मुझे याद पड़ता है कि कुछ समय पहले करण जौहर और कपिल शर्मा के घटते वज़न पर काफ़ी चर्चा हुई थी। कहा गया कि इन लोगों ने ओज़ेम्पिक के टीके लगवाकर अपना वज़न कम किया है। करण जौहर तो इतने कमज़ोर दिखने लगे, जैसे कि बुरी तरह से बीमार हों। इस तरह के टीकों पर चारों ओर चर्चा होने लगी। इसके नफ़े-नुकसान पर भी बातें हुईं और मामला ख़ासा वायरल हो गया।
विदेशों से भारत में फ़ैशन समय-समय पर अपनी पैठ बनाता दिखाई देता है। एलोपैथी की दवाओं का आम तौर पर भारत में आविष्कार नहीं किया जाता। शायद कोरोना वैक्सीन एक अपवाद रही हो। भारत में वज़न कम करने की दवाओं और टीकों का ज़बरदस्त बाज़ार है। ऐसा अंदाज़ा है कि वर्ष 2030 तक इन दवाओं का बाज़ार 80 अरब रुपए तक पहुँच जाएगा।
ऐसा कहा जाता है कि किसी भी इंसान की शादी का दिन उसके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण दिनों में से एक होता है। मगर शादी के साथ ही हर चीज़ के परिपूर्ण होने का दबाव भी आता है, जिसमें उसका रूप-रंग भी शामिल है। हर दुल्हन चाहती है कि अपने विवाह के दिन वह दुनिया की तमाम दुल्हनों से अलग दिखाई दे। उसे दुल्हन के रूप में जो भी देखे, बस देखता रह जाए।
वज़न घटाने में मदद करने वाली दवाओं, जैसे कि ओज़ेम्पिक, माउंजारो और वोगोवी के कारण अब दुल्हनों की शादी को लेकर सोच बदल चुकी है। अब दुल्हनें शादी से पहले जल्दी-से-जल्दी अपना वज़न कम करना चाहती हैं। ब्रिटेन में यह फ़ैशन इस कदर फैल रहा है कि ड्रेस डिज़ाइनर पसोपेश में हैं। वे ड्रेस का नाप लेते हैं और जब तक ड्रेस तैयार होती है, होने वाली दुल्हन का वज़न कई किलोग्राम कम हो चुका होता है।
ऐसा माना जाता है कि ब्रिटेन में लगभग 15 लाख लोग वज़न घटाने वाले इंजेक्शनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो भूख को दबाने और वज़न कम करने के लिए तैयार किए गए हैं।
इस साल ही ड्रेस डिज़ाइनर एंजी स्मिथ ने 11 ऐसी दुल्हनों के लिए काम किया है, जिन्होंने इन दवाओं का इस्तेमाल करने का विकल्प चुना है। “मेरे पास एक दुल्हन आई, जो एक साल से वज़न कम करने की कोशिश कर रही थी और फिर उसका वज़न स्थिर हो गया। तब उसने वज़न कम करने वाले इंजेक्शन लेने का फ़ैसला किया।”
एंजी का मानना है कि इससे उन पर काम का दबाव तो बढ़ जाता है, मगर उन्हें व्यक्तिगत रूप से लगता है कि अगर इससे लोगों के स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है, तो इसमें कोई दिक्कत महसूस नहीं होती।
उन्होंने बताया कि दुल्हनों से उनकी पोशाक और शादी के बारे में ‘सभी सामान्य बातों’ पर चर्चा करने के बाद वह सीधे पूछती हैं कि क्या दुल्हनें वज़न कम करने वाले इंजेक्शन का इस्तेमाल कर रही हैं। “मैं इसे असभ्य या दखलंदाज़ी नहीं मानती। दरअसल, मुझे योजना बनाने के दृष्टिकोण से यह जानना ज़रूरी लगता है, क्योंकि इससे मेरे काम करने का तरीका बदल गया है।”
भारतीय महानगरों की युवतियों में भी यह फ़ैशन अत्यधिक लोकप्रिय हो रहा है। उन्हें भी “माउंजारो प्री-वेडिंग पैकेज” का चस्का लग चुका है। हर लड़की चाहती है कि जब वह दुल्हन बने तो दुनिया की सबसे बेहतरीन दुल्हन लगे। ध्यान देने लायक बात यह है कि अब कुछ युवा लड़के भी इस पैकेज में रुचि ले रहे हैं। उनकी भी तमन्ना जाग रही है कि वे कामदेव समान दूल्हे लगें। कुछ ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आने वाला युग “माउंजारो प्री-वेडिंग पैकेज” युग कहलाएगा।
भारत में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो किसी भी तरह के हालात में अवसर खोज लेते हैं। नई दिल्ली की एक मेडिकल वेलनेस क्लिनिक ‘क्लैरिटी स्किन क्लिनिक’ ने इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हुए ज़ोर-शोर से प्रचार करना शुरू किया है। ऐसा लगता है जैसे युवा पीढ़ी पागल बनने को बेकरार बैठी है, बस पागल बनाने वाला चाहिए। इंजेक्शन मूलतः डायबिटीज़ के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, मगर इनके लगाने से वज़न भी कम होता है। अब दूल्हा-दुल्हन के शादी के जोड़े के साथ-साथ वज़न कम करके छरहरा और सुंदर लगना भी ज़रूरी हो चुका है।
यह क्लिनिक पहले केवल स्किन ट्रीटमेंट और बालों की सज्जा का काम किया करते थे, मगर माउंजारो की लोकप्रियता ने उनके पैकेज में वज़न कम करना भी शामिल कर दिया है। क्लिनिक ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी जारी किया है, जिसमें सही आहार, एक्सरसाइज़ और माउंजारो इंजेक्शन से शरीर को छरहरा बनाने का दावा किया गया है। आजकल वज़न घटाने के लिए ‘विगोवी’ के मुकाबले ‘माउंजारो’ अधिक लोकप्रिय इंजेक्शन बन गया है।
एक अन्य क्लिनिक के डॉ. रजत गोयल ने बताया कि पिछले कुछ महीनों में उनके पास वज़न कम करने के उद्देश्य से जितने भी मामले आए, उनमें से कम-से-कम बीस प्रतिशत लोग ऐसे थे, जिनकी एक या कुछ महीनों बाद शादी होने वाली थी। शादी के बंधन में बंधने वाले ये युवा वज़न कम करने में अत्यधिक रुचि रखते थे। वहीं डॉ. गोयल इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि वज़न कम करने वाले इंजेक्शन डॉक्टर की निगरानी में ही लेने चाहिए, क्योंकि ऐसी दवाइयों के गंभीर साइड इफ़ेक्ट भी हो सकते हैं। डॉ. गोयल का दावा है कि वे कॉस्मेटिक कारणों से कभी भी वज़न कम करने वाले इंजेक्शन नहीं देते। हाँ, यदि किसी मरीज़ के लिए वज़न घटाना लाज़िमी होता है, तभी वे इन दवाओं के लिए प्रिस्क्रिप्शन लिखते हैं।
रॉयटर्स एजेंसी ने इस विषय पर एक विस्तृत समाचार जारी किया था। इसमें कई भारतीय लड़कियों के किस्से बयान किए गए थे कि वे अपने विवाह से पहले वज़न कम करने के लिए क्यों परेशान थीं।
दरअसल, भारत में शादियाँ उन परिवारों के लिए भव्य आयोजन होती हैं, जो ऐसा ख़र्च उठा सकते हैं। वैसे संस्कृति और परंपराओं का भी इन आयोजनों पर गहरा प्रभाव होता है। आज भी कई विवाह परिवारों द्वारा तय किए जाते हैं, जिनमें अक्सर शारीरिक बनावट और आर्थिक स्थिति को लेकर अपेक्षाएँ जुड़ी होती हैं। ख़ास तौर पर माता-पिता द्वारा तय किए जाने वाले विवाहों में लड़की के शरीर की बनावट पर विशेष टिप्पणियाँ की जाती हैं। दुल्हन पर स्लिम-ट्रिम दिखने का भयंकर दबाव होता है।
रॉयटर्स के अनुसार, मुंबई की 26 वर्षीय वित्त कर्मचारी अदिति ने नवंबर में वज़न घटाने के लिए डॉक्टर से सलाह ली, क्योंकि व्यायाम और आहार से मनचाहा परिणाम नहीं मिल रहा था। फ़रवरी में अपनी शादी से पहले माउंजारो के ज़रिए 10 किलोग्राम वज़न कम करने के बारे में अदिति ने कहा, “जब मुझे परिणाम दिखता है, तो मुझे खुशी होती है। अगर मैं खुश नहीं होती, तो मुझमें आत्मविश्वास पैदा नहीं हो पाता। मैं शादी के समय ऐसा महसूस नहीं करना चाहती थी।”
वह उन आधा दर्जन दुल्हनों और एक दूल्हे में से एक थीं, जिन्होंने रॉयटर्स से शादी से पहले वज़न घटाने वाली दवाओं के इस्तेमाल के बारे में बात की, लेकिन सामाजिक कलंक के कारण अपने पारिवारिक नामों का इस्तेमाल न करने का अनुरोध किया। उन्होंने अपनी शादी में ‘एक ख़ास तरह से’ दिखने के सामाजिक दबाव का हवाला दिया और उनमें से अधिकांश ने जल्द ही इंजेक्शन लेना बंद कर दिया था।
बेंगलुरु की 27 वर्षीय प्रिया एक टेक वर्कर है। उसे जब-जब कोई लड़का देखने आता था, तो उसके भारी शरीर का मज़ाक बनाया जाता था। उसके लिए वज़न घटाने की दवाएँ भावी दूल्हों के परिवारों द्वारा उसके मोटापे का मज़ाक उड़ाने से बचने का साधन बन गईं।
प्रिया ने रॉयटर्स को बताया, “मेरे वज़न के कारण कई पुरुषों और उनके परिवारों ने मेरे प्रस्ताव ठुकरा दिए। मुझे मोटा कहा गया।” प्रिया ने शुरुआत में ‘सेमाग्लूटाइड’ की ओरल दवा का इस्तेमाल किया, जिसे भारत में मधुमेह के इलाज के लिए मंज़ूरी मिली हुई है। 12 किलो से अधिक वज़न कम करने के बाद उन्होंने इंजेक्शन के ज़रिए ली जाने वाली ‘माउंजारो’ दवा का इस्तेमाल शुरू कर दिया।
जहाँ तक आम इंसान का सवाल है, सभी को अपने भोजन पर नियंत्रण रखते हुए हल्के व्यायाम के ज़रिए अपना वज़न नियंत्रित करना चाहिए। ‘पुरवाई’ पत्रिका आप सबको आगाह करना चाहेगी कि ऐसी कोई भी अंग्रेज़ी दवा नहीं है, जिसके साइड इफ़ेक्ट न हों। शरीर प्रकृति की देन है और वज़न कम करने की दवाएँ पूरी तरह से अप्राकृतिक हैं। ऐसी दवाओं से बचने का प्रयास करना चाहिए। फ़ास्ट फ़ूड जैसी ख़तरनाक चीज़ें वज़न बढ़ाती हैं। कंप्यूटर और मोबाइल फ़ोन हमारा सबसे अधिक समय लेते हैं। बैठे-बैठे वज़न बढ़ना स्वाभाविक है। शरीर को हिलाइए, डुलाइए और चलाइए!

अंतिम पंक्ति गौरतलब है… लेकिन कुछ ऐसे हैं जो चाहकर भी शरीर को हिलाडुला नहीं सकते, उनके लिए ओबेसिटी बड़ी समस्या है, उनके लिए क्या उपाय है?
हाँ. एक शोधपरक सम्पादकीय के लिए आपको बधाई…
सन्दीप भाई, कुर्सी पर बैठ कर करने वाले बहुत से व्यायाम हैं… मैं उनके लिंक भेजूंगा।… आपको संपादकीय पसंद आया… हार्दिक धन्यवाद।
माननीय संपादक महोदय,
आपका संपादकीय “शादी का ख़र्चा मोटा… शरीर पतला…!” समकालीन समाज की एक अत्यंत गंभीर और तेजी से फैलती मानसिकता पर सशक्त प्रहार करता है। आपने जिस सहज, व्यंग्यात्मक और शोधपरक शैली में विवाह, सौंदर्य और बाज़ारवाद के त्रिकोण को प्रस्तुत किया है, वह न केवल पठनीय है बल्कि गहन चिंतन के लिए भी प्रेरित करता है। आज के समय में जब सोशल मीडिया और दिखावे की संस्कृति युवाओं पर “परफेक्ट दिखने” का अस्वस्थ दबाव बना रही है, तब आपका यह संपादकीय समाज को आईना दिखाने का कार्य करता है।
विशेष रूप से आपने जिस प्रकार वज़न घटाने वाले इंजेक्शनों के बढ़ते चलन, उसके व्यावसायिक दोहन और उससे जुड़ी सामाजिक मानसिकता को उदाहरणों सहित प्रस्तुत किया है, वह इस लेख को केवल एक सामान्य टिप्पणी नहीं रहने देता, बल्कि इसे एक सामाजिक दस्तावेज़ का स्वरूप प्रदान करता है। रॉयटर्स जैसे अंतरराष्ट्रीय संदर्भों का समावेश इसकी विश्वसनीयता और गंभीरता को और अधिक बढ़ाता है।
यह संपादकीय आज के समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक, आवश्यक और चेतावनीपूर्ण है। आपकी अंतिम पंक्तियाँ विशेष रूप से जीवनशैली, स्वास्थ्य और प्राकृतिक संतुलन की ओर लौटने का सार्थक संदेश देती हैं। ऐसे विचारोत्तेजक संपादकीय के लिए आपको हार्दिक बधाई।
शैलेश भाई इस सार्थक एवं सारगर्भित टिप्पणी में आपने कहा है कि – आपने जिस सहज, व्यंग्यात्मक और शोधपरक शैली में विवाह, सौंदर्य और बाज़ारवाद के त्रिकोण को प्रस्तुत किया है, वह न केवल पठनीय है बल्कि गहन चिंतन के लिए भी प्रेरित करता है। आज के समय में जब सोशल मीडिया और दिखावे की संस्कृति युवाओं पर “परफेक्ट दिखने” का अस्वस्थ दबाव बना रही है, तब आपका यह संपादकीय समाज को आईना दिखाने का कार्य करता है।…
आपको हार्दिक धन्यवाद।
हमेशा की तरह इस बार का भी संपादकीय विशेष विषय पर ही है….सर सही कहूं तो ये सुंदर दिखने का जो सामाजिक दबाव है वो बहुत बुरा है..ये सिर्फ वजन नहीं बल्कि नाक कैसी हो आँखें कैसी हों रंग कैसा हो ये सब बहुत बुरा असर डालते हैं मन पर…बचपन से मेरी खुद की तुलना हमेशा मेरी ज्यादा सुंदर दिखने वाली बहनों से की गई फिर शादी के लिए इस कारण रिजेक्ट किया गया कि मेरा वजन बहुत कम था,ज्यादा दुबली थी ….ऐसे में युवाओं का दवाइयों के प्रति झुकाव बहुत सामान्य बात है लेकिन समझना होगा कि प्रकृति से खिलवाड़ सदैव महंगा पड़ा है इंसान को इन दवाइयों का भी दूरगामी परिणाम अच्छा नहीं होगा
शिवानी आपकी टिप्पणी में आपके बचपन का दर्द हम सब महसूस कर सकते हैं… आपकी टिप्पणी सीधी दिल से निकल कर तमाम पाठकों के दिल तक पहुंच रही है।
प्रासंगिक
धन्यवाद।
अजब-गजब दुनिया में अजब-गजब तौर-तरीकों की जानकारी देती आपकी लेखनी!
सादर नमन
हार्दिक धन्यवाद सरिता जी।
मैं इतने विस्तृत रूप से नहीं जानती थी। आप के आज की संपादकीय से मेरा तो सच कहूँ ज्ञानवर्धन हुआ।
बहुत शुक्रिया रीटा जी।
बहुत सार्थक संपादकीय सर, समाज को जागरूक करता हुआ…एक नया विषय शायद जिसपर इतने विस्तार से किसी ने न लिखा हो
मनीष आप तो जानते हैं कि पुरवाई का प्रयास रहता है कि हम हर बार कोई नया विषय आप सबके सामने रखें। आपको संपादकीय पसंद आया, दिल से शुक्रिया।
प्रासंगिक एवं उपयोगी सम्पादकीय। हर लड़की दुल्हन के रूप में सुंदरतम दिखना चाहती है, लेकिन स्लिम ट्रिम होने के लिए दवाइयों का सेवन ग़लत है क्योंकि इसके दूरगामी परिणाम अच्छे नहीं। जानकारी देता और सचेत करता आलेख विचारणीय है। हार्दिक बधाई।
आपने एकदम सही कहा सुदर्शन जी। धन्यवाद।
विज्ञान और तकनीकी का जितना विस्तार हो रहा है उतना ही इंसान प्रकृति से दूरी बना रहा है और हर किस्म के अप्राकृतिक कार्य में संलग्न है ।
प्रकृति के कायदे कानून को अपनाकर ही मानव कल्याण संभव है ।
Dr Prabha mishra
आदरणीय प्रभा जी, आपसेपूरी तरह सहमत।
आदरणीय सर,
सादर अभिवादन।
‘पुरवाई’ के इस अंक का संपादकीय- ‘शादी का ख़र्चा मोटा… शरीर पतला…!’- आज के दौर की कड़वी सामाजिक विडंबना को पूरी बेबाकी से उजागर करता है। यह लेख केवल विवाह की तैयारियों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि उस ‘दिखावे की संस्कृति’ पर एक गहरा प्रहार है जिसने मानवीय संवेदनाओं और स्वास्थ्य को बाज़ार की वस्तु बना दिया है। आपने जिस बेबाकी से आधुनिक समाज में बढ़ते कृत्रिम आकर्षण और ‘प्राकृतिक खिलवाड़’ को उजागर किया है, वह अंतर्मन को झकझोर देने वाला है।
आलेख के आरंभ में ही करण जौहर और कपिल शर्मा जैसे चर्चित चेहरों का उदाहरण देकर आपने यह सिद्ध कर दिया है कि कैसे ‘ग्लैमर’ की दुनिया का अंधानुकरण आम इंसान के भीतर असुरक्षा का भाव पैदा कर रहा है। ओज़ेम्पिक और माउंजारो जैसे इंजेक्शनों का ज़िक्र यह स्पष्ट करता है कि अब सुंदर और छरहरा दिखने की चाहत प्राकृतिक प्रयासों से हटकर पूरी तरह रसायनों और दवाओं पर निर्भर हो गई है। यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि एक ऐसे भविष्य की ओर संकेत करती है जहाँ मनुष्य अपने ही शरीर के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार करने लगा है।
संपादकीय का सबसे मर्मस्पर्शी पक्ष वह है, जहाँ आप ‘विवाह’ जैसे पवित्र बंधन के साथ जुड़े उन सामाजिक दबावों की चर्चा करते हैं जो विशेष रूप से युवतियों पर लादे जाते हैं। रॉयटर्स के हवाले से दी गई अदिति और प्रिया जैसी लड़कियों की कहानियाँ समाज की उस संकुचित मानसिकता का आईना हैं, जहाँ लड़की के गुणों से अधिक उसके ‘स्लिम-ट्रिम’ होने को प्राथमिकता दी जाती है। प्रिया का वह प्रसंग, जहाँ शरीर के भारीपन के कारण उसे अपमानित होना पड़ा, पाठक के हृदय में करुणा और वर्तमान सामाजिक ढांचे के प्रति आक्रोश पैदा करता है।
आपने भारत के अस्सी अरब रुपये के बढ़ते वज़न घटाने वाले बाज़ार और ‘माउंजारो प्री-वेडिंग पैकेज’ जैसे प्रलोभनों के माध्यम से बाज़ारवाद के खतरनाक जाल को उजागर किया है। आपका यह कटाक्ष कि- ‘युवा पीढ़ी पागल बनने को बेकरार बैठी है, बस पागल बनाने वाला चाहिए।’- आज के उपभोक्तावादी तंत्र पर एक तीखा प्रहार है। यहॉं यह स्पष्ट होता है कि कैसे वेलनेस क्लिनिक और विज्ञापन तंत्र लोगों की मानसिक कमज़ोरियों का व्यावसायिक लाभ उठा रहे हैं।
कहना गलत नहीं होगा कि यह संपादकीय अपनी सहज-सरल भाषा और मार्मिक उदाहरणों के माध्यम से एक अभिभावक की तरह चेतावनी भी देता है। आपका यह परामर्श कि शरीर प्रकृति की देन है और इसके साथ अप्राकृतिक छेड़छाड़ आत्मघाती हो सकती है, आज की मशीनी पीढ़ी के लिए एक जीवन-रक्षक मंत्र है। शरीर को ‘हिलाने-डुलाने’ और संतुलित जीवन-शैली अपनाने का आपका सुझाव बाज़ार की दवाओं का सबसे सशक्त विकल्प है। यह लेख न केवल बाज़ारवाद के विरुद्ध एक दस्तावेज़ है, बल्कि हमें अपनी जड़ों और प्रकृति की ओर लौटने का एक आत्मीय आग्रह भी करता है।
प्रिय भाई चंद्रशेखर जी आपने कहा है कि – “ओज़ेम्पिक और माउंजारो जैसे इंजेक्शनों का ज़िक्र यह स्पष्ट करता है कि अब सुंदर और छरहरा दिखने की चाहत प्राकृतिक प्रयासों से हटकर पूरी तरह रसायनों और दवाओं पर निर्भर हो गई है। यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि एक ऐसे भविष्य की ओर संकेत करती है जहाँ मनुष्य अपने ही शरीर के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार करने लगा है।
संपादकीय का सबसे मर्मस्पर्शी पक्ष वह है, जहाँ आप ‘विवाह’ जैसे पवित्र बंधन के साथ जुड़े उन सामाजिक दबावों की चर्चा करते हैं जो विशेष रूप से युवतियों पर लादे जाते हैं।”
आपका तहेदिल से शुक्रिया।
इस बार का संपादकीय -‘ शादी का खर्चा मोटा…शरीर पतला…! हमारी आधुनिक जीवन शैली पर केंद्रित है। मुटयाए लोग पतला होने के लिए कैसी-कैसी दवाइयां ले रहे हैं, यह जानकर अब आश्चर्य नहीं होता है।
लड़कियां स्लिम दिखने के चक्कर में न जाने कितना खटराग करती है! अगर शादी वाला मामला हो तो ये सुंदरियां कुछ भी कर गुजर जाएंगी। क्योंकि हर लड़की शादी में सुंदर दिखना चाहती है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। इसे हम मानवीय प्रवृत्ति कह सकते हैं। लेकिन शरीर का मोटापा इसमें भारी व्यवधान डालता है। मोटापा सुंदरता का सबसे बड़ा दुश्मन जो है।बहुत सी चीजें छिपाई जा सकती हैं पर मोटापा छिपाए नहीं छिपता है।
कंपनियां इस समस्या का समाधान लेकर बाजार में कूद पड़ी है। मोटे लोग इस समाधान का भरपूर लाभ ले रहे हैं। खैर.. ये तो चलता रहेगा। आप कितना भी कहिए कि इसके साइड इफैक्ट्स होते हैं, पर लोग नहीं मानेंगे। सबको पता है कि फास्ट फूड बजन बढ़ाते हैं, फिर भी हम लोग नहीं मानते हैं। खूब खाते हैं और जमकर खाते हैं। क्यों न खाएं? हर चीज की दवा उपलब्ध है, तब काहे की चिंता। साइड इफैक्ट्स होंगे तो उसके लिए भी दवाएं उपलब्ध हैं।
विभिन्न अनुसंधानों से यह स्पष्ट हो गया है कि खान-पान मोटापा बढ़ाते है, यह बात साठ प्रतिशत के लिए सही है। चालीस प्रतिशत पर यह लागू नहीं होता है। मैंने ऐसे भी गरीब लोग देखे हैं कि उनको ढंग का खाना नसीब नहीं होता है फिर भी वे मोटे हैं। कुछ लोगों के जीन्स मोटापे वाले होते ही हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ लोग कितना भी खाएं वे मोटे नहीं होते हैं। उनके जीन्स अपनी तरह के होते हैं। मैं खुद एक नौकरीपेशा व्यक्ति हूं। कई बार प्रयास किया कि थोड़ा सा बजन बढ़ जाए, डाइट भी उसी तरह की ली पर कोई फर्क नहीं पड़ा। फिर यह सोचकर तसल्ली कर लेता हूं कि छोड़ो यार! जैसा हूं उसी में संतोष करूं। अधिकतर लोगों ने मुझे इसी रूप में स्वीकार किया है तो अब काया परिवर्तन क्यों की जाए! इतना कमजोर भी नहीं हूं।
शादी का नाम आते ही ध्यान खर्च पर चला जाता है। खर्च होता भी है। ब्यूटीपार्लर का खर्च तो शादी का एक अहम हिस्सा बन गया है। अब मोटापा कम करने का खर्च भी शामिल हो चुका है। आपने सच कहा है कि विदेशों से भारत में फैशन समय-समय पर अपनी पैठ बना लेता है। खासकर पश्चिमी जगत वाला फैशन कुछ ज्यादा ही पैठ बना रहा है।
मेरी धारणा तो यह है कि फैशन का सूर्य पश्चिम से उदय होता है और पूर्व में अपने संपूर्ण वैभव के साथ फैल जाता है।
संपादकीय के अंत में आपने चेतावनी दे दी है। अगर इस चेतावनी को कुछ लोग भी फालो कर लेंगे तो उनके स्वास्थ्य में गिरावट नहीं आएगी। साहित्य को लोक हितकारी माना गया है। आज के संपादकीय इसके तत्व बहुतायत में विद्यमान हैं।
लोक-मंगल की कामना के साथ मैं भी इस मत में अपने मत को शामिल करता हूं -” सभी को फास्ट-फूड से बचना चाहिए।”
प्रिय भाई लखन लाल पाल जी यह कहना ग़लत ना होगा कि आपकी टिप्पणी पढ़ने की आदत सी हो गई है। यदि आपकी टिप्पणी ना आए तो लगता है कि जैसे संपादकीय में कोई कमी रह गई। आप सही कहते हैं कि – लोक-मंगल की कामना के साथ मैं भी इस मत में अपने मत को शामिल करता हूं -” सभी को फास्ट-फूड से बचना चाहिए।”… हार्दिक आभार।
शादी का खर्चा मोटा शरीर पतला…संपादकी य में आज युवाओं में शरीर को जीरो साइज का बनाने के लिए दवाएं लेने की प्रवृति पर चिंता व्यक्त करते हुए उसे चेताया भी है।
मेरा मानना है कि हमें अपने शरीर से प्यार करना सीखना होगा। हमारे शरीर की बनावट खान-पान के साथ व्यक्ति के जीन पर भी निर्भर है। अगर इंसान अपने शारीरिक विसंगतियों पर विचलित होने की अपेक्षा आंतरिक गुणों के विकास में ध्यान देगा तो जो जैसा है, उसी में स्वीकार्य होगा।
यह अवश्य है कि सांचे में ढला शरीर आत्मविश्वास को बढ़ाता है किन्तु इंसान को अपनी फिटनेस बढ़ाने के लिए प्राकृतिक साधनों को अपनाना चाहिए न कि दवाओं का।
सदा की तरह मनुष्य मात्र को सार्थक सन्देश देता संपादकीय।
आदरणीय सुधा जी आप से पूरी तरह सहमत कि – यह अवश्य है कि सांचे में ढला शरीर आत्मविश्वास को बढ़ाता है किन्तु इंसान को अपनी फिटनेस बढ़ाने के लिए प्राकृतिक साधनों को अपनाना चाहिए न कि दवाओं का।
शादी का अच्छा विवरण प्रस्तुत किया है आपने
मगर कपड़े और ज्वेलरी का खर्चा बहुत कम बताये इतने में तो कुछ भी नहीं होता है
यह भी सोचने वाली बात तो है संगीता जी।
एक और संपादकीय जो समाज की नब्ज़ को थामें हुए शादी और मोटापे के कब्ज़ पर! पहले समस्या को बताता,जताता और पहचान कर उसका
निदान भी बताया है।
और निदान भी वैद्य के नुस्खे की मानिंद यथा
शरीर को हिलाइए, डुलाइए और चलाइए!
बढ़िया और समीचीन संदर्भों को रेखांकित करता संपादकीय।
सूर्य कांत शर्मा
भाई सूर्यकांत जी, आपने तो चंद शब्दों में संपादकीय की आत्मा को समझा दिया… समस्या को बताया, जताया और पहचान करके उसका निदान भी बताया….
पता नहीं लोग और क्या-क्या करेंगे! लेख को पढ़कर भी आ लोगों की आंख ना खुले तो क्या कर सकते हैं! बहुत बढ़िया ले आ।
हार्दिक धन्यवाद भाग्यम जी।
समाज की बहुत सही नब्ज़ पकड़ी आपने सर। शादी-विवाह को कोई गंभीरता से ले या नहीं लेकिन यह जानते हुए भी कि इंसान गलतियों का पुतला है, शादी पर ये जो Perfect दिखने का भूत चढ़ जाता है न, इसका हैंगोवर ताउम्र रहता है।
एकदम सही कहा रक्षा।
प्रकृति के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ गलत परिणाम ही लाती है । प्रकृति को प्राकृतिक तरीके से ही सम्हाला जाना चाहिए। व्यायाम और संतुलित आहार शरीर को स्वस्थ भी रखता है और सुदृढ़ भी। ग़ौरतलब यह है कि shortcuts का ज़माना है , धीरज की कमी है और समय की भी। ऐसे में ऐसी दवाइयां बड़ी handy हो जाती हैं। अब, परिवर्तन कहां किया जाये , इस पर विचार होना चाहिए।
अलहदा विषय पर जानकारियों से भरपूर संपादकीय के लिए धन्यवाद!
रचना, आपने बहुत ही संतुलित मगर सारगर्भित टिप्पणी लिखी है। हार्दिक धन्यवाद।
वाह जितेन्द्र भाई; सम्पादकीय का कितना मज़ेदार विषय चुना है। सम्पादकीय को पढ़ने के बाद, सब से पहले तो, मेरा सवाल उस जोड़े से है जिन्होंने शादी से पहले इंजैक्शन लगवा लगवा कर अपने आपको मैरिलिन मुनरो और मार्लेन ब्राण्डो या फिर मधुबाला और दिलीप कुमार जैसी शकल दे दी। शादी के बाद ऊटी या फिर एक से बढ़कर एक जगहों पर जाकर हनीमून का पूरण आनन्द भी उठाया। उसके बाद लौटकर अपने ठिकाने पर वापस आकर अपना गृहस्थ जीवन शुरू किया। लेकिन इस सब के बावजूद भी अपनी खाने पीने की, उठने बैठने की या फिर शरीर को हिलाने की वो पुरानी आदतें को उसी तरह से कायम रक्खा।
शादी से पहले की जो दूरियाँ थीं वो अब बहुत कम हो गई हैं और सुबह सुबह एक दूसरे का वो चेहरा देखने को मिलता है जो, बिना किसी मेकप के, अपने असली रूप में होता है। धीरे धीरे पुरानी आदतों के कारण शरीर अपने उसी मंज़िल की ओर बढ़ने लगता है जो इंजैक्शन लगवाने से पहले की थी
मेरा प्रश्न:
दुनिया को दिखाने के लिए यह सब दिखावा किस लिए मेरे दोस्त? इन झंझटों में पड़ने की बजाए क्यों नहीं अपने शरीर का पहले से ध्यान रक्खा?
विजय भाई, आपने संपादकीय के मर्म को सही पकड़ा है कि – “दुनिया को दिखाने के लिए यह सब दिखावा किस लिए? इन झंझटों में पड़ने की बजाए क्यों नहीं अपने शरीर का पहले से ध्यान रक्खा?” – हार्दिक धन्यवाद।
जीवनशैली, स्वास्थ्य और प्राकृतिक संतुलन की ओर बढ़ने का सार्थक संदेश देती प्रासंगिक एवं उपयोगी संपादकीय!
स्नेहाशीष आशुतोष।
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
आपके संपादकीय के विषय हमेशा ही सिर्फ विषय नहीं रहते हैं सर जी! सामयिक विषय, तत्थ्यात्मक जानकारी, गुण-दोष, लाभ-हानि और चेतावनी…संग सावधानी; उचित मश्वरे के साथ!!!!और शीर्षक उससे अधिक मनोरंजक। पाठकों के लिये संपादकीय के इंतजार के मूल में यही जिज्ञासा काम करती रंहै।
लेकिन विषय गंभीर है। कपिल शर्मा तो चलो ठीक है, पर करण जौहर?वह तो इतने मोटे दिखे नहीं कभी कि सेहत दाँव पर लगा दें!!!!!!
खैर….!
भले ही विवाह महत्वपूर्ण संस्कार है। किंतु वर्तमान में दिनों- दिन आर्थिक संपन्नता और दिखावे के चलते र्इसका बदलता और बढ़ता स्वरूप चिंता का विषय है। 80अरब की संख्या पढ़कर दिमाग घूम गया।
ओजे़म्पिक ,माउंजारो और वोगोवी वजन कम करने वाली दवाओं के बारे में जानकर आश्चर्य नहीं, बल्कि दुख हुआ।
माँग और पूर्ति बाजार का महत्वपूर्ण नियम है। और बाजार सिर्फ व्यापार समझता है।नफा देखता है। नुकसान उपभोक्ता के समझने की बात है।
भारत में तो इसके लिये आयुर्वेद, प्रकृतिक चिकित्सा और होमियोपैथी में भी ऐसे उपचार हैं जिसका लाभ समय रहते लिया जा सकता है।
ब्रिटेन में 15 लाख की संख्या ने आश्चर्यचकित किया।ड्रैस डिजाइनर एंजी की समस्या जरूरी और स्वाभाविक लगी। उनके लिए तो वास्तव में यह चिंता का विषय है कि ऐसे में वह क्या करें?
यह काल आराम पूर्ण जिंदगी की चाहत रखता है सर जी! शरीर हिलाना- डुलाना न पड़े बस! कोई समझना ही नहीं चाहते कि न चलने पर मशीन भी जाम हो जाती है।
आपने एक बात 100 टके सही कही,*युवा पीढ़ी पागल बनने के लिये बेकरार हो रही है।*
भोजन जितना जरूरी है,उतना ही जरूरी शारीरिक श्रम भी है। चाहे आप उसे व्यायाम से मैनेज करें या शारीरिक श्रम से करें।
वजन कम खाकर कम करना शरीर को कमजोर बनाता है।
आपकी यह बात काबिले गौर है कि ऐसी कोई अंग्रेजी दवा नहीं है इसके साइड इफेक्ट न हो। फिर
बैठे-बैठे काम के चक्कर में वज़न बढ़ना स्वाभाविक है , इसीलिये शरीर को हिलाना, डुलाना और चलाना जरूरी है।
जहाँ तक सुन्दरता की बात है तो यह सच है कि आजकल लड़के और लड़कियाँ; दोनों का ही झुकाव सुन्दरता की ओर है।काश लोग समझ पाते कि असली सुन्दरता गुणों की है। इस बात पर हमें याद आता है कि हमारे स्कूल ग्रुप में बनारस से एक सुशीला गुप्ता थी। बहुत साँवली और फीचर्स भी नहीं, पर नेचर उसका इतना अच्छा था कि हम लोग सब उस पर जान देते थे।
सादगी के सौंदर्य और आकर्षण के साथ सौम्यता का प्रभाव श्रृंगार के हर अलंकारिक सौंदर्य को पीछे छोड़ देता है।
काश लोग समझ पाएँ।
सावधान, सचेत और जागरूक करते इस संपादकीय के लिये आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।
पुरवाई का आभार!