Wednesday, February 11, 2026
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संपादकीय – सुनो ना… सुनो ना… सुन लो ना…!

अगर मीर और ग़ालिब आज के ज़माने में लिख रहे होते और बेचारों को पश्चिम बंगाल की उर्दू अकादमी में निमंत्रित किया जाता, तो ममता बनर्जी की सत्ता, ‘जमीयत उलेमा-ए-हिंद’ और ‘वाहियान फाउंडेशन’ का इस्लाम और ‘उर्दू अकादमी’ का अस्तित्व ख़तरे में पड़ गया होता।

फ़िल्म ‘चलते-चलते’ में जावेद अख़्तर कहते रह गए सुनो ना… सुनो ना… सुन लो ना… मगर कोलकाता में किसी ने उनकी एक नहीं सुनी और उनके प्रस्तावित कार्यक्रम को स्थगित कर दिया… ‘किन्हीं अपरिहार्य कारणों’ से स्थगित!
पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी ने ‘साहित्य एवं सिनेमा’ पर आधारित एक चार-दिवसीय कार्यक्रम की घोषणा की थी, जिसमें कि एक ‘मुशायरे’ का आयोजन भी होना था। इस कार्यक्रम के लिए जावेद अख़्तर को मुख्य अतिथि के तौर पर निमंत्रित किया गया था। इससे पहले भी जावेद अख़्तर कोलकाता में बहुत से साहित्यिक कार्यक्रमों में शामिल हो चुके हैं। 
जावेद अख़्तर एक घोषित नास्तिक हैं। वे किसी भी धर्म या मज़हब को नहीं मानते… दरअसल वे ईश्वर के अस्तित्व को ही पूरी तरह से नकारते हैं। उनकी बातें तार्किक होती हैं, मगर कई बार तल्ख़ भी हो जाती हैं। वे बहुत-सी बातें ऐसी कहते हैं जो कि ओशो कहा करते थे, मगर ओशो की आवाज़ न तो कभी ऊँची होती थी, और न ही उसमें तुर्शी होती थी। 
मैं यह स्पष्ट कर देना चाहूँगा कि मैं जावेद अख़्तर का प्रशंसक नहीं हूँ… और न ही गुलज़ार का। मुझे ऐसा लगता है कि इन  दोनों को साहित्यकार के रूप में आवश्यकता से अधिक महत्व दिया जाता है। मगर आज के संपादकीय का मुद्दा जावेद अख़्तर के साहित्यकार होने या उनके साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता होने के बारे में नहीं है। आज का मुद्दा है “चरमपंथियों द्वारा एक साहित्यकार का अपमान”। एक साहित्यिक पत्रिका का संपादक होने के नाते यह मेरा नैतिक कर्तव्य भी बनता है कि किसी भी साहित्यकार का अपमान हो, तो उसे पूरी साहित्यिक बिरादरी का अपमान समझना चाहिए । 
‘जमीयत-उलेमा-ए-हिंद’ और ‘वाहियान फाउंडेशन’ ने जावेद अख़्तर को ‘शैतान’ बताते हुए निमंत्रण भेजने का तीखा विरोध किया था। इन संस्थाओं ने ममता बनर्जी सरकार को चेतावनी भी दी थी, कि यदि यह कार्यक्रम आयोजित किया गया, तो सरकार को उनके प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है। जमीयत ने यह भी चेतावनी दी कि अगर निमंत्रण वापस नहीं लिया गया, तो वे 2007 में तस्लीमा नसरीन के खिलाफ हुए आंदोलन जैसा ही विरोध करेंगे। दोनों संस्थाओं का कहना था कि जावेद अख़्तर बार-बार धर्म और ईश्वर के खिलाफ बोलते हैं, इसलिए उन्हें मंच देना गलत है।
‘जमीयत उलेमा-ए-हिंद’ की राज्य इकाई के महासचिव मुफ़्ती अब्दुस सलाम कासमी ने कहा, “जावेद अख़्तर की कुछ हालिया टिप्पणियों ने मुसलमानों के एक वर्ग की भावनाओं को ठेस पहुँचाई है। हमारा मानना है कि एक अल्पसंख्यक संस्थान होने के नाते पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी किसी ऐसे व्यक्ति को आमंत्रित कर सकती है जिसने आम मुसलमानों की भावनाओं को ठेस न पहुँचाई हो।”
‘वाहियान फाउंडेशन’ ने भी इस निमंत्रण का विरोध करते हुए कहा, कि जावेद अख़्तर जैसे लोग युवा दिमागों पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। रिपोर्ट के अनुसार फाउंडेशन के मुफ्ती शमील नदवी ने कहा था कि ‘हमें यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि अकादमी ने जावेद अख़्तर साहब को इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करने के लिए आमंत्रित किया है। यह आश्चर्यजनक है क्योंकि अकादमी मुख्यतः मुसलमानों के योगदान का प्रतिनिधित्व करती है।’
यानि कि यह तो तय हो गया कि उर्दू भारत में मुसलमानों की भाषा है, और यदि आप नास्तिक या क़ाफ़िर हैं तो आपको वहाँ आमंत्रित नहीं किया जा सकता है।  ध्यान देने लायक बात यह भी है कि पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी की अध्यक्ष वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हैं, और तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद उपाध्यक्ष हैं। 
आयोजन शुरू होने से कुछ घंटे पहले उर्दू अकादमी ने उस कार्यक्रम को रद्द कर दिया। जब पूछा गया तो अकादमी की सचिव नुजहत जैनब ने एक आधिकारिक बयान में केवल ‘न टाली जा सकने वाली परिस्थितियों’ का हवाला दिया। उन्होंने आगे कहा कि “हम नई तारीखों की घोषणा बाद में करेंगे।” हालाँकि जब कार्यक्रम दोबारा आयोजित किया जाएगा, उसमें जावेद अख़्तर साहब को निमंत्रित किया जाएगा या नहीं, इस बात को स्पष्ट नहीं किया गया।
ममता बनर्जी और उनका मंत्री मंडल इस चिंता में हैं कि अगले साल मार्च में पश्चिम बंगाल में चुनाव होने वाले हैं। भला वहाँ की सरकार अपने वोट-बैंक की बात कैसे नहीं मानेगी। मन में यह भी विचार आ रहा है कि क्या पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी  की आत्मा ममता दीदी में प्रवेश कर गई है और उन्होंने भी राजीव गाँधी जैसा निर्णय लेने में ही भलाई समझी। 
वामपंथी छात्र संगठनों (एस.एफ.आई., ए.आई.एस.एफ़, आइसा आदि के प्रतिनिधियों ने कार्यक्रम को स्थगित करने की निंदा की है। उन्होंने जावेद अख़्तर को दिल्ली में ‘हिंदी सिनेमा में उर्दू की भूमिका” पर बोलने का निमंत्रण दिया है। मगर किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि जावेद अख़्तर को कोलकाता में न्यौता देकर कोई कार्यक्रम आयोजित कर सके। रवीन्द्रनाथ टैगोर की धरती पर पहले तसलीमा नसरीन पर हमला हुआ, और बंगाल से निष्कासित कर दिया गया। अब बारी जावेद अख़्तर की है। कारण दोनों के मामले में एक ही है। दोनों ने शांतिप्रिय मज़हब के ठेकेदारों को नाराज़ कर दिया, और अब ख़मियाज़ा भुगत रहे हैं। 
जावेद अख़्तर ने उर्दू अकादमी के निर्णय पर टिप्पणी करते हुए कहा, “मेरे लिए यह बिल्कुल भी नया नहीं है!  अगर मैं आपको फ़ोन और मैसेज दिखाऊं तो मुझे लगातार कट्टरपंथियों, हिंदू और मुस्लिम, दोनों से नफ़रत भरे ई-मेल मिलते हैं… कुछ कहते हैं कि मैं जिहादी हूँ और मुझे पाकिस्तान चले जाना चाहिए…  कुछ कहते हैं कि मैं काफ़िर हूँ और सौ फीसदी मैं नर्क में जाऊँगा… और मुझे अपना नाम बदल लेना चाहिए। मुझे मुस्लिम नाम रखने का कोई हक़ नहीं है वगैरह… वगैरह।  तो मेरे लिए यह कोई नई बात नहीं है। मैं आपको बता दूँ कि 20-25 साल में चार बार मुंबई पुलिस ने मुझे अपनी मर्जी से सुरक्षा दी है। मैंने इसके लिए कहा नहीं था; लेकिन उन्होंने कहा कि इसकी ज़रूरत है, इसलिए हम आपको दे रहे हैं। चार में से तीन बार ऐसा किसी मुस्लिम कट्टरपंथी संगठन या व्यक्ति की वजह से हुआ और एक बार दूसरे पक्ष की वजह से।”
लेखिका तस्लीमा नसरीन ने अतीत की उस वाम मोर्चा सरकार को याद किया, जिसने उन्हें पश्चिम बंगाल छोड़ने के लिए मजबूर किया था| उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल की सी.पी.एम. सरकार ने मुझे राज्य छोड़ने पर मजबूर किया| इससे किसकी ताकत बढ़ी? जाहिर है कि इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों की ताकत।
अब वे जावेद अख़्तर के खिलाफ भड़के हुए हैं, जिन्हें उर्दू अकादमी ने आमंत्रित किया है। वे कह रहे हैं, ‘जावेद अख़्तर ने इस्लाम की आलोचना की है, हम उन्हें पश्चिम बंगाल में घुसने नहीं देंगे। अगर वे घुसे, तो हम उन्हें वैसे ही भगा देंगे, जैसे हमने तसलीमा को भगाया था। उर्दू अकादमी इस्लामी कट्टरपंथियों के सामने बेबस है… यहाँ तक कि राज्य सरकार भी शायद बेबस है।
रंगकर्मी सफ़दर हाशमी की बहन शबनम हाशमी ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपना विरोध प्रकट किया है। सोशल साइट ‘एक्स’  पर शबनम हाशमी ने लिखा है, “ये तो शुरुआत है… मैं ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रही हूँ… बोल रही हूँ… अपने सीनियर कार्यकर्ताओं और युवाओं से कह रही हूँ कि वे मुस्लिम राइट विंग की ओर से चलाए जा रहे मंचों को मान्यता देना बंद करें।”
जावेद अख़्तर को टैग करते हुए शबनम हाशमी ने लिखा है, “अगर आप इसके लिए तैयार हैं, तो मैं कोलकाता में कार्यक्रम करूँगी… देखती हूँ किसकी हिम्मत है जो रोक दे। SFI, AISF और आइसा जैसे संगठनों की तरफ से जारी एक संयुक्त बयान में कहा गया है- ऐसी धमकियों का विरोध करने के बजाय, सरकार ने आत्मसमर्पण कर दिया… ये हमला न केवल जावेद अख़्तर हुआ है, बल्कि कला, संस्कृति, धर्मनिरपेक्षता और बौद्धिक स्वतंत्रता पर है। जावेद अख़्तर का कार्यक्रम रद्द होने के बाद तृणमूल कांग्रेस सरकार निशाने पर आ गई है। पश्चिम बंगाल सरकार पर कट्टरपंथियों के दबाव में घुटने टेक देने का इल्ज़ाम लग रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के निर्णयों से राज्य सरकार न सिर्फ इस्लामी कट्टरता के सामने झुक रही है, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से हिंदू राष्ट्रवाद को भी बढ़ावा दे रही है। पश्चिम बंगाल, जो कभी बौद्धिकता, बहुलतावाद और प्रगतिशील सोच का केंद्र था, अब धीरे-धीरे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध कदम उठाने लगा है। जावेद अख़्तर का कार्यक्रम स्थगित होना कोई संयोग नहीं, बल्कि एक राजनीतिक सौदे का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें सत्ता के बदले स्वतंत्रता की कुर्बानी दी जा रही है।
आज बंगाल एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ या तो वह कट्टरपंथी वीटो के आधीन रहकर हर विचार को धार्मिक टेस्ट  से पास करेगा, या फिर वह अपने सांस्कृतिक और बौद्धिक इतिहास को याद करके ‘नवजागरण’ की परंपरा को पुनर्जीवित करेगा। यह सिर्फ एक कार्यक्रम की बात नहीं है,  यह उस डरावनी चुप्पी की शुरुआत है… जिसमें हर आवाज ख़ामोश की जा रही है, हर सोच को शक की नज़र से देखा जा रहा है।
‘पुरवाई’ का मानना है कि यह सिर्फ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम को रद्द करने की बात नहीं है, बल्कि पश्चिम बंगाल में लगातार  बौद्धिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर संकट के बादल गहराते जा रहे हैं| आलोचकों का कहना है कि यह कदम सरकार की राजनीतिक मजबूरियों और वोट बैंक की राजनीति का परिणाम है, जिससे राज्य की धर्मनिरपेक्ष पहचान खतरे में पड़ती जा रही है। 
मुझे आज मीर और ग़ालिब की याद आ रही है। मुझे याद आता है ग़ालिब का वह  अमर शेर… “हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन / दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।” और मीर ने तो बहुत तल्ख़ लहजे में कहा था – “मीर के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो / उन ने तो क़श्क़ा खींचा, दैर में बैठा, कब का तर्क इस्लाम किया।”
अगर मीर और ग़ालिब आज के ज़माने में लिख रहे होते और बेचारों को पश्चिम बंगाल की उर्दू अकादमी में निमंत्रित किया जाता, तो ममता बनर्जी की सत्ता, ‘जमीयत उलेमा-ए-हिंद’ और ‘वाहियान फाउंडेशन’ का इस्लाम और ‘उर्दू अकादमी’ का अस्तित्व ख़तरे में पड़ गया होता।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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37 टिप्पणी

  1. आज का संपादकीय कई सियासत के बड़े खिलाड़ियों की नींद उड़ा देगा और कोई बड़ी बात नहीं कि वे अपने अंदर के अश्वत्थामा के जिन्न को छदम रूप में इस युद्ध में उतार ही दें।
    क्योंकि छली शकुनि फितरत तो विजडम बास्केट में अपना खेल खेलने में लगी है।
    वीर सुभाष ,शरत चंद्र,बंकिम ,गुरुदेव टैगोर की
    ओजस से परिपूर्ण भूमि अब सीना पार पड़ोसी की औरंगजेबियत फितरत और घृणित कार्यों से चर्चा में कई सालों से है।घुसपैठ,धार्मिक उन्माद,चोरी और सीना जोरी,देश की बच्चियों के साथ वीभत्सता कोई नई बात नहीं।तिस पर भी केंद्र का धृतराष्ट्र को भजना ,,,ऐसे कई प्रकरण हैं,जिनमें आम आदमी महज़ एक खिलौना या वोट बैंक जिसे जिम्नास्टिक में पैरलल बार या घोड़े सरीखा है।इस पर बंगाल की पॉलिटिक्स
    जनसंख्या में बदलाव और कठमुल्लापन का आत्मघाती खेल खेल रही है।यह संपादकीय उसी की उपज है।
    उर्दू भाषा को एक फ़िरके या धर्म विशेष से जोड़ कर देखना और उसे साबित करने हेतु वैसे ही पारिस्थितिक तंत्र को स्थापित करना एक खतरनाक स्थिति है।
    यह संपादकीय बंगाल और उर्दू,साहित्य,सिने के जन तथा आम जन तक पहुंचना चाहिए।

    • भाई सूर्यकांत जी आपने पश्चिम बंगाल की उर्दू अकादमी की घटना को बहुआयामी टिप्पणी से संपादकीय को बेहतरीन समर्थन दिया है।

  2. सादर नमस्कार सर..
    नैतिक विचारों से परिपूर्ण यह संपादकीय कई जानकारी दी तथा उचित दिशा में सोचने को प्रेरित भी किया। वर्तमान स्थिति यह है कि हर छोटी बड़ी बात राजनीतिक हो जा रही है… और हर बात पर दंगा घिराओ विरोध..ये सबकुछ अब होना ही है…

    बहुत ही महत्वपूर्ण संपादकीय है सर हर बार की तरह … साधुवाद

  3. आदरणीय संपादक महोदय
    इस बार का संपादकीय गंभीरता से विचारणीय मुद्दा उठा रहा है। हालांकि बंगाल में कट्टरवादी इस्लाम का झंडा फहराने वाले लोग तो सरकार द्वारा ही पोषित है!
    किसी भाषा पर आयोजित कार्यक्रम का स्थगित किया जाना तो सीधे-सीधे वोट बैंक की राजनीति ही है। जो शेर पालता है उसको कभी ना कभी शेर चीरता तो होगा ही!
    अत्यंत शोचनीय स्थिति को दर्शाने वाला गंभीर संपादकीय धन्यवाद।

  4. आज का संपादकीय कई लोगों की नींद उड़ा ले जाएगा। आज ही क्यों ? नींद तो पहले ही उड़ जाना चाहिए। लोगों के जागे रहने पर असल जागना तब है जब इसके लिए कुछ हिम्मत दिखाई जाए। आपकी पहल बहुत सराहनीय है पर किसी के कानों पर जूं रेंगे तब क्रियाशील होंगे लोग। बौद्धिकता और अभिव्यक्ति पर खतरा और पहरा दोनों ही गलत हैं। बढ़िया संपादकीय के लिए बधाई।

    • पद्मा आपने सही कहा… बौद्धिकता और अभिव्यक्ति पर ख़तरा और पहरा – दोनों ही ग़लत हैं।

  5. ये प्रतिक्रिया स्वभाविक है अपनी स्वार्थसिद्धि के लिये। मनुष्य को संसार में न्याय भी देखना और अन्याय भी। संदर्भ अलग-अलग हो सकते हैं। बढ़िया सम्पादकीय। वैसे स्वार्थ न्याय पर हावी अधिक होता है।

  6. *जो सच बोले उसी सूली चढ़ा दो*…
    कला, संस्कृति, साहित्य, मानवीय धर्म और संवेदनाएँ जब कट्टरता की भेंट चढ़ जातीं हैं तब अमानवीयताएँ और नाइंसाफियाँ फूलने-फलने लगती हैं। अपसंस्कृतिमूलक सत्ताएँ झूठ को सच और सच को झूठ में बदलने के खुलेआम खेल खेलती हैं।
    कट्टरपंथी मानसिकता आज के पश्चिम बंगाल के लिए यह कोई नई बात नहीं है।
    जहाँ तक जावेद अख्तर साहब की बात है उनका अपना अलग मिजाज है, उनके सोचने का अलहदा नजरिया है। उनसे सहमत और असहमत बखूबी हुआ जा सकता है। लेकिन कला, संस्कृति और साहित्य पर कट्टरता हाबी
    हो, यह किसी भी दृष्टि से जायज नहीं है।
    पश्चिम बंगाल में कला, संस्कृति, साहित्य के बहाने भारतीय संस्कृति के वैशिष्ट्य को अपदस्थ करने के कुचक्र कट्टरपंथी निरंतर करते आ रहे हैं। रामनवमी व दुर्गापूजा जुलूसों पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं, प्रतिबंध ही नहीं, यात्राओं पर हमले, तोड़फोड, हिंसा, आगजनी आदि पश्चिम बंगाल की धरती पर अब आमबात हो गई है। यह दुरावस्था सभ्य और सांस्कृतिक समाज के लिए चिंता की बात है। किसी वरिष्ठ कवि की कविता यह पंक्ति पश्चिम बंगाल पर सटीक बैठती है-
    *जो सच बोले उसे सूली चढ़ा दो*।
    . आस्तिकता, नास्तिकता, ईश्वर, अनीश्वर, धर्म, पंथ, मजहब, उपासना और पूजा पद्धतियाँ आदि व्यक्ति की अपनी-अपनी निजी आस्थाओं और मान्यताओं पर निर्भर करती हैं।
    लेकिन यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रीय मूल्यों और राष्ट्रधर्म के विरुद्ध, मानवता के विरुद्ध कार्य करता है, बयानबाजी करता है तो फिर उसे समाज, संस्कृति और साहित्य से बहिष्कृत करना ही चाहिए।
    आपके संपादकीय की यही खास विशेषता है कि आप सामाजिक सरोकारों के वे सुलगते प्रश्न उठाते हैं, जिनका अनदेखी नहीं की जा सकती।
    वाजिब संपादकीय के लिए भाई तेजेंद्र शर्मा जी आपको अनेक साधुवाद।
    ••••••
    डॉ० रामशंकर भारती

    • भाई रामशंकर भारती जी, जिस तटस्थता से पुरवाई का संपादकीय लिखा गया है, उसी तटस्थता से आपने सार्थक टिप्पणी की है। आपके समर्थन के लिये हार्दिक धन्यवाद।

  7. आपने सही कहा है कि पश्चिम बंगाल अर्थात रवीन्द्रनाथ टैगोर की धरती, जो कभी बौद्धिकता, बहुलतावाद और प्रगतिशील सोच तथा नवजागरण का केंद्र था, अब धीरे-धीरे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध कदम बढ़ा रहा है। उर्दू अकादमी इस्लामी कट्टरपंथियों के सामने बेबस है, इस तरह के निर्णयों से सरकार इस्लामी कट्टरपंथियों के दबाव में घुटने टेक रही है, सत्ता के बदले स्वतंत्रता की कुर्बानी दे रही है। पहले तसलीमा नसरीन और अब जावेद अख़्तर के रूप में पुनरावृति हुई है। यह कदम सरकार की सियासी मजबूरियों और वोट बैंक की राजनीति का साफ़ नतीजा है। उर्दू, जिसे भारत की एक धर्मनिरपेक्ष भाषा मानी जाती रही है, इस पर मजहबी रोगन चढ़ाये जाने की कोशिशें हो रही है। यदि आप नास्तिक या क़ाफ़िर हैं तो आपको वहाँ आमंत्रित नहीं किया जा सकता है। वामपंथी छात्र संगठनों ने इसकी की निंदा की है यानी यह सिर्फ एक सियासी मामला है, वोट बैंक की राजनीति का साफ़ नतीजा है। जावेद अख्तर की पुकार “सुनो ना… सुनो ना… सुन लो ना…” को बंगाल ने तवज्जो नहीं दी।
    बेहतरीन विश्लेषण। शीर्षक भी शानदार

  8. इस तरह का विरोध किया ही जाना चाहिए, ये पश्चिम बंगाल को मुस्लिम कटटर वाद के हवाले किया जाना है लेकिन दुर्भाग्य ये कि इस सबके बावजूद ममता सेकुलर ही रहेंगी, इसके बारे में अब वेस्ट बंगाल के बौद्धिक वर्ग को सोचना चाहिए कि वे उनका प्रदेश किस दिशा में बढ़ रहा है ।

  9. आज का संपादकीय करेंट अफेयर्स के साथ भविष्य की चिंता से भी रूबरू कराता है। पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी ने ‘साहित्य और सिनेमा’ विषय पर चार दिवसीय कार्यक्रम के आयोजन में जावेद अख्तर जी को अध्यक्षता के लिए आमंत्रित किया था जिसका विरोध जमीयत-उलेमा ए-हिंद तथा वाहियान फाउंडेशन ने किया है। इन फाउंडेशनों ने जावेद अख्तर जी को शैतान बता दिया है। जावेद अख्तर जी नास्तिक जो है।
    पश्चिम बंगाल सरकार इनके आगे झुक भी गई। यह स्थिति असहज करने वाली है। वोट बैंक के लिए सरकारों का इनके सामने झुकना भविष्य के लिए हानिकारक सिद्ध होगा।
    आपने लिखा है कि विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के निर्णयों से राज्य सरकार न सिर्फ इस्लामी कट्टरता के सामने झुक रही है, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से हिंदू राष्ट्रवाद को भी बढ़ावा दे रही है।
    यह सही है कि इस तरह की घटनाओं से बहुसंख्यक हिन्दू परेशान हो जाता है। आज ये संगठन राज्य सरकार को झुका रहे हैं कल पूरे देश को झुकाएंगे। पाकिस्तान और बांग्लादेश की स्थिति से लोग अनभिज्ञ नहीं है। इसी से वे इन देशों के हिंदुओं के बीच अपने आपको रखकर देखने लगते हैं।
    एक बात और है इनके सामने कोई भी विचारधारा टिकती नहीं है। बंदूक सीने पर रखी हो तो अच्छे से अच्छे तीस मारखां विचारक की घिग्घी बंध जाती है। साहित्य हो या पत्रकारिता इनके सामने पानी भरते है। कुछ व्यक्ति तथा संगठन जावेद अख्तर जी को न बुलाए जाने का विरोध कर रहे हैं। उनके विरोध करने से कुछ नहीं होगा। सरकार ही झुक गई तो इनके चिल्लाने से क्या होता है।
    फिलहाल यह स्थिति ठीक नहीं कही जा सकती है। यह घटना भविष्य के भय को बढ़ावा दे रही है।
    इस पर संपादकीय का विषय बनाना बड़ी जुर्रत का काम है। वह भी बेबाकी के साथ। सबसे बड़ी बात इसमें जो संदर्भ दिए गए हैं उससे संपादकीय बहुत स्तरीय हो गई है ।
    सर आपने बहुत बढ़िया संपादकीय लिखा है। इसके लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।

    • आपने सही लिखा है भाल लखनलाल पाल जी कि इस विषय पर संपादकीय लिखना तलवार की धार पर चलने जैसा था… सावधानी हटी और दुर्घटना घटी वाली स्थिति थी। आपके समर्थन के लिये हार्दिक धन्यवाद।

  10. भारत की सांस्कृतिक मुख्यधारा से बंगाल तेजी से दूरी बना रहा है। उलेमा-ए-हिंद’ और “वाहिया’त'” फाउंडेशन’ जैसी धुर इस्लामी संगठन /संस्थायें पूरे राज्य का इस्लामीकरण कर रही हैं – ये इस्लाम के वे धड़े हैं जिन्हें कोई भी सृजनात्मक कार्य – कला साहित्य संगीत भी खुदा की शान के खिलाफ लगता है।

    आपका आज का संपादकीय आगाह करने वाला है।

  11. पुरवाई का यह अंक पठनीय और समयुकूल चिंतनीय है ।
    सम्पादकीय ,कविताएँ,कहानियाँ उत्कृष्ट और भावपूर्ण हैं ।अकादमिक दृष्टि से अंक बेहतर बन पड़ा है ।
    यशस्वी सम्पादक श्री तेजेंद्र शर्मा को
    बहुत बधाई ।

    मीनकेतन प्रधान ।
    रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
    भारत

    • भाई मीनकेतन, जी हमारी टीम का प्रयास रहता है कि हर अंक पिछले से बेहतर हो। आपको अंक पसंद आया, बहुत शुक्रिया।

  12. सर देखिए कैसा मजाक है ना ममता बनर्जी जो अपनी कठोरता के लिए जानी जाती है आज अपने वोट बैंक के लिए निर्णय नहीं कर पाईं। नेताओं के लिए कोई धर्म नहीं, कोई मजहब नहीं, कोई मान नहीं सम्मान। सब कुछ सिर्फ और सिर्फ अपनी कुर्सी के लिए।
    सच्चाई की परत दर परत खोलता आपका संपादकीय

  13. हमेशा की तरह आपने अपने विषय वैविध्य दृष्टि को बरकरार रखते हुए संपादकीय लिखा है। ममता बनर्जी की स्थिति ‘कहते बने न सहते’ की हो गई है। आपकी पारखी नज़र कुछ ऐसी ही है कि कोई भी क्षेत्र आपकी कलम (कीबोर्ड) से अछूता न रह पाएगा। गहन संपादकीय के लिए साधुवाद आदरणीय तेजेन्द्र जी!!

  14. आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी ने पुरवाई के इस अंक के संपादकीय में मुस्लिम कट्टरपंथियों की साम्प्रदायिकता और पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार द्वारा उसके आगे घुटने टेक देने का महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है। मैं भी अनेक विषयों पर जावेद अख्तर से सहमति नहीं रखता हूँ और हिन्दी सिनेमा में इस्लामिक सुप्रीमेसी के उनके लगातार लेखकीय आग्रह और विचारधारा के खिलाफ लिखता रहा हूँ लेकिन एक गीतकार, शायर तथा कई बार उनके निष्पक्ष विचारों की प्रशंसा करने से भी पीछे नहीं हटता। साहित्य में लोकतांत्रिक मूल्यों की अक्षुण्णता के लिए ऐसा करना आवश्यक भी है और समाज के उत्तम स्वास्थ्य के लिए अपरिहार्य भी।
    आज जिस प्रकार जमीयत उलेमा ए हिंद और वाहियान फाउंडेशन के दबाव में आकर बंगाल उर्दू अकादमी की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने तथाकथित अपरिहार्य कारणों से जावेद अख्तर के आमंत्रण वाले कार्यक्रम को स्थगित किया है, वह निंदनीय है और कला जगत के लिए काला दिन भी है क्योंकि मात्र चुनावी फायदे के लिए मुस्लिमों को संतुष्ट करने के उद्देश्य से किसी कार्यक्रम को रोकना बेहद निंदनीय कृत्य है। फिर उर्दू सिर्फ़ मुसलमानों की भाषा नहीं है, अपितु यह भारतीय उपमहाद्वीप की भाषा है। जिस तरह हिंदी केवल हिंदुओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती, उसी तरह उर्दू मुसलमानों की भाषा मात्र नहीं हो सकती। मेरा राजनेताओं से यह विनम्र निवेदन है कि वे भाषा और मजहब की रोटियां सेंककर देश आग लगाना बंद कर दें। वरना बात निकली तो बहुत दूर तलक जाएगी और इस आग में उनके घर भी आएंगे, जो इसका इस्तेमाल अपने कुत्सित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए करेंगे। एक बेहतरीन और प्रासंगिक संपादकीय लेखन के लिए आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी बधाई के पात्र हैं।

    • पुनीत आपने लिखा है – आज जिस प्रकार जमीयत उलेमा ए हिंद और वाहियान फाउंडेशन के दबाव में आकर बंगाल उर्दू अकादमी की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने तथाकथित अपरिहार्य कारणों से जावेद अख्तर के आमंत्रण वाले कार्यक्रम को स्थगित किया है, वह निंदनीय है और कला जगत के लिए काला दिन भी है क्योंकि मात्र चुनावी फायदे के लिए मुस्लिमों को संतुष्ट करने के उद्देश्य से किसी कार्यक्रम को रोकना बेहद निंदनीय कृत्य है। –

      आपसे पूरी तरह सहमत।

  15. आपने अपने संपादकीय में पश्चिम बंगाल में कुछ कट्टरपंथी ताकतों के कारण जावेद अख्तर के कार्यक्रम को रद्द करने की बात की है। ममता बनर्जी तो काफ़ी समय से वोट बैंक के लिए इन कट्टरपंथी ताकतों का मोहरा बनी हुई हैं। किसी के विचारों से असहमत होना, अलग बात है लेकिन इसके लिए कार्यक्रम को रद्द करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन ही कहलायेगा। आपने यह कहकर अच्छा व्यंग्य किया है कि लगता है कि राजीव गाँधी की आत्मा उनमें समा गई है। वोट के लिए ये छदम निरपेक्ष लोग न जाने कितने समझौते करेंगे।
    सदा की तरह समसामयिक जानकारी उपलब्ध कराता संपादकीय। साधुवाद आपको।

    • आदरणीय सुधा जी, आपने संपादकीय का समर्थन करते हुए लिखा है कि – “आपने यह कहकर अच्छा व्यंग्य किया है कि लगता है कि राजीव गाँधी की आत्मा उनमें समा गई है। वोट के लिए ये छदम निरपेक्ष लोग न जाने कितने समझौते करेंगे”। आपका समर्थन हमारे लिये महत्वपूर्ण है सुधा जी।

  16. कैसी विडंबना है कि लोकतंत्र में वोट कीं कुत्सित राजनीति के कारण एक साहित्यकार का अपमान स्वयं सरकार द्वारा किया गया है । सी एम वैसे तो छोटी-छोटी बातों पर तेज-तर्रार भाषण देती हैं। अब क्या हुआ? सटीक , उम्दा, प्रासंगिक सम्पादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।

  17. हमेशा की तरह एक खरा और बेबाक संपादकीय। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हुए, एक जाहिलपन से भरे राजनीतिक हमले के खिलाफ आपने एक तरह से हल्ला बोल दिया है। और यह जरूरी, बहुत जरूरी था। कोई जरूरी नहीं कि आप जावेद अख्तर की हर बात से सहमत हों। पर जावेद वह शख्स है, जो हर तरह की सांप्रदायिकता के खिलाफ है। इसलिए उस पर हमला इन्सानियत पर हमला है। इस पर भी हम नहीं बोलेंगे तो कब बोलेंगे!

    फिर एक बात और। जो उर्दू को मुस्लिमों की भाषा बताते हैं, वे उर्दू के हितैषी नहीं, दुश्मन हैं। उर्दू एक प्यारी भाषा है। उसे हिंदू, मुसलमान के चश्मे से देखना उसकी महान परंपरा को तार-तार कर देने जैसा अक्षम्य अपराध है।

    आपने बेबाकी से एक जरूरी सच कहा है। इसके लिए मैं आपकी कलम को सलाम करता हूं!

    स्नेह,
    प्रकाश मनु

  18. जावेद अख़्तर को पहले मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करना और फिर उस कार्यक्रम को स्थगित कर देना निश्चित रूप से इसके पीछे चरमपंथियों का हाथ है और ममता बनर्जी की सरकार उनके आगे झुक गई है। गद्दी की फ़िक्र तो करनी चाहिए किंतु इतना भी नहीं कि वोटों की खातिर अपनी साख को दाँव पर लगा दिया जाए।‌ यह निर्णय सरासर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार है और इसकी निंदा होनी ही चाहिए। एक स्वतंत्र देश में व्यक्ति को इतनी आज़ादी तो होनी चाहिए कि वह अपने विचारों के साथ इस समाज में रह सके। इस बात के लिए किसी को भी इतना अधिकार नहीं मिलना चाहिए कि वह दूसरों के कर्तव्य अकर्तव्य निर्धारित करे। वोटों की खातिर बहुत कुछ होते सुना है देखा है, यह कोई नई बात नहीं है किंतु यह कृत्य निंदनीय अवश्य है। सरकार इस स्तर पर मजबूर हो जाए, यह किसी भी तरह से स्वीकार योग्य नहीं है। शबनम हाशमी ने ठीक ही लिखा है ‘ऐसी धमकियों का विरोध करने की बजाय सरकार ने आत्म समर्पण कर दिया और सचमुच यह हमला सिर्फ़ जावेद अख्तर पर नहीं अपितु कला संस्कृति और बौद्धिक स्वतंत्रता पर हमला है आपने इस अन्याय का संज्ञान लिया और खुलकर उस पर अपनी बात रखी, आप बधाई के पात्र हैं। बुद्धिजीवी यदि किसी महत्वपूर्ण भूमिका में हों तो उन्हें इसी प्रकार निर्भयता पूर्वक अपनी आवाज़ उठानी चाहिए। यदि इसी तरह संकुचित दृष्टिकोण से संस्थाएं चलती रहीं तो अंध राष्ट्रवाद का विस्फोट भी होगा और इससे समाज को कुछ प्राप्त नहीं होगा।
    मुखर होकर अपनी बात रखने के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।

  19. आदरणीय तेजेन्द्र जी

    अब की बार के संपादकीय का विषय साहित्य से जुड़ा है। जाहिर है कि साहित्य की परिपेक्ष्य में यह एक ऐसी चिंता का विषय है, जिस पर करना तो बहुत कुछ चाहिये, होना भी बहुत कुछ चाहिये; लेकिन न कोई कुछ कर पाएगा, ना कुछ हो पाएगा। मगर होने के गर्भ में छुपे गंभीर परिणाम संभावित हैं।

    आप अक्सर अपनी कहानियों के संदर्भ में कहते रहे हैं कि मुख्य मुद्दा घटना नहीं होती, घटना के बाद की स्थितियाँ होती हैं। कुछ वैसे ही स्थिति यहाँ बन गई है।

    कार्यक्रम की घोषणाएँ तो काफी पहले से हो जाती हैं।

    जावेद अख्तर की इस नास्तिक सोच के बारे में भी सभी लोग जानते ही होंगे।

    किसी भी कार्यक्रम के आयोजन के पहले हर तरह से विचार करना आवश्यक होता है। आयोजन के उद्देश्य के अनुरूप विशिष्ट अतिथि का चयन किया जाता है! उसका पद,कद, प्रभाव और परिणाम पर विचार करके ही मुख्य अतिथि तय किया जाता है। यह तो पहले नहीं हुआ जबकि होना चाहिए था। आश्चर्य है कि विरोध होने के बावजूद भी तय हो गया, मतलब जान-बूझ कर किया गया।

    विरोध की खबर क्या ज़ावेद अख्तर को नहीं लगी होगी? निश्चित रूप से लगी होगी बेहतर होता कि वह स्वयं ही मना कर देते! कम से कम सम्मान की रक्षा होती।

    आज ही हमने किसी विद्वान का वीडियो सुनते हुए सुना – “जब आपको पता चल जाए कि आपकी कथित कमजोरियों की वजह से आपको बरखास्त किया जाना तय है, तब यह बेहतर है कि आप स्वयं रिटायरमेंट ले लें ताकि आपका सम्मान बना रहे।”

    इसे पढ़ते हुए हमें जावेद अख्तर की ही नहीं, आयोजन कर्ताओं की भी याद आई।

    एक संपादक के तौर पर आपकी चिंता वाज़िब है। और होनी भी चाहिये।

    हमें इस संपादकीय में सबसे अधिक दुख अगर किसी बात से पहुँचा तो वह है उर्दू भारत में मुसलमानों की भाषा है। और नास्तिक लोगों के लिए वहाँ जगह नहीं।

    राजनीति का प्रभाव यहाँ पर भी दिखाई दे रहा है। चुनाव और वोट बैंक यहाँ भी आड़े आ रहे हैं।

    जावेद अख्तर को तो खैर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है उन्होंने खुद ने कह दिया।

    तस्लीमा नसरीन ने बिल्कुल सही कहा कि सीपीएम सरकार ने उसे राज्य छोड़ने पर मजबूर करके इस्लामी कट्टर पंथी संगठनों की ताकत को बढ़ावा दिया। वर्तमान में जो हुआ वह उसी शह का प्रभाव है।

    अगर उस समय विरोध होता तो आज यह बात उठती ही नहीं।

    यह तो बिल्कुल तय है कि हमला जावेद अख्तर पर नहीं हुआ बल्कि यह कला, संस्कृति, धर्मनिरपेक्षता और बौद्धिक स्वतंत्रता पर हुआ है। इसके जो दूरगामी परिणाम हैं वह और खतरनाक हो सकते हैं।

    यह इस्लामिक कट्टरता और राष्ट्रवाद को आमने-सामने खड़ा कर रही है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी हमला है।

    एक छोटी सी सूचना आगामी परिणामों के चलते, राज्य स्तरीय एवं राष्ट्र स्तरीय समस्याओं के विध्वंसक जखीरे के साथ सामने खड़ी है।

    संपादकीय की गंभीरता महसूस हुई।आदरणीय तेजेन्द्र जी

    अब की बार के संपादकीय का विषय साहित्य से जुड़ा है। जाहिर है कि साहित्य की परिपेक्ष्य में यह एक ऐसी चिंता का विषय है, जिस पर करना तो बहुत कुछ चाहिये, होना भी बहुत कुछ चाहिये; लेकिन न कोई कुछ कर पाएगा, ना कुछ हो पाएगा। मगर होने के गर्भ में छुपे गंभीर परिणाम संभावित हैं।

    आप अक्सर अपनी कहानियों के संदर्भ में कहते रहे हैं कि मुख्य मुद्दा घटना नहीं होती, घटना के बाद की स्थितियाँ होती हैं। कुछ वैसे ही स्थिति यहाँ बन गई है।

    कार्यक्रम की घोषणाएँ तो काफी पहले से हो जाती हैं।

    जावेद अख्तर की इस नास्तिक सोच के बारे में भी सभी लोग जानते ही होंगे।

    किसी भी कार्यक्रम के आयोजन के पहले हर तरह से विचार करना आवश्यक होता है। आयोजन के उद्देश्य के अनुरूप विशिष्ट अतिथि का चयन किया जाता है! उसका पद,कद, प्रभाव और परिणाम पर विचार करके ही मुख्य अतिथि तय किया जाता है। यह तो पहले नहीं हुआ जबकि होना चाहिए था। आश्चर्य है कि विरोध होने के बावजूद भी तय हो गया, मतलब जान-बूझ कर किया गया।

    विरोध की खबर क्या ज़ावेद अख्तर को नहीं लगी होगी? निश्चित रूप से लगी होगी बेहतर होता कि वह स्वयं ही मना कर देते! कम से कम सम्मान की रक्षा होती।

    आज ही हमने किसी विद्वान का वीडियो सुनते हुए सुना – “जब आपको पता चल जाए कि आपकी कथित कमजोरियों की वजह से आपको बरखास्त किया जाना तय है, तब यह बेहतर है कि आप स्वयं रिटायरमेंट ले लें ताकि आपका सम्मान बना रहे।”

    इसे पढ़ते हुए हमें जावेद अख्तर की ही नहीं, आयोजन कर्ताओं की भी याद आई।

    एक संपादक के तौर पर आपकी चिंता वाज़िब है। और होनी भी चाहिये।

    हमें इस संपादकीय में सबसे अधिक दुख अगर किसी बात से पहुँचा तो वह है उर्दू भारत में मुसलमानों की भाषा है। और नास्तिक लोगों के लिए वहाँ जगह नहीं।

    राजनीति का प्रभाव यहाँ पर भी दिखाई दे रहा है। चुनाव और वोट बैंक यहाँ भी आड़े आ रहे हैं।

    जावेद अख्तर को तो खैर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है उन्होंने खुद ने कह दिया।

    तस्लीमा नसरीन ने बिल्कुल सही कहा कि सीपीएम सरकार ने उसे राज्य छोड़ने पर मजबूर करके इस्लामी कट्टर पंथी संगठनों की ताकत को बढ़ावा दिया। वर्तमान में जो हुआ वह उसी शह का प्रभाव है।

    अगर उस समय विरोध होता तो आज यह बात उठती ही नहीं।

    यह तो बिल्कुल तय है कि हमला जावेद अख्तर पर नहीं हुआ बल्कि यह कला, संस्कृति, धर्मनिरपेक्षता और बौद्धिक स्वतंत्रता पर हुआ है। इसके जो दूरगामी परिणाम हैं वह और खतरनाक हो सकते हैं।

    यह इस्लामिक कट्टरता और राष्ट्रवाद को आमने-सामने खड़ा कर रही है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी हमला है।

    एक छोटी सी सूचना आगामी परिणामों के चलते, राज्य स्तरीय एवं राष्ट्र स्तरीय समस्याओं के विध्वंसक जखीरे के साथ सामने खड़ी है।

    संपादकीय की गंभीरता महसूस हुई।
    इस गंभीर विषय पर लेखनी चलाने के लिए आपको बधाई।

  20. सादर प्रणाम भाई
    आपका संपादकीय बहुत ही सार्थक सारगर्भित और आवश्यक लगा।आप हमेशा जनहित व देश.व.साहित्य हित के मुद्दे उठाते हैं जिनपर बेबाक लेखन अभिव्यक्ति की एक सशक्त मुखर आवाज बन जाती है।विशेष रुप से पश्चिम बंगाल की साहित्यिक नीतियों और वहां कुकुरमुतते की तरह पनप रहे चरमपंथियों की घृणित सोच ने एक बौद्धिक सांस्कृतिक सोच.वाले प्रदेश को विद्वेष और घृणा का राजनीतिक रुप दे दिया है।वहां की उर्दू अकादमी द्वारा आयोजित कार्यक्रम को रद्द कर साहित्यकार कवि जावेद अख्तर को धमकियां दिया जाना केवल साहित्यकार ही नहीं साहित्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी अपमन
    है। साहित्य वैसे भी उपेक्षित हो रहा है बंगाल में।आपका संपादकीय गहनता से इस दिशा में चिंतन के लिए प्रेरित करता है–पश्चिम बंगाल, जो कभी बौद्धिकता, बहुलतावाद और प्रगतिशील सोच का केंद्र था, अब धीरे-धीरे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध कदम उठाने लगा है। जावेद अख़्तर का कार्यक्रम स्थगित होना कोई संयोग नहीं, बल्कि एक राजनीतिक सौदे का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें सत्ता के बदले स्वतंत्रता की कुर्बानी दी जा रही है।
    यह आवाज उठनी चाहिए थी पहले भी।बहुत खुशी है कि यह.आवाज हमारी पुरवाई के माध्यम से उठी।बहुत सुंदर संपादकीय के लिए हार्दिक बधाई।
    पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

  21. बहुत ही ईमानदार और बेबाक सम्पादकीय है इस बार का ! सत्ता की नज़र पड़ जाये तो कहीं इन आलेखों को बंगाल तक पहुंचने पर भी प्रतिबंध न लग जाये !
    लेकिन आंखें खोलने के लिए ऐसी सचबयानी बहुत ज़रूरी है।
    इस निडरता के लिए और शब्दों का संतुलन बनाये रखते हुए घातक स्थिति का चित्रण कर देने के लिए साधुवाद!

  22. आख़िर क्या हो गया है हमारे बँगाल को? लगता है किसी कि नज़र लग गई है। कहाँ तो रबिन्द्र संगीत “अमार शोनार बँगला” का गान होता था और कहाँ अब कट्टरपंथियों ने बंगाल का सँगीत, नृत्य और कला को हाइजैक कर लिया है। इसी बंगाल में भारत की कितनी बड़ी बड़ी हस्तियों ने जन्म लिया और इसे कला का बहुत बड़ा केन्द्र बनाया और कहाँ यह हालत हो गई है। क्या आजकल के नेता वाकई बंगाल के हित के बारे में सोच रहे हैं या फिर उनको अपनी कुर्सी की चिन्ता है?

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