पाकिस्तान के राष्ट्रीय डेटाबेस और पंजीकरण प्राधिकरण (एनएडीआरए) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान में 22 लाख से अधिक हिंदू रहते हैं जो इस्लामिक राष्ट्र की आबादी का लगभग 1.18 प्रतिशत है। स्वतन्त्रता के समय पाकिस्तान की आबादी का लगभग 23% हिंदू थे। इनमें से अधिकांश 95 प्रतिशत सिंध में रहते हैं। यहां जब अंतिम संस्कार किया जाता है तो अस्थियां मंदिरों या श्मशान घाट में ही सुरक्षित रख दी जाती हैं। इसलिए विसर्जन की प्रतीक्षा कर रही अधिकांश अस्थियां वहीं से हैं। दोनों देशो में चल रहे तनाव के चलते, 2011 से 2016 तक, अटारी-वाघा संयुक्त चेक पोस्ट के माध्यम से केवल 295 पाकिस्तानी हिंदुओं की राख भारत लायी गई थी।
भारत में जब नागरिकता संशोधन कानून संसद द्वारा पास किया गया तो तमाम विपक्षी दलों ने इसके विरोध में बयान जारी किये। जावेद अख़्तर जैसे सुलझे हुए इन्सान ने भी इसे मुसलमानी नज़रिये से देखा। ममता बनर्जी ने तो भाजपा सरकार के विरुद्ध मोर्चा ही संभाल लिया। मगर राजनीति से हट कर भी इस विषय पर सोचने की आवश्यकता है।
हर देश में मुस्लिम, ईसाई और यहूदियों के कब्रिस्तान होते हैं। उनकी मृत्यु जिस मुल्क में भी होती है वहीं वे दफ़न भी हो जाते हैं। उनके धार्मिक रीति-रिवाज यही कहते हैं। मगर हिंदुओंकी समस्या बिल्कुल अलग ही है। उनका अंतिम संस्कार तो किसी भी देश में हो सकता है, मगर उनकी आत्मा की शांति के लिये अस्थियों को गंगाजी में ही विसर्जित किया जाना होता है। अब दुनिया के तमाम देशों में तो गंगा जी को ले जाया नहीं जा सकता। तो फिर एक ही तरीक़ा है कि मृतक की अस्थियों को विमान द्वारा भारत ले जाकर हरिद्वार में गंगा जी में विसर्जित कर दिया जाए।
मगर यहां भी एक पेंच है। कुछ देश ऐसे हैं जहां से भारत आने के लिये वीज़ा की आवश्यकता नहीं होती मगर अधिकांश देशों के नागरिकों को भारत आने के लिये वीज़ा लेना पड़ता है। दरअसल पाकिस्तान और भारत के रिश्तों में हमेशा ही तनाव बना रहता है। इसलिये किसी भी पाकिस्तानी नागरिक को तब तक भारत का वीज़ा नहीं मिल पाता जब तक उसे कोई भारतीय नागरिक स्पॉन्सर ना करे। इसके बावजूद आसानी से वीज़ा नहीं मिल पाता।
पाकिस्तान में दोहरी नागरिकता का प्रावधान बना हुआ है। यानी कि कोई भी पाकिस्तानी नागरिक पाकिस्तान के अलावा किसी अन्य देश की नागरिकता भी ले सकता है। इस तरह वह एक ही समय में अपनी पाकिस्तानी नागरिकता को बरक़रार रखते हुए ब्रिटेन या अमरीका का नागरिक भी बन सकता है। मगर यहां एक पेंच फंस जाता है। जब कोई अमरीकी या युरोपीय नागरिक भारत के वीज़ा के लिये अप्लाई करता है तो उसे आसानी से भारत का वीज़ा मिल जाता है। मगर जिस अमरीकी या किसी भी अन्य देश के नागरिक के पास पाकिस्तान का पासपोर्ट भी मौजूद है, उसे केवल पाकिस्तानी पासपोर्ट पर ही वीज़ा दिया जाता है। और उसके लिये भी वही शर्तें लागू हो जाती हैं जो कि पाकिस्तान के नागरिकों पर लागू होती हैं।
याद रहे कि यह समस्या भारतीय नागरिकों पर भी उतनी ही लागू होती है जितनी कि पाकिस्तानी नागरिकों पर। यदि कोई भारतीय नागरिक पाकिस्तान की यात्रा करना चाहता है तो उसे भी स्पाँसरशिप का पत्र चाहिये होता है। वरना उसे वीज़ा नहीं मिलता है।
तो हम बात कर रहे थे उन हिंदुओंकी जिन की मृत्यु और अंतिम संस्कार तो पाकिस्तान में हो गया। मगर उनकी अस्थियों को गंगा जी में प्रवाहित कैसे किया जाए। इन्सान के बनाए हुए कानून कैसे दूसरे इन्सानों के पैरों में बेड़ियां डाल देते हैं। जीवित मनुष्य की तो बात ही अलग है, ये कानून तो आत्मा की शांति की राह में भी रोड़े अटकाकर खड़े हो जाते हैं।



एक नए संवेदनशील विषय पर आपके विचार अत्यंत ग्रहणीय है सर। अति दुःखद.. राजनीति किसी भी तरह भावनाओं के साथ खेलती तो है। आपका संपादकीय में जो गहराई है
भावात्मक विचारों को स्पष्ट करती है। आपका यह तथ्यपरक लेख अवश्य पाठकों के मन को अलोड़ित करने में सफल होगा। साधुवाद
हार्दिक आभार अनिमा जी। यह आलेख स्पष्ट करता है कि कैसे आस्था के राह में राजनीतिक हालात रोड़े अटका देते हैं।
Your Editorial of the day speaks of a very important and grave issue,that of a ritual and belief that the souls of Hindus,Jains and Sikhs find peace only after the ashes of the dead are immersed in the sacred waters of the Ganges.
Your emphasis on how those who happen to live in Pakistan and want to come to India for this purpose must be facilitated by that country is a matter of great importance for all concerned.
Warm regards
Deepak Sharma
Deepak Ji, thanks so much for your encouraging comment. Your story published in this issue has drawn emotional comments from the readers alike.
अच्छा है कि अब वे अपनी अस्थियां गंगा में प्रवाहित कर सकेंगे और अच्छा ये भी है कि वे भारत की नागरिकता भी पा सकेंगे। जहां तक जावेद अख्तर या राजनीतिक लोग caa को गलत आईने में देखते हैं तो ये उनकी समस्या है क्योंकि इस देश के ज्यादातर लोग अब सही बात को सही तरीके से देखते और समझते हैं। जिसे वो बैलेट पेपर में व्यक्त करता है जबकि बाकी लोग शोर मचाने में लगे रहते हैं जिसे आज मतदाता सुनता ही नहीं है
आलोक भाई, आपने सटीक टिप्पणी की है। हार्दिक आभार।
डायबिटीज के स्नातक आपको ग्यान देते होगें करेला का रस पीलो मेथी के दाने उगा कर खालो.भेडी का पानी .याने आपके मसाला डब्बा को डायनिंग टेबल पर स्थापित कर ले.
कहते हैं चदन का लगाना सर दर्द के लिए मुवाफिक, पर चंदन का घिसना और लगाना भी दर्दे सर है. अब आप अपना ख्याल
रखिए.
पुष्पा जी यह टिप्पणी किसी अन्य संपादकीय के बारे में है, जो यहां आ गई है। फिर भी आभार।
एक जबरदस्त विषय पर सम्पादकीय
जब सभी धर्म अपने देश में अपने तरीके से अंतिम संस्कार करते हैं तो हिंदुओं को भी अपने देश में अपनी गंगा ढूंढनी चाहिए । पर्यावरण को संतुलन में रखने की बात जाने कब सोचेगा मनुष्य ।
जब पांच तत्वों से शरीर निर्मित है तो ये तत्व पूरी धरा पर मौजूद हैं अतः मुक्ति का मार्ग भी हमारे आसपास है ।अब तो भारत में भी गंगा को स्वच्छरखने पर सोचा जा रहा है ।राम करे गंगा बची रहे ।
Dr Prabha mishra
प्रभा जी, हिंदू धर्म की एक ख़ासियत यह भी है कि हम आस्था में भी रास्ता खोजने का प्रयास कर सकते हैं। आभार।
बहुत बढ़िया संपादकीय लिखा है लाखों लोगों की आस्था इससे जुड़ी हुई है और आस्था में राजनीतिक हालात किस प्रकार रोड़े अटका रहे हैं यह भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
आपकी लेखनी को सलाम
डॉ. मुक्ति हार्दिक आभार।
सदा की भांति एक अनन्य विषय पर आपका संपादकीय पढ़ने को मिला। बाहर बसे हिंदुओं की समस्या तो है ही। खास कर ऐसे देश में जहां हिंगुओं को कुचला जा रहा हो। ऐसे में अस्थियों के विसर्जन हेतु दस दिनों का वीसा सचमुच राहत की बात है। इसका श्रेय चाहे कोई भी सरकार ले। यह कार्य तो वैसा ही है जैसे भारत मे बसे मुस्लिमों को हज का वीसा । भारत सरकार अगर हज के लिए सब्सिडी दे सकती है तो बाहर बसे हिंदुओं के अस्थि विसर्जन की भी कोई योजना अवश्य लानी चाहिए आखिर caa के अंतर्गत नागरिकता भी तो दे रही है।
सुरेश सर आपकी टिप्पणी हमेशा उत्साह बढ़ाती है। हार्दिक आभार।
विषय बहुत अच्छा उठाया है आपने।आज जब सांस्कृतिक भटकाव में आदमी की संवेदनाएं तार-तार हो रही हैं। पिता -पुत्रों में दूरियां बढ़ रही हैं, अंतिम संस्कार में भी दूर देश से फोन आता है ,दाह संस्कार करवा दीजिए हम बाद में आएंगे। अस्थियों को संभालने की बात तो वह सोचता ही नहीं ।गरीब आदमी की तो गंगा भी उसके आसपास ही है।यह में भारत के संदर्भ में कह रही हूं। पाकिस्तान अथवा अन्य देशों के हिन्दुओं को भी अपनी सोच बदल लेना चाहिए गंगा कब तक अस्थियों को लेकर बहती रहेगी।आजकल तो विद्युत शवदाह गृह में अस्थियां भी राख हो जाती हैं। आपने बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है आवश्यकता इस बात की है, लोगों को जागरूक किया जाएं कि मन चंगा तो कठौती में गंगा।
कला जी आपने मुद्दे को अलग दृष्टि से देखा है। हार्दिक आभार।
हर बार की तरह इस बार भी बिल्कुल अलग विषय पर ही आपका संपादकीय रहा। संपादकीय के मामले में आप हमेशा ही हैरत में डाल देते हैं।
इस बार भी आपसे एक नई जानकारी मिली। दोहरी पाकिस्तान की दोहरी नागरिकता वाली।
गंगा और भारतीय आस्था एक दूसरे की पूरक हैं।अतः विदेश में रहने वालों के लिए यह प्रॉब्लम संभावित है। अस्थि संस्कार हमारे जीवन का अंतिम संस्कार रहता है इसलिए इसके प्रति गहरी संवेदनशीलता रहती है। मोक्ष मिलता है या नहीं मिलता है यह कोई नहीं जानता लेकिन क्योंकि ऐसा कहा जाता है इसलिए सभी ऐसी अपेक्षा करते हैं की मुक्ति प्राप्त हो और अस्थियों का विसर्जन गंगा में ही हो।गंगा के प्रति यह भावना तो बनी हुई है की अस्थि विसर्जन वहाँ पर करने से मोक्ष मिल जाता है हालांकि नर्मदावासी नहीं जाते। वे यहीं नर्मदा जी में ही विसर्जित करते हैं।पर समझने की जरूरत है। अस्थियों को किसी भी पवित्र नदी में विसर्जित कर दिया जाए। पर बात आस्था और विश्वास की है।
एक श्लोक हमें याद है। वास्तव में यह मंत्र है और जब हम छठवीं क्लास में थे तब हमने इसे याद किया था कोर्स में प्रसिद्ध नदियों को लेकर-
गंगा सिंधु सरस्वती च यमुना ,
गोदावरी नर्मदा ।
कावेरी सरयू महेंद्रतनया
चर्मणवति वेदिका।
क्षिप्रावेदवती महासुर नदी,
ख्याता च या गंडकी।
पूर्णापूर्ण जले
समुद्रसहिता कुर्वन्तु भो मंगलम्।
बाद में अक्सर बड़ी-बड़ी पूजा यज्ञ हवन में इस मंत्र का जाप करते हुए हमने सुना है।
यह सभी पवित्र नदियाँ है और इसमें विसर्जन किया जा सकता है लेकिन क्या करें! हम लोग अपने आस्थाओं से कुछ ज्यादा ही बँधे हुए हैं।
कुछ ऐसे हैं जो गया जी ही जाते हैं गंगा जी में विसर्जन के लिये।
पंचमुखी हनुमान जी के मंदिर के जो पुजारी थे उनके द्वारा हस्तियों का विसर्जन इतनी लंबी अवधि के बाद पढ़कर थोड़ा सा बुरा लगा।
अच्छा है कि पाकिस्तान से विसर्जन के लिए भारत आने का वीजा मिलना तय हुआ। आज का संपादकीय बेहद संवेदनशील विषय पर था।
वैसे हम एक ऐसे कवि को जानते हैं जिन्होंने अपने माता-पिता की अस्थियाँ अपने घर में रखी हुई हैं। (वह भगवान की पूजा में विश्वास नहीं करते )उनकी पूजा करते हैं हमने उनसे बहुत डिटेल में कभी नहीं पूछा लेकिन आपके संपादकीय को पढ़ने के बाद हम उनसे यह सारी बातें बहुत डिटेल में पूछेंगे। हो सकता है आप भी उनको जानते हों बहुत नामी हैं खुद भी है बात बताने में संकोच नहीं करते।पर यहाँ हम उनका नाम बिल्कुल नहीं लेंगे। उनका भरोसा सिर्फ विज्ञान है।
उम्मीद है कि अबकी बार हमारी टिप्पणी ने अपनी लंबाई को लेकर आपको परेशान नहीं किया होगा।
एक नए आश्चर्यजनक संपादकीय की प्रतिक्षा के साथ , अनेक नवीन जानकारी से पूरित इस संपादकीय के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया सर!
नीलिमा जी मै भी अपने आप को Agnostic मानता हूं। भगवान के अस्तित्व पर सवाल खड़े करता रहता हूं। मगर बाऊजी के श्राद्ध पर, और इंदु के जन्मदिन, बरसी और श्राद्ध पर मंदिर जाता हूं।
कल रात जब मैंने आप का संपादकीय पढ़ा तो एकदम हैरान हो गई क्योंकि कुछ ही दिन पहले मैंने इस विषय पर नेट पर काफ़ी मैटर पढ़ा था। यह लगभग फरवरी मिड की बात है… मैं बहुत हैरान थी कि कैसे अब तक इस बेहद संवेदनशील करूण महत्वपूर्ण मुद्दे पर किसी का ध्यान नहीं गया.. बात धर्म के साथ आस्था और मोक्षकी थी… मरने के बाद तो धर्म और जाति की बेड़ियाँ टूट जाती है. पांच तत्व पांच तत्वों में मिल जाते हैं मात्र अवशेष शेष रह जाते.. उनके विसर्जन पर भी कानूनी पैबंद…. लेकिन आपके लिखे संपादकीय ने एक बार फिर आप की सतर्क लेखनी का मुरीद बना दिया आपने उनके लिए आवाज उठाई है जो अब अपने लिए आवाज नहीं उठा सकते थे…और संतुष्टि की बात है कि अब उन दिवंगत हिंदुओं की अस्थियों को भारत के हरिद्वार में विसर्जित किया जा सकेगा। नरेंद्र मोदी सरकार ने स्पॉन्सरशिप पॉलिसी में संशोधन किया है. संशोधन के बाद मृतक पाकिस्तानी हिंदुओं के परिवार के लोगों को 10 दिनों का ट्रैवल वीजा दिया जाएगा. वीजा के जरिए वह लोग अपने परिवार के सदस्यों की अस्थियों को हरिद्वार आकर पवित्र गंगा में विसर्जित कर पाएl नरेंद्र मोदी सरकार की स्पॉन्सरशिप पॉलिसी में संशोधन के बाद ऐसा पहली बार होगा, जब 426 पाकिस्तानी हिंदुओं की अस्थियों को उनके परिवार के लोगों के द्वारा हरिद्वार में गंगा नदी में विसर्जित किया जाएगा. वर्तमान में ये अस्थियां कराची के कुछ मंदिरों और श्मशान घाटों और अन्य जगहों पर रखी हुई हैं.
l.“यह हम सभी के लिए स्वागत योग्य समाचार है। कराची के श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर के राम नाथ महाराज ने बुधवार को कहा, भारतीय उच्चायोग हमें अपने मृतकों का अंतिम संस्कार करने के लिए हरिद्वार जाने के लिए भारत से प्रायोजन प्राप्त करने के लिए नहीं कहेगा
एक बार पुनः एक सतर्क संपादक और सचेत साहित्यकार की कलम से निकले अलग से संपादकीय के लिए साधुवाद।
किरण जी आपने इस विषय पर पहले ही कुछ पढ़ रखा था, जान कर अच्छा लगा। हमारी पुरवाई के पाठक सचेत भी हैं और सक्रिय भी। हार्दिक आभार।
अब ये एक और कमाल का विषय। कहाँ से आप खोज लाते हैं !!! यह आस्था से जुड़ा अति सम्वेदनशील विषय है। यों तो हर नदी पवित्र है, किन्तु गंगा हृदय में, विचारों में, रोम-रोम में रची-बसी है। मृत्यु के बाद भी गंगा जैसी माँ की गोद में जाने का सुख आत्मा को मिलता होगा, मुझे ऐसा महसूस होता है। यों मृत्यु के परे का विज्ञान अनिर्वचनीय है।
जो भी हो, अब वीज़ा मिलने लगा तो न जाने कितनी आत्माओं को तृप्ति मिल गई होगी।
अस्तु। ये जानकारी हमारे जैसे पाठकों के संज्ञान में लाने के लिए आपको जितना साधुवाद दिया जाए, कम है।
आदरणीय शशि मैम, आपको संपादकीय पसंद आया जान कर उत्साह बढ़ा। प्रयास रहता है कि पाठकों तक कुछ न कुछ नया पहुंचाया जाए।
मानवीयता को पास से देखकर लिखा गया शानदार और दमदार आलेख जो आदर्श पत्रकारिता के मानकों को याद करता हुआ /दिलाता हुआ संपादकीय है।पाकिस्तान ने अल्पसंख्यकों की स्थिति को बताता और सियासत को आईना दिखता एक साहसिक व्यक्तित्व का संवेदना जागता संपादकीय आलेख।
यही आलेख अगर किसी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में से किसी एक में भी शाया /प्रकाशित होता तो अब तक प्रतिक्रियाओं का अंबार लगा होता।
पाकिस्तान का दमघोंटू रवैया सेना जनित राजनीति और कठमुल्लापन बेहद शर्मनाक है।
कुछ कुछ यहां/सरहद पार की सियासत भी जिम्मेंदार है।
मानवाधिकार संगठन भी सो गए हैं।तब तेजेंद्र जी का आलेख आंधी में जलते दिए सा है।
भाई सूर्य कांत जी आपकी टिप्पणी स्नेह से परिपूर्ण है। हार्दिक आभार।
संवेदनशील विषय पर हृदयस्पर्शी आलेख। आस्थायें, संस्कृति से किसी भी व्यक्ति का इतना जुड़ाव होता है कि वह चाहे विश्व के किसी कोने में क्यों चला जाये, उसकी आस्थाएं नहीं बदलतीं। मेरा तो मानना है कि जो लोग देश से बाहर जाते हैं वे अपने साथ देश से जुड़ी स्मृतियों के साथ अपने संस्कार और आस्थाएं भी ले जाते हैं और उसे पूरी शिद्दत से अपनी संतत्ति में रोपने का प्रयत्न करते हैं लेकिन पाकिस्तान की बात अलग है, विभाजन ने ऐसी त्रासदी को जन्म दिया जो नासूर बन गई है जिसने भाई -भाई को अलग कर दिया। वहां बसे हिंदू तो अभी भी भारतीय हैं। काश! सरकारें उनकी भावनाओं को समझ पातीं!! अब सरकार CAA लेकर भी आई है तो कुछ राजनीतिक पार्टियां अपनी तुष्टिकरण की राजनीति के कारण इसका विरोध कर रही हैं। आखिर कब यें लोग इनकी व्यथा समझेंगे। जहाँ तक जैन, सिख एवं बौद्ध का प्रश्न है, इनका मुलाक़ात धर्म तो हिंदू ही है, ये इनकी शाखाएं हैं। आज से नहीं वर्षो से जैन और अग्रवालों में विवाह सम्बन्ध होते आये हैं। जहाँ तक सिख धर्म की बात है हमारे एक मित्र सरदार जी थे, अब वे नहीं रहे, उन्होंने बताया था कि जो हिंदू सिख धर्म को मानते हैं, अगर उनके दो बेटे होते हैं तो वे अपना एक बेटा गुरु को देते हैं, वह पगड़ी पहनता है जबकि दूसरा सामान्य हिंदू रीति रिवाजों को मानता है।
पाकिस्तान में रखी अस्थियों को गंगा नदी में विसर्जन करने की अनुमति अवश्य मिलनी चाहिए। शायद आपका आलेख पढ़कर सरकार इस दिशा में कोई कदम उठाये। आज के आलेख के लिए आपको बधाई।
सुधा जी वर्तमान सरकार ने अब दस दिन का अस्थि विसर्जन वीज़ा देने का निर्णय ले लिया है। हार्दिक आभार आपकी टिप्पणी के लिये।
बहुत ही संवेदनशील विषय पर बात करने के लिए साधुवाद आपको। ये सही बात है कि ऐसे विषयों को राजनीति से दूर, मानवीय दृष्टिकोण से देखना समझना चाहिए।
हार्दिक आभार शिवानी।
भारत सरकार महान लोकतंत्र होने का दावा करती है लेकिन वे पाकिस्तानी हिंदुओं को वीजा नहीं देकर उन्हें उनके धार्मिक अधिकारों से वंचित कर रही है.’
संपादकीय मानवीय मूल्यों पर आधारित है और ऐसी खबर भी है यह जिस पर भारतीय मीडिया ने ध्यान नहीं दिया। ध्यान तो उन्होंने करोड़ों के इलेक्ट्रॉल बॉन्ड पर भी नहीं दिया। ध्यान तो उन्होंने 90% विकलांग दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जी एन साईं बाबा को दो दो बार बाइज्जत बरी होने पर भी नहीं दिया। वर्तमान सरकार का ध्यान केवल और केवल 400 पार का है। उसके लिए चाहे जो करना पड़े उन्हें।
यह अस्थि विसर्जन क्या चीज है फिर उनके लिए। आप लीक से हटकर मुद्दा लेकर आए हैं और हमें भी कुछ नया पढ़ने को मिला है शुक्रिया इस बात के लिए आपका सर।
तेजस आपका ग़ुस्सा वाजिब नहीं है। संपादकीय में मैंने लिखा है कि अंततः वर्तमान भारत सरकार ने दस दिन का अस्थि विसर्जन वीज़ा देने का निर्णय ले लिया है।
जी अस्थि विसर्जन के लिए वीज़ा देना शुरू कर दिया है यह पढ़ा मैंने। अच्छी खबर है लेकिन इसकी सत्यता की पुष्टि भी तो नहीं हुई है संपादकीय में आदरणीय सर। बाकी गुस्सा तो अन्य फैसलों पर है।
सच में , बहुत ही दुखद है परन्तु ये भी सत्य है तेजेन्द्र जी कि इस प्रकार की समस्या से मैं अनभिज्ञ थी |
मैं महाराष्ट्र में रहती हूँ और पिताजी सेना में थे तो देश के अन्य कई राज्यों में रही हूँ | स्थनीय लोग अक्सर अपने परिजनों की अस्थियां शहर के पास बहने वाली नदियों में ही विसर्जित कर देते हैं | गंगा में अस्थि विसर्जन के लिए जाना सामान्यतः उत्तर भारतीय समुदाय द्वारा ही किया जाता है | बड़े-बुजुर्गों के इमोशंस भी मायने रखते हैं पर इतने वर्षों तक अस्थियों को सहेजना। क्या कहूँ !
ये जानकार अच्छा लगा कि भारत सरकार द्वारा इस प्रकार का वीसा देने का निर्णय लिया गया है | ईश्वर से बस यही माँगती हूँ की ये बैर ख़तम हो , शांति हो |
एक और अच्छे सम्पादकीय लेखन के लिए आपको साधुवाद |
नंदिता साहू
नंदिता जी आपने समस्या को एक नये ढंग से देखा है। हार्दिक आभार।
पर्यावरण नियंत्रण बोर्ड , अन्तर राष्ट्रीय पर्यावरण संघ, संयुक्त राष्ट्र संघ एवम भारत सरकार पर्यावरण नियंत्रण के आदेशों का पालन करते हुए नदियों का पानी प्रदूषित होने से बचाने के लिए, सब नदियों में अस्थि प्रवाहित कर विसर्जन करने के लिए प्रतिबन्ध लगा दिया गया है।
इसके स्थान पर सब नदियों के विसर्जन घाट पर अस्थि कुण्ड बनवाए गए हैं। अब कानूनी तौर पर अस्थियां नदियों में नहीं बहाई जा सकती। अस्थियों को अब वैकल्पिक कुण्ड में विसर्जित करना अनिवार्य है। ताकि सब नदियों का पानी प्रदूषित होने से बचाया जा सके। अतः अब अस्थियां कहीं भी कुण्ड में विसर्जित की जा सकती हैं।
आपने संपादकीय से इतर अपनी बात कही है कैलाश भाई।
आपकी जानकारी को दाद देनी पड़ेगी। लिक से हटकर मुद्दा आपने उठाया। नया पढ़ने को और जानने को मिला। मैं भी बहुत खुश किस्मत हूं आप मुझे अलग से भेज देते हैं ताकि मैं पढ़ लूं। तबीयत खराब होने की वजह से पढ़ ही नहीं पाई आज ही पढ़ पाई । बहुत ही अद्भुत जानकारी। बहुत-बहुत धन्यवाद ऐसी जानकारियां देते रहें और हम अपने स्तर को ऊंचा उठाने की कोशिश करते रहें।
हार्दिक आभार भाग्यम जी। आप तबीयत न ठीक होने के बावजूद पुरवाई का संपादकीय पढ़ लेती हैं।
संवेदनशील विषय पर बढ़िया लेख
हार्दिक आभार संगीता जी।
नई जानकारी से युक्त बहुत बढ़िया संपादकीय। सदा की तरह ध्यानाकर्षक विचार।
मेरी चिंता यह कि सालों इंतजार के बाद 160 लोगों की अस्थियों के प्रवाह से गंगा जी की क्या हालात होगी? विश्व भर के लोग यहाँ ही क्यों बहाते हैं अस्थियां?
गंगा को बचाना है तो लोगों को खुद भी सोचना चाहिए। सरकार सोचेगी तो बात बिगड़ जाएगी।
शायद आप को याद नहीं कि हिन्दू धर्म में ही अस्थि विसर्जन का प्रावधान है। हरिद्वार में हमारे पुरखों के नाम वहां रजिस्टरों में लिखे हैं। जब मृत्यु रजिस्टर करवाने की सुविधा नहीं थी, यही एक तरह का रजिस्ट्रेशन होता था।
हरिद्वार में पुरखों के नाम रजिस्टर में लिखे हैं, यह बात आश्चर्यजनक लगी। यह हमें नहीं पता था।
हालांकि गंगा जहां भी है अस्थि विसर्जन वहां भी हो सकता है लेकिन फिर भी कुछ लोग गंगा के किसी खास स्थान पर जाने की रीत निभाते हैं। कई लोग गया जी भी जाते हैं,
जी मैं जब अपने पिता जी की अस्थियां लेकर वहां गया था तो हमारे पुरोहित के पास मेरे पड़दादा जी, दादा जी और पिता जी के हस्ताक्षर वहां मौजूद थे – एक ही पृष्ट पर।
यह प्रमाण है कि आपकी बातों में तथ्यगत सच्चाई कितनी अधिक है। सलाम आपको।
बहुत मार्मिक ।इस विषय पर दुख भरे असमंजस के सिवा कुछ अनुभव ही नहीं होता. संवेदनशील मनुष्य छटपटाहट से दो-चार हो समझ नहीं पाता कहें क्या.हिंदू जिनोसाइड का यह श्रैण्य आलेख है।इस पर कहना बहुत है पर कह नहीं पा रही।आपने यह आंकडों के साथ शब्दबद्ध कर एक महान दायित्व का निर्वाह किया है.आभार। अभिनंदन.
हार्दिक आभार क्षमा जी।
भाग्यम शर्मा जी के अनुसार मैं भी आप का शुक्रगुज़ार हूँ की आप लिक से हटकर मुद्दे उठाते रहते हैं। आप की शोध दृष्टि को मानना पड़ेगा। नया पढ़ने और जानने को मिलता रहता है। मैं भी बहुत खुश किस्मत हूं की आप मुझे अलग से भेज देते हैं। बहुत ही अद्भुत जानकारी। बहुत-बहुत धन्यवाद।
हार्दिक आभार अंसारी भाई।
महत्वपूर्ण और मार्मिक विषय पर आपकी गहरी अभिव्यक्ति