Tuesday, July 16, 2024
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संपादकीय – विधान सभा भवन भोजपुरी सिनेमा नहीं!

सवाल यह उठता है कि कल तक यही नीतीश कुमार इंडी गठबंधन के माध्यम से भारत का प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे थे। मगर इनके बीते दिनों के व्यवहार ने इनकी मानसिक स्थिति पर ढेरों सवाल खड़े कर दिये हैं। राहुल गांधी शायद चुपके-चुपके मुस्कुरा रहे होंगे। उन्हें यह तो साफ़ महसूस हो रहा होगा कि उनके प्रधानमंत्री पद की रेस में से एक प्रतिद्वंदी बाहर हो गया है। मगर यह भी सच है कि ज़िम्मेदार पदों पर आसीन व्यक्तियों का अपने व्यवहार पर नियंत्रण रखना बहुत आवश्यक है।

हिन्दी सिनेमा में नायिका का पानी में नहाना और उसके प्रेमी का उसे देख कर गीत गाना एक बहुत आम सी बात है। मगर ध्यान देने लायक बात यह है कि उसी नायिका को देख कर शैलेन्द्र फ़िल्म ‘संगम’ में लिखते हैं, “मेरे मन की गंगा, और तेरे मन की जमुना का, बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं।” और उसी स्थिति में फ़िल्म ‘तीन चोर’ के लिये राजेन्द्र कृष्ण लिखते हैं, “नदिया के पानी में, हाय रे हाय / नदिया के पानी में / जवानी देखो आग लगाती है / बदन मल-मल के नहाती है।”
यानी कि बात कहने का सलीक़ा बहुत महत्वपूर्ण है। क्लास में पढ़ाई जाने वाली मानव शरीर की संरचना और ब्लू फ़िल्म का वीडियो चाहे एक ही विषय के बारे में चर्चा कर रहे हों, उनका उद्देश्य भिन्न होता है। पहले का उद्देश्य शिक्षा प्रदान करना है तो दूसरे का उद्देश्य मज़ा लेना है।
भोजपुरी फ़िल्में तो अश्लीलता के लिये बदनाम हैं। यही बिहार की भाषा भी है। मगर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बोलते हुए इस बात का ख़ास ख़्याल रखना होगा कि वे भोजपुरी सिनेमा में द्विअर्थी संवाद नहीं बोल रहे हैं; बल्कि वे प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर विधानसभा और विधानसभा में निर्वाचित सदस्यों के बीच गंभीर मुद्दे पर अपनी बात रख रहे हैं।
पत्रकार अविनाश राय ने एबीपी की वैबसाइट पर लिखा है, “जिस बिहार के भोजपुरी गानों के बोल में ‘गमछा बिछाकर’ सब कुछ मांग लिया जाता है, एसी से लेकर कूलर तक को लहंगा और चोली में लगा दिया जाता है, जहां सब कुछ ‘फटाफट खोलकर’ दिखाने की मांग की जाती है,  लहंगे को उठाने के लिए रिमोट तक का ईजाद कर लिया गया है, खाली चुम्मा से काम नहीं चलता है, वहां पर सेक्स एजुकेशन जैसे जटिल विषय और खास तौर से उसमें भी पुल आउट मेथड जैसे विषय को समझाने के लिए नीतीश कुमार ने सीधे सरल शब्दों का सहारा ले लिया तो उसमें इतनी हाय तौबा क्यों।”
भाई अविनाश राय वही भूल कर रहे हैं जिसकी ओर मैंने ऊपर इशारा किया है। नीतीश कुमार किसी घटिया भोजपुरी फ़िल्म में अभिनय नहीं कर रहे थे। वे विधान सभा जैसे प्रतिष्ठित स्थल में अपनी बात रख रहे थे जहां असंसदीय शब्दों का प्रयोग वर्जित है। यहां तो नीतीश कुमार हंसते-मुस्कुराते और मज़ा लेते अपने हाथों से अश्लील मुद्राएं बना कर विधान सभा के अध्यक्ष, सदस्यों और पत्रकारों को निगाहें मटका-मटका कर, मज़े ले-लेकर और हाथों से संभोग-क्रिया प्रदर्शित करते हुए अंतिम पलों में बाहर निकाल लेने की प्रक्रिया समझा रहे थे। मुझे याद नहीं पड़ता कि इससे पहले कभी किसी भी मुख्यमंत्री ने इतने भोंडे तरीके से सेक्स पर विधान सभा अथवा विधान परिषद में अपनी बात रखी हो।
वैसे नीतीश कुमार कोई बहुत बूढ़े भी नहीं हैं। वे केवल 72 वर्ष के हैं। मगर उनका व्यवहार पिछले कुछ समय से सठियाया हुआ सा महसूस होने लगा है। वे मतिभ्रम का शिकार होते दिखाई देते हैं। मैंने उन्हें विधान सभा में भाषण देते हुए सुना और देखा। वे बार-बार अपने पेट पर दोनों हाथ ऊपर से नीचे फिराते हैं जैसे कि आत्मविश्वास की बहुत कमी हो।
हम यह भी नहीं कह सकते कि नीतीश कुमार जी की ज़बान फिसल गई थी या उनसे ग़लती हो गई थी क्योंकि उन्होंने जो शब्द विधान सभा में बेहूदगी से इस्तेमाल किये, वही शब्द विधान परिषद में उसी तरह आंखें मटका-मटका कर मुंह में पानी भर-भर कर इस्तेमाल किये। ध्यान देने लायक बात यह है कि नीतीश कुमार ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की हुई है। यदि उन्होंने विश्वविद्यालय में डॉक्टरी की पढ़ाई की होती तो शायद उन्हें विधान सभा में सेक्सॉलॉजी का लेक्चर देने की छूट मिल सकती थी।
ज़ाहिर है कि नीतीश कुमार की इस बेजा हरकत पर पूरे देश में हो हल्ला तो मचना ही था। उनके इंडी अलाएंस में तो भयानक चुप्पी छा गई। सत्तारूढ़ दल पर बंदूक साधे नेताओं को जैसे अचानक साँप सूंघ गया हो। उन्होंने कान पर मोटे-मोटे हेडफ़ोन लगा लिये थे ताकि उन्हें नीतीश कुमार की आवाज़ सुनाई ही न दे। और नीतीश के समर्थन में ऐसी कमज़ोर दलीलें सुनने को मिल रही थीं कि उन पर टिप्पणी करते हुए भी अजीब-सा महसूस होता है।
नीतीश के उप-कप्तान तेजस्वी यादव ने तो अपने सेक्स टीचर का बचाव किया ही किया क्योंकि उसे गठबंधन सरकार को बचाना है; तेजस्वी की माताश्री और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री रबड़ी देवी ने भी नीतीश कुमार का बचाव करते हुए कहा, “गलती से उनके मुंह से निकल गया. उन्होंने इस बयान के लिए सदन में माफी मांगी है. विपक्ष को सदन चलने देना चाहिए।”
कांग्रेसी नेता अधीर रंजन चौधरी ने तो एक तरह से पूरे बिहारी समाज को लपेटे में ले लिया। उनका मानना है कि बिहारी जब इकट्ठे बैठते हैं तो हंसी मज़ाक में बहुत कुछ कह लेते हैं। ज़रूरी नहीं कि हमें उनकी बात समझ में आए। मुख्यमंत्री ने भी मज़ाक में कुछ कह दिया होगा।
ज़ाहिर है कि भारतीय जनता पार्टी भला ऐसे सुनहरे अवसर को क्यों हाथ से जाने देती। बीजेपी की महिला विधायक भागीरथी देवी ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि हम लोगों ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने का काम किया था लेकिन उन्होंने अब सदन में गंदा काम किया है। भागीरथी देवी ने आगे कहा कि मुख्यमंत्री जी का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है उन्हें इलाज की जरूरत है। भागीरथी देवी ने कहा कि नीतीश कुमार भाषण तब ही देते हैं जब वह गांजा पीते हैं।
प्रशांत किशोर ने कहा कि आप कल की बात मत कीजिए, कई महीनों से नीतीश कुमार बोलना कुछ चाहते हैं, बोल कुछ जाते हैं। जो उन्होंने फर्टिलिटी पर बात कही है, स्वतंत्र भारत के इतिहास में कोई सिटिंग मुख्यमंत्री इस तरह की भाषा और इस तरह के उदाहरण का प्रयोग विधानसभा के पटल पर करे ऐसा आज तक कोई उदाहरण नहीं दिखता। उन्होंने आगे कहा कि ऐसे बयान दिखाते हैं कि नीतीश कुमार की मनोस्थिति और मनोदशा क्या है। नीतीश कुमार को या तो समझ नहीं है या वो डेल्यूजनल हो गए हैं।
नीतीश कुमार ने जब देखा कि पानी सिर से ऊपर चढ़ता जा रहा है तो उन्होंने विधान सभा में माफ़ी मांग ली। माफ़ी मांगते हुए भी वे किसी गली मुहल्ले में लड़ने वाले व्यक्ति की तरह अपने को कोस रहे थे। माफ़ी मांगने में भी गंभीरता नहीं दिखाई दे रही थी।
सदन में नीतीश के विवादित बयान के बाद बीजेपी की महिला विधान पार्षद निवेदिता सिंह फूट-फूट कर रोने लगीं। उन्होंने सदन के बाहर मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि नीतीश कुमार ने आज सदन में जिस तरह का बयान दिया है, उससे महिलाएं शर्मसार हुई हैं। मैं सदन में उनका प्रवचन सुनने की हिम्मत नहीं जुटा पाई और बाहर आ गई। नीतीश कुमार के बयान ने बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश की महिलाओं को शर्मसार किया है।
वहीं मुलायम सिंह की बहू और भाजपा नेता अपर्णा यादव ने कहा कि विधानसभा देश का बहुत गौरवान्वित और प्रतिष्ठित भवन है… बिहार के लोग बड़ी सुलझी मानसिकता के होते हैं। वहां के मुख्यमंत्री द्वारा इस तरह की बात करना शर्मनाक है… इस प्रकार के लोगों को विधानसभा में होना ही नहीं चाहिए।
अभी विवादग्रस्त टिप्पणी का शोर थमा भी नहीं था कि अगले ही दिन नीतीश कुमार ने विधान सभा में वरिष्ठतम सदस्य जीतनराम माँझी के साथ तू-तड़ाक वाली बातचीत कर दी। टीवी समाचार में साफ़ दिखाया गया कि 80 वर्षीय जीतनराम माँझी बहुत सलीक़े से माननीय मुख्यमंत्री कह कर अपनी बात सदन में कह रहे थे। मगर न जाने क्यों नीतीश कुमार भड़क गये।
उन्होंने कहा कि यह मेरी गलती थी कि मैंने इस व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना दिया था। दो महीने में ही मेरी पार्टी के लोग कहने लगे कि कुछ गड़बड़ है इन्हें हटाओ। उसके बाद मैं फिर सी.एम. बन गया। वे (जीतन राम मांझी) कहते रहते हैं कि वह भी मुख्यमंत्री थे। वह मेरी मूर्खता के कारण मुख्यमंत्री बने थे।
नीतीश के आपा खोने के बाद उनके पास बैठे उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने उन्हें रोकने की कोशिश की। नीतीश इतने गुस्से में थे कि उन्होंने तेजस्वी के निवेदन को दरकिनार कर जीतनराम माँझी के लिए तू-तड़ाक की भाषा का इस्तेमाल किया।
माँझी ने सदन से बाहर आकर नीतीश कुमार के व्यवहार पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि मैं नीतीश कुमार से उम्र में चार साल बड़ा हूं। ये ही नहीं मैं 1980 में विधायक बना था। नीतीश कुमार 1985 में विधायक बने थे। मैं उम्र और राजनीति दोनों में ही उनका सीनियर हूं। वो अपनी मर्यादा को लांघ रहे हैं। वह कह रहे हैं कि मैं गवर्नर बनना चाहता हूं, यह बिल्कुल गलत है। मैं दलित हूं इसलिए नीतीश कुमार ने मेरे लिए तू तड़ाक की भाषा का उपयोग किया।
वे यहां तक कह गये कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को खाने में विषैला पदार्थ इसलिए दिया जा रहा है कि वे जल्दी से जल्दी नाकाबिल साबित हो जाएं। माँझी ने कहा कि उन्हें गद्दी से हटाकर तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बनने की जल्दबाजी में हैं, इसलिए उनकी पार्टी से बने विधानसभा अध्यक्ष भी आँख बंद कर गलत बातें होने दे रहे हैं। अंतिम उद्देश्य मुख्यमंत्री की छवि खराब करना ही है।
सवाल यह उठता है कि कल तक यही इंसान इंडी गठबंधन के माध्यम से भारत का प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहा था। मगर इनके पिछले दो दिनों के व्यवहार ने इनकी मानसिक स्थिति पर ढेरों सवाल खड़े कर दिये हैं। राहुल गांधी शायद चुपके-चुपके मुस्कुरा रहे होंगे। उन्हें यह तो साफ़ महसूस हो रहा होगा कि उनके प्रधानमंत्री पद की रेस में से एक प्रतिद्वंदी बाहर हो गया है। मगर यह भी सच है कि ज़िम्मेदार पदों पर आसीन व्यक्तियों का अपने व्यवहार पर नियंत्रण रखना बहुत आवश्यक है।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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25 टिप्पणी

  1. प्रकाश पर्व दीपावली की शुभकामनायें। बिहार के मुख्यमंत्री की अभद्रता को भद्रता से प्रस्तुत करने के लिए हार्दिक आभार। हृदय पीड़ित हुआ एक बार फिर महिलाओें को ही नहीं देश की गरिमा को शर्मसार करने वाला बयान पढ़ कर। इस तरह के बयान गै़रज़िम्मेदाराना पहले भी आये हैं।
    वास्तव में लगता है कि नीतीश कुमार सहित विपक्षी गठबन्धन अपना मानसिक संतुलन खो बैठा है। सदिच्छा ही की जा सकती है कि ऐसे व्यक्तियों को ईश्वर सद्बुद्धि दे।

  2. भोजपुरी भाषा बहुत शालीन भाषा है , भोजपुर में भी दो खण्ड हैं एक में लंठई वाली भाषा अवश्य है जहां घर मे भी उटपटांग शब्द बोले जाते रहे हैं नीतीश कुमार उसी क्षेत्र से हैं अतः उनकी भाषा मे ऐसे शब्द मिलते हैं , कोई व्यक्ति 90 की उम्र तक भी संयमित होता है कोई 70 पर अपना संतुलन खो बैठता है। आप और मैं भी 72 के घेरे में हैं आप कितने संयमित हैं जग जाहिर है परंतु नीतीश कुमार पिछले 3 वर्षों से अपने क्रोध और वाणी का संयम खो चुके हैं।। 3 वर्ष पूर्व बीजेपी के साथ थे तो ऐसी ही अभद्र भाषा मे विधान सभा मे ही तेजस्वी को डांट लगाई थी। भोजपुरी भाषा मे भिखारी ठाकुर भी हुए हैं जिनके गीत सिनेमा जगत में 60 के दशक में भोजपुरी भाषा को नायि ऊंचाई पर ले गए थे, गंगा मैया तोहे पिहरी चढ़इबो इत्यादि। अतः भाषा का दोष नही दोष समय का है ह्रास तो हिंदी में भी हुआ है। इसका अर्थ यह नहीं कि हम घर मे बेटे बेटियों के सामने खुले आम नग्न सेक्स क्रिया का वर्णन करें। निशित के भाषण का वीडियो उनसेंसेरेड देख हसि देखते हुए भी शर्म आ गयी मानो कोई चोरी से पोर्न देखते पकड़ा गया ह्यो। जितनी भर्त्सना करें कम है। भारत को खास कर बिहार वालों को सोचना होगा।

    • सुरेश भाई आपने नीतीश कुमार की भाषा और भोजपुरी पर सार्थक टिप्पणी की है। हार्दिक आभार।

  3. सिर्फ एक वक्तव्य ने सुशासन कुमार की सारी छवि को नष्ट कर दिया है भले ही देर न करते हुए उन्होंने इस वक्तव्य के लिए माफ़ी भी मांग ली है, लेकिन कहते है बद से बदनाम बुरा। बस यही सब नीतीश कुमार के साथ हो गया है।
    आपने बहुत सुंदर विचेचना के साथ तर्क सम्मत रूप से अपनी बात रखी है। मुझे लगता है, आपका यह संपादकीय निःसन्देह इस मुद्दे पर आए बहुत से संपादकियों से सुंदर और सटीक बना है।
    हार्दिक बधाई, दीवाली पर्व की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ तेजेन्द्र सर।

    • विरेंदर भाई, एक व्यक्ति ५० वर्ष तक एक साधु जैसा जीवन बिताता है, फिर एक दिन किसी की हत्या कर देता है, तो उसे भी सज़ा हत्या की मिलेगी ही। उसके ५० वर्षों पर कोई विचार नहीं किया जाएगा।

  4. “,जाको हरि दारुण दुख देहीं
    ताकी मति पहले हर लेहीं ”
    कुछ ऐसा ही लग रहा है ,आगे हरि इक्षा
    दीपावली पर्व मंगलमय हो
    Dr Praha mishra

  5. आदरणीय संपादक महोदय
    आपके संपादकीय में नीतीश जी के जिस विचारणीय वक्तव्य पर कहा गया है उसके लिए ‘अभद्र’ और ‘अश्लील’ जैसे शब्द भी छोटे पड़ गए हैं। मेरे विचार से जो कुछ भी विधान सभा और विधान परिषद में कहा गया,वह केवल स्त्रियों के लिए नहीं बल्कि समान रूप से पुरुषों के लिए भी लज्जा जनक है, कहते हैं ना कि ऐसी बातों को सुनने के बाद इच्छा होती है कि हम अपने ‘कान धो ‘डालें!
    इसमें भाषा का कोई दोष नहीं है, भाषा के शब्द हर भाव के लिए होते हैं और होने भी चाहिए, परंतु आवश्यक से आवश्यक और अश्लील से अश्लील बातों को भी सभ्य समाज में कहने का एक संस्कृत तरीका होता है और वह हमको अपने संस्कारों से मिलता है।
    नीतीश जी ने तो क्षमा याचना भी झुंझलाते हुए ही की है ना कि ग्लानिऔर लज्जा के साथ।

    ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे कि वह अपनी जिह्वा पर नियंत्रण रख सके और साथ ही हृदय में पवित्रता भी।

    सरोजिनी

    • सरोजिनी जी, आपने सही फ़रमाया है। बात करने का ढंग हर इन्सान को आना चाहिए। हार्दिक आभार।

  6. प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई एक और बधाई और शाबाशी के साथ बधाई और वह बधाई अध्ययन अंक के संपादकीय लिखने वाले हरदिल अजीज़ कहानीकार और पत्रकार को।
    ये संपादकीय आने वाले वर्षों में पत्रकारिता के विद्यार्थियों और संस्थाओं के लिए नजीर होगा कि मुद्दे को समझ कर पूरी शालीनता से सुसभ्यता और संस्कार के साथ किस प्रकार से अपनी बात को बेहद सजगता और निडरता से बिना लाग लपेट के कहा जाए।
    यह संपादकीय महिला शक्ति और बिहार में उसके प्रति क्या मानसिकता है को साक्ष्य सहित लिखा गया है।इस में एक अनुभवी कहानीकार और साहित्यकार की कलम की ताकत दिखाती है जो इस निंदनीय वक्तव्य में मनोवैज्ञानिक पक्ष को भी देख कर टिप्पणी करती है।
    पुनः बधाई इस समीचीन परंतु ज्वलंत मुद्दे को इतने गरिमापूर्ण अंदाज़ ए बंया से उकेरने के लिए।

  7. तेजेन्द्र ने अपने ठीक लिखा है कि नीतीश जी की भाषा और हाव-भाव दोनों ही अश्लील और घटिया स्तर के थे।ऊपर से वे जिस आत्ममुग्धता के साथ मुस्कुराते भी जा रहे थे, वह यह बताने के लिए काफी है कि वे विषय के प्रति कितने अगंभीर थे। उनका वीडियो देखने के बाद मुझे आत्मग्लानि सी होने लगी कि मैं किस आदमी को देख-सुन रहा हूं। बिहार में तो वे मुख्यमंत्री हैं लेकिन यदि एक दिन के लिए भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे तो वह देश की राजनीति का सबसे ख़राब दिन होगा! ईश्वर न करे ऐसा दिन कभी देखना पड़े।

  8. हमेशा की तरह बहुत उम्दा लिखा है।
    नीतीश कुमार ने विधानसभा की गरिमा को ठेस पहुंचाई है।
    अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए था।
    कुछ बातें ऐसी होती है जो बंद कमरे में ही की जाए तो अच्छी लगती हैं सभी के सामने करना और ऐसी भाषा का प्रयोग करना निंदनीय है।
    पुनः आपको ढेर सारी शुभकामनाएं।

  9. शब्द सम्हारे बोलिये, शब्द के हाथ न पाँव।
    एक शब्द औषधि करे, एक शब्द करे घाव।
    उम्दा लेख,जब वेल एजुकेटेड लोग भी मर्यादित भाषा का प्रयोग करें वह भी विधानसभा और राज्य सभा में तो वास्तव में बहुत शर्मिंदगी की बात है इनकी भाषा से मुझे हमेशा यही लगता था कि यह अशिक्षित इंसान है। आपने बिल्कुल सही कहा अगर डॉक्टर की पढ़ाई की होती तो पता नहीं क्या होता।

    • अंजु आपकी टिप्पणी कम शब्दों में पूरी बात कह देती है। सुशासन बाबू को सही समझा है आपने।

  10. नीतीश कुमार की इस टिप्पणी ने शालीनता की हदें पार कर दी हैं। यह स्त्री ही नहीं , पूरे सदन और पूरे,भारत का अपमान है।
    इन्हें ‘ सुशासन बाबू ‘ किसने कह दिया ?उनकी बॉडी लैंगवेज़ भी शर्मनाक है।
    बिहारी फ़िल्में अश्लील होती हैं।
    दो तर की विचित्र मानसिकता है बिहार में।
    आईएएस बहुत निकलते हैं। वहीं दूसरी तरफ राजनीति के साईलैंट वोटर हैं।
    जनसंख्या नियंत्रण की बात को सहजता से कहा जा सकता है।
    उनकी मनःस्थिति के बारे में कुछ अवांछित बातें भी सामने आ रही हैं।
    जो भी प्रकरण है , असंसदीय है। यह निंदनीय है।
    आपने सम्पादकीय में पारदर्शिता बरती है।
    यह ख़ुद के पाँवों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा हुआ।
    ‘इंडी ‘ के कुछ लोगों की लीपापोती से कुछ नहीं होने वाला।तीर कमान से निकल चुका है।क्षमा माँग लेने से पाप नहीं धुलेंगे। यह अक्षम्य है।
    संपादकीय में बेबाकी की मैं प्रशंसक हूँ।

    • मीरा आपने संपादकीय में वर्णित सभी स्थितियों को बारीक़ी से पकड़ा है। इस सार्गर्भित टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार।

  11. आदरणीय तेजेंन्द्र जी!
    सोचा तो यह था कि इस संपादकीय पर कुछ भी….. कुछ भी ……नहीं लिखेंगे क्योंकि पूरा पढ़ने की ताकत ही नहीं जुटा पाए। फिर अशांत मन और आक्रोश चित्त से कुछ भी लिखा जाना उचित नहीं होता इसलिए भी लिखने का मूड नहीं बना, लेकिन लगा कि लिखना तो होगा ही।लगा…. कि लिखना तो बनता है। जब कोई सामान्य व्यक्ति इस तरह की बातें करता है तो हंगामा तो तब भी हो सकता है पर इतना ज्यादा नहीं।
    लेकिन जब कोई व्यक्ति प्रतिष्ठित पद पर बैठकर जनता का प्रतिनिधि होकर इस तरह से अश्लील भाषा का प्रयोग करता है, वह भी हाव -भाव और संकेतों के साथ ……तो यह हंगामे से कहीं बहुत ऊपर की बात होती है। ऐसे लोगों के लिये तो माफी का प्रावधान भी नहीं होना चाहिये।
    चुनाव प्रचार के इस दौर में आरोप- प्रत्यारोप व आक्षेपों की बारीश में, प्रतिष्ठित और वरिष्ठ नेताओं के द्वारा जिस तरह से शब्दों की अवमानना हुई है उससे तो शब्द संसार स्वयं ही लज्जित है।
    एक वक्त था जब राजनीति में सिर्फ वैचारिक मतभेद हुआ करते थे। कोई व्यक्तिगत या पारिवारिक स्तर तक जाने की बात सोचता भी नहीं था। नैतिक स्तर पर सब एक दूसरे का सम्मान करते थे पर आज राजनीति इतनी भ्रष्ट हो गई है ,स्तर इतना अधिक गिर गया है कि शर्म आती है यह कहते हुए कि ये हमारे नेता है और ऐसे लोगों के हाथों में हमारे देश का भविष्य है।
    इस बार के संपादकीय ने ऐसी घटना से रूबरू कराया है जिस पर उस व्यक्ति के लिये कुछ कहने को उस स्तर के कोई शब्द कम से कम हमारे शब्दकोश में तो नहीं है।
    जनता का जागरूक होना बहुत ज्यादा जरूरी है। सिर्फ जनता ही वह न्यायाधीश है जो ऐसे लोगों को माकूल सजा दे सकती है।
    जब बड़ी-बड़ी नौकरियों के लिए जी जान से युवा वर्ग पढ़ाई करता हैं ।बड़े-बड़े कॉम्पिटीशन में भाग लेना होता है तो क्या देश को चलाना एक जिम्मेदारी से भरा हुआ दायित्व नहीं है? इसके लिए कोई निश्चित शैक्षिक योग्यता क्यों नहीं होना चाहिये?वे सारे नियम जो एक नौकरी करने वाले पर लागू होते हैं वह इन पर क्यों नहीं? क्यों नहीं उनके लिए चरित्र प्रमाण- पत्र जरूरी है?
    क्यों उनके लिये पुलिस वेरिफिकेशन जरूरी नहीं है?
    नेताओं को देशभक्ति व सेवा भाव से कोई लेना- देना नहीं होता है। सिर्फ पैसा कमाना और मौज करने के अलावा नेतागिरी का कोई उद्देश्य नहीं है। दिखाने के लिए थोड़ा बहुत जो कुछ कर दिया वह कर दिया वह भी सिर्फ अपने वालों के लिये। सच में बेहद तकलीफ होती है यह सब देखकर ऐसा लग रहा है कि जनता की मानसिकता को किस तरह बदला जाए।
    हम तो संपादकीय को ही पूरा नहीं पढ़ पाए। पढ़ने में ही क्रोध व शर्मिंदगी महसूस हो रही थी क्या यह वही भारत है जिसके गुणगान हम सब हमेशा गाया किये? यह पतन का दौर चल रहा है। होड़ लगी है नेताओं में कि कौन कितना नीचे गिर सकता है! किस स्तर तक गिर सकता है!!? चारित्रिक दृष्टि से, नैतिक दृष्टि से, कर्मों की दृष्टि से। ऐसा लग रहा है जैसे हम सब एक अंधे युग में जी रहे हैं। सब दृष्टिहीन भी हैं। दशाहीन भी और दिशाहीन भी।
    हमें उसे पिक्चर की याद आ रही है जो अभी कुछ समय पहले ही हमने देखी थी मनोज बाजपेई अभिनीत *एक बंदा काफी है* जिसमें एक भ्रष्ट संत के खिलाफ केस लड़ते हुए वे कहते हैं कि,”मैं रावण को माफ कर देता अगर रावण ने रावण बनकर सीता का अपहरण किया होता, लेकिन उसने साधु का वेश धारण किया हुआ था, जिसका प्रभाव पूरे संसार के साधुत्व और सनातन पर सदियों तक रहेगा जिसकी कोई माफी नहीं।’
    नितीश कुमार सहित ऐसे जितने भी नेता हैं और उनके जितने भी समर्थक हैं, वे सब राजनीति के क्षेत्र में एक काले धब्बे की तरह है।यह बात उन पर भी लागू होती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ अभिव्यक्ति की स्वच्छंदता नहीं होती है, यह बात नेताओं को समझना चाहिए और जनता को भी जागरूक होते हुए ऐसे नेताओं का बहिष्कार करना होगा।
    काश!काश!!!कि जनता जाग जाए; पर कब जागेगी क्या पता?
    अब आपको तो क्या ही कहें तेजेन्द्र जी !हर बार आपका संपादकीय जिस तरह से विस्फोट करता है , वह काबिलेतारीफ है।

    • आदरणीय नीलिमा जी, आपकी विस्तृत टिप्पणी से मुझे और पुरवाई के पाठकों को संपादकीय समझने में ख़ासी मदद मिली। हार्दिक आभार।

  12. सारा दोष जनता का है। गन्दगी पसंद की जाती है तो परोसी जा रही है। कहना तो नहीं चाहिए पर भोजपुरी फिल्मों के संवाद एवं गीतों ने इतनी गंदगी पहले ही कर रखी है कि नाले में पड़े सूअर की तरह कुशासन बाबू को लगा होगा कि वे तो OMG -2 के पंकज त्रिपाठी हैं। और जनता उनके डायलॉग्स सुनकर तालियाँ बजायेगी।

    कुएँ में ही भांग पड़ी है। कौन किसको समझाये।

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