Wednesday, February 11, 2026
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संपादकीय – भारतीय ज्ञान परंपरा – नीति और नीयत!

भारत में यह बात सर्वत्र कही जाती है कि ताजमहल शाहजहाँ ने बनवाया था और कुतुब मीनार कुतबुद्दीन ऐबक ने। मैंने गहन शोध किया और जानने का प्रयास किया कि जहाँ से ये लोग भारत आए, क्या वहाँ ऐसी कोई इमारतें मौजूद हैं, जिनकी परंपरा के अनुसार इन्होंने ये निर्माण भारत में कराएं, तो मैंने यह पाया कि ऐसा कुछ  नहीं है। यानि कि ताजमहल और कुतुब मीनार भारत के कारीगरों ने भारतीय भवन निर्माण की ज्ञान और परंपरा के अनुसार इन भवनों का निर्माण किया। जब हम दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिरों पर पत्थर पर की गई महीन कारीगरी और नक्काशी देखते हैं- तो विश्वास हो जाता है कि भारत में भवन निर्माण की परंपरा बहुत विकसित थी। अजंता-एलोरा की गुफ़ाएं भी इस बात का सबूत हैं कि हमारी ये कलाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी शताब्दियों से परंपरा का हिस्सा बनी हुई हैं।

आजकल हर विश्वविद्यालय और महाविद्यालय के पास एक ही काम है- भारतीय ज्ञान परंपरा पर संगोष्ठी आयोजित करना और लेखकों एवं शोधार्थियों से आलेख लिखवा कर एक पुस्तक प्रकाशित कर देना। जो लोग आलेख लिखते हैं, उन बेचारों के पास भी शोध का साधन एक ही है- चैट जीपीटी, गूगल मामा और सुनी-सुनाई बातें। 
सबसे मज़ेदार स्थिति यह है कि आप किसी भी लेखक या आलोचक से गुज़ारिश करेंगे कि अमुक विषय पर लेख चाहिए, तो वह आपको दो घंटे से लेकर दो दिन में किसी भी विषय पर आलेख दे देगा। बेचारी भारतीय ज्ञान परंपरा! चैट जीपीट और जेमिनी पर भी अतिरिक्त दबाव बढ़ता जा रहा है। उसे हर रोज़ दसियों आलेख भारतीय ज्ञान परंपरा पर लिखने पड़ रहे हैं। हमारे कुछ लेखक तो कमाल करते हैं कि साहित्य में जारी विमर्शों को भारतीय ज्ञान परंपरा से सीधे जोड़ देते हैं। 
मुझसे मेरे एक शोधार्थी ने व्हाट्सएप संदेश में लिख कर पूछा – “सर आपने कभी भारतीय ज्ञान परंपरा पर कोई कहानी लिखी है? मुझे एक शोध पत्र लिखना है!” मैं तब से सोच रहा हूँ कि क्या भारतीय ज्ञान परंपरा पर इसी तरह काम होता रहेगा? क्या इतने गंभीर विषय पर इतनी हल्की बातें सुनने को मिलती रहेंगी। 
हर व्यक्ति भारतीय ज्ञान पर अपनी बात की शुरूआत वेदों से करता है-फिर चाहे स्वयं उसने एक भी वेद ग्रंथ कभी खोल कर न देखा हो। जो शोधार्थी मुझसे मेरी ही कहानी के बारे में पूछ रहा है, भला वह सामवेद या यजुर्वेद को खोल कर कैसे देख पाएगा। 
हमें समझना होगा कि ज्ञान और परंपरा दो अलग-अलग विषय हैं। परंपरा का शिक्षा से कोई नाता हो, ऐसा ज़रूरी नहीं है। हमारे विश्वास, आस्था, पारिवारिक नियम हमारी परंपरा का हिस्सा हो सकते हैं। मगर जहाँ तक ज्ञान की बात है- उसका शिक्षा से जुड़ा होना अति आवश्यक है, बिना शिक्षा भला ज्ञान का क्या अर्थ है?
भारत में यह बात सर्वत्र कही जाती है कि ताजमहल शाहजहाँ ने बनवाया था और कुतुब मीनार कुतबुद्दीन ऐबक ने। मैंने गहन शोध किया और जानने का प्रयास किया कि जहाँ से ये लोग भारत आए, क्या वहाँ ऐसी कोई इमारतें मौजूद हैं, जिनकी परंपरा के अनुसार इन्होंने ये निर्माण भारत में कराएं, तो मैंने यह पाया कि ऐसा कुछ  नहीं है। यानि कि ताजमहल और कुतुब मीनार भारत के कारीगरों ने भारतीय भवन निर्माण की ज्ञान और परंपरा के अनुसार इन भवनों का निर्माण किया। जब हम दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिरों पर पत्थर पर की गई महीन कारीगरी और नक्काशी देखते हैं- तो विश्वास हो जाता है कि भारत में भवन निर्माण की परंपरा बहुत विकसित थी। अजंता-एलोरा की गुफ़ाएं भी इस बात का सबूत हैं कि हमारी ये कलाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी शताब्दियों से परंपरा का हिस्सा बनी हुई हैं। 
प्रश्न यह उठता है कि क्या अन्य क्षेत्रों में भी हमारे ज्ञान की कोई परंपरा आज के वर्तमान युग तक अपने आपको बचा पाई है, या तमाम परंपराएँ समय के साथ-साथ पूरी तरह से नष्ट होती चली गईं? इसके लिए तो ज़मीनी स्तर पर गहन शोध की आवश्यकता है, तभी हमें मालूम हो पाएगा कि सच्चाई क्या है। मगर जो लेखक धड़ाधड़ इस विषय पर आलेख लिख रहे हैं, क्या उन्होंने कुछ महीने या साल शोध के लिए लगाए हैं? उनकी लेखन मान्यताओं का आधार क्या है?
प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति पर आलेख लिखते हुए कभी किसी भी लेखक ने यह नहीं बताया कि महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र या संदीपनी के आश्रमों का पाठ्यक्रम क्या होता था? क्या वहाँ अलग-अलग विषयों पर अलग-अलग अध्यापक हुआ करते थे? क्या भगवान कृष्ण और ग़रीब ब्राह्मण सुदामा एक ही कक्षा में पढ़ते थे, या उनके पाठ्यक्रम भिन्न हुआ करते थे। 
हम जब आज के विमान की बात करते हैं, तो हमारे तथाकथित विद्वान एक स्वर में शोर मचाते हैं कि हमारे यहाँ तो पुष्पक विमान रामायण काल में ही मौजूद था। मुझ जैसा कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति सोचने लगता है कि पुष्पक विमान तो रावण के पास था, और रावण था राक्षसराज। पूरी रामायण में विमान का ज़िक्र केवल दो बार आता है- पहली बार सीता हरण के समय जब रावण आकाश मार्ग से सीता का हरण कर उन्हें लंका ले जाता है। दूसरी बार जब रावण वध के बाद विभीषण भगवान राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान को पुष्पक विमान से अयोध्या वापस भेजता है।
एक मूक प्रश्न यह है कि क्या अयोध्या पहुँचने के बाद पुष्पक विमान पड़े-पड़े सड़ गया? क्या भगवान राम ने पुष्पक विमान की देख-रेख के लिए किसी हैंगर की व्यवस्था की? क्या भगवान राम ने सोचा कि पुष्पक इतना ज़बरदस्त यात्रा का साधन है, तो उसका निर्माण अयोध्या में भी होना चाहिए, या फिर विभीषण के पायलट विमान को उड़ा कर वापस लंका ले गए और भारतीय ज्ञान परंपरा इस ज्ञान से पूरी तरह वंचित कर दी गयी?
यदि भारतीय ज्ञान परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी और काल-दर-काल आगे बनी रहती, तो हम विमान का उल्लेख महाभारत काल में भी अवश्य सुनते। ये भी हो सकता था कि ज्ञान परंपरा के माध्यम से महाभारत काल में विमानों द्वारा आक्रमण किया जाता और पूरी लड़ाई विमानों से ही लड़ी जाती। मगर इस ज्ञान परंपरा का पतन रामायण काल में ही हो गया और जब तक पश्चिम के देशों ने विमानों से आकाश को भर नहीं दिया,  भारतवासियों को पता ही नहीं चला कि विमान भी कुछ होता है। 
भारतीय परंपरा के अनुसार जब कभी किसी को अस्त्र-शस्त्र की आवश्यकता होती थी, तो वह भगवान शिव, भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी की पूजा करता था। वे भगवान भी राम और रावण दोनों से प्रसन्न हो जाया करते थे, और उन्हें शस्त्र दे दिया करते थे। मगर हमारी त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश की आयुध फ़ैक्टरियाँ कहाँ स्थित थीं, इनकी जानकारी कहीं नहीं मिलती है। क्या सभी अस्त्रों का निर्माण वे स्वयं करते थे, या उनके यहाँ कर्मचारी थे, जो इस काम को अंजाम देते थे? इन सब पर शोध करना आसान नहीं है। विश्वविद्यालयों से विशेष आग्रह है कि अपने शोध ग्रंथ छपवाने में जल्दबाज़ी न करें। यह काम गंभीर है, इस प्रकार जल्दबाज़ी में लिखे आलेख भारतीय ज्ञान परंपरा को नुकसान अधिक पहुँचाएंगे
भारतीय ज्ञान को अक्सर भक्ति, वांग्मय, कर्म आदि से जोड़ दिया जाता है। भारतीय ज्ञान नौकरी या अर्थोपार्जन से जुड़ा नहीं दिखाई देता है। ज्ञान को फ़लसफ़ा बना कर देखने की तुलना में बेहतर होगा कि ज्ञान को आधुनिक दृष्टि से भी जोड़े, ताकि मनुष्य के जीवन यापन में भी उससे कुछ लाभ मिले।
प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के ज़माने में एक योग गुरु हुआ करते थे – धीरेंद्र ब्रह्मचारी। वे दूरदर्शन पर आकर हर सप्ताह भारतीय योग पद्धति पर अपना कार्यक्रम प्रस्तुत किया करते थे। वर्तमान में बाबा रामदेव ने भारतीय ज्ञान परंपरा की दो शाखाओं को पूरी तरह से आर्थिक पक्ष से जोड़ दिया है- योग एवं आयुर्वेद। बाबा रामदेव ने साबित कर दिया कि यदि हम चाहते हैं कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल भारत में ही नहीं विदेशों तक पहुँचे, तो उसे आस्था और श्रद्धा से ऊपर उठा कर आज की ठोस सच्चाई से जोड़ना होगा। वे आयुर्वेदिक नुस्ख़े, जो वैद्यों की छोटी दुकानों तक सीमित थे, आज बड़ी केमिस्ट की दुकानों पर उपलब्ध हैं। 
 एक भारतीय औषध परंपरा सदियों से भारतीय परिवारों में चली आ रही है- वह है दादी-नानी के नुस्ख़े। इन्हें कोई मुग़ल आक्रमण या अंग्रेज़ी राज नष्ट नहीं कर पाएं। दादी-नानी ने इसे पूरी तरह से परिवार से जोड़े रखा और पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसे आगे बढ़ाती रहीं। बल्कि आजकल तो बहुत सी यू-ट्यूबर दादी-नानी इन नुस्ख़ों पर वीडियो बना-बना कर लोगों तक पहुँचा रही हैं, और यू-ट्यूब के माध्यम से पैसा भी कमा रही हैं।
हमें भारत को फ़िल्मी हस्ती मनोज कुमार के चश्मे से देखना बंद करना होगा। यह कहना छोड़ना होगा कि- ‘जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने, दुनिया को तब गिनती आई।’ सवाल यह है कि भारत ज़ीरो देने के बाद ज़ीरो पर बैठा क्यों रहा… क्यों बाकी दुनिया उस जीरो पर सवार होकर चाँद और मंगल तक पहुँच गई। आज हम मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप, आई पैड, कृत्रिम बौद्धिकता जैसी तमाम चीज़ों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऑटो रिक्शा से लेकर टैक्सी, रेल और विमान तक की यात्रा कर रहे हैं… इसमें भारतीय ज्ञान परंपरा कहाँ है… क्या भारतीय ज्ञान की सच में कोई परंपरा है? 
भारतीय ज्ञान परंपरा कोई इतना छोटा विषय नहीं है, जो एक साहित्यिक पत्रिका के संपादकीय में समेटा जा सके। मगर संपादकीय कम-से-कम यह ज़िम्मेदारी तो निभा सकता है कि पाठकों, प्राध्यापकों, नेताओं और मंत्रियों तक यह बात पहुँचा सके कि भारतीय ज्ञान परंपरा के साथ मज़ाक करना बंद किया जाए। भारत सरकार को एक ऐसा आयोग गठित करना होगा- जो शून्य से शुरू करे और गंभीरतापूर्वक विषयों की सच्चाइयों तक पहुँच सकें। इस आयोग का अध्यक्ष कोई ऐसा व्यक्ति होना चाहिए, जो भारतीय ज्ञान परंपरा और शोध कार्य दोनों का विशेषज्ञ हो।  
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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49 टिप्पणी

  1. प्रिय सर आपने शुरुआत बड़ी मजेदार और हास्यपूर्ण तरीके से की और फिर धीरे धीरे इसे गंभीर बनाते हुए अंत में जो वाजिब सवाल उठाए और जिन शास्त्रों और निर्माण का उद्धरण दिया काबिले तारीफ है। आपकी सोच वाकई चिंताजनक है। संगोष्ठी में न आने का मलाल है। तबीयत खराब और दुर्घटना के कारण घुटने के दर्द के कारण नहीं आ सका। लेकिन ये पढ़कर लगा जैसे यही आपने बोला होगा संगोष्ठी में। और इस विषय पर लिखना मजबूरन है। यह पाठ्यक्रम के जैसे हो गया है हर शोधार्थी को इस विषय पर लिखना ही होगा। किंतु आपने इस संपादकीय से कई सारे नए विषय छात्रों के लिए दे दिए हैं। समझने वाले विषय समझ जायेंगें।

    • तेजस तुम्हारे एक्सीडेंट के बारे में जानकर चिंता हुई। अपना ख़याल रखें। दरअसल भारतीय ज्ञान परंपरा को भारतीय विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों ने मज़ाक का विषय बना दिया है। यह एक गंभीर मुद्दा है जिस पर ज़मीनी काम करने की ज़रूरत है।

  2. सही बात है भारतीय ज्ञान परंपरा छोटा विषय नहीं… बहुत ही बेहतरीन लिखा है आपने

  3. “ज्ञान को फ़लसफ़ा बना कर देखने की तुलना में बेहतर होगा कि ज्ञान को आधुनिक दृष्टि से भी जोड़े, ताकि मनुष्य के जीवन यापन में भी उससे कुछ लाभ मिले।”-ठीक कहा आपने।

  4. ज्ञान और शिक्षा एक दूसरे के पूरक हैं। आपने सच कहा कि बिना शिक्षा के ज्ञान का कोई अर्थ नहीं रह जाता है । पुष्पक विमान का उल्लेख यहां पर बहुत सार्थक और रोचक लगा ।
    भारतीय ज्ञान परंपरा को हल्के में लेना कतई उचित नहीं है ।
    विचारोत्तेजक आलेख हेतु हार्दिक साधुवाद सर।

  5. किसी भी लेख की सार्थकता इसी में है कि वह पाठकों के विचारों को उबाल देने में विवश कर दे। आपका संपादकीय हमेशा की तरह ही विचारों को उबाल दे गया। सुनी सुनाई बातों से अधिक हमे स्वयं भारतीय ज्ञान और परंपरा पर शोध कर समझना होगा। परंतु इसके लिए बहुत वर्षों की मेहनत और अर्थ की आवश्यकता है। तेजी से भागते इस युग में भारतीयता को समझने के लिए स्थिर और लंबी आयु वाले लोगों की आवश्यकता है।

    • संगीता जी, पुरवाई पत्रिका का उद्देश्य यही है कि बिना किसी दबाव के सच सामने रखा जाये। पाठकों के मन में सवाल उठें तो हमारे प्रयास सफल हैं।

  6. वाह्ह्ह.. सर.. यह संपादकीय वास्तव में महत्वपूर्ण है.. इसमें आपके विचार महत्वपूर्ण है… सभी लेखक पाठक इस विषय को इस विचार को आपके उपदेश को यदि स्वीकार करते हैं मानते हैं… वास्तव में… जिस परिवर्तन की कल्पना आप कर रहें हैं… वह सत्य होगा… पर बहुत देर हो चुकी है…
    यह आपने सम्पूर्ण सत्य कहा है सर… यह गुगुल चैट जीपीटी, यूट्यूब आदि का जबसे आविर्भाव हुआ है.. सबकुछ का पतन हुआ है… क्या ज्ञान क्या साहित्य क्या परंपरा क्या संस्कृति.. क्या संस्कार… कुछ भी नहीं…. आज बच्चों के हाथ में पुस्तक की जगह ये सब अनर्थकारी वस्तुएँ हैं…. कोई भी प्रश्न करो सीधे गुगुल से दिखाते हैं…. कुछ लिखने कहो तो चैट जीपीटी… शोध की परंपरा भी नहीं रही…भारतीय मूल परम्परा शिक्षा.. सबकुछ अनुभव व जीवन शैली से जुड़ा था.. व्यवहारिक ज्ञान सामाजिक श्रृंखला से जुड़ा था..पर… जब मोबाइल नहीं था…. तब हमारे सामने कहानी उपन्यास प्रबंध आदि की पुस्तकें होतीं थी…. अब नहीं….
    आपके एक एक शब्द… सबकुछ सत्य है… सबकुछ…
    मैं बहुत ही कम आलेख लिखती हूँ कुछ दिन पहले मुझे कोणार्क पर एक आलेख प्रस्तुत करना था..2 वर्ष लग गए लिखते लिखते… पुरवाई में आपने स्थान भी दिया है…

    इस संपादकीय से आजकी पीढ़ी को यदि मार्गदर्शन मिलता है तो यह सार्थक होगा…. हमारी संस्कृति की रक्षा केवल हम ही कर सकते हैं… गुगुल या यूट्यूब नहीं….

    साधुवाद

    • अनिमा, मैंने आपके लेखन में भी ठहराव महसूस किया है और व्यक्तित्व में भी। आपके कोणार्क वाले लेख में आपकी मेहनत महसूस की जा सकती है। संपादकीय को आपने गहराई से पढ़ा और सार्थक टिप्पणी भेजी, हार्दिक आभार।

  7. इस बार का संपादकीय, हम भारतीयों को अपनी आत्मा को टटोलने पर विवश करेगा। क्योंकि हमें अपनी ज्ञान,परंपरा,
    संस्कृति पर तो कोई विश्वास ही नहीं है और अगर कोई सरकारी प्रयास हुए भी तो उसमें लाभ उठाने वाले तथाकथित मठाधीश शोधार्थियों के देव उसे अपने लुगदी ज्ञान से परिपुष्ट कर और अपने अंदाज़ उकेरने में कोई कोर कसर नहीं रखते हैं।
    संपादकीय में खरे विचारों और औचित्य पूर्ण तर्कों को यथा स्थान रखा गया है ।ताकि तथाकथित शोधार्थियों, लाभार्थियों और लफ्फाजी से महिमा मंडित होते विद्वानों को आईना देखने की फुर्सत मिले।
    चैट , जीपीटी ,गूगल या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यह सहायक हो सकते हैं लेकिन स्वाध्याय नाम के पहाड़ पर आपको चढ़ने की कला कतई नहीं सीखा सकते वरन यह आपको आलसी धोखेबाज और चोरी की ओर प्रवत कर सकते हैं।जो हमारे भारतीय ज्ञान और परंपरा में घोर अपराध की संज्ञा से विभूषित किया जाते हैं।

    हम अपनी लड़कपन और युवावस्था में एक शब्द सुना करते थे और वह था स्वाध्याय ,,अक्सर अधेड़ उम्र के लोग या वायो वृद्धि लोग धार्मिक ग्रंथो शास्त्रों पुराणोंका अध्ययन करते और उसे अध्ययन की चर्चा करके अपने-अपने परिवारों को उसे ज्ञान से कहीं ना कहीं लाभान्वित भी करते थे ।एक समय आया जब संस्कृत या संस्कृत वाली भारतीय वेशभूषा को मजाक का विषय बनाना पड़ा या कहीं बनना पड़ा क्योंकि जिस घर में उसके अपने बच्चे या उसमें रह रहे लोग जब अपनी ही वेशभूषा और संस्कृति का को उपहास के रूप में देखेंगे अक्सर सुनते थे जिसकी हिंदी या संस्कृत अच्छी होती थी, अरे बड़ा शास्त्री बना करता है कोई यदि वेदों और पुराणों के अध्ययन को कोई युवा आगे कहता था तो कहते थे पंडित जी नमस्कार ,,,शास्त्री जी नमस्कार ,,और धीरे-धीरे नतीजा यह हुआ कि पाश्चात्य सभ्यता ने तो जमकर प्रगति कर ली और हम वहीं के वहीं पिछलग्गू लगभग गुलाबी गुलामी मानसिकता के गुलाबी से अनुयाई बनकर रह गए।
    इस आलेख में बहुत अच्छी और सच्ची बातें और औचित्यपूर्ण ढंग से कही गई यथा पुष्पक विमान सरीखे विषय पर शोध हुआ ही नहीं इसी प्रकार आयुधों का निर्माण त्रिदेव द्वारा बहुत अच्छी बात है और वर्तमान समय में जब यह रक्षा उत्पादन के रूप में सामने आ रहा है यह बेहतरीन टेक्नोलॉजी और चीजों को रखने के सामने आ रहा है तो इसे लफ़्फ़ाज़्ज़ी कहा जाए खैर एक राजनीतिक पुट हो गया वापस लौटते हैं।
    और बताते हैं कि यदि स्वाध्याय को दोबारा से अपने जीवन में आरोपित किया जाए और वेद पुराण और बाकी चीजों को भी अपने अध्ययन में शामिल करने तो कहीं ना कहीं हम वर्तमान की समिति ज्ञान परंपरा को अपनी स्वयं की भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़कर उसमें से कुछ बेहतर अपने और अपने समाज और अपने देश के लिए कुछ बेहतर कर पाएंगे नहीं तो वह एक कहावत है देसी गधा पूरबी चाल।
    यूं भी ग्लोबल से ग्लोबल का अर्थ यह कतई नहीं है कि हम अपनी ज्ञान परंपरा में निरंतर साधना रत ना रहे अपने शास्त्रों ,वेद और पुराणों या बेहतरीन पुस्तकों में अपने मन और आत्मा को रमा कर तर्कों को न खोजें, बहुत शानदार बात और जानदार बात इस संपादकीय में कही गई जो आम जन को विशेष रूप से युवाओं और किशोर को आकर्षित करेगी और वह यह है की कुतुब मीनार या ताजमहल उन लोगों ने बनवाई जो आक्रांता और अन्य दुर्गुणों और कुविचारों की प्रतिमूर्ति थे,,, कहते हैं ना जैसी संगत वैसी रंगत !!!हमारी भारतीय
    ज्ञान परंपरा और यहां का वातावरण उनकी विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों को नष्ट कर उनमें सर्जनता का समावेश कर गया। तो हम अपने ज्ञान और परंपरा से उन्हें अपने स्वरूप को क्यों नहीं प्राप्त कर सकतेहै!?
    संपादकीय निश्चित रूप से उन शोधार्थियों या उन अनुसंधानकर्ताओं को एक कड़ी चुनौती है जो गूगल,chat gpt या इधर-उधर से बातें जोड़ करके पुस्तक छपवा डालते हैं या आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जमाना है उनसे लिखवा भी डालते हैं तो कहीं ना कहीं उनकी आत्मा पर जो हमारी भारतीय संस्कृति का अंदाज है कि अपनी आत्मा पर बोचने लीजिए तो यही कहेंगे कि अपनी आत्मा पर बोझ न लीजिए ज्ञान के क्षेत्र में पढ़िए बढ़िया और गुनिए।
    आदरणीय संपादक को मन और आत्मा से प्रणाम और यह समाज इस प्रकार के संपादकीय से समृद्ध होगा ,ऐसा मेरा विचार है।

    • भाई सूर्य कांत जी, आपने तो पूरी शिद्दत से संपादकीय पढ़ा और उस पर जम कर लिखा। साफ़ महसूस हो रहा है कि आपको संपादकीय ने आंदोलित कर दिया है। स्नेह बनाए रखें।

  8. आपने सही लिखा पिछले एक दो वर्ष से भारत के हर कालेज और विश्व विद्यालय इसी विषय पर सेमिनार और संगोष्ठी आयोजित करता आ रहा है विशेष रूप हिंदी अथवा भाषा विभाग ही यह पुनीत कार्य कर पा रहें हैं। शायद विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान भी ऐसा कर रहे हों ऐसा देखने में कम ही नज़र आया है। यह बात सही है कि ज्ञान और परम्परा को साहित्य और दर्शन के संदर्भ में देखना काफी नहीं है। उसे जीवन और जगत के अन्य संदर्भ में देखना जांचना होगा और शोध के निष्कर्ष वास्तविक जीवन में उतारने होंगे। यह सब सेमिनार आदि सरकारी अनुदान से किये जा रहें हैं। श्रयह देखना भी आवश्यक है कि सरकार के वित्त का सार्थक उपयोग किया जाये। आपका संपादकीय महत्वपूर्ण और जरुरी प्रश्न की तरफ ध्यान दिला रहा है।
    ऐसे प्रश्न और भी मंचों पर उठाये जानें होंगे। देश के स्वस्थ विकास के लिए इस विषय का बहुत महत्व है।

    • आदरणीय संतोष जी, आपने संपादकीय की आत्मा को पकड़ा है। हमारी वर्तमान सरकार का प्रयास होना चाहिये कि इस महत्वपूर्ण मुद्दे को गंभीरता से लिया जाए।

  9. आपने जो विषय ताजमहल और कुतुबमीनार के विषय में उठाया है वह सुधांशु त्रिवेदी ,भाजपा प्रवक्ता, ने भी एक चैनल पर कहा था और विषय विचारणीय भी है। आपने उस कला को दक्षिण भारत के मन्दिरों से जोड़ा है,इसमें तथ्य है। जहाँ से मुगल आदि आये थे वहाँ ऐसी कलाकृतियां देखने को नहीं मिलती हैं। उसकाल में( रामायण, महाभारत–) में पलायन भी बहुत रहा होगा। भाषागत उद्गम भी लगभग एक बताते हैं, भाषाविद। पूरा यूएसए(अमेरिका) पलायन से बसा है और यूरोप के साथ आधुनिक विज्ञान का घर है, कहूँ यूरोप से बहुत आगे है। आज हम कहाँ हैं और क्यों है, यह विचारणीय है। बढ़िया संपादकीय लिखा है आपने।

  10. आज के अपने विद्वतापूर्ण
    संपादकीय में आप ने ज्ञान व परम्परा की अलग पहचान व विशिष्ट शोध के विषय में बात उठाते हुए आप ने इन में भेद करने की आवश्यकता पर हमारा ध्यान दिलाया है। तथा यह भी कहा है कि शोध करते समय केवल बाहरी वेबसाइट पर निर्भर रहने की बजाए हमें मूल सिद्धांतों के ज्ञान व साक्षात अनुभव अर्जित करने होंगे।
    धन्यवाद व शुभ कामनांए
    दीपक शर्मा

  11. बात सही है और विचार योग्य भी हालांकि जब आप ये कहते हैं कि ब्रह्मा विष्णु महेश ने कहां अपनी आयुध फैक्टरी लगाई तो विषय गम्भीरता छोड़कर व्यंग्य की ओर बढ़ गया। बाकी ताजमहल और कुतुबमीनार निश्वित रूप से भारतीय परम्परा से निर्मित की गई है, इतिहासकारों ने इसे गैर जिम्मेदारी से किन्हीं और के नाम चढ़ा दिया और आज हम इस पर बहस कर रहे हैं

    • आलोक भाई, जब हम गंभीरता से वैज्ञानिक शोध करेंगे तो पता चलेगा कि हमारी त्रिमूर्ति कहां से अस्त्र-शस्त्र प्रदान करती थी।

  12. विचारणीय। बस एक पहलू पर टिप्पणी करुंगा। पुष्पक विमान से अयोध्या पहुंचने पर श्रीराम ने उसे उसके स्वामी कुबेर के पास जाने का आदेश दिया। इस प्रसंग का बहुत भावपूर्ण वर्णन गोस्वामी तुलसीदास ने मानस में किया है। आदेश सुनते ही पुष्पक विमान एक साथ ही दुखी और प्रसन्न हुआ। कारण श्रीराम का विछोह और अपने स्वामी से मिलन। जाहिर है पुरामनीषियों ने पुष्पक विमान की संकल्पना एक इंटेलिजेंट ईमोशनल मशीन के रुप में की थी।

    • अरविंद भाई मेरी जानकारी के मुताबिक मूल रामायण (वाल्मीकि) में ऐसा कोई ज़िक्र नहीं है। वैसे तो गोस्वामी जी के बाद हमारे रामायण मनीषी नरेन्द्र कोहली ने भी रामायण में बहुत सी घटनाएं जोड़ी हैं।

  13. ताजमहल और कुतुबमीनार के बारे में बताते हुए आपने दक्षिण की वास्तुकला से उसे जोड़ते हुए अपने गहन शोध के द्वारा बताया कि इनका निर्माण भारतीय भवन निर्माण की ज्ञान परंपरा के अनुसार हुआ है, यह पढ़कर कुछ लोगों की भ्रान्तियां अवश्य दूर होंगी।
    भारतीय औषध परंपरा दादी-नानी के नुस्खे सदियों से भारतीय परिवारों में इसीलिए जीवित है क्योंकि यह श्रुति आधारित है इसलिए इसे मुग़ल कोई मुग़ल आक्रमण या अंग्रेज़ी राज नष्ट नहीं कर पाये।

    श्रुति आधारित लोककथाओं के माध्यम से हम अपनी परम्पराओं से जुड़े हुए हैं लेकिन हमारी ज्ञान परंपरा पर अभी शोध की आवश्यकता है। इसके लिए गुगुल तथा A I की जानकारी पर निर्भर रहने की बजाय साहित्य मर्मग्य जनों को ऋग्वेद, सोमवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद का अनुवाद कर जन -जन तक पहुंचना होगा।

    जहाँ तक आम लोगों की वैदिक ग्रंथों से दूरी का प्रश्न है, इनकी संस्कृत भाषा है। मुगलों तथा अंग्रेजों के गुलाम रहने के कारण भी अपनी जड़ों से दूर होते गए। आज इन्हें पुनः पुर्नस्थापित करने की आवश्यकता है।

    आज के संपादकीय के लिए साधुवाद।

    • आदरणीय सुधा जी, आपने दादी-नानी के नुस्ख़ों पर सही टिप्पणई की है। हमें भारत की ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिक स्तर पर खोज करनी है, गूगल या एआई के माध्यम से नहीं।

  14. पुरवाई पत्रिका का संपादकीय -‘ भारतीय ज्ञान परंपरा और नीयत!’ में भारतीय ज्ञान की अविरल धारा में वर्तमान से लेकर प्राचीन काल तक का सफर तय किया गया है। इस सफर में कहीं गहन शोध है तो कहीं प्रश्न भी है। ये प्रश्न वाजिब है। वाजिब इसलिए कि हम आदिकाल(मानव उत्पत्ति) से अपनी संस्कृति, अपनी परंपराओं का बोझ लिए घूमते हैं तो क्या यह बोझ सार्थक है या निरर्थक! इस सबकी पड़ताल संपादकीय में गहनता से देखने को मिलती है। यह विषय है ही ऐसा कि, अपढ़, कुपढ़,ज्ञानी, बौद्धिक, अति बौद्धिक अपने-अपने स्तर से इसकी व्याख्याएं देते रहते हैं। आगे भी देते रहेंगे। इसलिए यह विषय और रोचक हो जाता है।
    हमारी प्राचीन सभ्यता कागजों में ही नहीं वरन् शिलालेखों में, पहाड़ों में, वास्तुकलाओं में सर्वत्र देखने को मिल जाती है। ये कलाएं दुनिया में अनूठी हैं। एलोरा अजंता की गुफाओं को ही देखा जाए तो दुनिया में इसके जोड़ के गुफा मंदिर कहीं नहीं मिलेंगे। श्रीलंका में कुछ गुफा मंदिर है जो सातवीं सदी के बाद बनाए गए हैं। वे एलोरा अजंता के गुफा मंदिरों की नकल मात्र है। कहने का तात्पर्य यह है कि भारत में गुफा मंदिर ईसा पूर्व की दो सदी पहले से बनने शुरू हो गए थे। कुछ तो इससे भी प्राचीन है। जब दुनिया ठीक से रहना खाना सीख रही थी तब हम बेहतरीन सृजन में निरत थे। ये गुफा मंदिर इसके गवाह हैं।
    इससे और प्राचीन समय में जाएं, जैसा कि संपादक महोदय जी ने इसका जिक्र रामायण और महाभारत काल को लेकर किया है। खासकर उस समय के विमान और आयुधों पर। रामायण में पुष्पक विमान का उल्लेख है। इसके बाद विमानों का कहीं जिक्र नहीं है। आखिर इसके बाद ऐसा क्या हुआ कि विमान बने ही नहीं। ये प्रश्न तो हमेशा मुंह बाए खड़ा मिलता है पर उत्तर कहीं नहीं मिलता है। इसलिए इसको काल्पनिक मान लिया जाता है। मैंने भी इस बारे में कई बार सोचा है। कई लोगों से बहस की है। पर वहां वही बात हुई कि गलफुल्ला की पसेरी, मुंह दबा की अढ़इयऊ नहीं। खैर..
    हमारे यहां की ज्ञान परंपरा अलग-अलग कालों में बदलती रही है। रामायण में ज्ञान ऊंचाइयों पर था पर वह सीमित लोगों तक रहा। जिनके लोगों के पास था, उन्होंने दूसरों से छिपाकर रखा, ताकि वह ज्ञान जीवन भर उनके अलावा किसी के पास न रहे और हम पुजते रहें। अंत समय पर वे अपने उत्तराधिकारी को बताकर मरते थे। कान में मंत्र फूंकने वाली पद्धति इसी ओर इंगित करती है। उन्हें ये भी लगता था कि ज्ञान छुपाने से फुरता (सिद्ध) है। “फुरहि मंत्र जो करे दुराऊ” इसी को लेकर चलते रहे। बीच में वे इस दुनिया से चले गए तो वह ज्ञान भी चला गया। महाभारत काल तक यही स्थिति रही। बौद्ध काल में ज्ञान छिपाया नहीं गया बल्कि सब जगह प्रसारित किया गया। उस ज्ञान को पुस्तकों में तो लिखा ही गया, हर विद्यार्थी को शिक्षित भी किया गया। नालंदा विश्वविद्यालय तथा उस समय के अन्य विश्वविद्यालय इसकी गवाही देते हैं। उस समय के पुस्तकालयों में ज्ञान विज्ञान की सामग्री से पुस्तकालय भरे पड़े थे।
    संपादकीय में आयुधों वाली बात खासा ध्यान आकर्षित करती है। इस तरह की बात बिना शोध के नहीं हो सकती है। मैं इसको बहुत देर तक सोचता रहा कि वाकई में ब्रह्मा, विष्णु और महेश को, जो भी व्यक्ति तपस्या करके इन्हें खुश करता था तो अपने अस्त्र-शस्त्र वे उन्हें दे देते थे।
    आपके संपादकीय से मेरे मस्तिष्क में न जाने कितनी कोंपल फूट पड़ी। मैं उस समय को आज के संदर्भ में जोड़ने लगता हूं कि ये हथियारों के व्यापारी थे। जैसे आज के F-32 , राफेल, J-17, लड़ाकू विमान,S-400, आकाश डिफेंस सिस्टम आदि बेचे और खरीदे जाते हैं। उसी तरह उस समय भी क्रय किए जाते होंगे। क्योंकि राक्षस हो या मनुष्य वह तभी तपस्या करता था जब वह छोटी-छोटी लड़ाइयां जीत लेता था और खूब धन इकट्ठा कर लेता था। बड़ी लड़ाइयों के लिए बड़े हथियार चाहिए होते हैं। कठिन तपस्या का मतलब बड़ी डील से ही हो सकता है।
    आयुध फैक्ट्रियां ऋषियों के पास थी। अगस्त ऋषि, भारद्वाज मुनि, परशुराम जी आदि के पास आयुधों का भंडार था। लक्ष्मण परशुराम संवाद में लक्ष्मण बहुत ही गूढ़ अर्थ में ये बात परशुराम जी से कहते हैं –
    *बहु धनुहीं तोरी लरकाई।*
    *कबहुं न अस रिस कीन्ह गोसाईं।।*
    कुतुबमीनार और ताजमहल ये विवाद के विषय बने हुए हैं। इतिहास में कुतुबुद्दीन ऐबक और शाहजहां द्वारा बनवाए बताए गए हैं। लेकिन स्थापत्य कला में विदेशियों को महारत हासिल नहीं थी। यह सही है कि विदेशियों ने अपने मूल स्थान पर ऐसी एक दीवाल न बना पाई हो तो यहां इतने बढ़िया महल कैसे बना सकते हैं। हमारे पाठ्यक्रमों में कुतुबुद्दीन और शाहजहां के ही नाम है।
    AI और ChatGPT पर आपने बहुत ही सटीक लिखा है। इसके सहारे शोधार्थी तुरंत शोधालेख तैयार कर लेते हैं। साहित्य जगत में इसका वायरस तेजी से फैल रहा है। वास्तविक साहित्यकार इससे परेशान हो रहे हैं। उस शोधार्थी से फिर भी मैं खुश हूं कि जिसने कम से कम उस विषय पर आपके द्वारा लिखी कहानी के लिए हाथ-पैर तो मार रहा था ।
    अबकी बार का यह संपादकीय मानसिक खुराक को पूरा करने वाला है।
    बढ़िया संपादकीय के लिए आपका बहुत-बहुत बधाई सर

    • भाई लखनलाल पाल जी, आपसे सीखना पड़ेगा कि कैसे किसी रचना को पढ़ा जाए और कैसे उस पर टिप्पणी लिखी जाए। आपने डिफ़ेंस सिस्टम, बड़ी डील, कठिन तपस्या आदि को समझाने की पूरी कोशिश की है। आपका मानना है कि आयुध फ़ैक्टरियां ऋषियों के पास थीं। – मेरी माँग यही है कि इस का ठोस सुबूत ढूंढ कर भारतीय ज्ञान को एक नया स्वरूप दिया जाए जिसमें कल्पना कम और ठोस सच्चाइयां अधिक हों।

  15. संपादक महोदय
    आपके संपादकीय में यथार्थ की ठोस धरा, अन्वेषण का अनंत अंबर पाठकों के मस्तिष्क को झिंझोड़ने के साथ ही उन्हें नवदृष्टि संपन्न बनाती है। अस्तु-बधाई….

  16. This article is to persuade younger generation to come forward and dig out our forefathers’ true contributions to the society.
    Keep it up hopefully you will get your goal soon. Good luck and with God blessings

  17. सादर प्रणाम तेजेन्द्र भाई
    आपके संपादकीय ने एक बार फिर चौंका दिया। अब तक सटीक जानकारी के अभाव में सचमुच भ्रम की स्थिति थी।लगभग सभी साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं ने भारतीय ज्ञान परंपरा पर परिचर्चा संगोष्ठी और सेमिनार तक आयोजित किये और सभी ने एक स्वर से बिना शोध किये सुनी सुनाई या डिजिटल माध्यमों से प्राप्त ज्ञान परोसा पाठकों के समक्ष। मैने भी कुछ लिखा था। आपकै.संपादकीय ने हमारी विचारधारा को एक नया मार्ग दिखाया है। बहुत ही सुंदर संतुलित और सारगर्भित संपादकीय के लिए अशेष आभार।
    कुछ मौलिक तथ्यों से तो हम शायद बिल्कुल ही अनजान थे।ताजमहल ,कुतुब मीनार, काशी और मथुरा तथा देश के तमाम मूर्तकलाओं ऐतिहासिक इमारतों के संबंध मे।
    दूसरी बात जो मन को स्पर्श करती.है कि परंपरागत रुप से प्राप्त ज्ञान हमारे परिवार समाज व परिवेश में प्रचलित कथाओं,घरेलू प्राकृतिक चिकित्सा तथा संस्कति आदि के माध्यम से आया ।
    परंतु ज्ञान का विशाल वैभव केवल कुछ परिचरचाओं और आधी अधूरी जानकारियों तथा शोध से कहीं परे है।आपने लिखा है —
    में समझना होगा कि ज्ञान और परंपरा दो अलग-अलग विषय हैं। परंपरा का शिक्षा से कोई नाता हो, ऐसा ज़रूरी नहीं है। हमारे विश्वास, आस्था, पारिवारिक नियम हमारी परंपरा का हिस्सा हो सकते हैं। मगर जहाँ तक ज्ञान की बात है- उसका शिक्षा से जुड़ा होना अति आवश्यक है, बिना शिक्षा भला ज्ञान का क्या अर्थ है?
    सचमुच वास्तविक शिक्षा भी वही है जो नित नवीन और शोध परक हो,तथा समाज को नया मार्ग दिखा सके।
    हार्दिक बधाई, अशेष शुभ कामनाए।
    पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

    • पद्मा आपने सही पकड़ा है कि ज्ञान और परंपरा को गडमड नहीं करना चाहिये। आधी आधूरी जानकारियां हासिल कर हम ग्रन्थ भरते जा रहे हैं। भारतीय ज्ञान के विकास को समझना आवश्यक है।

  18. भारतीय ज्ञान परंपरा और शोध विषयों को अलग दृष्टि से आकलन करने और मापने का दृष्टिकोण वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित होना चाहिए। आपका आलेख इस बात पर गौर करने का संदेश देता है।
    महत्वपूर्ण और अनसुलझे विषय को उठाया है। हम सभी को इस विषय पर तार्किक सोच के साथ विचार करना होगा और प्रगतिशील बनना होगा।
    डाॅ• क्षमा पांडेय
    भोपाल मध्यप्रदेश

    • क्षमा जी, आपने संपादकीय को समर्थन देकर हमें हौसला दिया है कि हम सही दिशा में काम करते रहें।

  19. भारतीय ज्ञान परंपरा पर एक महत्वपूर्ण लेख। जो ना केवल शोधार्थियों को बल्कि बड़े-बड़े विद्वानों को भी कई महत्वपूर्ण बिंदु थमा देता है, जिन पर काम बहुत करना बाकी है यह कई सालों की अथक शोध साधना की मांग करता है न कि गूगल मामा या चैट जीपीटी के शॉर्टकट ।आपने ठीक ही कहा कि जल्दबाजी या शॉर्टकट में किए गए शोध निष्कर्षों से तो भारतीय ज्ञान परंपरा का नुकसान हो रहा है क्योंकि जो एक बार दर्ज जाता है अगला आने
    वाला शोधकर्ता उसी को आधार बनाकर अपनी अगली यात्रा शुरू कर देता है। इस तरह से वे भारतीय ज्ञान परंपरा की खोज की यात्रा भटक रहे हैं।

    • प्रिय रक्षा, युवा पीढ़ी जब हमारे किसे संपादकीय को या रचना पर टिप्पणी करती है तो हमें यह संतुष्टि मिलती है कि हमारी पत्रिका सही दिशा में काम कर रही है।

  20. इससे अधिक अफ़सोसनाक बात और क्या होगी कि हम अपनी ही धरोहर से अनजान हैं। हमारी सभ्यता और संस्कृति के बारे में बस उतना ही जानते हैं जितना कोर्स में पढ़ाया गया या जो कुछ इधर उधर सुन लिया। इस योग्य बन ही नहीं पाये कि अपने वेदों को पढ़ते। जो ज्ञान विदेशी हमारे यहां से ले गये, उसे अपने लिए उपयोग में ला पाते।‌ शिक्षा व्यवस्था ने रोज़ी रोटी कमाने लायक बना दिया लेकिन अपनी परम्पराओं से बहुत दूर अन्य दिया। सतही ज्ञान को हम सम्पूर्ण मान बैठे हैं।
    आवश्यकता है इस दिशा में गंभीरता से सोचने और कदम उठाने की।
    विचारोत्तेजक सम्पादकीय के लिए साधुवाद।

    • रचना आपने एकदम सही कहा कि सतही ज्ञान को हम सम्पूर्ण मान बैठे हैं। हार्दिक धन्यवाद।

  21. विचारोत्तेजक संपादकीय !

    टिप्पणी में यही कहूंगा कि जिस युग में एक बाइसिकल तक का जिक्र न हो , वहां पुष्पक विमान कोरी कल्पना है।
    दूसरा, शाब्दिक अर्थ में जीरो के बाद केवल जीरो नहीं।
    ७ वी शताब्दी में भास्कराचार्य
    ८ वी में श्रीधराचार्य
    १२ वी में भास्कराचार्य ने

    बीजगणित, ट्रिगोनोमेट्री, कैल्कुलस आदि के बारे में आश्चर्यजनक जानकारी दी। मैने स्वयं ‘ लीलावती ‘ को पढ़ा भी है।
    पर सूत्र में संक्षिप्त प्रतिनिधित्व के अभाव में कुछ आगे न हो पाया।
    ज्ञान की बिजली चमकती है और फिर बुझ क्यों जाती है यह शोध का विषय है।

    • सर यही तो हम कह रहे हैं कि ज्ञान अवश्य रहा होगा… उसकी परंपरा विकसित नहीं हो पाई।

  22. आज की संपादकीय से बहुत कुछ जानने को मिला। टिप्पणियाँ भी उतनी ही ज्ञानवर्धक और महत्वपूर्ण हैं। साधुवाद

  23. सर, हमेशा की तरह एक महत्वपूर्ण विषय उठाया अपने। एक नई सोच के साथ कई प्रश्न और चीजों को देखने की नई दृष्टि दी। जैसे पुष्पक विमान। जैसे त्रिदेवों की आयुध फैक्ट्री। सच कहा आपने कि “जीरो पर ही क्यों टिके रहे हम?”
    संपादकीय जिम्मेदार लोगों तक पहुंचे, शुभकामनाएं और हार्दिक बधाई सर।
    सादर

  24. आदरणीय तेजेन्द्र जी ! भारतीय ज्ञान परम्परा के विषय में शोधपरक दृष्टिकोण से चर्चा करते हुए आपने अति सराहनीय और विचारणीय प्रश्न उठाए हैं। उनका समाधान भी शोधपरक आधार पर ही होना चाहिए, तब तो सोने में सुहागा हो जाएगा। दादी-नानी की मौखिक कहीनी-वाचन परम्परा को आपने भारतीय ज्ञान परम्परा से जोड़ कर देखने का जो प्रयास किया है, वह बहुत ही श्लाघनीय है। ऐसे वैचारिक सम्पादकीय के लिए आपको बारम्बार साधुवाद।

  25. मैंने जो टिप्पणी ऊपर लिखी है, उसमें कम्प्यूटर बाबा ने बहुत त्रुटियाँ कर दी हैं।

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