आज अचानक मुझे मेरी पड़ोसन सावित्री की याद आ गई. हाथ में एक मैला- कुचैला थैलालिए दीन-दुनिया से बेखबर चली जा रही थी. सड़क के दोनों ओर बाजार लगा हुआ था. दुकानदार अपने-अपने सामान की प्रशंसा करके ग्राहकों को लुभा रहे थे. ‘बहन जी, क्या दिखाऊं ?’ तभी बराबर से एक कार गुजरी तो सावित्री एकदम चौंक पड़ी और बदहवास सी वह कार के पीछे भागी. कार तो फर्राटे भरती हुई निकल गई.
दीपूपूपू—, दीपूपूपू— सावित्री बिना रुके बदहवास सी चीखती हुई भागी जा रही थी. भागते-भागते हांफने लगी और लड़खड़ा कर सड़क पर ही गिर गई. दीपू दीपू की रट लगाए हुए जोर-जोर सेपुकार रही थी और बेहाल सी बेबसी में बिलख-बिलख कर रो रहीथी. आस-पास के लोगों ने दौड़कर उसे उठाया. आपस मेंतरह-तरह की बातें कर रहे थे. भीड़ में से निकल कर एक अधेड़ महिला आई और उसने सावित्री के कंधे को हिलाया।कब तक रोएगी ? संभल, चल घर चल. उसने सावित्री कोसहारा देकर उठाया, उसके कपड़े झाड़े और उसका हाथ पकड़ कर पलट कर घर की ओर चल दी।अब भीड़ छंटने लगी थी. भीड़ में से एक व्यक्ति ने पूछा,”आप इन्हें जानती हैं ? ये बहन जी तो रोजाना ही मेरी दुकान के आगे से निकलती हैं,थैला हाथ में लिए रहती हैं. कभी-कभार थोड़ी-बहुत सब्जी ले लेती हैं.बहुत कम बोलती हैं. आज बराबर से एक कार निकली जिसे देख कर जोर-जोर से चिल्ला उठीं और कार के पीछे पागलों की तरह दौड़ने लगीं.”
“हाँ भाई, मैं इसे जानती हूँ. यह एक शहीद की विधवा है.मात्र अठारह वर्ष की उम्र में ये अभागन बन गई थी.विवाह को मात्र तीन माह बीते थे कि इस पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. पति को तो ऑंख भर कर देख भी नहीं पाई थी. पति एक महीने की छुट्टी में गाँव आए तो उनका विवाह हो गया. अभी सात दिन ही बीते थे कि भारत और चीन का युद्ध छिड़ गया.जो सैनिक छुट्टियों में अपने घर आए हुए थे उन्हें वापस बुला लिया गया. इसके पति को भी वापस जाना पड़ा. और वो ऐसे गए कि कभी लौट कर नहीं आए. एक दिन तिरंगे में लिपटा शहीद का शव आया तो उसकी बूढ़ी माँ का रुदन सुनकर महाकाल भी हिल गए. इकलौता कुलदीपक बुढ़ापे में छोड़ गया और यह देखकर इसकी ऑंखें तो पथरा सी गई थीं. हाथों की महेंदी भी फीकी नहीं पड़ी थी कि सौभाग्य के सारे प्रतीक मिटा दिए गए. श्वेत वसना नवयौवना की दुनिया बेरंग हो गई और खाली हाथ मायके भेज दी गई.
इसके पति जीने का सहारा तो इसके पास छोड़ गए थे. जैसे ही इसे पता चला कि एक नवांकुर उसके अंदर पनप रहा है तो इसने अपनी बड़ी बहन को बताया.माता-पिता सुनकर सन्न रह गए. बहुत सोच-विचार कर उन्होंने निर्णय लिया कि बच्चे को इस दुनिया में न आने दें और कहीं पर योग्य वर देखकर सावित्री का दूसरा विवाह कर दें. माता-पिता के निर्णय का पता चला तो वह दहाड़ उठी थी,“मेरे बारे में सोचने का अधिकार मेरा है, अन्य किसी को नहीं. ये बच्चा इसके शहीद पिता की अमानत है. मैं इस बच्चे को दुनिया में अवश्य लाऊॅंगी. मेहनत-मजदूरी करके इस अमानत को पालूंगी, पढ़ाऊॅंगी-लिखाऊॅंगी और देखना एक दिन अफसर बन कर ये अपने पिता का नाम रौशन करेगा.” इतना कहकर सावित्री फूट फूटकर रो पड़ी. उसने पिता का घर सदा के लिए छोड़ दिया. यौवन कहां चला गया, पता ही नहीं चल पाया.एक-दो बार मायके- ससुराल आना-जाना हुआ और फिर—फिर वह दुनिया में अकेली रह गई. एक अंधी बूढ़ी सास थी, वह भी परलोक सिधार गई.शहीद पति की थोड़ी सी पेंशन मिलती थी, बाकी मेहनत मजदूरी करके अपना और अपने बच्चे का पेट पाल रही थी. इसके अलावा दुनिया दारी से दूर ही रहती रही. बेटे को उच्च शिक्षा दिलाई. पढ़-लिखकर वह उच्च कोटि का न्यायाधीश बन गया.उसके न्याय के चर्चे दूर-दूर तक फैले हुए थे. कुछ समय बाद सुशिक्षित, सुंदर कन्या से विवाह हुआ. पर इस बेचारी के नसीब में बीरानी ही लिखी थी. बहू-बेटे को तो सावित्री को मां कहने और उसे साथ रखने में भी शर्म आती थी और एक दिन उसे अकेली छोड़कर वे अपनी सभ्य दुनिया में चले गए. तब से यह ऐसे ही भटकती रहती है. ज्यादातर अपनी कोठरी में ही पड़ी रहती है. कार में बैठा व्यक्ति शायद उसे अपना बेटा लगा हो जिसे देखे हुए भी तो बारह-तेरह बरस हो चुके थे. दसवीं तक ही पढ़ पाई थी कि विवाह हो गया. मामा ने भाग दौड़ करके शहीद की विधवा का प्रमाण पत्र दिलवा दिया.शहीदों की विधवाओं को आजीविका चलाने के लिए स्वावलंबन शिविर लगाया गया था.वहीं पर सावित्री ने सिलाई करना सीखा था. भूखी रही, प्यासी रही पर बेटे के लालन – पालनमें कमी न आने दी. जीवन भर खटती रही. अपना जीवन तो भूल ही गई थी. और अब देखो कैसे भटक रही है.