मुझे याद है कि जब स्कूल में हमारा पेपर ठीक नहीं जाता था, तो हम अपने माता-पिता से कहा करते थे, “पेपर आउट ऑफ़ सिलेबस आया था!” राहुल गाँधी और ‘इंडी एलायंस’ को भी हर हार के बाद लगता है कि क़सूर ईवीएम और चुनाव आयोग का है, वरना उन्होंने तो कमाल की तैयारी की थी। जब एक ही झूठ बार-बार बोला जाता है, तो लगने लगता है कि वही सच है!
बिहार चुनाव के नतीजों ने विपक्षी दलों के पैरों तले से ज़मीन खिसका दी है। आत्मावलोकन करने के स्थान पर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने ‘एक्स’ पर ट्वीट करते हुए लिखा कि –
“मैं बिहार के उन करोड़ों मतदाताओं का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने महागठबंधन पर अपना विश्वास जताया।”
“बिहार का यह परिणाम वाकई चौंकाने वाला है। हम एक ऐसे चुनाव में जीत हासिल नहीं कर सकें, जो शुरू से ही निष्पक्ष नहीं था।”
“यह लड़ाई संविधान और लोकतंत्र की रक्षा की है। कांग्रेस पार्टी और ‘इंडिया गठबंधन’ इस परिणाम की गहराई से समीक्षा करेंगे, और लोकतंत्र को बचाने के लिए अपने प्रयासों को और अधिक प्रभावी बनाएंगे।”
हम सबने ग़ौर किया था कि चुनाव अभियान के दौरान ही तेजस्वी यादव ने राहुल गाँधी के ‘वोट-चोरी’ और ‘गद्दी छोड़ो’ के राग पर गीत गाना बंद कर दिया था। तेजस्वी भले ही नवीं पास हैं, मगर ज़मीनी राजनीति को राहुल गाँधी से कहीं अधिक समझते हैं। वे जानते हैं कि उसके पिता लालू प्रसाद यादव ज़मानत पर रिहा हैं। मगर राहुल गाँधी ये भूल जाते हैं कि वे स्वयं और उनकी माँ सोनिया गाँधी, दोनों ज़मानत पर चल रहे हैं।
राहुल गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस लगभग 95 चुनाव हार चुकी है। मोदी ब्रांड इस समय विश्व का सबसे बड़ा ब्रांड है, जिससे मुकाबला करने के लिए कांग्रेस को समझना होगा कि साल में 365 दिन ज़मीनी स्तर पर काम करना आवश्यक है। भारत में 28 राज्य और 8 केन्द्र शासित प्रदेश हैं। इस समय कांग्रेस केवल हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में सत्तारूढ़ है। स्थिति नाज़ुक है, ऐसे मेंज़ुबानी रंग-रोगन लगाने से कुछ नहीं होगा।
मुझे याद है कि जब स्कूल में हमारा पेपर ठीक नहीं जाता था, तो हम अपने माता-पिता से कहा करते थे, “पेपर आउट ऑफ़ सिलेबस आया था!” राहुल गाँधी और ‘इंडी एलायंस’ को भी हर हार के बाद लगता है कि क़सूर ईवीएम और चुनाव आयोग का है, वरना उन्होंने तो कमाल की तैयारी की थी। जब एक ही झूठ बार-बार बोला जाता है, तो लगने लगता है कि वही सच है!
अभी राहुल गाँधी बिहार के चुनावी नतीजों के झटके से उबर भी नहीं पाए थे कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने एक और धमाका करते हुएएक बयान दे डाला, “कांग्रेस का मतलब मुस्लिम और मुस्लिम का मतलब कांग्रेस” है। कांग्रेस सरकार ने अल्पसंख्यकों को कई अवसर दिए हैं। केवल कांग्रेस ने ही अल्पसंख्यकों को बड़े पद दिए हैं।”
गाँधी परिवार के करीबी रेवंत रेड्डी ने भारतीय जनता पार्टी को एक और हथियार पकड़ा दिया है कि इस डंडे से मेरी पिटाई की जाए। गाँधीपरिवार को प्रसन्न करने के लिए उनके भक्त किसी भी तरह की बेवक़ूफ़ी करने से बाज़ नहीं आते। पहले से ही कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप लगते रहे हैं। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष एन. रामचंद्र राव ने गुरुवार को मुख्यमंत्री की उनके उक्त बयान के लिए आलोचना की और उसे बेहद आपत्तिजनक बताया। उन्होंने कहा कि देश की सबसे पुरानी पार्टी (कांग्रेस) वोट बैंक की राजनीति में लिप्त है।
रामचंद्र राव ने कहा, “कांग्रेस शासन में सबसे अधिक सांप्रदायिक दंगे हुए हैं, ऐसे में वे कैसे कह सकते हैं कि कांग्रेस का मतलब मुस्लिम है? हालांकि, यह सांप्रदायिक और बेहद आपत्तिजनक बात है। मुझे लगता है कि मुख्यमंत्री हताश हैं, क्योंकि वे उपचुनाव (जुबली हिल्स उपचुनाव) हारने वाले हैं। वे केवल मुस्लिम वोट चाहते हैं, वे हिंदू वोटों के बारे में नहीं सोच रहे हैं।”
अभी रेवंत रेड्डी ने कांग्रेस को बहत्तर हूरों वाली पार्टी घोषित किया ही था कि भारत की दो सौ बहत्तर हस्तियों ने राहुल गांधी को एक खुला पत्र लिख कर चुनाव आयोग को बदनाम करने के लिये लताड़ लगाई। पत्र पर हस्ताक्षर करने वाली इन हस्तियों में 16 रिटायर्ड जज, 14 पूर्व राजदूत सहित 123 पूर्व नौकरशाह, और 133 रिटायर्ड सेना अधिकारी शामिल हैं।
पत्र में कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा गया है कि पहले सशस्त्र बलों की बहादुरी पर सवाल उठाए गए, फिर न्यायपालिका, संसद और संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बनाया गया और अब चुनाव आयोग को “सुनियोजित और साज़िशन” बदनाम करने की कोशिश की जा रही है।
राहुल गाँधी के सितारे इन दिनों ख़ासे गर्दिश में हैं। अभी वे इन तमाम मुद्दों से जूझ ही रहे थे कि ‘इंदिरा गाँधी मेमोरियल ट्रस्ट’ ने चिली की पूर्व राष्ट्रपति मिशेल बैचेलेट को शांति, निरस्त्रीकरण और विकास के लिए साल ‘2024’ के प्रतिष्ठित ‘इंदिरा गाँधी पुरस्कार’ से सम्मानित कर दिया। मिशेल संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार की पूर्व प्रमुख भी रह चुकी हैं। ‘चिली’ का एक अर्थ मिर्ची भी होता है। कांग्रेस के इस निर्णय से हर तरफ़ मिर्ची फैलने का अहसास हो रहा है।
सच तो यह है कि ‘इंदिरा गाँधी मेमोरियल ट्रस्ट’ एक निजी संस्था है, जो जब चाहे, जिसे चाहे सम्मानित करने का हक़ रखती है। मगर जब एक ट्रस्ट पूर्व प्रधानमंत्री के नाम पर चल रहा हो और उसे चलाने वाली केवल उसकी बहू ही नहीं, बल्कि भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस की सर्वे-सर्वा हैं, तो इस निर्णय पर सवाल उठना लाज़मी हो जाता है।
सोनिया गाँधी ने मिशेल बैचेलेट को ‘इंदिरा गाँधी शांति, निरस्त्रीकरण और विकास पुरस्कार-2024’ प्रदान किया, और कहा कि इंदिरा गाँधी ने गरीबी, असमानता और दमन के खिलाफ लड़कर देश को नया स्वरूप दिया है। बैचेलेट ने इंदिरा को दूरदर्शी नेता बताया और उनकी शांति व न्याय की विरासत को आज भी प्रेरक बताया।
सोनिया ने इस अवसर पर कहा कि- ‘इंदिरा गाँधी शांति, निरस्त्रीकरण और विकास पुरस्कार’ की स्थापना 1985 में ‘हमारे समय की सबसे असाधारण महिला नेताओं में से एक’ की स्मृति में की गई थी। उन्होंने इंदिरा गाँधी के एक उद्धरण को याद किया: “हमें शांति चाहिए क्योंकि गरीबी, बीमारी और अज्ञान के खिलाफ लड़ने के लिए एक और युद्ध है।” उन्होंने कहा कि एक दयालु हृदय, अपने लोगों के लिए गहरा प्रेम, मानवाधिकारों के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता और अहिंसा में अटूट विश्वास रखने वाली नेता के रूप में उनकी विरासत अनगिनत लोगों को प्रेरित करती रहेगी।
अपने संबोधन में, बैचेलेट ने शांति, निरस्त्रीकरण और विकास के लिए इंदिरा गाँधी पुरस्कार के लिए गहरा आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि भारत में एक बार फिर आना वास्तव में एक सौभाग्य है। उन्होंने इंदिरा गाँधी को ‘एक दूरदर्शी महिला और दुनिया भर के कई लोगों के लिए प्रेरणा का एक जबरदस्त स्रोत’ बताते हुए उनकी जिंदगी और विरासत को श्रद्धांजलि अर्पित की।
यहाँ ध्यान देने लायक बात यह है कि मिशेल बैचेलेट संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार की पूर्व प्रमुख के रूप में भारत की हमेशा आलोचना करती रही हैं। इसलिए भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस द्वारा पूर्व चिली राष्ट्रपति मिशेल बैचेलेट को ‘इंदिरा गाँधी शांति पुरस्कार’ प्रदान किए जाने की कटु आलोचना की। भारतीय जनता पार्टी ने उनके सी.ए.ए. और जम्मू-कश्मीर पर दिए गए पुराने बयानों को अपनी आलोचना का आधार बनाया।
2019 में, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटने के बाद लगे प्रतिबंधों पर टिप्पणी करते हुए, बैचेलेट, जो उस समय संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की प्रमुख थीं, उन्होंने कहा था कि भारत सरकार की हाल की कार्रवाइयों का “कश्मीरियों के मानवाधिकारों पर गंभीर असर” हुआ है।
भारतीय जनता पार्टी के नेता अमित मालवीय ने गुरुवार को ‘एक्स’ पर पोस्ट किया कि “कांग्रेस का मिशेल बैचेलेट को ‘इंदिरा गाँधी शांति पुरस्कार’ देना जितना साफ़ है, उतना ही अनुमानित भी”, उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि- जिसने अपने कार्यकाल को “पूरी तरह एंटी-इंडिया, प्रो-इस्लामिक नैरेटिव पर खड़ा किया, जो ग्लोबल लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम से बिल्कुल मेल खाता है। स्वाभाविक है कि कांग्रेस ने उन्हें सम्मान देने की जल्दी की।”
यह पुरस्कार 1986 में शुरू किया गया था, जिसे ‘इंदिरा गाँधी मेमोरियल ट्रस्ट’ प्रदान करता है। इस ट्रस्ट की अध्यक्ष सोनिया गाँधी तथा गाँधी परिवार के अन्य सदस्य- राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा हैं।
बैचेलेट इस पुरस्कार की 37वीं प्राप्त-कर्ता हैं। इस पुरस्कार के प्रमाणपत्र में उल्लेख है कि- ‘वह चिली की सोशलिस्ट पार्टी की सदस्य हैं और उन्होंने कठिन परिस्थितियों में शांति, लैंगिक समानता, मानवाधिकार, लोकतंत्र और विकास के लिए लगातार काम किया है।’ इसके साथ ही भारत-चिली संबंधों में उनके योगदान की भी सराहना की गई है।
ध्यान देने लायक बात यह भी है कि वर्ष 1991 में यह पुरस्कार राजीव गाँधी को मरणोपरांत दिया गया। इसे नेहरू परिवार की परंपरा भी कही जा सकती है। भारत के इतिहास में दो ऐसे प्रधानमंत्री रहे, जिन्हें उनके कार्यकाल में ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया। साल 1955 में पंडित जवाहरलाल नेहरू और साल 1971 में इंदिरा गाँधी को उनके कार्यकाल के दौरान यह सम्मान दिया गया। इन दोनों पर आरोप है कि इन्होंने खुद को ‘भारत रत्न’ देने का कार्य किया।
मित्रों! जब मैंने ‘पुरवाई’ पत्रिका की संरक्षक आदरणीय ज़किया ज़ुबैरी जी को बताया कि किस तरह पंडित जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गाँधी ने स्वयं को ‘भारत रत्न’ से नवाज़ा और सोनिया गाँधी ने अपने दिवंगत पति को ‘इंदिरा गाँधी शांति पुरस्कार’ से अलंकृत किया, तो उन्होंने बड़ी मासूमियत से कहा – “शर्मा जी, यह तो वैसे ही हुआ जैसे आप ख़ुद को ‘इंदु शर्मा कथा सम्मान’ से नवाज़ लें!”
इस बार के संपादकीय-‘बिहार चुनाव के बाद ‘ में कांग्रेस जो कि देश की सबसे पुरानी पार्टी है के लगातार गिरावट पर केंद्रित है। यह बात सच है कि कांग्रेस पार्टी निरंतर अपना जनाधार खोती जा रही है। चूंकि गांधी परिवार इसका सर्वेसर्वा है तो जिम्मेदारी भी उन्हीं पर जाती है। राहुल गांधी जनता की नब्ज पकड़ने में विफल साबित हो रहे हैं। चुनाव आयोग पर इसका ठीकरा फोड़ा जाना मैं सही नहीं समझता हूं।
दरअसल क्या है कि पुरखों की कमाई कितने दिनों तक खाई जा सकती है? खुद कुछ न करेंगे तो वह पूंजी भी खत्म हो जाएगी। पंडित जवाहरलाल नेहरू, इन्दिरा गांधी देश की शान रहे हैं। जनता ने उन्हें पकड़ा तो सत्ता से उतरने न दिया। एक दो घटनाओं को छोड़ दें तो आज भी उनके योगदान को देश भूल नहीं सकता है। ये महापुरुष आज भी जनमानस में उतने ही आदरित है जितने पहले थे।
राहुल गांधी ने एक दो बुनियादी भूलें कर दी है। पहली भूल तो कांग्रेस की विचारधारा से भटक गए हैं। समन्वयवादी विचारधारा पर वे कम टिक पाते हैं। एंग्री यंग मैन की भूमिका जनता को पसंद नहीं आ रही है। इतने बड़े देश के मिजाज को समझना एक राजनेता को आना चाहिए। हर बार की हार का ठीकरा आप किसी और पर नहीं फोड़ सकते हो।
भारतीय जनता पार्टी ने जनता की नब्ज पकड़ ली है। वह कठोर निर्णय लेने के लिए जानी जाती है। देश के मामले में हो या विदेश के मामले में, दोनों में उसने साबित किया है। जनता इसी में खुश है।
इन्दिरा गांधी के बाद ऐसे निर्णय भाजपा ही ले रही है। जनता को यह पसंद आ रहा है।
बिहार चुनाव में इंडिया गठबंधन ने ऐसे वादे किए जो हास्यास्पद थे। इन वादों की रही-सही कसर ओवैसी ने निकाल ली।
चुनाव परिणाम और परीक्षा में आउटआफ कोर्स वाली उक्ति बड़ी सटीक रही।
पुरस्कारों की बात तो ऐसी है कि चाहे खुद ले लें या दूसरों को दे दें, ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। कौन याद रखता है! हां भाजपा इसे अच्छे से भुना लेती है। भारत विरोधी लोगों को पुरस्कृत करना कांग्रेस के लिए नुकसान पहुंचाएगा। भारतीय राजनीति में इसे देखा जाता है।
आदरणीया जकिया ज़ुबैरी जी का पुरस्कारों पर कटाक्ष धारदार है।
इतने फेमस विषय पर संपादकीय लिखना बड़ी बात है। क्योंकि इस पर लगातार डिबेटे होती रही है। फिर भी आप संपादकीय में नयापन लेकर आए हैं। आपको बहुत-बहुत बधाई सर
भाई लखन लाल पाल जी मैं तो डर रहा था कि इस संपादकीय के बाद डंडे पड़ेंगे। मगर आपने तो एकदम तटस्थ होकर इतनी ख़ूबसूरत टिप्पणी कर दी कि हौसला बढ़ गया। हार्दिक आभार।
पुरवाई’ में प्रकाशित आपका यह संपादकीय केवल प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक ज़ोरदार आईना है जो विपक्ष की हर हार के बाद की चिर-परिचित मुद्रा को बेनक़ाब करता है। ‘पेपर आउट ऑफ़ सिलेबस आया था’ वाली उपमा ने तो सीधे बचपन की याद दिला दी! यह विडंबना ही है कि ज़मीनी स्तर पर काम करने के बजाय, हर असफलता का ठीकरा ईवीएम या चुनाव आयोग पर फोड़ा जाता है, जबकि असली समस्या नेतृत्त्व और रणनीति में निहित है।
राहुल गाँधी का ज़मानत पर होने के बावजूद ‘वोट-चोरी’ का राग अलापना और तेजस्वी यादव का इस राग को बीच में ही छोड़ देना, यह साबित करता है कि अनुभवहीनता और हकीकत की समझ का फासला कितना बड़ा है। आपने मोदी ब्रांड की महत्ता और कांग्रेस के सिमटते जनाधार का जो निर्भीक विश्लेषण किया है, वह किसी भी राजनीतिक पंडित से अधिक सटीक है।
रही बात रेवंत रेड्डी के बयान और ‘इंदिरा गाँधी पुरस्कार’ की, तो ये गाँधी परिवार के आस-पास बने चाटुकारिता के माहौल को दर्शाते हैं। तुष्टीकरण की राजनीति को इससे बड़ा ‘हथियार’ भला और क्या मिल सकता था? और परिवार के भीतर ही सम्मान बाँटने की आपकी और ज़किया ज़ुबैरी जी की अंतिम टिप्पणी तो इस पूरे लेख का सार है—सत्य, सरल और बेबाक!
आपका यह संपादकीय उन लोगों के लिए एक गंभीर चेतावनी है जो सिर्फ ज़ुबानी रंग-रोगन लगाकर राजनीति करना चाहते हैं। आशा है, यह विश्लेषण कांग्रेस को आत्म-मंथन के लिए प्रेरित करेगा। आपके बेलाग और बेबाक लेखन के लिए हृदय से आभार!
पुरवाई का के संपादकीय ,अब ऐसा लगता है कि भारतीय अखबारों के पर्याय से कहीं ऊपर उठकर ,भारतीय लोकतंत्र,के अब चौथे खंबे को परिभाषित करने से लगते हैं।
यह संपादकीय भी कई समीचीन मुद्दों और कभी केंद्र में सात दशक तक रही कांग्रेस के वास्तविक रूप को बड़ी ही सादगी और सच्चाई के आलोक में प्रस्तुत करता है।
कांग्रेस के युवराज अश्वत्थामा और राजमाता गांधारी की कारगुज़ारियों का भी सुस्पष्ट मंज़र भी इंदिरा गांधी पुरस्कार की बानगी से इस संपादकीय में तथ्यात्मक रूप से बतलाई गई है।
तेजेंद्र शर्मा जी का यह संपादकीय बिहार चुनाव में कांग्रेस की *पराजय* का गहराई से विश्लेषण करता है। पराजय शब्द इसलिए कि हार -जीत तो खेल में होती है। यह खेल नहीं वरन् बार – बार की हार जो पराजय से भी गहन है, या युद्ध में पराजय।
पेपर आउट ऑफ सिलेबस सही उपमा दी है।
मैं तो मानती हूँ कि किसी अन्य परीक्षा की तैयारी कर दूसरी परीक्षा देना। जैसा कि आजकल कुछ परीक्षार्थी करते हैं, उन्हें याद ही नहीं रहता कि पेपर का पाठ्यक्रम क्या है, किस विषय का पेपर है।
कुछ भी मनगढ़ंत लिख आते हैं और ठीकरा परीक्षा पर फोड़ते हैं।
आपने सही लिखा कि तेजस्वी भी जमीनी हकीकत जान गए थे।
परिणाम के बाद पार्टी को विश्लेषण करना चाहिए, इस क्रम में आज का संपादकीय विश्लेषण पढ़ना चाहिए।
बहुत ही शानदार लिखा है सर.. कहते हैं ना कि “विनाशकाले विपरीत बुद्धि” तो ये कांग्रेस परिवार के ऊपर बिल्कुल सटीक बैठता है..पक़र सबसे हास्यास्पद यह है कि यह परिवार क्यों नहीं समझ पाता कि इनको हराने में इनकी हरकते ही अधिक ज़िम्मेदार हैं..
और जो आपने इस संपादकीय का अंत किया है, उसने तो ख़ूब गुदगुदाया.. सटीक उदाहरण दिया मैम ने
भारत और भारत के विभिन्न प्रकार के चुनाव
ये आरम्भ से ही विकसित देशों के लिए
चर्चा का विषय रहे हैं।
आज के हालात पर अच्छा हास्य, व्यंग मिश्रित है ।
Dr Prabha mishra
राजनीति से दूर हूं, अधिक जानकारी नहीं रखती।
पर यहां एक ही बात कांग्रेस ख़ुद को हमेशा से ही महान समझता है।
दांत नहीं हैं चने खाने के लिए, पर वह मानेगा नहीं, उल्टा दांत है चने ही ख़राब है क़रार देगा।
सादर नमस्कार सर…
हमेशा की तरह एक विशेष शोध से लिखा गया संपादकीय है…एक एक शब्द विचार एवं विश्लेषण सबकुछ अर्थपूर्ण है….वैसे वे वही करेंगे जो जन्म से करते आ रहे हैं….जो उनकी आदत है….
साधुवाद
शानदार संपादकीय
पेपर हर बार आउट ऑफ सिलेबस आ रहा है बहुत सालों से। बढ़िया लगा सभी मुद्दों पर अच्छे से बात रखी आपने
ज़किया जी का कथन भी बहुत अच्छा लगा पुनः एक अच्छे संपादकीय के लिए आपको बधाई
आदरणीय संपादक जी
इस अंक का संपादकीय तो मुझे एक हास्य रचना लगा!
आपने लिखा है’ इस समय राहुल गांधी के सितारे गर्दिश में हैं’ मैं तो सोचती हूं उनके सितारे कभी उगे ही नहीं थे, गर्दिश में तो तब जाते जब वह कभी जगमगाए होते है;
‘इंदिरा गांधी शांति सम्मान ‘ऐसे व्यक्ति को देना जो भारत की नीतियों के विरुद्ध हो, तो ‘खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे” जैसा काम है!
अब ‘अंधा बांटे रेवड़ियां फिर फिर अपने को देय’ वाली कहावत चरितार्थ करने के लिए आप स्वयं को पुरस्कृत कर ही सकते है।
मजेदार संपादकीय के लिए बधाइयां।
संपादक महोदय की टिप्पणी विस्तृत है और दो टूक है.
अब सोनिया और राहुल भारतीय राजनीति के लिए आउट ऑफ सिलेब्स है.अब कांग्रेस पार्टी बुड्ढी और अप्रासंगिक हो गई है. यह आजादी प्राप्त करने के लिए एक संगठन था सच में आजादी के गांधी जी ने कहा था जिस उद्देश्य के लिए इस पार्टी को बनाया गया था अब उद्देश्य प्राप्त हो गया अत कांग्रेस पार्टी को समाप्त किया जाना चाहिए.आज का कांग्रेस पुनः प्रजातंत्र को राजतंत्र में ले जानेवाली पार्टी गई है.जिस तरह राजा का पुत्र ही राजा होता था ठीक उसी प्रकार लुटेरे का सरदार का बेटा पुनः सरदार बन बैठता है उन सभी पार्टियों का अगुवाई कांग्रेस कर रही है.रहा बात बिहार चुनाव उसमें राजग गठबंधन की बड़ी जीत यह दर्शाती है कि अब बिहार गरीबी और पलायन से मुक्ति चाहता है.अन्य राज्यों की तरह hm bhi viksit राज्य बने.इस बात को जनता समझ चुकी है..अब बिहार भी झटपट सौर उठकर वोट कर रहा है यह बिहार चुनाव में साबित हो चुका है.
रही बात घपले .,रंगदारी, घोटालेबाज लालू की पार्टी की अब वो गए जमाने की बात हो गई.यह भारत के लिए अच्छी बात है नहीं तो इंडी गठबंधन एक पार्टी नहीं गिरोह है जो तमाम नकारत्मक लोगो का जमावड़ा है. जो सांप्रदायिकता के नाम पर लोगो डरा कर अपना वोट बतौर रही थी.इस चुनाव में अब ध्वस्त हो गया.
हर विषय पर आपका गहन शोध अचंभित करता है। इस बार भी खुले पत्र में हस्ताक्षर करने वालों की सूची..!
जिसमें “16 रिटायर्ड जज, 14 पूर्व राजदूत सहित 123 पूर्व नौकरशाह, और 133 रिटायर्ड सेना अधिकारी शामिल हैं।”
यह इंडेप्ट विश्लेषण वाकई आपके श्रम को उजागर करता है।
This aspect of your editorial always awes me..!!!
बहुत दुखद तो यह है कि एक हट्टी कट्टी पार्टी का यूँ ढहते जाना।हम सब जानते हैं कि विपक्ष का मज़बूत होना किसी भी लोकतंत्र के लिये कितना आवश्यक है।राहुलजी ने यात्राओं के माध्यम से ,खेतिहरों के साथ खेतों मे उतरने से लेकर उनके साथ भोजन करने करने तक ने उनको खुद को ज़रूर कोई
भावनात्मक मजबूती दी होगी पर जनता से ‘कनेक्ट’नहीं बना।
मंचीय एवं साक्षात्कार परिपक्वता में अभी भी काम होना है।
यह सच है कि कांग्रेस की स्थापना जिस उद्देश्य से की गई वह
अब बचा नहीं ।इंदिराजी तक का नेतृत्व वह था जिसने संग्राम में स्वयं भाग लिया और वह देश के विकास की कटिबद्धता लिये था।सफल नेतृत्व सिर्फ़ पारिवारिक थाती नहीं,जनता
आर्थिक,सामाजिक सुरक्षा चाहती है।वर्तमान नेतृत्व की कमी सुधार के लिए एक संतुलित सोच के विपक्ष की आवश्यकता है,जनता आपके व्यक्तिगत विकास फार्मूले से नहीं चलती हैं वह भावुकता
की लाठी से हाँकी जाना पसंद करती है।जनता इतनी भी बेवकूफ नहीं कि 100 नौकरियों की गुंजाइश वाली जगह 5000 नौकरियों की घोषणा से रपट जाए।
सच्चाई,अच्छाई, आधुनिक सोच अपनी जगह हैं,पर ये राजनीति की भाषा नहीं।राजनीति माँग से नियंत्रित है।
सदा से यही होता आया है,राजनीति में नीति कहाँ दिखाई देती है? । बहुत महत्वपूर्ण विश्लेषण ,नयापन लिए
आ. ज़ाकिया जी का तंज बहुत सही ,खूब !
आपको साधुवाद
सस्नेह
सदा से यही होता आया है,राजनीति में नीति कहाँ दिखाई देती है? । बहुत महत्वपूर्ण विश्लेषण ,नयापन लिए
आ. ज़ाकिया जी का तंज बहुत सही ,खूब !
आपको साधुवाद
सस्नेह
इस बार के संपादकीय-‘बिहार चुनाव के बाद ‘ में कांग्रेस जो कि देश की सबसे पुरानी पार्टी है के लगातार गिरावट पर केंद्रित है। यह बात सच है कि कांग्रेस पार्टी निरंतर अपना जनाधार खोती जा रही है। चूंकि गांधी परिवार इसका सर्वेसर्वा है तो जिम्मेदारी भी उन्हीं पर जाती है। राहुल गांधी जनता की नब्ज पकड़ने में विफल साबित हो रहे हैं। चुनाव आयोग पर इसका ठीकरा फोड़ा जाना मैं सही नहीं समझता हूं।
दरअसल क्या है कि पुरखों की कमाई कितने दिनों तक खाई जा सकती है? खुद कुछ न करेंगे तो वह पूंजी भी खत्म हो जाएगी। पंडित जवाहरलाल नेहरू, इन्दिरा गांधी देश की शान रहे हैं। जनता ने उन्हें पकड़ा तो सत्ता से उतरने न दिया। एक दो घटनाओं को छोड़ दें तो आज भी उनके योगदान को देश भूल नहीं सकता है। ये महापुरुष आज भी जनमानस में उतने ही आदरित है जितने पहले थे।
राहुल गांधी ने एक दो बुनियादी भूलें कर दी है। पहली भूल तो कांग्रेस की विचारधारा से भटक गए हैं। समन्वयवादी विचारधारा पर वे कम टिक पाते हैं। एंग्री यंग मैन की भूमिका जनता को पसंद नहीं आ रही है। इतने बड़े देश के मिजाज को समझना एक राजनेता को आना चाहिए। हर बार की हार का ठीकरा आप किसी और पर नहीं फोड़ सकते हो।
भारतीय जनता पार्टी ने जनता की नब्ज पकड़ ली है। वह कठोर निर्णय लेने के लिए जानी जाती है। देश के मामले में हो या विदेश के मामले में, दोनों में उसने साबित किया है। जनता इसी में खुश है।
इन्दिरा गांधी के बाद ऐसे निर्णय भाजपा ही ले रही है। जनता को यह पसंद आ रहा है।
बिहार चुनाव में इंडिया गठबंधन ने ऐसे वादे किए जो हास्यास्पद थे। इन वादों की रही-सही कसर ओवैसी ने निकाल ली।
चुनाव परिणाम और परीक्षा में आउटआफ कोर्स वाली उक्ति बड़ी सटीक रही।
पुरस्कारों की बात तो ऐसी है कि चाहे खुद ले लें या दूसरों को दे दें, ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। कौन याद रखता है! हां भाजपा इसे अच्छे से भुना लेती है। भारत विरोधी लोगों को पुरस्कृत करना कांग्रेस के लिए नुकसान पहुंचाएगा। भारतीय राजनीति में इसे देखा जाता है।
आदरणीया जकिया ज़ुबैरी जी का पुरस्कारों पर कटाक्ष धारदार है।
इतने फेमस विषय पर संपादकीय लिखना बड़ी बात है। क्योंकि इस पर लगातार डिबेटे होती रही है। फिर भी आप संपादकीय में नयापन लेकर आए हैं। आपको बहुत-बहुत बधाई सर
भाई लखन लाल पाल जी मैं तो डर रहा था कि इस संपादकीय के बाद डंडे पड़ेंगे। मगर आपने तो एकदम तटस्थ होकर इतनी ख़ूबसूरत टिप्पणी कर दी कि हौसला बढ़ गया। हार्दिक आभार।
पुरवाई’ में प्रकाशित आपका यह संपादकीय केवल प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक ज़ोरदार आईना है जो विपक्ष की हर हार के बाद की चिर-परिचित मुद्रा को बेनक़ाब करता है। ‘पेपर आउट ऑफ़ सिलेबस आया था’ वाली उपमा ने तो सीधे बचपन की याद दिला दी! यह विडंबना ही है कि ज़मीनी स्तर पर काम करने के बजाय, हर असफलता का ठीकरा ईवीएम या चुनाव आयोग पर फोड़ा जाता है, जबकि असली समस्या नेतृत्त्व और रणनीति में निहित है।
राहुल गाँधी का ज़मानत पर होने के बावजूद ‘वोट-चोरी’ का राग अलापना और तेजस्वी यादव का इस राग को बीच में ही छोड़ देना, यह साबित करता है कि अनुभवहीनता और हकीकत की समझ का फासला कितना बड़ा है। आपने मोदी ब्रांड की महत्ता और कांग्रेस के सिमटते जनाधार का जो निर्भीक विश्लेषण किया है, वह किसी भी राजनीतिक पंडित से अधिक सटीक है।
रही बात रेवंत रेड्डी के बयान और ‘इंदिरा गाँधी पुरस्कार’ की, तो ये गाँधी परिवार के आस-पास बने चाटुकारिता के माहौल को दर्शाते हैं। तुष्टीकरण की राजनीति को इससे बड़ा ‘हथियार’ भला और क्या मिल सकता था? और परिवार के भीतर ही सम्मान बाँटने की आपकी और ज़किया ज़ुबैरी जी की अंतिम टिप्पणी तो इस पूरे लेख का सार है—सत्य, सरल और बेबाक!
आपका यह संपादकीय उन लोगों के लिए एक गंभीर चेतावनी है जो सिर्फ ज़ुबानी रंग-रोगन लगाकर राजनीति करना चाहते हैं। आशा है, यह विश्लेषण कांग्रेस को आत्म-मंथन के लिए प्रेरित करेगा। आपके बेलाग और बेबाक लेखन के लिए हृदय से आभार!
भाई चंद्रशेखर जी, आपकी बेबाक टिप्पणी बहुत से लोगों को आईना दिखाने का काम करेगी। स्नेह बनाए रखें।
स्नेह हेतु हृदय से आभारी हूॅं सर!
ख़ुश रहिये।
बढ़िया संपादकीय। हाल में हुए चुनाव और गांधी परिवार को सोच का अच्छा विश्लेषण। हार्दिक शुभकामनाएं
हार्दिक आभार प्रगति।
पुरवाई का के संपादकीय ,अब ऐसा लगता है कि भारतीय अखबारों के पर्याय से कहीं ऊपर उठकर ,भारतीय लोकतंत्र,के अब चौथे खंबे को परिभाषित करने से लगते हैं।
यह संपादकीय भी कई समीचीन मुद्दों और कभी केंद्र में सात दशक तक रही कांग्रेस के वास्तविक रूप को बड़ी ही सादगी और सच्चाई के आलोक में प्रस्तुत करता है।
कांग्रेस के युवराज अश्वत्थामा और राजमाता गांधारी की कारगुज़ारियों का भी सुस्पष्ट मंज़र भी इंदिरा गांधी पुरस्कार की बानगी से इस संपादकीय में तथ्यात्मक रूप से बतलाई गई है।
भाई सूर्य कांत जी मन प्रसन्न कर देने वाली टिप्पणी के लिए धन्यवाद बहुत छोटा शब्द है।
तेजेंद्र शर्मा जी का यह संपादकीय बिहार चुनाव में कांग्रेस की *पराजय* का गहराई से विश्लेषण करता है। पराजय शब्द इसलिए कि हार -जीत तो खेल में होती है। यह खेल नहीं वरन् बार – बार की हार जो पराजय से भी गहन है, या युद्ध में पराजय।
पेपर आउट ऑफ सिलेबस सही उपमा दी है।
मैं तो मानती हूँ कि किसी अन्य परीक्षा की तैयारी कर दूसरी परीक्षा देना। जैसा कि आजकल कुछ परीक्षार्थी करते हैं, उन्हें याद ही नहीं रहता कि पेपर का पाठ्यक्रम क्या है, किस विषय का पेपर है।
कुछ भी मनगढ़ंत लिख आते हैं और ठीकरा परीक्षा पर फोड़ते हैं।
आपने सही लिखा कि तेजस्वी भी जमीनी हकीकत जान गए थे।
परिणाम के बाद पार्टी को विश्लेषण करना चाहिए, इस क्रम में आज का संपादकीय विश्लेषण पढ़ना चाहिए।
पद्मा आप हमेशा संपादकीय को गहराई से पढ़ कर गंभीर टिप्पणी करती हैं। मन से शुक्रिया।
बहुत ही शानदार लिखा है सर.. कहते हैं ना कि “विनाशकाले विपरीत बुद्धि” तो ये कांग्रेस परिवार के ऊपर बिल्कुल सटीक बैठता है..पक़र सबसे हास्यास्पद यह है कि यह परिवार क्यों नहीं समझ पाता कि इनको हराने में इनकी हरकते ही अधिक ज़िम्मेदार हैं..
और जो आपने इस संपादकीय का अंत किया है, उसने तो ख़ूब गुदगुदाया.. सटीक उदाहरण दिया मैम ने
आपकी ख़ूबसूरत टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद और स्नेहाशीष मनीष।
भारत और भारत के विभिन्न प्रकार के चुनाव
ये आरम्भ से ही विकसित देशों के लिए
चर्चा का विषय रहे हैं।
आज के हालात पर अच्छा हास्य, व्यंग मिश्रित है ।
Dr Prabha mishra
सूक्ष्म अवलोकन, बहुत ही महत्वपूर्ण संपादकीय लिखा है आपने।
स्नेहाशीष अपूर्वा।
राजनीति से दूर हूं, अधिक जानकारी नहीं रखती।
पर यहां एक ही बात कांग्रेस ख़ुद को हमेशा से ही महान समझता है।
दांत नहीं हैं चने खाने के लिए, पर वह मानेगा नहीं, उल्टा दांत है चने ही ख़राब है क़रार देगा।
हार्दिक धन्यवाद डॉ सपना।
हार्दिक धन्यवाद प्रभा जी।
सादर नमस्कार सर…
हमेशा की तरह एक विशेष शोध से लिखा गया संपादकीय है…एक एक शब्द विचार एवं विश्लेषण सबकुछ अर्थपूर्ण है….वैसे वे वही करेंगे जो जन्म से करते आ रहे हैं….जो उनकी आदत है….
साधुवाद
हार्दिक आभार आदरणीय अनिमा जी।
शानदार संपादकीय
पेपर हर बार आउट ऑफ सिलेबस आ रहा है बहुत सालों से। बढ़िया लगा सभी मुद्दों पर अच्छे से बात रखी आपने
ज़किया जी का कथन भी बहुत अच्छा लगा पुनः एक अच्छे संपादकीय के लिए आपको बधाई
निर्देश निधि जी आपके समर्थन के लिए हार्दिक धन्यवाद।
आदरणीय संपादक जी
इस अंक का संपादकीय तो मुझे एक हास्य रचना लगा!
आपने लिखा है’ इस समय राहुल गांधी के सितारे गर्दिश में हैं’ मैं तो सोचती हूं उनके सितारे कभी उगे ही नहीं थे, गर्दिश में तो तब जाते जब वह कभी जगमगाए होते है;
‘इंदिरा गांधी शांति सम्मान ‘ऐसे व्यक्ति को देना जो भारत की नीतियों के विरुद्ध हो, तो ‘खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे” जैसा काम है!
अब ‘अंधा बांटे रेवड़ियां फिर फिर अपने को देय’ वाली कहावत चरितार्थ करने के लिए आप स्वयं को पुरस्कृत कर ही सकते है।
मजेदार संपादकीय के लिए बधाइयां।
सरोजिनी जी, इस ज़बरदस्तम टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवादम!
संपादक महोदय की टिप्पणी विस्तृत है और दो टूक है.
अब सोनिया और राहुल भारतीय राजनीति के लिए आउट ऑफ सिलेब्स है.अब कांग्रेस पार्टी बुड्ढी और अप्रासंगिक हो गई है. यह आजादी प्राप्त करने के लिए एक संगठन था सच में आजादी के गांधी जी ने कहा था जिस उद्देश्य के लिए इस पार्टी को बनाया गया था अब उद्देश्य प्राप्त हो गया अत कांग्रेस पार्टी को समाप्त किया जाना चाहिए.आज का कांग्रेस पुनः प्रजातंत्र को राजतंत्र में ले जानेवाली पार्टी गई है.जिस तरह राजा का पुत्र ही राजा होता था ठीक उसी प्रकार लुटेरे का सरदार का बेटा पुनः सरदार बन बैठता है उन सभी पार्टियों का अगुवाई कांग्रेस कर रही है.रहा बात बिहार चुनाव उसमें राजग गठबंधन की बड़ी जीत यह दर्शाती है कि अब बिहार गरीबी और पलायन से मुक्ति चाहता है.अन्य राज्यों की तरह hm bhi viksit राज्य बने.इस बात को जनता समझ चुकी है..अब बिहार भी झटपट सौर उठकर वोट कर रहा है यह बिहार चुनाव में साबित हो चुका है.
रही बात घपले .,रंगदारी, घोटालेबाज लालू की पार्टी की अब वो गए जमाने की बात हो गई.यह भारत के लिए अच्छी बात है नहीं तो इंडी गठबंधन एक पार्टी नहीं गिरोह है जो तमाम नकारत्मक लोगो का जमावड़ा है. जो सांप्रदायिकता के नाम पर लोगो डरा कर अपना वोट बतौर रही थी.इस चुनाव में अब ध्वस्त हो गया.
भाई शिवशंकर जी, आपकी टिप्पणी में आपका आक्रोश महसूस किया जा सकता है।
हर विषय पर आपका गहन शोध अचंभित करता है। इस बार भी खुले पत्र में हस्ताक्षर करने वालों की सूची..!
जिसमें “16 रिटायर्ड जज, 14 पूर्व राजदूत सहित 123 पूर्व नौकरशाह, और 133 रिटायर्ड सेना अधिकारी शामिल हैं।”
यह इंडेप्ट विश्लेषण वाकई आपके श्रम को उजागर करता है।
This aspect of your editorial always awes me..!!!
हार्दिक आभार सरस! आपकी सकारात्मक टिप्पणी हर बार हौसला बढ़ाती है।
महत्वपूर्ण विश्लेषण।
आत्मीय बधाई और अभिनंदन
हार्दिक धन्यवाद पिलकेन्द्र भाई।
बहुत दुखद तो यह है कि एक हट्टी कट्टी पार्टी का यूँ ढहते जाना।हम सब जानते हैं कि विपक्ष का मज़बूत होना किसी भी लोकतंत्र के लिये कितना आवश्यक है।राहुलजी ने यात्राओं के माध्यम से ,खेतिहरों के साथ खेतों मे उतरने से लेकर उनके साथ भोजन करने करने तक ने उनको खुद को ज़रूर कोई
भावनात्मक मजबूती दी होगी पर जनता से ‘कनेक्ट’नहीं बना।
मंचीय एवं साक्षात्कार परिपक्वता में अभी भी काम होना है।
यह सच है कि कांग्रेस की स्थापना जिस उद्देश्य से की गई वह
अब बचा नहीं ।इंदिराजी तक का नेतृत्व वह था जिसने संग्राम में स्वयं भाग लिया और वह देश के विकास की कटिबद्धता लिये था।सफल नेतृत्व सिर्फ़ पारिवारिक थाती नहीं,जनता
आर्थिक,सामाजिक सुरक्षा चाहती है।वर्तमान नेतृत्व की कमी सुधार के लिए एक संतुलित सोच के विपक्ष की आवश्यकता है,जनता आपके व्यक्तिगत विकास फार्मूले से नहीं चलती हैं वह भावुकता
की लाठी से हाँकी जाना पसंद करती है।जनता इतनी भी बेवकूफ नहीं कि 100 नौकरियों की गुंजाइश वाली जगह 5000 नौकरियों की घोषणा से रपट जाए।
सच्चाई,अच्छाई, आधुनिक सोच अपनी जगह हैं,पर ये राजनीति की भाषा नहीं।राजनीति माँग से नियंत्रित है।
नीहार जी आपने तटस्थ भाव से स्थिति का विश्लेषण किया है। इस सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार।
आ. संपादक श्री
सदा से यही होता आया है,राजनीति में नीति कहाँ दिखाई देती है? । बहुत महत्वपूर्ण विश्लेषण ,नयापन लिए
आ. ज़ाकिया जी का तंज बहुत सही ,खूब !
आपको साधुवाद
सस्नेह
आ. संपादक श्री
सदा से यही होता आया है,राजनीति में नीति कहाँ दिखाई देती है? । बहुत महत्वपूर्ण विश्लेषण ,नयापन लिए
आ. ज़ाकिया जी का तंज बहुत सही ,खूब !
आपको साधुवाद
सस्नेह