पुरवाई पत्रिका का संपादक होने के नाते जिस एक स्थिति ने मेरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया वह थी, कि – जैसे ही भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने हिंदी में बोलना शुरू किया, सभी डीएमके सांसद चिल्लाने लगे और उनसे अंग्रेज़ी में बोलने के लिए कहने लगे।मगर जब प्रियंका वाड्रा हिंदी में बोलीं, तो वे ही सांसद चुप थे, विरोध का एक शब्द भी नहीं बोले। यानि कि भाजपा नेता की हिंदी सांप्रदायिक है, और प्रियंका वाड्रा की हिंदी सेक्युलर है! निशिकांत दुबे ने सही जवाब दिया –बेहतर होता अगर आप मुझे किसी विदेशी भाषा के बजाय तमिल में बोलने के लिए कहते। सवाल यह है कि यदि एक भारतीय नेता भारत की संसद में हिंदी में अपना वक्तव्य नहीं दे सकता, तो क्या ब्रिटेन और अमेरिका की संसद में देगा?
भारतीय संसद ने फ़ैसला लिया कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान पर किए गए ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा की जाए। विपक्ष ख़ासा दबाव बना रहा था, कि इस मुद्दे पर संसद में प्रधानमंत्री विपक्ष के सवालों का जवाब दें। वैसे समय-समय पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर, और गृह मंत्री अमित शाह इन तमाम सवालों के जवाब देते रहे हैं। भारतीय सेना के अधिकारी भी प्रेस काँफ़्रेंस के ज़रिए सवालों के जवाब देते रहे हैं।
सत्र से पहले ही काँग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृह मंत्री चिदंबरम ने एक विवादित बयान देकर माहौल में गर्मी पैदा कर दी। चिदंबरम ने एक इंटरव्यू में पहलगाम आतंकी हमले को लेकर सवाल उठाए, कि क्या हमले में शामिल आतंकी वाकई पाकिस्तान से आए थे? क्या इस बात के सबूत हैं? उन्होंने यह भी कहा कि हमले में घरेलू आतंकी भी हो सकते हैं। सरकार यह साफ नहीं कर रही, कि नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) ने हमले के बाद क्या काम किया है।
नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी के सिपहसालार गौरव गोगोई ने तो सरकार से संसद में ऐसा सवाल पूछ डाला कि सबके चेहरे पर मुस्कान बरबस आ गई। उनका सवाल था कि भारतीय सेना पाकिस्तानी ठिकानों पर दूर से क्यों हमला कर रही थी। नज़दीक जाकर क्यों नहीं लड़ाई की। गौरव गोगोई को शायद नहीं मालूम कि यह लंबी दूरी की मिसाइलों का ज़माना है। यह कुश्ती नहीं है, जिसमें पहलवान का लंगोट खींच कर गिराना है।
विपक्ष के उपनेता गौरव गोगोई ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर को लेकर सरकार कह रही है, हमारा मकसद युद्ध का नहीं था। हम पूछ रहे हैं- क्यों नहीं था? मकसद युद्ध का होना चाहिए था। सरकार कह रही है – हमारा मकसद पीओके लेना नहीं था। हम पूछ रहे हैं- क्यों नहीं था? होना चाहिए था। पीओके अगर आज नहीं लेंगे, तो कब लेंगे?
गोगोई ने आगे कहा, ‘हम तो युद्ध के लिए तैयार थे, लेकिन ये सीज़फायर क्यों हुआ, किसके आगे आप झुके मोदी जी, ये देश को बताना होगा। ट्रंप ने 26 बार कहा कि मैंने मध्यस्थता की, वे कहते हैं कि 5-6 जेट इस ऑपरेशन के दौरान गिरें, मैं सरकार से पूछना चाहता हूँ कि कितने जेट गिरे?’ उन्होंने कहा कि पूरा देश और विपक्षप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ था, लेकिन 10 मई की शाम सीजफायर की सूचना आती है। गोगोई ने मोदी से सवाल पूछा, ‘ये सीजफायर क्यों हुआ?, जबकि पाकिस्तान घुटने टेकने को तैयार था, तो आप क्यों रुके? आप किसके सामने झुके, किसके सामने सरेंडर किया?’
कांग्रेस सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने तो बेवक़ूफ़ी की सारी हदें लांघते हुए लोकसभा में कहा, “…आपको भी रास्ता चुनना होगा… या तो आंख दिखाओ या हाथ मिलाओ… या तो बातचीत करके अमेरिका से संबंध सुधारो और डॉनल्ड को चुप कराओ। डॉनल्ड का मुंह बंद कराओ… नहीं तो हिंदुस्तान में मैकडॉनल्ड्स बंद कराओ… नहीं तो अमेरिका को दोनों घोड़ों पर चढ़ने का अधिकार नहीं है।”
नेता विपक्ष राहुल गाँधी तो लगातार यह कहते रहे हैं कि ट्रंप का फ़ोन आया “नरेन्दर सरेंडर!” और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरेंडर कर दिया। सरकार, भारत-पाकिस्तान संघर्ष में चीन की भूमिका पर बात करने से बचती रही है… कभी साफ तौर पर नहीं कहा कि ट्रंप झूठ बोल रहे हैं… अपने पूरे भाषण में प्रधानमंत्री ने एक बार भी चीन का जिक्र नहीं किया… पूरा देश जानता है कि चीन ने पाकिस्तान की हर तरह से मदद की, लेकिन प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री ने कहीं भी चीन का नाम नहीं लिया।
राहुल गाँधी ने अपना भाषण अंग्रेज़ी में दिया, तो प्रियंका गांधी ने अपनी बात हिंदी में कही। राहुल गाँधी ने अंतरराष्ट्रीय बातों पर ध्यान केंद्रित किया, तो प्रियंका घरेलू मुद्दों पर अपनी बात रखती रहीं। उन्होंने पहलगाम में मारे जाने वाले लोगों को भारतीय कहा और लगभग हर मृतक का नाम पढ़ा। सत्ता पक्ष शोर मचा कर उन्हें याद दिलाता रहा, कि मरने वाले सभी हिंदू थे। और पाकिस्तानी आतंकवादियों ने धर्म पूछ-पूछ कर हिंदुओं को मौत के घाट उतारा।
कांग्रेस पार्टी ने अपने वरिष्ठ सांसदों शशि थरूर एवं मनीष तिवारी को बहस में हिस्सा लेने से रोक दिया था। वे मौन व्रत धारण किए रहें। मगर मनीष तिवारी ने X-पर ट्वीट करते हुए लिखा –“है प्रीत जहाँ की रीत सदा / मैं गीत वहाँ के गाता हूँ / भारत का रहने वाला हूँ/ भारत की बातसुनाता हूँ।” अपनी बात इशारों-इशारों में कह गए मनीष तिवारी।
संयोग देखिए कि जिस दिन संसद में सिंदूर पर बहस होनी थी, उसी दिन भारतीय सेना ने तीन पाकिस्तानी आतंकवादियों को ढेर कर दिया – नाम दिया ऑपरेशन महादेव! समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव को एक और मुद्दा मिल गया। उनका सवाल था कि नरेंद्र मोदी सरकार आतंकवादियों का इस्तेमाल राजनीति के लिए क्यों करती है?… विपक्ष ने ऑपरेशन का नाम महादेव होने पर भी आपत्ति जताई ।
भारतीय विपक्षी दलों की एक समस्या है कि वे सरकार की आलोचना करते-करते कब सेना की आलोचना शुरू कर देते हैं, इसका आभास उनको भी नहीं होता। वे एक मूल बात नहीं समझते, कि भारत की सेना संगठित व् अनुशासित सेना है। पाकिस्तान की सेना की तरह निरंकुश नहीं है। यदि 1971 में भारतीय सेना ने कुछ कारनामा कर दिखाया, तो वह भी राजनीतिक नेतृत्व के अनुसार था। यदि 1962 में भारतीय सेना हारी, तो उसका कारण भी राजनीतिक नेतृत्व था। क्योंकि उस नेतृत्व ने कभी सेना को हथियारों से लैस ही नहीं किया।
टी.एम.सी. के नेता कल्याण बनर्जी ने क्रिकेट के खेल का उदाहरण देते हुए व्यंग्य किया, “ कभी सुना है क्रिकेट में कोई प्लेयर 90 रन बनाकर खेल रहा है, तो कोई बोलेगा कि हम पारी ख़त्म करते हैं। ऐसा केवल मोदी जी कर सकते हैं और कोई नहीं। मोदी जी आप कृपा करके क्रिकेट के मैच में मत घुसिएगा। 140 करोड़ लोग कह रहे हैं कि युद्ध कीजिए और आपने अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप से कह दिया कि आप युद्ध बंद कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री जी, आपने एक बार भीX-हैंडल पर क्यों नहीं लिखा कि, “नहीं, ट्रंप गलत हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति महोदय आपने जो कहा है, वह ग़लत है। आप ऐसा करने की हिम्मत नहीं दिखा पाए… आप अमेरिकी राष्ट्रपति से इतना घबराते क्यों हैं? इतिहास आपको कभी माफ़ नहीं करेगा।”
लोकसभा में ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद प्रणीति शिंदे ने कहा, ऑपरेशन सिंदूर कुछ और नहीं, बल्कि मीडिया में सरकार का एक तमाशा था | प्रणीति ने कहा, कोई हमें यह नहीं बता रहा, कि इस ऑपरेशन में क्या हासिल हुआ… कितने आतंकवादी पकड़े गए? हमने कितने लड़ाकू विमान खो दिए? कौन ज़िम्मेदार है और यह किसकी गलती है, इसका जवाब सरकार को देना चाहिए।
ए.आई.एम.आई.एम. के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने सबको हैरान करते हुए कहा है कि पाकिस्तानी डीप स्टेट को ऐसी सख्त सीख दी जानी चाहिए, कि फिर कभी दूसरा पहलगाम न हो। ओवैसी ने भारत की कार्यवाहीका स्वागत किया है। ओवैसी ने पहलगाम की घटना को इंसानियत का कत्ल बताया था और कहा था कि भारत पाकिस्तान के ऊपर कड़ी कार्यवाही करे। भारत के द्वारा मंगलवार रात डेढ़ बजे ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ के तहत बहावलपुर, मुरीदके, बाघ, कोटली और मुजफ्फराबाद में कार्यवाही किए गए। ये वही ठिकाने हैं, जहाँ से भारत पर आतंकी हमलों की साजिश रची जा रही थी और उन्हें अंजाम दिया जा रहा था।
मगर सरकार को घेरते हुए उन्होंने एशिया कप में भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच पर सवाल उठाए। उन्होंने सदन में कहा कि जब दोनों देशों के बीच व्यापार और हवाई क्षेत्र बंद हैं, तो पाकिस्तान के साथ किस मुँह से क्रिकेट मैच खेल सकते हैं।
राहुल गाँधी ने डॉनल्ड ट्रंप से डिक्टेशन लेते हुए भारत की अर्थव्यवस्था को मृतप्रायः घोषित कर दिया। इस तरह उन्होंने अपने ऊपर आलोचना को निमंत्रित कर लिया, कि वे पाकिस्तान के पोस्टर बॉय हैं, जो डोनल्ड ट्रंप के प्रवक्ता बने हुए हैं।
ऑपरेशन सिंदूर पर सत्ता पक्ष ने वही जवाब संसद में दिए, जो वे अलग-अलग मंचों से कह चुके थे। मूल मुद्दा यह है कि इस बहस से सरकार, विपक्ष या आम जनता को हासिल क्या हुआ? हमारे हिसाब से तो बस यही हासिल हुआ, कि विपक्ष जो सवाल इधर-उधर फेंक रहा था, वे सब अब व्यवस्थित ढंग से संसद में दर्ज हो गए और सत्ता पक्ष के जवाब भी जो भिन्न मंचों पर दिए गए, वे भी अब आधिकारिक हो गए। मगर एक बात साफ़ है कि भारतीय सांसदों को इस बात का रत्ती भर भी ज्ञान नहीं है, कि संसद में शोभनीय व्यवहार कैसे किया जाता है।
मेरे प्रिय कवि शैलेन्द्र ने 1959 की फ़िल्म ‘लव मैरिज’ (देव आनंद, माला सिन्हा) के लिए एक गीत लिखा था –“टीन-कनस्तर पीट-पीटकर, गला फाड़कर चिल्लाना / यार मेरे, मत बुरा मान, ये गाना है न बजाना है।”कवि शैलेन्द्र ने उस समय फ़िल्मों में आ रहे नए किस्म के वेस्टर्न संगीत पर आधारित गीतों के बारे में जो लिखा था, वह आज के सांसदों के व्यवहार पर पूरी तरह फ़िट बैठता है। भारतीय सांसदों को भी समझना होगा, कि गला फाड़ कर चिल्लाना, शोभनीय व्यवहार नहीं है।
पुरवाई पत्रिका का संपादक होने के नाते जिस एक स्थिति ने मेरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया वह थी, कि – जैसे ही भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने हिंदी में बोलना शुरू किया, सभी डीएमके सांसद चिल्लाने लगे और उनसे अंग्रेज़ी में बोलने के लिए कहने लगे।मगर जब प्रियंका वाड्रा हिंदी में बोलीं, तोवे ही सांसद चुप थे, विरोध का एक शब्द भी नहीं बोले। यानि कि भाजपा नेता की हिंदी सांप्रदायिक है, और प्रियंका वाड्रा की हिंदी सेक्युलर है! निशिकांतदुबे ने सही जवाब दिया –बेहतर होता, अगर आप मुझे किसी विदेशी भाषा के बजाय तमिल में बोलने के लिए कहते। सवाल यह है कि यदि एक भारतीय नेता भारत की संसद में हिंदी में अपना वक्तव्य नहीं दे सकता, तो क्या ब्रिटेन और अमेरिका की संसद में देगा?
मेरी आयु 73 पूर्ण होकर 74 में चल रही है, मेरा पूरा परिवार राजनैतिक परिवेश से आता है , मां जी झारखंड पार्टी के संस्थापक थे, चाचा ने 67 में जनसंघ की टिकट पर चुनाव लड़ा था,, अटल जी से मेरे व्यक्तिगत अति मृदु संबंध थे, अतः रजनीति समझने किबथोडी बहुत काबलियत है परन्तु ऐसा निष्कृष्ट विपक्ष मैन आज तक नहीं देखा, आपरेशन सिंदूर पर चर्चा में अगर सकारात्मक सोच से बहस होती तो भारत के भविष्य हेतु कई आयाम खुलते, विदेश नीति को एक दिशा दी जा सकती थी, बड़बोले ट्रम्प को उचित संकेत तो मोदी जी ने दे दिया परंतु देश साथ देता तो जबाब दिय्या जा सकता था, ट्रम्प की चिंता भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता है और कुछ नहीं वह जानता है कि 25% टैरिफ से भारत को नहीं अंततः उसको ही नुकसान होने वाला है ,भारत के निर्यात में मुख्यतः दो वस्तुएं हैं एक जेम्स एंड ज्वैलरी दुसरीं दवाएं, अगर भारत से नहीं खरीदेगा तो अन्य सोर्स से लेगा तो उसे 25 प्रीतश्त से ज्यादा महंगी पड़ेगी वही भारत की खपत विशाल है और भारत के आयात के अन्य साधन भी हैं अतः भारत अगर ट्रेड रेस्ट्रिक्ट करता है तो अमेरिका को दोहरी मार पड़ेगी यह बात राहुल जरूर जानता होगा परन्तु हाय रे राजनीति जो कुछ न करवा लें। ये कभी देश हित की बातें नहीं कर सकते केवल वोटबैंक की बाते करेंगे।
आज के संपादकीय में सिंदूर हिंदी में या फिर अंग्रेज़ी में? ऑपरेशन सिंदूर पर विपक्ष के नेता राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी, गौरव गोगाई, प्रनीति शिंदे, दीपानकर हुड़्डा के साथ ओवेसी के बयानों का उद्धरण देकर विपक्ष पर कटाक्ष तो किया ही है, भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर डोनाल्ड ट्रम्प के बयान का राहुल गाँधी के समर्थन पर आपने सही कहा कि उन्होंने स्वयं को अपनी आलोचना के लिए निमंत्रित कर लिया है। वे पाकिस्तान के पोस्टर बॉय हैं ही, अब डोनल्ड ट्रंप के प्रवक्ता बन गये हैं।
अखिलेश यादव का बयान और भी चिंतित करने वाला है। उनके अनुसार आतंकवादी को मारने का समय सुनिश्चित किया हुआ था।
पता नहीं हमारे राजनीतिज्ञ कितना गिरेंगे। न उन्हें देश की चिंता है न अपनी इमेज की। देश की जनता को वे अभी भी मूर्ख समझते हैं। आज वे यह भी भूल गये हैं कि संसद वाद-विवाद के द्वारा समस्याओं का हल निकालने का स्थान है न कि अखाड़ा…आज बहस नहीं वरन शोर शराबा ज्यादा हो गया है। एक समय था ज़ब अटल बिहारी बाजपेई, सुषमा स्वराज, लाल कृष्ण आडवाणी को सुनना अच्छा लगता था।
समय बदल रहा है और युद्ध की तकनीक भी, फिर भी गौरव गोगाई का अनर्गल प्रलाप…
निशिकांत दुबे को अंग्रेजी में बोलने पर यह आपने सही कहा कि भारत कि संसद में सांसद हिन्दी में नहीं बोलेंगे तो क्या इंग्लैंड और अमेरिका की संसद में बोलेंगे।
जहाँ तक ऑपरेशन रोकने का प्रश्न है, मेरे विचार से उचित निर्णय था वरना रूस-यूक्रेन युद्ध की तरह पता नहीं कितने दिन चलता जिससे जान माल का तो नुकसान होता ही, आर्थिक स्थिति पर भी असर पड़ता।
संसद में पक्ष -विपक्ष के सांसदों के बयानों के द्वारा उनकी मानसिकता का विश्लेषण करता उत्कृष्ट संपादकीय।
साधुवाद आपको।
सर अंत में सवाल पूछना कि यदि एक भारतीय नेता भारत की संसद में हिंदी में अपना वक्तव्य नहीं दे सकता, तो क्या ब्रिटेन और अमेरिका की संसद में देगा? यह एक लेखक की सजगता तो दिखाता ही है साथ में यह भी दिखाता है हिन्दी को अपने ही घर में सम्मान और अस्तित्व के लिए जूझना पड़ रहा है।
सर इस पूरे लेख को पढ़ने के पश्चात लगा कि लेखकीय दृष्टि बिल्कुल सधी हुई और पक्षपातविहीन है।वर्तमान में घट रही घटनाओं पर की गई आपकी टिप्पणी शोधपरक होती है जो हमारी सोचने समझने की क्षमता को विकसित करती है।
बहुत उम्दा और गंभीर संपादकीय है सर। शीर्षक बड़ा दिलचस्प है
गौरव गोगोई ने तो सरकार से संसद में ऐसा सवाल पूछ डाला कि सबके चेहरे पर मुस्कान बरबस आ गई। उनका सवाल था कि भारतीय सेना पाकिस्तानी ठिकानों पर दूर से क्यों हमला कर रही थी। नज़दीक जाकर क्यों नहीं लड़ाई की। गौरव गोगोई को शायद नहीं मालूम कि यह लंबी दूरी की मिसाइलों का ज़माना है। यह कुश्ती नहीं है, जिसमें पहलवान का लंगोट खींच कर गिराना है।
पूरा संपादकीय मस्त है लेकिन ये पैराग्राफ ने ध्यान खींचा। बाकी राजनीतिक उथल पुथल भी जल्द होने के योग बन रहे हैं ज्योतिष के अनुसार। मोदी जी को पद त्याग करना पड़ेगा इसकी भी पूरी संभावनाएं बनी हुई है। अमित शाह ज्योतिष के अनुसार प्रबल दावेदार नजर आते हैं। उसके बाद 2028 में योगी जी। वैसे अगले 10 साल तक किसी भी सरकार को बहुमत भी नहीं मिलेगा। सत्ता में NDA ही नजर आती है बाकी देखते हैं ज्योतिष कितना पास या फैल होता है। दीगर बात ये है कि सम्पादकीय मस्त लगा।
पक्ष और विपक्ष ने कुछ भी नया नहीं कहा… जो जोकरपना विपक्ष ने किया उसकी बात मैंने कर दी। मेरा तो मुख्य सवाल ही यही है कि आख़िर इस बहसे से हासिल क्या हुआ। जो जो सबने संसद के बाहर कई कई बार कहा, वही संसद में कहा। करदाताओं के पैसे सब नाले में गये।
हमेशा की तरह एक बहुत ही दमदार संपादकीय.. इस ज्वलंत मुद्दे को बहुत ही सारगर्भित परन्तु विस्तृत तरीके से लिखा आपने…इस लेख को विपक्ष को पढ़ना चाहिए ताकि वे अपनी बेवक़ूफ़ियों को एक बार फिर से समझ सकें…
पुरवाई पत्रिका के इस बार का संपादकीय विषय – सिंदूर हिन्दी में या फिर अंग्रेजी में? ये विषय संसद के मानसूनी सत्र 2025 से उठाया गया है। अब ये रिकार्ड विषय बन चुका है।
जैसा कि सरकार ने घोषणा की थी कि आपरेशन सिंदूर अभी खत्म नहीं हुआ है। सिर्फ सीजफायर हुआ है। मुझे भी लगा था कि ये पाकिस्तान में चलेगा और भारत में भी चलेगा। संसद के मानसून सत्र में आपरेशन सिंदूर का ही बोलबाला रहा। विपक्ष इस पर पहले से ही प्रश्न उठाता रहा है और अब यहां संसद में भी वही प्रश्न दोहराये गए हैं। कांग्रेस पार्टी के सांसदों के हमले घातक रहे पर सरकार के आगे वे टिक न सके। उनकी बाॅडी लेंग्वेज से ऐसा लग रहा था कि ये सफलता उन्हें पच नहीं रही है। जनता के बीच उनका यह संदेश सही नहीं गया है। आधे सांसद तो जोकर नजर आए। जैसे सेना दूर से हमला क्यों कर रही है, नजदीक जाकर क्यों नहीं मारा।
विपक्ष के कुछ सांसदों को निशिकांत दुबे का हिंदी में बोलना रास नहीं आ रहा था। दीपेंद्र हुड्डा जी का यह कहना कि अमेरिका से ‘आंख दिखाओ या हाथ मिलाओ’ बहुत ही बचकाना वक्तव्य था। घरेलू राजनीति हो या वैश्विक राजनीति दोनों में गणितीय फार्मूले नहीं चलते हैं। मतलब राजनीति में दो धन दो चार नहीं होते हैं, पांच भी हो सकते हैं और हजार भी हो सकते हैं। विपक्ष इसमें ये ढूंढ रहा था कि इस आपरेशन में सरकार से चूक कहां हुई? ट्रंप के बयान में उन्हें कारू का खजाना दिख रहा था। प्रधानमंत्री जी के स्पष्टीकरण से वह भी दिखना बंद हो गया। कुछ कह रहे थे कि प्रधानमंत्री जी ने ट्रंप का नाम क्यों नहीं लिया। भाई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैसा बोलना चाहिए ये एक नेता को जानकारी होनी चाहिए। प्रधानमंत्री जी ये समझते हैं। उनकी इस चतुराई को पूरा विश्व समझ चुका है।
राहुल गांधी जी ने इस संदर्भ में इंदिरा गांधी जी से मोदी जी की तुलना करनी चाही। इतने बड़े नेता के लिए ये नहीं करना चाहिए था। इंदिरा गांधी जी देश का गौरव है। उन्होंने जो काम किया है उसे देश हमेशा याद रखेगा। पुरखों की पूंजी को आप कब तक खाते रहोगे? आप भी अपना वर्चस्व स्थापित कीजिए। अनुराग ठाकुर ने उनके लिए शून्य शून्य शून्य… वाला प्रमाणपत्र दिखाकर उनका प्रोग्रेस कार्ड संसद में ही थमा दिया है। ट्रंप की मृत अर्थव्यवस्था के साथ भी आप खड़े हो गए। भारत की अर्थव्यवस्था के आंकड़े ही देख लिए होते। ये मानते हैं कि देश में बेरोज़गारी है और भी समस्याएं हैं। पर मृत अर्थव्यवस्था तो नहीं ही है।आज ट्रंप साहब की ये हालत है कि विश्व का छोटे से छोटा देश भी उन्हें सीरियसली नहीं ले रहा है। वो तो उनके पुरखे (अमेरिका) इतना रुतवा कायम कर गए हैं सो ट्रंप महोदय उसी को भुना रहे हैं। ऐसा ही रहा तो एक दिन अमेरिका की हालत खराब हो जाएगी।
विपक्ष के नेता राहुल गांधी जी को देश के साथ खड़ा दिखना चाहिए। आपके व्यवहार से जनता में ये संदेश जा रहा है कि आप खुलकर देशविरोधी हो रहे हो। ट्रंप के वक्तव्य ऐसे नहीं है कि जो स्थायी हो। सुबह कुछ कहते हैं और शाम को कुछ और। आज इस देश पर 500% टैरिफ लगा रहे हैं तो कल पलटकर फिर यथास्थिति पर आ जाते हैं।
संसद सत्र के बीच आपरेशन महादेव में सेना ने पहलगाम हमले को अंजाम देने वाले पाकिस्तानी आतंकवादियों को निपटा दिया। ये तो मेरे भी दिमाग में आया था कि मानसून सत्र, सावन का सोमवार, आपरेशन महादेव को इसी समय क्यों? पर सरकार विपक्ष को बहुत अच्छे से जानती है कि पूरा विपक्ष संसद सत्र में इसी की चर्चा करते। सेना ने इस हमले के बाद घेराबंदी कर दी थी। हो सकता है सेना ने उनको पहले से ट्रैक कर लिया हो और सरकार से उन्हें निपटाने की इजाजत मांगी हो तो सरकार ने कह दिया हो कि थोड़ा रुक जाओ। आतंकवादियों पर नज़र रखे रहिए। अनुकूल अवसर आने पर देख लेना। इसे मैं सच नहीं कह रहा हूं। आप लोग इसे मेरी कल्पना मानिएगा।
आज का संपादकीय रुचिकर इसलिए लगा कि सरकार और विपक्ष हमारे ही है। और हम यहां दोनों की अच्छाइयों और कमियों पर बात करते हैं। ये देश हमारा है, उस पर गर्व करना बनता है।
बढ़िया संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर।
भाई लखनलाल पाल जी आप सच में अद्भुत है। जिस तरह आप निरंतर सक्रिय रहते हैं, उससे हम सबको सीखने को बहुत कुछ मिलता है। समस्या यही है कि जो कुछ पक्ष और विपक्ष संसद से बाहर कह रहा था, वही संसद में दोहरा रहा है। केवल कुछ जोकरों ने बेवकूफ़ी भरे बयान दिये… वरना तो करदाता का पैसा स्वाह हो गया।
एक बार और बेहतरीन संपादकीय।
जो भारत की संसद और सांसदों की निडर ,बेबाक पड़ताल करता है और आईना भी पेश करता हैं।
संपादकीय एक संसद की कार्यवाही पर कमेंट्री या आँखों देखा हाल सा लगता है।
बधाई हो संपादक और पुरवाई पत्रिका समूह।
नमस्कार सर….अत्यंत महत्वपूर्ण चर्चा की है आपने सर….
अपने देश की दुर्गति के कारण आरंभ से जो रहे हैं.. उनको समर्थन देने वाले भी बहुत हैं.. बस भविष्य में इनकी सरकार कभी न आए । मोदी जी निश्चित रूपसे देश को शीर्ष पर ले जायेंगे….
साधुवाद सर
संसद में आपरेशन सिंदूर पर हुई बहस को अपने इस संपादकीय का मुद्दा बनाया, इससे आपके देश के प्रति सरोकार भी परिलक्षित होते हैं। वैसे यहां इस कार्यवाही को तो टीवी पर प्रसारित होते देखा सुना परंतु आपकी प्रस्तुति ने इस बहस को न केवल रोचक ढंग से पेश किया बल्कि आपके सारी बहस में अंतर्निहित व्यंग ने इसे और रोचक बना दिया। यह बहस सरकार को कटघरे में खड़े करने की कोशिश से विपक्ष ने अपनी बहस देश के विरुद्ध ही कर डाली और इसका परिणाम यह ह हुआ कि जहां आपरेशन सिंदूर के विषय में कोई चूक हुई होगी, मोदी विरोध और सत्ता लोलुपता के कारण उस ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया। वास्तव में भारत का लक्ष्य आपरेशन सिंदूर के माध्यम से पाकिस्तान के आतंकी ठिकाने नष्ट करना था और वह भारतीय सेना ने बखूबी हासिल कर लिया और पाकिस्तान को बता दिया कि उसने ऐसा कर दिया है और अब अगर पाकिस्तान कोई हरकत करेगा तो उसका मुनासिब जवाब दिया जायेगा। पाकिस्तान के आक्रमण करने के कारण भारत ने उसके नौ हवाई अड्डे तबाह कर डाले। जब भारत की मिसाइल नूरखां हवाई अड्डे के पास गिरी तो वहां पाकिस्तान के परमाणु बम अथवा उसे संबंघित सामग्री आदि खतरे में दिखी तो पाकिस्तान रोता रोता अमरीका के पास पहुंचा, बताया तो यह भी जा रहा है कि नूरखां हवाई अड्डे के कहीं अमरीका ने अपने कुछ परमाणु बम रखें हैं जिन्हें ख़तरा पैदा हो गया था तो अमरीका ने उसे पोर्न युद्ध बंद करने के लिए कहा जिसके कारण पाकिस्तान ने भारत से युद्धविराम की गुहार लगाई।
खैर, आपके संपादकीय से बहुत मुद्दों की तरफ ध्यान आकर्षित किया है। भारत के प्रति आपकी चिंता हर भारतीय की तरह उचित है पर विपक्ष बिल्कुल गैर जिम्मेदाराना बना हुआ है जो देश का दुर्भाग्य है।वैसे संसद विपक्ष के शोर शोराबे के कारण चल ही नहीं रही है। मैंने एक दिन यह भी लिखा था कि जिस दिन संबंध शोर शोराबे के कारण न चले, उस दिन के वेतन सांसद को नहीं दिये जाये, काम नहीं तो वेतन नहीं, उससे कुछ अंतर तो पड़े गा।
*इन दिनों, व्हाट्सएप पर यह सन्देश जबरदस्त चर्चा है कि राजा विक्रमादित्य ने नरेंद्र मोदी के रूप में जन्म लिया है और जो वेताल था कोई और नहीं राहुल गांधी के रूप में जन्मा है और नरेंद्र मोदी की पीठ पर सवार होकर उलजलूल प्रश्न करता है और जैसे ही उत्तर मिल जाता है गायब हो जाता है तथा कुछ समय बाद फिर नया बेतुका प्रश्न पूछने वापस आ जाता है।
बेताल इन दिनों अकेले नहीं विपक्षी महागठबंधन के साथ आता है।
राजनीति का इतना अधःपतन अपनी जानकारी में कभी नहीं देखा।
शैली
भारत की संसद में विपक्ष की भूमिका पर
उम्दा सम्पादकीय है ।विपक्ष के पास राष्ट्र हित में कोई मुद्दा वर्तमान में है नहीं अब तो ऐसा लगता है ।
साधुवाद
Dr Prabha mishra
संपादक महोदय, भारत की प्रजातांत्रिक रीति से चुनी हुई संसद सदस्यों की टोली में सरकार को ‘विपक्ष’ नहीं बल्कि भारत की जनता को ‘भारत विरोधी दल’ मिल गया है! भारतवर्ष की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी को राहुल गांधी के रूप में एक देशद्रोही मिल गया है, जो गांधी का छद्म नाम लेकर ‘हृदय में जयचंद की आत्मा लिए अज्ञानी जनता को मूर्ख बना रहा है।
देश की जनता पता नहीं कब इस रोग से मुक्ति पाएगी। हिंदी की उपेक्षा के प्रति आपकी पीड़ा आपके सच्चे भारत प्रेम को प्रदर्शित करती है।
बहुत बढ़िया संपादकीय के लिए बधाइयां।
मेरे ससुर जी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे।वे जेल जा चुके थे। वाराणसी के बड़े नेता राज नारायण सिंह उनके मित्र थे, राज नारायण जी ने ही इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैध घोषित करने का मुकदमा जीता था। जब कांग्रेस सत्ता में आई तब ससुर जी राजनीतिक गतिविधियों से संन्यास ले लिया था और कांग्रेस पार्टी भी छोड़ दी। उनका मानना था कि कांग्रेस का लक्ष्य भारत को स्वतंत्रता दिलाना था ,शासन करना नहीं। इस पार्टी के शासनकाल के दुष्परिणाम देश भुगत ही रहा है।
जितेन्द्र भाई: विपक्ष के तबेले में जितने भी भिन्न-भिन्न प्रकार के नमूने भरती हैं, क्या उन्हें, अपनी ज़िम्मेवारी को लेकर, थोड़ी सी भी तमीज़ या अकल है कि, संसद की गारिमा को बरकरार रखते हुए, संसद में क्या-क्या और कैसे-कैसे प्रश्न पूछने चाहियें? शायद नहीं!!!!!! इन सब लोगों को, और इस में विपक्ष के दिग्गज नेताओं भी शामिल हैं, सिवाय अपना गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाने और उसको साफ़ करने के इलावा और कोई काम आता ही नहीं। यह सब, सत्तर साल में विक्सित, मोटी बुद्धी के साथ-साथ मोटी चमड़ी का चमत्कार है। आज की विपक्ष ने जो सत्तर साल तक जंता को धोखे में रखकर अपना उल्लू सीधा किया, उन सब काली कर्तूतों का चिठ्ठा अब खुल कर सामने आरहा है। बेशर्म यह इतने हैं कि, सब कुछ जानते हुए भी, अभी तह सत्ता का मोह नहीं गया।
विपक्ष में रहते हुए, भारत के विकास की तरफ़ ध्यान देने को छोड़ कर, यह जब पाकिस्तान का खुला समर्थन और अपने ही देश को नीचा दिखाने की “देशद्रोही” हरकतें करते हैं, वो बहुत ही लज्जाजनक है।
विपक्षियों को आप जिस भी वर्ग में रखलें लेकिन प्रधान मन्त्री आदरणीय मोदी जी ने अपनी दृड़ और मस्त हाथी की चाल से यह साबित कर दिया है कि “काफ़िला चलता रहता है”।
इस संपादकीय ने न केवल विषय की जटिलता को संतुलित दृष्टिकोण से उजागर किया है, बल्कि सार्वजनिक संवाद को भी समृद्ध बनाया है। तेजेंद्र शर्मा ने साफ-साफ बताया है कि कैसे “स्वीकार” और “इनकार” में बड़ा अंतर है — पहली बार सार्वजनिक मंच पर सेना प्रमुख द्वारा हुए खुलासों को समझना कितना ज़रूरी है। वे ठीक कह रहे हैं कि जब कोई बदलाव होता है, जैसे सीडीएस का विदेश में बोलना, तो उसका सरकार द्वारा संचालित रणनीतिक कारण हो सकता है।
साथ ही, लेख ने यह दिखाया कि राजनीतिक नेतृत्व ने क्यों एक समन्वित और पारदर्शी प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी—विशेषकर अगर जानकारी दी जानी थी तो वो पहले संसद में साझा की जानी चाहिए थी, जिससे घरेलू स्तर पर अधिक सवाल-जवाब हो पाते। सभी तथ्यों के बीच यह संपादकीय इस बहस में राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देने की सलाह देता है।
इन बातों ने इस संपादकीय को प्रभावशाली बनाया है और यह उच्च स्तर का विवेकशील विश्लेषण प्रस्तुत करता है। हाल की बहस और मीडिया की रिपोर्टिंग में अक्सर पक्षपात या प्रतिक्रियात्मक टोन अधिक हो जाता है, लेकिन यहाँ लेखक ने समस्या की जड़ तक जाकर निष्पक्ष दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है।
इस तरह की पत्रकीय व्याख्या हमें जटिल राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों को समझने में मदद करती है—जहाँ राजनीति, सैन्य निर्णय और रणनीतिक संचार जैसे पहलुओं को संतुलित तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
इस बार के अपने संपादकीय में आप ने संसद में आपरेशन सिंदूर को लेकर विभिन्न सांसदों द्वारा किए गए प्रश्नों के उल्लेख के साथ-साथ उन वक्तव्यों पर भी प्रकाश डाला जो इस विषय पर उन लोग ने प्रस्तुत किए।
एक ज्वलंत विषय को जिस समग्रता से आप ने हमारे सामने रखा है, उस के प्रति हमारी सराहना व आभार स्वीकार करें।
धन्यवाद व शुभ कामनांए
दीपक शर्मा
संसद में आपरेशन सिंदूर पर हुई बहस पर बहुत सटीक संपादकीय लिखा है सर आपने….वास्तव में विपक्ष ने अपनी मर्यादा और गरिमा खो दी है….इस मुद्दे पर सब के एकमत होने से देश की अखण्डता को बल मिलता…
इस बार के संपादकीय पर क्या ही कहा जाए! समझ में ही नहीं आ रहा कि यह जनता के द्वारा चुने गए सांसद हैं!
काश! संसद भवन में प्रवेश करते समय इनके दिमाग में राष्ट्र के सम्मान की बात होती! अपने उत्तरदायित्व का बोध होता!! सही गलत निर्णय करने की क्षमता होती और काश! काश!!काश!!!कि इनका विवेक जाग्रत होता और ये राष्ट्र की गरिमा का ध्यान रख पाते। काश इनमें इतनी समझने की क्षमता होती कि उनके ऊपर देश के उत्तरदायित्व है। उस गंभीरता को समझ पाते कि जिसके लिए संसद पर चर्चा होने वाली थी!
संसद दुनिया में मजाक बनकर रह गई है
सच में बेहद दुखद है, सब अपनी डफली अपना राग वाला हाल है! तमिल लोग तो हिंदी से नफरत ही करते हैं।और
आपकी दो बातें काबिले गौर लगीं–
*गौरव गोगोई को शायद नहीं मालूम कि यह लंबी दूरी की मिसाइलों का ज़माना है। यह कुश्ती नहीं है, जिसमें पहलवान का लंगोट खींच कर गिराना है।*
संसद में जाने के पहले ऐसे लोग अपने दिमाग को घर में लॉकर में रखकर आते हैं।
दूसरा-
सवाल यह है कि यदि एक भारतीय नेता भारत की संसद में हिंदी में अपना वक्तव्य नहीं दे सकता, तो क्या ब्रिटेन और अमेरिका की संसद में देगा?
विरोध होना चाहिये था अंग्रेजी में बोलने की बात पर।
समझ में नहीं आता कि इन मूर्खताओं पर हँसा जाए या रोया जाए।
वाकई इस समय कांग्रेस की तस्वीर ऐसी है कि रोना ही आता है उस पर। कम से कम देश के मामले में तो एक मत हुआ करें।मुद्दों की नजाकत को समझें।
शुक्रिया आपका तेजेन्द्र जी! संपादकीय के माध्यम से वस्तुस्थिति का आईना निर्भीकता से दिखाने के लिये।
पुरवाई का आभार तो बनता ही है।
एक बार फिर आपरेशन सिंदूर चर्चा में है।भारतीय जवानों देशभक्तों की देश के प्रति निष्ठा और समर्पण दांव पर लगा है। महान भारतीय संसद और सत्ता के गलियारों में बेतुके मुद्दे और प्रश्न उछाले गये।आतंकवाद पर न जाने कितनी कहानियाँ गढी जाती हैं,उनकी सच्चाई पर बेतुकी बयान बाजी अब तो सुनने की भी इच्छा नहीं होती।
आज के संपादकीय में बहुत सटीक और सारगर्भित प्रसंगों की चर्चा नै राजनीतिक दलों और उनकी नीतियों तथा वैश्विक दखलंदाजी पर भी रोशनी डाली है। क्या भारत की.संसद की कोई सर्वमान्य भाषा भी है?विविध भाषा भाषी देव में हिन्दी में बोलना भी अब एक अपराध होता जा रहा है।जैसा कि आदरणीय तेजेन्द्र भाई ने लिखा है-
सवाल यह है कि यदि एक भारतीय नेता भारत की संसद में हिंदी में अपना वक्तव्य नहीं दे सकता, तो क्या ब्रिटेन और अमेरिका की संसद में देगा?
बहुत सुंदर, सार्थक संपादकीय और विचारणीय भी।सचमुच ये मुद्दे दिग्भ्रमित करते.हैं। संपादकीय का इस बार का शीर्षक भी सटीक बन पडा है।एक बार पुन: हार्दिक बधाई, शुभ कामनाएं भाई।हृदय से आभार सत्य को जानने समझने का दृष्टिकोण सामने रखा आपने।
सादर प्रणाम।
उम्दा, सारगर्भित सम्पादकीय। संसद की कार्यवाही का सजीव चित्रण है। सुंदर विश्लेषण।मुझे राजनीति कभी समझ नहीं आई, पर आपके लेखन में इतनी स्पष्टता है कि सब रुचिकर लगा। विपक्षी दल मोदी जी की कमियों को निकालने की आड़ में अपना ही मजाक उड़वा रहे हैं।ईश्वर सबको सद्बुद्धि दे ताकि वे ओछी सोच से ऊपर उठकर देश के बारे में सोचें।
इस बार का संपादकीय पढ़ते हुए ऐसा लग रहा था जैसे हमारे ही विचारों को आपकी कलम ने शब्दों में ढाल दिया हो। इस संपादकीय के एक-एक शब्दों से हम सहमति की सीमा के पार तक सहमत हैं। आज का विपक्ष स्थिति को समझने और उसके अनुरूप व्यवहार करने के बजाय अपनी मूर्खता के प्रदर्शन में लगा रहता है जो देश के लिए घातक साबित हो सकता है। गोगोई ,जया बच्चन और प्रियंका गांधी जैसे लोगों की बातें सुनकर बहुत कोफ़्त होती है । राहुल गांधी की गैरज़िम्मेदाराना बातें जिसमें वह भारत की अर्थव्यवस्था को डेड बोलता है , सुनकर उसकी परवरिश पर गुस्सा आता है। सोचने वाली बात यह है कि नेता प्रतिपक्ष की इन बातों को सुनकर उन्हीं की पार्टी के उन लोगों के मन में ,जो थोड़ी सी भी संतुलित सोच रखते हैं ,क्या गुजरती होगी। मोदी जी इतनी गंभीरता और शालीनता से इन लोगों की बातों का जवाब देते हैं इसके लिए तो उन्हें सलामी देनी बनती है।
चिंता का विषय यह है कि विपक्ष के इस पागलपन का इलाज कब और कैसे होगा? किसी संपादकीय में इसका उपाय भी अवश्य दीजिएगा सर !
इस विचारोत्तेजक संपादकीय में बेबाकी और ईमानदारी से अपनी बात रखने के लिए आपको बहुत बधाई और साधुवाद!
आपका संपादकीय विशुद्ध एकपक्षीय है। केवल संघ और भाजपा की स्क्रिप्ट का इसे बेहतर रूप कहा जा सकता है। संसद में क्या होता है, यह सब प्रोसीडिंग में लाइव रहता है। अब दक्षिण के नेताओं को भी हिंदी बोलने में समस्या नहीं है। लेकिन हिंदी जगत के दंभी लोगों के कारण ही तमिलनाडु के लोग अभी भी हिंदी स्वीकार नहीं कर रहे हैं। आप लंदन में अंग्रेजों को जबरदस्ती हिंदी स्वीकार करा लेंगे क्या। तमिलनाडु में बीते दशको में हिंदी लेखकों के प्रयासो से एक बेहतर वातावरण बना था और हिंदी विरोधी आंदोलन जैसी चीजे थम गयी थी। लेकिन आज जो हो रहा है वह वही हो रहा है जिसकी भविष्यवाणी कवि गुरु रवींद्र नाथ टैगोर ने की थी। संसद और राजनीति पर आप कुछ भी लिखने को आजाद हैं। लेकिन भारत की संसद के दोनों सदनों में 22 अधिसूचित भाषाओं में बोलने के लिए सांसदों को आजादी है। जो हिंदी नहीं जानता उसके लिए अंग्रेजी में अनुवाद की व्यवस्था भी है। सच्चाई यह है कि ऑपरेशन सिंदूर से निकले कई सवाल भारतीय जनमानस में विद्यमान हैं। उनका जवाब प्रवासी भारतीयों को भले नहीं चाहिए हो लेकिन सौ फीसदी भारतीयों को चाहिए ही। सरकार के पास विकल्प रहा है कि साफगोई से उन सवालों का जवाब दे दिया जाता, लेकिन उसकी जलेबी बना दी गयी। अभी भी समय है जवाब देने का। लेकिन जवाब देने की जगह नेता प्रतिपक्ष की छवि धूमिल करने में ही सत्ता पक्ष और उसके भक्तों की अधिक रूचि है। लेखक और पत्रकार तबका तो खैर इन दिनों चारण युग से भी आने निकलने की होड़ में है। इस विषय पर संसद के दोनों सदनों की चर्चा सुनने के लिए थोड़ा समय निकालेंगे तो आपको लगेगा कि सच्चाई उशसे इतर है जो आपने संपादकीय में लिखी है।
पुनश्च सेना की आलोचना की बात केवल भाजपा और संघ परिवार के लोग कह रहे हैं। विपक्षी नेताओं के किसी भी भाषण में अगर आपने सेना की आलोचना सुनी हो तो उसकी नाम लिख कर संपादकीय लिखिए। मेरी निगाह में यह संपादकीय पांचजन्य में छपता तो बेहतर था।
बहुत ही रोचक विषय। कॉंग्रेस के दोगलेपन ने संसद की गरिमा को हमेशा से ठेस पहुंचाई है। सिंदूर की परंपरा तो सिंधु घाटी की सभ्यता से जुड़ा है और इसका वर्णन शिव पुराण और रामायण में भी है। फ़िल्म साहब बीवी गुलाम में सिंदूर का महत्व मीना कुमारी जी ने अपने दमदार अभिनय द्वारा समझाया है।
अत्यंत सचिंतित और विचारपरक संपादकीय के लिए आपको साधुवाद। यह सच है कि वर्तमान भारतीय राजनीति में नीचे गिरने की जैसे होड़ लगी है। इसमें पक्ष – विपक्ष सब शामिल हैं. ‘तोड़ी दोनों ने मर्यादा…’। पर सबसे बुरा हाल विपक्ष का है, जैसे वे समझ ही नहीं पा रहे हैं कि कहना क्या है? सरकार की नीतियों का विरोध विपक्ष का काम है पर वे सरकार की नीतियों का विरोध करते कब देश का विरोध करने लग रहे हैं, शायद उनको मालूम ही नहीं है। आपरेशन सिंदूर पर विपक्ष को पाकिस्तान और ट्रम्प ज्यादा विश्वसनीय लग रहे हैं, वे नहीं जानते हैं कि अपनी इस समझ के चलते वे इस संदर्भ में अपने ही देश का अपमान कर रहे हैं। राहुल गाँधी तो अभी भी अपनी राजनीतिक जमीन को खोजने के लिए तरह-तरह के प्रयोग ही कर रहे हैं. ट्रम्प जब मोदी को अपना दोस्त कहते थे तब वे ट्रम्प को पसंद नहीं करते थे, और अब ट्रम्प भारत विरोधी रुख अख्तियार कर लिए हैं तो वही विपक्ष को खूब पसंद आ रहे हैं।
भारतीय राजनीति के इस समकालीन पतन को आपने खूब गहराई से पहचाना, परखा और आईना दिखाया है। पर मुश्किल यह है कि हमारे तथाकथित नेता अब ऐसा कोई आईना नहीं देखते जिसमें उनका वास्तविक चेहरा नज़र आता हो। आपने संसद में नेताओं के आचरण पर उचित टिप्पणी की है। ऐसा व्यवहार जिसे देखकर शर्म आती है।
पुरवाई के माध्यम से आप खरी-खरी कह रहे हैं, यह सुखद है। उम्मीद यही है कि आपके सच और साहस कि कोई ‘पुरवाई’ संसद में भी पहुँचे।
आपका बहुत आभार।
जबरदस्त आलेख
मेरी आयु 73 पूर्ण होकर 74 में चल रही है, मेरा पूरा परिवार राजनैतिक परिवेश से आता है , मां जी झारखंड पार्टी के संस्थापक थे, चाचा ने 67 में जनसंघ की टिकट पर चुनाव लड़ा था,, अटल जी से मेरे व्यक्तिगत अति मृदु संबंध थे, अतः रजनीति समझने किबथोडी बहुत काबलियत है परन्तु ऐसा निष्कृष्ट विपक्ष मैन आज तक नहीं देखा, आपरेशन सिंदूर पर चर्चा में अगर सकारात्मक सोच से बहस होती तो भारत के भविष्य हेतु कई आयाम खुलते, विदेश नीति को एक दिशा दी जा सकती थी, बड़बोले ट्रम्प को उचित संकेत तो मोदी जी ने दे दिया परंतु देश साथ देता तो जबाब दिय्या जा सकता था, ट्रम्प की चिंता भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता है और कुछ नहीं वह जानता है कि 25% टैरिफ से भारत को नहीं अंततः उसको ही नुकसान होने वाला है ,भारत के निर्यात में मुख्यतः दो वस्तुएं हैं एक जेम्स एंड ज्वैलरी दुसरीं दवाएं, अगर भारत से नहीं खरीदेगा तो अन्य सोर्स से लेगा तो उसे 25 प्रीतश्त से ज्यादा महंगी पड़ेगी वही भारत की खपत विशाल है और भारत के आयात के अन्य साधन भी हैं अतः भारत अगर ट्रेड रेस्ट्रिक्ट करता है तो अमेरिका को दोहरी मार पड़ेगी यह बात राहुल जरूर जानता होगा परन्तु हाय रे राजनीति जो कुछ न करवा लें। ये कभी देश हित की बातें नहीं कर सकते केवल वोटबैंक की बाते करेंगे।
सुरेश सर, आपने अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के हवाले से संपादकीय और विपक्ष पर गहरी टिप्पणी की है। हार्दिक आभार।
आभार राघवेन्द्र भाई।
आज के संपादकीय में सिंदूर हिंदी में या फिर अंग्रेज़ी में? ऑपरेशन सिंदूर पर विपक्ष के नेता राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी, गौरव गोगाई, प्रनीति शिंदे, दीपानकर हुड़्डा के साथ ओवेसी के बयानों का उद्धरण देकर विपक्ष पर कटाक्ष तो किया ही है, भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर डोनाल्ड ट्रम्प के बयान का राहुल गाँधी के समर्थन पर आपने सही कहा कि उन्होंने स्वयं को अपनी आलोचना के लिए निमंत्रित कर लिया है। वे पाकिस्तान के पोस्टर बॉय हैं ही, अब डोनल्ड ट्रंप के प्रवक्ता बन गये हैं।
अखिलेश यादव का बयान और भी चिंतित करने वाला है। उनके अनुसार आतंकवादी को मारने का समय सुनिश्चित किया हुआ था।
पता नहीं हमारे राजनीतिज्ञ कितना गिरेंगे। न उन्हें देश की चिंता है न अपनी इमेज की। देश की जनता को वे अभी भी मूर्ख समझते हैं। आज वे यह भी भूल गये हैं कि संसद वाद-विवाद के द्वारा समस्याओं का हल निकालने का स्थान है न कि अखाड़ा…आज बहस नहीं वरन शोर शराबा ज्यादा हो गया है। एक समय था ज़ब अटल बिहारी बाजपेई, सुषमा स्वराज, लाल कृष्ण आडवाणी को सुनना अच्छा लगता था।
समय बदल रहा है और युद्ध की तकनीक भी, फिर भी गौरव गोगाई का अनर्गल प्रलाप…
निशिकांत दुबे को अंग्रेजी में बोलने पर यह आपने सही कहा कि भारत कि संसद में सांसद हिन्दी में नहीं बोलेंगे तो क्या इंग्लैंड और अमेरिका की संसद में बोलेंगे।
जहाँ तक ऑपरेशन रोकने का प्रश्न है, मेरे विचार से उचित निर्णय था वरना रूस-यूक्रेन युद्ध की तरह पता नहीं कितने दिन चलता जिससे जान माल का तो नुकसान होता ही, आर्थिक स्थिति पर भी असर पड़ता।
संसद में पक्ष -विपक्ष के सांसदों के बयानों के द्वारा उनकी मानसिकता का विश्लेषण करता उत्कृष्ट संपादकीय।
साधुवाद आपको।
आदरणीय सुधा जी, आप हमेशा संपादकीय को समग्रता में पढ़ते हुए अपनी सार्थक टिप्पणी करती हैं। हार्दिक आभार।
बहुत बढ़िया पढ़ कर बहुत अच्छा लगा। संसद की कार्यकारी तो हमने देखी थी पर पढ़ना और भी अच्छा लगा। बहुत-बहुत बधाई आपको। ऐसे ही आप लिखते रहे हम पढ़ते रहें।
हार्दिक धन्यवाद आदरणीय भाग्यम जी।
सर अंत में सवाल पूछना कि यदि एक भारतीय नेता भारत की संसद में हिंदी में अपना वक्तव्य नहीं दे सकता, तो क्या ब्रिटेन और अमेरिका की संसद में देगा? यह एक लेखक की सजगता तो दिखाता ही है साथ में यह भी दिखाता है हिन्दी को अपने ही घर में सम्मान और अस्तित्व के लिए जूझना पड़ रहा है।
सर इस पूरे लेख को पढ़ने के पश्चात लगा कि लेखकीय दृष्टि बिल्कुल सधी हुई और पक्षपातविहीन है।वर्तमान में घट रही घटनाओं पर की गई आपकी टिप्पणी शोधपरक होती है जो हमारी सोचने समझने की क्षमता को विकसित करती है।
सुनीता, मेरा प्रयास रहता है कि जितना भी ऑब्जेक्टिव रह सकूं उतना प्रयास अवश्य करता रहूं। इस ख़ूबसूरत टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
बहुत उम्दा और गंभीर संपादकीय है सर। शीर्षक बड़ा दिलचस्प है
गौरव गोगोई ने तो सरकार से संसद में ऐसा सवाल पूछ डाला कि सबके चेहरे पर मुस्कान बरबस आ गई। उनका सवाल था कि भारतीय सेना पाकिस्तानी ठिकानों पर दूर से क्यों हमला कर रही थी। नज़दीक जाकर क्यों नहीं लड़ाई की। गौरव गोगोई को शायद नहीं मालूम कि यह लंबी दूरी की मिसाइलों का ज़माना है। यह कुश्ती नहीं है, जिसमें पहलवान का लंगोट खींच कर गिराना है।
पूरा संपादकीय मस्त है लेकिन ये पैराग्राफ ने ध्यान खींचा। बाकी राजनीतिक उथल पुथल भी जल्द होने के योग बन रहे हैं ज्योतिष के अनुसार। मोदी जी को पद त्याग करना पड़ेगा इसकी भी पूरी संभावनाएं बनी हुई है। अमित शाह ज्योतिष के अनुसार प्रबल दावेदार नजर आते हैं। उसके बाद 2028 में योगी जी। वैसे अगले 10 साल तक किसी भी सरकार को बहुमत भी नहीं मिलेगा। सत्ता में NDA ही नजर आती है बाकी देखते हैं ज्योतिष कितना पास या फैल होता है। दीगर बात ये है कि सम्पादकीय मस्त लगा।
तेजस आपने तो संपादकीय पर टिप्पणी करते हुए एक राजनीतिक भविष्यवाणी करने का ख़तरा भी मोल लिया है। हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।
शुक्रिया सर
अच्छा है किन्तु आपको पीएम के बयान तक आकर उसकी।भी एक मीमांसा करनी चाहिए थी
पक्ष और विपक्ष ने कुछ भी नया नहीं कहा… जो जोकरपना विपक्ष ने किया उसकी बात मैंने कर दी। मेरा तो मुख्य सवाल ही यही है कि आख़िर इस बहसे से हासिल क्या हुआ। जो जो सबने संसद के बाहर कई कई बार कहा, वही संसद में कहा। करदाताओं के पैसे सब नाले में गये।
आपरेशन सिंदूर की संसद -चर्चा का.शानदार -सम्यक विवेचन।
हार्दिक धन्यवाद पिलकेन्द्र जी।
शानदार सम्पादकीय : साधुवाद
हार्दिक धन्यवाद विभा जी।
सही पकड़े हैं
सर ये हिंदी या अंग्रेज़ी
अपनी सुविधा अनुसार जब दे
खुद ही अपना पहले वाला व्यान भूल जाते हैं
हार्दिक धन्यवाद अनिल भाई।
हमेशा की तरह एक बहुत ही दमदार संपादकीय.. इस ज्वलंत मुद्दे को बहुत ही सारगर्भित परन्तु विस्तृत तरीके से लिखा आपने…इस लेख को विपक्ष को पढ़ना चाहिए ताकि वे अपनी बेवक़ूफ़ियों को एक बार फिर से समझ सकें…
मनीष बेटा जब आपकी पीढ़ी संपादकीय से जुड़ती है तो संपादकीय सच में सफल हो जाता है।
पुरवाई पत्रिका के इस बार का संपादकीय विषय – सिंदूर हिन्दी में या फिर अंग्रेजी में? ये विषय संसद के मानसूनी सत्र 2025 से उठाया गया है। अब ये रिकार्ड विषय बन चुका है।
जैसा कि सरकार ने घोषणा की थी कि आपरेशन सिंदूर अभी खत्म नहीं हुआ है। सिर्फ सीजफायर हुआ है। मुझे भी लगा था कि ये पाकिस्तान में चलेगा और भारत में भी चलेगा। संसद के मानसून सत्र में आपरेशन सिंदूर का ही बोलबाला रहा। विपक्ष इस पर पहले से ही प्रश्न उठाता रहा है और अब यहां संसद में भी वही प्रश्न दोहराये गए हैं। कांग्रेस पार्टी के सांसदों के हमले घातक रहे पर सरकार के आगे वे टिक न सके। उनकी बाॅडी लेंग्वेज से ऐसा लग रहा था कि ये सफलता उन्हें पच नहीं रही है। जनता के बीच उनका यह संदेश सही नहीं गया है। आधे सांसद तो जोकर नजर आए। जैसे सेना दूर से हमला क्यों कर रही है, नजदीक जाकर क्यों नहीं मारा।
विपक्ष के कुछ सांसदों को निशिकांत दुबे का हिंदी में बोलना रास नहीं आ रहा था। दीपेंद्र हुड्डा जी का यह कहना कि अमेरिका से ‘आंख दिखाओ या हाथ मिलाओ’ बहुत ही बचकाना वक्तव्य था। घरेलू राजनीति हो या वैश्विक राजनीति दोनों में गणितीय फार्मूले नहीं चलते हैं। मतलब राजनीति में दो धन दो चार नहीं होते हैं, पांच भी हो सकते हैं और हजार भी हो सकते हैं। विपक्ष इसमें ये ढूंढ रहा था कि इस आपरेशन में सरकार से चूक कहां हुई? ट्रंप के बयान में उन्हें कारू का खजाना दिख रहा था। प्रधानमंत्री जी के स्पष्टीकरण से वह भी दिखना बंद हो गया। कुछ कह रहे थे कि प्रधानमंत्री जी ने ट्रंप का नाम क्यों नहीं लिया। भाई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैसा बोलना चाहिए ये एक नेता को जानकारी होनी चाहिए। प्रधानमंत्री जी ये समझते हैं। उनकी इस चतुराई को पूरा विश्व समझ चुका है।
राहुल गांधी जी ने इस संदर्भ में इंदिरा गांधी जी से मोदी जी की तुलना करनी चाही। इतने बड़े नेता के लिए ये नहीं करना चाहिए था। इंदिरा गांधी जी देश का गौरव है। उन्होंने जो काम किया है उसे देश हमेशा याद रखेगा। पुरखों की पूंजी को आप कब तक खाते रहोगे? आप भी अपना वर्चस्व स्थापित कीजिए। अनुराग ठाकुर ने उनके लिए शून्य शून्य शून्य… वाला प्रमाणपत्र दिखाकर उनका प्रोग्रेस कार्ड संसद में ही थमा दिया है। ट्रंप की मृत अर्थव्यवस्था के साथ भी आप खड़े हो गए। भारत की अर्थव्यवस्था के आंकड़े ही देख लिए होते। ये मानते हैं कि देश में बेरोज़गारी है और भी समस्याएं हैं। पर मृत अर्थव्यवस्था तो नहीं ही है।आज ट्रंप साहब की ये हालत है कि विश्व का छोटे से छोटा देश भी उन्हें सीरियसली नहीं ले रहा है। वो तो उनके पुरखे (अमेरिका) इतना रुतवा कायम कर गए हैं सो ट्रंप महोदय उसी को भुना रहे हैं। ऐसा ही रहा तो एक दिन अमेरिका की हालत खराब हो जाएगी।
विपक्ष के नेता राहुल गांधी जी को देश के साथ खड़ा दिखना चाहिए। आपके व्यवहार से जनता में ये संदेश जा रहा है कि आप खुलकर देशविरोधी हो रहे हो। ट्रंप के वक्तव्य ऐसे नहीं है कि जो स्थायी हो। सुबह कुछ कहते हैं और शाम को कुछ और। आज इस देश पर 500% टैरिफ लगा रहे हैं तो कल पलटकर फिर यथास्थिति पर आ जाते हैं।
संसद सत्र के बीच आपरेशन महादेव में सेना ने पहलगाम हमले को अंजाम देने वाले पाकिस्तानी आतंकवादियों को निपटा दिया। ये तो मेरे भी दिमाग में आया था कि मानसून सत्र, सावन का सोमवार, आपरेशन महादेव को इसी समय क्यों? पर सरकार विपक्ष को बहुत अच्छे से जानती है कि पूरा विपक्ष संसद सत्र में इसी की चर्चा करते। सेना ने इस हमले के बाद घेराबंदी कर दी थी। हो सकता है सेना ने उनको पहले से ट्रैक कर लिया हो और सरकार से उन्हें निपटाने की इजाजत मांगी हो तो सरकार ने कह दिया हो कि थोड़ा रुक जाओ। आतंकवादियों पर नज़र रखे रहिए। अनुकूल अवसर आने पर देख लेना। इसे मैं सच नहीं कह रहा हूं। आप लोग इसे मेरी कल्पना मानिएगा।
आज का संपादकीय रुचिकर इसलिए लगा कि सरकार और विपक्ष हमारे ही है। और हम यहां दोनों की अच्छाइयों और कमियों पर बात करते हैं। ये देश हमारा है, उस पर गर्व करना बनता है।
बढ़िया संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर।
भाई लखनलाल पाल जी आप सच में अद्भुत है। जिस तरह आप निरंतर सक्रिय रहते हैं, उससे हम सबको सीखने को बहुत कुछ मिलता है। समस्या यही है कि जो कुछ पक्ष और विपक्ष संसद से बाहर कह रहा था, वही संसद में दोहरा रहा है। केवल कुछ जोकरों ने बेवकूफ़ी भरे बयान दिये… वरना तो करदाता का पैसा स्वाह हो गया।
एक बार और बेहतरीन संपादकीय।
जो भारत की संसद और सांसदों की निडर ,बेबाक पड़ताल करता है और आईना भी पेश करता हैं।
संपादकीय एक संसद की कार्यवाही पर कमेंट्री या आँखों देखा हाल सा लगता है।
बधाई हो संपादक और पुरवाई पत्रिका समूह।
हार्दिक धन्यवाद भाई सूर्यकान्त जी। क्या आप वापिस दिल्ली में ठीक से सैटल हो गये…
नमस्कार सर….अत्यंत महत्वपूर्ण चर्चा की है आपने सर….
अपने देश की दुर्गति के कारण आरंभ से जो रहे हैं.. उनको समर्थन देने वाले भी बहुत हैं.. बस भविष्य में इनकी सरकार कभी न आए । मोदी जी निश्चित रूपसे देश को शीर्ष पर ले जायेंगे….
साधुवाद सर
अनिमा जी, आपकी चिंता समझ में आती है। अपना ख़्याल रखें।
संसद में आपरेशन सिंदूर पर हुई बहस को अपने इस संपादकीय का मुद्दा बनाया, इससे आपके देश के प्रति सरोकार भी परिलक्षित होते हैं। वैसे यहां इस कार्यवाही को तो टीवी पर प्रसारित होते देखा सुना परंतु आपकी प्रस्तुति ने इस बहस को न केवल रोचक ढंग से पेश किया बल्कि आपके सारी बहस में अंतर्निहित व्यंग ने इसे और रोचक बना दिया। यह बहस सरकार को कटघरे में खड़े करने की कोशिश से विपक्ष ने अपनी बहस देश के विरुद्ध ही कर डाली और इसका परिणाम यह ह हुआ कि जहां आपरेशन सिंदूर के विषय में कोई चूक हुई होगी, मोदी विरोध और सत्ता लोलुपता के कारण उस ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया। वास्तव में भारत का लक्ष्य आपरेशन सिंदूर के माध्यम से पाकिस्तान के आतंकी ठिकाने नष्ट करना था और वह भारतीय सेना ने बखूबी हासिल कर लिया और पाकिस्तान को बता दिया कि उसने ऐसा कर दिया है और अब अगर पाकिस्तान कोई हरकत करेगा तो उसका मुनासिब जवाब दिया जायेगा। पाकिस्तान के आक्रमण करने के कारण भारत ने उसके नौ हवाई अड्डे तबाह कर डाले। जब भारत की मिसाइल नूरखां हवाई अड्डे के पास गिरी तो वहां पाकिस्तान के परमाणु बम अथवा उसे संबंघित सामग्री आदि खतरे में दिखी तो पाकिस्तान रोता रोता अमरीका के पास पहुंचा, बताया तो यह भी जा रहा है कि नूरखां हवाई अड्डे के कहीं अमरीका ने अपने कुछ परमाणु बम रखें हैं जिन्हें ख़तरा पैदा हो गया था तो अमरीका ने उसे पोर्न युद्ध बंद करने के लिए कहा जिसके कारण पाकिस्तान ने भारत से युद्धविराम की गुहार लगाई।
खैर, आपके संपादकीय से बहुत मुद्दों की तरफ ध्यान आकर्षित किया है। भारत के प्रति आपकी चिंता हर भारतीय की तरह उचित है पर विपक्ष बिल्कुल गैर जिम्मेदाराना बना हुआ है जो देश का दुर्भाग्य है।वैसे संसद विपक्ष के शोर शोराबे के कारण चल ही नहीं रही है। मैंने एक दिन यह भी लिखा था कि जिस दिन संबंध शोर शोराबे के कारण न चले, उस दिन के वेतन सांसद को नहीं दिये जाये, काम नहीं तो वेतन नहीं, उससे कुछ अंतर तो पड़े गा।
*इन दिनों, व्हाट्सएप पर यह सन्देश जबरदस्त चर्चा है कि राजा विक्रमादित्य ने नरेंद्र मोदी के रूप में जन्म लिया है और जो वेताल था कोई और नहीं राहुल गांधी के रूप में जन्मा है और नरेंद्र मोदी की पीठ पर सवार होकर उलजलूल प्रश्न करता है और जैसे ही उत्तर मिल जाता है गायब हो जाता है तथा कुछ समय बाद फिर नया बेतुका प्रश्न पूछने वापस आ जाता है।
बेताल इन दिनों अकेले नहीं विपक्षी महागठबंधन के साथ आता है।
राजनीति का इतना अधःपतन अपनी जानकारी में कभी नहीं देखा।
शैली
भारत की संसद में विपक्ष की भूमिका पर
उम्दा सम्पादकीय है ।विपक्ष के पास राष्ट्र हित में कोई मुद्दा वर्तमान में है नहीं अब तो ऐसा लगता है ।
साधुवाद
Dr Prabha mishra
संपादक महोदय, भारत की प्रजातांत्रिक रीति से चुनी हुई संसद सदस्यों की टोली में सरकार को ‘विपक्ष’ नहीं बल्कि भारत की जनता को ‘भारत विरोधी दल’ मिल गया है! भारतवर्ष की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी को राहुल गांधी के रूप में एक देशद्रोही मिल गया है, जो गांधी का छद्म नाम लेकर ‘हृदय में जयचंद की आत्मा लिए अज्ञानी जनता को मूर्ख बना रहा है।
देश की जनता पता नहीं कब इस रोग से मुक्ति पाएगी। हिंदी की उपेक्षा के प्रति आपकी पीड़ा आपके सच्चे भारत प्रेम को प्रदर्शित करती है।
बहुत बढ़िया संपादकीय के लिए बधाइयां।
मेरे ससुर जी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे।वे जेल जा चुके थे। वाराणसी के बड़े नेता राज नारायण सिंह उनके मित्र थे, राज नारायण जी ने ही इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैध घोषित करने का मुकदमा जीता था। जब कांग्रेस सत्ता में आई तब ससुर जी राजनीतिक गतिविधियों से संन्यास ले लिया था और कांग्रेस पार्टी भी छोड़ दी। उनका मानना था कि कांग्रेस का लक्ष्य भारत को स्वतंत्रता दिलाना था ,शासन करना नहीं। इस पार्टी के शासनकाल के दुष्परिणाम देश भुगत ही रहा है।
जितेन्द्र भाई: विपक्ष के तबेले में जितने भी भिन्न-भिन्न प्रकार के नमूने भरती हैं, क्या उन्हें, अपनी ज़िम्मेवारी को लेकर, थोड़ी सी भी तमीज़ या अकल है कि, संसद की गारिमा को बरकरार रखते हुए, संसद में क्या-क्या और कैसे-कैसे प्रश्न पूछने चाहियें? शायद नहीं!!!!!! इन सब लोगों को, और इस में विपक्ष के दिग्गज नेताओं भी शामिल हैं, सिवाय अपना गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाने और उसको साफ़ करने के इलावा और कोई काम आता ही नहीं। यह सब, सत्तर साल में विक्सित, मोटी बुद्धी के साथ-साथ मोटी चमड़ी का चमत्कार है। आज की विपक्ष ने जो सत्तर साल तक जंता को धोखे में रखकर अपना उल्लू सीधा किया, उन सब काली कर्तूतों का चिठ्ठा अब खुल कर सामने आरहा है। बेशर्म यह इतने हैं कि, सब कुछ जानते हुए भी, अभी तह सत्ता का मोह नहीं गया।
विपक्ष में रहते हुए, भारत के विकास की तरफ़ ध्यान देने को छोड़ कर, यह जब पाकिस्तान का खुला समर्थन और अपने ही देश को नीचा दिखाने की “देशद्रोही” हरकतें करते हैं, वो बहुत ही लज्जाजनक है।
विपक्षियों को आप जिस भी वर्ग में रखलें लेकिन प्रधान मन्त्री आदरणीय मोदी जी ने अपनी दृड़ और मस्त हाथी की चाल से यह साबित कर दिया है कि “काफ़िला चलता रहता है”।
इस संपादकीय ने न केवल विषय की जटिलता को संतुलित दृष्टिकोण से उजागर किया है, बल्कि सार्वजनिक संवाद को भी समृद्ध बनाया है। तेजेंद्र शर्मा ने साफ-साफ बताया है कि कैसे “स्वीकार” और “इनकार” में बड़ा अंतर है — पहली बार सार्वजनिक मंच पर सेना प्रमुख द्वारा हुए खुलासों को समझना कितना ज़रूरी है। वे ठीक कह रहे हैं कि जब कोई बदलाव होता है, जैसे सीडीएस का विदेश में बोलना, तो उसका सरकार द्वारा संचालित रणनीतिक कारण हो सकता है।
साथ ही, लेख ने यह दिखाया कि राजनीतिक नेतृत्व ने क्यों एक समन्वित और पारदर्शी प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी—विशेषकर अगर जानकारी दी जानी थी तो वो पहले संसद में साझा की जानी चाहिए थी, जिससे घरेलू स्तर पर अधिक सवाल-जवाब हो पाते। सभी तथ्यों के बीच यह संपादकीय इस बहस में राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देने की सलाह देता है।
इन बातों ने इस संपादकीय को प्रभावशाली बनाया है और यह उच्च स्तर का विवेकशील विश्लेषण प्रस्तुत करता है। हाल की बहस और मीडिया की रिपोर्टिंग में अक्सर पक्षपात या प्रतिक्रियात्मक टोन अधिक हो जाता है, लेकिन यहाँ लेखक ने समस्या की जड़ तक जाकर निष्पक्ष दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है।
इस तरह की पत्रकीय व्याख्या हमें जटिल राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों को समझने में मदद करती है—जहाँ राजनीति, सैन्य निर्णय और रणनीतिक संचार जैसे पहलुओं को संतुलित तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
निशिकांत दुबे जी ने सही कटाक्ष किया हमेशा की तरह विचारणीय बेहतरीन संपादकीय
इस बार के अपने संपादकीय में आप ने संसद में आपरेशन सिंदूर को लेकर विभिन्न सांसदों द्वारा किए गए प्रश्नों के उल्लेख के साथ-साथ उन वक्तव्यों पर भी प्रकाश डाला जो इस विषय पर उन लोग ने प्रस्तुत किए।
एक ज्वलंत विषय को जिस समग्रता से आप ने हमारे सामने रखा है, उस के प्रति हमारी सराहना व आभार स्वीकार करें।
धन्यवाद व शुभ कामनांए
दीपक शर्मा
संसद में आपरेशन सिंदूर पर हुई बहस पर बहुत सटीक संपादकीय लिखा है सर आपने….वास्तव में विपक्ष ने अपनी मर्यादा और गरिमा खो दी है….इस मुद्दे पर सब के एकमत होने से देश की अखण्डता को बल मिलता…
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
इस बार के संपादकीय पर क्या ही कहा जाए! समझ में ही नहीं आ रहा कि यह जनता के द्वारा चुने गए सांसद हैं!
काश! संसद भवन में प्रवेश करते समय इनके दिमाग में राष्ट्र के सम्मान की बात होती! अपने उत्तरदायित्व का बोध होता!! सही गलत निर्णय करने की क्षमता होती और काश! काश!!काश!!!कि इनका विवेक जाग्रत होता और ये राष्ट्र की गरिमा का ध्यान रख पाते। काश इनमें इतनी समझने की क्षमता होती कि उनके ऊपर देश के उत्तरदायित्व है। उस गंभीरता को समझ पाते कि जिसके लिए संसद पर चर्चा होने वाली थी!
संसद दुनिया में मजाक बनकर रह गई है
सच में बेहद दुखद है, सब अपनी डफली अपना राग वाला हाल है! तमिल लोग तो हिंदी से नफरत ही करते हैं।और
आपकी दो बातें काबिले गौर लगीं–
*गौरव गोगोई को शायद नहीं मालूम कि यह लंबी दूरी की मिसाइलों का ज़माना है। यह कुश्ती नहीं है, जिसमें पहलवान का लंगोट खींच कर गिराना है।*
संसद में जाने के पहले ऐसे लोग अपने दिमाग को घर में लॉकर में रखकर आते हैं।
दूसरा-
सवाल यह है कि यदि एक भारतीय नेता भारत की संसद में हिंदी में अपना वक्तव्य नहीं दे सकता, तो क्या ब्रिटेन और अमेरिका की संसद में देगा?
विरोध होना चाहिये था अंग्रेजी में बोलने की बात पर।
समझ में नहीं आता कि इन मूर्खताओं पर हँसा जाए या रोया जाए।
वाकई इस समय कांग्रेस की तस्वीर ऐसी है कि रोना ही आता है उस पर। कम से कम देश के मामले में तो एक मत हुआ करें।मुद्दों की नजाकत को समझें।
शुक्रिया आपका तेजेन्द्र जी! संपादकीय के माध्यम से वस्तुस्थिति का आईना निर्भीकता से दिखाने के लिये।
पुरवाई का आभार तो बनता ही है।
आपने आपरेशन सिंदूर पर संसद में बहस को बड़े तरतीव से विवेचित किया है। धन्यवाद
एक बार फिर आपरेशन सिंदूर चर्चा में है।भारतीय जवानों देशभक्तों की देश के प्रति निष्ठा और समर्पण दांव पर लगा है। महान भारतीय संसद और सत्ता के गलियारों में बेतुके मुद्दे और प्रश्न उछाले गये।आतंकवाद पर न जाने कितनी कहानियाँ गढी जाती हैं,उनकी सच्चाई पर बेतुकी बयान बाजी अब तो सुनने की भी इच्छा नहीं होती।
आज के संपादकीय में बहुत सटीक और सारगर्भित प्रसंगों की चर्चा नै राजनीतिक दलों और उनकी नीतियों तथा वैश्विक दखलंदाजी पर भी रोशनी डाली है। क्या भारत की.संसद की कोई सर्वमान्य भाषा भी है?विविध भाषा भाषी देव में हिन्दी में बोलना भी अब एक अपराध होता जा रहा है।जैसा कि आदरणीय तेजेन्द्र भाई ने लिखा है-
सवाल यह है कि यदि एक भारतीय नेता भारत की संसद में हिंदी में अपना वक्तव्य नहीं दे सकता, तो क्या ब्रिटेन और अमेरिका की संसद में देगा?
बहुत सुंदर, सार्थक संपादकीय और विचारणीय भी।सचमुच ये मुद्दे दिग्भ्रमित करते.हैं। संपादकीय का इस बार का शीर्षक भी सटीक बन पडा है।एक बार पुन: हार्दिक बधाई, शुभ कामनाएं भाई।हृदय से आभार सत्य को जानने समझने का दृष्टिकोण सामने रखा आपने।
सादर प्रणाम।
।
सदैव की भांति निष्पक्ष, विषय की विस्तृत व्याख्या एवं सारगर्भित जानकारी हार्दिक बधाई.
उम्दा, सारगर्भित सम्पादकीय। संसद की कार्यवाही का सजीव चित्रण है। सुंदर विश्लेषण।मुझे राजनीति कभी समझ नहीं आई, पर आपके लेखन में इतनी स्पष्टता है कि सब रुचिकर लगा। विपक्षी दल मोदी जी की कमियों को निकालने की आड़ में अपना ही मजाक उड़वा रहे हैं।ईश्वर सबको सद्बुद्धि दे ताकि वे ओछी सोच से ऊपर उठकर देश के बारे में सोचें।
इस बार का संपादकीय पढ़ते हुए ऐसा लग रहा था जैसे हमारे ही विचारों को आपकी कलम ने शब्दों में ढाल दिया हो। इस संपादकीय के एक-एक शब्दों से हम सहमति की सीमा के पार तक सहमत हैं। आज का विपक्ष स्थिति को समझने और उसके अनुरूप व्यवहार करने के बजाय अपनी मूर्खता के प्रदर्शन में लगा रहता है जो देश के लिए घातक साबित हो सकता है। गोगोई ,जया बच्चन और प्रियंका गांधी जैसे लोगों की बातें सुनकर बहुत कोफ़्त होती है । राहुल गांधी की गैरज़िम्मेदाराना बातें जिसमें वह भारत की अर्थव्यवस्था को डेड बोलता है , सुनकर उसकी परवरिश पर गुस्सा आता है। सोचने वाली बात यह है कि नेता प्रतिपक्ष की इन बातों को सुनकर उन्हीं की पार्टी के उन लोगों के मन में ,जो थोड़ी सी भी संतुलित सोच रखते हैं ,क्या गुजरती होगी। मोदी जी इतनी गंभीरता और शालीनता से इन लोगों की बातों का जवाब देते हैं इसके लिए तो उन्हें सलामी देनी बनती है।
चिंता का विषय यह है कि विपक्ष के इस पागलपन का इलाज कब और कैसे होगा? किसी संपादकीय में इसका उपाय भी अवश्य दीजिएगा सर !
इस विचारोत्तेजक संपादकीय में बेबाकी और ईमानदारी से अपनी बात रखने के लिए आपको बहुत बधाई और साधुवाद!
आपका संपादकीय विशुद्ध एकपक्षीय है। केवल संघ और भाजपा की स्क्रिप्ट का इसे बेहतर रूप कहा जा सकता है। संसद में क्या होता है, यह सब प्रोसीडिंग में लाइव रहता है। अब दक्षिण के नेताओं को भी हिंदी बोलने में समस्या नहीं है। लेकिन हिंदी जगत के दंभी लोगों के कारण ही तमिलनाडु के लोग अभी भी हिंदी स्वीकार नहीं कर रहे हैं। आप लंदन में अंग्रेजों को जबरदस्ती हिंदी स्वीकार करा लेंगे क्या। तमिलनाडु में बीते दशको में हिंदी लेखकों के प्रयासो से एक बेहतर वातावरण बना था और हिंदी विरोधी आंदोलन जैसी चीजे थम गयी थी। लेकिन आज जो हो रहा है वह वही हो रहा है जिसकी भविष्यवाणी कवि गुरु रवींद्र नाथ टैगोर ने की थी। संसद और राजनीति पर आप कुछ भी लिखने को आजाद हैं। लेकिन भारत की संसद के दोनों सदनों में 22 अधिसूचित भाषाओं में बोलने के लिए सांसदों को आजादी है। जो हिंदी नहीं जानता उसके लिए अंग्रेजी में अनुवाद की व्यवस्था भी है। सच्चाई यह है कि ऑपरेशन सिंदूर से निकले कई सवाल भारतीय जनमानस में विद्यमान हैं। उनका जवाब प्रवासी भारतीयों को भले नहीं चाहिए हो लेकिन सौ फीसदी भारतीयों को चाहिए ही। सरकार के पास विकल्प रहा है कि साफगोई से उन सवालों का जवाब दे दिया जाता, लेकिन उसकी जलेबी बना दी गयी। अभी भी समय है जवाब देने का। लेकिन जवाब देने की जगह नेता प्रतिपक्ष की छवि धूमिल करने में ही सत्ता पक्ष और उसके भक्तों की अधिक रूचि है। लेखक और पत्रकार तबका तो खैर इन दिनों चारण युग से भी आने निकलने की होड़ में है। इस विषय पर संसद के दोनों सदनों की चर्चा सुनने के लिए थोड़ा समय निकालेंगे तो आपको लगेगा कि सच्चाई उशसे इतर है जो आपने संपादकीय में लिखी है।
पुनश्च सेना की आलोचना की बात केवल भाजपा और संघ परिवार के लोग कह रहे हैं। विपक्षी नेताओं के किसी भी भाषण में अगर आपने सेना की आलोचना सुनी हो तो उसकी नाम लिख कर संपादकीय लिखिए। मेरी निगाह में यह संपादकीय पांचजन्य में छपता तो बेहतर था।
बहुत ही रोचक विषय। कॉंग्रेस के दोगलेपन ने संसद की गरिमा को हमेशा से ठेस पहुंचाई है। सिंदूर की परंपरा तो सिंधु घाटी की सभ्यता से जुड़ा है और इसका वर्णन शिव पुराण और रामायण में भी है। फ़िल्म साहब बीवी गुलाम में सिंदूर का महत्व मीना कुमारी जी ने अपने दमदार अभिनय द्वारा समझाया है।
अत्यंत सचिंतित और विचारपरक संपादकीय के लिए आपको साधुवाद। यह सच है कि वर्तमान भारतीय राजनीति में नीचे गिरने की जैसे होड़ लगी है। इसमें पक्ष – विपक्ष सब शामिल हैं. ‘तोड़ी दोनों ने मर्यादा…’। पर सबसे बुरा हाल विपक्ष का है, जैसे वे समझ ही नहीं पा रहे हैं कि कहना क्या है? सरकार की नीतियों का विरोध विपक्ष का काम है पर वे सरकार की नीतियों का विरोध करते कब देश का विरोध करने लग रहे हैं, शायद उनको मालूम ही नहीं है। आपरेशन सिंदूर पर विपक्ष को पाकिस्तान और ट्रम्प ज्यादा विश्वसनीय लग रहे हैं, वे नहीं जानते हैं कि अपनी इस समझ के चलते वे इस संदर्भ में अपने ही देश का अपमान कर रहे हैं। राहुल गाँधी तो अभी भी अपनी राजनीतिक जमीन को खोजने के लिए तरह-तरह के प्रयोग ही कर रहे हैं. ट्रम्प जब मोदी को अपना दोस्त कहते थे तब वे ट्रम्प को पसंद नहीं करते थे, और अब ट्रम्प भारत विरोधी रुख अख्तियार कर लिए हैं तो वही विपक्ष को खूब पसंद आ रहे हैं।
भारतीय राजनीति के इस समकालीन पतन को आपने खूब गहराई से पहचाना, परखा और आईना दिखाया है। पर मुश्किल यह है कि हमारे तथाकथित नेता अब ऐसा कोई आईना नहीं देखते जिसमें उनका वास्तविक चेहरा नज़र आता हो। आपने संसद में नेताओं के आचरण पर उचित टिप्पणी की है। ऐसा व्यवहार जिसे देखकर शर्म आती है।
पुरवाई के माध्यम से आप खरी-खरी कह रहे हैं, यह सुखद है। उम्मीद यही है कि आपके सच और साहस कि कोई ‘पुरवाई’ संसद में भी पहुँचे।
आपका बहुत आभार।