Wednesday, February 11, 2026
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संपादकीय – फ़ैट ही फ़िट है जी…!

महानगरों में रहने वाले लोग प्रायः वसा और चीनी वाली चीजों के अधिक सेवन, प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों, गतिहीन होती जीवनशैली और बदलते सामाजिक-आर्थिक मानकों के कारण मोटापे और  बीमारियों से जूझते  हैं | हमें न तो ‘साइज़ ज़ीरो’ होना है और न ही शरीर को लोटा बनने देना है। बस इस शोध में जो कहा गया है- उसे मान लें और शरीर के वज़न को थोड़ा सा बढ़ा भी रहने दें तो कोई हर्ज नहीं, बस सक्रियता बनी रहनी चाहिए। सक्रिय जीवन के बारे में कहा जाता है न – “जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह-ओ-शाम!”

मुझ से जब कभी कोई पूछता है, “तेजेन्द्र जी, कैसे हैं?” तो मेरा एक स्टैंडर्ड जवाब होता है – “फ़िट एण्ड फ़ैट”। शायद मन में थोड़ा-सा लालच भी होता है कि सामने वाला कह दे, “अरे आप कहाँ फ़ैट हैं?… आप तो बिल्कुल फ़िट दिखते हैं।”
आजकल फ़ैशन शो का ज़माना है। तमाम प्रतिभागी ‘ज़ीरो फ़िगर’ पाने की होड़ में लगी दिखाई देती हैं। किसी-किसी को देखकर तो ऐसा लगता है मानो शरीर नहीं, बस हड्डियों का ढाँचा भर रह गया हो। करण जौहर और कपिल शर्मा जैसे लोग भी पतले दिखने के लिए ओज़ेंपिक जैसी दवाइयों का सेवन करते नज़र आते हैं। ऐसा लगता है कि करण जौहर ने तो शायद कुछ ज़्यादा ही डोज़ ले ली हो, उनके चेहरे का सारा ओज जैसे हड्डियों में सिमट गया हो।
कुछ दिन पहले व्हाट्सऐप पर एक फ़ोटो वायरल हो रही थी, जिसमें एक दीवार-घड़ी दिखाई दे रही थी। उसमें सेकंड की सुई सबसे पतली, मिनट की उससे मोटी और घंटे की सुई सबसे मोटी थी। उसके साथ एक दिलचस्प कैप्शन लिखा था -“जो सबसे ज़्यादा चलता है, वही सबसे पतला होता है!” बस, तभी से मन में यह विचार बैठ गया कि क्यों न थोड़ा शोध किया जाए- क्या पतला होना ही स्वस्थ होने की निशानी है?
धर्मेन्द्र के आगमन से पहले सिनेमा के हीरो का बदन कसरती नहीं हुआ करता था। दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनन्द जब रुपहले पर्दे पर आए, तो उनका शरीर आम आदमी की तरह स्वाभाविक और छरहरा हुआ करता था। देव आनन्द ने डाइट-कंट्रोल के सहारे अपने को लंबे समय तक जवान बनाए रखा, लेकिन कुल मिलाकर उस दौर के हीरो सामान्य इंसान जैसे ही लगते थे। धीरे-धीरे दौर बदला। संजय दत्त, सलमान ख़ान और हृतिक रोशन जैसे कलाकारों ने ‘सिक्स-पैक’ बॉडी का फ़ैशन शुरू किया, और नई हीरोइनों ने ‘ज़ीरो फ़िगर’ के जलवे बिखेरे।
आज पूरा बाज़ार पेट और वज़न कम करने के फ़ार्मूलों तथा दवाओं से भरा पड़ा है। आयुर्वेद, होम्योपैथी और एलोपैथी आदि तीनों पद्धतियों में इस बात की होड़ मची हुई है कि मोटापा कम करने की रामबाण दवा उनके पास ही है। पर सच तो यह है कि यदि कोई व्यक्ति अपना वज़न नियंत्रित रखना चाहता है, तो केवल भोजन की आदतों को व्यवस्थित करके ही सफलतापूर्वक ‘वेट मैनेजमेंट किया जा सकता है। इसके लिए दवाओं का सहारा लेना शरीर पर दुष्प्रभाव छोड़ सकता है।
मेरा तो नारा है- पेट कम करोवेट से मत डरो!” यदि आपका पेट अभी तोंद में परिवर्तित नहीं हुआ  है, तो घबराने की कोई ज़रूरत नहीं। यदि आपका शरीर हमेशा थकान से चूर नहीं रहता और आप अपना दैनिक कामकाज सहजता से कर लेते हैं, तो वज़न को लेकर परेशान होने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है।
हाल ही में डेनमार्क में इस विषय पर एक शोध किया गया है, जिसके नतीजों ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। शोध में पाया गया कि जो लोग वज़न कम करने के लिए ओबेज़िटा-60, मौनजारो, ज़ेपबाउंड और वेगावो जैसी दवाओं का सेवन कर रहे हैं, उन्हें बाद में पछताना पड़ सकता है | क्योंकि वे अनजाने में अपने ही स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।
डेनमार्क के वैज्ञानिकों ने बी.एम.आई. यानि कि बॉडी मास इंडेक्स (BMI – Body Mass Index) को अपनी रिसर्च के केन्द्र में रखा। वैज्ञानिकों ने इस सोच को चुनौती दी है कि दुबले पतले व्यक्ति स्वस्थ होते हैं। इस शोध में पाया गया कि अधिक वज़न वाले लोगों (ओवर-वेट) के मुकाबले अधिक दुबले पतले लोगों को मृत्यु का डर अधिक रहता है। 
डेनमार्क की इस रिसर्च में 85,000 से अधिक लोगों पर परीक्षण किया गया। अध्ययन में पाया गया कि जिन व्यक्तियों का बी.एम.आई. 18.5 से कम था, उनकी मृत्यु की संभावना सामान्य व्यक्तियों की तुलना में तीन गुना अधिक थी। शोध के अनुसार, 22.5 से 24.9 के बीच का बी.एम.आई. सबसे सुरक्षित और सेहतमंद रेंज माना गया। ध्यान देने योग्य बात यह रही कि जिन लोगों का बी.एम.आई. 25 से 35 के बीच था-उनमें भी मृत्यु का ख़तरा विशेष रूप से अधिक नहीं पाया गया। यानि कि थोड़ा अधिक वज़न होना स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक नहीं है।
इस शोध में यह पाया गया कि जिन लोगों का BMI सबसे कम और सबसे ज्यादा पाया गया था, दोनों ही समूहों में मौत का खतरा सबसे अधिक पाया गया था। बहुत कम वज़न वाले (Underweight) लोग, जिनका बीएमआई 18.5 से कम था (BMI <18.5), उनमें मृत्यु का ख़तरा तीन गुना अधिक पाया गया। कम सेहतमंद दायरा (Low healthy range), जिसमें बीएमआई 18.5 से 19.9 के बीच रहता है, उनमें मृत्यु का ख़तरा लगभग दो गुना अधिक रही । वहीं जिनका बीएमआई 20 – 22.4 के बीच रहता है, उनमें भी मृत्यु का ख़तरा 27 प्रतिशत पाया गया। सुरक्षित और सेहतमंद बीएमआई तो हम ऊपर बता ही चुके हैं। मगर जिनका बी.एम.आई. 25 से 35 होने पर, जिन्हें हम सामान्यतः ओवर-वेट (Overweight/Obese) कहते हैं; उनमें भी ख़तरे जैसी कोई बात नहीं है। समस्या शुरू होती है- जब बी.एम.आई. 40 से ऊपर जाने लगता है (BMI 40+ Severe obesity) तो मृत्यु का ख़तरा दो गुना अधिक हो जाता है। 
यदि कोई व्यक्ति बहुत अधिक पतला रहने के प्रयास में खाना कम कर देता है या बिल्कुल छोड़ देता है, तो शरीर केटाबॉलिक अवस्था (Catabolic State) में प्रवेश कर जाता है। इस अवस्था में शरीर, मस्तिष्क के सुचारू रूप से कार्य करने के लिए आवश्यक ऊर्जा प्राप्त करने हेतु अपने ही ऊतकों (tissues) को तोड़ने लगता है। इस प्रक्रिया में शरीर अपनी लगभग सारी ऊर्जा मस्तिष्क को प्राथमिकता देने में लगा देता है, जिसके परिणामस्वरूप अन्य अंगों के कार्य प्रभावित होने लगते हैं।
विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो बहुत अधिक पतला होना स्वस्थ रहने का संकेत नहीं है। इसके विपरीत, थोड़ा बहुतओवरवेटहोना शरीर के लिए अधिक लाभकारी माना गया है। इसका कारण यह है कि शरीर में थोड़ा अतिरिक्त वसा (fat) होने का अर्थ है कि उसमें रोगों और प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ने की बेहतर क्षमता मौजूद है।
इस रिसर्च को समझने के लिए एक कैंसर मरीज का उदाहरण लिया जा सकता है। मान लीजिए कि कोई व्यक्ति कैंसर का इलाज करवा रहा है और उसकी ‘कीमोथेरैपी’ चल रही है। ऐसे उपचार के दौरान प्रायः वज़न घटने लगता है और भूख में कमी आ जाती है। ऐसी स्थिति में जिन लोगों के शरीर में पहले से ‘फैट रिज़र्वमौजूद होता है, उनका शरीर अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से कार्य करता रहता है। इसके विपरीत, बहुत पतले व्यक्तियों में चर्बी की कमी होने के कारण शरीर की स्वयं को पुनर्स्थापित (Self-repair) करने की क्षमता घटने लगती  है, जिससे उनकी जीवन-रक्षा की संभावना कम हो जाती है।
डेनमार्क स्थित आरहूस यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में प्रोफेसर डॉ. सिग्रिड बर्ज ग्रिबशोल्ट ने बताया कि इस प्रकार के डेटा को देखते समय कई बातों को ध्यान में रखना चाहिए। कुछ लोगों का वज़न किसी अंतर्निहित बीमारी के कारण भी कम हो सकता है।
हमने पाया कि दुबले-पतले लोगों को भी घातक हार्ट अटैक होने का खतरा हो सकता है, क्योंकि उनके शरीर में छिपी हुई वसा हृदय की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को तेज़ कर देती है। यह ख़तरनाक फ़ैट जिसे ‘विसरल फ़ैट’ कहा जाता है, शरीर के अंदर गहराई तक जमा हो जाती है। इसके लिवर, पेट और आंतों के चारों ओर जमा होने का ख़तरा अधिक रहता है।
बढ़ते वज़न को डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, हार्ट अटैक, स्ट्रोक और यहाँ तक कि कुछ कैंसर के ख़तरे को भी बढ़ाने वाला माना जाता रहा है। अधिक वज़न और उसके कारण होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं पर तो अक्सर चर्चा होती रहती है। मगर शायद पहली बार एक ऐसा शोध हुआ है, जिसने अत्यधिक पतलेपन को अभिशाप और किसी हद तक मोटापे को वरदान माना है। 
महानगरों में रहने वाले लोग प्रायः वसा और चीनी वाली चीजों के अधिक सेवन, प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों, गतिहीन होती जीवनशैली और बदलते सामाजिक-आर्थिक मानकों के कारण मोटापे और  बीमारियों से जूझते  हैं | हमें न तो ‘साइज़ ज़ीरो’ होना है और न ही शरीर को लोटा बनने देना है। बस इस शोध में जो कहा गया है- उसे मान लें और शरीर के वज़न को थोड़ा सा बढ़ा भी रहने दें तो कोई हर्ज नहीं, बस सक्रियता बनी रहनी चाहिए। सक्रिय जीवन के बारे में कहा जाता है न – “जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह-ओ-शाम!”
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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44 टिप्पणी

  1. अब हम सोच रहे हैं अपने को कहां खड़ा पाएं।तर्क अच्छे हैं।चिंतामुक्त करने वाले।

  2. बहुत बढ़िया, ये उन लोगों के लिए वाकई बहुत उपयोगी है जो थोड़े से फैट से परेशान हो जाते हैं या पतले होने के लिए मेडिसिन लेते ।

  3. बहुत सुंदर, समसामयिक विषय पर संपादकीय l
    भाषा शैली बहुत प्रभावपूर्ण l अन्य विषयों की तरह ये भी सोचने पर मजबूर कराती हैं l
    धन्यवाद

  4. वैसे तो प्रॉब्लम नहीं है बस ज़किया जी की छरहरी देह यष्टि को देख ख़ुद पर रहम आता है ! unhe mera bahut bahut pyar kahna♥️

  5. संपादकीय महोदय का आज का पोस्ट फैट ही फिट है प्रासंगिक है। मैं कई ऐसे लोगों।को जनता हूँ जो फैट कम करने के चक्कर अपना सेहत ही गवां बैठे।उनका।चलना फिरना दूभर हो गया और अनेकों बीमारियों से गस्त हो कर हड्डियों का ढांचा बन गए। भारत गांवों का देश है आज भी दिल्ली या मुंबई भले ही मेट्रो सीटी में आ।गए लेकिन मुझे तो एक बड़ा सा गांव लगता है। जिसमें एक अच्छी बात है कि
    आदमी को सेहत मंद होना चाहिए, सेहत से आदमी खाते।पीते घर का।लगता है एवं बलिष्ठ भी होता है जो आनेवाले। कई कोविड उसका कुछ भी नहीं बिगड़ सकते। कोविंद देखा गया कि बेचारे भेजेटेरियन की मौत सबसे ज्यादा रही।
    आजकल।डाक्टर व्यक्ति की ऊंचाई के अनुसार।अपना वजन।रखने को कहते है जो हमें लगता है सरासर गलत है,एक बार किसके बीमार पड़ें तो गए काम से।आदमी को मजबूत और सेहतमंद दारा सिंह की तरह होना चाहिए।
    रही बात महिलाओं की आज 30/40 पहले फिल्मों में सेहतमंद का पैमाना लाजवाब था।आजकल तो नायिका तो लगता है अन्न दाना से भेट ही नहीं है। सुंदर लगना तो दूर वो जीरो साइज के चक्कर में वो सेहत से विलीन हो जाती है।
    अत अब पुनः आ गया।फैट ही फिट है

  6. फैट ही फिट है जी…संपादकीय ने बहुत से लोगों को राहत दी होगी। सच आज लोग अपने शरीर को लेकर बहुत सचेत रहते हैं। न जाने पतले होने के लिए अपनी डाइट में कितनी कटौती करते हैं। कुछ दवाओं के साथ keto diet, Intermittent fasting अपना कर शरीर को आकर्षक बनाने का प्रयास करते हैं किन्तु ऐसा करके वे अपने शरीर के साथ खिलवाड़ ही करते हैं। सब खाना चाहिए किन्तु लिमिट में। मोटापा ज्यादा खाने से नहीं होता, कभी -कभी वंशानुगत कारण भी हो सकते हैं। आपने डेनमार्क की रिसर्च का उद्धरण देते हुए जो कहा है, मेरा भी यही मानना है कि हमें न तो ‘साइज़ ज़ीरो’ होना है और न ही शरीर को लोटा बनने देना है। जीवन सक्रिय होना चाहिए।
    सार्थक संपादकीय के लिए साधुवाद।

    • सुधा जी आपने सही कहा है कि आजकल इन्सान आकर्षक बनने के चक्कर में अपने शरीर के साथ खिलवाड़ करने लगता है।

  7. इस बार का संपादकीय -‘ फैट ही फैट है जी…!’ मानव जीवन के स्वास्थ्य पर आधारित है। संपादक महोदय जी ने गहन शोध के बाद इसे लिखा है।
    इस संपादकीय की खासियत यह है कि पाठक इसे पढ़ते-पढ़ते अपने स्वास्थ्य की मापजोख करने लगता है। मन ही मन सोचता है कि वह बी. एम. आई. के किस खांचे में फिट बैठ रहा है। मतलब वह फिट है या नहीं, सारा ध्यान उसका इसी पर केंद्रित होकर रह जाता है।
    डेनमार्क के वैज्ञानिकों के स्वास्थ्य संबंधी मीटर में वह अपने आपको बार-बार नापता-जोखता है। कहीं वह फिट बैठ जाता है और कहीं अपने को अनफिट महसूस करता है।
    इस संपादकीय को पढ़कर मुझे भी लगा कि हम जैसे दुबले-पतले स्वास्थ्य को लेकर कितना भरम पाले बैठे थे। संपादकीय पढ़कर जाना कि वह भरम सौ प्रतिशत सटीक नहीं था। मोटे लोग (मित्र)जब मेरे साथ तेज धूप में पैदल चलते थे और गर्मी में जब उनकी वसा पिघलती थी तो वे बुरी तरह से बिलबिला जाते थे। उन्हें देखकर लगता था कि ये भी क्या जिंदगी है। लेकिन इस शोध ने तो पूरा नजरिया ही बदल दिया है।
    सर आपने एक नारा दिया है -” पेट कम करो… वेट से मत डरो।” यह कथन मुझे सत्य प्रतीत हो रहा है । मूल जड़ पेट ही है। इसको कंट्रोल कर लिया तो शरीर फिट ही रहता है।
    मोटे लोग दुबले होने के चक्कर में ओबेजिटा -60 जैसी दवाइयों का सेवन करते हैं। ये दवाइयां उनके लिए घातक सिद्ध होती हैं। यह शोध से पता चल रहा है। इनका सेवन स्वास्थ्य के लिए खिलवाड़ जैसा है। लोगों को इसके सेवन से बचना चाहिए। फिल्म निर्माता करण जौहर का उदाहरण देकर आपने डेनमार्क के वैज्ञानिकों के शोध को सही सिद्ध कर दिया है।
    यह तो सोलह आने सच है कि स्वस्थ व्यक्ति के लिए यह संसार लुभावना है, हर चीज में उसे आकर्षण महसूस होगा। बीमार के लिए सारा संसार निरर्थक लगने लगता है।
    अंत में आपकी ही कही बात का अनुसरण करते हुए कि जीवन चलने का नाम है, चलते रहो सुबह ओ शाम। जो चलता है वही जीवन का आनंद उठा पाता है। जो बैठ जाता है वह दुख उठाता है। गाड़ी भी महीने भर के लिए खड़ी कर दी जाती है तो बिना मिस्त्री को दिखाए उसे चलाना संभव नहीं है। गाड़ी हो या जीवन दोनों की लगभग एक सी कहानी है।
    इस जीवनोपयोगी संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर

    • प्रिय भाई लखनलाल पाल जी, बहुत से पाठक मुझे बताते हैं कि हम आपके संपादकीय की हर सप्ताह बहुत व्यग्रता से प्रतीक्षा करते हैं। इसी तरह पुरवाई पत्रिका आपकी प्रतिक्रियात्मक टिप्पणी की प्रतीक्षा करती है। आपने तो संपादकीय का मूल रेखांकित कर दिया है – “मूल जड़ पेट ही है। इसको कंट्रोल कर लिया तो शरीर फिट ही रहता है।” हार्दिक धन्यवाद।

  8. आदरणीय आज के समय में बहुत ही उपयोगी संपादकीय लेख है। अधिकतर लोग भ्रांतियों में जीते हैं कि मोटापा बहुत ही गंभीर बीमारी है खासकर तथाकथित यू ट्यूबरों के चक्कर में और यू ट्यूब पर सलाह देने वाले तथाकथित एक्सपर्ट के चक्कर में।
    आपको इस संपादकीय के लिये बहुत बहुत धन्यवाद।

  9. सादर नमस्कार सर…… महत्वपूर्ण एवं शोधपूर्ण जानकारियों सहित आपका संपादकीय सबके लिए पठनीय एवं ग्रहणीय है… मोटापा कोई रोग नहीं पर हर रोग का कारण मोटापा ही है…. 2 साल पहले मोटापा से मैं भी जूझ रही थी.. और दो mild strokes की शिकार भी हूँ चुकी हूँ…. पर डॉक्टर की सलहा से वजन कम करते ही और खाने पीने का ध्यान रखते ही कई बीमातियों से मुक्ति मिली…जो आपने BMI के बारे में जानकारी दी है.. वह बिल्कुल सही है…

    साधुवाद

    • अनिमा जी, आपने अपनी निजी सेहत का हवाला देते हुए मोटापे को हर रोग का कारण बताया है। आपका हार्दिक धन्यवाद।

  10. ज्वलंत समस्या पर उपयोगी सम्पादकीय। महत्वपूर्ण तथ्यों के आधार पर आपने समाधान भी सुझाया है। मोटापा बहुत सारी बीमारियों की जड़ है। विभिन्न विषयों पर आपकी जानकारी अद्भुत है। साधुवाद

  11. सबके मतलब का कुछ न कुछ मिल जायेगा इस संपादकीय में। मेरी सोच के मुताबिक संपादकीय। ठीक ठाक वजन के साथ सक्रिय जीवन शैली हर रोग को थोड़ा पीछे धकेल देती है।
    हालांकि भोजन से अधिक आज की तनाव युक्त जीवन शैली तन मन के स्वास्थ्य को अधिक प्रभावित कर रही है। फिर भी सक्रिय दिनचर्या और अपने मन पसंद कार्यों में व्यस्त रहना काफी कुछ स्वस्थ रखता है। उसके बाद थोड़ा-बहुत वेट हो पर पेट न हो बस….

    • आपसे पूरी तरह सहमत सुधा जी, “ठीक ठाक वजन के साथ सक्रिय जीवन शैली हर रोग को थोड़ा पीछे धकेल देती है।” हार्दिक धन्यवाद।

  12. महत्वपूर्ण और जरूरी, जानकारी से युक्त संपादकीय।
    सेहत है तो सब है।
    शोध के माध्यम से बताने की कोशिश, पतलापन भी बीमारी है। अत्यधिक पतला होना, जीरो साइज के लिए दीवानगी अच्छी नहीं.

  13. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    इस बार का संपादकीय पढ़ने पर हँसाता जरुर है, पर थोड़ा बहुत चिंतित भी करता है।

    जो लोग अपनी हेल्थ को लेकर कुछ ज्यादा ही कॉन्शियस है उनके लिए संपादकीय बहुत महत्वपूर्ण है।

    जो लोग अपने काम स्वयं करते हैं,और भरपेट खाकर चैन की नींद सोते हैं ।उन्हें कोई चिंता नहीं।

    कोई राज रोग हो तो वह बात अलग है। फिर यह युक्ति काम नहीं आती।

    पहले के लोग इतना सब नहीं सोचते थे ।जी तोड़ मेहनत करना, मन भर के खाना, चैन की नींद सोना और स्वस्थ रहना।

    शरीर स्वस्थ रखने के लिए शारीरिक मेहनत जरुरी है। आजकल फैशन हो गया कि घर में काम नहीं करेंगे और बॉडी फिट रखने के लिए दूसरे विकल्प ढूंढेंगे।

    जिस तरह युवा वर्ग हार्ट अटैक/हार्ट फेल के चपेट में है मेडिकल फिटनेस के अतिरिक्त यह खानपान पर भी निर्भर है।

    शरीर भी एक मशीन ही तो है। बिना किसी प्रयास के भी शरीर फिट रह सकता है।शारीरिक श्रम जरूरी है।और हर वक्त खुश रहना। बिंदास मन भर के खाओ, तन तोड़कर न भी करो, थोड़ा तो करो और सुकून की गहरी नींद सो।
    पड़ी रहने पर तो मशीन में भी जंग लग जाती है,जाम हो जाती है।
    स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने वाली संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।

    • नीलिमा जी आपका कहना है कि, “शरीर भी एक मशीन ही तो है। बिना किसी प्रयास के भी शरीर फिट रह सकता है। शारीरिक श्रम जरूरी है।और हर वक्त खुश रहना।” आपने संपादकीय को सही पकड़ा है।

  14. आदरणीय संपादक
    ”पुरवाई”

    नमस्कार जी
    प्रत्येक संपादकीय में आप ऐसे पहलू को उठाते हैं, जो कहीं न कहीं मानव जीवन से अवश्य जुड़ा होता है । ‘फिट’ और ‘फेट’ ये दोनों ऐसी चीजें हैं, जिसके पीछे हर व्यक्ति दौड़ रहा है । विशेषत; भारत में ।

    पतला होने के लिए दवाइयाँ खाना उचित नहीं है । इस तरह से पतला होने का तमाशा दो-चार दिन का होता है । लंबे समय में इसके परिणाम बहुत घातक होते हैं ।

    यहाँ एक दु;खद घटना का विवरण मैं अवश्य करना चाहूंगी, मेरे एक परिचित हैं, वे अच्छे-खासे मोटे-ताजे हैं, पतला होने के लिए डॉक्टर के पास गए, डॉक्टर ने उन्हें पता नहीं क्या सलाह दी, कहा एक पेट का छोटा-सा ऑपरेशन होगा और धीरे-धीरे आप पतले हो जाएंगे । डॉक्टर ने आंत को काटकर छोटा कर दिया, जिससे खाना कम खाया जाए, और व्यक्ति पतला होता जाए । ऑपरेशन तो हो गया, वे पतले भी हो गए, परंतु साइड इफेक्ट इतने ज्यादा हुए कि वे पूरे वर्ष भर बिस्तर में पड़े रहे, अनेकों बीमारियों ने घेर लिया और पिछ्ले हफ्ते खबर आई कि कल्पेश भाई (बदला हुआ नाम) नहीं रहे । मात्र 42 वर्ष की उम्र में । मैं आप सबको डरा नहीं रही हूँ, पर हाल में ही ऐसा हुआ है । विषय संगत घटना थी, इसलिए लिख दिया ।

    आज के संपादकीय में सबसे खुशी की बात ये कही गई है कि मोटापे के भी बहुत सारे फायदे होते हैं । शक्तिशाली होने से बीमारियाँ कम होती हैं, कारण, बीमारियों से लड़ने की क्षमता अधिक होती है । मोटापा कम करने के लिए पतला मतलब कमजोर नहीं होना है बल्कि स्वस्थ्य होना है । दवाइयों का प्रयोग न करके, योगा, कसरत आदि पर ध्यान देना आवश्यक है । फिर हर समस्या का समाधान रामदेव बाबा तो हैं ही । चलना सबसे अच्छा कसरत है । घड़ी हा उदाहरण बहुत ही सटीक है । पैदल चलें, खुश रहें ।
    उषा
    ***

    • आदरणीय उषा जी आपने अपनी टिप्पणी में अपने एक मित्र के साथ घटी दुर्घटना का ज़िक्र किया है। इस घटना के माध्यम से आपने संपादकीय का औचित्य सिद्ध कर दिया है। हार्दिक धन्यवाद।

  15. आपके इस आलेख ने कई भ्रांतियाँ दूर कीं। मसलन दुबला व्यक्ति अधिक फुर्तीला और स्वस्थ होता है, जबकि मोटापा, कई बीमारियों को दावत देता है। अगर आपका मेटाबॉलिज्म अच्छा है, तो आपके दुबले या मोटे होने से फर्क नहीं पड़ता। आपको फिट रहने पर जोर देना है, वहीं स्वस्थ जीवन की कुंजी है।
    बढ़िया ज्ञानवर्धक संपादकीय के लिए बधाई स्वीकारिए आदरणीय …!

    • सरस जी, आप की टिप्पणी से हमारे बहुत से पाठकों की भ्रांतियां भी दूर हो जाएंगी। बहुत शुक्रिया।

  16. फैट ही फैट है,,,आज के समय और जहां में यही तो catchy cat है?!
    ये संपादकीय पुरानी बुजुर्गों की हिदायत को भी काफी हद तक याद दिलाता है और उसकी अहमियत भी बताता है।
    अक्सर बुजुर्ग कहा करते थे कि समभाव में रहो
    खाओ पियो छको मत
    दौड़ो भागो थको मत
    देखो भालो तको मत ।
    और यूं भी हमारी भारतीय संस्कृति में मध्य मार्ग यानी संतुलित रास्ता अपनाने की जो पहले एक मंशा रहती थी और इसका व्यावहारिक रूप दिखाई पड़ता था।
    यही कारण था कि हमारी भारतीय संस्कृति में कभी मोटापे डायबिटीज और ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों की आमद दर्ज ही नहीं हुई थी।

    लेकिन लोकल से ग्लोबल क्या हुए खाना-पीना सोच सब कुछ बदल दिया और नतीजा वही रहा देसी गधा पूरबी चाल।
    और हम पाश्चात्य सभ्यता के अनुकरण करते-करते हमने यदि ध्यान नहीं दिया, तो बेहद मोटे डायबिटीज और हार्ट पेशेंट और ब्लड प्रेशर से ग्रस्त हो गए और अगर बहुत ज्यादा कॉन्शियस हुए तो जीरो फिगर पर आगे नतीजा यह हुआ कि दोनों तरफ बीमारी का घर!?!

    यही बात यह संपादकीय बड़े ही रोचक सार्थक सरस और सहज सरल अंदाज में बयां करता है।

    • भाई सूर्यकांत जी आपने अपने मस्त अंदाज़ में अपनी टिप्पणी लिखी है।
      खाओ पियो छको मत
      दौड़ो भागो थको मत
      देखो भालो तको मत ।
      सटीक बात कही है आपने।

  17. ‘ज़ीरो फ़िगर’ की होड़ में कमजोर और कई तरह की शारीरिक जटिलताओं को आमंत्रण देने से बहेतर है की हम स्वस्थ और फिट रहें। ‘ज़ीरो फ़िगर’ का कांसेप्ट बॉलीवुड नायक-नायिकाओं के दिमाग में बैठा है, दक्षिण भारतीय सिनेमा में नहीं है, बल्कि थोड़ा मोटा होना पसंद करते हैं। “फ़िट एण्ड फ़ैट, लाइफ इज बेस्ट” – यही हमारे लिए ठीक है। आपके शोधपरक संपादकीय आलेख से हम जैसों को हौसला मिलता है।

    • आपने संपादकीय को तह तक समझ लिया है भाई जयंत कर शर्मा जी। हमारा प्रयास यही रहता है कि नई नई जानकारियां आप तक ला सकें।

  18. नमस्कार तेजेन्द्र जी
    बहुत ही अच्छा व प्रभावित करने वाला संपादकीय है तेजेन्द्र जी, हमारे जैसे लोगों के लिए तो बड़ी तसल्ली सी देता हुआ।
    अभी तक तो यही अहसास हुआ है कि कोई भी चीज़ सीमित रूप से करने में ठीक सा ही रहता है।इस उम्र के मुहाने पहुँचकर न तो कसरत अधिक होती और न ही अधिक देर तक भूखा रहा जाता, एसीडिटी होने की संभावना बढ जाती है। हाँ, एक्टिव रहना ज़रूरी है।
    साधुवाद आपको

    • आदरणी प्रणव जी आपको संपादकीय ने प्रभावित किया यह हमारे लिये संतोषप्रद स्थिति है। बहुत बहुत शुक्रिया।

  19. इस बार के संपादकीय से एक बहुत बड़ी भ्रांति दूर हुई कि वज़न बढ़ना किसी बीमारी का सूचक है और यह भी कि अत्यधिक पतलापन भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। आपने उदाहरण सहित ऐसी अनेक स्थितियों का उल्लेख किया है, जिसमें थोड़ा बहुत ओवरवेट होना शरीर के लिए लाभप्रद ही साबित होता है। बीएमआई के बारे में भी अच्छी जानकारी मिली। समग्र रूप से देखा जाए तो यदि हम अपने वज़न से किसी प्रकार की परेशानी नहीं अनुभव करते तो फ़िक्र की कोई बात नहीं है, हां जीवन में सक्रियता बहुत जरूरी है। एक नारा प्राप्त हुआ “पेट कम करो वेट से मत डरो”।
    जानकारी युक्त संपादकीय हेतु बहुत आभार।,

    • विद्या जी हम सब ना जाने क्यों कंपलेक्स का शिकार हो जाते हैं। ना जाने कितनी बातें हैं जिनकी हमें जानकारी ही नहीं होती। याद रखें – पेट कम करें… वेट से ना डरें…

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