पुरवाई परिवार को पूरा विश्वास है कि विपक्षी दलों के नेताओं ने जो बयान विदेशी धरती पर दिए हैं, भारत में वापस आने के बाद वे उन पर क़ायम रहेंगे। कहीं ऐसा न हो कि उनके राजनीतिक दलों के मालिक उन पर दबाव डालें और फिर ये भी राहुल गाँधी के सुर में सुर मिला कर – ‘नरेन्दर सरेंडर’ का गीत दोहराने लगें…
मुझे याद है कुछ समय पहले मुझे एक वरिष्ठ पत्रकार-साहित्यकार ने भारत से फ़ोन पर बात करते हुए कहा था, “तेजेन्द्र जी, आपको ध्यान देना होगा। आपकी छवि बहुत ज़्यादा राष्ट्रवादी होती जा रही है!” और मैं सन्नाटे में रह गया कि क्या किसी की छवि राष्ट्रवादी होना कोई नकारात्मक स्थिति है? यदि मैं भारत के लिए सोचता हूँ, तो क्या कोई अपराध कर रहा हूँ?
कुछ ऐसी ही स्थिति वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सलमान ख़ुर्शीद के साथ पैदा हो गई है। उनका एक सवाल हम तमाम भारतवंशियों को सोच में डाल देता है। सलमान ख़ुर्शीद ने दरअसल भारत सरकार द्वारा गठित बहुदलीय संसदीय मंडल के प्रतिनिधि सदस्य के रूप में इंडोनेशिया में अपने एक साक्षात्कार में कश्मीर में धारा 370 को हटाने को सही बताया और जम्मू-कश्मीर में हो रहे विकास की तारीफ़ कर दी। बस इसके बाद उनकी ट्रोलिंग शुरू हो गई।
इस पर सलमान ख़ुर्शीद ने अपने सोशल मीडिया एक्स पर 2 जून को लिखे गए एक पोस्ट में विदेश दौरे के समय भारत में उनकी राजनीतिक निष्ठा पर उठ रहे सवालों का जवाब इशारों-इशारों में दिया। उन्होंने लिखा कि जब वे आतंकवाद के खिलाफ़ भारत के मिशन का संदेश दुनिया तक पहुँचा रहे थे, तब उनकी राजनीतिक निष्ठा को लोग अपने घर में बैठकर कैल्कुलेट कर रहे थे… यह दुःखद है। उन्होंने आखिर में एक सवाल किया कि क्या देश भक्त होना इतना कठिन है!
सलमान खुर्शीद ने कहा, राहुल गाँधी के जो सवाल हैं, मैं उनसे सहमत हूँ… साथ ही उन्होंने इस बात को भी साफ़ कर दिया कि मैं कांग्रेस में हूँ। सलमान खुर्शीद ने पूछा, कि बार-बार मेरे कांग्रेसी होने पर सवाल क्यों उठाए जा रहे हैं? देशभक्त और कांग्रेस भक्त, दोनों एक साथ क्यों नहीं हो सकते?
उन्होंने स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकार ने हमें भेजा था, वहाँ हमने पूरी दृढ़ता के साथ देश की बात रखी। आतंक के खिलाफ अपनी बात रखी… और अपने मकसद में हम कामयाब रहें।
भारत सरकार ने ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ के बाद बहुदलीय संसद सदस्यों के सात दलों को विश्व के अलग-अलग देशों में भेजा, ताकि वे भारत और पाकिस्तान के बीच आतंकवाद को लेकर चल रहे तनाव के बारे में भारत का पक्ष रख सकें।
बैजयंत पांडा के नेतृत्व में पहला ग्रुप सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन और अल्जीरिया गया। इस ग्रुप में निशिकांत दूबे (भाजपा), रेखा शर्मा (भाजपा), असदुद्दीन ओवैसी (एआईएमआईएम), एस. फांगनोन कोन्याक (भाजपा), सतनाम सिंह संधू (मनोनीत) और गुलाम नबी आजाद (डीपीएपी) शामिल हैं। इनके साथ राजनयिक हर्षवर्धन शृंगला भी थे।

दूसरा दल रविशंकर प्रसाद के नेतृत्व में यूके, फ्रांस, जर्मनी, इटली और डेनमार्क में भारतीय पक्ष प्रस्तुत करने के लिए गया। इस ग्रुप में डी. पुंडरेश्वरी (भाजपा), प्रियंका चतुर्वेदी (शिव सेना – उद्धव), गुलाम अली खटाना (मनोनीत) डॉ. अमर सिंह (कांग्रेस), समिक भट्टाचार्य (भाजपा) और एम जे अकबर (मनोनीत) शामिल हैं। इनका साथ दिया, राजनयिक पंकज सरन ने।
तीसरा ग्रुप जनता दल यूनाइटेड के संजय कुमार झा के नेतृत्व में इंडोनेशिया, जापान, कोरिया, सिंगापुर और मलेशिया की यात्रा पर निकला। इस ग्रुप में अपराजिता सारंगी (भाजपा), बृजलाल (भाजपा), डॉ. जॉन ब्रिटास (सीपीआई-एम), प्रदान बरुआ (भाजपा), हेमांग जोशी (मनोनीत) और सलमान खुर्शीद (कांग्रेस) शामिल थे। इनके साथ राजनयिक मोहन कुमार रहें।
चौथा ग्रुप संयुक्त अरब अमीरात (UAE), लाइबेरिया, कांगो गणराज्य और सिएरा लियोन पहुँचा, जिसका नेतृत्व कर रहे थे, श्रीकांत एकनाथ शिंदे (शिवसेना शिंदे ग्रुप)। इस ग्रुप में बांसुरी स्वराज (भाजपा), ई.टी. मोहम्मद बशीर (इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग), अतुल गर्ग (भाजपा), सस्मित पात्रा (बीजू जनता दल), मनन मिश्रा (भाजपा) और एस.एस. अहलूवालिया (भाजपा) शामिल थे। इनका साथ दिया, राजनयिक सुजन चिनॉय ने।
पाँचवाँ और सबसे चर्चित दल रहा, शशि थरूर के नेतृत्व वाला ग्रुप। इस ग्रुप ने अमेरिका, पनामा, ब्राज़ील, कोलंबिया और गुयाना में भारत का पक्ष रखा। इस ग्रुप में शंभवी (लोक जनशक्ति दल), डॉ. सरफराज अहमद (झारखंड मुक्ति मोर्चा), जी.एम. हरीश बालयोगी (तेलुगू देशम पार्टी), शशांक मणि त्रिपाठी (भाजपा), भुवनेश्वर कालिता (भाजपा), मिलिंद देवड़ा (शिव सेना – उद्धव) और तेजस्वी सूर्या (भाजपा) शामिल रहें। इनका साथ दिया, राजनयिक तरनजीत सिंह संधू ने।
डी.एम.के. पार्टी की कनिमोझी करुणानिधि के नेतृत्व में छठा ग्रुप स्पेन, ग्रीस, स्लोवेनिया, लातविया और रूस पहुँचा। इस ग्रुप के सदस्य थे, राजीव राय (समाजवादी पार्टी), मियां अल्ताफ अहमद (नेशनल काँफ़्रेस), कैप्टन ब्रजेश चौटा (भाजपा), प्रेमचंद्र गुप्ता (राष्ट्रीय जनता दल) और अशोक कुमार मित्तल (आम आदमी पार्टी) । इनके साथ दो राजनयिक रहें – मंजीव एस पुरी और जावेद अशरफ़।
सुप्रिया सुले (एन.सी.पी.) के नेतृत्व में सातवां ग्रुप मिस्र, कतर, इथियोपिया और दक्षिण अफ्रीका में भारत का पक्ष रखने पहुँचा। इस ग्रुप में राजीव प्रताप रूड़ी (भाजपा), विक्रमजीत सिंह (आम आदमी पार्टी), मनीष तिवारी (कांग्रेस), अनुराग ठाकुर (भाजपा), लवू श्रीकृष्ण देवरायलू (तेलुगू देशम पार्टी), आनंद शर्मा (कांग्रेस) और वी. मुरलीधरन (भाजपा) शामिल रहें। इनके साथ टीवी पर लोकप्रिय चेहरा रहें राजनयिक सैयद अकबरुद्दीन थे।
कांग्रेस के नेता शशि थरूर, सलमान ख़ुर्शीद, मनीष तिवारी और आनंद शर्मा पर अतिरिक्त दबाव रहा, क्योंकि उनके राष्ट्रीय नेता राहुल गाँधी तो ‘नरेन्दर सरेंडर…!’ ‘कितने विमान गिरे?’ और डॉनल्ड ट्रंप का राग अलाप रहे थे; जबकि उनके चार वरिष्ठ नेता पाकिस्तान के विरुद्ध विश्व भर में भारत का पक्ष रख रहे थे।
इंडी गठबंधन के बारे में सोच कर, तो यही लग रहा है कि क्या अब इसका कोई अस्तित्व बचेगा, अथवा इसका श्राद्ध हो चुका है! सच तो यह है कि आम भारतीय भी अब इन चार वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ विपक्ष की प्रियंका चतुर्वेदी, सुप्रिया सुले, मिलिंद देवड़ा की बातें सुन कर हैरान हो रहे थे। हैरानी तो इस बात की भी थी, कि इन संसदीय दलों में इंडियन यूनियन, मुस्लिम लीग, सीपीआई एम, और आम आदमी पार्टी के नेता भी शामिल थे।
शशि थरूर के बाद संसदीय दलों के सबसे अधिक मुखर नेता रहें, एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन औवेसी। पाकिस्तान पर बरसते हुए ओवैसी ने कहा, “पाकिस्तान को इस्लाम का मतलब ही नहीं पता। अगर वह इस्लाम को मानता, तो आतंक नहीं फैलाता।’ उन्होंने पूर्व पाकिस्तानी प्रधान मंत्री बेनज़ीर भुट्टो की हत्या का ज़िक्र करते हुए कहा, कि पाकिस्तान ने उनके हत्यारों को बचाया। ओवैसी ने ज़ोर देकर कहा कि, ‘पाकिस्तान की बातों को मैं जूते की नोंक पर रखता हूँ।”
ओवैसी ने गल्फ देशों के सामने पड़ोसी पाकिस्तान को बेनकाब किया। चार देशों के दौरे पर गए, ओवैसी ने गल्फ़ देशों को बताया कि पड़ोसी मुल्क कई वर्षों से भारत में आतंकवाद फैला रहा है। अपने संबोधन में ओवैसी ने पहलगाम आतंकी हमले से पहले 15 अप्रैल को पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर की ओर से दिए गए भड़काऊ भाषण का भी जिक्र किया।
पुरवाई पत्रिका के लिए यह कह पाना संभव नहीं कि इन सात दलों को सरकार ने किस प्रकार की सलाह दी है या निर्देश दिए हैं। क्या वे वापस आने के बाद अपनी रिपोर्ट भारत सरकार को सौंपेंगे या फिर वे ख़ुद एक प्रेस काँफ़्रेंस करके भारतीय जनता को अपनी उपलब्धियों के बारे में सूचना देंगे।
वैसे कोलंबिया ने शशि थरूर की बातें सुनने के बाद पाकिस्तान के पक्ष में दिए गए अपने वक्तव्य को वापस ले लिया और आतंकवाद के विरुद्ध अपनी आवाज़ को भारत के साथ जोड़ दिया।


नमस्कार
प्रवासी हो गए तो क्या देश के लिए प्रेम होना चाहिए ।
उम्दा सामग्री है सम्पादकीय में ।भारत के पत्रकारों के बीच भी इसी मुद्दे पर चर्चा जारी है।
Dr Prabha mishra
हार्दिक धन्यवाद डॉ प्रभा जी।
शोध परख आलेख
भारत की विडंबना यह है कि लोग देश से नहीं पार्टी और व्यक्ति के प्रति निष्ठा रखते हैं।
सरकार की यह पहल एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है जो पाकिस्तान के झूठ को सबके सामने लाने में सफल रही है।
आभार
इस सार्थक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद गीता जी।
बहुत बढ़िया आपने मेरी मन की बातें लिख दी मुझे बहुत अच्छा लगा। मेरे मन में यही बात है आ रही थीं।
मुझे हमेशा आपका संपादकीय पढ़कर बहुत अच्छा लगता है। बधाई हो।
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय भाग्यम जी।
आदरणीय संपादक जी
इस समय भारत में विपक्ष की जो राजनीतिक स्थिति है वह अत्यंत सोचनीय और चिंता जनक है। धार्मिकता राजनीति और पारंपरिकता में क्या अंतर है यह विपक्ष भूल चुका है ।उनकी दृष्टि केवल सत्ता पाने पर है ।
कौन सी सोच समाज के लिए विघटनकारी है इससे उनका कोई मतलब नहीं है। तनिक सी भी सामाजिक समझ रखने वाले व्यक्ति को ऐसा लगता है कि विपक्ष को सरकार की कमियों की ओर ध्यान दिलाना चाहिए परंतु इस समय का विपक्ष कमियों को तो छोड़िए उनके सकारात्मक कदमों की भी छीछालेदर करने में लगा रहता है, जिससे सत्ता पक्ष को नुकसान कम होता है और विपक्ष अपना ही जनाधार खोता चला जा रहा है। यह सचमुच प्रजातंत्र के लिए अत्यंत सोचनीय दशा है कि विपक्ष हो ही ना क्योंकि वर्तमान में विपक्ष केवल शत्रु की भूमिका निभा रहा है। जब मेरे बच्चे बड़े हो रहे थे तब उनको धर्म, भाषा ,प्रदेश,संस्कृति आदि में भेद करना सीखना थोड़ा कठिन था परंतु वे इन सब के बीच की रेखा को बहुत जल्दी ही समझ गए परंतु विपक्ष के नेता इस आयु तक भी इन चीजों में कोई भेद नहीं कर पाते हैं। सबसे बड़ी बात तो देश शब्द ही उनके लिए बेमानी है वह केवल सत्ता और मात्र धन और सत्ता चाहते।हैं जिन्हें ,’देश :का ही अर्थ न पता हो वे भला ‘देशभक्ति’ क्या समझना चाहेंगे!
सरोजिनी जी, आपने संपादकीय को लेकर कुछ अहम मुद्दे उठाए हैं। विपक्ष को लेकर आपकी टिप्पणी उल्लेखनीय है।
दल से पहले देश होता है और देश से ही दल हैं। इस मौके पर देश के उन विभिन्न दलों के प्रतिनिधियों की भूमिका सराहनीय है। औवेसी चाहे जैसे भी बोलते रहे हों लेकिन आपरेशन सिंदूर के बाद उनकी भूमिका राष्ट हित में ही रही है।
जहां तक सवाल राहुल गांधी का है वे एक अपरिपक्व सांसद हैं और अच्छे राजनीतिज्ञ तक नहीं हैं। नरेन्द्र सरेंडर की बात पर कहना है कि वे शायद प्रधानमंत्री की कॉल टेप कर रहे थे या फिर उस जगह उपस्थित थे। सिर्फ इन्ही के कारण कांग्रेस पार्टी अपना स्थान खोती जा रही है।
रेखा जी स्पष्टवादिता से भरपूर टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
‘क्या देशभक्त होना इतना मुश्किल है..?’ यह संपादकीय राजनीतिक घटनाक्रमों में बार-बार आ रहे बदलावों की उपज है। आपरेशन सिंदूर के संदर्भ में भारतीय डेलीगेशन विश्व के विभिन्न देशों में आतंकवाद के विरुद्ध भारत का पक्ष रखने गए हुए हैं। इन सभी ने भारत का पक्ष मजबूती से रखा है। जिसमें थरूर साहब और ओवैसी जी हीरो बनकर उभरे हैं। आज वे इस स्तर के हीरो बन गए हैं कि भारत की जमीं पर लैंड करते ही उन पर पुष्पों की बरसात होगी। उनके घर तक फूल बिछा देंगे लोग।
रही बात कि वे अपनी बात पर कायम रहेंगे या नहीं तो मुझे लगता है कि ओवैसी जी और थरूर जी डिगने वाले नहीं हैं। बाकी के अन्य भारी टेंशन और परीक्षण से होकर गुजरेंगे।
देशभक्ति जन्मजात होती है। इसका प्रशिक्षण नहीं लेना पड़ता है। रही विचारधाराओं की बात तो ये फलती-फूलती रहती हैं। हमारी विचारधाराएं अलग हो सकती हैं पर देश का स्वाभिमान एक रहना चाहिए।
आपके लिए राष्ट्रवाद का तमगा बुरा नहीं है। राष्ट्रवाद खून में होता है। और जब वह उबाल मारता है तो संपादकीय ऐसे ही निकलती है।
विपक्ष जो कर रहा है उनके हिसाब से बुरा नहीं है। वे लगातार विपक्ष में बैठने के लिए नहीं बने है। उन्हें भी सत्ता चाहिए। लेकिन मुझे नहीं लगता है कि इन बयानों से उन्हें कुछ लाभ होने वाला है। मोदी सरकार के लिए ये बयान बहुत अनुकूल है। विपक्ष समझ नहीं पा रहा है। इन बयानों से भाजपा ही नहीं जनता भी भड़की हुई है। विपक्ष जितनी जल्दी इससे उबर जाए उसके लिए उतना अच्छा है।
समसामयिक विषयों पर आपकी संपादकीय बहुत रोचक होती है। बढ़िया संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर
आपने सही कहा “देशभक्ति जन्मजात होती है”। आपने संपादकीय के हर पहलू को ख़ूबसूरती से खंगाला है। हमेशा की तरह सार्थक और सारगर्भित टिप्पणी। हार्दिक आभार।
बेहतरीन शानदार सार्थक अभिव्यक्ति
धन्यवाद भावना।
क्या देश भक्त है होना कठिन है!?!?
अब सियासत और नीति में टकराव है।सियासत है कि मानती नहीं?!? पक्ष और विपक्ष एक जुट होकर खड़े नहीं हो पा रहे,,यही सियासत है।
नीति पालन ने देश भक्ति को जज़्बा तो पैदा कर दिया।जिसमें औवेसी साहब का कमाल जमाल पैदा कर रहा और साथ ही साथ यह विश्वास भी कि लोकतंत्र की नीति को जान मिली है।यही प्राण वायु तब और संजीवनी बनती है,जब सलमान खुर्शीद ,शशि थरूर सरीखे भारत का पक्ष दुनिया के देशों के सामने रखते है।
संपादक ने चाणक्य को भी संदर्भित किया है और सही किया है। कि क्या यह देश भक्ति का जज़्बा लौट कर भी कायम रहेगा या फिर भगवान राम के द्वारा महाबली बाली के मारे जाने पर सुग्रीव का विलाप और सब कुछ छोड़ जाने की बात कहना है।
एक और बात जिस पर तार्किक ,औचित्यपूर्ण और मानवीय संवेदनाओं की दृष्टि से एक सफाई सत्तापक्ष से आपेक्षित है कि राफेल या दूसरे हवाई जहाज में देश सेवा करते कितने पायलट्स का बलिदान हुआ।
यह तो हमारी सुस्पष्ट नीति और रीती भी है कि हम अपने शहीदों की शहादत को मुखर प्रखर और कृतज्ञ होकर सलाम करते है।
संपादकीय का अंतिम पैरा बहुत महत्वपूर्ण है और यही है सबसे बड़ा सवाल। देखने की बात होगी कि इन प्रतिनिधियों की यह वफ़ादारी राष्ट्र के प्रति यथावत रहेगी क्या। अलग नहीं तो संसद सत्र में सब साफ़ हो जाएगा।
भाई इंद्रजीत त्रिपाठी जी, आपने संपादकीय के अंतिम पैराग्राफ़ को रेखांकित करके संपादकीय के महत्व को दर्शाया है। हार्दिक धन्यवाद।
भाई सूर्य कांत जी अपने शहीदों को सलाम करने की हमारी नीति का हवाला देते हुए आपने बहुत से सवालों के जवाब दे दिए हैं। हार्दिक धन्यवाद।
यहां देश की कोई नहीं सोचता
बस मैं मूरी पार्टी मेरी कुर्सी और मेरा पैसा पावर
आपने जो चाणक्य नीतियां सुझाई वो शानदार है
हमेशा की तरह संग्रहणीय लेख
सोनिया जी, आपने एकदम सही कहा है।
आज देश का नेतृत्व कर रहे हर राजनेता ने दलीय मतभेदों से ऊपर उठ अंतर्मन की आवाज़ को स्वर दिया है, अपने उत्तर दायित्व को ईमानदारी से समझा है। कोई जातीयता, कोई दल, कोई मतवैभिन्य राष्ट्र से ऊपर नहीं है। आतंकवाद के खिलाफ ‘हम सब एक हैं’ का उद्घोष, राष्ट्रीय एकता का सशक्त दस्तावेज बनकर उभरा है।
हार्दिक धन्यवाद डॉ मधु जी।
प*अहोभाग्य है देशभक्त होना* …
आपका संपादकीय पढ़कर मुझे नब्बे के दशक का एक वाक्या याद आ गया।
तब मैं शिक्षण के साथ-साथ छोटीमोटी पत्रकारिता भी करता था। विद्यालय के गणतंत्र दिवस समारोह में किसी गुमनाम स्वाधीनता संग्राम सेनानी को आमंत्रित करने का विचार मन में आया। जनपद में कुछ गुमनाम स्वाधीनता सेनानी भी थे, जो सरकारी सूची में इंदराज नहीं थे। ऐसे ही एक अस्सी वर्षीय स्वाधीनता संग्राम सेनानी जो अंत्यज समाज के थे।जिनका घर गाँव के बाहर तालाब के किनारे था। जहाँ गाँवभर की गंदगी फेंकी जाती थी। कच्चे झोपड़े में वे रहते थे। उनसे मिलने उनके गाँव गया। मैंने उन्हें बताया कि आपको स्कूल में ध्वजारोहण के लिए बुलाने आया हूँ। उन्होनें आभार जता मना करते हुए कहा, मैं 15 अगस्त और 26 जनवरी को कहीं नहीं जाता हूँ।
घर पर ही ध्वजारोहण करता हूँ। यही मेरे घर में दो त्योहार मनते हैं। नये कपड़े और पकवान बनते हैं। बातों-बातों में उन्होंने अपना तामपत्र भी दिखाया। वे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में सैनिकों के कपड़ा धोने का काम करते थे। उन्हें कोई सरकारी सुविधा, पेंशन भी नहीं मिलती थी। मेरे सरकार को कोसने पर वे बोले, मैंने तो नेताजी के लिए काम किया और देश की सेवा की है। आज भी सेवा करने का जज्बा है। मुझे किसी सरकारी इमदाद की कोई ख्वाहिश नहीं है…
बाँस के टोकरे, डलिया आदि बनाने का पुस्तैनी काम बेटा करता है। उसी से गुजर बसर हो जाती है।
वे देश या सरकार खिलाफ कुछ भी नहीं सुनना चाहते थे..
ऐसी देशभक्ति को किसी सबूत, किसी तमगे आदि की जरूरत नहीं होती।
भाई तेजेंद्र जी!
आपकी संपादकीय बहुत स्पष्ट व बेवाक है। देश के भीतर हो या विदेश में कहीं भी देश की शान के खिलाफ बयानबाजी करना, देश की मानहानि करना निश्चित तौरपर यह उस देश के नागरिक के लिए बहुत बड़ा अभिशाप है और उसे देश का सच्चा नागरिक कहलाने में कोफ्त होती है।
हमारे विभिन्न राजनीतिक दलों के जो राजनेता विदेशी धरती पर भारत की एकता, अखंडता तथा ऑपरेशन सिंदूर की कामयाबी तथा आतंकवाद को बढ़ावा देनेवाले पड़ोसी पाकिस्तान को बेनकाब कर रहे हैं। उनकी इस सोच का देश विदेश में स्वागत हो रहा है।
भारत में आकर ये राजनीतिक लोग विदेशों में दिए अपने बयानों पर यदि कायम रहते पाते हैं, तो निश्चिततौर पर उन्हें किसी से भी देशभक्ति के प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं है, उस गुमनाम अस्सी वर्षीय स्वाधीनता संग्राम सेनानी की तरह…
उस अनाम 80 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी को नमन। उम्मीद है कि आपके अंतिम पैराग्राफ़ वाली बात सच निकल आए।
बहुत अच्छे उदाहरण के साथ महत्वपूर्ण टिप्पणी, बधाई और धन्यवाद राम शंकर जी
जी आपने सही कहा शैली जी।
भारत की राजनीति की यह विडंबना हो गई है कि अगर आप देशहित की बात करते हैं तो आपको संघी, भाजपाई, तथाकथित दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी और भी न जाने क्या क्या बता दिया जाता है। आज से लगभग तीन दशक पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव जी ने विपक्ष के नेता अटलबिहारी वाजपेयी जी को भारत का पक्ष रखने के लिए भेजा था और समूचे विपक्ष ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार की विदेश नीति का समर्थन किया था और पाकिस्तान के नापाक मंसूबों को ध्वस्त किया था लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि वहीं कांग्रेस आज विपक्षी दल के रूप में अपने कर्तव्यों का सम्यक निर्वहन नहीं कर रही है और न सिर्फ शशि थरूर, सलमान खुर्शीद जैसे अपनी पार्टी के नेताओं की दलीय निष्ठा पर सवाल खड़े कर रही है, बल्कि उसके तथाकथित सबसे बड़े नेता राहुल गांधी नरेंदर सरेंडर जैसी शब्दावली का इस्तेमाल कर पाकिस्तान को हम पर गोल करने का मौका दे रहे हैं। यह बेहद निंदनीय और अक्षम्य अपराध है, जिसकी भर्त्सना दबे स्वरों में विदेश भेजे गए विपक्षी नेता भी कर रहे हैं। अरे, इनसे बेहतर तो असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के नेता हैं, जो अपने नेता के पीछे खुलकर खड़े होकर देश प्रथम की बातें कर रहे हैं। इसी तरह शिव सेना उद्धव गुट को छोड़कर प्रायः अन्य सभी दलों ने भारत सरकार की विदेश नीति को मौन स्वीकृति दी है। कांग्रेस पार्टी का यह दुर्भाग्य है कि उसमें शशि थरूर और जयराम रमेश जैसे अनेक सुयोग्य नेताओं के होते हुए उसे राजमाता और युवराज के अघोषित नेतृत्व के पीछे मुँह बंद कर चलने को विवश होना पड़ रहा है और लगातार हार से वह पतन के गर्त में जा रही है। यदि उसके पास दमदार नेतृत्व होता तो नरेंद्र मोदी जी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री न बने होते और कांग्रेस एक मजबूत पार्टी के रूप में विपक्ष से सत्ता पक्ष की ओर जाती दिखाई देती लेकिन पंद्रह वर्ष के वनवास से कांग्रेस कोई सीख लेती नजर नहीं आती और देश विरोधी बयानों से फजीहत कराकर खुद के लिए गड्ढा खोद रही है। आपके संपादकीय में आपने जो पीड़ा व्यक्त की है, वह एक आम हिंदुस्तानी की भी पीड़ा है और यही आपके संपादकीय की सफलता है कि वह आम सरोकारों से इस प्रकार जुड़ता है कि लगने लगता है कि आप हमारे ही मन को बात कह रहे हैं। एक बेहतरीन संपादकीय के लिए आपको बधाई हो।
पुनीत भाई, आपने भारतीय विपक्ष को डिटेल में समझा और समझाया है। कांग्रेस अब भु नींद से जाग जाए तो बेहतर।
सलमान खुर्शीद का सवाल कि ‘क्या देशभक्त होना इतना कठिन है’ आपको राष्ट्रवादी होने के फोन आने की घटना से एकदम सही साबित हो जाता है। वाकई विपक्ष ने ये बड़ा ही घटिया नरेटिव सेट कर किया है कि देशभक्त होना, देश की बाते करना यानि बीजेपी का हो जाना, मोदी भक्त हो जाना, ऐसे में जब जनता इन्हें वोट नहीं देती तो इनके लिए जनता खराब हो जाती है या evm हैक हो जाती है जबकि दिमाग़ विपक्ष का खराब हुआ पड़ा है जो देशभक्ति या बीजेपी और भारत या मोदी में फर्क नहीं समझ पा रहा है ।
भाई आलोक जी, मामला बहुत पेचीदा हो रहा है। टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
महत्वपूर्ण विषय पर बेहतरीन लेख और सवाल तो बहुत ही विचारणीय है…
तात्कालिक मुद्दे पर आपका यह संपादकीय सहज ही स्पष्ट और बेबाक चर्चा करता है। निःसन्देह भारत के नेतृत्व करने के लिए गए प्रत्येक नेता ने इस बार राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भावना का परिचय दिया है, जो भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक शुभ संकेत है। हालाँकि आपका यह संशय भी ग़लत नहीं है कि विपक्ष के यही नेता क्या अपने कहे पर कायम रह पाएंगे? बहरहाल एक बात निश्चित है कि अब साधारण भारतीय भी इस बात को समझने लगा है कि किसी भी बड़े नेता का दिया गया वक्तव्य उसका स्वतंत्र विचार है या उसकी पार्टी विचारधारा का लिखित स्टेटमेंट।
सादर।
हार्दिक धन्यवाद संगीता।
विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस के चरित्र को बताते महत्वपूर्ण संपादकीय लिखने केलिए हार्दिक बधाई और धन्यवाद। आपके, ब्रिटिश नागरिक होने के बाद भी राष्ट्रवादी होने की छवि के लिए कुछ ‘ विशेष’ किस्म के लोगों को कष्ट होना स्वाभाविक है।
“देशभक्त और कांग्रेस भक्त, दोनों एक साथ क्यों नहीं हो सकते?” स्वाभाविक प्रश्न है। क्योंकि लन्दन में जन्मे ‘ए ओ ह्यूम’ की बनाईं पार्टी देशभक्त तो हो ही नहीं सकती। जो भारतीय कांग्रेस से जुड़े वो छद्म से भारतीय थे। राष्ट्रवादी नेता जैसे पटेल कुचल दिए गए, बोस जो कांग्रेस अध्यक्ष थे, उन्होंने 1939 में पार्टी छोड़ दी, हट्टेकट्टे लाल लाजपत राय लाठीचार्ज में घायल हो कर मर गए (डेढ़ हड्डी के गांधी का कभी बाल बांका नहीं हुआ, प्रश्न मन में बार-बार चोट करता है)। कांग्रेस में मुखर रहे गांधी, जो 45 साल की उम्र में 1915 में भारत आए स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने, 7 जून 1893 में उन्हें ट्रेन से उतारा गया था, उसकी चोट उभरी 1015 में? अतः बहुत से प्रश्न हैं, जिनका उत्तर शायद कभी भविष्य में मिले। गांधी के प्रिय नेहरू जो ब्रिटिश स्टाइल के so called राष्ट्रवादी थे।
बोस को इस्तीफ़ा देना पड़ा था क्योंकि गांधीजी ‘अबुल कलाम आज़ाद को अध्यक्ष बनाना चाहते थे। “मौलाना अबुल कलाम आज़ाद” अफग़ान उलेमाओं के ख़ानदान से ताल्लुक रखते थे जो बाबर के समय हेरात से भारत आए थे। उनकी माँ अरबी मूल की थीं और उनके पिता मोहम्मद खैरुद्दीन एक फारसी (ईरानी, नृजातीय रूप से) थे। मोहम्मद खैरुद्दीन और उनके परिवार ने भारतीय स्वतंत्रता के पहले आन्दोलन के समय 1857 में कलकत्ता छोड़ कर मक्का चले गए। जिन्होंने ख़िलाफत आन्दोलन का खुल कर समर्थन किया था। (खिलाफत आंदोलन (1919-22) ब्रिटिश भारत में भारतीय मुसलमानों द्वारा तुर्की के खिलाफ ब्रिटिश नीति और प्रथम विश्व युद्ध के बाद मित्र देशों की सेनाओं द्वारा ओटोमन साम्राज्य के नियोजित विघटन के खिलाफ शुरू किया गया एक राजनीतिक अभियान था।)
1962 का युद्ध, जैसे जानबूझ कर हारा गया था। 1971के युद्ध में मानेक शॉ जैसे का नेतृत्व था तो जीते। लेकिन शिमला समझौते के साथ जीत कर भी हार गए। इस युद्ध का सच “किस्सा कुर्सी का” (1978,निर्देशन अमृत नाहटा, जो भारतीय संसद के सदस्य थे, निर्माण बद्री प्रसाद जोशी ने किया था। जिसके सभी प्रिंट जब्त करके जला दिए गए थे)
आप सभी समझदार हैं, अतः “देशभक्त और कांग्रेस भक्त, दोनों एक साथ क्यों नहीं हो सकते?” इस प्रश्न का उत्तर स्वतः स्पष्ट है।
भारत के पक्ष को रखने वाली समितियों का गठन, केंद्रीय प्रशासन की योग्यता, स्पष्ट करता है।
रही बात विपक्ष की तो, 2014 के बाद उसका एक ही एजेंडा है, मोदी विरोध, मोदी जी चूंकि देशहित के काम कर रहे हैं तो,अंध मोदी विरोधी, देश विरोधी हो जाते हैं।
स्थिति बेहद चिन्ताजनक है। सेना के ऊपर प्रश्न चिह्न लगाना हृदय-विदारक है।
आज के समय में विपक्ष की भूमिका पर विमर्श आवश्यक है ताकि जनमानस को गुमराह होने से बचाया जा सके। ऐसे में आपका संपादकीय अत्यन्त महत्वपूर्ण है। पुनः हार्दिक धन्यवाद।
शैली जी आपने पुरवाई के पाठकों को संपादकीय में उठाए विषय की समस्या को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में परखा है। आपने बहुदलीय समितियों के गठन और विपक्षी दलों की मानसिकता को सही उजागर किया है।
आपके पत्रकार-साहित्यकार मित्र जिन्होंने कहा था कि तेजेन्द्र जी, आपको ध्यान देना होगा। आपकी छवि बहुत ज़्यादा राष्ट्रवादी होती जा रही है…और आज सलमान खुर्शीद के कहे शब्द कि राष्ट्र भक्त होना क्या इतना कठिन हो गया है, आज के तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग की मानसिकता को दर्शाते है। उनकी यह मानसिकता आज बहुसंख्यक वर्ग को भी दंश देती है। सच तो यह है कि अपने विरोधियों के लिए अंधभक्त शब्द भी इन्हीं लोगों ने गढ़ा है।
वैसे तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग की यह प्रतिक्रिया तो होनी ही है क्योंकि पिछले कुछ वर्षो की छोड़ दें तो हमारी सरकारों ने न तो चीन के विरुद्ध और न ही पाकिस्तान के विरुद्ध कोई कठोर कदम उठाये? चीन ने तिब्बत तो हथियाया ही, अरुणाचल प्रदेश पर भी अपना दावा ठोंकता रहा। पाकिस्तान को आधा कश्मीर भी दे दिया।
सेना को खुली छूट तो अभी दी गई है वरना एक वह दौर भी था कि कश्मीर में पत्थर चलते थे सेना को उनके विरुद्ध कार्यवाही करने की इजाजत नहीं थी। ऐसा क्यों और किसके इशारे पर हो भी प्रश्न चिन्ह है। वैसे कांग्रेस और उसके नेता राहुल गाँधी का व्यवहार आज भी न कहे बहुत कुछ कह देता है…वरना नरेंदर सरेंडर जैसी शब्दावली… वह भी विपक्षी नेता की!
आपने अपनी बात कहते हुए भारत द्वारा भेजे गये सभी डेलीगशन के सदस्यों की जानकारी तथा उनके भारत को प्रतिनिधित्व करने के न केवल इसके उद्देश्य के बारे में बताया है वरन शशि थरूर, ओवेसी तथा सलमान खुर्शीद के सकारात्मक दृष्टिकोण के बारे में बताते हुए उचित प्रश्न भी किया है कि क्या इन सांसदों का यही रुख भारत आने के बाद भी रहेगा?
जानकारी भरे आइना दिखाते सारगर्भित आलेख के लिए साधुवाद।
सुधा जी, आपने संपादकीय को तटस्थता एवं गहराई से समझा और अपनी सारगर्भित टिप्पणी दी है। देखते हैं आगे क्या कुछ घटित होता है।
जितेन्द्र भाई: दुनिया भर में, आतंकवाद के ख़िलाफ़, अपना संदेश पहुँचाने के लिये, भारत सरकार ने जो सात बहुदलीय टीमें भेजीं, उनके ब्यानों को सुनकर आपके प्रश्न “क्या देशभक्त होना इतना मुश्किल है?” ने काफ़ी विचलित कर दिया। किसी भी देश की लोकसभा में वहाँ के सांसदों का, चाहे वो विपक्ष के हों या प्रशासन के हों, देश के हित के बारे में ही सोचना अनिवार्य है। दोनों पक्षों की अप्रोच अलग अलग हो सकती के लेकिन जहाँ तक देश का सवाल है, वहाँ दोनों पक्षों से यही उमीद की जाती है कि वो देश के हितों की बात ही सोचें। मेरा यह कथन दुनिया के हर देश के प्रशासन पर लागू हो सकता है।
आप का प्रश्न भारत के आजकल के हालात को देखते हुए किसी हद तक ठीक भी है। सत्तर साल तक सत्ता का नशा काँग्रेस के दिमाग़ में इतना चढ़ गया है कि, सत्ता हाथ से निकल जाने के बाद और उनके विपक्ष में बैठने के बाद, राहुल गाँधी को, अपने लिए, सिवाय प्रधान मन्त्री की कुर्सी के इलावा कुछ भी नज़र नहीं आता। और यही सब से बड़ी देश की बदकिस्मती है कि अपने इन इरादों को पूरा करने के लिए वो भारत को बदनाम करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। अभी तक सलमान ख़ुरशीद और असदुद्दीन औवेसी के मुँह से प्रशासन के बारे में कभी भी कोई अच्छी बात सुनने को नहीं मिली लेकिन, सलाम है इन दोनों को जो, विदेश में जाकर, इन दोनों ने देश को पहले समझा। अब जब यह लोग वापस आगए हैं तो देखना यह है कि राहुल और उसके चमचे इनके ख़िलाफ़ क्या क्या गुल खिलाते हैं।
आपके प्रश्न का उत्तर है कि “देश पहले” बाकी सब बाद की बातें हैं।
जय हिन्द,
जय भारत,
भारत माता की जय
आपने सही कहा है विजय भाई – देश पहले, बाक़ी सब बाद की बाते हैं।… काश विपक्षी दल आपकी इस बात को समझ पाएं।
तथ्यों पर आधारित बहुत ही महत्वपूर्ण बातें आपने साझा की हैं। जो लोग अनभिज्ञ हैं उन लोगों को पूरे मामले को समझने में बहुत मददगार साबित हो सकता है संपादकीय।
साधुवाद आपको
इस ख़ूबसूरत टिप्पणी के लिये स्नेहाशीष शिवानी।
Thank you,Tejendra ji,for giving these details of the groups that were sent abroad for justifying India’s response and stand on Pak terrorism.
Also you have supported the spirit of patriotism and self- righteousness that our delegates displayed in support of our government for having been at war with Pakistan.
Warm regards
Deepak Sharma
Deepak ji, for the Purvai, nothing is more important than genuine patriotism. I don’t know why in India Patriotism and Secularism don’t share the same page!
महत्वपूर्ण समसामयिक विषय पर सारगर्भित, बेबाक़ सम्पादकीय बहुत अच्छा लगा। बधाई आपको।
हार्दिक आभार सुदर्शन जी।
प्रिय तेजेंद्र जी!
सदा की भाँति समसामयिक विषय पर तों आपको अपने विचार प्रस्तुत करने ही थे । शेष सब कुछ तो समाचारों ,बेकार की चर्चाओं से टी. वी पर जोर-शोर से अपने मुद्दे पर मुहर लगाने से कहाँ कोई विषय बच पाता है जिसमें कितना सुना , समझा जा सकता है?
अजीब फ़ोन आया आपके पास ! प्रवासी होने का अर्थ अपने देश की मिट्टी को भूल जाना हो सकता है क्या? उसकी सुगंध से ही देह का निर्माण हुआ है तब यह फ़ोन तो सलमान खुर्शीद की बात को पुख्ता कर रहा है जैसे ‘राष्ट्रवादी होना इतना कठिन है?
यह तो कुछ ऐसी बात हो गई कि माँ सामने नहीं है तो उसे भुला दिया जाए? क्या यह संभव है?
परिस्थितियोंवश माँ की गोदी छोड़नी भी पड़ती है किन्तु उसे भुला देने वाला अथवा छवि राष्ट्रवादी होने वाली बात कुछ अजीब नहीं है?
संपादकीय में पूरी बातें खुलकर और सदा की भणिति बेबाकी से काही गई हैं । साधुवाद आपको
अभी एक बार और पढ़ना होगा पूरी बात की गहराई तक जकने के लिए । धन्यवाद
आदरणीय प्रणव जी, संपादकीय पर आपकी स्नेहिल, सार्थक एवं सारगर्भित टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार।
निश्चय ही चाहे हम कहीं भी रहें किसी भी विचारधारा को माने लेकिन देश के प्रति अनुराग एक सहज अनुभूति की तरह हमारे हृदय में उपजती है, बिल्कुल मुश्किल नहीं है देशभक्त होना….सर आपने सम्पादकीय में बहुदलीय सांसदों के समूह के विषय में विस्तृत जानकारी दी, साधुवाद आपको।
जया, हमारा प्रयास रहता है कि पुरवाई के पाठकों को हर विषय की अंदरूनी जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
राष्ट्रवाद का अर्थ संकुचित होते-होते अब दक्षिण पंथ अथवा भाजपा संघ तक सीमित रह गया है। ऐसा लगता है सिर्फ़ उन्हें ही अपने राष्ट्र के पक्ष में बोलने अथवा खड़े होने की मान्यता प्राप्त है। प्रत्यक्ष बात है कोई भिन्न विचारधारा वाला व्यक्ति भी राष्ट्रवादी हो सकता है, भले ही वह संघ के विचारों से शत प्रतिशत सहमत न हो।
इस बार भारत-पाकिस्तान के बीच आतंकवादी संगठनों को समाप्त करने के उद्देश्य से, युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न होने के बाद भारत सरकार द्वारा सात दलों को दुनिया के अनेक देशों में भेजा जाना एक महत्वपूर्ण घटना है। यह भी बड़े तारीफ़ की बात है कि जो भी लोग बाहर गए ,उन्होंने अपनी पार्टी की संकीर्णता को छोड़कर देश की बात की किंतु इससे बड़ी विडंबना नहीं हो सकती कि उन्हीं की पार्टी के लोग उनके ऊपर शक की सुई घुमाने लगें।
आपने बहुत विस्तार में प्रमुख नेता तथा उनके ग्रुप के सभी सदस्यों का बहुत अच्छा विवरण दिया है। आपने अपनी बात यहां से शुरू की है कि भारत के साहित्यकार मित्र आगाह कर रहे हैं कि आप राष्ट्रवादी होते जा रहे हैं; राष्ट्रवाद को इतने सीमित अर्थ में लेना हमारा दुर्भाग्य है ! आपका संपादकीय हमेशा बहुत महत्वपूर्ण होता है ; पठनीय और संग्रहणीय भी । इसके लिए आपको बहुत-बहुत बधाई और साधुवाद।
विद्या जी, तबीयत नासाज़ होने के बावजूद आपने ना केवल संपादकीय पढ़ा बल्कि उस पर सार्थक टिप्पणी भी की। हार्दिक धन्यवाद।
आपका संपादकीय पढ़ना हमेशा एक सुखद और ज्ञानार्जन का अनुभव दे जाता है। कांग्रेस के नेता शशि थरूर, सलमान ख़ुर्शीद, मनीष तिवारी और आनंद शर्मा के बदले सुर के लिये उनका वतन के प्रति समर्पण और कुछ मोदी मैजिक कहा जा सकता है। ओवैसी ने तो भारतीयों में अपनी एक अलग ही सकारात्मक छवि बना ली है।
ऐसे प्रतिनिधि मंडल की संकल्पना और उसे मूर्त रुप देना मोदी की ही राजनीतिक कुशलता दर्शाती है। यह एक ठोस, फलदायी कदम रहा है। आतंकवाद के विरुद्ध ऐसे ही विश्वव्यापी अभियान पूरी कठोरता और प्रतिबद्धता के साथ चलाना चाहिए। सारा विश्व आजिज आ चुका है।
अरविन्द भाई, आपका पुरवाई पत्रिका के संपादकीयों के प्रति समर्थन हमारा हौसला बढ़ाता है। हार्दिक धन्यवाद।
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
आपके संपादकीय को पढ़ते हुए कभी-कभी ऐसा लगता है कि किन-किन कामों के लिए आपको समय चुराना पड़ता होगा। चौकस नजर रखनी पड़ती होगी देश दुनिया के समाचारों पर, घटनाओं पर, और सबूत के साथ पेश करना पड़ता है। नौकरी करते हुए इतना सब करना सरल तो बिल्कुल नहीं है। आपके परिश्रम को सलाम
हम पुरवाई परिवार के विश्वास के साथ सहमत हैं, अगर आपने विश्व के सामने कोई बात कही तो उसे आपको निभाना ही चाहिए और निभाना आपका दायित्व बनता है। बात क्योंकि राष्ट्रहित की है इसलिये इसमें किसी को भी कोई आपत्ति होनी ही नहीं चाहिए फिर वह चाहे कोई सी भी पार्टी होऔर किसी भी पार्टी का नेता हो। व्यक्तिगत लड़ाइयों से कहीं ऊपर है राष्ट्र।
राष्ट्रवादी होना गुनाह नहीं।हम तो इस शब्द को ही सिरे से खारिज करते हैं। और अपील करते हैं कि अगर यह डिक्शनरी में है तो इसे हटा दिया जाए। हिंदुस्तान में हम अपने देश को माँ का दर्जा देते हैं और माँ जन्म से ही गर्भनाल से अपनी संतान से जुड़ी रहती है। उसके प्रति कर्तव्य होता है ।जो लोग इस तरह की बात करते हैं निश्चित रूप से उन्हें राष्ट्र का मतलब ही नहीं पता। अन्य देश जो अपनी धरती को माँ नहीं कहते वे भी अपने देश की धरती से प्रेम करते हैं उसके प्रति समर्पित रहते हैं ।कर्तव्यबद्ध रहते हैं ।राष्ट्रवादी होना बिल्कुल भी बुरा नहीं और कठिन तो बिल्कुल भी नहीं। समझ-समझ का फेर है। यह संकुचित सोच की निशानी है।
सलमान खुर्शीद को समझना होगा कॉन्ग्रेस-भक्ति और राष्ट्रभक्ति एक साथ हो सकती है और अगर अपन सही रहते हैं तो अपने को किसी को सफाई देने की जरूरत नहीं रहती। आपने जो किया है, जो कहा है; वह छुपकर नहीं किया है ,सारी दुनिया गवाह है कि आप सही है।
सभी ने भारत के पक्ष में संज्ञान लिया है इस बात को हर पार्टी को समझना जरूरी है। ओवैसी और अहमद फातही ने जो कहा वह भी काबिलेगौर है जिसे नजर अंदाज़ नहीं किया जा सकता।
सारी दुनिया जानती है कि भारत क्या है और पाकिस्तान क्या है? लेकिन फिर भी दोस्ती और दुश्मनी निभाते हुए व्यक्तिगत स्वार्थ आड़े आ जाते हैं । राजनीति और भ्रष्ट शब्द एक साथ जुड़े हुए दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं।सच बेचारा तो यहाँ दम तोड़ देता है।
इस बार के संपादकीय के लिए हमारी तरफ से इतना ही।
देश दुनिया में होने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं और सूचनाओं से निरंतर सचेत और जागृत करते आपके संपादकीय के लिए आपका तहेदिल से शुक्रिया
आदरणीय नीलिमा जी, आपने तो संपादकीय को बहुत इमोशनल हो कर पढ़ा और उसका विश्लेषण किया है। हर कोण से विषय को खंगाला है। हार्दिक धन्यवाद।
सटीक विश्लेषण। धन्यवाद, तेजेंद्र जी!
जब ए कहता है बी से कि तुम ज्यादा राष्ट्रवादी होते जा रहे हो तो बी सोचेगा क्या सचमुच! वह अपने को निष्पक्ष साबित करने की कोशिश में कुछ उल्टे कदम लेगा, कुछ वामपंथियों की प्रशंसा करेगा, इत्यादि। ए यही सब तो चाहता है। पर संपादकीय इस महत्वपूर्ण बात पर प्रकाश डालता है कि राष्ट्रवादी होने में क्या बुराई है? एक एक अलग अलग इश्यू अपने आपमें सही या गलत होता है।
भाई हरिहर झा जी, आपने बहुत सटीक बात कही है। हार्दिक धन्यवाद।
बहुत सटीक, सारगर्भित संपादकीय। संपादक जी को हार्दिक बधाई ।