वो शांत है, सरल है
वो सागर नहीं है
इसलिए इस में कोई
लहर नहीं आती!
न ये कल-कल का नाद
करती कोई नदी है
अनादि काल से समय के
अस्तित्व खोने तक ,
ये सीमा से परे
गहरी अनंत झील है
इस में कोई लहर नहीं आती।
न किसी पक्षी चहचहाट
न जीवन के ,
न अस्तित्व के
कोई पद चिन्ह
चारों ओर कुछ है तो
वो है अनंत तक पसरा
मौन, मौन और मौन
और कुछ नहीं…
समय यहां स्वयं अर्थहीन है
न कुछ घटता है न बढ़ता है
न पनपता है न नष्ट होता है
असीम शांति ही उसका स्वरूप है
जीवन की ये उलझी , कांटो से भरी
पथरीली पगडंडियां हमें उसी ओर ले जाती है…
वो असीम है ,अकाल है ,अकारण है, अबूझी है
शांत है, मौन है
किसी स्थिति प्रज्ञ सी मुक्त है
सारे झंझावात , चक्रवात निस्तेज हो जाते है
सब उस में समाहित हो अपना
अस्तित्व खोते जाते है
यश-अपयश , ईर्ष्या-द्वेष, हार-जीत
सब अर्थहीन हो जाते है…
रिश्ते भी इसकी आगोश में
अर्थहीन हो जाते हैं…
न मै, न तू , न ही कोई और
वो सम रूप ही स्वीकार करती है
अकेले ही जाना है
होने का बोध
यही छूट जाना है
दुख संताप सारे हर लेती है
डरो नहीं , भय से न हो कंपित
इसकी गोद में असीम शांती है…
न कुछ पाने की इच्छा
न कुछ खोने का भय
देखो ! जो जमीन में गाड़ा जा रहा है
कभी वहीं मेरी पहचान थी
जो उस चिता में धूं-धूं जल रहा है ना
वही संसार में मेरा बोध था
सारे संबंध उसी से थे…
अब मेरी कोई पहचान नहीं
न सुख न दुख ,
बस इसकी गोद में
सब कुछ शांत है

