प्रतियोगिता छोड़ घर लौटने के बाद ब्रिटिश टैब्लॉयड ‘द सन’ को दिए गए एक साक्षात्कार में 24 वर्षीय मिल्ला मैगी ने कहा कि आयोजकों ने उन्हें वहाँ वेश्या की तरह महसूस करवाया। आयोजकों की नज़र में वे लोग वहाँ मात्र मनोरंजन का साधन थीं। अमीर पुरुषों के सामने प्रदर्शन के सामान की तरह पेश किए जाने के बाद उन्होंने अपना पक्ष रखने का फैसला किया। उन्होंने मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता को ‘पुराना और अतीत में फँसा हुआ’ करार दिया और कहा कि प्रतियोगिता में बचे 109 फाइनलिस्टों में से कुछ को ‘बोरिंग’ होने के लिए आयोजकों ने फटकार भी लगाई।
भारत में इन दिनों ऑपरेशन सिंदूर को लेकर इतनी बहसबाज़ी चल रही है कि देश में और क्या घटित हो रहा है, उसकी ओर किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा है। 10 मई से तेलंगाना में विश्व-सुंदरी प्रतियोगिता की शुरूआत हो चुकी है, जो कि कल यानि कि 31 मई 2025 तक चलने वाली है। जब तक यह संपादकीय प्रकाशित होगा ‘मिस वर्ल्ड 2025’ की घोषणा हो चुकी होगी।
भारत का इस प्रतियोगिता से बहुत पुराना रिश्ता रहा है। 23 अगस्त 1943 को मुंबई में जन्मी रीता फ़ारिया ने 23 साल की उम्र में, 17 नवंबर, 1966 को लंदन में आयोजित प्रतियोगिता में मिस वर्ल्ड का ख़िताब जीता था। रीता इस उपलब्धि को हासिल करने वाली न केवल भारत की, बल्कि पूरे एशिया की पहली महिला थीं। इंटरनेट पर कहीं-कहीं उनका जन्म वर्ष 1945 भी बताया जाता है। यहीं ध्यान देने लायक बात यह भी है कि इसके पश्चात मिस एशिया का ख़िताब जीतने के लिए किसी भारतीय महिला को 1970 तक प्रतीक्षा करनी पड़ी, जब ज़ीनत अमान (जो बाद में एक लोकप्रिय अभिनेत्री भी बनीं) ने यह प्रतियोगिता जीती।
पुरवाई के पाठक अवश्य सोच रहे होंगे कि आख़िर हमारे संपादक हमें मिस वर्ल्ड का किस्सा क्यों सुना रहे हैं। आज जबकि इतने अधिक महत्व के मुद्दे हमारे सामने हैं… भारत के डिप्लोमैटिक दल पूरे विश्व में भारत का पक्ष रख रहे हैं… शशि थरूर के ‘थरूरिज़्म’ से त्रस्त राहुल गांधी और कांग्रेस के अन्य नेता पूरी तरह से कंफ़्यूज़्ड दिखाई दे रहे हैं… ऐसे में मिस वर्ल्ड का राग क्यों?
बात कुछ यूं है कि तेलंगाना सरकार (मुख्यमंत्री – कांग्रेस के श्री रेवंत रेड्डी) ने यह तय कर लिया था कि 10 से 31 मई तक आयोजित होने जा रही मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता के दौरान राज्य को ब्रांड के तौर पर दुनिया के सामने प्रस्तुत किया जाए और साथ ही साथ उन्होंने विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए एक कार्य योजना भी तैयार कर ली थी।
इस योजना के अनुसार 12 से 31 मई तक सांस्कृतिक, विरासत और पर्यटन पर केंद्रित कार्यक्रमों की एक श्रृंखला आयोजित की जाएगी। इस योजना का मूल उद्देश्य तेलंगाना के समृद्ध इतिहास, जीवंत संस्कृति और चिकित्सा पद्धति सहित पर्यटन क्षमता को प्रदर्शित करना था। आध्यात्मिक पर्यटन के तहत प्रतिभागियों ने 15 मई को हैदराबाद के निकट ‘यादगिरिगुट्टा’ में प्रसिद्ध भगवान लक्ष्मी नरसिंह स्वामी मंदिर तथा ‘पोचमपल्ली’ में हथकरघा बुनाई केंद्र का भी दौरा किया।
जहाँ एक तरफ़ प्रदेश के मुख्यमंत्री भारत-पाक सैनिक संघर्ष और भारतीय सांसदों के 7 दलों द्वारा विदेशों में भारत का पक्ष रखने की मुहिम पर राजनीति कर रहे थे, वहीं विश्व-सुन्दरी प्रतियोगिता से एक ऐसी ख़बर आई कि सभी भारतीयों और भारतवंशियों को सोच में डाल दिया कि आख़िर भारत के किसी राज्य में ऐसी घटना कैसे घट सकती है।
दरअसल हम यूरोप और अमेरिका की नारी को आज भी मनोज कुमार की फ़िल्मों के लेंस से देखते हैं। हम मान कर चलते हैं कि उनमें कोई मान-मर्यादा नहीं होती; वे कम कपड़े या बिकिनी पहन कर समुद्र किनारे लेटी रहती हैं; इनमें कोई पारिवारिक मान्यताएँ नहीं होती हैं, मगर यहाँ हुआ इसके ठीक विपरीत।
मिस इंग्लैंड मिल्ला मैगी ने मिस-वर्ल्ड प्रतियोगिता के आयोजकों के व्यवहार के विरुद्ध शिकायत करते हुए प्रतियोगिता का बहिष्कार कर दिया और इंग्लैंड वापिस चली गई। वहाँ उसने ‘द सन’ समाचार पत्र को दिए एक साक्षात्कार में आयोजकों पर ‘शोषण और अपमान’ के गंभीर आरोप लगाए हैं।
प्रतियोगिता छोड़ घर लौटने के बाद ब्रिटिश टैब्लॉयड ‘द सन’ को दिए गए एक साक्षात्कार में 24 वर्षीय मिल्ला मैगी ने कहा कि आयोजकों ने उन्हें वहाँ वेश्या की तरह महसूस करवाया। आयोजकों की नज़र में वे लोग वहाँ मात्र मनोरंजन का साधन थीं। अमीर पुरुषों के सामने प्रदर्शन के सामान की तरह पेश किए जाने के बाद उन्होंने अपना पक्ष रखने का फैसला किया। उन्होंने मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता को ‘पुराना और अतीत में फँसा हुआ’ करार दिया और कहा कि प्रतियोगिता में बचे 109 फाइनलिस्टों में से कुछ को ‘बोरिंग’ होने के लिए आयोजकों ने फटकार भी लगाई।
मिल्ला का कहना है कि उन्हें आखिरी झटका तब लगा, जब उन्हें प्रायोजकों के रूप में शो में लगाए गए पैसे के लिए ‘धन्यवाद’ के तौर पर मध्यम आयु वर्ग के पुरुषों का मनोरंजन करने के लिए कहा गया। मिल्ला ने साफ़ करते हुए कहा कि ‘छह मेहमानों वाली हर टेबल पर दो लड़कियाँ बिठाई गईं थीं। हमसे उम्मीद की जा रही थी कि हम पूरी शाम उनके (ख़ास मेहमानों) साथ बैठेंगे और धन्यवाद के रूप में उनका मनोरंजन करेंगे। हमें कुछ ऐसा महसूस करवाया गया कि हम इन लोगों को खुश करने के लिए वहाँ थे और सर्कस के बंदरों की तरह बैठे थे। मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर सकती थी।’
भारतीय डिप्लोमैटिक परंपरा के अनुसार, तेलंगाना पर्यटन विभाग के प्रधान सचिव जयेश रंजन ने मिल्ला मैगी के आरोपों को बेबुनियाद बताया। ‘पुरवाई’ को आज तक यह कभी समझ नहीं आया कि किसी भी मुद्दे की जाँच हुए बिना यह कैसे पता चल जाता है कि आरोप किस बुनियाद पर टिके हैं या फिर बेबुनियाद हैं। मुद्दे पर आगे बोलते हुए जयेश रंजन ने बयान दिया कि, “चौमोहल्ला पैलेस में मिस इंग्लैंड और मिस वेल्स एक बड़े अधिकारी, उनकी पत्नी, बहू और एक अन्य महिला के साथ एक टेबल पर बैठी थीं. मिस वेल्स ने साफ तौर पर यह कहा कि किसी ने भी उनके साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं किया है।”
मिल्ला मैगी द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों की जाँच करने के लिए बीते रविवार, 25 मई को महिला सुरक्षा आयोग की टीम माधापुर के ट्राइडेंट होटल पहुँची। इस टीम में डीजी महिला सुरक्षा शिखा गोयल, डीआईजी रेमा राजेश्वरी और साइबराबाद स्पेशल ब्रांच डीसीपी साई श्री शामिल हैं। होटल पहुँच कर तीनों महिला अधिकारियों ने मिस वर्ल्ड प्रतिभागियों से बातचीत की। चौमोहल्ला पैलेस में मिल्ला मैगी के बगल में बैठी थीं मिस वेल्स। इसलिए मिस वेल्स से भी पूछताछ की गई, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके, कि आखिर वहाँ हुआ क्या था। लगभग 50 प्रतिभागियों द्वारा दी गयी जानकारी से डोज़ियर तैयार किया गया है।
इस बीच यह भी पता चला है कि मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता की सी.ई.ओ. जूलिया मोर्ले के अनुसार मिल्ला मैगी ने अपनी माँ की तबियत ख़राब होने का हवाला देते हुए वापस इंग्लैंड जाने की इच्छा ज़ाहिर की थी। आयोजकों ने उनके साथ पूरा सहयोग किया और उन्हें इंग्लैंड की वापसी यात्रा में सहायता भी की। मगर मिल्ला मैगी की माँ ने इस बात का खंडन करते हुए कहा कि आयोजकों ने मिल्ला की वापसी के लिए कोई सहायता नहीं की। उसकी हवाई जहाज़ की टिकट के पैसे स्वयं मिल्ला की माँ ने अदा किए थे।
पूर्व मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर रॉव की पार्टी भारत राष्ट्र समिति (पूर्व नाम तेलंगाना राष्ट्र समिति) ने मामले का संज्ञान लेते हुए दि सन अख़बार की टिप्पणी को पोस्ट करते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है। “ट्वीट में बीआरएस ने लिखा, “तेलंगाना की जनता का 250 करोड़ रुपये ख़र्च कर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेलंगाना राज्य और हैदराबाद की छबि को धूमिल करने वाली कांग्रेस सरकार और रेवंत को क्या जवाब देना है?”
ख़ैर यह तो राजनीति है। यदि के. चन्द्रशेखर रॉव की सरकार के समय यह मुद्दा उठता, तो कांग्रेस पार्टी उन्हें नहीं बख़्शती और शायद ठीक इसी तरह की टिप्पणी करती। अंतिम समाचार मिलने तक इंग्लैंड से शार्लट ग्रान्ट मिल्ला मैगी का स्थान लेने के लिये हैदराबाद पहुंच चुकी हैं। शार्लट मिस इंग्लैंड की फ़र्स्ट रनर अप थीं।
भारत के आयोजकों को किसी भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर के किसी आयोजन से पहले चाहिए कि अपने आपको और अपने अधिकारियों को सही ढंग का प्रशिक्षण दें। सबसे अधिक ज़रूरी है अपना ‘माइंड सेट’ यानी कि विचार प्रणाली को ही बदलना होगा। यह बहुत ज़रूरी है कि हम एक संतुलित व्यवहार स्वयं भी करें और अपने प्रायोजकों को भी प्रोफ़ेशनल व्यवहार के लिए एक निर्देशिका तैयार कर दें। इस तरह की घटनाएँ विश्व में भारत की छवि को धूमिल करती हैं।
नमस्कार सर ।
आपका यह संपादकीय सौंदर्य प्रतियोगिता के पीछे का वीभत्स चेहरा दिखाने का महत्वपूर्ण काम करता है। सौंदर्य प्रतियोगिताओं में स्त्री को हमेशा ही वस्तु के रूप में प्रस्तुत की जाती रही है। ‘मिल्ला’ को बधाई कि उसने खुद को वस्तु बनने से इनकार कर दिया।
इस सार्थक टिप्पणी के लिए स्नेहाशीष रक्षा।
ऑपरेशन सिंदूर और अन्य विचारोत्तेजक ख़बरों के बीच में से विश्व सुंदरी प्रतियोगिता और उस पर उठे विवाद को केंद्र में लाकर,इस बार का संपादकीय खोजी पत्रकारिता का धर्म निभाया है।
विश्व सुंदरी प्रतियोगिता का इतिहास और विवाद को निष्पक्ष अंदाज़ से वर्णित किया गया है।कहावत है कि ‘आग है तो धुंआ भी होगा’!?।
मैगी मिल्ला ने अगर है तो जांच भी होगी। यह सियासत की आरामदायगी का मामला है।
मुद्दा विश्व सुंदरियों को वारांगना के रूप में पेश करने का है,,,,,भारत की छवि को ऐसे मुद्दे ,यदि सही से प्रबंधित नहीं किए गए, ले डूबेंगे।
विश्व सुंदरी प्रतियोगिता का आयोजन ,इसे आयोजन करने में प्रोफेशनल दक्षता,अनुभव और कौशल को संभालने में अभी क्षेत्रीय सियासत बहुत ही बौनी और नौसिखिया सी प्रतीत होती है।वोट बैंक,सत्ता हेतु जोड़ तोड़ की राजनीति, टैक्स पेयर्स की गाढ़ी कमाई को लुटाने और भेड़िया दसान में लिप्त रहने का इतिहास इतना जिद्दी है कि पीछा ही नहीं छोड़ता।
यह प्रकरण यदि ठीक से प्रबंधित नहीं किया गया तो भारत की छवि काफी प्रभावित होगी।
बरहाल संपादकीय और पुरवाई पत्रिका समूह ने
अपना कार्य बखूबी कर दिया है।
भाई सूर्यकान्त जी आपने संपादकीय को धैर्य से पढ़ कर उस पर सटीक टिप्पणी की है। हार्दिक धन्यवाद।
विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराने के लिए पुरबाई के संपादक श्री तेजेन्द्र शर्मा सर को धन्यवाद।
अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित प्रतियोगिता मिस बल्ड का आयोजन जब भी किसी देश में होता है मीडिया का पूरा कवरेज रहता है। एक महीना पहले से इसका आगाज रहता है लेकिन इस बार कहीं कुछ नहीं। प्रतियोगी मिल्ला मैगी द्वारा आरोप लगाने पर भारत की प्रतिष्ठा गिरेगी । हमें लगता है हैदराबाद जैसे 2 nd ग्रेड सिटी में मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता किया ही नहीं जाना चाहिए था ।
भाई सिंह साहब, आपने स्थिति को सही समझा है। बहुत शुक्रिया।
नमस्कार तेजेन्द्र जी
बहुत ही उम्दा और विचारणीय संपादकीय बन पड़ा है। संपादकीय के लिए आपकी खोज बहुत ही प्रभावित करती है। आपकी लेखनी को सलाम और पुरवाई पत्रिका के लिए आपको और समस्त मंडल को हार्दिक बधाई और बहुत बहुत शुभकामनाएँ।
आपकी दिल से लिखे गए शब्द सीधे दिल तक पहुंच गये भाई सूर्यकांत जी।
ना मालूम क्यों मिल्ला की बात कुछ हद तक सही प्रतीत होती है । ऐसी प्रतियोगिताओं में बाज़ार वाद हावी रहता है, जब, बिकनी में दुनिया के सामने लड़कियों को नुमाया किया जाता है तो अकेले में अगर ये सब होता हो तो अचरज क्या ?
आप से सहमत आलोक भाई।
– तेलंगाना को शर्मिंदगी से भरा बैग ‘मिल्ला’ ‘- एक अलग तरह का संपादकीय है। पूरे संपादकीय में मैं ‘बैग मिल्ला’ का अर्थ ढूंढने की कोशिश करता रहा। जब पूरा संपादकीय पढ़ा तब उसका गूढ़ अर्थ समझ में आया।
यह बात सच है कि आपरेशन सिंदूर के बीच अन्य सारी खबरें गौड़ हो चुकी है। लेकिन इस गौड़ खबर पर आपने संपादकीय लिखकर पाठकों का ध्यान इस ओर खींच लिया है।
वैसे तो विश्व सुन्दरी प्रतियोगिता खाए अघाए लोगों की विलासिता का ही प्रतीक है। नारी के बाह्य और आंतरिक सौंदर्य के दिग्दर्शन का यह तरीका पुरुष जाति को माडर्न सिद्ध करता है। स्त्री शोषण के इस मान्य तरीके को लोग स्वीकार कर चुके हैं।
रही बात स्त्री की तो वह पूरब की हो या पश्चिम की। मान-सम्मान सभी के अंदर होता है। पहनावा अलग हो सकता, खान-पान अलग हो सकता है पर अपने प्रति उठती नजरों को हर स्त्री अच्छे से समझती हैं। मिल्ला के साथ यही हुआ है। उसने उस माहौल को महसूस कर लिया होगा। तभी तो वह इस प्रतियोगिता का बायकॉट कर वापस ब्रिटेन लौट गई है।
आपकी इस बात से सहमत हुआ जा सकता है कि ऐसे तरह के कार्यक्रम के लिए आयोजकों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। हर जगह (किसी भी जगह पर नहीं) लार टपकाते नहीं घूमना चाहिए। इस प्रकरण से तेलंगाना की ही नहीं भारत देश की भी बदनामी होती है।
ब्रिटिश टैब्लायड ‘द सन’ पक्षपातरहित नहीं है। वह ऐसी खबरों को चटपटी बनाकर परोसने में माहिर है। फिर भी मेरा झुकाव मिल्ला की तरफ है। उसको न्याय मिलना चाहिए।
तेजेन्द्र सर जी,इस खबर को संपादकीय का विषय बनाना आपकी मौलिक सोच को दर्शाता है। आपकी संपादकीय के विषय हटकर ही होते हैं जिसमें हर तरह के पाठक अपने-अपने स्तर का उसमें ढूंढ लेते हैं। बढ़िया संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर
भाई लखनलाल पाल जी आप जैसे प्रबुद्ध पाठकों और मित्रों की प्रतिक्रियाएं मुझे हर बार कुछ नया खोजने के लिये प्रेरित करती हैं। आपका शब्द लार टपकाना एकदम सटीक है। आपका हार्दिक धन्यवाद हमेशा की तरह।
आदरणीय संपादक महोदय सादर नमस्कार आपने एक ऐसे विषय के बारे में संपादकीय लिखा है जो हमेशा से विवादित विषय रहा है। सर्वप्रथम जब इस प्रकार की प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं तो उसके फार्म में सभी शर्तें व नियम बहुत साफ़ लिखे होते हैं । टूसरा जब यह प्रतियोगिता आयोजित की जाती है तो उसके लिए उन्हें शारीरिक, मानसिक व व्यवहारिक रूप से तैयार किया जाता है ।भारत के आयोजकों को निश्चित रूप से पहले स्वयं को एक व्यवसायिक रूप में तैयार करना चाहिए था । पर भारत में इस तरह की व्यवस्थित गतिविधियों कम ही देखने को मिलती है। दूसरी जो भारतीय मानसिकता बन गई है सफेद रंग देखते ही “सर” “मैडम” कह कर स्वयं को द्वितीय श्रेणी में रखना भी इसका कारण हो सकता है की इस शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया गया। मिस मिल्ला ने जो कहा वह कहीं न कहीं तो थोड़ा सा ही सही पर सच रहा होगा। क्योंकि शायद आपको पता हो की नीदरलैंड ने 35 वर्षों बाद कहा की नीदरलैंड में कोई सौन्दर्य प्रतियोगिता नहीं होगी। बल्कि प्रेरणादायी कहानियाँ होंगी । इसके पीछे भी एक कारण प्रतियोगिता में भाग लेने वाले प्रतिभागियों को प्रतियोगिता के नियमों के अनुसार बहुत कम कपड़े व एक नपे तुले शारीरिक वजन में रहना शामिल था। जो मिस मिल्ला ने कहा शायद वह कहीं सच हो सकता है ।इस तरह की प्रतियोगिता में बहुत कुछ अनचाहा होता है इसपर भारतीय सिनेमा में कई फिल्में भी बन चुकी हैं । इन सब नकारात्मक बातों के बीच जो अच्छी बात है वह यह है की तेलंगाना इस बहाने विश्व में पर्यटन के क्षेत्र में अपनी पहचान बना सकेगा।
आम लगने वाले इस विषय के पीछे बहुत विशेष महत्व को आपने पाठकों के समक्ष रख कर इस ओर इशारा किया है क्या आज भारत जब विश्व गुरु बनने की होड़ में है तब भी उसे इस तरह की प्रतियोगिताओं की ज़रूरत है?????
ऋतु आपने एक महिला होने के नाते इस समस्या को बिल्कुल नये कोण से देखा है। आपको संपादकीय पसंद आया यह पुरवाई के लिये गर्व का विषय है। हार्दिक धन्यवाद।
आदरणीय संपादक महोदय,
जब रीता फारिया मिस वर्ल्ड चुनी गई तब मैं किशोरावस्था में पदार्पण कर रही थी उस उम्र ऐसी प्रतियोगिताएं हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती थीं और ऐसी प्रतियोगिताओं के प्रति हृदय में कुतूहल ,जिज्ञासा सभी कुछ होता था। लेकिन जब तक बात सुष्मिता सेन तक आई तब तक दुनियादारी कुछ-कुछ समझ में आने लगी थी तब मुझे ऐसा लगने लगने लगा कि जब व्यापारियों को
भारत एक संभावित ‘बड़ा बाजार’ लगने लगता है ,तब हमारे देश में रूपसियों की कमी नहीं रहती, सौंदर्य के क्षेत्र में भारत बढ़ा चढ़ा दिखाई देता है, जब यह उद्देश्य पूरा हो जाता है तब व्यापारी कहीं किसी दूसरे देश में बाजार ढूंढने लगते हैं। आज भी मेरी यही सोच है, नहीं जानती कि यह सही है या ग़लत । भारत की आर्थिक स्थिति मजबूत है लोगों के पास खर्च करने के लिए पैसा है इसलिए शायद इसीलिए यह प्रतियोगिता यहां आयोजित की गई है।लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए कब किस बात को मुद्दा बनाकर उछाल दिया जाए कोई नहीं जानता, कौन कौन से हथकंडे अपनाए जाते हैं इनकी सच्चाई कभी सामने नहीं आती। ऑपरेशन सिंदूर की तरफ लोगों का अधिक ध्यान था सौंदर्य प्रतियोगिता अपेक्षित होती जा रही थी कहीं ऐसा तो नहीं कि यह मुद्दा सिर्फ इसलिए उछला कि जनता ध्यान कुछ तो इस और आए?यह सब मेरे अपने विचार है ।
जनरुचि के हिसाब से संपादकीय बहुत अच्छा है।
धन्यवाद आदरणीय।
जितेन्द्र भाई: मिल्ला मैगी के ब्यान को कोई कितना भी झूटा कहे लेकिन सत्य यही है कि मिस वर्लड प्रतियोग्यता में भाग लेने वाली मैगी की दिमाग़ी हालत इतनी ख़राब नहीं हो सकती कि वो प्रतियोग्यता को एकाएक छोड़कर वापस अपने देश जाए और प्रबँधकारों पर एसे लाँछन लगाए। कहीं न कहीं तो उसकी बातों में कुछ सच होगा ही। आपके इस ब्यान में, कि अभी तक अमेरिकन और योरोपियन नारियों को मनोज कुमार की पुरानी फ़िल्मों के लैँज़ से देखा जाता है, बहुत वज़न है। भारत में रहते बहुत से लोगों को शायद अभी तक इस बात का ज्ञान नहीं है कि यह नारियाँ भी यदि खुलकर और हँसकर बात करती हैं तो वो वो नहीं है जो अब भी बहुत से लोग समझते हैं। बड़े शहरों की बात और है लेकिन जब यह प्रतियोग्यता तैलँगाना जैसे शहर में ही करनी थी तो वहाँ पर काम करने वालों को पूरी ट्रेनिँग देना बहुत ज़रूरी था। क्या ऐसा किया गया? शायद नहीं। आजकल के सिन्दूर औप्रेशन को लेकर इस मुद्दे को उठाने के लिए बहुत बहुत साधुवाद।
विजय भाई, मिल्ला मैगी और तेलंगाना को लेकर आपकी टिप्पणी संपादकीय को सही ढंग से परखती है। हार्दिक धन्यवाद।
ये एक अति विख्यात हर दिल अज़ीज़ प्रतियोगिता नहीं है! अगर मिल्ला मैगी को ये ना गवार गुज़रा तो इसकी शिकायत उन्होंने तुरन्त आयोजकों को क्यों नहीं की !
अगर आयोजक उनकी बात नहीं सुनते तो
पूरी दुनिया भर के मीडिया कर्मी वहाँ मौजूद थे ! उनसे कह सकती थी ! कम से कम ब्रिटिश मीडिया से तो बात कर ही सकती थी ! अपने गृह नगर पहुँच कर उजागर करने की क्या आवश्यकता थी !
जो कुछ उपरोक्त वर्णन है वो एक तरफ़ा ही लगता है !
आयोजकों का विस्तृत हवाला नहीं दिया गया ! माँ की अस्वस्थता बता कर आयोजन स्थल छोड़ना केवल बहाना लगता है ! सच्चाई कुछ और ही है !
शायद उनको आभास हो गया होगा कि नम्बर नहीं लगने वाला !
जहाँ धुआँ होता है चिन्गारी ज़रूर होती है !
अब पता लगाना ज़रूरी है कि सच क्या है !
जी कैलाश भाई, यह भी एक नज़रिया है।
इस संपादकीय के दो मुख्य पहलू मुझे लगे । एक तो आयोजकों का दृष्टि दोष (मुझे यही शब्द उचित लग रहा है )। दूसरा मिल्ला का खुद को वस्तु की तरह से देखे जाने से इनकार करना।
हमेशा से सौन्दर्य प्रतियोगिताएँ बाज़ार की खोज में कराई जाती हैं… और उनके नियम जब आम महिलाओं को पढ़ने को मिलते हैं तो वह कठोर ही लगते हैं। इसलिए ये विवादित रहती हैं । मिल्ला भी इनसे अनभिज्ञ नहीं थीं, और तैयार थीं पर संभवतः जो देखने को मिला वो उससे अधिक क्रूर था । उन्होंने इसके विरुद्ध आवाज उठाकर मेरी दृष्टि में साहस का काम किया है । पूरे सिस्टम के विरोध में बोलना एक अकेली स्त्री के लिए कभी भी आसान नहीं होता । सिस्टम ने उनकी खाली जगह तुरंत ही भर दी । ऐसे में जाँच की संभावना कम ही लगती है । तेलंगाना को पर्यटन में जो लाभ मिलन था, वो प्रतियोगिता कराकर मिल ही जाएगा । मिल्ला ने शुरुआत की है, उम्मीद है इसमें आगे और भी साहसी लड़कियां जुड़ेंगी और तब सिस्टम में सुधार की आवश्यकता महसूस की जाएगी ।
एक विचारणीय संपादकीय के लिए आभार
वंदना आपने इतने सुलझे हुए ढंग से सलीकेदार टिप्पणी की है कि मुझे भी संपादकीय समझ में आ गया। हार्दिक धन्यवाद।
Thanks,Tejendra ji,for drawing our attention to the Miss World event of 2025,organized in Hyderabad this year.
It is regrettable indeed that Milla faced humiliation and revolted against it by going back without being a part of the Finale.
We do need such self- respecting and dignified ‘beauties’ indeed.
Warm regards
Deepak Sharma
Deepak ji, thanks so much for your support.
तेलंगाना को शर्मिंदगी से भरा बैग ‘मिल्ला’ संपादकीय पढ़कर यह संज्ञान में आया कि भारत के ही एक प्रदेश तेलंगाना में चल रही सौंदर्य प्रतियोगिता में मिल्ला मैगी अपने प्रति हुए व्यवहार से आहत होकर प्रतियोगिता छोड़कर चली गईं। यह अच्छा नहीं हुआ लेकिन इससे भी बढ़कर आश्चर्य यह पढ़कर हुआ कि रनर अप उनकी जगह लेने आ गईं। क्या इससे यह प्रश्न नहीं उठेंगे कि मिल्ला गलत थीं। मिल्ला के साथ पूरे देश को (इंग्लैंड) को खड़ा होना चाहिए था तभी उनका पक्ष मजबूत होता। ज़ब उनके देश की संस्था ही उनके मामले में गंभीर नहीं दिखती तो दूसरा अन्य कोई क्यों होगा?
हैरानी तो भारतीय मिडिया के रुख पर भी है जो ऑपरेशन सिंदूर में इतना खोया हुआ है कि अपने ही देश के प्रदेश में हो रहे इस आयोजन पर एक शब्द भी नहीं।
आपने ठीक ही लिखा है कि ज़ब तक यह संपादकीय पढ़ेंगे तब तक मिस वर्ल्ड का चयन हो जायेगा। आज ही मैंने पढ़ा कि 72वें मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में थाइलैंड की ओपल सुचाता चुआंग्सरी ने जीत का परचम लहराया है।
ज्वलंत विषय पर लिखने और ध्यान आकर्षित कराने के लिए साधुवाद।
सुधा जी, आपने तो संपादकीय की समग्रता में समीक्षा कर दी। हर महत्वपूर्ण बिंदु को एनेलाइज़ किया है।
अच्छा किया मिल्ला मैगी चली गई। स्त्रियों के प्रति घटिया सोच को पहले बदलने की ज़रूरत है।
हार्दिक धन्यवाद डॉ रौबी।
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
इस बार के संपादकीय का विषय अप्रत्याशित , अकल्पनीय और शर्मसार करने वाला रहा। पढ़ने के बाद दुख हुआ।
ऐसे आयोजनों में अगर कुछ भी अनुचित होता है तो निश्चित रूप से आयोजक इसके लिए उत्तरदायी हैं। गलती करके उसे ढाँकने की कोशिश करना दूसरा गलत काम है।
ऐसी प्रतियोगिता जिसमें विदेश के भी प्रतियोगी भाग ले रहे हों ,वह राष्ट्र के सम्मान के साथ जुड़ी होती है। राज्य सरकार , केंद्र सरकार के साथ ही प्रतियोगिता में भागीदार और कर्मरत हर व्यक्ति का भी यह उत्तरदायित्व होता है कि अतिथि व आतिथेय की मर्यादा बनी रहे साथ ही भाग लेने वाली प्रत्याशियों की गरिमा बनी रहे, उनका स्वाभिमान, सम्मान” बना रहे।अतिथि देवो भव” सूक्ति वाक्य हमारी संस्कृति की नींव है।यह कहना कि “वैश्या की तरह महसूस कराया गया” चरित्र हनन की श्रेणी में आता है। स्वाभिमान पर चोट करती है।प्रतियोगिता के लिये तैयारी से आई मिस मिल्ला का बीच से ही लौट जाना सोचने पर विवश करता है।
सिंदूर मिशन को तो राजनीति ने हास्यास्पद बना दिया है।नेता मौके का फायदा उठाकर नौटंकी करने से बाज नहीं आते। और जिस सेना इतनी बहादुरी से अपने काम को अंजाम दिया उसकी कोई पूछ ही नहीं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर की ऐसी प्रतिस्पर्धा होने पर केंद्र का एक ऐसा गठित दल होना चाहिए जो वहाँ जाकर कार्यक्रम की व्यवस्थाओं को, निर्देशों की पूर्व जाँच करे। नैतिक स्तर पर आयोजन के सुचारू रूप से संपन्न होने के तहत जाँच करें। देश के भीतर की सीमाओं में होने वाली इस तरह की हरकतों पर भी ध्यान देना जरूरी है ।
इस तरह की प्रतियोगिताओं में होने वाली किसी भी गलती पर कठोर सजा का प्रावधान जरूरी है जो हमारे देश की प्रतिष्ठा से जुड़ी हैं।
कोई यहाँ भी कहे कि “जाकर मोदी को बता दो।”
केंद्रीय काँग्रेस पार्टी को भी इस विषय पर संज्ञान लेना चाहिये।
इस घटना को राष्ट्र के सम्मान से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
एक गंभीर विषय पर संज्ञान लेने वाले संपादकीय के लिये तेजेन्द्र जी!आपको बधाई।
पुरवाई का आभार तो बनता ही है।
“इस घटना को राष्ट्र के सम्मान से अलग करके नहीं देखा जा सकता” – आपने ठीक कहा आदरणीय नीलिमा जी। इस समग्र टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
——— प्रतियोगिताओं में बहुत प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष घटता है। कभी कुछ सामने आता है ,कभी कुछ सामने नहीं भी आता। यह घटना भी ऐसी ही है। इतिहास साक्षी है कि यूरोप ने नारी तन का सबसे अधिक शोषण किया है। विज्ञापनों में सबसे अधिक नारी को ही दिखाया जाता था। यह प्रतियोगिता भी आकर्षण को बेचो, शोषण और पूंजीवादी बाजारवाद के नियमों से चलती है। इस संपादकीय ने एक अनछुए विषय को उठाकर , पाठकों की वर्तमान एकरसता को तोड़ा है। इस में कुछ बातें विचारणीय हैं।… आपका हार्दिक धन्यवाद !!
भाई हरनेक जी आपने सटीक मुद्दे उठाए हैं। हार्दिक धन्यवाद।
संतुलन बनाए रखते हुए अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के साथ भारत की छवि का भी ख्याल रखते हैं बढ़िया लेख
बहुत शुक्रिया संगीता जी।
आपकी हर संपादकीय तथ्य और चिंतनपरक ही नहीं शिक्षाप्रद भी होती है। देश, दुनिया और समाज के हर पहलू पर आपकी पैनी नज़र हर संपादकीय में दिखती है।
मिल्ला मैगी का प्रकरण विकृत पुरुष मानसिकता का एक जीवंत उदाहरण है। इससे यह भी पता चलता है कि आज भी गौतमी को छलने के लिए इंद्रों की सभाएँ विधिवत सजती हैं।
बधाई आदरणीय!
भाई गंगाप्रसाद जी आपने तो न्यूनतम शब्दों में इतना कुछ कह डाला। हार्दिक धन्यवाद।
आखिर कब तक … ?
आदरणीय भाई तेजेंद्र शर्मा जी
नमस्कार।
आपके संपादकीय पर विलंब से टिप्पणी कर रहा हूँ
आपने अपने संपादकीय में खुलेतौर पर मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में मिल्ला मैगी के साथ हुए दुर्व्यवहार, अपमान व शोषण आदि के स्याह पक्षों का खुलासा करने के साथ ही इस तरह की मिस वर्ल्ड सौंदर्य प्रतियोगिताओं के नाम पर होने वाले विद्रूप को भी बखूबी उजागर किया है मिल्ला मैगी का ब्रिटिश टैब्लॉयड ‘द सन’ को दिए साक्षात्कार में यह कहना कि मेरे साथ वेश्याओं जैसा व्यवहार किया गया, निश्चित रूप से बहुत ही चिंताजनक है। मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में यदि कोई महिला प्रतिभागी यह महसूस करती है कि वह आयोजकों की नजर में सिर्फ एक खूबसूरत देह है, एक जिंस है, एक सामान है इसके अलावा कुछ नहीं तो यह उसकी स्त्री अस्मिता पर सीधा हमला है। ऐसी दूषित मानसिकताओं के बीच उसका व्यक्तित्व खण्डित होने लगता है, उसका सौंदर्यबोध झुलस जाता है, मुरझा जाता है…..
शाबाशी देनी होगी मिल्ला मैगी की उन्होंने अपने अपमान को सार्वजनिक कर दिया। अक्सर प्रतिभागी इस तरह के अपमान दबाकर रह जाते हैं और किसी तरह प्रतियोगिता में शामिल बने रहते हैं। लेकिन मिल्ला मैगी का जमीर शायद या स्वीकार नहीं कर पाया होगा, किसी का भी नहीं करना चाहिए।
स्त्री स्वातंत्र्य की दुहाई देकर किए जाने वाले ऐसे आयोजनों में कोई महिला प्रतिभागी अपने को लुटापिटा और अपमानित महसूस करे,तो यह बहुत शर्मनाक और शर्मसार करने वाली बात है और एक गंभीर मुद्दा भी।
धर्म और मर्यादाओं के नाम पर स्त्री को पर्दे के कैद में रखे जाने की पितृसत्तात्मक समाज साजिशें की बेड़ियाँ भले हीं टूट रहीं हों। मगर पुरुष प्रधान समाज की महिलाओं के प्रति दोयम दर्जे की दूषित मानसिकता अक्सर देखने को मिलती है। आखिर कब बदलेंगे पुरुष अपना नजरिया…
ऐसे लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए सदैव घूँघट में छुपा रहनेवाला चाँद अब काँधे पर अपने खुले बाल लहराकर आकाश में चंद्रयान उड़ाने की कुब्बत रखता है। देश के दुश्मनों को नेस्तनाबूद करने का अदम्य शौर्य-साहस रखता है।
उफ! कैसे कोई आयोजक सौदर्य प्रतियोगिता में भाग ले रही महिला को बेइज्जत करने की जुर्रत करता है।
ऐसी घिनौने सोच वाले लोगों के साथ राज्य व केंद्र सरकार को सख्ती से पेश आना ही चाहिए….
बकौल डॉक्टर सुशीला टाकभौरे-
“जानकी अब सच जान गई है
वह धरती में समाना नहीं चाहती
बल्कि आकाश में उड़ना चाहती है…”
डॉ० रामशंकर भारती
3 जून 2025
भाई रामशंकर भारती जी, आपने टिप्पणी करने में समय लिया मगर टिप्पणी में अपना दिल उंडेल दिया। डॉ. सुशीला टाकभौरे की पंक्तियां सच में नारी के मन का दर्पण हैं।
बहुत ही संतुलित और स्पष्ट वक्तव्य है ये संपादकीय। पिछले दिनों इस समाचार ने हालांकि बहुत उछाल नहीं पाया पर फिर भी नज़र अंदाज़ भी नहीं किया जा सका। ऐसे समय में ये संपादकीय आना बहुत ही समझदारी भरा कदम है।
शिवानी, आप निरंतर संपादकीय पढ़ती भी हैं और अपनी प्रतिक्रिया भी देती हैं। युवा पीढ़ी की टिप्पणी सच में बहुत महत्वपूर्ण होती है।
संपादकीय के शीर्षक ने खास तौर पर ध्यान खींचा। स्त्री विमर्श के संदर्भ में विश्व स्तर पर यह एक बड़ी घटना है। अपने पूरे घटनाक्रम को जजमेंटल ना होते हुए ना होते हुए बहुत धैर्य और संतुलन
के साथ लिखा है। तेलंगाना सरकार के सामने भी यह एक बड़ा प्रश्न है। जांच के परिणाम पर भी एक संपादकीय आए इसकी उम्मीद करते हैं। संपादक जी को
साधुवाद
प्रज्ञा, आपने एकदम सही सवाल उठाया है। आमतौर पर देखा गया है कि वक्त के साथ-साथ लोगों की स्मृति से मुद्दे ग़ायब हो जाते हैं और किसी को पता ही नहीं चलता कि जांच का परिणाम क्या रहा। हार्दिक धन्यवाद।
Kuchh व्यक्तिगत कारणों से हमारी प्रिय पुरवाई को आज ही देखने की फुर्सत मिली तो सबसे pehle संपादकीय को ही पढ़ने का लालच नहीं छोड़ पायी … लीक से हटकर पर सटीक लेखन पढ़ने को मिला… निर्विवाद है कि जहां तक पहुंचने के लिए एक मॉडल अपने सारे प्रयास लगा देती हैं वहाँ से ऐसे ही असहज हो कर कोई वापसी कैसे कर सकती हैं ? प्रश्न यह नहीं कि MILLA Miss world चयनित होती या नहीं… ? सवाल तो यही है कि ख्वाबों की तामीर से बस कुछ समय पूर्व ही एक विदेशी मूल की बिंदास युवती में अचानक भारत भूमि पर अपनी अस्मिता और अस्तित्व को लेकर इतना असुरक्षित भाव आ गया कि वो इतनी जल्दी इतनाअप्रत्याशित निर्णय ले गयी…? उसने परवाह नहीं की आयोजकों se वापसी ka किराया तक लेना गवारा नहीं किया और आयोजकों की व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न छोड़ कर चली गई… वास्तव में चिन्तन ही नहीं चिंता का भी विषय बना कि हमारी संस्कृति की तो उदाहरण विश्व भर में दी जाती रहीं हैं.. और हम ही इस गरिमा को सम्भाल सहेज नहीं पा रहे… .. विदेश धरती से हमारी बच्ची इस तरह लौटती तो मुद्दे और होते.. पर … खैर… युद्धों ki विभीषिका के बीच भी संपादक महोदय ने इस नाजुक मुद्दे को समझा, परखा, जांचा और साँझा कर पुनः भारतीय संस्कृति के प्रहरियों को गरिमा रक्षण हेतु चेताया.. साधुवाद आदरणीय…
*शार्लट ग्रान्ट का आना इस प्रश्न का निदान नहीं… MILLA का प्रतियोगिता छोडकर जाना निसंदेह शर्मनाक है*.. संपादक महोदया ने जो बदलने की ताकीद की है… वो नितांत विचारणीय है l
किरण जी, आपने संपादकीय की नब्ज़ को सही पकड़ा है। इस बेहतरीन टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
It’s quite sad to see such outdated mindsets still prevailing, especially on global platforms that are meant to celebrate talent and diversity. A strict investigation must be carried out, and those responsible should be stripped of all designations and privileges. Such behavior should never be tolerated.