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सुधा जुगरान की कहानी – इक्कीसवी सदी की नायिका

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कैसे हां बोल दूं…?” मौलिश्री बड़बड़ा रही थी, “आप जानती है न कि मेरी कंपनी की कोई ब्रांच दिल्ली में नहीं हैनीना हैरान सी बेटी का चेहरा निहारती रह गई।
लेकिन ऐसे तेरी शादी कैसे होगी..?” नीना ने अपना घिसा-पिटा प्रश्न दोहरा दिया, “हर रिश्ते में कोई न कोई कारण बता कर मना कर देती है
हां तो क्या…मैरिज इज नॉट माई कप ऑफ टी..”  कह कर मौलिश्री दनदनाती बाहर निकल गई। 
नीना बाहर आकर बरामदे में बैठ गई। शाम गहरा रही थी। अक्टूबर का महीना…त्यौहारों का मौसम, इसी बहाने ही तो उसने मौलिश्री को बेंगलुरु से घर बुलाया था। बेटे ने भी दीदी को समझाया,
दीदी आप समझती क्यों नहीं…मम्मी की एंजाइटी बहुत बढ़ रही है…ज्यादा बढ़ गई तो कहीं डिप्रेशन में न चली जाएं..
मम्मी की एंजाइटी मेरे कारण नहीं बढ़ रही…अकेलेपन से बढ़ रही हैमौलिश्री भन्ना गई थी। इसी डर से तो वह लंबे समय से चंडीगढ आने का प्लान नहीं कर रही थी।
उसे आए अभी 7-8 दिन ही हुए थे। लेकिन किसी न किसी रिश्ते को लेकर दोनों में घमासान हो जाता। 
बरामदे में बैठी नीना समझ ही नहीं पा रही थी कि आखिर इस पीढ़ी की लड़कियां विवाह से इतनी खार क्यों खाए बैठी हैं। क्यों नहीं जरूरत समझती हैं शादी की। रंजन कितनी जल्दी हाथ छुड़ा कर चले गए थे। अकेले जिंदगी के उबड़-खाबड़ रास्तों पर गिरते पड़ते कितनी मेहनत से उसने बच्चों को उनकी मंजिल तक पहुंचाया था।
बेटा शमिक डॉक्टर है। उसे एक डॉक्टर लड़की पसंद है। इसलिए उसकी चिंता नहीं है। लेकिन 32 साल की पूरी होने जा रही मौलिश्री का क्या करे। नीना जब भी इस बात को अधिक सोचती है, उसकी एंजाइटी बढ़ जाती है। घबराहट होने लगती है, शरीर अशक्त और नींद भूख सब गायब। पस्त सी उसने सिर पीछे टिका कर आंखें बंद कर ली। नेपथ्य से कुछ आवाजों का शोर मस्तिष्क पटल पर प्रहार कर रहे थे।
आज कॉलेज मत जाना….लड़के वाले आ रहे हैंकॉलेज के लिए तैयार होती नीना से पिताजी ने कहा तो हतप्रभ सी नीना किचन में मां के पास जा कर खड़ी हो गई। 
यह क्या है मां….?” वह गुस्से में बोली।
क्या…क्या है?” मां ने सब्जी छौंकने के लिए कढ़ाई स्टोव पर चढ़ा दी।
जो पिताजी कह रहे हैं
तेरे पिताजी ठीक कह रहे हैंमां कढ़ाई में तेल को घूरते हुए उसके गर्म होने का इंतजार करने लगी।
मां यह तुम्हारा जमाना नहीं है…यह भी कोई उम्र है शादी की। 21 की ही हुई हूं अभी
जब तक शादी होगी…तब तक 22 की हो जाएगी, जमाना इतना भी नहीं बदला हैमां ने गर्म तेल में तड़का डाल दिया था।
मुझे अभी शादी नहीं करनी है…नीना ने अपना फैसला सुनाया।
बेटी का विवाह माता-पिता की पहली जिम्मेदारी है…अब जा और तैयार होमां ने सब्जी छौंक दी। छौं की आवाज और तेल के घुएं के साथ उसके सारे अरमान भी वाष्प बन कर उड़ गए थे। 
पढ़-लिख कर भी वह मां की ही तरह उन्हीं परंपराओं को निभाने एक घर से दूसरे घर में आ गई थी। एक खूंटे से दूसरे खूंटे पर बांध दी गई थी। हां, मां की पीढ़ी की अपेक्षा उसकी रस्सी कुछ रेशमी व दायरा कुछ अधिक था। इसलिए वह कुछ दूर तक टहल सकती थी। लेकिन मां की अपेक्षा अधिक शिक्षित होने के कारण उसके खूंटे व उसकी स्वतंत्रता के परिधि की सीमाओं के बीच जिम्मेदारियों के टीले कुछ ज्यादा उग आए थे। इन सब के मध्य वह किन्हीं खुशफहमियों के पलों में अपने खूंटे व परिधि के बीच उगे टीलों और खोहों में टहलती खुद को ढूंढने का असफल प्रयत्न करती…..
      लेकिन इसी रस्साकस्सी में एक दिन खूंटा ही उखड़ गया। वह अचंभित सी अपने जीवन की असीमित सीमाओं व उबड़-खाबड़ रास्तों को ताकती रह गई। तब महसूस हुआ कि खूंटे की बुरी आदत हो गई थी। कभी सीमाओं का अतिक्रमण करती उसकी जिजीविषा पर जब खूंटा रस्सी को खींच कर झटका देता तो उसे बहुत बुरा लगता था। लेकिन अब उन अनंत सीमाओं से भय लगने लगा था। खूंटे पर बंधे रहना सुरक्षित लगता था। 
खूंटा उखड़ गया था, इसलिए रस्सी भी लस्त-पस्त इधर-उधर पड़ी थी। लेकिन अधिक दिन इस सोच में न डूब सकी। बीएड थी, एक प्राइवेट स्कूल में बमुश्किल नौकरी मिल गई। नौकरी के रुपयों से कुछ नहीं हो सकता था। लेकिन अघ्यापिका के तमगे ने ट्यूशन दिलाने में मदद की। जिंदगी की गाड़ी उबड़-खाबड़ रास्तों पर हिचकोले खाते चलने लगी।
धीरे-धीरे वह पथरीला रास्ता भी नप गया और जिंदगी कुछ-कुछ बहने का अहसास देने लगी। शमिक डॉक्टर और मौलिश्री इंजीनियर बन गई। लेकिन मात्र एक ही पीढ़ी में लड़कियों की सोच का अंतराल उसे हतप्रभ करने लगा। 
रात के खाने के मध्य विराट चुप्पी सबको डस रही थी। सब कुछ उल्टा-सीधा समेट वह अपने बेडरूम में चली गईं। मुश्किल से आई नींद अल्लसुबह ही खुल गई। नित्यकर्म से निबट वह फिर बाहर बरामदे में बैठ चाय पीते हुए फूल, पत्ती, आसमान के विस्तार, उड़ते हुए पक्षियों को बिना मतलब यूं ही बहुत देर तक घूरती रही, जैसे अपने अंदर लटकते-पछड़ते धागों के सिरों को ढूंढ रही हो।
शमिक और मौलिश्री उसके अंदर उठते खामोश तूफान को समझ रहे थे, फूटने को तैयार वोलकेनो के लावे की तासीर को महसूस कर रहे थे। तभी कामवाली रानी उसके पास आकर बैठ गई।
क्या हुआ भाभीजी…यहां काहे बैठी हो ऐसे चुपचाप…उसने असमान के विस्तार से नजरें उतार कर रानी के चेहरे पर टांग दी।
बस ऐसे ही…फिर एक लंबी सांस भर कर बोली,  “तेरी बिटिया का रिश्ता तय हुआ कहीं….क्या उम्र हो गई राधा की?”
इस मार्च में 26 की हो जाएगी
अरे! तुम लोगों में तो यह उम्र बहुत ज्यादा है…अब मीन मेख मत निकाल, फटाफट कर दे
ऐसे कैसे फटाफट कर दूं भाभीजी…एमए. किया है, ब्यूटिशियन का भी कोर्ष कर रखा उसने…खुद कमाती है। लड़के वालों के नखरे देखो तो….मोटर साइकिल चाहिए, चाहे औकात पेट्रोल भरने की न हो। लड़की शादी के बाद नौकरी नहीं करेगी…घर का काम आना चाहिए…शादी में कितना खर्च करेंगे…मैंने तो साफ कह दिया…लड़की नौकरी जरूर करेगी…खर्च उतना ही करूंगी, जितना मेरी जेब में टका होगा…घर का काम करेगी पर किसी की नौकर बन कर न रहेगी…चाहे न हो शादीवह हतप्रभ सी रानी का चेहरा देखती रह गई। 
रानी की जमात की औरतें भी सोच कितनी खुली रखने लगी हैं। नहीं जल्दी है उसे आनन-फानन में बेटी का ब्याह निबटाने की। रानी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है। बच्चों को अपने बलबूते पढ़ाया है उसने। शराबी पति पी कर ज्यादा बक-बक करता है तो रानी दो चार जूते लगा कर कोठरी में बंद कर देती है। नशा उतरने के बाद गिड़गिड़ता है तब दरवाजा खोलती है। 
इस समय भी उसकी निगाहें रानी के चेहरे पर टिकी अतीत की पगडंडियों पर विचरण कर रही थीं। रानी उठ कर चली गई। उसने दरख्तों से लिपटी, इधर-उधर छिटकी उगते सूरज की रश्मियों पर अपनी दृष्टि आबद्व कर दी।
 रितिक का नाम कहीं दूर ह्रदय की गहरी घाटियों से आवाज देने लगा था। आंखों के कोर कुछ नम हो आए। उसने झटके से स्मृतियों के दरवाजे बंद कर दिए। अकेले रहना उसके लिए आसान नहीं था। बेटी को अपने अकेलेपन से प्यार क्यों कर है। वह समझ ही नहीं पा रही थी। नौकरी में व्यस्त तो वह भी थी। दो बच्चों का साथ भी था फिर? क्यों खलती थी उसे कोई कमी? क्यों चाहिए थी उसे किसी की सुरक्षा? क्यों भावनात्मक रूप से कमजोर पाती थी खुद को? आखिर क्यों? आजकल की लड़कियों को यह सब क्यों नहीं खलता।
तभी मौलिश्री की आवाज सुनाई दी, उसने दरख्तों से हटा कर अपनी दृष्टि मौलिश्री के चेहरे पर जमा दी, “मम्मी मैं कुछ काम से राशि के पास जा रही हूं। आप इंतजार मत करना। खाना खा लेनास्कर्ट और टॉप में सजी, चुस्त-दुरस्त मौलिश्री उसे सूचना देकर चली गई। उसके सेंडिलों की ठक-ठक की आवाज उसे बहुत देर तक हथौड़े की तरह ठकठकाती रही।
वह उठ कर अंदर आ गई। अनायास ही उसके कदम बेटी के कमरे की तरफ मुड़ गए। अस्त-व्यस्त बिस्तर, खुला लैपटॉप, आधी खुली अटैची जिसमें कपड़े अंदर कम बाहर ज्यादा थे। गंदा-बिखरा कमरा। नीना का दिल किया खूब बड़बड़ाए। लेकिन पस्त होती चैतन्यता के साथ वह बेटी का कमरा व्यवस्थित करने लगी। बिस्तर ठीक कर, अटैची ठीक से लगाने के लिए सारे कपड़े बाहर खींच लिए। अटैची की साइड की जेब टटोली तो जो चीज हाथ में आई उसे उसने बिच्छू के डंक मारने जैसे जोर से दूर फेंक दिया। वह एक गर्भ निरोधक टेबलेट की स्ट्रिप थी। 
गर्भ निरोधक गोलियां क्या मौलिश्री लेती है? वह हतप्रभ रह गई। लेकिन क्यों? अगर उसका किसी से इतनी नजदीकी रिश्ता है तो फिर शादी क्यों नहीं? क्या इक्कीसवीं सदी की लड़की की सोच इतनी खुली हो गई कि पेट की भूख की तरह यह भी एक भूख ही है बस। अन्य जरूरतों की तरह जीवन की एक जरूरत। पुरुष की ही तरह क्या स्त्री ने भी अपनी भावनाओं को नियंत्रित कर भौतिक स्तर पर जीना सीख लिया? आखिर कितना सही है यह? उससे कुछ सोचा नहीं जा रहा था। उसकी चैतन्यता लुप्तप्रायः हो रही थी। ह्रदय की गहरी कंद्राओं से रितिक फिर कातर स्वर में आवाज देने लगा था। उसका प्रणय निवेदन लुप्त होती चेतना के बीच स्मृतियों में कहीं अटक गया था। जिन बेड़ियों को पहन कर उसने अपनी जिंदगी के तमाम बसंत गुजार दिए। उन्हीं वर्जनाओं को बेटी तोड़ रही है बिना किसी डर व झिझक के। 
 नीना खुद को संभालने के प्रयास में डूबती जा रही थी। घबराहट बेचैनी, सीने में दर्द पसीना…वह समझ नहीं पा रही थी, उसे हो क्या रहा है। उसे सांस उखड़ने जैसा अहसास हो रहा था। सोचा शमिक को फोन करे…लेकिन उसे फोन करने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी। उसने उठने का प्रयत्न किया और एक चक्कर खाकर बेहोश हो बिस्तर पर गिर पड़ी। 
उसे पता नहीं उसके बाद क्या हुआ। उसने जब आंखें खोली तो खुद को अस्पताल में आईसीयू के बेड पर कुछ मशीनों के साथ पाया। नर्स की नजर उसकी खुली आंखों पर पड़ी, वह डॉक्टर को बुलाने के लिए दौड़ गई। आनन-फानन में डॉक्टर्स की टीम आकर उसे चेक करने लगी। उसने निगाहें इधर-उधर घुमा कर देखा, डॉक्टर्स के पीछे शमिक खड़ा था। उसकी निगाहें मौलिश्री को ढूंढ रही थीं। 
डॉक्टर्स उसे चेक कर के संतुष्ट थे। स्ट्रेस व एंजाइटी की वजह से माइनर हार्ट अटैक आया था। अब घबराने वाली कोई बात नहीं। इन्हें खुश रखने की कोशिश कीजिएसीनियर कार्डियोलौजिस्ट डॉक्टर दत्ता शमिक से कह रहे थे। नीना का दिल किया, उनसे पूछे। खुश रहने की कोई गोली हो तो दीजिए…आपको पता भी है मेरे दुख का कारण। लेकिन दोनों ही बातें नहीं हो सकती थी। उसने आंखें बंद कर ली। 
शाम तक सब ठीक रहा तो इन्हें रूम में शिफ्ट कर देंगेकहते हुए वे बाहर चले गए और साथ ही शमिक भी। 
नीना का अशांत मन फिर भटकने लगा। बंद पलकों की छांव तले दूर कहीं से आवाज देता रितिक का आर्द्र स्वर अब स्पष्ट सुनाई देने लगा था। मैं तुम्हें प्यार करने लगा हूं नीना…आखिर ऐसे अकेले जीवन गुजार देने की क्या तुक है?‘ 
बच्चों की किशोर उम्र है…उनका जीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा
बच्चों का जीवन बनाने के लिए तुम अस्त-व्यस्त नहीं हो रही हो?‘
इसी का नाम मां है…एक स्त्री अपनी संतान के प्रति स्वार्थी नहीं हो सकती
इसमें स्वार्थी होने वाली कौन सी बात है…तुम्हारे प्रयत्नों के साथ मेरे प्रयत्न भी शामिल हो जाएंगे
नहीं रितिक….घोर निराशा के क्षणों में तुम सामने आ गए और मैं भावनात्मक रूप से टूट सी गई….लेकिन अब संभल गई हूं
संभल नहीं गई हो बल्कि हिम्मत जुटा रही हो संभलने की…हर स्तर पर तुम्हें मेरी जरूरत है
नहीं किसी भी स्तर पर नहीं‘ 
अपनी नैसर्गिक जरूरतों को यूं मत दबाओ…शादी कर लो मुझसे
मेरी कोई नैसर्गिक जरूरत नहीं…बच्चों का भविष्य बनाना ही मेरा उद्देश्य है
कितने साल बीत गए…शायद 16 या 18 साल। रितिक चला गया था। उसकी तटस्थता से टकरा कर आखिर उसने अपने कदम मोड़ ही लिए और वह एक त्यागमयी, गरिमामयी स्त्री का ताज पहने अपनी नैसर्गिक जरूरतों के खिलाफ खुद से खुद ही युद्व छेड़े रही। रितिक की यादें कभी-कभी दिल को बेध डालती थी। पर उसे कभी अपने निर्णय पर पछतावा नहीं हुआ। लेकिन आज खोखले क्यों लग रहे हैं अपने आदर्श?
उसने बच्चों के लिए, खास कर बेटी के भविष्य के लिए, अपने जिन तन-मन व भावनात्मक जरूरतों पर पहरे बिठा दिए। उसकी जीवन भर की उसी कमाई को बेटी पल भर के सुख के लिए यूं उड़ा रही है। जिन राहों पर वह संभल-संभल कर कदम रखती रही, उन्हीं राहों पर बेटी ने दौड़ लगा दी और उसे इस बात का कोई गिल्ट तक भी नहीं। वह मजे से अपने लिए आए रिश्तों की खामियों और खूबियों पर चर्चा कर रही है। बहस कर रही है।
शाम को नीना को प्राइवेट रूम में शिफ्ट कर दिया गया। शमिक उसकी हथेली अपने हाथों के बीच दबाए चुप बैठा था। न उसने पूछा, मौलिश्री कहां है और न शमिक ने बताया। तूफान के बाद का सन्नाटा था जिसे दोनों पी रहे थे।
मैं अस्पताल कैसे पहुंची शमिक..?” एकाएक नीना ने पूछा।
दीदी लेकर आईं…उन्होंने मुझे फोन किया था पर मैं एक ऑपरेशन में था
कैसे लेकर आई…नीना चौंक कर बोली।
मम्मी आपको यह भी याद नहीं शायद कि आज मेरी कार घर पर ही थी…शुक्र है, वरना देर हो जाती तो अनर्थ हो जाता
उसके सामने पति के अंतिम क्षणों का मंजर घूम गया। रंजन छाती के दर्द को दबाए तड़फ रहे थे। सामने कार खड़ी थी लेकिन उसे ड्राइव करनी नहीं आती थी। जब तक पास पड़ोस से मदद मांगी तब तक देर हो गई। अस्पताल के गेट तक पहुंचते-पहुंचते सब कुछ बिखर गया था। 
लेकिन वह तो मेरे सामने ही राशि को मिलने चली गई थी
राशि दीदी को कहीं जाना पड़ा। जाने के एक घंटे के अंदर ही दीदी वापस आ गईं थीं। शायद आपको बेहोश हुए अधिक समय नहीं हुआ था…इसीलिए..भावुक हो शमिक ने मम्मी का सिर सहला कर माथे पर चुंबन अंकित कर दिया था।
नीना चुप हो गई। वह समझ नहीं पा रही थी, क्या सही है और क्या गलत।
मम्मी मैं घर जाकर दीदी को भेजता हूं….खाना बना कर ले आऊंगा…दीदी कह रही थीं वे रात में आपके पास रुकेंगी…मैं घर पर रहूंगा
अरे यह उल्टी गंगा किसलिए बहा रहे हो…नीना आश्चर्य से बोली।
कौन सी उल्टी गंगा….सब गंगाएं सीधी हैं मम्मी…बस सोच-सोच का फर्क हैकह कर शमिक बाहर निकल गया। शमिक की बात के अर्थ में डूबती-उतराती वह आंखें बंद कर सोने की कोशिश करने लगी। दवाइयों के प्रभाव से नींद आ गई। पता नहीं कितनी देर तक सोती रही।
माथे पर गर्म हथेली के स्पर्श से उसने आंखें खोल दी। मौलिश्री उसके तकिए के पास स्टूल पर बैठी उसे ममता से निहार रही थी। उसके आंखों के भावों ने नीना के मन के भावों को पल भर के बदल डाला। लेकिन क्षण भर में ही पुराने विचार दिमाग पर हावी हो गए। उसने मुंह पलट दिया। मौलिश्री नीना की हथेली अपने दोनों हाथों में लेकर सहलाने लगी,
मम्मी, नाराज हो मुझसे…?” स्निग्ध भीगे स्वर में वह बोली। नीना ने कोई जवाब नहीं दिया।
मुझे मालूम है कि आप नाराज हैंनीना फिर भी दूसरी तरफ देखती रही।
मम्मी….” 
कौन है वह..?” नीना ने सपाट स्वर में प्रश्न दाग दिया। मौलिश्री थोड़ी देर खामोश रही। 
आप मेरी तरफ देखिए…मेरी आंखों में…मैं सब कुछ बताऊंगी
मम्मी प्लीज…नीना ने पलट कर एक तटस्थ निगाह उसके चेहरे पर टिका दी।
अब बताओ….क्या आपको मेरी आंखों में कोई पाप नजर आ रहा है…क्या मेरी निगाहें झुकी हुई हैं
जिन्हें शर्म नहीं होती…उनकी निगाहें नहीं झुकती हैंनीना कड़वे स्वर में बोली। मौलिश्री का दिल-दिमाग पल भर के लिए क्षत-विक्षत हो गया।
मम्मी…वह किसी तरह खुद को संभाल कर संयत स्वर में बोली, “मैं और पारस पिछले 5 साल से लिव-इन में रह रहे हैं
लिव-इन में?” उसे एक झटका लगा, फिर चौंक कर बोली,  “लेकिन पिछले 5 साल में तो मेरा तेरे पास कई बार आना-जाना हुआ है…तेरे साथ तो कोई नहीं था…क्या छोड़ भी दिया इतनी जल्दी?”  नीना के स्वर में कड़वाहट और व्यंग एकसाथ उतर आए।
नहीं मम्मी…मालिश्री नीना का हाथ सहलाते हुए बोली,  “जब भी हम में से किसी एक के पेरेंट्स आते थे, हम अपने-अपने फ्लैट में रहने आ जाते थे
धूल झोंक रहे हो दोनों अपने घर वालों की आंखों मेंनीना के स्वर की तल्खी कम न हो पा रही थी।
धूल नहीं झोक रहे हैं…बल्कि घर वालों को दुख न पहुंचे इसलिए…नहीं बताना चाह रहे थे
जब 5 साल से साथ हो तो फिर विवाह क्यों नहीं?”  वह हताश सी बोली, “तू 32 की हो गई है…तुझे अभी भी अपने अच्छे-बुरे की समझ नहीं है…तेरी उम्र से मैं थोड़ी ही बड़ी थी…तेरे पापा के जाने के बाद मैंने अकेले कितनी कठिनाइयां सह कर तुम दोनों को बड़ा किया….तुझे अपने कर्तव्यों का जरा भी भान है
यह आपकी सोच है मां…वह लाड में बोली, “कौन से कर्तव्य पूरे नहीं किए मैंने…मैं अच्छी पोजिशन पर हूं…हर तरह से सक्षम हूं….आपकी जैसी स्थिति अगर मेरे साथ आ जाए तो मैं मानसिक, भावनात्मक व आर्थिक शक्तियों से मजबूत हूं और जब ये तीनों शक्तियां किसी लड़की के पास हों तो वह शारीरिक क्षमता से भी परिपूर्ण हो जाती है…क्योंकि उसके लिए राहें आसान हो जाती हैं, जरूरत पड़ने पर मैं आपके प्रति शमिक से अधिक कर्तव्य पूरे कर सकती हूं
तू अपनी आजादी का गलत फायदा उठा रही है
नहीं मां मैंने अपनी आजादी का कोई गलत फायदा नहीं उठाया। बल्कि मेरी जनरेशन की लड़की, पुरुष की ही तरह सचेत है अपने अधिकारों के प्रति…मुझे एक अच्छा लाइफ पार्टनर चाहिए…जाहिर सी बात है सिर्फ दुनिया के देखने की नजर से नहीं…बल्कि वह वास्तव में मेरे मैच का हो…मेरी पीढ़ी की लड़की हर कर्तव्य पूरा करने की क्षमता रखती है लेकिन अपने अरमानों को कुचल कर नहीं…अपनी भावनाओं को झुलसा कर नहीं…मुझे अपने मन से संतुष्ट होना है न कि दुनिया की निगाहों में..
तुम 5 साल से साथ रह रहे हो तो क्या विवाह की बात सोचोगे ही नहीं…ऐसे ही साथ रहोगे..?” नीना के चेहरे पर मां वाली बेबसी छा गई थी।
नहीं मां, हम शादी करेंगे….मैं चाहती थी सही मौके पर आपको पूरी बात बताऊं, पर आपका रिएक्शन जानती थी, इसलिए हिम्मत नहीं होती थी…शमिक बेटा है आपने उसकी पसंद को स्वीकार कर लिया…वे दोनों मिलते-जुलते हैं…1-2 दिन की छुट्टी चले जाते हैं…आप अपने दिल को तसल्ली दे देती हैं…लड़का है और मानने वाला भी नहीं है….आखिर लीशा भी तो बेटी है किसी की..
नीना खोई-खोई निगाहों से शून्य में ताकती रही। एक ही पीढ़ी में मानसिक, भावनात्मक व वैचारिक बदलाव ग्राह्य नहीं हो पा रहे थे। कुछ भी हो उसकी पीढ़ी के लिए यह एक तरह का कल्चरल शॉक है जिसे पचाना आसान नहीं।
मां…मौलिश्री स्नेह से नीना के सिर पर हाथ फेरती हुई बोली, “जरा सोचिए, कभी शादियां 10-12 की उम्र में होती थीं…फिर 16-18 की उम्र में होने लगीं और फिर 22-25 में। हर पुरानी पीढ़ी के लिए नई पीढ़ी का यह कदम हमेशा ही गलत रहा। लेकिन स्त्री हर बार, पुरुष-सत्ता से कुछ हद तक बाहर निकली। कभी घूंघट आम था, अब दुल्हन भी घूंघट नहीं रखती तो क्या बिगड़ गया। अब शादियों की उम्र 30 से ऊपर चली गई तो क्या शादियां होनी बंद हो गई। इतनी परिपक्व उम्र में विवाह देख समझ कर करना कोई बुरी बात तो नहीं। मेरा विश्वास करो मां जिस दिन पुरुष-स्त्री, पति-पत्नि के रूप में दोस्त बन जाएंगे यह धरती स्वर्ग हो जाएगी” 
लिव-इन में रहने वाले विवाह की प्रतिबद्धता नहीं समझते
पर मैं समझती हूं…हर तरह का नैतिक-अनैतिक हमेशा ही हुआ है मां….स्त्री ने हमेशा दुष्कर परिस्थितियों वश बहुत कुछ गलत-सही झेला है। आप मात्र 34 की थीं तब…सच बताओ मां…क्या कभी दिल नहीं किया किसी के सीने पर सिर रखने को, किसी की बाहों के विश्वास भरे घेरे में बंधने को…क्या कभी मन आर्कषित नहीं हुआ किसी की तरफ…क्या तन के संवेंगों ने सिर नहीं उठाया?”
नीना की आंखों से अविरल धारा बहने लगी। रितिक के शब्द गूंज गए। विवाह के बंधन में समाज व परिवार की डर से नहीं बंधना चाहतीं तो क्या हम मिल-जुल भी नहीं सकते…?‘ लेकिन उसके लिए जो अनैतिक था, उसी पर बेटी नैतिकता का पाठ पढ़ा रही थी।
मैं सब जानती हूं मां…आपकी पीड़ा समझती हूं। आपके अकेलेपन का इल्म है मुझे…लेकिन मुझे अपनी सीमाएं बढ़ाने के लिए किसी खूंटे की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है…लंबी रेशमी रस्सी मेरी जरूरत नहीं…और न मुझे अपनी खुशी के लिए खूंटे के मिजाज को परखने की जरूरत है। बल्कि मैं तो खूंटे को उसकी अपनी सीमा में बनाए रखने की कूवत रखती हूं
नीना के मस्तिष्क में बेटी की वाणी विश्वास तो भर रही थी। लेकिन संस्कारों से ओतप्रोत मन बेटी की कुछ दलीलों से अस्पृश्य भी था। कुछ भी कहे मौलिश्री, दो पीढ़ियों का गैप व द्वंद हमेशा ही दोनों पीढ़ियों को अपनी-अपनी जगह पर मथता ही रहेगा। यूं तो हर पहली पीढ़ी का अपनी नई पीढ़ी के विचारों को स्वीकार कर उनके साथ चलना हमेशा एक मजबूरी ही रही है। फिर भी जागरुक अभिभावकों ने जनरेशन गैप मिटाने की भरपूर कोशिश की है। लेकिन जिस विवाह-संस्कार ने परिवार-संस्था को जन्म दिया और परिवार संस्था ने एक सभ्य समाज को, सभ्य समाज ने एक सुरक्षित जिंदगी दी है। उसीका भविष्य खतरे में पड़ता दिखाई दे रहा है। पुरुषसत्ता जैसी मानसिकता रखने वाले पुरुष गलत हैं तो क्या उनका विरोध परिवार में रह कर नहीं किया जा सकता? उसके लिए विवाह-संस्था को ही धत्ता बता देना…कहां तक सही है…नहीं, मैं ऐसी स्वतंत्रता की पक्षधर नहीं हो सकती। पुरुषसत्ता में परिवर्तन स्त्री के विचारों की क्रांति से आएगा और स्त्री के विचारों में क्रांति स्त्री शिक्षा से आएगी न कि लिव-इन-रिलेशनशिप जैसे रिश्तों से। 
मौलिश्री”  आखिर नीना ने अपनी सुदीर्घ चुप्पी तोड़ी, “मैं तेरी प्रत्येक बात से इत्तेफाक रखती हूं। लेकिन तुम चाहे इसे जनरेशन गैप का नाम दो या मेरे संस्कारों का। मैंने विवाह अपनी इच्छा से नहीं किया और मैं उस पर खुद को कायम रख पाई, यह मेरी मर्जी थी। लेकिन मेरे जैसी स्थिति आने पर मैं किसी दूसरे को विवाह करने की राय अवश्य दूंगी। 
विवाह संस्कार पर मेरा अटल विश्वास है और यही शिक्षा दूंगी कि जब तुम्हारी पीढ़ी को हमने कमजोर नहीं बनाया है तो फिर विवाह से पलायन क्योंबच्चों व परिवार बसाने से पलायन क्योंजब खूंटे को उसकी सीमा में बनाए रखने की कूवत रखते हो तो फिर रस्सी को एक तरफ फेंक कर खूंटे के बगल में अपना खूंटा गाड़ने के बजाए खूंटे से पलायन का मार्ग क्यों चुन रही है तुम्हारी पीढ़ी। विवाह की उम्र कोई भी हो, लेकिन विवाह क्यों नहीं….नहीं मौलिश्री तुम मुझे कितना भी पाठ पढ़ा दोगी, लेकिन विवाह-संस्कार से मेरा विश्वास नहीं डिगेगा। मैं चाहती हूं, तुम जितनी जल्दी हो सके…पारस व उसके घरवालों को बुला लो या मुझे उनके घर ले चलो कह कर नीना मुंह फेर कर लेट गई। 
नीना के तर्कों ने मौलिश्री को एकाएक निरस्त्र कर दिया। नीना ने एक तरह से खुली चुनौति दे दी थी उसे। हिम्मत है तो सामना करो, पलायन क्यों?  लेटते हुए मौलिश्री सोच रही थी, कल पारस से आगे के प्रोग्राम के लिए बात करनी पड़ेगी। मम्मी ने तो उसकी पूरी पीढ़ी को ही चुनौति दे दी और वह इक्कीसवीं सदी कि नायिका के प्रतिनिधि के रूप में इस चुनौति को स्वीकार करती है। सोच कर मुस्कुराते हुए मौलिश्री ने आंखें बंद कर ली और सोने की कोशिश करने लगी।

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