विनोद खन्ना : एक दिलकश मुस्कान का व्यक्तित्व 1
साभार : Koimoi.com
यूँ तो मुमकिन नहीं चंद लफ़्ज़ों में बयां, ये दिलकश दास्तां उसकी।
चंद शब्दों की रवानी है, जाने कितने दिलों में समाई ये कहानी है।।
हिंदी सिनेमा में एक उत्कृष्ट अभिनेता और राजनीति में एक बेहतरीन राजनेता के तौर पर पहचाने जाने वाले विनोद खन्ना हमेशा ही सिल्वर स्क्रीन पर अपने स्टारडम के लिये पहचाने जाते रहे। उनकी दिलकश मुस्कान सदा ही उनके व्यक्तितत्व का एक खास हिस्सा रही। भले ही इस मुस्कान के पीछे गहरी सोच रखने वाला ‘मन’ कई बार संसार को आश्चर्यचकित भी करता रहा, लेकिन शायद इसी मन की तह में जाने कितने प्रश्न छुपे होंगे जिन्होंने विनोद को जीवन-मरण के रहस्यों से रु-ब-रु होने के लिये विवश किया होगा, तभी तो अपने जीवन के सफलतम दौर में भी वह सब कुछ त्याग कर आध्यात्मिकता की राह पर चल पड़े थे।
उन्होंने इस यात्रा में क्या पाया था और कितने रहस्यों का निवारण कर पाए थे विनोद! यह विषय तो निःसन्देह उनकी निजी और आंतरिक साधन का विषय था, अतः इस बारे में बात करना तो नितांत ही व्यक्तिगत होगा। बरहाल उनकी रहस्यमयी जीवन गाथा के कुछ पन्ने जरूर साझा किए जा सकते हैं।
ब्रिटिश शासन काल के पेशावर (वर्तमान में पाकिस्तान में) में 6 अक्तूबर 1946 को जन्म लेने वाले विनोद के पिता किशन लाल खन्ना टेक्सटाइल,डाई-केमिकल के व्यवसाय से जुड़े हुए थे। जन्म के एक वर्ष बाद ही बंटवारे के दौर में, पांच भाई-बहनों सहित उनका परिवार पेशावर से ‘बॉम्बे’ (आज की मुम्बई) आ बसा था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली-मुम्बई के अलग-अलग स्कूलों में हुई। किशोरावस्था यानि 1960 के बाद उनकी स्कूली शिक्षा नासिक के एक बोर्डिग स्कूल में हुई और बाद में उन्होंने ‘सिडेन हैम कॉलेज’ से वाणिज्य में स्नातक किया था। स्कूली शिक्षा के दौरान ही विनोद खन्ना ने ‘मुगल-ए-आज़म’ जैसी फ़िल्म देखीं, जिसका उन पर गहरा असर पड़ा। हालांकि विनोद बचपन से ही बेहद शर्मीले थे, लेकिन स्कूल के दौरान ही उन्हें एक बार एक टीचर ने जबरन किसी नाटक में अभिनय करवाया, और शायद यहीं से उनके मन में अभिनय की इच्छा पनपने लगी थी। हालांकि उनके पिता हमेशा यही चाहते थे कि उनका बेटा फिल्मों की बजाए उनके परिवारिक व्यवसाय में हाथ बंटाए लेकिन विनोद के निरंतर किए गए प्रयासों के बाद उनके पिता ने उन्हें दो वर्षों का समय दे दिया कि वह इन दो वर्षों में यदि सफल नहीं हुए तो उन्हें अपना परिवारिक व्यवसाय संभालना होगा। और इन्हीं दो वर्ष में विनोद ने मॉडलिंग के जरिये फ़िल्म संसार में अपना मुक़ाम तलाश कर लिया था।
विनोद का फ़िल्मी सफर जब शुरू हुआ, जब वह एक पार्टी के दौरान चर्चित अभिनेता ‘सुनील दत्त’ से मिले। यही से उनके जीवन का रुख बदला और वह अपने पिता के व्यवसाय संभालने की जगह एक अभिनेता बनने के रास्ते पर चल निकले। अजंता_आर्ट्स के बैनर तले, निर्माता सुनील दत्त और ए सुब्बाराव के निर्देशन में बनने वाली इस फ़िल्म के जरिये चार नए चेहरों को सिनें पर्दे पर उतारा गया था। ये चार नाम थे। सोमदत्त (सुनील दत्त के भाई), संध्या रानी, लीना चंद्रावरकर एवं  विनोद खन्ना। और फ़िल्म थी ‘मन का मीत’ (1968)। हालांकि हैंडसम विनोद इस फ़िल्म में विलेन के रूप में लांच किए गए थे लेकिन यह एक आश्चर्य ही रहा कि इस फ़िल्म से अभिनय यात्रा शुरू करने वाले चारों चेहरों में से विनोद ही सबसे अधिक चर्चित हुए और उनकी खलनायकी चल निकली।
ये हिंदी सिनेमा का वह दौर था जब एक ‘स्टार’ से जुड़े सभी समीकरण बदल रहे थे। ठीक ऐसे समय में विनोद की एंट्री बतौर खलनायक हुयी थी। और यह पहला ‘एन्टी-नायक’ था जिसकी पहचान उसकी पर्सनल्टी और मोहक मुस्कान से नायक की तरह हुई। दिलकश अदाओं के लिए पहचाने जाने वाले कई सितारों के बीच विनोद जी की खूबसूरती और उनका अंदाज एक गज़ब बन कर हिंदी सिनेमा में छा गया और ‘आन मिलो सजना’, ‘सच्चा झूठा’ (1970), ‘रखवाला’, ‘मेरा गांव मेरा देश’ (1971) जैसी फिल्मों ने विनोद को बतौर सफल खलनायक बॉलीवुड में स्थापित कर दिया।
लेकिन शायद विनोद के अंदर का अभिनेता अभी इतने से संतुष्ट नही था और वह किसी बेहतर अवसर की तलाश में था। यह तलाश पूरी हुयी ‘गुलजार’ से मिलकर, जिनकी फ़िल्म ‘मेरे अपने'(1971) से उसने सफलता का एक और आगाज किया। ये एक महज संयोग ही था कि गुलजार ने भी बतौर निर्देशक करियर की शुरूआत इसी फ़िल्म से की थी। छात्र राजनीति पर आधारित इस फिल्म में अहम भूमिका मीना कुमारी जी ने निभाई थी लेकिन फिल्म में विनोद खन्ना और शत्रुध्न सिन्हा के बीच का संघर्ष और आपसी संवाद देखने लायक थे। अपना अभिनय कौशल दिखाने का अवसर विनोद को एक बार फिर मिला जब उन्होंने गुलजार के साथ ही फिल्म ‘अचानक’ (1973) में काम किया और ये फ़िल्म उनके करियर की एक यादगार हिट फिल्म साबित हुई। इस फ़िल्म की खासियत थी कि इसमें कोई गीत नहीं था।
नायक-खलनायक की अदाकारी के बीच ‘कच्चे धागे(1973), ‘पत्थर और पायल’, ‘हाथ की सफाई’ (1974) जैसी फिल्मों के बीच आई फ़िल्म ‘इम्तिहान’ (1974) ने विनोद को पूरी तरह नायक के तौर पर स्थापित कर दिया और अंततः वर्ष 1977 में आई फिल्म ‘अमर अकबर ऎंथोनी’ ने उन्हें सफल अभिनेताओं के शीर्ष पायदान पर ला खड़ा किया। मनमोहन देसाई के निर्देशन में बनी यह फिल्म (अमर अकबर एंथोनी ) तीन भाइयों के ‘खोया पाया’ फार्मूले पर आधारित थी जिसमें उनके साथ शीर्ष अभिनेता अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर भी थे। उस दौर में मल्टीस्टारर फिल्मों से विनोद को कभी परहेज नहीं रहा और वे उस समय  के सभी स्टार्स अमिताभ बच्चन,राजेश खन्ना,धर्मेंद्र सुनील दत्त आदि के साथ फिल्में करते रहे। यह दौर वह भी था, जब विनोद निरंतर अध्यात्मिकता की ओर बढ़ रहे थे। उनका निरंतर ‘ओशो’ के संपर्क में रहना उनके जीवन की नई दिशा तय कर रहा था।
वर्ष 1978 में आई फ़िल्म ‘मुक़्क़दर का सिंकदर’ और 1980 में आई फिल्म ‘कुर्बानी’ ने विनोद को सफलता के उच्चतम शिखर पर ला खड़ा किया। फिरोज खान के निर्माण और निर्देशन में बनी इस फिल्म के लिए विनोद को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फिल्म फेयर पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया। यही वह दशक था जब विनोद को सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के सम्मुख उनके सिंहासन का दावेदार माना जाने लगा था, लेकिन इसके विपरीत यही वह समय भी था जब विनोद ने 1982 में फिल्म इंडस्ट्री को अलविदा कह कर लाखों दिलों को चोट दी थी और अपना संपूर्ण वैभव छोड़कर अपने गुरु आचार्य रजनीश के आश्रम में जा एक संयासी का जीवन अपना लिया था।. . .
फिर कुछ वर्ष इसी तरह बीत गए, विनोद के लौटने की अटकलें लगती रही और समय-समय इसकी चर्चा होती रही। सात वर्ष के लंबे अरसे के बाद अटकलों को विराम मिला और वर्ष 1987 में विनोद ने अपनी फ़िल्मी पारी को एक बार फिर से फिल्म ‘इंसाफ’ से शुरू किया और साथ ही सफलता का एक नया अध्याय लिखा। उसके बाद वर्ष 1988 में फिरोज खान के बैनर में आई फ़िल्म ‘दयावान’ को समीक्षकों द्वारा उसके करियर की उत्कृष्ठ फिल्मों में से एक माना गया, हालांकि व्यवसायिक तौर पर फ़िल्म बहुत अधिक सफल नही हो सकी, लेकिन चर्चित बहुत हुई। इसके बाद जल्दी ही ‘बंटवारा'(1989), ‘जुर्म’ (1990), ‘फ़रिश्ते'(1991), और ‘क्षत्रिय’ (1993) जैसी फिल्मों के बाद उनका कैरियर बतौर नायक ढलने लगा। वर्ष 1999 में विनोद को फ़िल्मों में उनके 30 वर्ष से अधिक भी समय के योगदान के लिए फिल्मफेयर के लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया।
जीवन की इसी पारी में विनोद ने राजनीति में भी प्रवेश किया करीब 23 वर्ष् पहले (1997 से) विनोद जी ने समाज सेवा को अपना लक्ष्य मान राजनीति में प्रवेश किया था और भारतीय जनता पार्टी में शामिल होकर गुरुदासपुर लोकसभा सीट से 1998 में वे संसद में चुन कर गए थे। तत्पश्चात 1999 में फिर से जीतने के बाद उन्हें 2002 में अटल जी की सरकार में केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री बनाया गया था। बाद में उन्होंने विदेश मंत्रालय में विदेश राज्य मंत्री का कार्यभार भी संभाला। हालांकि 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में वे चुनाव हार गए लेकिन बाद में 2014 में वे फिर से संसद के लिए चुने गए थे। वह पहले बॉलीवुड अभिनेता थे जो चार बार सांसद बने। राजनीति के साथ उनका फिल्मी कैरियर का तीसरा पड़ाव भी चलता रहा जिसमें विनोद ने कई फिल्मों में पिता की भूमिका भी निभाई, जिनमें  सलमान खान के पिता की भूमिका वाली ‘वांटेड’ (2009) और ‘दबंग,(2010) दबंग-2 (2012), जैसी फिल्में काफी चर्चा में भी रही। फिल्मों के अलावा विनोद ने ‘छोटे पर्दे’ पर भी अपनी अभिनय प्रतिभा का रंग ‘महाराणा प्रताप’ और ‘मेरे अपने’ जैसे धारावाहिकों में बहुत शिद्द्त से बिखेरा था।
पंजाब के गुरदासपुर से तीन बार सांसद रहने के दौरान और फिर पठानकोट में जिस तरह उन्होंने जनसाधारण के लिये हर संभव आगे बढ़कर काम किया, वह अपने आप में एक उम्दा उदाहरण है।  अपने अंतिम दिनों में अपने स्वास्थ्य कारणों से कुछ कम सक्रिय थे लेकिन फिर भी हर संभव प्रयास से वे अपनी दोनों भूमिकाएं ‘नेता और ‘अभिनेता’ को बखूबी निभाने का प्रयास कर रहे थे कि वर्ष 2017 के शुरू में उन्हें डीहाइड्रेशन की परेशानी के चलते मुम्बई के एच एन रिलायंस अस्पताल में भर्ती कराया गया, यही उनके ब्लेडर कैंसर की बात जनसाधारण के सामने आई और इसी के चलते विनोद 27 अप्रेल 2017 के दिन इस नश्वर संसार को छोड़ परमधाम को चले गए।
शायद यही थी उनके जीवन की आध्यात्मिकता यात्रा की प्राप्ति जिसके फलस्वरूप उन्होंने जीवन और जीवन के मायने सिखाती विचारधारा को न केवल खुद अपनाया बल्कि जाने से पहले, अपने साथ जुड़े कार्यकर्ताओं को भी बतौर विरासत दे गए। वर्ष 2018 में उन्हें सम्मान देते हुए, मरणोपरांत भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च पुरस्कार, दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया, जो उनके अनिगिनित प्रशंसकों की तरफ़ से उन्हें एक भाव भीनी श्रद्धांजलि भी थी।
सच कहा जाए तो यह सब किसी बायोपिक-स्टोरी से कम नहीं था। एक बेजोड़ कलाकार, अजीम शख्सि‍यत, हरफनमौला अंदाज, अपने वजूद से जुड़ाव और सबके लिए कुछ करने का जज्बा। बस यही थी इनका संपूर्णता। कभी न भुलाया जाने वाला शख्स। विनोद खन्ना।

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