कंपनी का पहला होटल हवा से फूलने वाला होगा, जिसे धरती पर बनाया जाएगा, चाँद पर भेजा जाएगा और वहाँ उसमें हवा भरी जाएगी। यह प्रयोग 2029 में किया जाएगा। उसके तीन वर्ष पश्चात इससे कई गुना बड़ा होटल चाँद पर स्थापित किया जाएगा, जिसका तापमान वहाँ की ज़मीन से कहीं अधिक होगा। इस होटल में एक समय में दस लोगों के रहने का प्रबंध होगा। इसका मैटीरियल इतना मज़बूत होगा कि इस पर रेडिएशन और टूटते सितारों का कोई असर नहीं होगा।
आज पूरी दुनिया में युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं। एक स्वतंत्र राष्ट्र वेनेज़ुएला पर अमेरिका के खिसके हुए राष्ट्रपति ने हमला करके वहाँ के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ़्लोरेस को गिरफ्तार कर न्यूयॉर्क की एक अदालत में पेश कर दिया। उसने अपने आप को वेनेज़ुएला का कार्यवाहक राष्ट्रपति भी घोषित कर दिया है। वह खिसका हुआ राष्ट्रपति, जिसका नाम डोनल्ड ट्रंप है, अब ईरान पर हमले की तैयारी में है और डेनमार्क को धमका रहा है कि ग्रीनलैंड उसके हवाले कर दिया जाए।
त्रेता युग में रावण अकेले ही सब कुछ बरबाद कर देता है। द्वापर युग में दुर्योधन अकेले ही महाभारत करवा देता है। हिटलर भी अकेले ही पूरी दुनिया को युद्ध में धकेलकर लाखों लोगों को मृत्यु के घाट उतार देता है। आज इन सबकी आत्मा का एक-एक अंश डोनल्ड ट्रंप के शरीर में प्रवेश कर चुका है और वे ऐसे हालात पैदा कर रहे हैं कि धरती रहने लायक बचे ही नहीं।
नोबेल शांति पुरस्कार को लालची निगाहों से देखने वाला ट्रंप पूरे विश्व की शांति के लिए ख़तरा बनकर खड़ा है। उसने अपनी बेहूदगी का नग्न प्रदर्शन करते हुए वेनेज़ुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो से उनका नोबेल शांति पुरस्कार हथिया लिया।
कोरिना मचाडो ने गुरुवार, 15 जनवरी को कहा कि उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप को अपना नोबेल शांति पुरस्कार का मेडल भेंट किया है। ट्रंप के सपने को तोड़ते हुए 2025 में शांति का नोबेल मचाडो ने ही जीता था और नोबेल समिति ने पहले ही साफ़-साफ़ कह दिया था कि यह पुरस्कार आप अपनी मनमर्ज़ी से जिसे चाहें उसे नहीं दे सकते, यानी इसे ट्रांसफ़र नहीं किया जा सकता।
ट्रंप ने इसके लिए मचाडो की तारीफ़ की है और इसे आपसी सम्मान का अद्भुत काम (जेस्चर) कहा। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ट्रूथ सोशल पर लिखा, “आज वेनेज़ुएला की मारिया कोरिना मचाडो से मिलना मेरे लिए बड़े सम्मान की बात थी। वह एक अद्भुत महिला हैं, जिन्होंने बहुत कुछ सहा है। मेरे द्वारा किए गए काम के लिए मारिया ने मुझे अपना नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान (प्रेज़ेंट) किया। आपसी सम्मान का यह कितना अद्भुत भाव है। धन्यवाद, मारिया!”
ट्रंप ने डेनमार्क को भी हड़का दिया है कि उसे ग्रीनलैंड पर क़ब्ज़ा चाहिए। ट्रंप चाहते हैं कि ग्रीनलैंड अमेरिका का हिस्सा बन जाए। उन्होंने अपने इस फ़ैसले को देश की सुरक्षा का मुद्दा बनाकर पेश किया है, लेकिन असल में कहानी कुछ और है। ट्रंप ग्रीनलैंड के ख़ज़ाने पर लट्टू हो गए हैं। यहाँ पर खरबों डॉलर के ख़ज़ाने के साथ इतनी ख़ूबसूरती है कि ट्रंप की नीयत बिगड़ गई है। ग्रीनलैंड की ख़ूबसूरत तस्वीरों के साथ जानें, यहाँ पर ऐसी कौन-कौन सी चीज़ें हैं, जिनकी वजह से ट्रंप सारे इंटरनेशनल नियमों को ताक पर रखने के लिए तैयार हैं।
ऐसे में साहिर लुधियानवी की नज़्म याद आती है, “ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है…!” और मेरे मन से तो किसी मित्र की आवाज़ निकलती है कि – ये कैसी दुनिया है… क्या ये दुनिया है… जो ये दुनिया है, तो क्या दुनिया है!
शायद मेरी यह आवाज़ डोनल्ड ट्रंप के ख़ास मित्र इलॉन मस्क ने भी सुन ली। उनकी कंपनी स्पेस-एक्स कॉर्पोरेशन ने एक नए स्टार्ट-अप कैलिफ़ोर्निया की एक स्पेस स्टार्टअप कंपनी गैलेक्टिक रिसोर्स यूटिलाइज़ेशन स्पेस (Galactic Resource Utilisation Space – GRU) को सहायता देने का निर्णय लिया है। इस नए स्टार्ट-अप ने दुनिया का पहला स्थायी होटल चाँद पर बनाने की घोषणा की है। इस कंपनी का टार्गेट है कि साल 2032 तक इनका चाँद पर बना होटल मेहमानों के स्वागत के लिए तैयार हो जाएगा।
हम आज तक ऐसे गीत तो सुनते आ रहे हैं-“चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो…।” मगर अब वह दिन दूर नहीं कि प्रेमी कहा करेंगे-चलो प्रिय, अब यहाँ दिल नहीं लग रहा… कुछ दिन चाँद पर बिताकर आते हैं।
जी.आर.यू. कंपनी के प्रमुख 22 वर्षीय स्काइलर चैन का कहना है कि यह कोई साधारण पारंपरिक होटल नहीं होगा। इसीलिए लोग इस होटल को लेकर इतने उत्साहित हैं। ज़रा सोचिए कि इस होटल में रहकर आप कितने अनूठे अनुभव कर सकते हैं। मून-वॉकिंग का मज़ा ले सकते हैं। खिड़की से बाहर देखने पर आपको सितारों के साथ-साथ धरती भी दिखाई देगी।
कंपनी का पहला होटल हवा से फूलने वाला होगा, जिसे धरती पर बनाया जाएगा, चाँद पर भेजा जाएगा और वहाँ उसमें हवा भरी जाएगी। यह प्रयोग 2029 में किया जाएगा। उसके तीन वर्ष पश्चात इससे कई गुना बड़ा होटल चाँद पर स्थापित किया जाएगा, जिसका तापमान वहाँ की ज़मीन से कहीं अधिक होगा। इस होटल में एक समय में दस लोगों के रहने का प्रबंध होगा। इसका मैटीरियल इतना मज़बूत होगा कि इस पर रेडिएशन और टूटते सितारों का कोई असर नहीं होगा।
वर्ष में दस ट्रिप चाँद पर लगाने की योजना है। वहाँ विशेष किस्म की गोल्फ़ खेलने की सुविधा भी उपलब्ध करवाने के बारे में काम चल रहा है। सच तो यह है कि मिस्टर चैन वे सपने देखते हैं, जो उन्हें सोने नहीं देते। उनकी मुख्य योजना तो 2060 तक मंगल ग्रह पर एक नगर बसाने की है। चाँद पर होटल की शुरुआत तो उनके मुख्य सपने का एक हिस्सा मात्र है।
स्काइलर चैन न जाने कभी ‘चैन’ से बैठ पाते हैं या नहीं… उनका कहना है कि, “जिस तेज़ी से तकनीकी विकास हो रहा है, उसके कारण मानवता हमारे जीवनकाल में ही अंतरग्रहीय बन जाएगी। हम तो इस बात के बारे में सोच रहे हैं कि चाँद और मंगल पर पहले इंसानी बच्चे का जन्म होगा।”
1969 में पहली बार एक इंसान नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने चाँद पर कदम रखा था। ऐसा करने के बाद उन्होंने कहा था, “इंसान के लिए एक छोटा कदम, मगर मानव जाति के लिए एक लंबी छलांग!” और केवल 60 वर्षों में यह छलांग इतनी लंबी हो जाएगी, यह तो सोचा ही नहीं जा सकता था। हमारी पीढ़ी यह अवश्य कह सकती है कि हमने अपना जीवन उस छोटे शहर से शुरू किया, जहाँ बिजली नहीं थी और घर में लालटेन जलाई जाती थी। और हमारी ही पीढ़ी ने चाँद पर होटल बनते देख लिया, जहाँ लोग हनीमून मनाने जा सकते हैं।
कंपनी का कहना है कि उन्होंने होटल में रहने की बुकिंग शुरू कर दी है। वर्ष 2032 तक होटल में पहले अतिथि के रुकने की व्यवस्था पूरी हो पाएगी। हाँ, यह बात सच है कि जब तक यह यात्रा अमीर और उच्च-मध्यवर्गीय परिवारों की पहुँच के भीतर पहुँच पाएगी, तब तक केवल अति धनाढ्य लोग ही चाँद पर पहुँच पाएँगे। शुरुआत में एक रात का किराया 4.10 लाख डॉलर, यानी साढ़े तीन करोड़ रुपये से कुछ अधिक हो सकता है। यात्रा की अग्रिम राशि यानी डिपॉज़िट करीब 10 लाख डॉलर है, जो लगभग आठ करोड़ रुपये बनते हैं।
यात्रा और रहने के पैकेज का दाम करीब £7,500,000/- प्रति यात्री तय किया जा रहा है, जो भारतीय मुद्रा में आज की एक्सचेंज दर पर करीब इक्यानवे करोड़ रुपये हो जाएगा।
‘पुरवाई’ के पाठक अवश्य सोच रहे होंगे कि आख़िर जिस चाँद पर गुरुत्वाकर्षण की समस्या के कारण इंसान चल-फिर नहीं सकता और बिना ऑक्सीजन के जीवित नहीं रह सकता, वहाँ होटल कैसे बन पाएगा। इस मामले में कंपनी का दावा है कि वे चाँद की मिट्टी (अंग्रेज़ी में लूनर सॉयल) से ही होटल का निर्माण करेंगे। इसका लाभ यह होगा कि उन्हें पृथ्वी से भारी सामग्री ले जाने की आवश्यकता काफ़ी हद तक कम हो जाएगी और ज़ाहिर है कि लागत में भी कमी आएगी।
इंसान के सपनों का कोई अंत नहीं। इसलिए स्कायलर चैन की कंपनी का कहना है कि कुछ विशेष किस्म की मशीनें और बने-बनाए ढाँचे चाँद पर भेजे जाएँगे, जिससे एक मज़बूत ढाँचा तैयार किया जा सकेगा। इस तकनीक के माध्यम से चाँद पर रिसर्च बेस तैयार किया जाएगा, जो मंगल ग्रह पर इंसानी बस्तियाँ बनाने के काम आएगा।
इस योजना के शुरुआती दौर में स्पेस यात्रा का अनुभव कर चुके लोग ही शामिल हो पाएँगे। आहिस्ता-आहिस्ता एडवेंचर प्रेमी और हनीमून कपल्स भी इस योजना का लाभ उठा पाएँगे।
एक डर यह भी मन में कहीं है कि इंसान ने जिस तरह धरती को बरबाद किया है और ओज़ोन लेयर का सत्यानाश कर दिया है, क्या अब चाँद और मंगल की बारी है?
भारत की इवेंट-मैनेजमेंट एजेंसियाँ तो यह समाचार सुनकर प्रफुल्लित हो जाएँगी। उनका तो चाँद और मंगल पर विवाह का पैकेज बनना भी शुरू हो गया होगा। पैकेज में पंडित, मौलवी, पादरी और ज्ञानी भी शामिल होंगे। आज तक तो चाँद को देखकर व्रत और रोज़ा तोड़ा जाता रहा है… अब तो चाँद पर ही यह सब होगा… वैसे होगा या होना बंद हो जाएगा?
उम्दा सा रोलर कोस्टर संपादकीय ! डॉनल्ड ट्रंप की पड़ताल करता हुआ और बेबाकी से इस व्यक्तित्व की प्रवृत्ति और भस्मासुर वृत्ति का भी परिचय कर दिया,मानवता के दुश्मन दुर्योधन रावण ,हिटलर सब के सब एक संपादकीय में समेट लिए हैं।!!! वेनेजुएला की माचाड़ो का अपना नोबल पुरस्कार अहंकार को भेंट करना और पाठकों को मानव व्यवहार का नक्शा बताता है कि शक्ति के मद में डूबा विश्व लोकतंत्र का विभूतिनारायण अब कैसा है और क्या करने पर अमादा है। बेचारे ग्रीनलैंड ने क्या बिगाड़ा है जो ट्रंप की दृष्टि इस पर है,इसका भी समावेश इस संपादकीय को वर्तमान स्थिति का डिस्पैच बना देता है!!!!
वहीं चांद पर होटल बनाने और उसकी सभी जरूरी डिटेल को बॉलीवुड की रूमानियत से पेश करना ,,,,बस कुल मिलाकर नायाब संपादकीय।
बधाई और सैल्यूट दोनों।
रोलरकोस्टर संपादकीय आपको चांद और मंगल की सैर करवा लाया है।
नोबेल शांति पुरस्कार के लिए पगलाया ट्रंप खुद ही विश्व में अशांति और अस्थिरता की सामयिक लहर के लिए जिम्मेदार है और ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’ को अपनी अनैतिक महत्वाकांक्षाओं से चरितार्थ कर रहा है। एलन मस्क भी उसकी महत्वाकांक्षी मानसिकता को साझा करता है। शायद वह रॉबर्ट ब्राउनिंग की मशहूर पंक्तियां Ah, but a man’s reach should exceed his grasp Or What’s a heaven for? से बहुत प्रभावित है या फंतासी फिक्शन का विद्यार्थी रहा है। ईश्वर की दी स्वर्ग जैसी इस धरती को मानव द्वारा लगातार दूषित करते रह दूसरे ग्रहों पर जीवन बसाने के दुस्वप्न और दुराग्रह को मेरी एक कविता The Beginning Pursues The End की यह पंक्तियां
बखूबी दर्शाती हैं:
As the fool flees in a frenzied fray
Abandoning the very paradise
To take on any new signs of life
In some forlorn-arid planetary nests-
Alas! The Beginning pursues the End.
बिमल जी आपने रॉबर्ट ब्राउनिंग और अपनी अंग्रेज़ी की कविताओं से उदाहरण देकर संपादकीय को नये आयाम प्रदान किये हैं। हार्दिक धन्यवाद।
हर बार की तरह इस बार का संपादकीय भी समकालीन विश्व की कड़वी सच्चाई और भविष्य की सुनहरी, किन्तु चुनौतीपूर्ण कल्पनाओं का एक बेजोड़ संगम है। लेखक ने जिस सूक्ष्मता और प्रखरता से एक ओर राजनीतिक पतन और दूसरी ओर वैज्ञानिक उत्थान के अंतर्संबंधों को जोड़ा है, वह आज के समय की सबसे सटीक व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह प्रतिक्रिया संपादकीय के प्रत्येक उस मर्मस्पर्शी पहलू का पूर्ण समर्थन करती है, जो आधुनिक मानवता को आत्मचिंतन का आईना दिखाने का साहस रखता है।
लेख का सबसे ज्वलंत पक्ष डोनल्ड ट्रंप के माध्यम से उभरती उस ‘तानाशाही मानसिकता’ पर प्रहार करता है, जो वैश्विक लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है। वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी और एक संप्रभु राष्ट्र की अस्मिता के साथ किया गया खिलवाड़ यह सोचने पर विवश करता है कि क्या अंतरराष्ट्रीय कानून अब केवल शक्तिशाली राष्ट्रों की विस्तारवादी नीतियों के बंधक बनकर रह गए हैं? ट्रंप की तुलना रावण, दुर्योधन और हिटलर जैसे ऐतिहासिक व पौराणिक विनाशकारी पात्रों से करना कोई अतिशयोक्ति नहीं है; जब सत्ता का अहंकार विश्व शांति को दांव पर लगा देता है, तो इतिहास स्वयं को एक त्रासदी के रूप में दोहराने लगता है। नोबेल शांति पुरस्कार जैसी वैश्विक प्रतिष्ठा को एक ‘वस्तु’ की तरह हथियाना और उसे आपसी सम्मान का ‘जेस्चर’ बताना न केवल नैतिकता का उपहास है, बल्कि यह उस गरिमा का भी अपमान है जो शांति के प्रयासों को दी जाती है। ग्रीनलैंड को हथियाने की जिद यह प्रमाणित करती है कि आज की राजनीति संसाधनों की अनैतिक भूख से ग्रस्त है, जहाँ अंतरराष्ट्रीय नियमों को ताक पर रखकर केवल स्वार्थ की सिद्धि की जा रही है।
इसी वैचारिक अंधकार के बीच लेख का दूसरा भाग मानवीय मेधा और असीम संभावनाओं की एक नई खिड़की खोलता है। स्काइलर चैन और इलॉन मस्क जैसे स्वप्नद्रष्टा जिस ‘अंतरग्रहीय मानवता’ का संकल्प ले रहे हैं, वह विज्ञान के इतिहास में एक नया अध्याय है। 1969 में नील आर्मस्ट्रॉन्ग के उस ‘एक छोटे कदम’ से लेकर 2032 तक चाँद पर स्थायी होटल स्थापित करने की यह योजना मानवीय संकल्प की पराकाष्ठा है। ‘गैलेक्टिक रिसोर्स यूटिलाइज़ेशन स्पेस’ (GRU) का यह अभिनव विचार कि चाँद की मिट्टी (Lunar Regolith) से ही वहाँ निर्माण किया जाए, न केवल परिवहन की लागत को कम करेगा, बल्कि यह भविष्य के मंगल मिशनों के लिए एक निर्णायक आधारशिला सिद्ध होगा। 2029 में हवा से फूलने वाले ‘इनफ्लेटेबल’ होटल का परीक्षण और उसके बाद एक मज़बूत बहुमंजिला संरचना का निर्माण हमें उस युग की ओर ले जा रहा है, जहाँ ‘चाँद के पार चलो’ केवल एक भावुक फिल्मी गीत नहीं, बल्कि एक यथार्थवादी पर्यटन पैकेज होगा।
हालाँकि, इस तकनीकी छलांग के पीछे लेख एक गहरी दार्शनिक और अस्तित्वगत चिंता भी व्यक्त करता है। जब चाँद की एक रात का किराया साढ़े तीन करोड़ रुपये और पूरा पैकेज करीब 91 करोड़ रुपये का हो, तो यह स्पष्ट है कि अंतरिक्ष फिलहाल केवल ‘अति-धनाढ्य’ वर्ग का एक नया क्रीड़ास्थल बनकर रह जाएगा। यह आर्थिक विषमता धरती के धरातल से निकलकर अब ब्रह्मांड के विस्तार तक अपनी जड़ें जमा रही है। सबसे मार्मिक चिंता यह है कि जिस प्रजाति ने अपनी ही धरती के पारिस्थितिक तंत्र और ओजोन परत को लहूलुहान कर दिया, क्या वह चाँद और मंगल की निष्कलंक सतह को अपनी विध्वंसक आदतों से सुरक्षित रख पाएगी? लेखक का यह संशय कि ‘क्या अब चाँद की बारी है’, हर उस व्यक्ति का प्रश्न होना चाहिए जो भविष्य के प्रति उत्तरदायी है।
कहना असंगत नहीं होगा कि भारतीय परिवेश में इवेंट मैनेजमेंट और धार्मिक अनुष्ठानों की जो कल्पना की गई है, वास्तव में वह व्यंग्य के साथ-साथ एक समाजशास्त्रीय सत्य को भी उजागर करती है। लालटेन के धुंधले प्रकाश से लेकर चाँद की चांदनी में होटल तक का सफर तय करने वाली हमारी पीढ़ी वास्तव में एक महान संक्रमण काल की गवाह है। यह संपादकीय हमें निरंतर यह बोध कराता है कि तकनीकी प्रगति की गति चाहे कितनी भी तीव्र क्यों न हो, यदि हमारे भीतर की मानवीय करुणा, वैश्विक शुचिता और नैतिक विवेक पीछे छूट गए, तो साहिर लुधियानवी का वह प्रश्न—’ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’—एक शाश्वत सत्य बनकर हमें सदैव कचोटता रहेगा। यह लेख आधुनिक सभ्यता के विरोधाभासों का एक उत्कृष्ट और प्रामाणिक दस्तावेज़ है।
भाई चंद्रशेखर जी, आपकी विस्तृत और गंभीर टिप्पणी संपादकीय के औचित्य को सिद्ध करती है। आपने तो संपादकीय के हर कोण पर टिप्पणी की है। हार्दिक धन्यवाद।
वाह! प्रदूषण चांद तक, तानाशाही व्यवस्था, लूट, धनाढ्यता सभी पर करारी चोट। जिसकी लाठी उसी की भैंस या कहें नंग बड़े परमेश्वर से …चारों ओर अराजकता का राज है और हम मूक दर्शक बन तमाशा देख रहे हैं। कार्टून रचा जा सकता है।
बहुत बहुत शुक्रिया नीलमणि जी।
बिल्कुल नए विषय पर मंतव्य। जितना नया उतना मार्मिक और प्रभावी, प्रासंगिक।
हार्दिक धन्यवाद प्रकाश भाई
ख्वाबों की दुनिया ,हक़ीक़त की दुनिया होने
के प्रयास में है ।
सम्भव है हमारी पीढ़ी अब नए संसार में जन्म लेगी इसलिए हमें गाना चाहिए
‘ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं ‘।
Dr Prabha mishra
हम गाएंगे – “हम धरा पे चंद्रमा की / आसमां पे धरती है!”
बेहतरीन पर लगा इस पर दो संपादकीय बनने चाहिए थे। एक ट्रंप की लंपटई पर और दूसरा जिसका टाइटल है।
Buy one… Get one free Alok Bhai!
ट्रंप ने बहुत झूठ परोसें नोबेल के लिए लेकिन जब करें न उतरे तो वेनेजुएला की विपक्षी ने अपना भविष्य सुरक्षित करने के लिए ट्रंप के सपने को पूरा कर दिया। जैसे बच्चों में रोते हुए बच्चे को किसी का खिलौना देकर चुप करा देते हैं।
चांद पर होटल का सपना बहुत अच्छा और हकीकत में बदल जाये तब और अच्छा होगा। वहां भी अपने-अपने होटल खोलने की होड़ लगेगी। डेस्टिनेशन मैरिज के लिए एक औश्र जगह मिल जायेगी।
ज़बरदस्तम रेखा जी… हार्दिक धन्यवाद।
बहुत सटीक, बेबाक टिप्पणी l संपादकीय किसी भी पत्रिका की आत्मा होती है l पुरवाई की संपादकीय हमेशा नए विषयों पर होती है, आधुनिक पत्रकारिता को जीवंत करती
सुन्दर टिप्पणी l
सादर प्रणाम l
माया इस ख़ूबसूरत टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
पुरवाई का इस बार का संपादकीय— ‘चाँद के पार चलो…!’ भविष्य के अद्भुत वैज्ञानिक आविष्कारों की संभावित रूपरेखा सामने रखता है। यही संपादकीय यदि दस वर्ष पहले लिखा गया होता, तो शायद हम कह देते— “सर, यह तो कल्पना है!” लेकिन आज ऐसा कहने का साहस नहीं होता। यह सुनहरी या काली खोपड़ी वाला मनुष्य जब कुछ ठान लेता है, तो उसे पूरा करके ही दम लेता है।
चाँद पर पहुँचने के विचार मात्र से ही पाठक के मन में न जाने कितने चित्र बनते–बिगड़ते हैं। पर वहाँ तक पहुँचने की जो लागत संपादकीय में दर्ज है, वह इन खूबसूरत कल्पनाओं पर जैसे काली स्याही फेर देती है। स्पष्ट है कि ये सुनहरे चित्र दुनिया के कुछ गिने-चुने लोगों के लिए ही हैं।
चांद या अन्य ग्रहों पर बसने का विचार किसी न किसी कारण मनुष्य के मस्तिष्क में आता ही रहता है। चाँद पर होटल बनाने जैसी कल्पनाएँ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप साहब के बयानों और स्वभाव से भी जुड़ती हैं। वे ऐसे व्यक्ति हैं जिनके बारे में कोई एक ठोस धारणा बनाना कठिन है। उनकी गतिविधियाँ कभी-कभी ऐसी आशंकाएँ पैदा कर देती हैं कि मानो यह दुनिया किसी बड़े टकराव की ओर बढ़ रही हो।
संपादकीय की अंतिम पंक्तियाँ—
“आज तक तो चाँद को देखकर व्रत और रोज़ा तोड़ा जाता रहा है… अब तो चाँद पर ही यह सब होगा… वैसे होगा या होना बंद हो जाएगा…”
बार-बार पाठक को अपनी ओर खींचती हैं।
वैसे भी आज की दुनिया एटम बमों के ढेर पर बैठी है। सिरफिरे निर्णयों से पूरी मानवता भयभीत रहती है। ऐसे में मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है—कहीं ऐसा तो नहीं कि साधन-संपन्न लोग भविष्य की अनहोनी से बचने के लिए पहले से ही अपने लिए वैकल्पिक दुनिया तैयार कर रहे हों? और धरती से चाँद का दीदार करने वाले लोग इन सबसे बेखबर यूं ही……..
प्रिय भाई लखनलाल पाल जी हमेशा की तरह आपकी टिप्पणी पुरवाई की संपादकीय टीम के लिये पीठ ठोंकने का काम करती है। आपको संपादकीय की अंतिम पंक्तियों ने विशेष प्रभावित किया इसके लिये विशेष धन्यवाद।
एक ओर ट्रंप की लोलुपता का विवरण और दूसरी ओर चाँद पर होटल बनाने की कल्पना। प्रभावशाली, बेहतरीन सम्पादकीय।आपकी जादुई लेखनी को नमन।
हार्दिक धन्यवाद सुदर्शन जी।
तेजेंद्र जी, आपने एक संपादकीय में कई विषय पर कटाक्ष करते हुए पाठकों को गंभीरतापूर्वक चिंतन करने के लिए विवश कर दिया है| इतिहास, पुराण, राजनीति, अर्थव्यवस्था, अंतरिक्ष ही नहीं मानवता के समक्ष खड़े संकट … | ये सिर्फ आप ही कर सकते हैं, अभिनंदन !!!
सुषमा जी इस प्यारी सी टिप्पणी के लिये विशेष आभार।
आदरणीय आज के संपादकीय ने बरबस ध्यान आकर्षित किया कितने सचेत और सतर्क पत्रकार सुलभ चिंतन से आपने वैश्विक अस्थिरता, तकनीकी महत्वाकांक्षा और मानवीय लालच के द्वंद्व को चतुराई से उजागर किया है। ट्रंप को रावण, दुर्योधन और हिटलर से जोड़कर कैसी अद्भुत और ऐतिहासिक चेतावनी दी है कि एक अपरिपक्व घोर महत्वाकांक्षी नेता व की महत्वाकांक्षा विश्व शांति को कैसे ध्वस्त कर सकती है। वेनेज़ुएला पर काल्पनिक हमला, मादुरो की गिरफ्तारी, ग्रीनलैंड की लिप्सा और नोबेल पुरस्कार विवाद को अतिरंजित कर संपादकीय ट्रंप की ‘लालची निगाहों’ पर प्रहार करता ह वह भी साहिर लुधियानवी की नज़्म से भावनात्मक गहराई जोड़ते हुए। कमाल है ! पूँजीवादी साम्राज्यवाद की आलोचना करता है यह संपादकीय l दूसरी ओर, चंद्र होटल की योजना—GRU कंपनी के 22 वर्षीय स्काइलर चैन के नेतृत्व में—मानवता की अंतरग्रहीय उड़ान की लिप्सा भी आश्चर्य जनक लगी l 2032 तक हवा से फूलने वाला होटल, मून-वॉकिंग, गोल्फ़ और 2060 तक मंगल नगर बसाने का सपना नील आर्मस्ट्रॉन्ग की ‘छोटे कदम’ से ‘लंबी छलांग’ तक पहुँच दिखाता है। लागत (साढ़े तीन करोड़ प्रति रात) अमीरों तक सीमित रखती है, पर चंद्र मिट्टी से निर्माण लागत घटाने का दावा विस्मित करता हुआ आशाजनक लगता है। स्पेसएक्स की सहायता इसे विश्वसनीय बनाती है। संपादकीय पर्यावरणीय चिंता के प्रस्ताव bhi उठाता लगा l पृथ्वी को बर्बाद कर चंद्र-मंगल पर कुदरत का दोहन? भारतीय संदर्भ में चंद्र व्रत-रोज़ा का व्यंग्य सांस्कृतिक विडंबना रेखांकित करता है। संपादक महोदय आपने जो निष्कर्ष दिए कि यह ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’ .. यही आज के ज़बर्दस्त संपादकीय ki मूल सम्वेदना लगी *शांति के बिना तकनीकी विजय व्यर्थ*। मनुष्य को वास्तव में ही लालच त्यागकर सतत विकास चुनना होगा अन्यथा विनाश सिर पर खड़ा है l
साधुवाद संपादकीय के विषय चयन और शिल्प विधान के लिए l
प्रिय किरण जी, आपकी टिप्पणी ने संपादकीय के दोनों पक्षों को सही उकेरा है। दिल से शुक्रिया।
आज का संपादकीय पढ़कर एक दहशत मन में पैठ गई। साइंस फिक्शन देखा करते थे, सोचा न था वे सच होंगे। यह भी किसी साइंस फिक्शन से कम नहीं लग रहा। पर उनमें जहाँ एक उत्साह हुआ करता था, इसे पढ़कर दिल बैठा जा रहा है। अनगिनत बस्तियों को अपनी ताकत से नेस्तनाबूत करने वाले, विश्व के विभिन्न कोनों में हिंसा की पराकाष्ठा दर्शानेवाले, किस हद तक अहम में चूर हैं ..!
पृथ्वी पर जहाँ लोगों से उनके मौलिक अधिकार, जीने की बेसिक जरूरतें छीनी जा रही हैं, वहाँ यह लोग ऐसे प्रोजेक्ट्स की परिकल्पना कर रहे हैं..!
इसमें से कुछ अंश भी विश्व के पिछड़े वर्गों को दे सके तो कमसे कम इंसानों की जिंदगी जी सकें वे जो इतनी बेरहमी से उनसे छीनी जा रही है। मन बैठ गया यह जानकर। ईश्वर अपने होने पर संदेह न पैदा करो।कुछ तो सुध लो..!
क्या पापों की गिनती अभी पूरी नहीं हुई ईश्वर…!
मन बहुत विचलित है आज का संपादकीय पढ़कर।
हमेशा की तरह इस बार भी आपका श्रम साफ दिखाई दे रहा है आदरणीय।
इस मन को छूने वाली टिप्पणी के लिये विशेष आभार सरस जी।
पाठकों को गंभीरतापूर्वक चिंतन करने के लिए विवश करता एक प्रभावशाली, बेहतरीन सम्पादकीय ❤️❤️
शुक्रिया आशुतोष।
सादर नमस्कार सर…
अत्यंत रोचक संपादकीय है सर….
ट्रॉप…. विनाश काले विपरीत बुध्दि का ज्वलंत उदाहरण है….वैसे इंसान के सिवा इस धरती पर ऐसी कोई प्राणी नहीं है जो भयंकर है और ध्वंसाभिमुखी है… प्रकृति का अंत भी इसी प्राणी के हाथों होगा…। आपने त्रेता से लेकर हिटलर तक की यात्रा में सबकुछ कह दिया है…एक अकेला ट्रॉप ही क्यों और भी हैं उसके साथ.. विनाशकारी लोग।
यह बात भी आपकी सच होगी… जब हमारी पीढ़ी नहीं होगी… कि इंसान पृथ्वी की तरह चाँद और मंगल को बरबाद कर देगा। होगा सर अवश्य होगा..। विकास के नाम पर… हम स्वयं ही अपने विनाश के कारण है और होते रहेंगे….
आप यूँ ही लिखते रहें सर….
आदरणीय अणिमा जी, इस सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
बहुत ही महत्वपूर्ण और ज्ञानवर्धक जानकारी तेजेंद्र सर आपने दी इसके लिए मैं आपको साधुवाद देती हूं । आपका संपादकीय लेख पढ़ते समय ऐसे लग रहा था कि जैसे हम स्वयं ही चांद पर घूमने जा रहे हो।
हरदीप जी बहुत बहुत शुक्रिया।
अति रोचक विषय के साथ बहुत-बहुत ज्यादा दिलचस्प संपादकीय बहुत-बहुत हार्दिक बधाई
धन्यवाद संगीता।
पुरवाई का इस बार का संपादकीय वैश्विक लोकतंत्र के उन्नतिकारक परिदृश्यों के बीच मुखरता से उभरते तानाशाहीपूर्ण रवैयों को आसन्न विश्व संकट के रूप में देख रहा है।
चाँद के पार की भयावहता को दर्शाता विचारणीय संपादकीय।
निर्भीक लेखनी के हिमायती भाई तेजेन्द्र जी को अनेक साधुवाद।
हार्दिक धन्यवाद भाई रामशंकर जी।
बहुत महत्त्वपूर्ण, ज्ञानवर्धक और चिंतनीय संपादकीय है। जिस बेबाक़ी से आपने तथ्यों को निष्पक्षता से प्रस्तुत किया है वह काबिले-ए-तारीफ़ है।
धन्यवाद अपूर्वा
बहुत फंटास्टिक संपादकीय। चांद का जो होगा, वह भविष्य के गर्भ में है। परंतु डोनाल्ड ट्रम्प के सिर फिरे होने से इस पृथ्वी का क्या होगा, यह शोचनीय है। चांद पर होटल बनाने की संभावना की बात की जा रही है पर दिमाग हिले डोनाल्ड ट्रम्प का कोई समाधान है या नहीं, इसके बारे में क्या कोई नहीं सोच रहा। अब तो उसे नोबल पुरस्कार अंतरित कर दिया गया है फिर भी वह हर देश के लिए खतरा बन गया है। कहीं वह अमरीका का भी पूरा भट्ठा बिठा कर मानेगा। आपने सही कहा कि उसमें रावण, दुर्योधन आदि की आत्माएं प्रवेश कर गई हैं। खैर, संपादकीय का विषय बहुत रोचक और लाजवाब रहा। आपकी रचनात्मकता कोई नमन
संतोष जी आपकी टिप्पणी ने हमारी हौसला अफ़ज़ाई की है। शुक्रिया
बहुत ही रोचक ढंगसे वैश्विक परिवेश में होने वाली घटनाओं के संदर्भ में आपका संपादकीय चौंकाता भी है और आने.वाले भविष्य की सटीक कल्पना से भी परिचित कराता है।अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप का समूची मानवता के प्रति अमानवीय व्यवहार उन्हें सबकी घृणा का पात्र बना रहा है।विश्व की शांति भंग करने वाला मांति पुरस्कार की कामना करे यह अत्यंत हास्यास्पद है।आपने सच ही लिखा है कि वे खिसके हुए राष्ट्रपति हैं।विशेष रुप से वेनेजुएला के साथ निर्ममता और दूसरे देशों को धमकाने जैसी बात उन्हे तानाशाह भी बनाती है।सचमुच जैसा कि आपने संपादकीय में लिखा है कि उनमें रावण ,दुर्योधन और हिटलर की आत्मा समाहित हो गई है,सच लगता है।बहुत ही यथार्थ परक, सारगर्भित और तथ्यपूर्ण संपादकीय के लिए बहुत बहुत बधाई और शुभ कामनाए भाई।
सादर प्रणाम।
पद्मा आप पुरवाई का हर संपादकीय पढ़ती हैं और उस पर सार्थक टिप्पणी भी करती हैं। हमें आपकी टिप्पणी की प्रतीक्षा रहती है। बहुत शुक्रिया।
बहुत लाजवाब लेख। पहले पृथ्वी पर ज़्यादा से ज़्यादा हड़पने की होड़ थी फिर ये होड़ चाँद के लिए होगी। बस यही सवाल बार बार मन मे उठ रहा है किसके कितने हिस्से आएगा चाँद।
सही कहा आपने बेटा जी।
आईडिया धांसू है। चांद पर बसायेंगे हम इक आशिया! मगर हालिया अंतरिक्ष अभियानों की विफलता शायद यह भी आगाह कर रही है कि हमें बहुत आशावादी होने की जरुरत नहीं है। आईएसस के यात्रियों का पहली बार मेडिकल इमर्जेंसी के चलते तयशुदा कार्यक्रम के पहले लौटना, एलान मस्क के सबसे शक्तिशाली राकेट से र्आटेमिस अभियान की आशंकाएं और प्रमोचनों की बार बार विफलता। भारतीय पोलर सैटेलाइट राकेट की दुबारा विफलता। एक लंबी लिस्ट है।
आपका यह संपादकीय एकदम ढर्रे से अलग एक नये विषय पर है जो स्वागत योग्य है। आपकी लेखनी के तो हम कायल हैं ही।
प्रिय अरविंद भाई प्रयास रहता है कि हर बार पुरवाई के पाठकों का किसी अनूठे और अनछुए विषय से परिचय करवाया जाए।
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
आपके संपादकीय पढ़कर लगता है कि आपकी दूरदृष्टि का लैं रथस वाकई बड़ा ही पावर फुल है। न्यूजपेपर और पत्रिकाओं के संपादकीय भी क्षेत्र व विषय विशेष तक सीमित रहते हैं। शायद आप अकेले ऐसे संपादक हैं जिनके संपादकीय का विषय पूरा विश्व है।वह भी प्रति सप्ताह। हर बार कुछ नया और आश्चर्यचकित करता हुआ।
अब पहले बात ट्रंप की।
उसके लिये क्या ही कहा जाए!
आपने सही कहा ! अपने-अपने समय में रावण और दुर्योधन दोनों ही अपने कुल का ही नहीं राज्य के साथ असंख्य लोगों का भी सर्वनाश कर बैठे। और हिटलर भी वैसा ही क्रूर! ऐसा लगता है कि ईश्वर ने तीनों आत्माओं का मिश्रण बनाकर ट्रंप को बनाया है। इसीलिये वह अधिक बड़ा नमूना है।उसे धरती के खतरे से कोई लेना-देना नहीं।
वह इंसान के लिये एक ख़तरनाक जोकर है। वाकई विश्वशांति के लिये खतरा है।कितनी अजीब बात है कि जिसे शांति का अर्थ भी पता नहीं वह शांति पुरस्कार का इच्छुक है।
कोरिया मचाडो ने पता नहीं क्या सोच कर अपना नोबेल शांति पुरस्कार ट्रंप को भेंट किया है?
आपको पढ़ने के बाद हमने गूगल पर सर्च करके इसकी जानकारी ली कि यह पुरस्कार उन्हें किसलिए दिया गया है? तो पता चला कि-
*मारिया कोरिना मचाडो (Maria Corina Machado) को 2025 का नोबेल शांति पुरस्कार वेनेज़ुएला में लोकतांत्रिक अधिकारों को बढ़ावा देने और वहां की तानाशाही से लोकतंत्र की ओर शांतिपूर्ण बदलाव लाने के उनके अथक प्रयासों और संघर्ष के लिए दिया गया था. उन्हें यह सम्मान वेनेज़ुएला के लोगों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को समर्थन देने के लिए मिला, जो स्वतंत्र चुनावों और नागरिक अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं.*
विश्व में शांति, भाईचारा, लोकतंत्र, मानवाधिकारों और संघर्षों को सुलझाना, निरस्त्रीकरण! इनमें से कौन सा ऐसा काम है जो ट्रंप ने किया; या कर रहा है ,या करना उसका उद्देश्य है।
मारिया कोरीना मचाडो तो कायदे से दंड की अधिकारी हैं।
नोबेल शांति पुरस्कार का तो उद्देश्य ही दुनिया मैं शांति की स्थापना है जो अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत के अनुसार राष्ट्रों के बीच भाईचारे और शांति को बढ़ावा देने के लिए दिए जाता है
क्या ट्रंप की सोच और कर्म में इसमें से एक भी कोई गुण या खासियत नजर आती है ?
यह तो नोबेल पुरस्कार का ही अपमान महसूस हो रहा है। पूरा उद्देश्य ही खंडित हो रहा है।
जो पूरे विश्व को अशांत करके युद्ध की स्थिति में ढकेल रहा है उसे देना!!!!! जबकि इसे ट्रांसफर करना इसपुरस्कार के नियमों के खिलाफ है। अब नियम में सुधार की आवश्यकता है ऐसा नियम भी बनाना होगा कि अगर किसी ने इसकी तौहीन की तो उससे यह वापस ले लिया जाए।
एलन मस्क!!!!!!!
क्या ही कहा जाए इनके बारे में!
बेचारा चाँद! जो ग्रह भी नहीं उपग्रह है। हाथ धोकर लोग उसके पीछे पड़े हैं।व्रत उसकी पूजा के बाद खुलेगा।रोज़ा उसी को देखकर टूटेगा। कोई चाँद को देखकर पानी पिएगा और कहीं चाँद दर्शन के साथ असंख्य बकरे बलि चढ़ जाएंगे।
जिनकी पूजा हो रही है, उन्हीं के सिर पर सवार होने जा रहे हैं लोग। बसने जा रहे हैं।
ऐसा लगा इलॉन मस्क ने गाना सुन लिया –
“आओ तुम्हें चाँद पर ले जाएँ, एक नई दुनिया बसाएँ”
या फिर किसी पत्नी ने कहा होगा –
चलो दिलदार चलो
चाँद के पार चलो
और आपने तत्काल फैसला ले लिया-
हम हैं तैयार चलो!
इसके साथ ही इतने सारे प्रश्न दिमाग में उठे हैं कि उनका समाधान समझ में नहीं आ रहा। किंतु वह सभी संपादकीय का विषय नहीं।
पर संपादकीय ने विज्ञान की ताकत और उसके लक्ष्य का अगला चरण इंगित किया।
कैसा होगा वह नजारा!!!!
पैसा जो न करवा लें वही थोड़ा।
चाँद पर फूलने वाले गुब्बारे की वैज्ञानिक विशेषताओं से आपने अवगत कराया।
हमारे लिये तो आश्चर्य यह भी रहा-
*22वर्षीय* स्काइलर चैन और *जी आर यू के प्रमुख*
इस बार का संपादकीय विशेष है। काफी महत्वपूर्ण जानकारियाँ लेकर आया है।
वर्तमान की अमेरिकी खलनायक ट्रंप की मूर्खताएँ और ताना शाही;
उपग्रह चाँद पर वैभव और विलास के आयाम के संभावित स्वप्न!
भविष्य की एक नयी तस्वीर।
एलन मस्क ……! क्या ही कहें!! पैसा ही पैसे को खींचता है।
ट्रंप दुनिया को तबाही की ओर ढकेल रहे हैं और और उनके चाहने वाले एलन मस्क चाँद में जाने की बात …… नहीं-नहीं… प्लानिंग कर रहे हैं।
इस बार के संपादकीय में हास्य भी है, व्यंग भी है। चिंता भी है और भय भी है। ज्ञान भी है विज्ञान भी है।यह मूर्खता को इंगित करते हुए सचेत भी कर रही है।
पूंजीवाद के बढ़ते चरण अदृश्य रूप से ही सही पर एक बार फिर दुनिया पूंजीवाद का प्रभाव और दुष्प्रभाव देख रही है और आगे देखेगी और आगे और देखेगी।
संपादकीय ने मनोरंजन भी किया और कल्पनाओं के आकाश में भी ले गया। राजनीतिक स्थितियों के दुष्परिणामों की चिंता से भी अवगत कराया।
ऐसा लग रहा है मानो नौ रस पूरे के पूरे इस संपादकीय में समाहित हैं। एक संपूर्ण फलित संपादकीय के लिये आपको विशेष बधाई सर जी।
पुरवाई का भी विशेष आभार।
नीलिमा जी आपकी सृजनात्मक और विस्तृत टिप्पणी सच में उल्लेखनीय है। आपकी टिप्पणी में भी 9 रस मौजूद हैं। धन्यवाद।
भविष्य के लिए चिंता पैदा करने वाला संपादकीय । जब किसी भी चीज़ की अति हो जाती है तो अवनति मुँह चिढ़ाती है । इन महत्वाकांक्षाओं पर अंकुश लगना चाहिए । आपने एक जिम्मेदार पत्रकार के नाते सब को सचेत किया है । अब कोई धरती को ही नहीं बेच खाये । पढ़ कर डर सा लगने लगा है । बहुत बधाई आपको ।
सादर,
शशि पाधा
शशि जी इस प्यारी सी टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की दुनिया को त्रस्त करने वाली कारगुजारियों के बारे में बताते हुए आपने डोनल्ड ट्रंप के ख़ास मित्र इलॉन मस्क की कंपनी स्पेस-एक्स कॉर्पोरेशन के बारे में बताया जो कैलिफ़ोर्निया की एक स्पेस स्टार्टअप कंपनी गैलेक्टिक रिसोर्स यूटिलाइज़ेशन स्पेस (Galactic Resource Utilisation Space – GRU) के सम्मिलित प्रयास से दुनिया का पहला स्थायी होटल चाँद पर बनाने जा रही है। इस कंपनी का कहना है कि साल 2032 तक इनका चाँद पर बना होटल मेहमानों के स्वागत के लिए तैयार हो जाएगा। इस होटल में एक समय में दस लोगों के रहने का प्रबंध होगा। इसका मैटीरियल इतना मज़बूत होगा कि इस पर रेडिएशन और टूटते सितारों का कोई असर नहीं होगा।
रिसर्च बेस के साथ यहाँ अन्य क्रिया कलापों के मद्देनज़र आपका डर उचित ही प्रतीत होता है कि इंसान ने जिस तरह धरती को बरबाद किया है और ओज़ोन लेयर का सत्यानाश कर दिया है, क्या अब चाँद और मंगल की बारी है?
आज यह बात सच साबित हो रही है कि विज्ञान जहाँ इंसानों की जिंदगी को खूबसूरत बना रहा है वहीं प्रकृति का विनाश कर जिंदगी दूभर भी कर रहा है।
विचारणीय संपादकीय के लिए साधुवाद।
सुधा जी आपने लिखा है “आपका डर उचित ही प्रतीत होता है कि इंसान ने जिस तरह धरती को बरबाद किया है और ओज़ोन लेयर का सत्यानाश कर दिया है, क्या अब चाँद और मंगल की बारी है?”… सच यही है कि इन्सान ने प्रकृति का विनाश करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
नमस्कार व नमन आपको
कोई संशय नहीं है कि रुचिपूर्ण व ज्ञानवर्धक संपादकीय है।आपने कहाँ कहाँ की सैर करवा दी। घनघोर व्यंग्य के साथ घनघोर चिंता यह है कि हमारे जीवन काल में हम धरती पर साँस लेने लायक या धरती हमारे बचे खुचे दिनों में हमें साँस देने लायक रहेगी?
हमारी पीढी तो सवा सत्यानाश देख रही है, महसूस कर रही है। यदि हमें सकारात्मक रहने के उपदेश घूँट घूँट कर पीने ही हैं तो बाबा शांति से बैठकर चैन की साँस ले सकें, इतनी कृपा बनी रहे वर्ना हम सभी कहीं न कहीं जीवन के प्रति प्रश्नचिन्हों के ढेर पर खड़े ही हैं।
वो महाराज ट्रंप हों अथवा उनकी दुम से लटकते कोई भी पुच्छले!धरती तो रहने योग्य बनी रहे, चाँद के लिए बाद में प्लानिंग कर लेंगे। अपाराधी एक बड़े नाम के साथ जुड़े कितने नाम होते हैं जो चैन लेने ही नहीं देते। वर्तमान में रहने योग्य बने रहें।वैसे अब जीने का उत्साह है कहाँजब तक साँस हैं, जीना होगा, शेष तो समझ नहीं आता।
आदरणीय प्रणव जी, आप की मज़ेदार टिप्पणी को तीन बार पढ़ गया। टिप्पणी में दर्द भी है और व्यंग्य भी और चिन्ता भी… हार्दिक धन्यवाद।