कंकर पाथर जोरि कै, मस्जिद लियो बनाय
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाय?
यदि कबीर ने ये शब्द 2024 में भारतीय संसद में कहे होते, तो तमाम राजनीतिक दल हंगामा खड़ा कर देते कि ख़ुदा को बहरा कह कर उसका अपमान किया गया है। कबीर को तुरन्त माफ़ी मांगनी चाहिये वरना हम संसद के मकर द्वार के बाहर रंग-रंगीले कपड़े पहन कर धरना प्रदर्शन करेंगे।
सच तो यह है कि भारत के राजनीतिज्ञों ने अपने ख़राब व्यवहार के लिये कोई हद मुकर्रर नहीं की हुई है। अपने फ़ायदे या वोट बैंक के लिये वे कुछ भी कर सकते हैं। इसमें कोई भी पार्टी किसी प्रकार का परहेज़ नहीं करती। जिसे जो माफ़िक आता है, कर गुज़रते हैं।
गांधी, गोडसे, यूसीसी, आर्टिकल 370, अल्पसंख्यक, किसान, मज़दूर यानी किसी भी मुद्दे को कोई भी राजनीतिक दल कैश करने से गुरेज़ नहीं करता। कोई भी नेता झूठ बोलने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाता। दावा यह किया जाता है कि हमारी पार्टी के कुछ सिद्धान्त हैं; मगर सिद्धांत एक ही होता है कि अगला चुनाव कैसे जीतना है।
भारत में एक विशेष किस्म का झूठ फैलाया जाता है कि भारत का संविधान बाबा साहेब अम्बेडकर की देन है। वे संविधान निर्माता हैं। अस्सी प्रतिशत से अधिक सांसदों ने शायद ही कभी संविधान पढ़ने की ज़हमत उठाई हो। मगर दावा यह कि बाबा साहब अम्बेडकर के संविधान के लिये जान भी दे देंगे।
याद रहे कि भारत का संविधान 1950 में लागू किया गया था। और पहले संशोधन की आवश्यकता प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को 1951 में ही पड़ गई। 1951 से लेकर अगस्त 2023 तक संविधान में 127 बार संशोधन किये जा चुके हैं – मगर उससे संविधान ख़तरे में नहीं पड़ा। जब-जब कांग्रेस पार्टी ने संविधान में संशोधन किया, वो देश की तरक्की के लिये था। मगर जब किसी अन्य दल यानी कि भारतीय जनता पार्टी ने कोई ऐसा प्रयास किया तो संविधान ख़तरे में आ गया।
शायद पुरवाई के पाठक जानना चाहेंगे कि भारत के संविधान निर्माण का इतिहास है क्या। तो हमने तय किया कि अपने पाठकों तक सबसे पहले यह सूचना पहुंचाएं कि संविधान निर्माण के लिये आठ समितियां बनाई गई थीं। उन विभिन्न समितियों के नाम और उनके अध्यक्ष कुछ इस प्रकार थे –
– संघ शक्ति समिति (अध्यक्ष पंडित जवाहर लाल नेहरू), संघीय संविधान समिति (अध्यक्ष पंडित जवाहर लाल नेहरू), प्रांतीय संविधान समिति (अध्यक्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल), प्रारूप समिति अध्यक्ष (डॉ भीम राव अम्बेडकर), मौलिक अधिकार समिति (अध्यक्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल), प्रकिया नियम समिति (अध्यक्ष डॉ राजेन्द्र प्रसाद), राज्यों के लिए समिति (अध्यक्ष पंडित जवाहर लाल नेहरू), संचालन समिति (अध्यक्ष डॉ राजेन्द्र प्रसाद)। संविधान के सलाहकार बी एन राव थे।
तो हम देखते हैं कि तीन समितियों के अध्यक्ष पंडित जवाहर लाल नेहरू थे, तो दो-दो समितियों के अध्यक्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल एवं डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे और केवल एक समिति के अध्यक्ष थे डॉ. भीमरॉव अम्बेडकर। फिर ऐसा क्यों है कि भारत की हर राजनीतिक पार्टी भारत के संविधान को बाबा साहेब अम्बेडकर का दिया हुआ संविधान कह कर अपना-अपना उल्लू सीधा करना चाहती है। जबकि सच तो यह है कि प्रारूप समिति में बाबा साहेब अम्बेडकर के अलावा छः सदस्य और भी थे जिनके नाम थे – कन्हैयालाल मुंशी, मोहम्मद सादुल्लाह, अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर, गोपाळ स्वामी अय्यंगार, एन. माधव राव, टी.टी. कृष्णामचारी।
यदि भारत का संविधान बाबा साहेब अम्बेडकर का दिया हुआ है, तो क्या बाकी की तमाम समितियां और प्रारूप समिति के अन्य सदस्य केवल गिल्ली-डंडा खेल रहे थे। उन्हें संविधान के निर्माण में ना तो कोई रुचि थी और ना ही उन में कोई सलाहियत थी। वे केवल मीटिंग में समोसा खाने आया करते थे। बाबा साहेब तमाम समितियों का काम अकेले संभाला करते थे और तमाम लिखत-पढ़त अकेले ही कर लिया करते थे।
सच तो यह है कि 25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में बोलते हुए बाबा साहब ने कहा था, “वामपंथी इसलिए इस संविधान को नही मानेंगे क्योंकि यह संसदीय लोकतंत्र के अनुरूप है और वामपंथी संसदीय लोकतंत्र को मानते नहीं हैं।” मगर आज वही वामपंथी उछल-उछल कर बाबा साहेब के गुणगान कर रहे हैं। पुरवाई के पाठकों को यह समझना होगा कि संविधान कोई तोहफ़ा नहीं है जो बाबा साहेब ने भारतवासियों को दे दिया। भारत का संविधान निर्माण एक गंभीर प्रक्रिया थी जिसमें उस समय के तमाम महत्वपूर्ण दिमाग़ अपना-अपना योगदान दे रहे थे।
थोड़ी हैरानी की बात तो यह है कि कांग्रेस पार्टी भी संविधान निर्माण में जवाहर लाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, वल्लभ भाई पटेल और टी. टी. कृष्णमाचारी के योगदान को रेखांकित करने का प्रयास नहीं करती है। दरअसल वोट बैंक की मजबूरी है कि बाबा साहेब का गुणगान किया जाए और दलित वोटों को अपनी झोली में डाल लिया जाए।
यह जानना आवश्यक है कि बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के मऊ में हुआ था। वे अपने माता-पिता की 14वीं और अंतिम संतान थे। डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के पिता सूबेदार रामजी मालोजी सकपाल थे। वे ब्रिटिश सेना में सूबेदार थे। बाबासाहेब के पिता संत कबीर के अनुयायी थे और वे बेहद सुविज्ञ भी थे। उनके घर में ग़रीबी का आलम इसलिये नहीं था कि वे दलित थे। बल्कि किसी भी परिवार में यदि 14 बच्चे होंगे तो उस घर के आर्थिक हालात कमज़ोर हो ही जाएंगे।
भीमराव अंबेडकर एक मामले में भाग्यशाली रहे कि उन्हें बड़ोदा के महाराज सयाजीराव गायकवाड़ का वरदहस्त प्राप्त था और उनकी शिक्षा अमरीका, इंग्लैण्ड और जर्मनी में हुई। वे बाईस वर्ष की आयु में एम.ए. पीएच. डी और अन्य डिग्रियां लेने के लिये विदेश गये थे। यानी कि उन्होंने जहां एक ओर बचपन में दलित होने के दंश सहे तो वहीं विदेश में पढ़ाई के कारण उनका व्यक्तित्व निर्माण किसी भी अन्य बड़े नेता – महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और मुहम्मद अली जिन्ना की तरह विदेश की पढ़ाई से हुआ।
वैसे बाबा साहेब अंबेडकर ज़मीन से जुड़े नेता नहीं थे। वे अपने जीवन में एक बार बॉम्बे नॉर्थ निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़े और हार गये। वे दो बार राज्यसभा के सदस्य बनाए गये। पुरवाई के पाठकों के लिये मैं बाबा साहब अंबेडकर का कोई ऐसा फ़ोटो खोजने में असफल रहा जिसमें वे खादी के कपड़ों में दिखाई दे जाएं। वे अपनी हर फ़ोटो में सूट-बूट और टाई लगाये ही दिखाई देते हैं। क्या इसका अर्थ यह निकाला जा सकता है कि लम्बा अरसा विदेश में रहने के कारण भारत के आम आदमी से उनका रिश्ता गहराई से नहीं जुड़ पाया।
बाबासाहेब आंबेडकर कांग्रेस से ख़ासे नाराज़ भी रहे। दरअसल पंडित जवाहर लाल नेहरू और बाबा साहेब के बीच रिश्ते मधुर नहीं रहे। बाबा साहब जिन मुद्दों पर अडिग थे कांग्रेस उन मुद्दों पर आज भी सहमत नहीं है। मसलन, समान नागरिक संहिता एवं अनुच्छेद 370 की समाप्ति, संस्कृत को राजभाषा बनाने की मांग एवं आर्यों के भारतीय मूल का होने का समर्थन।
बाबा साहेब का मानना था कि जब देश का विभाजन मज़हबी आधार पर हुआ है तो फिर संविधान में सेक्युलर शब्द के लिये कोई स्थान नहीं है। श्रीमती इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के दौरान 42वां संशोधन करते हुए सेक्युलर शब्द संविधान में जोड़ दिया। देखा जाए तो बाबा साहेब आंबेडकर के बहुत से विचारों का समर्थन वर्तमान भारत सरकार अधिक करती दिखाई देती है।
पश्चिमी देशों में रह कर मैंने एक बात सीखी है कि यहां किसी भी राजनेता को भगवान नहीं बना दिया जाता जैसे कि व्यक्ति पूजा भारत में होती है। बाबा साहेब आंबेडकर, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मुहम्मद अली जिन्ना – ये सब हाड़-माँस के इंसान थे। इनमें अच्छाइयां भी थीं और इंसानी कमियां भी। उन्हें इन्सान ही रहने दिया जाए। भारतीय संसद बेहतर काम करेगी यदि इसके सांसद आंबेडकर के नाम पर लड़ना झगड़ना बंद करके संसद में आम आदमी की समस्याओं पर सार्थक बहस करे। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
वाह बेहद धमाकेदार विषय या ज्वलंत समस्या पर केंद्रित है यह संपादकीय। आदरणीय आंबेडकर पर जानकारी सटीक और प्रमाणित जानकारी से लबरेज है इस बार का संपादकीय।
सारी की सारी पार्टियां संपादकीय वर्णित सच्चाई से अच्छे से वाकिफ है,बस जनता है कि जानती नहीं।वोट बैंक के सवाल पर सारी राजनीति तिलस्मी हो जाती हैं।यही हाल अब मुफ्त रेवड़ियों पर भी है।
आज दिल्ली के बेल पर बाहर मुख्य मंत्री ने वर्ग विशेष के लिए आंबेडकर स्कॉलरशिप योजना का तुगलकी फरमान जारी कर दिया है कि दुनिया की किसी भी यूनिवर्सिटी में दाखिला के लो,शेष खर्च दिल्ली सरकार उठाएगी। उनका कहना है कि आंबेडकर की भांति वर्ग विशेष के युवा पढ़ें लिखें और खर्च करेगी दिल्ली सरकार?!?
अब आंबेडकर साहब तो चौदहवें बच्चे थे और इकलौते युवा थे और सपोर्ट करने को एक महाराज?
संविधान निर्माता अकेले आंबेडकर थे ही नहीं ,वे एक घटक थे और सक्रिय घटक बस इस से अधिक नहीं।
लाखों पाठकों को यह जानकारी लाभान्वित करेगी।
सारगर्भित और सटीक तथ्यों को सामने लाता ,संपादकीय।
पुरवाई पत्रिका परिवार की साधुवाद।
एक चर्चा,मुफ्त की रेवड़ियों पर भी हो तो शायद युवा अपने वोट को सही प्रकार से प्रयोग कर सके।
भाई सूर्य कांत जी फिर तो मेरा दिल्ली आना मुश्किल हो जाएगा। सड़जी तो यह संपादकीय पढ़ कर बहुत नाराज़ हो जाएंगे।
सूर्यकांत जी सहमत आपकी बात से। तेजेंद्र सर ने शानदार संपादकीय लिखा है। लेकिन मुझे एक बात समझ नहीं आती बेल पर बाहर मुख्यमंत्री दिल्ली के लिए 10 हजार करोड़ और मांग रहा था। जब इतना बेहतर कर हो दिया है दिल्ली को तो घाटे में क्यों चल रही है। अतिरिक्त लोन क्यों चाहिए।
तेजेंद्र सर को आभार शानदार संपादकीय के लिए।
तेजस, धन्यवाद। आपकी दूसरी बात का जवाब अलग से देंगे।
इस विषय पर बेहतरीन सम्पादकीय
हार्दिक धन्यवाद आलोक।
बहुत ही ज्ञानवर्धक सम्पादकीय, अंबेडकर जी के बारे में बहुत ही अच्छी जानकारी दी, सारा मसाला ही कुर्सी का है कुर्सी के खातिर यह लोग कुछ भी कर सकते हैं।
साधुवाद
एक एक तथ्य सटीक और सुचिंतित है।
हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हमारे संविधान का 80% भाग ब्रिटिश गवर्नमेंट इंडिया एक्ट 1935 से लिया गया है।
वोट की राजनीति किसी को भी ईश्वर बना सकती है।
साधुवाद।
हार्दिक आभार राजेश्वर भाई।
वाह्ह्ह्ह..!सर, सम्पूर्ण सत्य कहा आपने। संविधान के बारे में इतनी सारी ज्ञानवर्धक जानकारी देकर आपने हम पाठकों को सोचने का सही मार्ग भी दिखाया। सोचकर आश्चर्य होता है कि कबतक हम भारतवासी इन नेताओं का चुनावी ड्रामा देखते रहेंगे? कबतक, एक मात्र परिवार जो कि स्वतंत्रता के बाद 70 साल से इस देश को अपनी निजी सम्पति मानकर एक गुरुत्वपूर्ण संस्कृति को ध्वस्त करता रहेगा?
काश, आपका यह लेख जनताओं को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने में सफल हो जाए!
साधुवाद आदरणीय सर जी
अनिमा जी, आपकी टिप्पणी हमारे लिये बहुत ज़रूरी है।
स्वभाविक व शोधपूर्ण संपादकीय।
संविधान का निर्माण संविधान सभा ने किया था। संभव है डाॅ अम्बेडकर का कोई विशेष योगदान रहा हो। यदि उनका योगदान 99% भी मान लिया जाए फिर भी किसी एक व्यक्ति को संविधान निर्माता का श्रेय दिया जाना उचित एवं स्वभाविक नहीं लगता। अच्छा तो यह होता कि संविधान किसने बनाया यह पूर्ण रुप से गुप्त रखा जाता। किसी का नाम हीं नहीं लिया जाता। इससे संविधान की सर्व स्वीकार्यता को ज्यादा बल मिलता।
समय समय पर संविधान संशोधन कितना उचित कितना अनुचित हुआ यह उस संशोधन के परिणामों की ईमानदार समीक्षा से पता चलेगा।
आर्यों को मूल भारतीय माने जाने वाली बात थोड़ी अलग लगी। मुझे लगता है यह संविधान का नहीं बल्कि इतिहास का विषय है।
भाई राजनन्दन जी, आपने एकदम सटीक टिप्पणी की है। हार्दिक धन्यवाद।
बेहतरीन संपादकीय वाह बहुत बढ़िया कटु सत्य
यथार्थ दृष्टिकोण के साथ आपने इसे प्रस्तुत किया है हार्दिक बधाई
धन्यवाद भावना।
आपने हमेशा की तरह ज्ञानवर्धक और समसामयिक घटनाचक्र पर उल्लेखनीय वर्णन किया है । भारतीय राजनीति की दाँव-पेंच समझने में मदद मिलती है।
जानकारी से परिपूर्ण महत्वपूर्ण सम्पादकीय। बहुत अच्छा लिखा। कॉपी करके फे बु पाठकों के लिए पोस्ट करें और दिल्ली आने पर आप वालों से संभलकर रहेंगे।
भाई रूप सिंह जी आपने संपादकीय पढ़ा और लिखा… हार्दिक धन्यवाद।
सामयिक, प्रासंगिक और यथार्थ के करीब
सम्पादकीय है ।
साधुवाद
Dr Prabha mishra
हार्दिक धन्यवाद प्रभा जी।
नमस्ते सर
बहुत ही महत्वपूर्ण संपादकीय है, इससे पाठक वर्ग भारतीय संविधान निर्माण की प्रक्रिया को भी तथ्यात्मक रूप से समझेंगे और ईश्वर वोट की राजनीति किस प्रकार काम करती है इसे भी।
धन्यवाद अपूर्वा। आपकी टिप्पणी सार्थक है।
बहुत ही बेहतरीन और तटस्थ लिखा है आपने।
कबीर के बेहद सटीक दोहे से शुरू कर आपने पूरे लेख में एक व्यंग्य के स्वर से रचा।
कई अनजान बातों का भी जिक्र किया है जो मुझे नहीं मालूम था।
बेबाक़ और सहज
रीटा जी, इस सार्थक और सटीक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
आज का संपादकीय वर्तमान के अनुरूप सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। आपकी तथ्यात्मक जानकारी इस वक्त बेहद कीमती है।इस संवाद के लिए हैट्स ऑफ तेजेन्द्र जी! तत्काल में इतना कहना तो बनता है। शेष बाद में लिखते हैं। सादर प्रणाम आपको।
हार्दिक धन्यवाद नीलिमा जी।
परिवार किसी एक व्यक्ति से नहीं चलता। छोटे मोटे काम अनेकों रहते है और सभी का सहयोग भी अपेक्षित है। राष्ट्रनिर्माण में भी वहीं बात लागू होती है। स्वस्थ राजनीति ही प्रगति का सूचक होती। विरोधी खेमा होना भी आवश्यक है, बाबा साहेब दलित वर्ग के लिए आदर्श है, अच्छी बात है मगर प्रभु श्री राम हो या गांधी जी या बाबा साहेब ये नाम जपना पर्याप्त कहा? जमीनी स्तर पर व्यक्तित्व भी उनकी तरह हो तो मजा है।
इस सटीक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद महेश भाई।
सार्थक सम्पादकीय आदरणीय
धन्यवाद कुसुम जी।
कबीरदास ने हिन्दू और मुसलमान, दोनों की कुरीतियों पर व्यंग्य किया है, दोनों धर्मों की बुराइयों की निंदा की है। लेकिन आज दोनों धर्म के लोग उनकी निंदा नहीं करते, क्योंकि वे कबीर थे, उनकी बात यथार्थ थी। कबीर अगर आज जीवित होते उनको उभय पक्ष कोस रहे होते। रही बात डॉ.आंबेडकर की, वे तो सिर्फ संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष यानी संविधान निर्माण के कार्य को त्वरित गति से पूरा करने के लिए जिन 22 समितियों का निर्माण हुआ था, उनमें से एक। इस समिति के और भी सदस्य थे। लेकिन उन्हें संविधान निर्माता के रूप में मीथ बना दिया गया। आपने इस पर सही आकलन किया है। जिस कांग्रस पार्टी और गांधीजी के उनका मतभेद था, वे ही ज्यादा हल्ला मचा रहे हैं। “व्हॉट काँग्रेस एंड गाँधी हैव डन टू द अनटचेबल्स?” (काँग्रेस और गाँधी ने अछूतों के लिये क्या किया?) इस किताब के साथ, आम्बेडकर ने गाँधी और कांग्रेस दोनो पर अपने हमलों को तीखा कर दिया था, उन्होंने उन पर ढोंग करने का आरोप लगाया था। 1946 में आयोजित भारत के संविधान सभा के लिए हुये चुनाव में खराब प्रदर्शन किया। बाद में वह बंगाल जहां मुस्लिम लीग सत्ता में थी वहां से संविधान सभा में चुने गए थे। आम्बेडकर ने बॉम्बे उत्तर में से 1952 का पहला भारतीय लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार से हार गए। उन्होंने भंडारा से 1954 के उपचुनाव में फिर से लोकसभा में प्रवेश करने की कोशिश की, लेकिन वे तीसरे स्थान पर रहे (कांग्रेस पार्टी जीती)। कहने का मतलब है कि जिस कांग्रेस पार्टी से उनका घोर विरोध रहा, वही उनकी तारीफ़ के पुल बांध रही है, जिस पार्टी ने संविधान का सबसे ज्यादा नुकसान किया है। आपने सही कहा है कि जिन बातों को बाबासाहेब को बुल्कुल पसंद नहीं करते थे और उनको मूल संविधान में स्थान नहीं दिया गया था, कालांतर में उन्हीं तत्वों को अमेंडमेंट के जरिए जोड़ दिये गया। यूं कहें तो अब की सरकार आंबेडकर की मान्यताओं को अधिक प्रोत्सहित कर रही है। सब सियासी मामला है, क्या करें …..
सम्पादकीय अत्यंत प्रासंगिक है। एक और नये तथा समयाकूल संपादकीय के लिए हार्दिक अभिनन्दन और धन्यवाद।
जयंत भाई आपकी सार्थक, गहराई से भरपूर टिप्पणी हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। हार्दिक धन्यवाद।
आपके संपादकीय भगवान अंबेडकर की जय हो! में विस्मयादिबोधक चिह्न लगाने से ही पता चल गया था कि आप कहना क्या चाहते हैं। मतलब आप इंसान को इंसान तक ही सीमित रखना चाहते हो। अगर कोई इससे आगे जाता है तो आश्चर्य की बात है। इससे सहमत हुआ जा सकता है।
आपने इस संपादकीय में संविधान निर्माण की प्रक्रिया में जो भी जानकारी मुहैया कराई है वह सही है। इस पर कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि यह सत्य तो संपादकीय के अलावा मैदान में पड़ा हुआ है।
राजनेता तो वही करते हैं जिससे उन्हें फायदा होता है। लेकिन जो लोग भगवान मानते हैं उनके मानने का कारण तो है। संविधान में उनके लिए जो अधिकार दिए गए हैं वे दैवीय अधिकार से कम नहीं है। इससे पहले भारतीय समाज में उनकी क्या स्थिति थी वह यहां बताने की आवश्यकता नहीं है। इतना ही कहूंगा कि उनकी स्थिति गुलामों से भी गई गुजरी थी।
इस संसार में खासकर भारतीय उपमहाद्वीप में हर एक व्यक्ति को भगवान चाहिए। वह भी साकार रूप में। निराकार में उन्हें बोध नहीं होता है। दलितों को (शूद्र कह सकते हैं)इसी धर्म के लोगों ने ईश्वर को उनके पास फटकने न दिया। अन्य धर्मों में उन्होंने जाना नहीं चाहा। कुछ गए भी है तो उससे संबंधित धर्म को ही स्वीकार किया है। जबकि खाए अघाए लोगों ने जमकर धर्मयात्रा की है। जहां सुविधा मिली उसी में शामिल हो गए।
एक बात और, आपने जिस विषय पर संपादकीय लिखी है और जिस कारण से संपादकीय लिखी है आपने उसको छुआ नहीं है। अभी हाल ही में भारतीय संसद में अंबेडकर जी के बारे में टिप्पणी की गई थी। हंगामा होना ही था और हुआ भी, अभी भी हो रहा है। जानते हैं सर यह टिप्पणी क्यों की गई थी?
मैं समझता हूं कि यह टिप्पणी अनायास ही नहीं की गई है और न ही धोखे से निकली है। बहुत सोच समझकर कहा गया है। यह इसलिए कहा गया है ताकि संविधान निर्माण की प्रक्रिया की सच्चाई सबको पता चल सके।
ये लोग बखूबी जानते हैं कि इस तरह का बयान दे देंगे तो विपक्ष हंगामा करेगा। हंगामा होगा तो टीवी चैनलों में एक्सपर्ट इसकी वास्तविकता बताएंगे। जनता इससे शिक्षित हो जाएगी।विपक्ष फंस गया। इस मुद्दे को नहीं उठाते तो आफत और उठा दिया तो वे जो करना चाहते थे उसमें सफल हो गए। आप भी इस ज्वलंत मुद्दे को उठाकर कामयाब हो गए हैं।
उन्होंने प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में जो सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से मुख्य धारा से बाहर हो चुके लोगों को उस धारा में लिखित रूप में शामिल करवाया है वह बहुत बड़ी बात है। कोई कुछ भी कहे मैं बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर जी को युगपुरुष मानता हूं और मानता रहूंगा। इस संपादकीय के लिए आपको बधाई सर
पंडित जवाहर लाल नेहरू का यह योगदान है कि उन्होंने भारत में लोकतंत्र की नींव रखी। लोकतंत्र पहले आया और संविधान बाद में। उसी लोकतंत्र की यह ख़ासियत है कि हम सबको अपना-अपना भगवान गढ़ने की स्वतंत्रता है – आपको भी है। ज़रूरी नहीं कि मैं या आप में से कोई एक ग़लत हो। एक ही समय में बहुत से दृष्टिकोण साथ-साथ चल सकते हैं।
विपरीत दृष्टिकोण के मध्य संतुलित सामंजस्य स्थापित कर, तथ्यों, संदर्भ स्त्रोतों का सत्यापन व पाठकों की प्रतिक्रिया और विचारों पर मनन कर, यथार्थ पर केंद्रित सदैव की भांति, विशिष्ट विषय पर सशक्त भाषा और प्रभावोत्पादक शैली में लिखा गया आपका यह संपादकीय विचारणीय है आदरणीय।
इस संतुलित टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार ऋतु।
नमस्ते तेजेंद्र जी
आपके संपादकीय ने संविधान के इतिहास, निर्माण प्रक्रिया, और इसके विभिन्न योगदानकर्ताओं के महत्व को विस्तार से उजागर किया है। वास्तव में संविधान को लेकर राजनीतिक दलों द्वारा की जाने वाली व्यक्ति-पूजा और वोट बैंक की राजनीति, संविधान की असल भावना और देश की तरक्की के मुद्दों को पीछे छोड़ देती है।
आपके लेख की हमेशा सबसे बड़ी विशेषता रही है कि यह पाठकों को इतिहास के तथ्यों से रूबरू कराता है
यह लेख भी बहुत परिपक्व संदेश देता है कि किसी भी नेता को भगवान बनाने के बजाय उसे उसके मानवीय गुणों और कमियों के साथ समझा जाना चाहिए।
आपके सशक्त व्यक्तित्व और लेखनी को नमन
कबीरदास जी के दोहे से आपने अपने संपादकीय का प्रारम्भ कर अपनी बात को धार दी है। आज कोई भी न सच्चाई कह सकता है न सुन सकता है। इन राजनीतिज्ञयों के लिए जनता तो मूर्ख है। वह न कुछ समझ सकती है, न गुण सकती है। इनके लिए गाँधी और अम्बेडकर एक ऐसे आइकोन हैं जिनके नाम लेने मात्र से इन्हें वोट मिल जायेंगे!
ज़ब तक कांग्रेस सत्ता में थी तब तक न संविधान खतरे में था न ही लोकतंत्र किन्तु 2014 के पश्चात् सब कुछ ख़तरे में पड़ गया क्योंकि वही भारत की एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसने भारत को आजादी दिलवाई इसीलिए उसे ही देश पर शासन करने का अधिकार है। अधिकार भी सिर्फ एक परिवार को है, किसी अन्य को नहीं।
इस एक परिवार ने अपने सिवा किसी को खड़ा ही नहीं होने दिया।
गाँधी और अम्बेडकर तो उसके लिए लॉलीपॉप हैं जिनका नाम लेकर वह दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों को लुभाना चाहती है। अगर वास्तव में उसे दलितों के लिए कुछ करना ही होता तो वह आपने 50 -55 साल के शासन में नहीं करती क्योंकि आरक्षण का प्रविधान तो सिर्फ 10 वर्षों का था। बाद में इसे सिर्फ वोट प्राप्त करने का हथियार बनाया गया।
मुझे याद आ रहा है वह वाकया ज़ब प्रियंका गाँधी पहली बार चुनाव प्रचार में उतरी थीं तो पेपर में खबर छपी थी कि जिस झोंपड़ी से इंदिरा गाँधी ने चुनाव प्रचार शुरू किया था वहीं से प्रियंका गाँधी ने शुरू किया है। इस खबर के साथ झोपड़ी तथा प्रियंका गांधी की फोटो भी थी।
जैसा आपने अपने संपादकीय में लिखा है कि तीन समितियों के अध्यक्ष पंडित जवाहर लाल नेहरू थे, तो दो-दो समितियों के अध्यक्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल एवं डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे और केवल एक समिति के अध्यक्ष थे डॉ. भीमरॉव अम्बेडकर। फिर ऐसा क्यों है कि भारत की हर राजनीतिक पार्टी भारत के संविधान को बाबा साहेब अम्बेडकर का दिया हुआ संविधान कह कर अपना-अपना उल्लू सीधा करना चाहती है।
मेरे विचार से जितने महत्वपूर्ण संविधान सभा के अध्यक्ष एवं उससे जुड़े अन्य सदस्य थे उतने ही महत्वपूर्ण भारतीय संविधान की मूल प्रति को सजाने वाले चित्रकार नंदलाल बोस थे। नंदलाल बोस और उनके शिष्य राममनोहर सिन्हा ने मिलकर संविधान की मूल पांडुलिपि को सजाया था।नंदलाल बोस ने अपने छात्रों के साथ चार साल में संविधान को 22 चित्रों और बॉर्डर से सजाया था।
मन के ज्ञान तंतुओं को खोलता, विश्लेषण करने को मजबूर करता जानकारी भरा आलेख।
साधुवाद आपको।
सुधा जी, आपकी टिप्पणी ने संपादकीय को संवारने का काम किया है। नन्दलाल बोस और राम मनोहर सिन्हा के बारे में जानकारी बहुत कम लोगों को होगी। हार्दिक धन्यवाद।
वाह बेहतरीन लेख
इतनी स्पष्टता से सब कुछ खोलकर सच्चाई को पाठकों तक लाने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार
नेहरू परिवार के सत्तर साल तक भारत पर राज करने के बाद इसी ख़ान्दान के लोगों को, चाहे वो इस लायक हों या न हों, ऐसा लगने लगा है जैसे भारत देश पर राज करना केवल इनकी ही बपौती है और वो ही इसके असली वारिस और हकदार हैं। संसद में जो आजकल राहुल गांधी ने गन्द मचा रखा है और हर बार संसद में और सड़कों पर लाल रंग की कोरी किताब हाथ में लेकर ‘संविधान ख़तरे में है’ के नारे लगाकर उसने अपनी जात दिखा दी है। क्या उस ने कभी अपने ख़ान्दान के गरेबान में झांक कर देखा है कि संविधान के साथ 127 बार छेड़छाड़ करके किसने इसकी धज्जियां उड़ाई हैं। अब जब और कुछ नहीं सूझा तो वोट लेने के लिए बाबा साहेब आंबेडकर के नाम को कैश कराना चाहता है। देखा देखी, इसी वोट के चक्कर में कांग्रेस के साथ साथ और भी पार्टियां पूरी तरह सक्रिय हो गई हैं।
यह बात मैं ने आपके पिछले सम्पादकीय में भी लिखी थी कि भारत का विभाजन ‘टू नेशन थ्योरी’ पर हुआ था। आप ने बाबा साहेब आंबेडकर को quote करके मेरे कथन को साबित कर दिया है कि भारत का विभाजन मज़हबी आधार पर हुआ था। विभाजन के इसी कारण से बाबा साहेब आंबेडकर ने संविधान में ‘सैक्युलर’ शव्द के लिये कोई स्थान नहीं समझा था। बाबा साहेब आंबेडकर के इस reason को एक दम ignore करके नेहरू और गाँधी ने 1947 में जो घिनौना खेल खेला उसका नतीजा आज देश भुगत रहा है और, अगर उन लोगों का बस चले जो पाकिस्तान न जाकर यहीं बस गए थे, तो मज़हब के आधार पर देश के एक और बटवारा होने के हालात बनते जारहे हैं। सब से बड़ी दुख और शरम की बात तो यह है कि वोटों के चक्कर में बाबा साहेब आंबेडकर के कथन को नज़रन्दाज़ करते हुए अपने ही लोग वोट समेटने के लिए इन लोगों की तुष्टीकरण पर लगे हुए हैं। हालात को देखते हुए अगर मोदी सरकार ने शीघ्र ही कोई ठोस कदन नहीं लिया और यह, so called देशभक्त, अपने मंसूबे में काम्याब हो गए तो फिर 80 करोड़ हिन्दु कहाँ जाएंगे?
जहाँ तक बाबा साहेब आंबेडकर और नेहरू के बीच मधुर रिशते न होने की बात है तो नेहरू के किस से मधुर रिशते रहे थे। पहली बात तो यह कि जिन हालात में गांधी ने नेहरू को आदरणीय सरदार वल्ल भाई पटेल के स्थान पर प्रधान मन्त्री बनाया था वो सब को पता है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति आदरणीय राजेन्द्र प्रसाद जी के के साथ जो नेहरू ने दुर्व्यवहार किया था वो किसी से छुपा नहीं है। भारत के प्रथम प्रधान मन्त्री नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के बाद यदि आदरणीय वल्लभ भाई पटेल को प्रधान मन्त्री बनाया होता तो सत्तर साल बाद देश की वो हालत न होती जो इस परिवारवाद के कारण हुई है।
जितेन्द्र भाई; इतने सुन्दर सम्पादकीय के लिए बहुत बहुत साधुवाद।
विजय भाई, आपकी भाषा में आक्रोश महसूस किया जा सकता है। आपने बहुत से मुद्दों पर ध्यान दिलाया है। हार्दिक धन्यवाद।
बाबा और गाँधी के कंधे पर बन्दूक रखकर खतरे से बचने की धमकी देना अपने देश में चलन सा हो रहा है। जहां गलत लगता है समय के अनुसार परिवर्तन होना ही चाहिए, वोट बैंक के लिए किसी नाम के पीछे छुप जाना बहादुरी नहीं है अपितु समझदारी से देश को आगे बढ़ने देने में बहादुरी है। हम सामान्य गृहिणी जैसी बुद्धि भी क्या राजनेताओं में नहीं है!! शायद नहीं है, क्योंकि हमें कुर्सी नहीं चाहिए और उनमें कुर्सी का लोभ हटते नहीं हट रहा।
ह्वाट्स एप पे हेडिंग शो हुआ तो सोचा कहे कि भैया, हमें भगवान कहने से सख्त आपत्ति है, फिर सोचा नहीं, बिन अंदर जाकर पढ़े बिन चुप रहना चाहिए। अब मन हो रहा कि आपका जानकारी भरा यह आलेख कॉपी करके फेसबुक पर डाल लें।
आभार भैया सम्पूर्ण जानकारी हेतु। समसामायिक महत्त्वपूर्ण आलेख।
सविता जी आपने कम शब्दों में उल्लेखनीय बातें कही हैं। संपादकीय को पसंद करने के लिए हार्दिक धन्यवाद।
प्रारूप समिति, यानी Drafting Committee, के Chairman थे। जिसका काम था
handling the task of presenting the draft OF constitution, answering various questions raised on it, and making necessary changes accordingly.*
(* https://byjus.com/question-answer/)
।
यानी 7 समितियांँ मुख्य मुद्दों पर काम करती थीं और उन्हें लिखित रूप देने का काम अंबेडकर की समिति करती थी। ऐसे में उन्हें संविधान निर्माता कहना कहां तक उचित है। किसी भी कार्यालय में मैनेजमेंट निर्णय लेता है, उसे लिखने या ड्राफ्ट करने का काम clerical staff करता है। बस यही योगदान है बाबा साहेब का।
अच्छा लगा कि संविधान निर्माण की प्रक्रिया को पाठकों तक पहुंचाया, अन्यथा ये जानकारी राजनीति शास्त्र पढ़ने वाले विद्यार्थी परीक्षा पास करने केलिए मजबूरन लेते हैं।
संविधान को संकट से बचाने वाला नेता तो निश्चित ही इस जानकारी से वंचित होगा।
बहुत से लोग इस जानकारी से भी वंचित होंगे कि, अंबेडकर ने मृत्यु (6/12/65) से कुछ दिन पूर्व (October 14, 1956), 365,000 अन्य दलितों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था। मैं खांटी लखनऊ की रहने वाली। जब मायावती जी ने जेल हटा कर, आज के समय में जैत *वन* (पत्थरों का) बनाया तो बौद्ध धर्म से सम्बन्ध जानने की इच्छा हुई।इतनी संख्या के साथ धर्म परिवर्तन के पीछे यह डर काम कर रहा होगा कि यदि अकेले धर्म परिवर्तन किया तो सामाजिक बहिष्कार या आलोचना हो सकती है। स्पष्टतः जो व्यक्ति स्वयं को दलित कहलाने में शर्मिंदा रहा, वह दलितों का मसीहा कैसे बन सकता है? ये तो नेता हैं या स्वयंसिद्ध, जो बाबा साहेब को भगवान मानते हैं। जैसे साईं बाबा व्यक्ति से भगवान बना दिए गए वैसे ही इन्सान किसी को भी भगवान बनाते हैं। दक्षिण भारत में तो फिल्म स्टार्स के भी मन्दिर बन जाते हैं। मेरी जानकारी में बौद्धों को आरक्षण नहीं मिलता। फिर आरक्षण का तथा अन्य बहुत सी लाभकारी योजनाओं का श्रेय बाबा साहेब को क्यों दिया जाता है?
अंबेडकर से अधिक महत्वपूर्ण कार्य पेरियार ई. वी. रामासामी*, और ज्योतिराव फुले• ने किया है। जिनकी चर्चा शायद ही संसद में होती हो। ये मात्र क्षेत्रीय नेता या समाज सुधारक बन के रह गये।
सत्य कहा कि सभी राजनीतिक दल अगला चुनाव जीतने के लिए ही काम करते हैं। लेकिन कुछ वास्तव में कुछ काम कर लेते हैं, कुछ केवल भावनाओं को भड़का कर, कभी स्वतंत्रता दिलाने का श्रेय लेकर, कभी दलित मुस्लिम करके वोट लेकर गद्दी का सुख राजशाही की तरह लेते हैं।
तटस्थता से लिखा गया, ज्ञानवर्धक संपादकीय।
*https://www.themooknayak.com/bahujan-nayak/special-things-you-should-know-about-periyar
•https://www.themooknayak.com/bahujan-nayak/dalit-history-month-special-mahatma-jyotirao-phule-public-welfare-works-and-scientific-ideas-will-continue-to-guide-humanity-for-ever
शैली जी आपकी टिप्पणी ने तो संपादकीय के औचित्य को सिद्ध कर दिया है। अधिकांश विषयों पर आपकी जानकारी अद्भुत होती है। हार्दिक धन्यवाद।
सर, आम तौर पर जिस विषय को लोग छूने से बचते हैं या बहुत संभलकर बात करते हैं, उस पर खरा खरा लिखने के लिए साधुवाद। तथ्यों से परिपूर्ण और यथार्थपरक संपादकीय से ज्ञानवर्धन भी हुआ।
सर, सबसे महत्वपूर्ण बात कि राजनेता हो या कोई भी विशिष्ट व्यक्ति क्यों न हो, उन्हें जब तक एक इंसान के रूप में देखा जायेगा, तभी सही कद और आकलन संभव है। भगवान बना देना वोटों की राजनीति का सबसे आसान तरीका है।
शैली जी सच बोलना मेरे व्यक्तित्व का अटूट हिस्सा है जो मैंने अपने बाऊजी से पाया है। इस समर्थन के लिए हार्दिक धन्यवाद।
अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर संपादकीय लिखा आपने। काश आम जनता के मध्य शिद्द्त से यह जानकारी जा पाए और वह समझ पाए कि उसकी नासमझी के कारण राजनीतिक पार्टियां
कैसे उससे फुटबाल की तरह खेलती हैं और तरह तरह के झूठे सच्चे मुद्दे उठा कर अपना उल्लू सीधा करती है। वर्तमान समय के भटके हुए युवा तो कुछ अधिक ही अनजान हैं। उनमें जोश है ताकत है लेकिन बुनियादी जानकारी का सर्वथा अभाव है। 18 साल के अधिकतर युवा राजनीतिज्ञों के लिए मात्र वोट-बैंक हैं और युवा इनके तिलस्मी वादों, सिद्धांतों व मुद्दों के मध्य अपना अंपग भविष्य संवारने की राह ढूंढ रहा है।
अत्यंत जानकारीपरक संपादकीय। साधुवाद आपको।
सुधा इस सार्थक और अर्थपूर्ण टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार।
आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी का डॉ. आंबेडकर को भगवान बनाने की कोशिशों पर आधारित यह लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि वास्तव में संविधान का निर्माण और लेखन कार्य तत्कालीन आईएएस बी एन राव ने किया था और इसके लिए राव जी ने अनेक देशों के संविधानों का गहन अध्ययन किया था तथा अनेक देशों में स्वयं जाकर वहां के संविधान के संबंध में लोगों लोगों की राय ली थी। संविधान सभा ने कई समितियां बनाई थीं, जिसमें से प्रारूप समिति में डॉ आंबेडकर को जगह दी गई थी। उन्होंने राव के साथ मिलकर इसका प्रारूप तैयार किया था। इसलिए उन्हें ही संविधान निर्माता कहना अनुचित होगा। मेरी पुस्तक भारतीय संविधान के निर्माता मिथक और यथार्थ में इसका विस्तृत वर्णन किया गया है। संविधान लागू होने के कुछ समय बाद ही डॉ आंबेडकर को भारतीय संविधान से निराशा होने लगी थी और वे इसे जलाने की बात करने लगे थे। इसलिए संविधान खतरे में है की बात करने वाले और डॉ आंबेडकर जी को संविधान निर्माता बताने वाले राजनेता उन्हें भगवान की भांति मान्यता देने का प्रयास कर केवल राजनीति कर रहे हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। निस्संदेह डॉ आंबेडकर एक विद्वान व्यक्ति थे, किंतु वे भी मनुष्य थे और उनमें भी मानवीय दुर्बलताएं अवश्य थीं, यह तथ्य हमें विस्मृत नहीं करना चाहिए। एक विचारोत्तेजक तथा बेबाकी से परिपूर्ण संपादकीय लिखने के लिए आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी बधाई के पात्र हैं।
पुनीत भाई, संपादकीय के लिए आपका समर्थन महत्वपूर्ण है। आप तो पाठकों को संपादकीय पूरी तरह समझा देते हैं। हार्दिक धन्यवाद।
अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करने के लिए हार्दिक बधाई एवं साधुवाद आपको आदरणीय संपादक महोदय
हार्दिक आभार विनीत भाई।
बहुत बढ़िया बिल्कुल सच मेरे भी यही विचार है।
भाग्यम जी शुक्रिया।
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
सबसे पहले आपको इस बार के संपादकीय के लिये तहेदिल से शुक्रिया! वैसे तो आपका हर संपादकीय विशिष्ट ही रहता है, किन्तु इस संपादकीय को हम सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।वह इसलिये कि इस संपादकीय के माध्यम से सब जान पाएँगे संविधान निर्माण की सच्चाई।
कबीर ज्ञानमार्गी शाखा के प्रमुख कवि रहे। किसी भी धर्म और जाति से परे उन्होंने अनावश्यक रूढ़ियों और गैर जरूरी परंपराओं का विरोध कर मानवता को प्रमुखता दी। लेकिन हम आपकी इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि अगर आज का वक्त होता तो संसद तो छोड़ ही दीजिए ,संसद के बाहर भी अगर कबीर ने इस तरह की कोई बात कही होती तो उनका जबरदस्त विरोध होता। क्या पता जीवित भी बचते कि नहीं।
सच कहना सबके लिए आसान भी नहीं होता। सच बोलने का दम सच्चा वीर ही रखता है। और सच को झेलना तो बिल्कुल भी सहज नहीं। झूठ को सच साबित करने के लिए लोग आजकल एड़ी से चोटी तक का जोर लगा देते हैं।
हम 16 आने सहमत हैं कि राजनीतिज्ञों के खराब व्यवहार की कोई हद नहीं है और हद मुकर्रर करेगा ही कौन? सभी नहले पर दहले की तरह हैं।कुर्सी की चमक, तेज, प्रभाव,अधिकार अपने आप को भगवान से कम ना समझने की ताकत, फिर परहेज कैसा? फिर मुद्दे चाहे जितने भी हों, जैसे भी हों,जो भी हों। कुर्सी को पकड़ने का लालच लोग छोड़ नहीं पाते।
आपका इस बार का संपादकीय बेहद-बेहद महत्वपूर्ण है। इस दृष्टि से कि हर भारतीय को कम से कम संविधान के बारे में जरूर जानना चाहिये साथ ही यह जानना भी बहुत जरूरी है कि संविधान बनाने जैसा काम किसी एक शख्सियत का हो ही नहीं सकता।
इसकी संपूर्ण जानकारी देने के लिए आपका विशेष शुक्रिया।
यह एक भ्रांति है जो एक लंबे समय से फैली हुई है कि अंबेडकर ही संविधान के रचयिता हैं और यह भी सच है कि इस भ्रांति को दूर करना इतना सहज नहीं क्योंकि लोग आजकल जो सुनते हैं उसे ही सच मान लेते हैं। सच्चाई को जानने का प्रयास नहीं करते। कोर्स की पढ़ाई करना ही जिनके लिए भारी हो वह युवा वर्ग है या बच्चे किसी अन्य पुस्तक या अन्य जानकारी से कोई वास्ता ही नहीं रखते। इसे थोड़ा-थोड़ा ही सही, जरूरी-जरूरी ही सही,लेकिन कोर्स से जोड़ना बहुत जरूरी है। स्कूलीय शिक्षा सेही। कॉलेज के एग्जाम तो लोग सिर्फ गाइड बुक खरीद के और इंपोर्टेंट क्वेश्चन को पढ़कर कर पास लेते हैं।
किसी भी नियमों की स्थापना के लिये य चयन के लिए संसद में बहुमत की जरूरत होती है। किसी एक का निर्णय नहीं रहता इसलिये किसी को इसके लिये दोष नहीं दिया जा सकता।
हमारी संस्कृति बहुत अच्छी जरूर है लेकिन जिन नियमों को अंबेडकर लागू करना चाहते थे वह सभी संभवतः जरूरी होने पर भी अगर वह चालू हो जाते तो निश्चित ही अच्छा रहता लेकिन अगर वह नहीं हुए इसका ठोस कारण होगा वह आज भी इतना आसान लगता नहीं।
धारा 370 संभवतः उस समय की जरूरत रही होगी, आज नहीं थी मोदी सरकार ने हटा दी इसके लिए उनका यह साहस प्रशंसनीय है।
हर नेता अपने समय और स्थितियों के अनुरूप किसी भी विषय पर निर्णय लेते हैं। और कोई भी भगवान नहीं है इसलिए गलतियाँ भी हो जाया करती हैं।
तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में कहा है-
जड़-चेतन ,गुण-दोषमय विश्व कीन्ह करतार,
संत हंस गुण गहँहि पय परिहरि वारि विकार।।
(इस जड़-चेतन संसार को ईश्वर ने गुण और दोषों से युक्त बनाया है। यहां संत लोग हंस की तरह जल रूपी विकार को छोड़कर दूध रूपी गुण को ही ग्रहण करते हैं।
(हंस की यह प्रवृत्ति रहती है कि अगर दूध और पानी मिलाकर उसके सामने रखा जाए तो वह उसमें से दूध को ग्रहण कर लेगा और पानी पानी छोड़ देता है)
हम आपके इस बात से भी पूरी तरह सहमत हैं कि कोई भगवान नहीं है। अछूत उद्धार के लिए गांधी जी ने जितना काम किया है जितना प्रयास किया है उतना किसी ने भी नहीं किया। इसके अलावा दक्षिण भारत में छूत-अछूत में चरम पर था वहाँ अनेक लोगों ने इस क्षेत्र में प्राणान्तक काम किया बिना किसी नाम और यश की चाहत के।
अंबेडकर ने तोअछूत उद्धार की बात छोड़ कर हजारों लोगों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया।
ख़ैर…. शुक्रिया पुनः आपका।
आदरणीय नीलिमा जी आपकी विस्तृत टिप्पणी के बाद तो तमाम पाठकों को संपादकीय पूरी तरह समझ आ जाएगा। आपकी हर विषय पर पुख़्ता जानकारी होती है। हार्दिक धन्यवाद।
यों तो आपके सभी सम्पादकीय एक से बढ़ कर एक होते हैं, यह सम्पादकीय तो और भी आगे है। आप हमेशा आम आदमी की स्थिति व उसके दर्द की बात को दिल व दिमाग़ दोनों से मंथन करते हैं, तब उसमें से विचारों का अद्भुत नवनीत निकल कर बाहर आता है।
आपने सही कहा कि राजनीति में वोटों के लिए किसी को भी भगवान बना दिया जाता है। नोटों के स्तेमाल की तो कोई सीमा ही नहीं है। मेरा एक दोहा मुझे याद आ रहा है…… बहुत तरक़्क़ी हो गई, बना दिया रोबोट ।
जितने भारी नोट हों, उतने भारी वोट ।।
आपने आज के संदर्भ में कबीर की सही स्थिति बयान की है। ये स्वार्थी तत्त्व किसी को भी नहीं छोड़ेंगे। कबीर को भी छोड़िए, अगर स्वर्ग से असली भगवान भी उतर आएँ, तो उनकी भी धज्जियाँ उड़ा देंगे। यों अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए ये किसी को भी भगवान बना दें, यह और बात है।
आपका सम्पादकीय निश्चित रूप से बेहतरीन है।
आदरणीय शशि जी, आप पुरवाई के हर संपादकीय को ना केवल पढ़ती हैं, बल्कि हमारा मार्गदर्शन भी करती हैं। स्नेह बनाए रखें।
आपने हमेशा की तरह ज्ञानवर्धक और समसामयिक घटनाचक्र पर उल्लेखनीय वर्णन किया है । भारतीय राजनीति की दाँव-पेंच समझने में मदद मिलती है।
हार्दिक धन्यवाद सरिता जी।
जहां राजनैतिक दलों ने स्वार्थवाद आंबेडकर को भगवान जैसा बना दिया, कुछ एक लोगों को सच्चाई का पता चलने पर घृणा के आवेश में लिख मारा।
संपादकीय की विशेषता है कि यह पूर्वाग्रह रहित और तथ्यपरक है।
आप का समर्थन महत्वपूर्ण है भाई हरिहर जी।
स्वार्थवाद —-> स्वार्थवश
अंबेडकर और संविधान निर्माण के संदर्भ सर्वथा नवीन जानकारी संपादकीय के माध्यम से प्राप्त हुई।
बहुत ही संतुलित तथ्यों से परिपूर्ण संपादकीय।