ट्रॉफ़ी को लेकर विवाद थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। मोहसिन नक़वी के एक करीबी सूत्र के अनुसार, फिलहाल एशिया कप ट्रॉफ़ी दुबई स्थित एसीसी कार्यालय में सुरक्षित है। नक़वी ने सख़्त निर्देश जारी किए हैं कि उनकी अनुमति और व्यक्तिगत उपस्थिति के बिना ट्रॉफ़ी किसी को भी न सौंपी जाए। सूत्र के मुताबिक़, नक़वी का आदेश है कि ट्रॉफ़ी केवल वे स्वयं ही भारतीय टीम या बीसीसीआई (भारतीय क्रिकेट बोर्ड) को सौंपेंगे- जब भी ऐसा “शुभ मुहूर्त” आएगा।
इस बार के एशिया कप क्रिकेट में खेल के मैदान पर सिर्फ़ क्रिकेट नहीं, बल्कि और भी बहुत कुछ खेला जा रहा था। हम सबको अंदाज़ा तो था कि इस बार कई फुलझड़ियाँ जलेंगी, मगर यह नहीं पता था कि बम भी फट सकता है। दरअसल, इतने मोर्चों पर एक साथ जंग छिड़ी हुई थी कि क्रिकेट बेचारी ठीक से साँस भी नहीं ले पा रही थी।
पहला मोर्चा तो भारत में विपक्षी दलों ने खोल रखा था। वे केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे थे, ये पूछते हुए कि ‘पहलगाम’ और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसी घटनाओं के बाद पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलने की आखिर क्या मजबूरी है। हैरानी की बात यह थी कि वे ही राजनीतिक दल, जो पहले पहलगाम को भाजपा सरकार का “नाटक” बता कर पाकिस्तान से बातचीत की वकालत कर रहे थे, अब ज़ोर-ज़ोर से सवाल उठा रहे थे कि भारत पाकिस्तान के साथ क्रिकेट क्यों खेल रहा है ?
विपक्ष का राजनीतिक दबाव अब भारतीय क्रिकेट टीम पर भी अपना असर दिखाने लगा था। टीम के कप्तान सूर्यकुमार यादव ने यह निर्णय लिया कि वे न तो टॉस के बाद पाकिस्तानी कप्तान से हाथ मिलाएँगे और न ही मैच समाप्त होने पर पाकिस्तानी खिलाड़ियों से। पहले तो विपक्षी दल भारत के पाकिस्तान के साथ खेलने पर ही सवाल उठा रहे थे, अब वे सूर्यकुमार यादव के इस निर्णय को “नाटक” कहकर उसकी खिल्ली उड़ाने लगे।
15 सितंबर 2025 को आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर भारत-पाकिस्तान मैच का खुलकर विरोध किया। उनका कहना था कि आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देश के साथ किसी भी तरह का खेल संबंध उचित नहीं है। इसी दौरान उन्होंने सूर्यकुमार यादव को सीधे शब्दों में चुनौती भी दी।
भारद्वाज ने कहा था, “अगर है तुम्हारी औकात-क्या नाम है इनका, सूर्यकुमार यादव… यदि तुम्हारी औकात है, तुम्हारी बीसीसीआई की औकात है, और तुम्हारी आईसीसी की औकात है, तो हम तुम्हें दूसरी चुनौती देते हैं कि जितना पैसा तुमने ब्रॉडकास्टिंग राइट्स, विज्ञापनों और क्रिकेट के कारोबार से कमाया है, सब शहीदों की विधवाओं को दे दो। तभी हम मानेंगे कि तुमने सच में समर्पण दिखाया है। हिम्मत नहीं है, औकात नहीं है इनकी, फर्ज़ी में बोलते हैं, ‘डेडिकेट कर दिया।’”
मामला यहीं थमा नहीं। एशिया कप के सुपर-4 मुकाबले के दौरान पाकिस्तानी तेज़ गेंदबाज़ हारिस रऊफ़ बाउंड्री लाइन पर फील्डिंग करते हुए भारतीय प्रशंसकों को “6–0 की जीत” की चेतावनी देते नज़र आए। इसी बीच उन्होंने अपने हाथों से गिरते हुए विमान का इशारा किया, मानो किसी विमान को मार गिराया जा रहा हो। रऊफ़ का यह इशारा कैमरों में कैद हो गया और देखते ही देखते उनके कई वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं, जिनमें वे आपत्तिजनक हरकतें करते हुए भी दिखाई दिए। ज़ाहिर है, हारिस रऊफ़ की इस शर्मनाक हरकत से माहौल और अधिक गरम हो गया।
लेकिन फ़ाइनल मुकाबले में भारतीय गेंदबाज़ जसप्रीत बुमराह ने मैदान पर ही रऊफ़ को उसी के अंदाज़ में जवाब दे डाला। इस पूरे टूर्नामेंट में ऐसा महसूस हो रहा था मानो भारत और पाकिस्तान की टीमें क्रिकेट कम, राजनीतिक दबाव ज़्यादा खेल रही हों।
अभिषेक शर्मा, कुलदीप यादव, रवींद्र जडेजा, तिलक वर्मा और शुभमन गिल जैसे खिलाड़ियों के शानदार प्रदर्शन के दम पर भारत ने पूरे टूर्नामेंट में अपराजित रहते हुए फ़ाइनल में पाकिस्तान को हराया। लेकिन जीत के साथ ही एक नई समस्या खड़ी हो गई – भारतीय टीम ने पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के मुखिया मोहसिन नक़वी से एशिया कप ट्रॉफ़ी लेने से इंकार कर दिया। नतीजतन दुबई के मैदान में लगभग एक घंटे तक अजीब सा तमाशा चलता रहा।
थोड़ी ही देर में जैसे पार्श्व में कोई गीत बज उठा- “शोर मच गया शोर, देखो आया ट्रॉफ़ी चोर!”
मोहसिन नक़वी ने यह कहकर ट्रॉफ़ी किसी और के हाथों भारतीय टीम को देने से भी इंकार कर दिया और अपने एक सहयोगी के ज़रिए ट्रॉफ़ी व मेडल यूएई क्रिकेट बोर्ड के दफ़्तर भिजवा दिए।
ग़ौरतलब है कि नक़वी पाकिस्तान के गृहमंत्री भी हैं। जब वे ट्रॉफ़ी लेकर मैदान से बाहर निकले, तो स्टेडियम में दर्शकों ने ज़ोरदार हूटिंग की और “भारत माता की जय” के नारे लगाने शुरू कर दिए। इसके बाद नक़वी ने एक और विचित्र शर्त रख दी- कि यदि भारत को ट्रॉफ़ी चाहिए, तो भारतीय कप्तान को ख़ुद एशिया कप टूर्नामेंट के दफ़्तर में आकर उनसे लेनी होगी। अपनी इन हरकतों से नक़वी ने न सिर्फ़ अपना, बल्कि पूरे पाकिस्तान का मज़ाक बना कर रख दिया।
बीसीसीआई और आईसीसी ने मोहसिन नक़वी के इस अव्यवसायिक और अनुचित व्यवहार पर नाराज़गी जताई है। वहीं, सोशल मीडिया पर चल रही ख़बरों में व्यंग्य के लहज़े में यह तक कहा जा रहा है कि भारत को एशिया कप ट्रॉफ़ी से वंचित करने के “साहसिक कारनामे” के एवज़ में पाकिस्तान सरकार नक़वी को गोल्ड मेडल देकर सम्मानित करेगी।
पाकिस्तानी मीडिया ‘आउटलेट द नेशन’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, सिंध और कराची बास्केटबॉल एसोसिएशन के अध्यक्ष एडवोकेट गुलाम अब्बास जमाल ने नक़वी को सम्मानित किए जाने की घोषणा की है। उनका कहना है कि नक़वी के इस कदम ने ऐसे समय में “राष्ट्रीय गौरव को पुनर्स्थापित” किया है, जब भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक व खेल संबंधी तनाव अपने चरम पर था।
मोहसिन नक़वी न केवल पाकिस्तान के गृहमंत्री हैं, बल्कि एशियन क्रिकेट काउंसिल (ACC) और पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB)-दोनों के मौजूदा अध्यक्ष भी हैं। वे शुरू से ही अपने भारत-विरोधी रुख के लिए जाने जाते हैं और कई मौकों पर भारत के ख़िलाफ़ तीखे बयान दे चुके हैं। नक़वी को पाकिस्तान का ऐसा नेता माना जाता है जो भारत-विरोधी बयानबाज़ी के ज़रिए सुर्खियों में बने रहते हैं। इससे पहले वे जनवरी 2023 से फरवरी 2024 तक पंजाब प्रांत के अंतरिम मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं।
मोहसिन नक़वी को पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के नेता आसिफ़ अली ज़रदारी और पाकिस्तान के आर्मी चीफ़ जनरल आसिम मुनीर- दोनों का क़रीबी माना जाता है। ज़रदारी और मुनीर पहले से ही अपने भारत-विरोधी एजेंडे के लिए प्रसिद्ध हैं। ऐसे में यह माना जा रहा है कि एशिया कप ट्रॉफ़ी को लेकर “ग़ायब” हुए नक़वी ने यह सब अपने इन आकाओं को खुश करने और राजनीतिक अंक बटोरने के उद्देश्य से किया।
पाकिस्तान के पूर्व तेज़ गेंदबाज़ शोएब अख़्तर ने मोहसिन नकवी और पाकिस्तान की पूरी टीम पर टिप्पणी करते हुए कहा, “हेडलेस और सेंसलेस जैसी है पूरी मैनेजमेंट… टीम कॉम्बिनेशन सही नहीं थे, कप्तानी सटीक नहीं रही और वो हमारी बातें सुनने के लिए तैयार ही नहीं थे। मुझे नहीं लगता कि एक कप्तान मिडिल आर्डर में अपनी जगह जस्टिफाई करता है, न ही बतौर स्पिनर | आपके पास ऑप्शन मौजूद हैं, अगर हारिस रउफ़ परफॉर्म नहीं कर पा रहा, लेकिन आपने तो उन्हें खिलाया भी नहीं। जब मैनेजमेंट खुद असुरक्षित महसूस करता है तो बड़े खिलाडियों को आगे नहीं बढ़ने देता, और फिर काम नहीं हो पाता।”
आम तौर पर भारत के विरुद्ध टिप्पणियाँ करने वाले पाकिस्तान के पूर्व कप्तान शाहिद अफरीदी ने मोहसिन नकवी को क्रिकेट और राजनीति में से किसी एक पर ध्यान देने की सलाह दी। उन्होंने टेलीकॉम एशिया स्पोर्ट से बात करते हुए कहा, “पीसीबी के अध्यक्ष का काम फ़ुलटाइम है। मोहसिन नकवी पाकिस्तान के गृहमंत्री भी हैं। इस वजह से पीसीबी को अलग ही रखा जाना चाहिए। पाकिस्तान क्रिकेट को चलाने के लिए समय चाहिए और वे सिर्फ सलाहकारों पर पूरी तरह से भरोसा नहीं कर सकते।”
उन्होंने आगे कहा, “ये सलाहकार उन्हें कहीं नहीं पहुँचा रहे, वे खुद भी मानते हैं कि उन्हें क्रिकेट के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। उन्हें चाहिए कि अच्छे और काबिल सलाहकारों को नियुक्त करें, जो खेल की समझ रखते हों। मेरी मोहसिन नकवी से गुजारिश है कि दोनों ही पद महत्वपूर्ण और बड़े काम वाले हैं, जिस पर समय और ध्यान दोनों दिए जाने की जरूरत है।”
ट्रॉफ़ी को लेकर विवाद थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। मोहसिन नक़वी के एक करीबी सूत्र के अनुसार, फिलहाल एशिया कप ट्रॉफ़ी दुबई स्थित एसीसी कार्यालय में सुरक्षित है। नक़वी ने सख़्त निर्देश जारी किए हैं कि उनकी अनुमति और व्यक्तिगत उपस्थिति के बिना ट्रॉफ़ी किसी को भी न सौंपी जाए। सूत्र के मुताबिक़, नक़वी का आदेश है कि ट्रॉफ़ी केवल वे स्वयं ही भारतीय टीम या बीसीसीआई (भारतीय क्रिकेट बोर्ड) को सौंपेंगे- जब भी ऐसा “शुभ मुहूर्त” आएगा।
स्वाभाविक है कि बीसीसीआई और आईसीसी, दोनों ही नक़वी के इस रवैये से ख़ुश नहीं हैं। वैसे भी पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड इतना प्रभावशाली नहीं कि बीसीसीआई या आईसीसी से सीधी टक्कर ले सके। मौजूदा स्थिति कुछ ऐसी लग रही है, मानो किसी ने बैंक में पैसे जमा करवा दिए हों, और अब बैंक उन्हीं पैसों को निकालने की अनुमति न दे रहा हो।
पाकिस्तान ने इस हरकत से अपने उस चरित्र को बे नकाब कर दिया जहां वो अपनी हार को जीत बनाकर पेश करता है, चोरी और सीना जोरी उसका चरित्र है, इससे वो किस तरह खुद को दुनिया में हंसी का पात्र बना रहा है ये शायद उसको अंदाजा ही नहीं है.
आलोक भाई… एशिया कप बहुत सी कड़वी यादें छोड़ गया है। जितनी जल्दी हो सके हमें वापिस क्रिकेट के खेल की ओर मुड़ना होगा।
सादर चरणस्पर्श
आज कि संपादकीय देखने या पढ़ने में सरल लग सकती है, न्यूज़ के माध्यम से भी हाल फिलहाल के घटनाक्रम संपादकीय के माध्यम से मस्तिष्क में पुनः आ जाएंगे।
मेरे पिता जी एवं सगे परिवार जनों ने ने BSF में 30/35 साल सेवारत रहें। भारत पाकिस्तान बार्डर कि कठिन चुनौती और पाकिस्तानी कायराना हरकतें कभी भी छुपी नहीं रही। मैं व्यक्तिगत तौर पर यह भारत पाकिस्तान के न केवल क्रिकेट एवं अन्य सभी गेमों के पक्ष में नहीं हूं, हमेशा विरोध रहा है।
संपादकीय में…….
पहलगाम’ और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसी घटनाओं के बाद पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलने की आखिर क्या मजबूरी है।……….
यह बात बिल्कुल तर्कपूर्ण है, आप एक ही समय में दोहरा नहीं खेल सकते, पर अफसोस देश की सरकार दोहरा खेलने से नहीं चूकती । विपक्ष तो कुछ भी कहें वह सेंसलेस है, आपको अपनी संपादकीय में विक्ट्री के पश्चात मोदी जी के एक्स पोस्ट का जिक्र करना चाहिए था, जो खुद आपरेशन सिंदूर और क्रिट पिच को एक समान समझते हैं। युद्ध और बुद्ध एक साथ कैसे संभव है ? मेरा व्यक्तिगत मानना है कि सरकार इतनी बेशर्म होकर यह तमाशा नहीं करना चाहिए। खेल लिया, पर ट्राफी नहीं लूंगा, मैच का पैसा बराबर लूंगा, ब्रांडिंग पूरी करूंगा। खेलूंगा तुम्हारे साथ, पर बात नहीं करूंगा, आखिर क्यों ? क्रिकेट की राजनीति से क्रिकेटर से लेकर सट्टा बाजार तक को करोड़ों का मुनाफा है, इस हम्मम में सब नंगे हैं। भारतीय क्रिकेट टीम को इस घटनाक्रम को अपनी देश भक्ति से जोड़ना नहीं चाहिए।
सरकार देशवासियों से दोनों तरफ खेल रही है। देश कि जनता भी आपरेशन सिंदूर में भी ताली बजाकर खुश हैं और क्रिकेट मैदान में भी मनोरंजन करके खुश हैं।
प्रिय शुभम, एक फ़ौजी परिवार के सदस्य होने के नाते आपने इस नाटक को बिल्कुल अलग ढंग से देखा है। हमारा यह सवाल भारत सरकार से हमेशा पूछा जाएगा कि – “पहलगाम’ और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसी घटनाओं के बाद पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलने की आखिर क्या मजबूरी है।…”
“पुरवाई ” का संपादकीय अपने आप में एक ऐसे दस्तावेज का महत्व रखता है जो एक साथ किसी घटना के वास्तविक विवरण से उपजे दृष्टिकोण उससे उत्पन्न होने वाले स्थानीय और वैश्विक प्रभाव का सटीक आकलन और भविष्य में किए जाने लायक़ उपायों का स्पष्ट संकेत एवं संदेश देता है। भारत – पाकिस्तान क्रिकेट और एशिया कप से उपजी नाना प्रकार की विद्रूपताओं का सटीक विश्लेषण करने के लिए संपादक श्री तेजेन्द्र शर्मा जी का अभिनंदन।
अशोक जी हमारा भरसक प्रयास रहता है कि आपकी कसौटी पर खरे उतर सकें। हार्दिक धन्यवाद।
इस बार का संपादकीय ,पाकिस्तान की पूरी पोल ही नहीं खोलता वरन पाकिस्तान के दिल ओ दिमाग की भी पड़ताल कर रहा हैं। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान बी टीम यानी भारतीय विपक्ष को भी उन्हीं के कथ्यों और कृत्यों का हू ब हू आईना उन्हें दिखा रहा है।
इस मुद्दे पर चर्चा तो हुई है पर रवायती सी।
पुरवाई पत्रिका समूह के संपादकीय को पढ़ने से पूरा मामला पाठक को समझ आता है।
गृह मंत्री और पीसीबी के अध्यक्ष एक ही व्यक्ति?!?! जैसे याद दिलाता है
एक ,,,,,ल्लू काफी है।पाकिस्तान की क्रिकेट अब राजनैतिक प्रदूषण में भारी और गहरी सांसें ले रही है और राजनीति अक्कड़ बक्कड़ भांबे भो अस्सी नभभे पूरे सौ के बचकाने अंदाज़ किसी लोकतंत्र के हिटलर की रखैल सी व्यवहार कर रही है।
बढ़िया संपादकीय।
भाई सूर्यकान्त जी इस विषय पर एक लंबा आलेख लिखना चाहिये था। संपादकीय की अपनी सीमाएं होती हैं।
इस बार का संपादकीय ‘एशिया कप टी20 2025’ पर केंद्रित है। इस कप के दौरान क्रिकेट से ज्यादा राजनीति का खेल खेला गया । यद्यपि इसके पहले क्रिकेट को इस स्तर तक नहीं माना गया था कि यह राजनीति के आसपास भी ठहरे। आपरेशन सिंदूर के समय पाकिस्तान ने सोशल मीडिया पर जितनी झूठी खबरें फैलाई थी इस कप के दौरान पूरी कसर निकाल ली गई। चूंकि यहां मैच लाइव चल रहा था तो झूठ का यहां पैसारा नहीं था। पाकिस्तानी प्रशंसक और जानकार सिर पीटने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे थे।
आपरेशन सिंदूर का क्रिकेट में प्रवेश करते ही राजनीति का पारा एकदम हाई हो गया। क्रिकेट भारत में ही नहीं पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में एक नशा के रूप में उभरा हुआ है। क्रिकेट मैदान में ही नहीं, मैदान के बाहर भी खूब खेला गया। कप्तान सूर्यकुमार यादव का पाक टीम से हाथ न मिलाना, मैदान में दोनों ओर के खिलाड़ियों द्वारा आपरेशन सिंदूर के हमले वाले सीन्स से एक दूसरे खिलाड़ियों को उत्तेजित करना खासा दिलचस्प रहा।
ऐसे में विपक्ष को भी कुछ बोलना था। सो आम आदमी पार्टी के नेता भारद्वाज जी कूद पड़े। उन्होंने टीम के कप्तान सूर्यकुमार यादव को आड़े हाथों ले लिया। प्रशंसक ये सहन नहीं कर सकते हैं। वह भी ऐसे कप्तान के प्रति जो लगातार अपने प्रशंसकों को जीत की अपरिमित खुशियां दे रहा हो । प्रशंसक खराब खेल खेलने पर क्रिकेटरों को खुद गाली देंगे, अच्छा खेलने पर सिर पर बैठाएंगे। लेकिन अन्य कोई गाली दे या कमेंट करे यह प्रशंसकों को कतई मंजूर नहीं है। खासकर नेताओं द्वारा तो और एलर्जिक हो जाता है। कप्तान को नाटकबाज कहना उस पार्टी के लिए आगे सिरदर्द होगा। कप्तान ने बड़ा दिल दिखाते हुए अपनी पूरी फीस पहलगाम के शहीदों के परिजनों को सौंप दी।
यह एशिया कप क्रिकेट टी20 2025 देश की आन-बान-शान से जुड़ गया था। टीम ने भी पूरे कप में अपराजेय रहकर भारतीयों का सिर ऊंचा रखा।
पाकिस्तान में भी भारत जैसी हलचल मची रही। वहां के लोग अपनी टीम से बेहद ख़फ़ा रहे। प्रशंसकों से लेकर पूर्व क्रिकेटरों तक ने टीम की खूब लानत-मलामत की। शोएब अख्तर ने टीम चयन पर प्रश्न उठाए।
भारतीय टीम के ट्राफी जीतने पर भी भारतीय कप्तान ने मोहसिन नक़वी से ट्राफी लेने से मना कर दिया। नकवी ट्राफी लेकर वापस लौट गए तो लोगों ने उन्हें ट्राफी चोर कहकर सोशल मीडिया पर खूब मीम बनाकर ट्रोल किया।
ट्राफी चोरी पर आपका संपादकीय हर पाठक के सामने यह प्रश्न छोड़ जाता है कि भारतीय टीम को यह ट्राफी कब तक मिलेगी? क्रिकेट में कोई ऐसा नियम है कि मोहसिन नक़वी के बदले किसी अन्य के हाथों ट्राफी ली जा सकती है??
भाई लखनलाल पाल जी हमेशा की तरह आपने संपादकीय को पूरी तरह से तह-दर-तह खोल कर अपनी प्रतिक्रिया लिखी है। क्रिकेट में ऐसा कोई नियम नहीं है कि ट्रॉफ़ी कोई व्यक्ति विशेष ही प्रदान कर सके।
एक कहावत है, मरता क्या नहीं करता
इसी अंदाज़ में पाकिस्तान ने बताया कि हारा हुआ क्या क्या कर सकता है
उम्दा सम्पादकीय
दीपावली शुभ हो
DrPrabha mishra
धन्यवाद प्रभा जी। दीपावली की शुभकामनाएँ आपके परिवार को भी।
सादर नमस्कार आदरणीय सर
पूरी घटना से तो हम सभी अवगत हैं फिर भी संपादकीय में सबकुछ और अधिक स्पष्ट हो गया है..
मेरा व्यक्तिगत विचार यही है कि.. इन लोगों पर क्यों नहीं प्रतिबंध लगा दिया जाता? पूरे विश्व को इनकी सच्चाई पता है..
साधुवाद
अनिमा पूरी कहानी मालूम होने के बावजूद आपने संपादकीय को पढ़ा और टिप्पणी भी की। इससे पुरवाई के संपादकीय के प्रति आपके कमिटमेंट का अहसास होता है। हार्दिक धन्यवाद।
एशिया कप पर लिखा संपादकीय महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसमें ऐसी घटनाएं घटीं जो नहीं घटनी चाहिए थीं। भारतीय विपक्ष का दोहरा नकारात्मक रवैया, पाकिस्तान के मंत्री का आपत्तिजनक व्यवहार समाज के असंवेदनशील व्यवहार को ही दर्शाता है। न जाने कहाँ जा रहा है इंसान?
समसामयिक घटनाओं पर पैनी दृष्टि के साथ संतुलित दृष्टिकोण के साथ लिखे संपादकीय के लिए साधुवाद।
सुधा जी, आपकी सार्थक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
हमेशा की तरह बेहतरीन संपादकीय
हार्दिक धन्यवाद संगीता।
बहुत ही.सार्थक और यथार्थ परक संपादकीय। मीडिया में छिपी बहसों और विवादों को.सुलझाया यह.संपादकीय देशभक्ति और खेल भावना को भी प्रोत्साहित करता है।एशिया कप 2025 सचमुच क्रिकेट के इतिहास में एक अनूठी घटना बन गई, जब पूरा विश्व आतंकवाद के पुरोघा पाकिस्तान के गृहमंत्री की खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे ,जैसी शर्मनाक हरकत का तमाशा देख रहा था।
संयोग से उस दिन का फाइनल मैच मैने भी देखा था।मुझे तो गर्व महसूस हुआ कि खेल में देशभक्ति को.सम्मान मिला है। कैप्टन सूर्य कुमार यादव का संकल्प और नकवी साहब की खिसियाहट मीडिया.में खूब चर्चित हुई।आपके संपादकीय ने उस पूरी घटना का सही सही आकलन प्रस्तुत किया है।घटना को नये अर्थ और संदर्भ मिले।बहुत बहुत बधाई हो भाई। आपकी सृजन शक्ति निरंतर गतिशील रहे।आपकी लेखनी को शत-शत नमन।
प्रणाम।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
पद्मा आपने संपादकीय के मर्म को समझ कर एक सार्थक टिप्पणी की है। आपका स्नेह और शुभकामनाएं हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं।
क्रिकेट के साथ भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों का भावनात्मक जुड़ाव जग ज़ाहिर है। पाकिस्तान को खेल में हराना किसी युद्ध में हरा देने से कम नहीं है। विडम्बनायें कुछ यूं हैं कि_
* हमारे देश का विपक्ष किसी सार्थक मुद्दे पर बात करने के बजाय सरकार के हर निर्णय को ग़लत साबित करने में जुटा रहता है । अपने ही देश की टीम को चेतावनी देते हुए शर्म की ज़रूरत महसूस नहीं करता। एक अन्तर्राष्ट्रीय विदूषक के आपकी अर्थव्यवस्था को मृत बोलने पर ख़ुश हो जाता है लेकिन क्रिकेट टीम की सफलता पर ख़ुशी मनाने से गुरेज़ करता है । *पाकिस्तानी नेता बचकानेपन में हमारे विपक्ष को खड़ा मुकाबला देते हैं। हम उनसे गरिमा और ईमानदारी की उम्मीद करें तो हम ख़ुद को छला रहे हैं।
स्थिति में परिवर्तन आयेगा; ट्रॉफी जिसपर भारत का हक़ है ,उसे ज़रूर मिलेगी और हम शान से उसे वापस लेकर आयेंगे। वो जो ट्रॉफी चोर है, उस बिचारे ने अपनी बुद्धि के हिसाब से महान काम करके “जोकर” का तमग़ा अपने आप को दिलवा दिया और उसकी टीम तो वैसे भी अपनी हरक़तों से हॅंसी का जरिया बनी ही हुई है।
बहरहाल मनोरंजन भरपूर हुआ है।
आपका सम्पादकीय हमेशा की भांति रुचिकर और जानकारियों से भरपूर है।
बहुत बधाई!