एक कहानीकार होने के नाते (जिसने अब तक कोई उपन्यास नहीं लिखा, और जो आजतक अपने लेखन के ‘शैशव काल’! में है) इस बात से एक विशेष ख़ुशी महसूस हो रही है कि चाहे भारत में साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ अभी तक कहानी को स्वतन्त्र विधा न मानते हों, कम से कम बुकर अवॉर्ड वालों ने तो कहानी विधा को रेखांकित कर दिया है।
हिंदी साहित्य की एक अजीब सी रिवायत है कि किसी भी कहानीकार को पूरा साहित्यकार नहीं माना जाता, जब तक कि वह कोई उपन्यास न लिख ले। उससे लगातार पूछा जाता है, कि “आपने अब तक कोई उपन्यास नहीं लिखा?”
कहीं यह मान लिया जाता है कि कहानी अपने आप में साहित्य की कोई संपूर्ण विधा नहीं है। कहानी उपन्यास का लघु-रूप है। उदय प्रकाश को भी साहित्य अकादमी सम्मान दिलवाने के लिए प्रकाशक को बड़े फ़ॉण्ट में उनकी लंबी कहानी ‘मोहनदास’ को मोटे काग़ज़ में उपन्यास के रूप में प्रकाशित करना पड़ा… जबकि वह उपन्यास था ही नहीं।
जब हिंदी के तुलनात्मक विषय पर युवा कथाकार विवेक मिश्र से मेरी बात हुई, तो उन्होंने कहा, “तेजेन्द्र जी, किसी भी कथाकार के लिए कहानी लेखन वाला काल उसका शैशव काल है। वह पूरा कथाकार उपन्यास लिखने के बाद ही बनता है।
प्रेमचंद के उपन्यास सेवासदन (1918), प्रेमाश्रम (1922), रंगभूमि (1925), निर्मला (1925), कायाकल्प (1927), ग़बन (1928), कर्मभूमि (1932) और गोदान (1936) आदि प्रकाशित हुए। जिस वर्ष गोदान प्रकाशित हुआ, उसी वर्ष उनकी कालजयी कहानी ‘कफ़न’ भी वर्ष 1936 में प्रकाशित हुई । फिर तो मित्र विवेक मिश्र के अनुसार प्रेमचंद के लेखन का शैशव काल उनके पूरे जीवन तक चलता रहा।
प्रेमचंद की कहानियाँ उपन्यासों से पहले, साथ-साथ और बाद में भी प्रकाशित होती रहीं। नमक का दारोगा (1913), बड़े घर की बेटी (1910), और सोज़े वतन (1908) में प्रकाशित हुईं। मगर बाद की कहानियाँ मंत्र (1928), शतरंज के खिलाड़ी (1925), पूस की रात (1930), ईदगाह (1933) आदि उपन्यासों के साथ-साथ प्रकाशित होती रहीं। इसका तो एक ही अर्थ है कि प्रेमचंद कहानी और उपन्यास विधाओं को एक-दूसरे से बिल्कुल अलग मानते थे। इसलिए जो विषय कहानी के अनुरूप प्रतीत होता था, वे उस पर कहानी लिखते थे और जो विषय विस्तार मांगता था, उस पर उपन्यास लिखते थे।
साहित्य अकादमी, दिल्ली और भारतीय ज्ञानपीठ विवेक मिश्र की बात से सहमत दिखाई देते हैं। शायद इसीलिए आजतक कभी हिंदी कहानी संग्रह को सम्मानित नहीं किया गया। चित्रा मुद्गल, मृदुला गर्ग और संजीव को भी उनकी श्रेष्ठ कृतियों के लिए सम्मानित न करते हुए, बस इसलिए सम्मानित किया गया कि अब उन्हें सम्मानित कर देना चाहिए।
पुरवाई के पाठक हैरान भी हो सकते हैं, कि आज हम संपादकीय के लिए यह कैसा विषय ले बैठे हैं! भाई लोग, पत्रिका साहित्यिक है तो साहित्य की बात तो करनी ही होगी न। और फिर इतनी बड़ी घटना घटित हुई है कि कन्नड़ लेखिका बानू मुश्ताक को उनके अंग्रेज़ी में अनूदित कहानी संग्रह ‘हार्ट लैंप’ के लिए वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित बुकर पुरस्कार प्रदान किया गया है। इन कहानियों का कन्नड़ से अनुवाद किया है दीपा भस्ती ने। संग्रह में कुल 12 कहानियाँ हैं, जो कि मिडल-क्लास मुस्लिम महिलाओं के जीवन पर आधारित कहानियाँ हैं।
बुकर अवॉर्ड में पुरस्कार की धनराशि £50,000/- (यानी कि आज की पाउंड-रुपए की दर के अनुसार ₹57,52,900/-) प्रदान की गई, जो कि लेखिका और अनुवादक में बराबर-बराबर बाँटी जाएगी। इसका अर्थ आसानी से यह निकाला जा सकता है कि बुकर अवॉर्ड के नियमों के अनुसार पुरस्कार विजेता बनने के लिए लेखक और अनुवादक का दर्जा समान है। अनुवादक द्वारा किया गया अनुवाद ही निर्णायक मंडल के सदस्यों ने पढ़ा और उसे सम्मानित करने का मन बनाया।


एक अलग और नई जानकारी के लिए हार्दिक हार्दिक धन्यवाद। दुनिया क्या सोचती है और भारतीय पुरस्कार प्रदान करने वाली संस्थाएं और उनके द्वारा पुरस्कार के लिए कार्यरत गणमान्य महानुभवों को एक नई सोच लेकर आगे बढ़ने का संदेश भी प्रस्तुत हुआ है। परम आदरणीय तेजेंद्र शर्मा साहब जी को हार्दिक हार्दिक बधाई। धन्यवाद।
प्रोफ़ेसर चिकुर्डेकर साहब, इस सार्थक और सारगर्भित टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
बुकर प्राइज के अब तक के बिल्कुल अनोखे और नवीन पहलू आपने प्रस्तुत किए हैं।
कहानी अपने आप में संपूर्ण और मौलिक विधा है । उपन्यास से उसकी तुलना बेमानी है ।
इस संदर्भ में बहुत गंभीर मर्म को भी आपने छुआ कि भारत का माहौल बिगड़ा हुआ है कई धड़ों में बंट चुका है।यह वास्तव में अफसोस जनक है
रक्षा इस संक्षिप्त मगर बेहतरीन टिप्पणी के लिए बहुत शुक्रिया।
इस बार के पुरवाई का संपादकीय – ‘कहानी उपन्यास का सारांश नहीं होती’ को लेकर लिखा गया है। यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है कि इंग्लैंड का प्रसिद्ध बुकर प्राइज कन्नड़ लेखिका बानू मुस्ताक जी की अंग्रेजी में अनुवादित पुस्तक ‘हार्ट लैम्प’ को दिया गया है, जिसका अंग्रेजी अनुवाद दीपा भस्ती ने किया है। उन्होंने कोई उपन्यास नहीं लिखा है। वे सिर्फ कहानीकार हैं। जबकि हिंदी की साहित्यिक संस्थाएं साहित्य अकादेमी और ज्ञानपीठ अकेली कहानियों पर पुरस्कार नहीं देती हैं।
इसमें संपादक महोदय आदरणीय तेजेन्द्र सर जी जो स्वयं एक श्रेष्ठ कहानीकार हैं, वे युवा साहित्यकार विवेक मिश्र जी से कहानी की स्थिति के बारे में प्रश्न करते हैं। विवेक मिश्र जी अपना पक्ष रखते हुए कहते हैं कि जब तक उपन्यास न लिख लिया जाए तब तक कहानी का शैशव काल चलता है। कम से कम एक उपन्यास लिख लेने से उसका शैशव काल बीत जाता है। किसी भी विचार को सिरे से खारिज तो नहीं किया जा सकता है। विवेक मिश्र जी का अपना विचार है। इस विचार की कितनी स्वीकार्यता है इसे हम आज तय नहीं कर सकते हैं। यह तो समय बताएगा।
कहानी लेखन से साहित्यकार कहानीकार माना जाता है। एक उपन्यास लिखने मात्र से से वह कहानीकार से कथाकार हो जाता है। चन्द्रधर शर्मा गुलेरी जी कहानीकार हैं और प्रेमचंद जी कथाकार। कहानी में जीवन की किसी एक घटना, या समय विशेष के मानसिक द्वंद्व को उद्घाटित किया जाता है। जबकि उपन्यास में संपूर्ण जीवन की घटनाएं विस्तार पाती हैं। इसलिए उपन्यास का फलक बड़ा होता है और कहानी का छोटा। समय काल के अनुसार थोड़ी बहुत परिभाषाएं परिवर्तित व परिवर्धित होती रहती हैं। लेकिन मूल में उक्त चीजें ही रहती हैं।
इस संपादकीय में अनुवाद को भी रेखांकित किया गया है। मतलब मूल पाठ श्रेष्ठ है या अनुवाद। अथवा दोनों। दोनों की बात प्राइज में इसलिए नहीं होगी कि ज्यूरी ने अंग्रेजी अनुवाद पढ़कर बुकर प्राइज की घोषणा की है। फिलहाल इतने भीतर जाने की जरूरत मैं नहीं समझता हूं। पुस्तक उत्कृष्ट थी इसलिए बुकर प्राइज की हकदार थी।
रवीन्द्र नाथ टैगोर जी की पुस्तक गीतांजलि पर नोबेल पुरस्कार अंग्रेजी अनुवाद पर ही मिला था। पहले इसका अनुवाद किसी दूसरे ने किया था पर टैगोर जी को वह अनुवाद पसंद नहीं आया था। इसलिए गीतांजलि का अनुवाद स्वयं टैगोर जी ने किया था। उसी पर उन्हें नोबेल पुरस्कार दिया गया था।
इस बार के संपादकीय में तनाव नहीं है। सहजता हैं, प्रश्न है, साहित्य में परंपरा से चले आ रहे रिवाज की भी बात की जा रही है। इस बार के बुकर पुरस्कार ने हमारी साहित्यिक संस्थाओं के दरवाजों पर दस्तक दे दी है। देखते हैं….
बढ़िया संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर।
भाई लखनलाल पाल जी आपने तो इस संपादकीय के हर कोण को पूरी तरह से खंगाला है। उम्मीद है कि इस संपादकीय को पढ़ने के बाद भारत की साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ अवश्य कुछ सकारात्मक कदम उठाएंगे।
बानू मुश्ताक़ और दीपा भस्ती को अनन्त शुभकामना ।एक सामाजिक विषय पर कहानी लेखन और वह भी सम्प्रदाय विशेष की स्त्रियों की सामाजिक, आर्थिक दशाओं पर कलम चलाना साहस ,सामर्थ्य और धैर्य का चिंतन है ।बुकर पुरस्कार टीम साहित्य में नए आयामों को पुरस्कृत कर रहा है यह भारत के पुरस्कार चयनकर्ताओं के लिए भी एक उदाहरण हो सकता है ।
Dr Prabha mishra
कम से कम शब्दों में सारगर्भित टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद प्रभा जी।
समस्त जानकारी युक्त आपका यह है संपादकीय अच्छा लगा।
वैसे तो आप हमेशा बहुत ही गहराई से जानकारी युक्त लिखते हैं।
कहानी और उपन्यास का विवेचन सारगर्भित है।
कन्नड़ लेखिका बधाई की पात्र हैं।
टिप्पणी के लिये बहुत शुक्रिया प्रमिला जी।
समस्त जानकारी युक्त आपका यह संपादकीय अच्छा लगा
धन्यवाद आपका।
आदरणीय संपादक जी,
संपादकीय के विषयों की विविधता और विचित्रता के साथ-साथ लोकप्रियता का भी ध्यान रखना आपकी विशेषता है।
पिछले कई अंकों के संपादकीय सामान्य जनता के बीच उठे हुए जालंत प्रश्नों पर लिखे गए और इस अंक का संपादकीय घोर ‘साहित्यिक ‘!
कमाल है!!
वैसे संपादकीय के शीर्षक से मैंने अनुमान लगाया था कि उपन्यास और कहानी पर कोई विमर्श जगाने वाला संपादकीय होगा परंतु यह तो निकाला ‘ ‘पुरस्कार ‘और परिभाषाओं को विश्लेषित करने वाला!!घोर व्यावसायिक श्रेणी का।
मुझ जैसे सामान्य साहित्य प्रेमी के लिए ऐसे विषय रुचि के अनुकूल नहीं होते परंतु ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान ‘वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए इस पर मैं कुछ ना कुछ तो टिप्पणी करूंगी ही!!
भारतीय भाषाओं में उपन्यास लिखने की परंपरा भले ही नवीन हो परंतु काव्य रूप में महाकाव्य तो सैकड़ो वर्ष पूर्व से लिखा जा रहे हैं,रामायण महाभारत और कालिदास की रचनाएं इसका ज्वलंत प्रमाण है।
मुझे ऐसा लगता है की कहानी पढ़ने वाला पाठक वर्ग अधिक बड़ा है अपेक्षाकृत उपन्यासों के! लेकिन पुरस्कार तो सामान्य पाठक की रुचि के अनुसार दिए नहीं जाते, तो यह विषय तो हमारे लिए ठीक वैसा ही है जैसे मंथरा के लिए रामराज्य, ‘कोऊ नृप मोहि हु हमें का हानी चेरी छांड़ि न होउब रानी !!!
आदरणीय सरोजिनी जी इस ‘घोर व्यावसायिक श्रेणी’ के संपादकीय पर इतनी ख़ूबसूरत साहित्यिक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
संपादकीय वही श्रेष्ठ होता है जो सामयिक मुद्दों को नवाचार के साथ प्रस्तुत कर अपनी बात को पाठक के मन में सीधे सेंध लगा ले। तल्ख सच को अभिव्यक्त करते हुए कहानी के महत्व को बताने के लिए आदरणीय तेजेंद्र जी ने प्रेमचंद की कई कहानियों का प्रकाशन वर्ष सहित ब्यौरा दिया है।
मेरे विचार से लेखन सदैव शैशव ही होता है। लेखक प्रौढ़ हो जाता है। रचना कहानी, उपन्यास या कोई भी हो सदा शिशु ही होती हैं। लेखक भी सदा सीखने की अभिलाषा में होते हैं।
बहुत सामयिक वैचारिकी प्रस्तुत करने के लिए आदरणीय तेजेंद्र जी को साधुवाद।
डॉ. पद्मा आपने कहा है कि लेखन सदैव शैशव ही होता है – लेखक प्रौड़ हो जाता है।… लेखक भी सदा सीखने की अभिलाषा में होते हैं – संपादकीय पर आपका यह नज़रिया भी काबिल-ए-तारीफ़ है।
इस सप्ताह का आप का संपादकीय इस वर्ष के मैन बुुकर इंटरनेशनल ट्रांसलेशन बुकर प्राइज़ के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी देने के साथ साथ साहित्य में कहानी- विधा को महत्वपूर्ण मानते हुए उसे संपूर्ण मान्यता देने के पक्ष में सरकारी संस्थानों का ध्यान इस ओर दिला कर हम लेखकों को भरोसा दिला रहे हैं कि उपन्यास लिखना बहुत ज़रूरी नहीं।
धन्यवाद व शुभ कामनांए
दीपक शर्मा
दीपक जी, इस बार आपकी टिप्पणी हिन्दी में देख कर अलग किस्म की ख़ुशी हुई। हमें पूरी उम्मीद है कि भारत की साहित्यिक संस्थाएं अवश्य हमारा संपादकीय पढ़ने के बाद कुछ सकारात्मक कदम अवश्य उठाएंगी।
एक नई दिशा देता संपादकीय उत्कृष्ट लगा। कहानी संकलन को बुकर पुरस्कार मिलना निश्चित ही कहानी विधा को स्थापित करता है । कहानी लेखकों का भविष्य उज्जवल जान पड़ता है।
आपकी सारगर्भित टिप्पणी के लिए बहुत शुक्रिया
सम्पादकीय ‘अपनी बात ‘में आपने विषय बड़ा समीचीन चुना और बताया कि किस तरह अकादेमी और ज्ञानपीठ ने कहानी विधा को उपन्यास विधा का बेबी बताया है, समझा है ! यह तय है कि उपन्यास विधा और कहानी विधा तात्विक आधारों पर अलग अलग हैं ! कहानी सुनाई जाती है, पढ़ कर एक बैठक में– और उपन्यास काफी समय यानी दिनों तक पढ़ता जाता है…ऐसा मैं मानता हूं! अब आपने यह विमर्श तो खड़ा ही कर दिया है कि कहानी उपन्यास का सारांश नहीं होती परंतु बड़े चातुर्य से इस विमर्श को पुरुस्कारों से भी जोड़ दिया है और कहा कि बूकर वालों की दृष्टि की क्या बात है उन्होंने कहानियों और उपन्यासों के भेद को भारतीयों से ऐक से समझा है! खैर आपने हमारी खामियों को भी नज़र अंदाज नहीं किया यही बात मुझे सुखद लगी! आशा है आपके इस सम्पादकीय का भारतीय प्रतिष्ठान उचित संज्ञान लेंगे!!
देवेन्द्र भाई, मैन बुकर अवार्ड के निर्णायक मंडल ने कन्नड़ कहानियों के अंग्रेज़ी अनुवाद को सम्मानित करके हमारे लिये ये सवाल पूछने का मौक़ा पैदा किया है। हार्दिक धन्यवाद।
आपकी विश के साथ हैँ कि साहित्य अकादमी बुकर सम्मानों से सीख लेकर कहानी और कहानीकार को भी सम्मान में शामिल करे ।
धन्यवाद आलोक भाई।
संपूर्ण जानकारी देता हुआ संपादकीय” कहानी उपन्यास का सारांश नहीं होता”। दोनों विधाओं का अपना अलग स्वरूप, अलग विशेषताएँ हैं ।बहुत शुभकामनाएँ
जब विश्व में कोई नयी पहल होती है तब हमें समझ आता है कि हम कितने पीछे और संकुचित दायरे में गुजर रहे हैं। हर कहानीकार उपन्यासकार नहीं होता है । बल्कि कहानीकार भी सीमित शब्दों में बांधकर रखने की विधा को ज्यादा पसंद किया जाता है।
साहित्य अकादमी या ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए साहित्य की अन्य विधाओं को अलग क्यों कर दिया जाता है? एक कहानी न सही सम्पूर्ण संग्रह को तो विचारार्थ मान्यता मिलनी चाहिए।
बहुत बहुत शुक्रिया रेखा जी, इस समर्थन के लिये।
बेहतरीन संपादकीय हेतु हार्दिक बधाई।
कहानी उपन्यास के लिए भूमि तैयार करने का काम करती है, इस दृष्टि से उसकी भूमिका बेहद महत्त्वपूर्ण है। उपन्यास का शैशवकाल मानने वाली बात मेरे गले नहीं उतर रही है। कहानी स्वतंत्र एवं सशक्त विधा है जो गागर में सागर भरने का काम करती है। मैं आपसे सहमत हूँ। कथाकार प्रेमचंद की मिसाल साहित्य समाज के सम्मुख है।
साहित्य अकादेमी ने नई पहल की है। सम्मान हेतु प्रत्येक विधा की कृतियाँ आमंत्रित की गई हैं। के.के. बिड़ला फाउंडेशन ,दिल्ली तो पहले से ही इस दिशा में उदार है। अन्य कई बड़ी संस्थाएँ भी कहानी को स्वतंत्र विधा के रूप में स्वीकार करती हैं।
इस सार्थक और सारगर्भित टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद डॉ. आरती।
पुरवाई के यशस्वी संपादक तेजेन्द्र जी का इस सप्ताह का संपादकीय में इस बार के बुकर पुरस्कार पर तफ़्सील से विभिन्न कोणों पर सटीक और सार्थक तथ्यों को समेटा गया है।
पहली बात कहानीकार और उपन्यासकार का द्वंद है।जो आज के परिवेश में पुराने ढर्रे को सही चुनौती देता है।उपन्यास अब क्लासिक यानी शास्त्रीय स्थिति में आता जा रहा है और कहानी अब युवा और आम पाठकों की मजबूती से पहली और व्यावहारिक पसंद बन गई है।कहानी अर्वाचीन,प्राचीन और वर्तमान के साथ साथ भविष्य की विधा भी है और उन काल खंडों को समेटती भी है।
कहानी जब कोई सुनता या पढ़ता है तो यह एक स्वाभाविक प्रश्न पाठकों द्वारा किया जाता है…
क्या हुआ… आगे भी तो बोलो क्या हुआ?
अतः कहानी एक मनोहारी विधा है।जीवन में शैशव काल के बाद से कहानी ही तो है जो रिश्तों को जोड़ती जीवन के सोपानों से गुजरती ही अंतिम छोर और उसके बाद भी शाश्वत रहती है।अस्तु आदरणीय विवेक मिश्रा जी को अपने विचारों को एक बार फिर से अवलोकन करने की आवश्यकता है।
यह पुरस्कार इस बार कहानी संग्रह को ही मिला है अतः साहित्य अकादमी को भी सुरक्षित और पारंपरिक तरीके के ढर्रे को छोड़ ही देना चाहिए।
एक बात अनुवाद की भी रेखांकित हुई है और सही हुई है। इसके लिए संपादक को सलाम।
एक काया से दूसरी काया में आत्मा प्रवेश जैसी कष्ट पूर्ण प्रक्रिया और विधा है,अनुवाद।
भारत में इसकी आवश्यकता पहले भी थी, आज भी है और रहेगी भी। अनुवाद भले ही कृत्रिम बुद्धि यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से प्रभावित हो, लेकिन अनुभवी अनुवादक द्वारा जब अनुवाद किया जाता है तो भाषा का सौंदर्य, लालित्य का समावेश स्वयंमेव हो जाता है बशर्ते अनुवादक ने पूरी मेहनत ईमानदारी से उस कृति को अनूदित किया हो और इस बुकर पुरस्कार में यही बात पूरी तरह खरी उतरी है ‘हार्ट लैंप’ अंग्रेजी अनुवाद पढ़कर के ही इसे बुकर प्राइज दिया गया।
बुकर पुरस्कार के आयोजकों को निश्चित रूप से बधाई के उन्होंने अनुवादक और लेखक को बराबर का दर्जा दिया यह बहुत बड़ी बात है। इसकी बहुत जरूरत भी है यदि हमें विभिन्न संस्कृतियों को जोड़ना है तो अनुवादक को लगभग क्या पूर्ण लेखक का दर्जा आपको देना ही होगा।
उम्मीद है यह बुकर पुरस्कार हमारे देश के विद्वानों और सरकारी संस्थानों और ज्यूरी के विचारों में बदलाव लाकर ,भारत के नेतृत्व की ग्लोकल से ग्लोबल में बदल दे।
एक बड़ा सा लाल सलाम पुरवाई पत्रिका समूह को।
***”मैने इसे अपनी फेस बुक वॉल पर पोस्ट किया है और विभिन्न बड़े समूहों में पोस्ट किया है
आपका मित्र
@सूर्यकांत शर्मा
भाई सूर्यकांत जी आपकी टिप्पणी ने संपादकीय को खोल कर पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत कर दिया है। कहानी और उपन्यास एवं लेखक और अनुवादक की तुलना करके हमने संपादकीय को एक विस्तार देने का प्रयास किया है। आपकी टिप्पणी पाठकों के लिये काफ़ी सहायक सिद्ध होगी। हार्दिक धन्यवाद।
उपन्यास का शैशव काल माना जा सकता है, खासकर एक लेखक के विकास के संदर्भ में। कहानी छोटी होती है, उसमें एक मुख्य घटना, कुछ सीमित पात्र और एक निश्चित समापन होता है। यह एक त्वरित प्रभाव छोड़ती है और लेखक को कथानक, चरित्र-चित्रण और भाषा पर नियंत्रण का अभ्यास करने का अवसर देती है।
वहीं, उपन्यास एक विस्तृत कैनवास है। इसमें लेखक को पात्रों के मनोविज्ञान में गहराई से उतरने, कई उप-कथानकों को बुनने, एक जटिल दुनिया का निर्माण करने और समय व स्थान के साथ खेलने की छूट मिलती है। उपन्यास में एक जीवन-काल या कई पीढ़ियों की कथा को समेटा जा सकता है, जिससे यह मानव अनुभव के विभिन्न पहलुओं को अधिक विस्तार और सूक्ष्मता से दर्शा पाता है।
जब यह कहा जाता है कि “कोई भी कहानीकार जब तक उपन्यास नहीं लिखता है उसे अधूरा ही माना जाता है,” तो यह इस विचार को दर्शाता है कि उपन्यास लेखन को एक लेखक के लिए एक बड़ी चुनौती और कलात्मक परिपक्वता का प्रमाण माना जाता है। यह लेखक की धैर्य, विस्तार से सोचने की क्षमता और एक बड़े कथानक को नियंत्रित करने की महारत को दर्शाता है। एक उपन्यास ही अक्सर लेखक को साहित्यिक जगत में एक गंभीर पहचान दिलाता है, क्योंकि यह उसकी वैचारिक गहराई और शिल्पगत दक्षता का प्रमाण होता है। हालांकि, यह कहना कि ‘अधूरा’ होता है, थोड़ा कठोर लग सकता है। कई महान कहानीकार भी हुए हैं जिन्होंने कभी उपन्यास नहीं लिखा, लेकिन उनका योगदान अतुलनीय है। फिर भी, उपन्यास को अक्सर लेखक के ‘पूर्ण’ होने की कसौटी के रूप में देखा जाता है।
बुकर पुरस्कार में अनुवाद की अहम भूमिका
आपने बिल्कुल सही कहा कि बुकर पुरस्कार (विशेषकर अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार) में अनुवाद की अहम भूमिका होती है। यह एक ऐसा मंच है जो दुनिया भर की भाषाओं के बेहतरीन साहित्य को वैश्विक पहचान दिलाता है।
गीतांजलि श्री को उनके उपन्यास ‘रेत समाधि’ (Tomb of Sand) के अंग्रेजी अनुवाद के लिए 2022 में अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिला। इसका अनुवाद डेज़ी रॉकवेल ने किया था।
यह दर्शाता है कि अनुवाद अब केवल एक भाषाई स्थानांतरण नहीं है, बल्कि एक रचनात्मक कार्य है। एक कुशल अनुवादक मूल कृति की आत्मा, उसकी सांस्कृतिक बारीकियों, साहित्यिक सौंदर्य और लेखक की आवाज़ को दूसरी भाषा में सफलतापूर्वक ले जाने का महत्वपूर्ण कार्य करता है। गीतांजलि श्री के मामले में, डेज़ी रॉकवेल के अनुवाद ने ‘रेत समाधि’ की अनूठी भाषा और शैली को अंग्रेजी भाषी पाठकों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके बिना यह अंतरराष्ट्रीय मंच तक नहीं पहुँच पाता।
कानड़ की लेखिका बानू मुश्ताक को उनकी लघु कथा संग्रह ‘हार्ट लैंप’ (Heart Lamp) के लिए 2025 का अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिला है, जिसका अंग्रेजी अनुवाद दीपा भस्ती ने किया है। यह कन्नड़ भाषा से इस पुरस्कार को जीतने वाली पहली कृति है और यह पहली बार है जब किसी लघु कथा संग्रह को यह प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला है।
गीतांजलि श्री के ‘रेत समाधि’ के बाद बानू मुश्ताक की ‘हार्ट लैंप’ का जीतना भारतीय भाषाओं के साहित्य के लिए एक और बड़ी उपलब्धि है। यह दर्शाता है कि वैश्विक साहित्यिक मंच पर भारतीय भाषाओं की कहानियों और आवाजों को कितनी गंभीरता से लिया जा रहा है, और इसमें निस्संदेह अनुवादकों का अतुलनीय योगदान है।
बुकर पुरस्कार जैसे अंतर्राष्ट्रीय सम्मान यह सुनिश्चित करते हैं कि साहित्यिक विविधता को बढ़ावा मिले और अंग्रेजी न बोलने वाली दुनिया का उत्कृष्ट साहित्य भी वैश्विक पाठक वर्ग तक पहुँच सके। यह अनुवादकों के महत्व को भी रेखांकित करता है, जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है, लेकिन जो दो संस्कृतियों और भाषाओं के बीच सेतु का काम करते हैं। इस प्रकार, अनुवाद केवल भाषाई दीवारें नहीं तोड़ता, बल्कि सांस्कृतिक समझ और वैश्विक साहित्यिक संवाद को भी बढ़ावा देता है।
आपका संपादकीय इन दोनों बिंदुओं को पूर्ण परिभाषित कर रहा है बहुत साधुवाद।
बहुत सुंदर, सदा हुआ, साफ-साफ संपादकीय। आत्मिक बधाई भाई।
धन्यवाद राजेन्द्र भाई।
तेजिंदर जी आप स्वयं एक कहानीकार हैं और आपने इस संपादकीय के माध्यम से एक कहानीकार की पीड़ा को उजागर किया है , सच बोलने के लिए बधाई.
मुझे एक बात और जोड़नी है , आप अपनी मातृभाषा में कितना ही बेहतर काम क्यों न कर रहे हों लेकिन अगर उस काम को वैश्विक प्लेटफार्म पर ले जाना है तो उसका अंग्रेजी अनुवाद होना जरूरी है , चाहे मानें या न मानें सचाई यही है कि एनी भाषाओं खास कर भारतीय भाषाओं की तुलना में अंग्रेजी में अनूदित साहित्य ज़्यादा लोगों तक पहुंचता है.
प्रदीप भाई, आपकी दिल से महसूस की गई टिप्पणी सीधी दिल तक पहुंची है। हार्दिक आभार।
आज के भाग-दौड़ के जमाने में जब लघुकथाएं अधिक प्रचलित हो रही हैं, उपन्यासों के साथ-साथ कहानी संग्रहों को भी मान्यता मिले , आपका स्पष्ट, सही और सटीक सलाह है।
हार्दिक धन्यवाद डॉ जमुना जी।
तेजेन्द्र भाई: कहानी और उपन्यास को लेकर आपके इस सम्पादकीय से बहुत सी बातों की जानकारी मिली। हर घटना की शूरूआत तो कहानी से ही होती है। धीरे धीरे फिर वो उपन्यास का रूप धारण कर जाती है। केवल इस लिये कि एक लेखक ने कहानीयाँ तो लिखी हैं लेकिन उपन्यास नहीं लिखा है, उसे मान्यता नहीं मिलती और उसके लेखन को शैश्व काल में माना जाता है। समय के साथ साथ विचारों में बदलाव आना बहुत ज़रूरी है। बुकर सम्मान की मिसाल को लेकर आप ने जो मुद्दा उठाया है उस से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। समय आगया है कि चाहे उपन्यास लिखें हों या नहीं, कहानीकारों को भी पूरा सम्मान मिलना चाहिये।
विजय भाई, आपकी साफ़गोई भारत की साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ तक पहुंचनी चाहिए। हार्दिक आभार।
और वो कैसे संभव हो सकता है।
जी, अपनी आवाज़ उठाते रहेंगे।
बहुत बढ़िया पढ़कर बहुत अच्छा लगा। यह तो हमारे लिए गर्व की बात है। आपको बहुत-बहुत बधाई।
हार्दिक धन्यवाद भाग्यम जी।
सादर प्रणाम भाई,
इस बार भी आपके संपादकीय का विषय सम सामयिक और वैचारिक दृष्टिकोण से उत्तम लगक।बुकर सम्मान से सम्मानित कन्नड कथाकार बानू मुश्ताक कै अनूदित कहानी संग्रह को मिलना भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा सकती है।आपने बिल्कुल सही प्रश्न उठाया कि कहानी उपन्यास या कथाकार का शैशव काल नहीं है मैं पूरी तरह सहमत हूं ।प्रेमचंद उदय प्रकाश, तेजेन्द्र शर्मा, दिव्या माथुर
शिवानी तथा अन्य कथाकारों,की कहानियों में भी उपन्यास की सी रोचकता है,लोकप्रियता है और पाठकीयता है,।एक उपन्यास की तरह आनंद मिलता है।फिलहाल यह शुरुआत एक उम्मीद तो जगाती ही है ।हार्दिक बधाई बाना मुश्ताक जी को।अशेष शुभ कामनाए, बधाई आपको एक बार फिर सार्थक, ज्वलंत प्रश्न उठाते संपादकीय के लिए। बधाई सभी कथाकारों को भी।
पद्मा मिश्रा-जमशेदपुर
पद्मा आपने संपादकीय की आत्मा को समझा और सारगर्भित टिप्पणी की है। हार्दिक आभार।
भाई तेजेंद्र शर्मा जी!
आप भी गजब हैं, हर बार अपने संपादकीय में लगभग अछूते और मौलिक विषय उठाते हैं।
आपकी वाग्मिता को प्रणाम करता हूँ।
जब पहली आँख खुली तो सबसे पहले अम्मा की लोरी सुनी, दूसरी आँख खुली तो दादी माँ से कहानी ही सुनी……..। मेरा मानना है कविता और कहानी का जन्म मनुष्य के साथ ही हुआ है। मेरा अपना प्रिय शौक (विषय) कहानियाँ पढ़ना है। कभी कभार लिखने की कोशिशें भी करता हूँ।
साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ जैसे हिन्दी के प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा कहानी को प्रमुख विधा न मानने की जानकारी आपके संपादकीय से मालूम पड़ी। जबकि इन सबकी भी अपनी-अपनी कहानी है। कहानी से ही उपन्यास निकला है। उपन्यास से कहानी पैदा नहीं हुई। हिंदी का शिक्षक होने के नाते मेरा मानना है, कहानी सर्वाधिक लोकप्रिय विधा हमेशा रही है, और आज भी है। एक अच्छी कहानी का आज भी उसी प्रकार स्वागत होता है, जिस प्रकार पिछले वक्तों में। आज कहानी का परिदृश्य पिछले किसी भी समय से अधिक विस्तीर्ण है। अब वह सिर्फ नगर या महानगर केंद्रित नहीं। नई कहानी अवश्य हिंदी की कहानी के इतिहास का सुनहरा दौर था जब राजेंद्र यादव, कमलेश्वर, मोहन राकेश, अमरकांत, निर्मल वर्मा, उषा प्रियंवदा, मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती, मार्कंडेय, रेणु, शेखर जोशी, दूधनाथ सिंह, ज्ञानरंजन, भीष्म साहनी, धर्मवीर भारती और कितने ही लेखकों ने हिंदी-कहानी को भाव-बोध, शिल्प-बोध और यथार्थ-बोध के स्तर पर इतना समृद्ध बनाया, जो आज हिंदी कहानी की शानदार विरासत है।
हिंदी साहित्य में साठ का दशक अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस काल को कहानी का प्रयोग काल भी कह सकते हैं। कहानी में अनेक बदलाव व परिवर्तन इस युग की देन है। अनेक नए-नए युग कहानी में पैदा हुए। कुछ नये सौंदर्यबोध एवं भाव- संवेदनाएँ यथार्थवादी की धरती पर अँगड़ाइयाँ लेकर जगीं, तो कहानी ने नई-नई पोषाकें पहननीं शुरु करदीं। कहानी, सचेतन कहानी, अकहानी, समकालीन कहानी, समांतर कहानी, जनवादी कहानी, सक्रिय कहानी जैसे कहानी के अनेक आंदोलन चल पड़े। (खेमे कहूँ तो गुस्ताखी होगी) कहानी लेखन आज भी पूर्व की तरह प्रतिष्ठित है।
आपके संपादकीय भूरि भूरि प्रशंसा।
कन्नड़ लेखिका बानू मुश्ताक को उनके अंग्रेज़ी में अनूदित कहानी संग्रह ‘हार्ट लैंप’ के लिए वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित बुकर पुरस्कार के लिए लेखिका तथा अनुवादक दीपा भस्ती को बधाई।
सामाजिक सरोकारों को लेकर जीवंत कहानियों के युग में आपके संपादकीय में नये विमर्श के अनेक आधारभूत तत्व मौजूद हैं। अनेक साधुवाद।
डॉ० रामशंकर भारती
सुरीलों का गाँव क्योलारी जालौन(उ.प्र.)
25 मई 2025
भाई रामशंकर भारती जी आपको पुरवाई के संपादकीय पसंद आते हैं, यह हमारी टीम के लिए उत्साहवर्धक टॉनिक है। आपने संपादकीय के संदर्भ में सार्थक मुद्दे उठाए हैं। आपका आभार।
नई जानकारी के लिए धन्यवाद।
समय की कमी के कारण लोग कहानी से लघु कथा की ओर जा रहे है। एवार्ड ऐसे साहित्य को मिलना चाहिए जो कम से कम पढ़ा जाता हो या बिल्कुल भी नहीं जैसे कि क्लिष्ट कविताएं या उपन्यास ।
यही सोच कर भारत में एवार्ड दिया जाता है, जिसे ‘ उच्चस्तरीय ‘ साबित करने में कठिनाई न हो।
धन्यवाद सर।
साधुवाद
सम्पादकीय लेखन अतुलनीय होता ही है : टिप्पणियाँ भी अद्धभुत होती हैं
बहुत शुक्रिया विभा जी।
आज का यह संपादकीय कहानी को एक पूर्ण साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित करता है, जिसे हिंदी साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियों, भारतीय ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी जैसे संस्थानों के पूर्वग्रह, जिसमें कहानी संग्रहों को सम्मान न प्राप्त होने जैसे चिंतनीय और परिवर्तनशील विषयों को भी उठाया गया है। आपके संपादकीय का आरंभ “एक कहानीकार होने के नाते (जिसने अब तक कोई उपन्यास नहीं लिखा और जो आज तक अपने लेखन के शैशव काल!में है)”स्वयं मे एक गंभीर व्यंग्यपूर्ण प्रश्न उठाता है, जिसमें कहानी विधा को लेखक की शैशव काल अवस्था मानने की मानसिकता व स्वतंत्र विधा के रूप में न मानने की परंपरा पर सार्थक प्रतिरोध है,जिसे आपने विभिन्न सशक्त साहित्यिक प्रमाणों के माध्यम से तर्कसंगत सिद्ध किया है। साथ ही बुकर सम्मान के लिए लेखक व कृति के अनुवादक,जो की मूल कृति को उसके भाव सहित लक्ष्य भाषा में भाषांतरित करता है,को समान अधिकार प्रदान करने का नियम, जिसके द्वारा अनुवादक का उचित श्रम जो मूल लेखक की कृति के मूल अर्थ का संरक्षण तो करता ही है, लेखक की भावनाओं, और भाषा, शैली को भी मूल कृति के अनुरूप बनाए रखने के गुरुतर दायित्व का निर्वहन करता है, जिसमें चूक होने के कारण ही गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर जी को ‘गीतांजलि’ का अनुवाद स्वयं करना पड़ा था; के वैशिष्ट्य को भी परिलक्षित करता है।
कहानी व उपन्यास के इतिहास और अंतर को स्पष्ट करते हुए इस संपादकीय के माध्यम से निश्चय ही यह सिद्ध हो जाता है कि कहानी अपने आप में एक सशक्त विधा है,जो उपन्यास की जननी है। निश्चय ही बुकर अवॉर्ड की ज्यूरी से प्रेरित होकर साहित्य अकादमी और भारतीय ज्ञानपीठ भी इस दिशा में अग्रसर हो यही शुभेच्छा है। हिंदी साहित्यिक विडम्बना पर गंभीर विवेकपूर्ण और विचारशील संपादकीय।
ऋतु आपको इस सार्थक और सारगर्भित टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
साहित्य की विधाओं के परिचय के क्रम में हमने पढ़ा था कि कहानी उपन्यास का लघु रूप नहीं होती, ठीक वैसे ही जैसे खंडकाव्य महाकाव्य का, अथवा एकांकी नाटक का। ये सभी स्वतंत्र विधाएं हैं। प्रेमचंद के उदाहरण द्वारा आपने अच्छी जानकारी दी कि विधा का चयन रचना निर्धारित करती है अथवा रचना की मांग के अनुसार लेखक तय करता है। विधा-गत प्रयोग के आधार पर लेखन को उच्च निम्न स्वीकार करना उचित नहीं है; हां यह प्रचलन में अवश्य है कि कहानी और उपन्यास दोनों विधाओं में लिखने वाला कथाकार है और सिर्फ़ कहानी विधा में लिखने वाला कहानीकार। चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी अपनी सृजित कहानी ‘उसने कहा था’ से वह इतने प्रसिद्ध हो गए कि कहानी का विकास उनके उल्लेख के बिना अधूरा माना जाएगा। बहुत समय पहले महाकाव्य को अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त था तथा एक बड़े साहित्यकार की मंशा एक महाकाव्य रचने की होती थी। इस संदर्भ में रवींद्र नाथ की टैगोर की पंक्तियों का हिंदी रूपांतर याद आ रहा है, “थी महाकाव्य रचने की मेरे मन में
हा कहां गई वह युद्ध- कथा सपने सी! कन्नड़ लेखिका बानो मुश्ताक को उनके अंग्रेजी में अनुवादित कहानी संग्रह ‘हार्ट लैंप’ के लिए वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित बुकर पुरस्कार के लिए लेखिका को तथा अनुवादक दीपा भारती को हार्दिक बधाई।
आपका संपादकीय, हमेशा की तरह, अपने विषय को उसकी पूरी पृष्ठभूमि के साथ प्रस्तुत करता है। आपकी सदिच्छा में आपकेसाथ हूं। बहुत-बहुत बधाई।
विद्या जी, आपने विस्तार से संपादकीय पर सार्थक टिप्पणी की है। हार्दिक आभार।
बहुत सटीक बढ़िया संपादकीय। हार्दिक शुभकामनाएं तेजेंद्र ji
बहुत शुक्रिया प्रगति जी।
कहानी उपन्यास का सारांश नहीं होती वरन एक सम्पूर्ण विधा है। यह कहना गलत है कि किसी लेखक के लिए कहानी लेखन उसका शैशव काल है। वह पूरा साहित्यकार उपन्यास लिखने के बाद ही बनता है। हाँ यह अवश्य है ज़ब भी कोई कथाकार चाहे वह कितने ही वर्षो से क्यों न लिख रहा हो, किसी नई कहानी लिखना प्रारम्भ करता है तो उसके मन में अपनी पहली कहानी लिखने जैसी ही कशमकश होती है। हर बार यह अंदेशा होता है कि उसे स्वीकारा जायेगा या नहीं।
जहाँ तक कि पुरस्कार और सम्मान की बात है, कहानी विधा को पुरुस्कार लायक समझा ही नहीं गया, यह आश्चर्यजनक है। पिछली बार गीतांजलि श्री के उपन्यास रेत समाधि’ के अंग्रेजी अनुवाद ‘टुंब ऑफ़ सैंड’ तथा इस बार सोशल एक्टिविस्ट, पत्रकार तथा पेशे से वकील बानू मुश्ताक के कहानी संग्रह के अंग्रेजी अनुवाद ‘हार्ट लैंप’को बुकर पुरस्कार से नवाजे जाने से शायद अब हमारे देश में भी कहानी विधा को भी मान्यता प्राप्त होगी, उसे शैशव काल या उपन्यास का सारांश नहीं माना जायेगा। इसके साथ ही साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ के पदाधिकारियों की आँखें भी खुलें तथा वे भी इस विधा को मान्यता दे दें। किसी के कहानी संग्रह को निकट भविष्य में साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार मिल सके।
जहाँ तक बानू मुश्ताक को किसी राजनीतिज्ञ द्वारा बधाई न देने की बात है भारत के नेता आपस में एक दूसरे की कमियां निकालने में ही लगे हैं तो इस समाचार पर उनकी नजर कहाँ जायेगी! बानू मुश्ताक को उनकी उपलब्धि के लिए बधाइयाँ।
सदा की तरह आँखें खोलने वाला एक अच्छा संपादकीय। बधाई आपको।
सुधा जी, आप पुरवाई का प्रत्येक संपादकीय ना केवल पढ़ती हैं बल्कि उस पर सूझबूझ से परिपूर्ण टिप्पणी भी लिखती हैं। आपका हार्दिक आभार।
बहुत सार्थक संपादकीय लिखा आपने। बिल्कुल कहानी खुद में पूर्ण है
धन्यवाद निर्देश निधि जी।
मुझे जानकर आश्चर्य हुआ कि हिन्दी साहित्य में कहानीकार को एक मुकम्मल साहित्यकार नहीं माना जाता। क्या अंग्रेजी साहित्य में भी यही मान्यता है?
अरविंद भाई हिन्दी साहित्य में यह समस्या पुरानी है।
मेरे विचार से कहानी लेखन बहुत ही प्राचीन, महत्वपूर्ण एवं खास विधा है , कहानीकार अत्यधिक महत्वपूर्ण है जो मानवीय जीवन के विभिन्न आयामों से कथाओं को उठाता है, अपनी लेखनी से कथा के पात्रों,को जीवंत करता है, देश,काल ,समाज ,संस्कृतिकी स्थितियों से अवगत कराता है, इसके लिए मूल कहानी लेखक को पूरा पुरस्कार मिलना चाहिए , अनुवादन एक अलग विधा है इसके लिए,विभिन्न भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है,यह भी सही हे कि किसी कृति का अनुवाद ठीक से नहीं किया गया मौलिकता के साथ तो कहानी की लय उसका कथ्य हल्का पड़ सकता है लेकिन इसका मतलब कथाकार और अनुवादक को समकक्ष समझा जाए ,बुकर पुरस्कार को आधा आधा बांटना तो कतई उचित नहीं है, अनुवादक का पुरस्कार अलग ही होना चाहिए ,
रही बात उपन्यासकार से कहानीकार को कम आंकना ,सरासर गलत है ,
हमारे देश में साहित्यिक पुरस्कारो के मामले में काफी झोल है,एक कहानी को जो थोड़े विस्तार की क्षमता रखती हो उस पर उपन्यास लिखा जा सकता है , परंतु 10 कहानी लिखने के लिए अलग-अलग प्लॉट पर काम करके टू द प्वाइंट लिखना ,लेखक की विचार शीलता मायने रखती है ,
किसी भी लेखक का शैशव काल ,लेखक ने सिर्फ कहानी लिखी ,सिर्फ कविता लिखी,उपन्यास लिखा,से नहीं आंका जा सकता,लेखक ने किसी भी विधा में महत्वपूर्ण , रोचक मौलिकता,से भरपूर लिखा है तो वह पुरस्कार के योग्य होना ही चाहिए।
विडंबना है देश के बाहर के लोग भारतीय लेखकों को सम्मानित कर रहे हैं और हम अभी सम्मान की श्रेणी तय नहीं कर पाए
बानू मुश्ताक जी को हार्दिक बधाई बुकर पुरस्कार हेतु,
आपका निरंतर चिंतन करके हर सप्ताह नए नए विषयों पर संपादकीय लिखना भी तारीफे काबिल है,आपको अनंत साधुवाद हमारा चिंतन बढ़ाने के लिए,
अगला पुरस्कार आपके लिए हो,पुरवाई परिवार की तरफ से शुभकामनाएं।
कुन्ती हरिराम झांसी
कुन्ती जी, आपने संपादकीय को परखते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। पूरी टीम आपकी आभारी हैं।
एकदम स्पष्ट रूप से आपके विचार और सुझाव ने दिल को खुश कर दिया। बहुत-बहुत बेहतरीन लेख समसामयिक विषय पर विचारणीय
हार्दिक धन्यवाद संगीता।
महत्वपूर्ण संपादकीय सर, कहानी विधा को लेकर महत्वपूर्ण प्रश्न।
स्नेहाशीष अपूर्वा।
इस संपादकीय का शीर्षक “कहानी उपन्यास का सारांश नहीं होती” अपने आपमें गंभीर विवेचना छिपाए हुए है । हिंदी साहित्य का दुर्भाग्य है कि हम विधाओं में ही कॉम्प्टीशन करने लगते हैं । कविता में छंद बद्ध और छंद मुक्त का विवाद पुराना होकर भी नया ही है । छंद बेहद कठिन है पर आज उसे मंचीय मान लिया गया है । व्यंग्य और लघुकथा ने साहित्य में अपना स्थान बनाने में लंबी लड़ाई लड़ी है । रही बात कहानी की तो ये अपने आप में महत्वपूर्ण विधा है । इसकी उपन्यास से तुलना नहीं हो सकती । आशा है बुकर के बाद इस पर संज्ञान लिया जाएगा और मानसिक बंध टूटेंगे ।
वंदना, इस सार्थक टिप्पणी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया।
नई और रोचक जानकारी । आज न्यूज़ चैनल देखने बैठो तो 10 दिन तक एक ही न्यूज़ को घसीटते रहते हैं। किंतु आपका संपादकीय हर बार एक नए विषय के साथ रोमांच पैदा करता है। युवा पीढ़ी को आपका संपादकीय अवश्य पढ़ाना चाहिए। समाचार पत्रों और न्यूज़ चैनल पर तो आज के समय में कुछ भी समसमायिकी की नहीं है। आपके संपादकीय के माध्यम से युवा पीढ़ी अपना ज्ञानवर्धन और समसमायिकी स्तर में बढ़ोतरी कर सकती है। कोटि कोटि प्रणाम सर आपको
अंजु, आपको पुरवाई का संपादकीय पसंद आता है, और आप इसे युवा पीढ़ी को पढ़ने के लिये प्रेरित कर रही हैं… यह हमारे लिये बहुत उत्साहवर्धक स्थिति है। हार्दिक आभार।
कहानी अलग विधा है और उपन्यास अलग। उपन्यास शब्दों का एक चल चित्र है। जहां प्रत्येक घटना का बारीकी से वर्णन किया जाता है तथा बहुत से पात्र होते हैं। कहानी में पात्र कम अवश्य होते हैं परंतु कहानी समाज का दर्पण होती है तथा समाज को आसानी से प्रभावित करती है…. बदलाव लाती हैं।
हर बार की तरह इस बार का संपादकीय नवीनता और विचारों के प्रवाह को बढ़ाने वाला है।
इस ख़ूबसूरत टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार संगीता।
प्रश्न है कि सर्वाधिक प्राचीन, लोकप्रिय और क्षिप्रगति विधा होते हुए भी कहानी उपेक्षित क्यों? समासात्मक, सूत्रात्मक और समय- प्रबन्धन विधा होते हुए भी नं० दो पर क्यों? गागर में सागर सी, थोड़े में बहुत कहने वाली विधा अवहेलित क्यों? शायद बुकर वालों की पहल और आपका सम्पादकीय पुरस्कार निर्णायकों/ साहित्य अकादमी और भारतीय ज्ञानपीठ का ध्यान आकर्षित कर सके।
इस अनछुए विषय पर लिखने के लिए, प्रश्न उठाने के लिए आप बधाई और धन्यवाद दोनों के पात्र हैं।
मधु जी आप जैसी वरिष्ठ आलोचक की टिप्पणी पाठकों तक पहुंचेगी तो उनमें नवचेतना जागृत होगी। हार्दिक आभार।
आदरणीय तेजेन्द्र जी
हर बार की तरह संपादकीय अकल्पनीय रहा। पर है बहुत महत्वपूर्ण। इस संपादकीय के माध्यम से बुकर अवॉर्ड को बेहतर तरीके से समझ पाए कि वास्तव में यह है क्या? एक बड़ी राशि मिलती है ,इसलिए तो वह बड़ा है ही लेकिन नाम भी बड़ा है, सम्मान भी बड़ा!
इस बार के संपादकीय में भी शीर्षक महत्वपूर्ण है। वास्तव में कहानी उपन्यास का सारांश हो भी नहीं सकती। कहानी और उपन्यास दो अलग-अलग विधाएँ हैं और सारांश एक अलग-अर्थ रखता है।वह हर विधा का हो सकता है। इसका अर्थ ही है कि जो पढ़ा जा रहा है उसका सार मुख्य रूप से क्या है ?चाहे वह उपन्यास हो कहानी या कोई और विधा। वह विधा का केंद्रीय भाव भी नहीं होता। कहानी और उपन्यास में उतना ही अंतर है जितना एक वचन और बहुवचन में।
हमें आज पता चला कि साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ कहानी को स्वतंत्र विधा नहीं मानते। काश वे यह बता पाते कि ऐसा क्यों?
साहित्य की 6 प्रमुख विधाएँ हैं-
1-कहानी
2- उपन्यास
3-एकांकी
4-नाटक
5-निबंध और
6-आलोचना
शेष सब गौण विधाएँ हैं।
अगर कहानी स्वतंत्र विधा नहीं है तो फिर स्कूली पाठ्यक्रम में झूठ क्यों सिखाया जा रहा है? क्यों प्रमुख छह विधाओं में कहानी को रखा गया है? यह सब गलत नहीं हो सकता।
कहानी संग्रह को बुकर अवार्ड मिलना शायद सभी के लिए आश्चर्यजनक रहा।
क्या आधार रहा होगा चयन का? पहली बार कहानी संग्रह का चयन हुआ है तो कुछ न कुछ तो विमर्श हुआ होगा, कुछ तो मानक तय किये गए होंगे!
दक्षिण भारत में19वीं सदी की अगर सामाजिक ,राजनीतिक व सामंतवादी व्यवस्था की बात करें तो बहुत ही खराब स्थिति थी। बजरंग बिहारी तिवारी का “केरल का सामाजिक आंदोलन एवं दलित साहित्य” की समीक्षा लिखते हुए जब हमने उसका इतिहास पढ़ा तो कई दिन हम बहुत अवसाद में रहे। स्थिति काफी खराब रही। जाति प्रथा और दास प्रथा का वहाँ काफी कष्टकारी पक्ष संभवतः आज भी है।
वे सभी अमानवीय पीड़ाओं को कहानियों में बुना गया होगा। फिर लेखन की अपनी भाषा और शैली भी प्रभावित करती है। जब कोई रचना अपनी भाषा में पढ़ी जाती है तो उसे पढ़ना और समझना दोनों ही सहज और सरल होता है। उसे बेहतर समझ पाते हैं।
इसमें निर्णायक मंडल का जो विभिन्न दृष्टिकोण से अध्यक्षीय पक्ष रखा;उसे पढ़ कर हमें यह बात समझ में आई कि निश्चित रूप से महिलाओं के जीवन, प्रजनन, अधिकारों, आस्था, जाति और शक्ति उत्पीड़न के बारे में जो लिखा गया होगा उसी से वे प्रभावित हुए होंगे,क्योंकि सबसे पहला प्रभाव वही डालते हैं।
जो भी हो,अगर हिंदी भाषा में भी इस संग्रह का अनुवाद हो सके तो तो इस सम्मानित संग्रह को सभी लोग पढ़ सकेंगे। इस दिशा में हिंदी कहानीकार भी आगे बढ़ सकते हैं।
जितना सम्मान इस संग्रह को विदेश में मिला अपने देश में भी वह संग्रह उतने ही सम्मान का अधिकारी है। रचना भी और रचनाकार भी। पर इस बात को कोई समझ पाए!
बुकर अवॉर्ड की जो जानकारी आपने दी, वह काबिले गौर है। जिसकी जानकारी शायद सबको नहीं होगी। निर्णायक मंडल के अध्यक्ष का यह कहना कि “यह एक क्रांतिकारी अनुवाद है।” बहुत मायने रखता है। भाषा और शैली की प्रभावशालिता बहुत मायने रखती है अनुवादकों को यह बात समझना बहुत जरूरी है
यहाँ अनुवाद से अर्थ अनुवाद में लिखे हुए से ही है। मुस्लिम महिलाओं को लेकर जो विषय बताए वे निश्चित रूप सिर्फ मुस्लिम परिवार ही नहीं और भी कई प्रांतों में देखने को मिलेंगे।
शीर्षक बहुत मायने रखता है। हार्ट लैंप हसीना से अधिक प्रभावशाली है
अब आपके संपादकीय का दूसरा विचारवान विषय-“जब तक कोई उपन्यास न लिख ले तब तक कहानीकार को पूरा साहित्यकार नहीं माना जाता।”
पर क्यों? क्या कारण है इसका? वास्तव में साहित्य का उद्देश्य क्या है? क्या सिर्फ मनोरंजन है?
कहानी विषय,घटना, वातावरण प्रधान होती है और सिर्फ मनोरंजन नहीं करती, बल्कि उस घटना के माध्यम से कोई ना कोई प्रेरणा तत्व पाठक तक पहुँचता हैं। उसमें उसके मूल में कोई ऐसा संदेश होता है जो समाज में परिवर्तन की ताकत रखता है सुधार के क्षेत्र में प्रेरित करता है। सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, हर पहलू से कहानी के प्रेरणातंतु लोगों को प्रभावित करते हैं। एक भी सकारात्मक संदेश उथल पुथल मचाने में सक्षम होता है।, भले ही वह पारिवारिक स्तर पर भी क्यों न हो।
और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कहानी में रोचकता होती है और उसे पढ़ने वाले अधिकतम लोग होते हैं, क्योंकि इसका स्वरूप छोटा होता है।
उपन्यास बड़ा होता है सब लोग इसे पढ़ने में अधिक रुचि इसलिए भी नहीं रखते क्योंकि यह पढ़ने में अधिक वक्त लेता है।
पर इससे इसका महत्व कम नहीं होता है यह भी प्रमुख धारा की विधा है। इसमें व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन का समग्रता से वर्णन रहता है, जीवन से जुड़ी प्रासंगिक कथाएँ भी साथ-साथ चलती हैं। उपन्यास लेखन एक महत्वपूर्ण लेखन है। पर इसका मतलब यह नहीं कि अगर किसी ने उपन्यास नहीं लिखा तो वह साहित्यकार ही नहीं। यह रचनाकार की रुचि के ऊपर निर्भर है कि वह अपने आप को किस लेखन में सहज पाता है।
कहानी का फलक छोटा है, उपन्यास का बड़ा, जाहिर है सबकी अपनी-अपनी क्षमता होती है।
बीमारी में कई बार बड़े-बड़े उपचार काम नहीं आते और किसी अनुभवी डाक्टर की एक छोटी सी गोली काम कर जाती है। बड़े-बड़े डॉक्टरों का उपचार उपन्यास की तरह है और एक छोटी सी गोली कहानी की तरह प्रभावशाली।
जब दोनों ही मुख्य धारा की विधाएँ हैं। तो किसी एक को किसी दूसरे से कमतर कैसे आँका जा सकता है? भोजन की सजी हुई थाली में हर चीज का स्वाद अलग-अलग होता है हर चीज स्वादिष्ट हो सकती है अपने-अपनी पसंद के अनुरूप।
वर्तमान की स्थिति तो ऐसी है कि सभी साहेब बने हुए हैं। निर्णायक की भूमिका में।
मैंने जो कहा वही ब्रह्म वाक्य।
एक ही रस लंबे समय तक आनंद नहीं देता। इसलिए परिवर्तन की आवश्यकता महसूस होती है।निहित मानवीय उद्देश्य सभी विधाओं के लिये महत्वपूर्ण हैं।
कहानी और उपन्यास में अंतर के लिये उनकी अपनी विशेषताएंँ हैं, स्वरूपगत, विषय और उद्देश्यगत, और भी अंतर हैं।पढ़ने पर कथा सा आभास भले ही ऐसा होता है लेकिन कहानी को उपन्यास का लघु रूप नहीं कहा जा सकता।दोनों की ही विशेषताएँ अलग-अलग हैं।
उदय प्रकाश जी वाला प्रसंग पढ़कर आश्चर्य हुआ। सम्मान पाने के लिए क्या-क्या किया जा सकता है!!
तेजेन्द्र जी! युवा कथाकार विवेक मिश्र की बात ने तो और भी ज्यादा आश्चर्यचकित किया।कहानी लेखन के लिये लेखन के शैशव काल की बात कहने वाले को कितने लोग जानते हैं? हमने तो नाम ही पहली बार सुना लेकिन प्रेमचंद को देश- दुनिया के लोग जानते हैं जयशंकर प्रसाद , महादेवी वर्मा, यशपाल और भी कितने ही लोग हैं आज के समय में भी अच्छे-अच्छे कहानीकार हैं। अपनी बात को रखने के लिए आप कोई तथ्य तो दें?कोई कारण तो बताएँ?
यशपाल की कहानी “दुख का अधिकार” इतना द्रवित करती है अंदर तक कि जिन कहानियों के लिए बुकर अवॉर्ड मिला है उन कहानियों से वह किसी भी तरह कमतर नहीं होगी। सारी दुनिया दो धड़े में बँटी हुई है। अमीर और गरीब ।अमीर का छोटा सा भी दुख दुनिया का बड़ा दुख बन जाता है, वहीं गरीब को अपना बड़ा दुख प्रगट करने का अधिकार नहीं।
वैसे तो हर जीवन हर पल सीखने की प्रक्रिया में रहता है और साहित्यकार भी इससे अलग नहीं। लेकिन जीवन अनुभव अधिक मायने रखते हैं।
लेखकीय दृष्टि से विधा विशेष इसकी मानक नहीं है। डॉ. होना अलग बात होती है और पेशे से संबद्ध अलग-अलग अंगों के विशेषज्ञ होना अलग बात होती है। साहित्य में भी अपनी-अपनी जगह सब विशेष हैं पर प्रश्न यह है कि आपने जो लिखा है वह कितनों ने पढ़ा और जो पढ़ा उसका क्या प्रभाव हुआ? चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने मात्र तीन कहानियाँ लिखी थीं
और मात्र एक कहानी ‘उसने कहा था’ ने उन्हें अमर कर दिया। उन्होंने एक भी उपन्यास नहीं लिखा।आपने कितना लिखा यह मायने नहीं रखता आपने क्या लिखा यह महत्वपूर्ण है फिर विधा चाहे जो भी हो।
कहीं दूर जाने की जरूरत ही नहीं विश्व स्तर पर ख्याति प्राप्त पुरवाई के एडमिन और संपादकीय लिखने वाले आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी!आपकी स्वयं की ख्याति आपकी कहानियों से ही है। हमें भी नहीं मालूम कि आपने कोई उपन्यास अभी तक लिखा है या नहीं।आज भीआप भारत सहित विश्व स्तर पर अपनी काला सागर, ढिबरी टाइट, कब्र का मुनाफा, देह की कीमत, जैसी महत्वपूर्ण कहानियों के लिये प्रसिद्धि प्राप्त हैं। कहानियाँ ही आपकी पहचान हैं।
इस लेबल पर अभी तक कोई उपन्यासकार पहुँचा भी होगा तो हमें पता नहीं लेकिन अब एक गुजारिश है कि अपने प्रमुख कहानियों को एक संग्रह में अंग्रेजी में अनुदित करें।आप तो स्वयं अंग्रेजी के विशेषज्ञ हैं।
पहली बार नोवेल का हिंदी अर्थ पता चला कभी जानने की कोशिश ही नहीं की।
तब तो यह ठीक ही रहा की कहानी संग्रह में निर्णायक मंडल को कुछ नया पढ़ने को मिला। कुछ ऐसा, जिसने उन्हें हिला दिया।निर्णायक मंडल के अध्यक्ष श्री मैक्स पोर्टर का कहा हुआ जितना आपने संपादकीय में लिखा उस हिसाब से उन्होंने जितना भी कहा, जो भी कहा, वह अनुवाद के लिए कहा और अनुवादित कृति के लिये कहा। उससे ऐसा लगा कि वास्तव में सम्मान अनुवाद के लिए ही दिया गया है, उसे आधा-आधा बाँटना जरूरी है क्योंकि मूल लेखक को नकारा नहीं जा सकता।पर हमें उनकी भाषा में खलबली मचाने वाली बात समझ में नहीं आई। शायद यह अनुवाद को लेकर ही कहा गया होगा जिसके माध्यम से हम देश दुनिया से जुड़ पाते हैं और वहाँ की स्थिति को उपन्यास या कहानियों के माध्यम से समझ पाते हैं।अनुवाद के माध्यम से जिसे पढ़कर उन सब के दिलों में हलचल मच गई वह भाषा और शैली की प्रभावशीलता ही होगी।
काश! अपने देश में भी इस तरह का कुछ हो पाए। अपन तो अपने ही लोगों को नहीं अपना पा रहे, जो दूसरे देशों में रहकर भी हिंदी का गौरव बढ़ा रहे हैं।
योग्यता और काबिलियत जातिवाद, वर्गवाद के साथ ही संपन्न लोगों के स्वार्थ की अग्नि में होम हो रही है। बुकर अवार्ड के लिये सम्मानित द्वय को बधाई।
बुकर अवार्ड से संबंधित जानकारी हम सब तक पहुँचाने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया
पुरवाई का आभार।
यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा आदरणीय नीलिमा जी – कि आपकी टिप्पणी संपादकीय से बेहतर है। हार्दिक धन्यवाद।
क बार फिर आँखें खोलने वाला संपादकीय! शायद पुरस्कार की इसी नीति के चलते ही हिन्दी साहित्य में ऐसे उपन्यासों की भरमार है जो वास्तव में एक लंबी कहानी ही हैं।
साधुवाद
बहुत बहुत शुक्रिया शिवानी।
कहानी साहित्यकार का शैशव काल….एक नवीन दृष्टिकोण ,साहित्य अकादमी को दिशा देता हुआ सम्पादकीय
जया इस टिप्पणी का तीखा व्यंग्य महसूस किया जा सकता है।
बहुत ही महत्वपूर्ण विचार है सर कहानी यदि उपन्यास का शैशव काल है.. तो मेरी दृष्टि में कहानी सबसे अधिक प्रभावी है अर्थात् शैशवावस्था सशक्त हुई..। आपके विचार से सहमत हूँ सर और आपके प्रश्न से भी..
अंत में आपकी जो इच्छा ( सभी प्रबुद्ध कहानीकारों की भी ) पूर्ण हो…
साधुवाद
अनिमा आपकी सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।