क्या आपने कभी यह महसूस किया है कि एक ही कमरे में कुछ लोग मीटिंग कर रहे हैं… मौसम मच्छरों का है और उस कमरे के अँधेरे कोनों में कुछ मच्छर अपने-अपने शिकारों की ओर ताक रहे हैं। कमरे में बैठे तमाम लोग एक ही तरह के कपड़े पहने हैं और उनके जिस्म के लगभग एक समान अंग खुले हुए हैं। मगर मच्छर उनमें से कुछ गिने-चुने लोगों को ही काटते हैं, जबकि कुछ लोगों को तो ख़बर ही नहीं हो पाती कि कमरे में मच्छर मौजूद भी हैं।
वैसे, एक ही परिवार के सदस्यों में भी किसी-किसी को मच्छर अधिक काटते हैं, जबकि कुछ अन्य सदस्यों का ख़ून चूसने में मच्छरों की कोई रुचि नहीं रहती। क्या आपने कभी सोचा है कि मच्छरों के भी नखरे होते हैं? वे हर ऐरे-गैरे का ख़ून चूसकर अपना हाज़मा ख़राब नहीं करना चाहते। उनकी भी अपनी एक लैबोरेटरी होती है, जिसमें यह पता किया जाता है कि कौन-से ग्रुप का ख़ून उनकी सेहत के लिए बढ़िया है।
लगता है जैसे उनके सिस्टम में ही ख़ून के ग्रुप की जाँच करने का कोई यंत्र लगा रहता है। यदि गलती से वे किसी दूसरे ब्लड ग्रुप के व्यक्ति के शरीर पर बैठ भी जाएँ, तो उन्हें भीतर से एक चेतावनी मिल जाती है- “इस व्यक्ति का ब्लड ग्रुप तुम्हारे ऊँचे व्यक्तित्व के अनुकूल नहीं है!”
करीब छह वर्ष पहले एक शोध किया गया था कि मच्छरों के काटने के पीछे क्या ब्लड ग्रुप का कुछ लेना-देना है। एक बात तो तय है कि मच्छर ‘समान अवसर’ वाली नीति में विश्वास नहीं रखते। उन पर किसी तरह का दबाव नहीं डाला जा सकता कि वे हर व्यक्ति का ख़ून समान रूप से चूसें। यह कोई ऐसी सरकार नहीं है जो समान अवसर की पॉलिसी में विश्वास रखती हो।
शोध में यह पाया गया कि मच्छरों को ‘ओ’ ग्रुप का ख़ून सबसे अधिक पसंद है। इस ग्रुप के लोगों का ख़ून उनकी पहली पसंद है। उसके बाद नंबर आता है ‘बी’ ग्रुप का, और ‘ए’ ग्रुप के ख़ून वाले लोगों में मच्छरों की विशेष रुचि नहीं होती। यदि विज्ञान न होता, तो हम कभी ये अंदर की बात जान ही नहीं पाते, बस “ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम” गाते रहते और मच्छरों को अपना लहू पिलाते रहते।
मगर ऐसा भी नहीं है कि मच्छर केवल ब्लड ग्रुप पहचानकर ही लहू पीते हैं। वैज्ञानिक शोध से पता चलता है कि कई अन्य कारण भी मौजूद हैं, जो किसी व्यक्ति को मच्छरों के लिए अधिक आकर्षक बना सकते हैं, जैसे- आपकी त्वचा में मौजूद सूक्ष्मजीव, आपकी साँस के साथ बाहर निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड, और आपके कपड़ों का रंग (लाल, नारंगी और काला जैसे रंग मच्छरों को अधिक आकर्षित करते हैं)। लेकिन अंततः मच्छरों की पसंद में अधिकांश भिन्नता दो कारकों पर निर्भर करती है- हमारे शरीर की प्राकृतिक गंध और आनुवांशिकी।
जिन लोगों के शरीर अधिक गर्म रहते हैं, मच्छर उनकी ओर अधिक आकर्षित होते हैं। त्वचा पर मौजूद कुछ विशेष बैक्टीरिया भी मच्छरों को आकर्षित करते हैं। लखनऊ के सिविल अस्पताल के वरिष्ठ जनरल फिज़िशियन डॉ. ए. के. श्रीवास्तव के अनुसार, ‘ओ’ पॉजिटिव ब्लड ग्रुप वाले लोगों में अधिक मेटाबॉलिज़्म और यूरिक एसिड होता है। मच्छर कार्बन डाइऑक्साइड की पहचान कर लेते हैं, जो लोग लंबी साँस लेते हैं और अधिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न करते हैं, उन्हें मच्छर अधिक काटते हैं। इसके अलावा मच्छर इंसान की खुशबू और बदबू भी पहचान सकते हैं। वे पसीने से निकलने वाले लैक्टिक एसिड और अमोनिया को भी पहचानते हैं। अगर उन्हें आपके पसीने की गंध पसंद आती है, तो वे आपको अधिक काट सकते हैं।
शराब का सेवन करने वाले साहित्यकारों के लिए कोई अच्छी ख़बर नहीं है, खासकर बीयर पीने वाले मित्रों के लिए। जी हाँ, यह सच है कि शराब, विशेषकर बीयर पीने से मच्छर अधिक आकर्षित होते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि बीयर पीने वालों को मच्छर काटने की संभावना अधिक होती है, क्योंकि शराब के सेवन से शरीर का तापमान बढ़ता है और शरीर की रासायनिक संरचना में परिवर्तन होता है। इससे पसीना और कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बढ़ जाता है, जो मच्छरों को आकर्षित करता है।
लेकिन इससे एक और सवाल खड़ा होता है- क्या नशे में धुत इंसानों का ख़ून चूसने वाले मच्छर खुद भी नशे में होते हैं? क्या मच्छर ऐसे लोगों का ख़ून चूसकर मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में गाने लगते हैं-
“मुझे दुनिया वालों, शराबी न समझो…” हज़ारों वर्षों से नशे में धुत इंसानों का ख़ून चूसने वाले मच्छरों की भारी संख्या के बावजूद, इस विषय पर अपेक्षाकृत कम शोध हुआ है।
फ़िलाडेल्फ़िया स्थित पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय की कीट-विज्ञानी तान्या डैपकी ने अपने एक साक्षात्कार में बताया था, “मुझे लगता है कि इसका जवाब ‘नहीं’ है, क्योंकि रक्त में अल्कोहल का स्तर बहुत कम होता है।” लेकिन मच्छरों और अल्कोहल के बीच संबंध पर गहन वैज्ञानिक अध्ययन की तलाश करें, तो सीमित जानकारी ही मिलती है।
नीदरलैंड में किए गए एक प्रयोग से यह बात सामने आई कि नियमित रूप से बीयर पीने का एक अप्रत्याशित प्रभाव यह भी है कि आप मच्छरों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकते हैं। ‘डच’ शोधकर्ताओं ने 26 अगस्त, 2025 को ‘बायोआरएक्सिव’ पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया कि यह मादक पेय हमारे रक्त में शर्करा की मात्रा को बढ़ाता है। इसकी जाँच के लिए, नीदरलैंड के निजमेगन स्थित राडबाउड विश्वविद्यालय की शोध टीम मादा मच्छरों को देश में आयोजित होने वाले वार्षिक संगीत समारोह ‘लोलैंड्स’ में लेकर आई। उन्होंने कुलिसिडे परिवार से संबंधित ‘एनोफेलेस’ मच्छरों का उपयोग किया।
वर्ष 2023 में शोधकर्ताओं ने आपस में जुड़े शिपिंग कंटेनरों के अंदर एक अस्थायी प्रयोगशाला स्थापित की। वहाँ लगभग 500 लोगों ने अपनी स्वच्छता, आहार और व्यवहार से संबंधित प्रश्नावली भरकर इस अध्ययन में भाग लिया।
इसके बाद वैज्ञानिकों ने प्रत्येक प्रतिभागी की बाँह को मच्छरों से भरे पिंजरे में रखा। कैमरों की सहायता से उन्होंने देखा कि पिंजरे के पास रखे चीनी के डिब्बे की तुलना में त्वचा के पास कितने अधिक मच्छर बैठते हैं।
अध्ययन के परिणामों से पता चला कि जिन लोगों ने आयोजन से 12 घंटे पहले बीयर का सेवन किया था, उनमें मच्छरों के आकर्षित होने की संभावना उन लोगों की तुलना में 1.35 गुना (लगभग 35%) अधिक थी, जिन्होंने बीयर का सेवन नहीं किया था।
‘पुरवाई’ पत्रिका एक साहित्यिक पत्रिका है। हम ऐसा कोई दावा नहीं करते कि हम वैज्ञानिक हैं या हमें हर विषय की प्रामाणिक जानकारी है। हमारी टीम को जब भी कोई ऐसा विषय मिलता है, जो हमारे पाठकों के ज्ञान में वृद्धि कर सकता है, तो हम उस पर गंभीरता से काम करते हैं और अपने पाठकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने का प्रयास करते हैं।
हमें पूरा विश्वास है कि इस संपादकीय के माध्यम से आप एक ऐसे विषय से परिचित हुए होंगे, जिस पर शायद आज तक आपका ध्यान नहीं गया था।

ये संपादकीय सभी को पसंद आयेगा।इसमें मच्छरों के ख़ून पीने का मुद्दा जो है।संपादकीय ब्लड ग्रुप विशेष की भी बात करता है,जो युवाओं को रोचक लग सकता है। आख़िर अनुसंधान का भी तो मामला है।
दूसरा पहलू वारुणी यानी शराब और बियर पीने वालों का भी है। तीसरा एंगल विशुद्ध वैज्ञानिक है कि शारीरिक गंध और त्वचा पर बैक्टीरिया इत्यादि की मौजूदगी,कपड़ों का रंग तथा अन्य परिस्थितियां भी मच्छरों की पसंद और नापसंद को जाहिर करती है।
इस संपादकीय का एक कॉमन थ्रेड है और वह है चुटिला और खिलंदड़ा अंदाज़।
एकदम क्लिनिकल टिप्पणी! त्वरित मगर सार्थक!
रोचक, आपने मच्छरों के आकर्षण के कई स्रोतों और कारणो को बताया।
नारी हार्मोन ईस्ट्रोजेन मच्छरों को अधिक आकर्षित करते हैं – एक शोध में मैंने पढ़ा था। कुछ तैलीय गंध भी उन्हें अपनी ओर आकर्षित करते हैं। एक बार मैंने खुद देखा था कि एक भीड़ वाली जगह में एक सज्जन बालों में कोई सुगंधित तेल लगाये थे। उनके सर के पास लगातार मच्छर मंडराते रहे।
हार्दिक धन्यवाद अरविंद भाई।
आज पता चला कि अखिर मेरा खून मच्छर क्यों अधिक चूसा करते हैं, धन्यवाद
चलिये संपादकीय सार्थक हो गया…
मच्छरों को अपने से दूर रखना हो तो
बियर का सेवन न करें । बालों और शरीर पर सुगंधित पदार्थ न लगाएं।
आज की सम्पादकीय का फ़लसफ़ा
Dr Prabha mishra
प्रभा जी… आप ने तो संपादकीय का तत्व निकाल लिया…
मच्छरो ने हमे दीवाना बना रक्खा है
कछुआ* हर शख़्स ने कमरे में लगा रक्खा है…
(*: कछुआ छाप अगर बत्ती)
पता चला कि कछुए की पीठ पर हो कर सवार / ओ मच्छर राजा हैं करने चले अब शिकार…
मच्छरों पर इस आलेख को पढ़कर आनंद आ गया। मच्छरों के बहाने चुटीले व्यंग्य और कटाक्ष भी खूब रहे।
हार्दिक आभार रीटा।
मज़ेदार आलेख है आ0तेजेन्द्र जी। और आपने जो जानकारी दी है वो वैज्ञानिक शोधों पर भी निर्भर है। मैं भी आपकी जानकारी में अपना अनुभव जोड़ देती हूँ। मुझे मच्छर काफ़ी कम काटते थे (ब्लड ग्रुप AB +) मेरे पति को अधिक काटते हैं (0+) है। लेकिन उनसे विवाह के पश्चात मुझे पहले से अधिक काटने लगे हैं मुझे लगता है कि केमिस्ट्री बदल गई है। हाँ कपड़ों के रंग पर भी मच्छरों का मंडराने काफ़ी निर्भर करता है। और ये भी तो देखिए कि मादा मच्छर ख़ून चूसती है और नर मच्छर पौधों का रस ( (सात्विक भोजन ) तो चुनते तो हैं ही। तेल लगाने का असर तो है ही पर एल्कोहल का भी। एक और बात भी है कि छोटे जीवों में माइक्रो-इवोल्यूशन होता रहता है जल्दी-जल्दी और ये हमारे मॉस्कीटो -रिपैलेंट्स को बेअसर करते रहते हैं हमें और सशक्त बनाने पड़ते हैं। मच्छर की फ़िलासफ़ी तू डाल-डाल मैं पात-पात।
ज्योत्सना जी, आपने तो संपादकीय में बहुत सी जानकारी जोड़ दी है… हार्दिक धन्यवाद।
वैज्ञानिक शोध पर आधारित लाभकारी संपादकीय।
कपड़ों के रंग से मच्छर के मंडराने का मुझे भी अच्छा खासा अनुभव हुआ है। जब भी काले रंग के कपड़े में पार्क मे जाती हूँ मच्छर ज़्यादा भिनभिनाते और काटते है, शांति से टहलने नहीं देते। बचपन में पड़ोसी के कमेंट से पता चल गया था कि मेरा खून मीठा है ( तुम्हें मच्छरों से और मच्छरों को तुमसे बहुत प्यार है। वैसे बता दूंँ कि मेरा ग्रुप भी BPositive है। मुझे लगता है यह संपादकीय युवा वर्ग के लिए ज़्यादा रुचिकर होगा वैसे तो मुझे भी रुचिकर लगा । हार्दिक बधाई ।
हार्दिक धन्यवाद मंजुला जी।
सब सही है।
जय हो।
जितेन्द्र भाई: आपके इस बार के सम्पादकीय को पढ़कर मुँह का ज़ायका कुछ ऐसा बदलता हुआ लगा जैसे कोई नई किसम की मिठाई, जो पहले कभी नहीं खाई थी, आज खाने को मिली है। अब सवाल उठता है मच्छरों के बारे में जो आपने बिलटिन लैबॉरेट्री की बात बताई है। उसे पढ़कर तो ऐसा लगता है कि शीघ्र ही इनकी श्रेणी में भी आर्टीफ़िशल इण्टेलोजैंस जल्दी आने वाली है। रही बात इनकी सिलैक्टिविटी की कि किसका ख़ून स्वादिष्ट है जिसे इन्होंने चूसना है। ज़ाहिर है कि अपने शिकार का ख़ून चूसने के बाद बतौर टिप के यह उसके शरीर में कुछ न कुछ अपनी निशानी भी छोड़ जाते होंगे। अब रिसर्च वालों को मच्छरों को बदनाम करने की बनाए यह पता लगाना है कि इनकी छोड़ी हुई निशानी के क्या क्या फ़ायदे हैं। हो सकता है कि ऐसे शोध से पता चल जाए कि फ़लाँ फ़लाँ श्रेणी के, नर या मादा, मच्छरों के काटने से इस इस बीमारी का इलाज हो सकता है। मुझे नेदरलैण्ड की राडबाउड विश्वविद्यालय की शोध टीम से भी शिकायत है कि वो वार्षिक संगीत समारोह में केवल मादा मच्छरों को ही क्यों ले गई।आख़िर पुरुष मच्छरों ने क्या गुनाह किया था कि उन्हें इस आनन्द से वंचित रक्खा गया।
आजकल के माहॉल में हर चीज़ मुमकिन है। मैं तो यह कहूँगा कि अपने इस सम्पादकीय से आपने जो एक जागृती पैदा की है उस पर अगर शोध किया जाए तो क्या पता किन किन बीमारीयों से लोगों को फ़ायदा पहुँचेगा। मेरी ओर से आपको बहुत बहुत साधुवाद।
विजय भाई पुरुष मच्छर साधू होते हैं। वे इंसान का लहू नहीं चूसते। वे फूलों और फलों का रस चूसते हैं। आपकी टिप्पणी हमेशा हमारा मार्गदर्शन करती है।
पुरुष मच्छर साधु होते हैं। मेरे लिए यह नई जानकारी है। आप के संपर्क में बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है।
जय हो!
वह अच्छी शोध पूर्ण सम्पादकीय। मैं इससे पूरी तरह सहमत हूं कि मच्छर सभी को समान रूप से नहीं काटते हैं। मेरे परिवार में एक बेटी है, अब तो यहां नहीं है लेकिन बचपन से तब चारपाई में सोते थे। दो बहनें एक साथ सोती थीं और एक के ऊपर ढेरों मच्छर बैठे मिलते थे और तारीफ की बात उसको पता नहीं चलता था।
शायद तब की प्रजाति और होती होगी, इतना प्रदूषण भी नहीं था, लेकिन परिवार के कुछ ही लोग ऐसे होते थे। वह ओ + थी। बाकी कारणों का अनुभव नहीं। लेकिन पुष्टि आज हुई कि क्यों?
इस प्यारी सी टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद रेखा जी।
हमारे परिवार में भी एक दंपति ने बताया था कि पति-पत्नी साथ में बैठे होते हैं, पति के पास मच्छर ज़्यादा आते हैं क्योंकि उनका ब्ल्ड ग्रुप ओ+ है। मैंने समझा शायद यूं ही मज़ाक़ कर रहे हैं। लेकिन यह लेख पढ़ कर विश्वास हुआ।
हार्दिक धन्यवाद रानी जी।
सादर नमस्कार सर….. रोचक लेख है सर…. शोधपूर्ण… बहुत कुछ सीखा भी….
साधुवाद सर…
धन्यवाद आदरणीय अनिमा जी।
इस बार का संपादकीय मच्छरों की जीवन शैली एवं उनके कार्य व्यवहार पर केंद्रित है। गहन अध्ययन एवं विभिन्न संदर्भों से उनकी रुचि आदि के बारे में सटीक जानकारी जुटाई गई है। चुटीले व्यंग्य का छौंक पाठक को गुदगुदाता है।
मच्छर की पसंदीदा डिश ‘ओ’ ब्लड ग्रुप है। भाई गजब का सेंसर है उसके मस्तिष्क में। इसे ही देख लीजिए…अभी तक यही सुनते आए थे कि शराब और बीयर देवता और मनुष्यों का प्रिय पेय है। आज पता चला कि यह मच्छरों का भी प्रिय पेय है। बीयर पिया हुआ मनुष्य उन्हें काफी पसंद है। आगे और अनुसंधान हों तो इस बात पर आश्चर्य चकित नहीं होना चाहिए कि सृष्टि के सभी जीवधारियों का पसंदीदा पेय शराब ही है।
मच्छर जायका बदलने के लिए पसीना, त्वचा में सूक्ष्म जीवों की उपस्थिति, और मुख से उत्पन्न कार्बन-डाई-ऑक्साइड के सम्यक निरीक्षण के उपरांत वहां भी हाथ मार लेता हैं। इनका संसार और इनकी अपनी गतिविधियां रोचक है। नखरों को जोड़ दिया जाए तो ये मानव के काफी करीबी लगते हैं। हौसलों की बात करें तो ये कभी मरने से नहीं डरते हैं। गाजे-बाजे के साथ आक्रमण करते हैं।
यह संपादकीय जितनी ज्ञानवर्धक है उससे ज्यादा मनोरंजक भी है। इस तरह की विविधता भरी संपादकीयों का हम सदैव इंतजार करते रहते हैं।
भाई लखन लाल पाल जी आपने कहा है कि – यह संपादकीय जितनी ज्ञानवर्धक है उससे ज्यादा मनोरंजक भी है। इस तरह की विविधता भरी संपादकीयों का हम सदैव इंतजार करते रहते हैं। – हमारे लिये तो यह किसी पुरस्कार से कम नहीं है। हार्दिक धन्यवाद।
आदरणीय सर, सादर प्रणाम।
आपने इस संपादकीय में ‘खून चूसने में भी नखरा’ जैसा अनूठा विषय चुनकर यह सिद्ध कर दिया है कि एक सजग साहित्यकार की दृष्टि उन सूक्ष्म पहलुओं तक भी पहुँचती है, जिन्हें हम अक्सर सामान्य मानकर छोड़ देते हैं। मच्छरों के चयन और उनके ‘नखरों’ को जिस चुटीले और खिलंदड़ अंदाज़ में आपने प्रस्तुत किया है, वह पाठक को शुरू से अंत तक बाँधे रखता है। विशेष रूप से मच्छरों के भीतर किसी ‘लैबोरेटरी’ या ‘ब्लड ग्रुप जाँच यंत्र’ होने की कल्पना आपके लेखन में एक बेहतरीन व्यंग्यात्मक रस घोलती है।
आपने इस संपादकीय में केवल हास्य ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों का भी समावेश बहुत ही संतुलन के साथ किया है। ‘ओ’ ब्लड ग्रुप के प्रति मच्छरों का विशेष प्रेम, मेटाबॉलिज्म, यूरिक एसिड और कार्बन डाइऑक्साइड जैसे कारकों पर जो प्रकाश आपने डाला है, वह मुझ जैसे अल्पज्ञ पाठक के सामान्य ज्ञान में वृद्धि करने वाला है। आपने विज्ञान को साहित्य के साथ जिस तरह पिरोया है, उससे यह संपादकीय न केवल पठनीय बन गया है, बल्कि एक सूचनात्मक दस्तावेज़ भी बन पड़ा है।
शराब, विशेषकर बीयर के सेवन और मच्छरों के आकर्षण के बीच के संबंध को आपने नीदरलैंड के राडबाउड विश्वविद्यालय के नवीनतम शोध (2025) के माध्यम से जिस प्रकार पुष्ट किया है, वह आपकी समसामयिक वैज्ञानिक चेतना को दर्शाता है। ‘मुझे दुनिया वालों, शराबी न समझो’ जैसे फिल्मी संदर्भों का उपयोग कर आपने विषय की गंभीरता को मनोरंजन के साथ जोड़ दिया है। यह देखना दिलचस्प है कि कैसे एक छोटा सा कीट भी अपनी पसंद-नापसंद में इतना ‘सलेक्टिव’ हो सकता है।
आपका यह संपादकीय आपकी प्रखर मेधा और जटिल वैज्ञानिक जानकारियों को सरल, सहज और रोचक भाषा में जनमानस तक पहुँचाने की अद्भुत कला का प्रमाण है। ‘पुरवाई’ के पाठकों के लिए यह सामग्री निश्चित रूप से नई और विस्मयकारी होगी। आपने जिस कुशलता से एक ‘स्याह’ विषय को अपनी लेखनी की चमक से उजला बनाया है, वह लंबे समय तक याद रखा जाएगा। आपकी यह प्रस्तुति साहित्य और विज्ञान के बीच के उस सेतु की तरह है, जो ज्ञान को बोझिल नहीं होने देती।
भाई चंद्रशेखर जी आपने अपनी टिप्पणी की शुरूआत में ही लिखा है कि – आपने इस संपादकीय में ‘खून चूसने में भी नखरा’ जैसा अनूठा विषय चुनकर यह सिद्ध कर दिया है कि एक सजग साहित्यकार की दृष्टि उन सूक्ष्म पहलुओं तक भी पहुँचती है, जिन्हें हम अक्सर सामान्य मानकर छोड़ देते हैं।
और अंत तक पहुंचते-पहुंचते आप कहते हैं – आपका यह संपादकीय आपकी प्रखर मेधा और जटिल वैज्ञानिक जानकारियों को सरल, सहज और रोचक भाषा में जनमानस तक पहुँचाने की अद्भुत कला का प्रमाण है।… आपने जिस कुशलता से एक ‘स्याह’ विषय को अपनी लेखनी की चमक से उजला बनाया है, वह लंबे समय तक याद रखा जाएगा। आपकी यह प्रस्तुति साहित्य और विज्ञान के बीच के उस सेतु की तरह है, जो ज्ञान को बोझिल नहीं होने देती।
हमारी पूरी टीम आपकी धन्यवादी है।
वैज्ञानिक शोधों के आधार पर व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत आपका यह संपादकीय ज्ञानवर्धक एवं रोचक है। इसमें आपने मानव जीवन से जुड़ी एक सामान्य समस्या का रहस्योद्घाटन हास्य, वैज्ञानिक तथ्यों तथा सामाजिक संकेतों के माध्यम से प्रभावपूर्ण ढंग से किया है। मच्छरों के काटने के अनेक कारणों, जैसे त्वचा का तापमान, शरीर की गंध, कार्बन डाइऑक्साइड, ब्लड ग्रुप तथा शराब सेवन आदि से पाठकों को अवगत कराया गया है।
सहज, सरल और प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत यह संपादकीय वास्तव में “मच्छरों के भी नखरे होते हैं” जैसे वाक्य के माध्यम से समकालीन सामाजिक व्यवस्था, समाज में समान अवसरों की दुर्लभता तथा मानवीय प्रवृत्तियों पर भी सार्थक कटाक्ष करता है।
इस प्रकार वैज्ञानिक चेतना से संपृक्त और मनोरंजक यह संपादकीय न केवल जीवन की सामान्य घटनाओं के प्रति चिंतन का संदेश देता है, बल्कि समाज की समस्याओं को उनके बहुआयामी पहलुओं एवं विसंगतियों सहित प्रस्तुत करने का सफल प्रयास भी करता है।
आपको हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
ऋतु जी, आपने संपादकीय के विषय और भाषा दोनों को सराहा है – आपको हार्दिक धन्यवाद।
मच्छरों के ख़ून पीने के पीछे के वैज्ञानिक कारणों
ब्लड ग्रुप पर बहुत अच्छा विवरण दिया है ये टिप्पणी कि “इस व्यक्ति का ब्लड ग्रुप तुम्हारे ऊंचे व्यक्तित्व के अनुरूप नहीं है”
बहुत अच्छा विचारणीय संपादकीय है अभिनंदन
दिल से शुक्रिया कमलेश भाई।
रोचक एवं ज्ञानवर्धक सम्पादकीय। आज पता चला कि मच्छर ज़्यादा क्यों काटते है। ब्लड ग्रुप ओ+ हैं न। कमाल की जानकारी दी है। साधुवाद
हार्दिक धन्यवाद सुदर्शन जी।
आदरणीय आप खोजी है, वैसे साधारण तया इसका अर्थ आप कुछ ना कुछ खोजते रहते हैं और बुंदेलखंडी में खोजी का अर्थ शरारती भी होता है जिसे कुछ ना कुछ हर वक्त शरारत सुझती रहती है इसीलिए आप आप खोजी प्लस खोजी हैं
अब यही देखिए मच्छर जी हां कहते हैं एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना सकता है नाना पाटेकर ने शायद किसी फिल्म में यह डायलॉग बोला है कहीं। सच बात है *ओ* पॉजिटिव वाला कोई व्यक्ति अगर बैठा होगा और वहां मच्छर होंगे तो वह तालियां बजाता रहेगा
मुझे यह बात पहले से ही पता थी कि *ओ* ग्रुप वाले लोगों को मच्छर बहुत काटते हैं मेरे घर में पतिदेव पर दोनों बेटो का बल्डग्रुप *ओ* है , जितना घर में राशन आता है इसका एक चौथाई समान मच्छरों के लिए आता है हिट हो गया, ऑल आउट, हो गया, कॉइल भी आओ कछुआ वाली अगरबत्ती हो गई
मेरी मुसीबत हो जाती है आधी रात में हिट का छिड़काव कभी भी हो सकता है, जो मुंह ढकने के बाद भी मेरे गले में खराश पैदा कर देता है मगर क्या करें साथी को मच्छर काट रहे हैं , गुस्सा हो नहीं सकते कहते हैं तुम्हारे गले में खराश हो रही तो मैं क्या करूं मैं क्या मच्छरों से रात भर
चित्तथा रहूं ,वैसे मैं तो बची हुई हूं मेरा बी ग्रुप है
मच्छरों में भी नर और मादा मच्छर हुआ करते हैं, और सबसे खास बात यह है कि मादा मच्छर ही मनुष्यों और जानवरों को काटती है जब उसे अंडे देना होता है तो उसे एक्स्ट्रा प्रोटीन की जरूरत होती है तब वह मनुष्यों और जानवरों से खून प्राप्त करती है बेचारे नर मच्छर तो फूलों फलो के रस पीकर ही जिंदा रहते हैं उनकी जिंदगी ही बेचारों की 6 या 7 दिन होती है लेकिन मादा मच्छर जो खून पीती है वह दस दिन से लेकर एक महीने तक भी जीवित रह सकती है।
वैसे मैं यह रेशों बताना नहीं चाहती थी क्योंकि मन ही मन में सोच रही थी की स्त्रिया भी पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा जीवित रहती हैं इसका मतलब कहीं यह तो नहीं कि वह अपने परिवार जनों का खून पीती हों
मादा मच्छर तो पीती ही खून है, उसकी इम्यूनिटी तो बड़ी ही रहेगी
मगर मित्रों यह सब हास्य की बातें हैं स्त्री में दर्द दुख सहने की क्षमता धरती के समान होती है इसलिए वह जीवन के झंझाबातों को झेल लेती है
अब काटे तो काटे लेकिन जो बीमारियां इनसे पैदा होती है मलेरिया डेंगू,चिकनगुनिया, फाइलेरिया ,मस्तिष्क ज्वर ओर न जाने क्या क्या
अब तो इन पर आल आउट डीडीटी छिड़काव का कोई असर नहीं होता , पहले तो नीम की पत्तियों का धुआं करने से भाग जाते थे
इनकी भी इम्युनिटी पावर बढ़ गई है अब तो इंसेक्टिसाइड इस्तेमाल करने से अच्छा पूर्व सुरक्षा करना है
घर के आस-पास जल भराव रोके घरों के आसपास कचरा इकट्ठा न होने दें गर्मी समाप्त होते ही कुलर का पानी पूरी तरह खाली कर दें
जहां पानी भरा रहता हो वहां पर थोड़ा मिट्टी का तेल डाल दें ताकि उनके अंडे न पनप सके मच्छरदानी लगाकर सोए
याद रखें डेंगू के मच्छरि भी साफ पानी में अंडे देते हैं अतः घर में काफी दिनों तक किसी भी डब्बे या बर्तन में पानी खुला व भरा ना रखें
आदरणीय प्रिय तेजेंद्र सर वाकई आपका जवाब नहीं संपादकीय में मच्छर ही सही
बढ़िया लिखा आनंद आया।
कुन्ती हरिराम झांसी
मेरी खोजी प्रवृत्ति को शरारती कह कर आपने दिल खुश कर दित्ता है जी। मगर आपने व्यंग्यात्मक टिप्पणी लिख कर पूरे पुरवाई परिवार का दिल जीत लिया है कुंती जी। थैंकूज़ आपको।
संपादकीय – ख़ून चूसने में भी नख़रा…आपने सदा की भांति न केवल नया विषय उठाया, वरन उसकी वैज्ञानिक तरीके से व्याख्या भी की है।
मेरा खून भी o+ है। अगर कमरे में एक भी मच्छर आ जाता है तो मेरे आस-पास ही घूमता रहता है। जब तक कि उस पर मेरा हाथ न पड़े। मज़ाक में आदेश जी कहा करते हैं कि तुम्हारा खून मीठा है। आपका संपादकीय पढ़कर पता चला कि हम इंसानों की तरह मच्छर भी अपने खाने के प्रति चूजी होते हैं। इसके साथ ही मच्छर शरीर की गंध, शराब इत्यादि से भी प्रभावित होते हैं।
नई जानकारी से परिचित करवाने के लिए साधुवाद आपका।
सुधा जी, आप O+V हैं और आपकी टिप्पणी भी पॉज़िटिव है। हार्दिक धन्यवाद।
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
संपादकीय का शीर्षक पढ़कर और चित्र देखकर चेहरे पर स्वाभाविक मुस्कान तैर गई।
एक पल दिमाग में ख्याल आया कि इस ताजी परेशानी की खबर आप तक कैसे पहुँच गई?बहरहाल प्रारंभ से अंत तक एक मुस्कुराहट के साथ पढ़ गए।
एक तो गर्मी की परेशानी, और राहत से नींद लेने के लिए कितना जतन करना पड़ता है मच्छरों से बचने के, यह सिर्फ एक भुक्त भोगी ही जान सकता है। आप इस दर्द को समझ पाए यह आपकी संपादकीय दृष्टि का ही कमाल है।
एक बात पहले ही कह दें ताकि बाद में भूल न जाएँ कि,” संपादकीय वर्तमान की सामयिक समस्याओं की दृष्टि से सामान्य ज्ञान का सर्वाधिक और सर्वश्रेष्ठ साधन है। आपको बार-बार प्रणाम
जिस तरह आपको पढ़कर महत्वपूर्ण जानकारियों से समृद्ध हो रहे हैं।”
अब विषय पर–
मच्छर आज प्रारंभ से अंत तक घर-घर की कहानी की तरह है। वास्तव में आज ऐसे विषय से परिचित हुए जिससे निरंतर पीड़ित होने के बाद भी ध्यान कभी नहीं गया था। यह तो अक्सर महसूस किया कि जब बहुत लोग साथ बैठे रहते थे भले ही अलग-अलग हों या सब सदस्य घर के हों; मच्छर कुछ लोगों पर ही अधिक मेहरबान होते थे। पर उनकी भी कोई चॉइस और नखरे होते हैं यह आपको पढ़कर जाना। इससे अनजान थे।
आश्चर्य और हास्यास्पद लगा कि मच्छरों का भी प्रिय ब्लड ग्रुप समूह है- ‘o’ positive है । उनकी भी पसंद
नापसंद होती है।
शरीर की प्राकृतिक गंध और आनुवंशिकी भी मच्छरों के काटने की कारक है।
त्वचा में मौजूद बैक्टीरिया के अतिरिक्त खुशबू- बदबू भी पसंद है। पसीने की *पसंदीदा गंध*
भी आकर्षित करती हैं।
शराब सेवन वाली बात पर तो सबसे ज्यादा आश्चर्य हुआ। समूह के उन सदस्यों के लिये यह सावधान होने वाली बात है अगर मच्छरों से बचना चाहते हैं। वैसे क्या इतना होश रहता होगा कि मच्छरों के काटने का पता चले?क्या पता!
आप एक सफल व्यंग्यकार हैं! अपने व्यंग्योक्तिपूर्ण लेखकीय कौशल से आपने इस संपादकीय को प्रारंभ से अंत तक हास्य पूर्ण बना दिया।
कई कथ्य महत्वपूर्ण लगे।
*वे हर ऐरे-गैरे का ख़ून चूसकर अपना हाज़मा ख़राब नहीं करना चाहते।*
*यदि गलती से वे किसी दूसरे ब्लड ग्रुप के व्यक्ति के शरीर पर बैठ भी जाएँ, तो उन्हें भीतर से एक चेतावनी मिल जाती है- “इस व्यक्ति का ब्लड ग्रुप तुम्हारे ऊँचे व्यक्तित्व के अनुकूल नहीं है!”*
*यह कोई ऐसी सरकार नहीं है जो समान अवसर की पॉलिसी में विश्वास रखती हो।*
हमें इस बात से सबसे ज्यादा आश्चर्य हुआ *आपके कपड़ों का रंग (लाल, नारंगी और काला जैसे रंग मच्छरों को अधिक आकर्षित करते हैं)।*
कपड़ों का रंग कैसे पहचान लेते हैं भई!
*ख़ून चूसकर मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में गाने लगते हैं-*
*“मुझे दुनिया वालों, शराबी न समझो…”*
कुल मिलाकर इस बार का संपादकीय मच्छरों की अनेक अनजानी जानकारियों से तो परिचय कराता है, लेकिन काफी मनोरंजक तरीके से।
प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का बहुत-बहुत शुक्रिया।
पुरवाई का आभार तो बनता है।
नीलिमा जी, आपने लिखा है कि – इस बार का संपादकीय मच्छरों की अनेक अनजानी जानकारियों से तो परिचय कराता है, लेकिन काफी मनोरंजक तरीके से। इसके साथ साथ आपने अपने निजी अनुभव भी साझा किये हैं। आपको संपादकीय में व्यंग्यात्मक टिप्पणियां भी पसंद आई हैं – आपका हार्दिक धन्यवाद।
मच्छर पर भी शोध हुए हैं, यह जानकर खुशी हुई । मैं मच्छरों से बहुत परेशान रहती हूँ। मेरा blood group B+ है। अगर किसी कमरे में एक ही मच्छर है और लोग ढेर सारे, बावजूद इसके वह मच्छर मुझे ही काटेगा। लोग बोलेंगे कहां है मच्छर, एक दो होंगे पर वो एक दो मेरी ही जान के पीछे पड़ रहते हैं।
बहुत बढ़िया संपादकीय
हार्दिक आभार सुषमा। यदि मच्छर आपको काट रहे हैं तो तय है कि उस कमरे में O+V blood group वाला कोई और मौजूद नहीं है।
हमेशा की भांति बाकमाल संपादकीय। यह ख्याल दिमाग में अक्सर आता था कि मच्छर कमरे में लोगों से कुछ ही लोगों को क्यों काटते हैं। तब यह रहस्योद्घाटन हुआ था कि वे O पॉजिटिव blood group वालों पर ज्यादा ही मेहरबान रहते हैं। इसलिए उन लोगों को हम अक्सर अपना ऑल आउट कहते थे।
पर आज मच्छरों की और भी choices पता चलीं। धन्यवाद आदरणीय इन प्रोटेक्टिव shields या कहें बख्तर बंद से अवगत का कराने के लिए।
सरस, आपकी टिप्पणी हमारे लिए हमेशा ही विशेष होती है। आपको आज मच्छरों के पसंदीदा मीनू कार्ड का पता चल गया… ज़बरदस्तम!
हर बार एक नया विषय, हर बार नई शोध, हर बार वही मेहनत = जानकारीपरक शानदार संपादकीय।
बहुत रोचक लगा मच्छड़ों पर आलेख.
वैसे मेरी बाल कविता का अंश है –
मच्छड़ नाना, मच्छड़ नाना
कहाँ से सीखा तूने गाना
प्रायः मुझे काटते नहीं, बस गाना सुनाते हैं। तो कारण को पढ़ा मन से। हालाँकि पीड़ित ओम जी शाम से दरवाजा खिड़कियाँ बंद करवा देते हैं। हमने भी पता किया कि जिनका खून मीठा होता है, उसे नहीं काटते हैं ये नाना।
जरूर अपन का तीता होगा।
खैर, इस हल्के विषय पर गहरा, विस्तृत आलेख के लिए साधुवाद तेजेंद्र जी।
अनिता, आपकी खिलखिलाती टिप्पणी मज़ेदार लगी। स्नेह बनाए रखें।
नई जानकारी के साथ बहुत ही बेहतरीन रोचक संपादकीय बहुत-बहुत धन्यवाद
हार्दिक धन्यवाद संगीता जी।
अद्भुत जानकारी sir. पता नहीं था l अनोखा विषय और उसपर आपकी दिलचस्प जानकारियां l साधुवाद sir