Sunday, May 3, 2026
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अरुण शीतांश की कविताएँ

स्पर्श

तो हमने सोचा कि एक बकरी अपने बच्चे को बचाती है
मां संतान को बचाती है
बंदर,भालू,हाथी,शेरनी, गिलहरी और न जाने कितने
यहां तक कि एक नाव को एक कील बचाती है
पानी, हवा, आग मनुष्य को बचाती है
मनुष्य किसको बचाता है!!
दरअसल बचाता नहीं रक्षा करता है
एक मुर्गी अंडे बचाने में सफल हो जाती है
पॉलिस करने वाला
आपको जूते को बचा लेता है
मक्खी मैला हटाकर बिमारी से बचाती है
पर उसकी ताकत उतनी है
वह क्या कर सकती है
फिर भी थकती नहीं

कविताओं को शब्द बचा लेते हैं
लानत है नेता देश को नहीं बचाते
विकास की राजनीति करते हैं

राजनीत चाहे तो सबको बचा सकती है

हमें रात को प्रेमिकाएं बचाती हैं
दिन को सूर्य की लालिमा सुबह-सुबह ही बचा लेती है

आवारा पशुओं को घास बचा लेती है

चाहे तुम जोर से दरवाजा बंद रखो हवा नहीं बचा सकती है
कोरोनावायरस वहीं है
अगर एक आदमी का भी है तो

अठारह साल की लड़की प्रेम को बचा ले जाती है

हम एक भिखारी को नहीं बचा पाते
जो पटना मोड़ मोहनिया के चौराहे पर रात दिन खुले आकाश में रहता है
बारिश धूप और ठंड में
सिर्फ दो कंबल के साथ

एक होटल वाला रोज़ बचा रहा है उसे
एक दिन पपीते देने से मेरा दिल नहीं भरा
गला भर आया पोखर जितना

अकेली रात को आंसू
के कोर से लूढ़का हुआ बूंद को गालों के स्पर्श ने बचाया

 श्री

बहुत शांत हवा भी हमें अंदर से झकझोरती है
विरान वातावरण में
सिर्फ एक चिड़िया की आवाज़ संगीत है
शाम के वक्त
अकेले हैं तो शाम भी अकेले हो जाती है
ठीक रात को निश्चिंत होकर कोई नहीं सो रहा
आज पूर्णिमा है तो क्या हुआ
चांद को रोज कटना ही है
एक दिन चांद को देखने के लिए पैसे लग सकते हैं
चांद के कंठ को नहीं
कट को देख सकते हैं

जैसे पानी और शौच के लिए दे रहे हैं शौक़ से
जेब कट जाती है
हद है भाई
फिर हम एकांत में कैसे
ध्यान लगा रहे हैं
जहां रेलवे की पटरियों की आवाज़
हारमोनियम की तरह बज रही है
खुशी की बात है कि
मेरे ख्याल में कोई सज रही है
सजना एकांत का विशेष स्थान है श्री श्री श्री…!

थाल

उन्हें कहाँ नसीब है
न चढ़ाने को मिलता है
न खाने को मिलता है

मगर वो फूल जरुर उनके पास है
जो थाल में हैं
और उन्हीं के हाथों से गुजरता है रोज़
आजकल नित्य दिन
चढ़ रहें हैं पूजा स्थलों पर

तुम्हारे ही मिट्टी में बोये पौधे के फूल

फूल से थाल सुन्दर लग रहा है
थाल से फूल
लेकिन उस थाल में अन्न नहीं है तुम्हारे पास
बस कुछ बीज हैं
जो सुबह-सुबह होते
पौधे के शक्ल में आ जाता है
फिर फूल
और थाल में फूल दिखाई देने लगता है
केवल अन्न नहीं

जो लिखा गया

जो लिखा गया
पेड़ों की देह पर
जो लिखा गया
ताम्रपत्र पर
जो लिखा गया
भोजपत्र पर
जो लिखा गया

मेरी उमर पर

जो लिखा गया
मेरे प्रेम पर

सब लिखा गया
सब जगह

दुःख के आंसू पर
नहीं लिखा गया
गांव से शहर तक

रंगीन खेत

खेत का एक रंगीन चित्र बन गया है कैमूर में
संस्कृतिक देश की तरह दिखाई दे रहा है

कोई किसान
पेण्टर बन रंग दिया हो
अपनी ही छाती और लालाट

यहां सुग्गे नहीं हैं
नहीं कबूतर
गिलहरियांँ गायब हैं
बगुले बचे हैं थोड़े

राख, काली राख को
दबा ली है धरती
अन्न जल त्याग कर किसान
अब अनाज से नहीं
राख से मर रहे हैं
कभी बर्तन मांजने में काम आता था
खेत को क्या किया जाए
जो हर बार मर रहा है
किसान की तरह
खेत को बचाया जाए
कि किसान को…!

  • अरुण शीतांश
    कवि, आलोचक एवं संपादक
    संप्रति- शिक्षण संस्थान में कार्यरत
    मणि भवन, संकट मोचन नगर, आरा भोजपुर 802301
    मो. – 09431685589 मेल [email protected]

 

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