लंदन में भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख श्री कुलदीप शेखावट ने दुख प्रकट करते हुए पुरवाई पत्रिका को बताया, “बांग्लादेश मैं हाल ही में हुई हिंदू विरोधी घटनाओं ने पूरे हिंदू समाज को झकझोर कर रख दिया है ! कल लंदन के बांग्लादेश हाई-कमीशन के सामने ब्रिटेन के हिंदू समाज ने एक प्रदर्शन किया! हमारा इतना ही कहना था की पूरे विश्व का हिंदू समाज एक है और किसी भी हिंदू को चाहे वो किसी भी देश का हो वो हमारे साथ है और हम सब एक है। वहाँ कि सरकार को हिंदू विरोधी गतिविधियों पर लगाम लगानी चाहिए!”
इस बार का संपादकीय बांग्लादेश में हिंदुओं की हो रही हत्याओं पर केंद्रित है। जिस तरह से आपने विभिन्न स्रोतों के माध्यम से वहां की वास्तविक घटनाओं को दिखाया है वह परेशान करने वाली है। कट्टरपंथी ताकतों के आगे जब सरकार घुटने टेक दे तो ऐसा होना स्वाभाविक है। यही स्थिति आज बांग्लादेश में देखने को मिल रही है।
अभी तक किसी मुस्लिम देश में यह सुनने को नहीं मिला है कि हिन्दू अपने लिए अलग देश चाहते हैं। या दूसरों की पूजा पद्धति से उन्हें दिक्कत है। वे जहां रहते हैं उस देश का हित ही चाहते हैं। लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश में यह स्थिति बन गई है कि अन्य धर्म के लोगों को जीने का हक ही नहीं है।
इस मामले में ये देश भारत को ब्लैकमेल करते हैं कि आप हमारी सहायता कीजिए नहीं तो हिन्दुओं की गर्दन हमारी मुट्ठी में है। हम मरोड़ देंगे। ऐसा पाकिस्तान करता रहा है। पाकिस्तान के एक राजनेता ने कहा था कि हिन्दू हमारा सुरक्षा कवच है। अब जब उस कवच को उन्होंने हटा लिया है तो उनकी हालत कैसी हो गई, यह किसी से छिपी हुई नहीं है।
आपकी इस बात से सहमत हूं कि आपरेशन सिंदूर की करारी हार से पाकिस्तान और अमेरिका बौखला गए हैं। इसलिए भारत के लिए बांग्लादेश के रूप में नया फ्रंट खोल दिया गया है। अब यह फ्रंट यूं ही चलता रहेगा। आपने चाणक्य वाली नीति का संदर्भ तो दिया है, पर वह कौन सी नीति है यह पाठकों पर छोड़ दिया है।
वार केवल सीमा पर ही नहीं लड़ी जाती है, बल्कि आपस में लड़ाकर भी जंग जीती जाती है। हिन्दू सिक्ख के मामले में ऐसा प्रयास हो रहा है।
इन निंदनीय घटनाओं के विरोध में लंदन से उठी यह आवाज बहुत दूर तक सुनाई दे रही है। हो सकता है कि पीड़ितों को धैर्य भी बंधा रही होंगी।
भारत के पक्ष-विपक्ष की बातें तो शोरगुल से ज्यादा कुछ नहीं है। हर बात पर किन्तु, परन्तु से पीड़ा को सहला लिया जाता है।
मैं तो कहता हूं कि कहीं पर भी हो, किसी भी देश में हो, मानव को जीवित रहने का अधिकार मिलना चाहिए। उन्हें पूरी स्वतंत्रता के साथ हर तरह की उन्नति करने की आजादी हो। यही सच्ची मानवता है।
आपका यह संपादकीय पीड़ादायक है। पर क्या किया जाए, सच्चाई से मुंह भी नहीं मोड़ा जा सकता है। अगर ऐसी स्थिति रही तो बांग्लादेश में अगले दस सालों में अल्पसंख्यक होंगे ही नहीं। बांग्लादेश पाकिस्तान की राह पर जो चल निकला है। मैं तो ईश्वर से यही प्रार्थना करूंगा कि मेरी यह बात कभी सत्य न हो।
पुरवाई अंतरराष्ट्रीय पत्रिका है, इसलिए उसमें अंतरराष्ट्रीय विषय आना स्वाभाविक है। पत्रिका अपने होने को सही सिद्ध करती है।
भारतीय उच्चायोग लंदन द्वारा वर्ष 2025 के लिए आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता से सम्मानित करने के लिए आपको बधाई सर
भाई लखनलाल पाल जी आपने लिखा है कि – “आपका यह संपादकीय पीड़ादायक है। पर क्या किया जाए, सच्चाई से मुंह भी नहीं मोड़ा जा सकता है। अगर ऐसी स्थिति रही तो बांग्लादेश में अगले दस सालों में अल्पसंख्यक होंगे ही नहीं। बांग्लादेश पाकिस्तान की राह पर जो चल निकला है”। आतंक का रास्ता सीधा रसातल की ओर ले जाता है।
पुरवाई के सम्मानित होने पर आपकी बधाई शिरोधार्य।
सम्माननीय सर, यह सम्पादकीय मात्र एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि समय के कठोर यथार्थ का निर्भीक, तथ्यात्मक और संवेदनशील दस्तावेज़ है। आपने बांग्लादेश में घटित घटनाओं को भावनात्मक उत्तेजना या अतिरंजना के बजाय ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, सामाजिक यथार्थ और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संकेतों के साथ प्रस्तुत किया है। बांग्लादेशी हिन्दुओं की पीड़ा को केंद्र में रखते हुए यह संपादकीय मानवाधिकार, अल्पसंख्यक सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता— तीनों प्रश्नों को एक साथ गम्भीरता से सामने रखता है।
शेख़ हसीना के कार्यकाल की उपलब्धियों का उल्लेख इस सम्पादकीय को ठोस आधार प्रदान करता है। आर्थिक विकास, वैश्विक निवेश, गरीबी में कमी और भारत-बांग्लादेश संबंधों में स्थिरता— इन तथ्यों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि जब शासन विवेकपूर्ण और समावेशी होता है, तब राष्ट्र प्रगति करता है और जब कट्टरपंथ हावी होता है, तब सबसे पहले सामाजिक सौहार्द, फिर आर्थिक विकास और अंततः राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ती है। यह तथ्यात्मक तुलना पाठक को सहज ही इस निष्कर्ष तक पहुँचाती है कि सत्ता परिवर्तन केवल राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि उसके दूरगामी मानवीय, सामाजिक और आर्थिक परिणाम होते हैं।
लंदन में बांग्लादेश उच्चायोग के सामने हुआ शांतिपूर्ण प्रदर्शन इस सत्य का सशक्त प्रमाण है कि बांग्लादेशी हिन्दुओं की पीड़ा अब केवल एक देश का “आंतरिक मामला” नहीं रह गई है। प्रवासी भारतीयों और वैश्विक हिन्दू समाज की एकजुटता यह दर्शाती है कि अन्याय चाहे जहाँ भी हो, उसकी प्रतिध्वनि सीमाओं को लांघकर अंतरराष्ट्रीय चेतना को झकझोरती है। इसके विपरीत, इस मानवीय मुद्दे को भारत-विरोधी नारों और खालिस्तानी उकसावे के माध्यम से भटकाने का प्रयास उस सुनियोजित रणनीति को उजागर करता है, जिसमें पीड़ितों की आवाज़ दबाकर राजनीतिक विद्वेष को हवा दी जाती है।
सम्पादकीय का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यह भारत से भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि रणनीतिक विवेक और कूटनीतिक दृढ़ता की अपेक्षा करता है। चाणक्य और चंद्रगुप्त की नीति का उल्लेख प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि यह संकेत है कि आज के जटिल भू-राजनीतिक परिदृश्य में नैतिक स्पष्टता और व्यवहारिक कूटनीति— दोनों का संतुलन अनिवार्य है। भारत का दायित्व केवल अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि पड़ोसी देशों में मानवीय मूल्यों, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के पक्ष में स्पष्ट एवं सुदृढ़ भूमिका निभाना भी है।
‘पुरवाई’ के इस अंक का यह सम्पादकीय किसी एक दल, विचारधारा या सत्ता-संघर्ष का पक्षधर नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और मानवीय गरिमा के पक्ष में खड़ा होने का साहसिक आह्वान है। इसकी प्रासंगिकता इसी में निहित है कि यह सुविधाजनक चुप्पी को अस्वीकार करता है और समय रहते चेतावनी देता है कि यदि कट्टरपंथ, हिंसा और अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों को अनदेखा किया गया, तो उसकी आँच केवल बांग्लादेश तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि समूचे उपमहाद्वीप की शांति, स्थिरता और विकास को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है; इसलिए यह सम्पादकीय न केवल विचारणीय है, बल्कि आज के समय की एक अनिवार्य चेतावनी भी है।
आपको चाणक्य और चंद्रगुप्त का उल्लेख पसंद आया, पढ़ कर बहुत अच्छा लगा। आप की बात से सहमत हैं कि हमारा संपादकीय “चेतावनी देता है कि यदि कट्टरपंथ, हिंसा और अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों को अनदेखा किया गया, तो उसकी आँच केवल बांग्लादेश तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि समूचे उपमहाद्वीप की शांति, स्थिरता और विकास को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।” आपका हार्दिक धन्यवाद।
एक बेहद ज़रूरी संपादकीय, धन्यवाद, पीढ़ा ये कि ये दर्द ब्रिटेन पहुंच गया लेकिन भारत में नहीं, इसे अपने देश की राजनीति की नंगई ही कह सकता हूं।
धन्यवाद आलोक भाई।
विचारणीय तथा महत्त्वपूर्ण संपादकीय
शुक्रिया अपूर्वा।
आज की संपादकीय विचारणीय है और उसमें बयान किया जा रहा हिंदुओं के प्रति दृष्टिकोण निंदनीय है और इसके लिए देश में में ही एक उदासीनता हमें ही लज्जित कर रही है।
समर्थन के लिये धन्यवाद रेखा जी।
बहुत क्षोभजनक स्थिति है। सातवीं निर्मम हिन्दू हत्या हो गयी है। यह कहां जाकर रुकेगी? और कैसे रुकेगी यह विचारणीय है। इस समय वैश्विक भू-राजनीतिक स्थितियां ऐसी हैं कि भारत को कोई भी कदम बहुत सोच समझकर उठाना होगा। आपने पूरे परिदृश्य को स्पष्टता से व्यक्त किया है।
धन्यवाद अरविंद भाई। आपने एकदम सही कहा है।
विचरण ही है महत्वपूर्ण बधाई।
भाग्यम जी बहुत शुक्रिया। अपनी सेहत का ख़्याल रखें।
आज की संपादकीय विचारणीय है । ऐसी क्षोभजनक स्थिति में भारत को कोई ठोस कदम बहुत सोच समझकर उठाना होगा।
आदरणीय, आपका ये संपादकीय बांग्लादेश में बदलते राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य, विशेषकर अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय की स्थिति पर केंद्रित दृढ़, साहसिक, स्पष्टवादी और विमर्शात्मक हस्तक्षेप है। जिसके माध्यम से आपने समकालीन घटनाओं को केवल तथ्यात्मक विवरण तक सीमित न रखते हुए उन्हें ऐतिहासिक, राजनीतिक भौगोलिक और मानवीय सरोकार के संदर्भ में प्रस्तुत किया है।
इस संपादकीय का केंद्रीय प्रभावकारी पक्ष इसका तथ्यात्मक विस्तार और वैश्विक परिप्रेक्ष्य है। शेख़ हसीना के शासनकाल की नीतियों, आर्थिक प्रगति और भारत-बांग्लादेश संबंधों के संतुलन को रेखांकित करते हुए आपने यह भी इंगित किया है, कि सत्ता परिवर्तन केवल राजनीतिक घटनाक्रम तक ही सीमित नहीं,अपितु इसके दूरगामी परिणाम सामाजिक संरचना और मानवीय संवेदनाओं पर भी गहरा प्रभाव डालते हैं। लंदन में हुए विरोध-प्रदर्शन का उल्लेख इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करता है।
आपके संपादकीय की भाषा आक्रामक न होकर पूर्वाभासात्मक और इसीलिए संकेतात्मक है, यद्यपि कुछ स्थलों पर भावनात्मक तीव्रता है, जो विषय की गंभीरता को और प्रबल बनाती है। चाणक्य और चन्द्रगुप्त की नीति का संदर्भ वर्तमान भारतीय विदेश नीति के लिए लाक्षणिक और चिंतनोन्मुख संकेतन के रूप में उभरता है।
समग्रतः ये संपादकीय राजनीतिक टिप्पणी से आगे बढ़कर मानवीय सरोकारों, क्षेत्रीय स्थिरता और नैतिक उत्तरदायित्व पर प्रश्न उठाता है। यह पाठक को केवल सूचना नहीं देता, बल्कि उन्हें चिंतन करने व संवाद करने के लिए प्रेरित करता है। समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में यह एक प्रासंगिक, विचारणीय और अत्यावश्यक लेख है।
साधुवाद!
बांग्लादेशी हिन्दुओं का दर्द लंदन पहुंचा संपादकीय में आपने बांग्लादेश में हिन्दुओं की स्थिति तथा भारत में उस पर हो रही राजनीति पर संतुलित विश्लेषण किया है। यह जानकर अच्छा लगा कि लंदन में बांग्लादेश हिंदू एसोसिएशन और भारतीय समुदाय ने बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों के विरुद्ध लंदन स्थित बांग्लादेश उच्चायोग के सामने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया लेकिन यह जानकर दुःख हुआ कि कुछ ख़ालिस्तानी समर्थकों ने गड़बड़ी फैलाने कि कोशिश की।यह सब सिर्फ भारत की समस्या नहीं रही है, विश्वव्यापी समस्या बनती जा रही है, अभी भी अगर हम न चेते तो निकट भविष्य में दूरगामी परिणाम झेलने के लिए अभिशप्त होंगे। इन दुःखद किन्तु सामयिक घटनाओं को अपने संपादकीय में स्थान देने तथा पाठकों को इन घटनाओं से रूबरू कराने के लिए साधुवाद।
सुधा जी, आपने सही कहा है कि – यह सब सिर्फ भारत की समस्या नहीं रही है, विश्वव्यापी समस्या बनती जा रही है, अभी भी अगर हम न चेते तो निकट भविष्य में दूरगामी परिणाम झेलने के लिए अभिशप्त होंगे।
इस सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
सम्पादक जी नमस्कार l आप की समय योजना (time management) का जवाब नहीं l पूरे सप्ताह विश्व हिन्दी दिवस के कार्यक्रम की तैयारी में लगे रहे फिर भी समय पर “संपादकीय” तैयार l नमन है आपको l
यह अक्सर देखने में आता है कि किसी भी मैं देश में जब आपस में फूट शुरू हो जाए तो वहां गरीबी पैर फैलाने लगती है l क्यों कि सारे स्रोत जो देश की प्रगति के लिए सुरक्षित होते हैं, गृह कलह में बर्बाद हो जाते हैं l बांग्लादेश के साथ यही हो रहा है l ….और फिर अराजक तत्व क्यों पीछे हटेंगे, सत्यानाश करने का कार्य तो वे करेंगे ही l
आज जो भी बांग्लादेश हमारे सामने है, उसने शून्य से आरंभ करके अपनी पहचान बनाई है l
विश्व में रेडीमेड कपड़ों के मामले में विश्व के बड़े देशों के साथ अपना नाम जोड़ लिया है l स्पोर्ट्स में भी वह विकसित देशों की सूची में शामिल हो चुका है l
लेकिन स्वार्थी घटक (नाम लिखनाआवश्यक नहीं है) निजी स्वार्थ के लिए आपस में फूट डलवा कर, यहां तक कि पड़ोस के देशों के साथ दुश्मनी करवाकर देश को बर्बाद करने पर तुले हैं l
…और इस की आंच यूरोप तक पहुंच चुकी है l
बांग्लादेश के जन्मदाता शेख मुजीब उर रहमान और भारत की मित्रता की मिसाल आज भी कायम है l इसका सबूत है मुसीबत के वक्त, शेख हसीना का, भारत में शरण लेना l फिर भारत तो भारत है, जरूरत मदों को अपने में शामिल कर ही लेता है l
जब तक बंगला देश की सरकार, स्वयं को सम्भालने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाती, दूसरे देश कहां तक मदद कर पाएंगे l अपनी पहचान बनाए रखने के लिये सामंजस्य की बहुत जरूरत होती है l बांग्लादेश को आज इससे बहुत जरूरत है l हिन्दू मुस्लिम के दायरे से ऊपर उठकर सोचना है l
उषा जी, विश्व हिन्दी दिवस में आपकी उपस्थिति एवं कविता पाठ के लिये बहुत बहुत शुक्रिया।
आप निरंतर पुरवाई संपादकीय पर सार्थक टिप्पणियां भेजती हैं, इसके लिये हार्दिक आभार।
बेहद संजीदा और प्रासंगिक संपादकीय l आदरणीय संपादक महोदय ने बांग्लादेश के वर्तमान (और तेजी से बिगड़ते) राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य और उसके भारत पर प्रभाव की एक चिंतित, राष्ट्रवादी दृष्टि से अभिव्यक्ति दी है lबांग्लादेश में शेख हसीना के त्यागपत्र और पलायन के बाद सत्ता-विहीनता ने कट्टरपंथी ताकतों को उभरने का अवसर दिया है।मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम व्यवस्था पर अमेरिका-पाकिस्तान की छाया और भारत-विरोधी रुख़ की झलक स्पष्ट दिखाई देती है।अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर पश्चिमी देश, इसे “आंतरिक मामला” कहकर टाल रहे हैं, जिससे न्याय और सुरक्षा दोनों ही कमजोर पड़ते हैं।“ऑपरेशन सिंदूर” के बाद बांग्लादेश को भारत-विरोधी मोर्चे पर खड़ा करने की कोशिश, क्षेत्रीय भू-राजनीति में भारत-घेराव की रणनीति का हिस्सा प्रतीत होती हैंl।लंदन में हिंदू संगठनों का शांतिपूर्ण प्रदर्शन, वैश्विक हिंदू एकजुटता का संकेत है, वहीं खालिस्तानी समूहों की दखल, भारत-विरोधी अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की ओर इशारा करती है।कुलदीप शेखावत का बयान हिंदू–सिख एकता और भारतीय डायस्पोरा की परिपक्वता को रेखांकित करता है, जिसने उकसावे के बावजूद संयम बनाए रखा। भारत की आंतरिक राजनीति में भी बांग्लादेश के प्रश्न पर राष्ट्रीय हित से अधिक वोट-बैंक की राजनीति और ध्रुवीकरण के संकेत दिखते हैं।कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं के बयानों में बांग्लादेश की आलोचना के साथ-साथ भारत की छवि पर भी चोट की कोशिश नज़र आती है, जबकि सलमान खुर्शीद का रुख अपेक्षाकृत संतुलित है।गाज़ा बनाम बांग्लादेश पर मौलाना साजिद रशीदी का दोहरा मानदंड, “चयनात्मक इंसानियत” और राजनीतिक इस्लामी विमर्श की सीमाओं को उजागर करता है।आर्थिक मोर्चे पर शेख हसीना के समय की उपलब्धियाँ दिखाती हैं कि राजनीतिक स्थिरता और धर्मनिरपेक्ष झुकाव ने बांग्लादेश को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाई थी।उनकी “सभी के प्रति मित्रता, किसी के प्रति द्वेष नहीं” की नीति ने भारत-बांग्लादेश संबंधों को स्थिरता और बहुपक्षीय संतुलन दिया, जो अब खतरे में है।ख़ालिदा ज़िया के निधन, तारिक रहमान की वापसी और भाजपा/भारत सरकार के साथ बढ़ते संपर्क, ढाका की सत्ता-समीकरण में एक नए अध्याय की संभावित भूमिका निभा सकते हैं l संपादक महोदय का निष्कर्ष कि भारत को चाणक्य–चंद्रगुप्त जैसी संयोजनात्मक, कठोर और दूरदर्शी नीति अपनानी होगी, यह संकेत देता है कि केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सामरिक, आर्थिक और कूटनीतिक रणनीति से ही नए “पूर्वी मोर्चे” से निपटा जा सकता है। पूर्णतः निष्पक्ष और तार्किक सन्दर्भ से लिखे गए संपादकीय के लिए आप को साधुवाद l
किरण जी आपने तो पूरी मेहनत से संपादकीय को खंगाला है और एक सटीक टिप्पणी लिखी है। आपने संपादकीय को “पूर्णतः निष्पक्ष और तार्किक सन्दर्भ से लिखा गया संपादकीय ” कहा है। हार्दिक आभार।
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
इस बार का संपादकीय काफी चिंताजनक है।
राजनीति का दोहरा चरित्र कब दंगाई रूप धारण कर लेता है। पता ही नहीं चलता।
एक लंबा समय हो गया बांग्लादेश में इस तरह की स्थिति को झेलते हुए।
भारत के अहसानों को भूल गया बांग्लादेश कि उसका तो अस्तित्व ही भारत के कारण है।
इस तरह की कट्टरता हर हाल में बुरी ही होती है। लगभग डेढ़ वर्ष से ऊपर हो गया वहाँ के लोगों को इस तरह की हिंसक गतिविधियों के बीच में जीते हुए।
पता नहीं हिंदू लोग वहाँ कैसे रह रहे हैं।
शेख हसीना ने अपने पद पर रहते उत्तरदायित्व पूर्ण निर्वाह किया,जैसा कि आपने बताया।
यह तो तय है कि दंगा फसाद की स्थिति में विकास की गति सिर्फ ठहरती नहीं, काफी पीछे रह जाती है। बदले की भावना से लिया जा रहा यह हिंदू विरोधी अभियान शर्मनाक है।
शासन को इसके खिलाफ जरूर कुछ ना कुछ करना चाहिये। आश्चर्य तो यही है कि कुछ हो क्यों नहीं रहा!
आपके संपादकीय का महत्वपूर्ण अंश यह है कि लंदन में रहने वाले बांग्लादेशी और भारतीय इसके विरोध में खामोशी से आवाज उठा रहे हैं। निश्चित ही यह सही है कि सारे विश्व का हिंदू समाज एक ही है।
लंदन में रहने वाले सभी भारतीय नागरिक निश्चित ही इसके लिए प्रशंसा के पात्र हैं।
इस गंभीर चिंतनीय विषय पर संपादकीय के लिए आपको बधाई। पुरवाई का आभार।
आदरणीय नीलिमा जी, पुरवाई का संपादकीय बांग्लादेश में चल रहे घटनाचक्र को अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि से देखने का प्रयास है। आपको इस सार्थक एवं सारगर्भित टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
बांग्लादेशी हिंदुओं का दर्द ,,,,,
आजकल पाकिस्तान और बांग्लादेश की शैतानी ताकतें गलबहियां कर रही है और मानवता रो रही है।हिंदुओं का मारा जाना जो पाकिस्तान में आम बात हो गई है वही अब बांग्लादेश में भी अमरीकी मिलीभगत से हो रहा है।
भारत का विपक्ष भी इस ओर जयचन्दी भूमिका के साथ सत्ता पक्ष के विरुद्ध खड़ा हो रहा है।भारत के मुसलमान विश्व के सबसे सुरक्षित लोकतांत्रिक व्यवस्था में पल बढ़ रहे हैं तिस पर भी दुखद है कि शिक्षा,वैज्ञानिक सोच और सकारात्मक अंदाज़ से काफी दूर हैं।
क्यों नहीं भारत की मुस्लिम संस्थाएं खड़ी होकर एक आवाज़ में कहती कि हम सारी सुविधाओं के साथ खुश और संतुष्ट हैं। बस यही विपक्ष को सोचना होगा।
इस बार का संपादकीय भारत के वासियों और प्रवासी भारतीयों के साथ साथ बड़ी बड़ी मानव अधिकार की अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं को सोचने पर मजबूर कर रहा है कि आख़िर बांग्लादेशी हिंदुओं का दोष क्या है?
आजकल अमरीका भी एक अलग राह पर निकल गया है जो पाकिस्तान की भी राह है।
बस यही विडंबना मासूम हिन्दुओं की कब्रगाह बनती जा रही है।
शोषण चाहे विश्व के किसी कोने में हो, सदैव निर्दोष या अल्पसंख्यक ही पीड़ित होते हैं। बंगला देश में जो हुआ, वास्तव में चिंता जनक है। लन्दन में उनके पक्ष में आवाज़ें उठ रही हैं, सुनकर कुछ राहत मिली। वरना जो इस तरह के माहौल में जी रहे हैं, उनकी तो ईश्वर भी सुध नहीं लेता।
विचलित कर गया इस बार का संपादकीय। आपने वस्तुस्थिति से अवगत कराया, जो महत्वपूर्ण और आवश्यक था।
सरस जी, संपादकीय पर आपकी टिप्पणी हमारी पूरी टीम के लिये उत्साहवर्धक है। हार्दिक धन्यवाद।