Wednesday, February 11, 2026
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संपादकीय – पाकिस्तान में ट्रेन-जैक

रेलगाड़ी को बंधक बना लेने के बाद बलोच लिबरेशन आर्मी ने पाकिस्तान सरकार को 48 घंटे का समय दिया था कि अगर सभी बलूच राजनीतिक कैदियों और जबरन ग़ायब किए गए लोगों को रिहा नहीं किया गया, तो सभी बंधकों को मार दिया जाएगा। पाकिस्तान की सेना या सरकार को 26 साल पहले इंडियन एअरलाइन्स के यात्रियों को बंघक बनाने का अनुभव तो है, मगर बंधकों को छुड़ाने का कोई अनुभव नहीं है। पाकिस्तान सेना के हेलिकॉप्टर हवा में उड़ान भरते दिखाई दिये। वहां की एअर फ़ोर्स ने एफ.-16 विमान भी तैयार कर लिये। मगर इन से बम्बारी तभी की जा सकती है, यदि आप फ़ैसला कर लें कि बंधकों को छुड़ाना मुख्य उद्देश्य नहीं है बल्कि बलोच लिब्रेशन आर्मी के लड़ाकों को मार गिराना लक्ष्य है।

इस सप्ताह पाकिस्तान को लेकर इतना कुछ घटित हुआ है कि मुझे तय करने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है कि मैं किस मुद्दे पर इस बार का संपादकीय लिखूं। तीनों घटनाएं ऐसी हैं कि उन पर स्वतन्त्र संपादकीय लिखे जा सकते हैं। मगर इस तरह तो पुरवाई पाकिस्तान केन्द्रित पत्रिका बन कर रह जाएगी। ज़ाहिर है कि हमारे पाठक इसके लिये तैयार नहीं होंगे।
पहला समाचार तो पाकिस्तान के वरिष्ठ क्रिकेटरों की तरफ़ से मिला। दुबई में जब भारत ने चैंपियन्स ट्रॉफ़ी जीती तो भारत के महान क्रिकेटर विराट कोहली ने अपने साथी मोहम्मद शमी की माँ के पाँव छूकर उन्हें सम्मान दिया और माँ ने विराट को आशीर्वाद दिया। इस पर पाकिस्तान के चंद पूर्व क्रिकेटरों – इंज़माम-उल-हक़ और शाहिद आफ़रीदी – ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ऐसा करना इस्लाम के विरुद्ध है। इस्लाम में अल्लाह के सिवाय किसी और के सामने सिर झुकाने की अनुमति नहीं है। शमी और उसकी माँ को चाहिये था कि वे कोहली को ऐसा करने से रोकें। इस विषय पर एक संपूर्ण संपादकीय लिखा जा सकता है। पाकिस्तानी क्रिकेटरों ने तथाकथित गंगा-जमुनी तहज़ीब की धज्जियां उड़ा दीं। नकारात्मक लोगों की विशेषता यही है कि वे किसी सकारात्मक काम में भी मीन-मेख निकाल कर स्थिति को विवादास्पद बना सकते हैं।
दूसरा समाचार अमरीका के शहर लॉस-एंजलिस से है। यह समाचार पाकिस्तान की एक देश के तौर पर हुई बेइज्ज़ती का द्योतक है। हुआ कुछ यूं कि एक रिपोर्ट के अनुसार, तुर्कमेनिस्तान में पाकिस्तान के राजदूत के.के. अहसान वगान को अमेरिका से डिपोर्ट कर दिया गया। यह घटना लॉस-एंजलिस एयरपोर्ट की बताई जा रही है। आमतौर पर विश्व में कहीं भी ऐसा समाचार देखने को नहीं मिलता कि किसी देश के डिप्लोमैंट को कोई दूसरा देश प्रवेश ना करने दे। 
तुर्कमेनिस्तान में पाकिस्तान के राजदूत के.के. अहसान वगान लंबे समय से पाकिस्तान की विदेश सेवा से जुड़े हुए हैं। अपने करियर के दौरान उन्होंने काठमांडू में पाकिस्तानी दूतावास में सेकंड सेक्रेटरी के रूप में सेवा दी है। इसके अलावा, वे लॉस एंजलिस स्थित पाकिस्तानी वाणिज्य दूतावास में डिप्टी कॉन्सुल जनरल, मस्कट में पाकिस्तान के राजदूत (एंबेसडर) और नाइजर स्थित पाकिस्तानी दूतावास में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। 
मगर पाकिस्तान में सबसे बड़ा धमाका किया बलोच लिब्रेशन आर्मी ने। उन्होंने तो पाकिस्तान की एक पैसेंजर गाड़ी को ही हाईजैक कर लिया। मैं स्वयं 26 वर्षों से ब्रिटिश रेलवे में कार्यरत हूं। मैं अच्छी तरह समझ सकता हूं कि किसी भी रेलगाड़ी को बंधक बना पाना कोई आसान काम नहीं है। ऐसे ऑपरेशन की तैयारी करने में कई महीने लग जाते हैं और इसे अंजाम देने के लिये बहुत से लड़ाकों की ज़रूरत पड़ती है। 
घटना कुछ इस प्रकार है कि मंगलवार 11 मार्च को क्वेटा से पेशावर जा रही जफ़र एक्सप्रेस को हथियारबंद बलूच लड़ाकों ने हाईजैक कर था। ट्रेन में 440 यात्री थे। बुरी तरह घायल हुए ट्रेन के ड्राइवर अमजद ने बताया कि हमलावरों ने रेलगाड़ी के इंजन के पास एक विस्फोटक ब्लास्ट किया, जिससे बोगियां पटरी से उतर गईं। जैसे ट्रेन रुकी बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) के लड़ाकों ने हमला कर दिया। लड़ाके ट्रेन की खिड़कियां तोड़कर ट्रेन में दाखिल हुए।
जफ़र एक्सप्रेस मंगलवार सुबह 9 बजे क्वेटा से पेशावर के लिए चली थी। इसके सिबि पहुंचने का समय दोपहर के 1.30 बजे था। इससे पहले ही दोपहर करीब एक बजे बलूचिस्तान के बोलान ज़िले के माशकाफ़ इलाके में बलूच लिबरेशन आर्मी ने गुडालार और पीरू कुनरी के बीच इस हमले को अंजाम दिया। यह पहाड़ी इलाका है, जहां 17 सुरंगें हैं, इसके चलते ट्रेन को धीमी स्पीड पर चलाना पड़ता है। इसका फायदा उठाकर BLA ने जफ़र एक्सप्रेस पर हमला किया।
इस ट्रेन में सुरक्षाबल, पुलिस और आई.एस.आई. के एजेंट्स सफर कर रहे थे। सभी पंजाब जा रहे थे। इन्होंने बलोच लिब्रेशन आर्मी के हमले का जवाब दिया, लेकिन बी.एल.ए. के लड़ाकों ने रेलगाड़ी पर कब्ज़ा कर लिया। इस दौरान कई सुरक्षाकर्मी मारे गए।
इस हमले को पाकिस्तान की आंतरिक इंटेलिजेंस असफलता का नमूना माना जा रहा है। एक इतना बड़ा हादसा हो गया और पाकिस्तान की महान इंटर सर्विस इंटेलीजेंस (आईएसआई) को इसकी भनक तक नहीं पड़ी। पुरवाई के पाठकों को बता दें कि आई.एस.आई. पाकिस्तान की सबसे बड़ी इंटेलीजेंस (गुप्तचर) सेवा है। 1950 में पूरे पाकिस्तान की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा का जिम्मा आईएसआई को सौंप दिया गया था। पाकिस्तान सरकार और सेना दोनों के लिये यह एक अप्रत्याशित घटना थी और उनकी प्रतिक्रिया हमेशा की तरह ढुलमुल सी रही। 
ना तो पाकिस्तान की सेना और ना ही सरकार बलोच लिब्रेशन आर्मी से बात करने को आगे आई। यह जानना आवश्यक है कि बलोच लिब्रेशन आर्मी बलोचिस्तान को एक अलग देश का दर्जा दिलवाने की एक लंबी लड़ाई लड़ रही है। रेलगाड़ी को बंधक बना लेने के बाद बलोच लिबरेशन आर्मी ने पाकिस्तान सरकार को 48 घंटे का समय दिया था कि अगर सभी बलूच राजनीतिक कैदियों और जबरन ग़ायब किए गए लोगों को रिहा नहीं किया गया, तो सभी बंधकों को मार दिया जाएगा।
पाकिस्तान की सेना या सरकार को 26 साल पहले इंडियन एअरलाइन्स के यात्रियों को बंघक बनाने का अनुभव तो है, मगर बंधकों को छुड़ाने का कोई अनुभव नहीं है। पाकिस्तान सेना के हेलिकॉप्टर हवा में उड़ान भरते दिखाई दिये। वहां की एअर फ़ोर्स ने एफ.-16 विमान भी तैयार कर लिये। मगर इन से बम्बारी तभी की जा सकती है, यदि आप फ़ैसला कर लें कि बंधकों को छुड़ाना मुख्य उद्देश्य नहीं है बल्कि बलोच लिब्रेशन आर्मी के लड़ाकों को मार गिराना लक्ष्य है। 
पाकिस्तान रेलवे के अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की है कि बलूचिस्तान के बोलन भेजने के लिए 200 से ज्यादा ताबूत क्वेटा लाए गए हैं। कहा जा रहा है कि अब तक पाकिस्तान की सेना सभी बंधकों को नहीं छुड़ा पाई है लेकिन पाकिस्तान दावा कर रहा है कि क्वेटा भेजे गए ये ताबूत प्रोटोकॉल के तहत भेजे गए हैं, ताकि बुरी स्थिति में इनका इस्तेमाल किया जा सके।
पाकिस्तानी मीडिया ने कहा था कि 155 यात्रियों को अब तक छुड़ा लिया गया है और बलोच लिबरेशन आर्मी के 27 लोग मारे गए हैं। हालांकि, अब भी 100 से ज्यादा यात्री बीएलए बंदूकधारियों के कब्जे में हैं।वहीं बीएलए ने 30 पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने का दावा किया था लेकिन फिलहाल कोई आंकड़े जारी नहीं किए गए हैं।
रेलगाड़ी से बच कर आए एक बंधक ने पाकिस्तान सरकार की पोल खोलते हुए बताया कि बलोच लड़ाकों ने बुज़ुर्गों, बच्चों और औरतों को ख़ुद ही रिहा किया। जबकि पाकिस्तान सरकार और सेना इसके विपरीत अनाप-शनाप दावे कर रही है। 
शुरू-शुरू में तो पाकिस्तानी सेना बलोचों के साथ उलझी रही, मगर जल्दी ही उन्होंने अपनी आवाम को बरगलाने के लिये इस घटना की ज़िम्मेदारी भारत पर डालनी शुरू कर दी। डीजी आईएसपीआर लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ़ चौधरी ने बलोचिस्तान में जाफ़र एक्सप्रेस पर हुए हमले को लेकर बयान दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत बलोचिस्तान में आतंकवादी गतिविधियों को प्रायोजित कर रहा है। 
बलोचिस्तान के मुख्यमंत्री सरफराज़ बुगती के साथ लेफ़्टिनेंट जनरल चौधरी ने शुक्रवार को ट्रेन हाईजैक मामले पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जहां उन्होंने यह बयान दिया। इस दौरान उन्होंने एक तरफ पाकिस्तानी सेना की सराहना की, तो दूसरी ओर इस पूरे घटनाक्रम के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया।
पाकिस्तानी सेना के अधिकारी यहीं नहीं रुके। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि जफ़र एक्सप्रेस हमले को लेकर भारत में एआई का इस्तेमाल कर फ़र्ज़ी वीडियो तैयार किए गए। इन वीडियो की मदद से भारतीय मीडिया ने स्थिति को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हुए दुष्प्रचार फैलाया। उन्होंने कहा, “एक ओर हमारा पड़ोसी देश बलूचिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है, तो दूसरी ओर उनका मीडिया पाकिस्तान को बदनाम करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है।”
पाकिस्तानी सेना के आरोप पर जवाब देते हुए भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “ हम पाकिस्तान की तरफ से लगाए गए निराधार आरोपों को दृढ़ता से ख़ारिज करते हैं। पूरी दुनिया जानती है कि वैश्विक आतंकवाद का केंद्र कहां है। पाकिस्तान को अपनी आंतरिक समस्याओं और विफलताओं के लिए दूसरों पर उंगली उठाने और दोष मढ़ने के बजाय अपने अंदर झांकना चाहिए।”
समस्या यह है कि कहीं से भी कोई आधिकारिक और सच्चे समाचार नहीं मिल पा रहे हैं। सबको कयास लगाने पड़ रहे हैं कि तथाकथित बयानों के बीच सच्चाई कहा छिपी बैठी है। मगर विश्व भर के मानवाधिकारों के पैरोकार ना जाने क्यों बलोचिस्तान के हालात पर चुप्पी साधे बैठे हैं। बलोच स्वतंत्रता सेनानी एक साथ पाकिस्तान और चीन के साथ लोहा ले रहे हैं। और पाकिस्तान हमेशा की तरह भारत और अफ़ग़ानिस्तान पर आरोप मढ़ रहा है। समस्या का हल जितनी जल्दी निकल सके दक्षिण एशिया में शांति के लिये बेहतर होगा।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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49 टिप्पणी

  1. पुरवाई का यह संपादकीय – पाकिस्तान में ट्रेन-जैक पर केंद्रित है। बलूच लिबरेशन आर्मी ने इसे बंधक बनाकर अपनी शर्तें रखी थी। इसमें 220 पाकिस्तानी फौजियों को लिबरेशन आर्मी ने मार दिया है। यह भी बताया जा रहा है कि बलूच लिबरेशन आर्मी ने महिला बच्चों और बूढ़ों को छोड़ दिया है।पाकिस्तान के साथ कुछ भी भी हो जाए वह कभी सच न बताएगा। वैसे इसे आतंकी घटना ही कहा जाएगा।लेकिन… लेकिन इसका जिम्मेदार खुद पाकिस्तान है। बलूचों पर पाकिस्तानी सेना की क्रूरता ने ऐसे हालात क्रियेट किए हैं। उसने न जाने कितने बलूचों को घर से उठाकर गायब कर दिया हैं। उनके परिजन शव मांगते रहे पर उन्हें शव नसीब न हुए। दूसरी बात बलूचिस्तान पाकिस्तान द्वारा जबरन कब्जाया हुआ है। बलूचिस्तान स्वतंत्र देश के लिए तड़प रहा है। यह तो समय बताएगा कि आगे क्या होगा।
    रही भारत पर आरोप की बात तो जो जैसा होता है उसे दूसरा वैसा ही दिखाई देता है। भारत सरकार ने जवाब दे दिया है।
    जिस देश की नींव झूठ की बुनियाद पर रखी हो उस देश को कोई गंभीरता से नहीं लेता है। वहां की अधिकांश जनता भी उसी तरह की है। बड़बोलेपन में उनकी कोई सानी नहीं है।
    धर्म को मानना बुरा नहीं है। लेकिन हर बात में धर्म को बीच में लाना ठीक नहीं है। खासकर खेल में तो बिलकुल नहीं। आप धर्म बदल सकते हैं, संस्कृति नहीं। संस्कृति उस क्षेत्र के मानव के खून में दौड़ती होती है। और संस्कृति उस क्षेत्र की भौगोलिक रचना से जन्मती है। क्रिकेटर विराट कोहली द्वारा मुहम्मद शमी की मां के पैर छूना भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। इस पर बखेड़ा करना नासमझी कही जाएगी।
    वैसे पाकिस्तान को कोई सीरियसली नहीं लेता है। तेजेन्द्र सर जी आपने संपादकीय का विषय बना दिया तो ठीक ही है। वरना पूरा पाकिस्तान यूट्यूबरों के हवाले हो चुका है। जिसमें मनोरंजन भी है, वहां के लोगों की बेवकूफियां है। हां कुछ यूट्यूबर सच्चाई का आइना भी दिखा रहे हैं। मुझे नहीं लगता है कि वहां के लोग कुछ समझेंगे। ग्वार पाठा पर कोई रंग चढ़ता कहां है।

    • भाई लखनलाल पाल जी, आप हमेशा हर संपादकीय की गहराई से पड़ताल करते हैं और एक सारगर्भित टिप्पणी से पाठकों को संपादकीय के सही अर्थ समझा देते हैं। हार्दिक आभार।

  2. पाकिस्तान की जफ़र एक्सप्रेस को हथियारबंद बलूच लड़ाकों ने हाईजैक करना जिसमें 440 यात्री थे, पाकिस्तान की अंदरूनी हालात को दर्शाता है। या कोई सामान्य घटना नहीं है किन्तु दहशत फैलाने या अपना लक्ष्य हासिल करने के निर्दोषों में भय पैदा करने की जघन्य और निंदनीय घटना है जिसकी जितनी भी निंदा की जाये कम ही है। वैसे भी जो देश आतंकवादियों को पालता है, उसके लिए यह घटना सामान्य ही है। दुःख तो सामान्य जनता के लिए सोचकर होता है जो इस घटना में मारे गये या घायल हुए।
    यही हाल भारत में नक्सलवाद प्रभावित राज्यों का है। ज़ब आदेश जी झारखण्ड में पदासीन थे तब वहां के कुछ इलाकों में नक्सलियों का डर इतना था कि सामान्य नागरिक विशेषतया दूसरे प्रांतों से आये लोग डर के साये में ही जीते थे। झारखंड में ट्रेन हाईजैक की घटना 2009 में भी हुई थी, जब भाकपा माओवादी संगठन ने लातेहार जिले के हेहेगड़ा स्टेशन पर बीडीएम सवारी ट्रेन को हाईजैक कर लिया था जो अपने नेता की रिहाई की मांग कर रहे थे।

    यद्यपि अब नक्सलवाद दम तोड़ रहा है किन्तु फिर भी आम जनमानस में अभी भी ख़ौफ़ है।
    महत्वपूर्ण संपादकीय के लिए साधुवाद।

    • सुधा जी नकस्लवादियों का आतंकवाद एक अलग समस्या थी। मगर बलूच लड़ाके तो स्वतंत्रता संग्राम लड़ रहे हैं। आपकी टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।

  3. पाकिस्तान एक देश के नाम फेल कंट्री है, उसको केवल गर्त में ही जाना है इसके लिए वे वैसी ही कोशिश कर रहे हैँ जैसे भारत में राहुल गांधी कांग्रेस को अपनी हरकतों से गर्त में लिए जा रहे हैं, जहाँ तक मानवाधिकारों की बात है तो जिन्हें बांग्लादेश में खुलेआम हुआ नरसंहार नहीं दिखा, रेप और हटाएं नहीं दिखीं, उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है?

  4. पाकिस्तान ने विगत ७५ वर्षों में जो बोया था, उसकी सज़ा उसे भविष्य में भी मिलेगी इसके प्रति कोई आशंका नहीं है.

  5. “सांप पालने वाले भूल जाते हैं कि साँप पलटकर उनको काट भी सकते हैं । पूरी दुनिया मे अनरेस्ट करने वाले लोग आज अपने मुल्क का मामूली विद्रोह नहीं सम्भाल पा रहे हैं । भारत मे कुछ मूर्खाधिराज इंडियन टीम को पाकिस्तान भेजने की बात कर रहे थे ,इतने खतरनाक हालात में टीम को न भेजने का निर्णय सही था । पाकिस्तान के अभी बहुत बुरे दिन आएंगे क्योंकि नफरत, झूठ,बारूद की फसल जो बोई है वही काटेंगे। इंजमाम को मोहम्मद शमी पहले ही कार्टून बता चुके हैं ।तो बाकी क्या ही कहना । बढ़िया संपादकीय है ।

  6. पाकिस्तान आर्मी ने बलोच नागरिकों को बहुत अमानवीय यातनाएं दी हैं। अब बलोचिस्तान का समय है। वे पाकिस्तान को सबक सिखाएंगे।
    महत्वपूर्ण संपादकीय लिखने के लिए आपका धन्यवाद।

  7. पूर्व संपादकीयों की तरह यह भी बहुत धमाके दार संपादकीय है । आप समस्या की जड़ तक जाते हैं फिर चाणक्य की तरह उसका हल बताते हैं। बधाई आदरणीय!

  8. पाकिस्तान को तबाह किया है उसकी फौज ने, गधे बेचकर देश चलाने वाले नेता और मदरसिया छाप मूर्ख मौलवियों ने। बाकी कसर पूरी कर रहे हैं आतंकवादी। बलूची कुछ के लिए आतंकवादी हैं और कुछ के लिए स्वतंत्र सेनानी। इस पर सबकी अपनी अपनी राय है। हर बार की तरह एक बेहतरीन संपादकीय, जिसपर विस्तार से चर्चा करना रोचक रहेगा।

    • बलूचिस्तान तो शुरू से ही पाकिस्तान से अलग राष्ट्र होना चाहता था। अब यह मुहिम जो़र पकड़ रही है।

  9. ट्रेन में कुछ ख़ास किस्म के लोग क्या कर सकते हैं, वो 2002 में गोधरा कांड से ही पता चल गया था, विस्तार अभी ‘साबरमती रिपोर्ट’ (zee 5) में देखा।
    कहते हैं जो बोया वो काटना पड़ता है, पाकिस्तान के लिए फसल तैयार है…
    संक्षेप में पड़ोसी मुल्क के कई कोण दिखा दिए, ज्ञानवर्धक संपादकीय के लिए हार्दिक आभार एवं बधाई।

  10. आदरणीय संपादक महोदय, इस बार के संपादकीय में आपने पाकिस्तान के पड़ोसी देशों के साथ संबंधों के विषय में चर्चा की है । पाकिस्तान का व्यवहार चाहे वह भारत हो , अफ़ग़ानिस्तान हो या बलोचिस्तान सभी के साथ अमानवीय ही रहा है।
    पाकिस्तान का नाम विश्व में आतंकवाद के लिए जाना जाता है। बलोच के लोगों के साथ पाकिस्तान में जो किया या कर रहा है उसे सब देख रहें है। मुझे नहीं लगता की बलोच पाकिस्तान के साथ भी वही व्यवहार करेगा जो पाकिस्तान ने उनके साथ किया॥

  11. यह संपादकीय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल खबरों तक सीमित नहीं, बल्कि घटनाओं के पीछे की सच्चाई को सामने लाने का प्रयास है। बलूचिस्तान, जो प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है, वहां के लोगों की गरीबी और उनके साथ किए जाने वाले अत्याचारों की चर्चा अक्सर मुख्यधारा की मीडिया में नहीं होती। आपने बड़ी स्पष्टता से बताया है कि कैसे पाकिस्तान सरकार की नीतियां और बलूच लोगों के प्रति उसका रवैया इस संघर्ष को और भड़का रहा है।

    पढ़ते हुए मुझे यह एहसास हुआ कि ट्रेन हाइजैक जैसी घटनाएं केवल आतंकवाद का नतीजा नहीं होतीं, बल्कि इसके पीछे वर्षों की उपेक्षा और असंतोष छिपा होता है। बलूच विद्रोही अगर हथियार उठा रहे हैं तो इसके पीछे उनके संघर्ष की अनदेखी भी एक बड़ा कारण है। संपादकीय का यह पक्ष विचार करने पर मजबूर करता है कि क्या समस्या का हल सिर्फ सैन्य बल प्रयोग से हो सकता है, या फिर सरकार को अपनी नीतियों में बदलाव लाने की जरूरत है।

    • अमित भाई आपने संपादकीय की जढ़ तक पहुंच कर मुद्दे को पकड़ा है। आपका हार्दिक धन्यवाद।

  12. एक क्रूर राष्ट्र को भी क्रूरता का स्वाद चखना ही पड़ता है।विश्वासघात करनेवाले देश को अब सही सबक मिलने आरम्भ हुए हैं।
    हाईजैकिंग का बहुत शौक रहा है पाकिस्तान को तो उनको वही देखने को मिल भी रहा है।
    पाकिस्तान से सम्बंधित , सिलसिलेवार तीनो घटनाओं ने पाकिस्तान की रही बची नक़ाब भी उलट दी।इनकी देश की किसी महिला को मिला सम्मान भी हज़म नहीं हुआ इनको।सिर्फ नुक्स ही निकालना जिसकी आदत हो गयी है वो नकारात्मक देश हर घटना के लिये भारत को ही जिम्मेदार कहेगा।यही एक ढाल राह गयी है अपनी असफलताओं से बचने हेतु।
    तेजेन्द्र जी को नित नवीन समाचार ,विश्लेषण सहित बताने के लिये साधुवाद।

    • आपकी यह सार्थक और सारगर्भित टिप्पणी हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण है निवेदिता जी। हार्दिक आभार।

  13. आदरणीय इतना सुंदर व सटीक संपादकीय लिखने के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई

    यह संपादकीय पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है और यह दिखाता है कि किस प्रकार पाकिस्तान की सरकार और सेना आंतरिक संकटों को हल करने में विफल रही है। साथ ही, यह पश्चिमी मीडिया और मानवाधिकार संगठनों की निष्क्रियता पर भी प्रश्न उठाता है।
    इस लेख की भाषा प्रभावशाली, तर्कसंगत और धारदार है, जो इसे अत्यंत पठनीय और प्रभावशाली बनाती है। यह न केवल एक पत्रकारिता लेख है, बल्कि दक्षिण एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति का एक महत्वपूर्ण दर्पण भी है।

    • डॉ. सुनीता आपको संपादकीय पसंद आया और आपने उसमें से कुछ ज्वलंत सवाल भी उठाए, हमारे पाठक इससे अवश्य कुछ नया ग्रहण करेंगे। आपको संपादकीय की भाषा और तर्क पसंद आते हैं, उसके लिये विशेष धन्यवाद।

  14. आपके पाकिस्तान केंद्रित संपादकीय को पढ़कर स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि केवल मजहब के अप्राकृतिक आधार पर बने देश की ऐसी ही हालत होनी थी। मजहब मनुष्य को जीवन पद्धति तो दे सकता है लेकिन राष्ट्रीयता नहीं दे सकता। इसीलिए ऐसे देश कभी भाषा के आधार पर बांग्लादेश बनते हैं और लगभग पचास साल बाद फिर से कट्टरता की अंधी कुहेलिका में खोते हैं या फिर अपनी सांस्कृतिक पहचान के लिए बलोचों की भांति संघर्ष करने को विवश होते हैं। वास्तव में पाकिस्तान एक देश है ही नहीं, बल्कि वह एक शिया जिन्ना की नासमझी, रहमत अली की कट्टरपंथी सोच और पंजाब बिहार उत्तर प्रदेश के कुछ मजहबी धर्मांधों द्वारा पैदा किया गया अवास्तविक मुल्क है, जो तथाकथित हिन्दू भारत के विरोध और दुनिया भर के मुसलमानों के साथ दिखने की मूर्खतापूर्ण सोच पर आधारित है, जिसकी भावनाएं शमी की मां के विराट कोहली द्वारा पैर छू लेने भर से आहत हो जाया करती हैं, लेकिन पंजाबी पाकिस्तानियों द्वारा सिंध, बलूचिस्तान और नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में किए जा रहे अत्याचारों पर मुँह सिलकर बैठ जाती हैं। बलूचिस्तान की अपार प्राकृतिक संपदा का दोहन पाकिस्तान चीन के साथ मिलकर वर्षों से कर रहा है लेकिन उनके अधिकारों की मांग करने पर उन्हें बेदर्दी से कुचल रहा है। ट्रेन अपहरण काण्ड पाकिस्तान के इसी अत्याचार की स्वभाव प्रतिक्रिया है। मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि भारत 14 अगस्त 1947 से पहले की भौगोलिक भारतीय स्थिति की बहाली का संकल्प संसद में पारित करे और सभी अवैध कब्जाधारियों को भारत की जमीन खाली करने को कहे। इससे पहले सन 1994 के संसद के संकल्प को पूरा करते हुए पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को भारत में शामिल किया जा सकता है, जिसके लिए मोदी सरकार कृतसंकल्पित है लेकिन ऐसा कब होगा, यह कोई नहीं जानता। फिर भी अगर ये दोनों काम हो गए तो न तो बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या होगी, न पाकिस्तान से आतंकवाद का निर्यात होगा और न ही सिंध, बलूचिस्तान आदि की समस्या होगी क्योंकि हमारी धरती और हमारे लोग वापस आएंगे तो विकास के सहारे हम उनके जीवन स्तर को सुधार सकेंगे और कट्टरता की आंधी से भी इन्हें बाहर निकाल सकेंगे लेकिन घर के मीरजाफरों पर सख्ती भी करनी होगी। पाकिस्तान को भी अब समझना होगा कि जो मुल्क अपने नागरिकों को आटा तक न दे सके क्या वास्तव में उसे एक मुल्क के रूप में बने रहने का अधिकार है? मेरी बाते। आज भले ही काल्पनिक लगती हों लेकिन ऐसा एक दिन अवश्य होगा। तब न पाक होगा, न सिंधु देश की ज़रूरत होगी, न बलूचिस्तान, न कटा फटा पूर्वी बंगाल और न ही कटा हुआ पंजाब। ये सब हमारे होंगे, तब गेहूं का पूरा कटोरा पंजाब और धान का भरा कटोरा बंगाल हमारा होगा और यही शायद इन सभी समस्याओं का सार्थक हल होगा।

    • पुनीत भाई आप तो कमाल ही करते हैं। संपादकीय पर कुछ ऐसा रंग चढ़ा देते हैं कि आपकी टिप्पणी संपादकीय को समझने का ज़रिया बन जाती है। हर बार की तरह इस बार भी वाह वाह…

  15. सम्पादक जी
    आपका संपादकीय पढ़ कर सब स्पष्ट समझ में आया है. क्योंकि कुछ छिटपुट पेपर में पढ़ लिया, कुछ चलते फिरते TV की ख़बरों में सुन लिया…बहुत बहुत धन्यवाद.आपका प्रत्येक संपादकीय पठनीय होता है.

    • सीमा जी, आपकी टिप्पणी ने संपादकीय का औचित्य सिद्ध कर दिया। बहुत शुक्रिया।

  16. एक असफल देश कोई सफल कार्यवाही कैसे कर सकता है, दुनिया के जो तथाकथित मानवाधिकारवादी हैं वो वही करते हैं जिससे उनकी दुकान चल सके. ये महाशक्तियों के एजेंट उनकी कठपुतलियां हैं. कश्मीरी पंडितों, सिक्खों, के नरसंहार, पश्चिम बंगाल, केरल में हिन्दुओं पर अत्याचार पर ये पार्टी करते हैं. बांग्लादेश, पाकिस्तान आदि देशों में अल्पसंख्यकों के अत्याचारों पर इनके मुँह में दही जमी रहती है…

    • संपादकीय पढ़ने के बाद आपका आक्रोश समझ में आता है प्रदीप भाई। बहुत शुक्रिया

  17. एक असफल देश कोई सफल कार्यवाही कैसे कर सकता है, दुनिया के जो तथाकथित मानवाधिकारवादी हैं वो वही करते हैं जिससे उनकी दुकान चल सके. ये महाशक्तियों के एजेंट उनकी कठपुतलियां हैं. कश्मीरी पंडितों, सिक्खों, के नरसंहार, पश्चिम बंगाल, केरल में हिन्दुओं पर अत्याचार पर ये पार्टी करते हैं. बांग्लादेश, पाकिस्तान आदि देशों में अल्पसंख्यकों के अत्याचारों पर इनके मुँह में दही जमी रहती है……

  18. मां और मस्तिष्क को छूने वाला और उन्हें सतर्क करने वाला जानदार ,शानदार ,औचित्य पूर्ण ,तर्कपूर्ण ,तथ्यपरक और संवेदनशील करता संपादकीय।
    महाशक्तियों के सियासती कुचक्र से पैदा और पीड़ित एक नहीं दो देश,,,भारत और पाकिस्तान।परिणाम एक आतंक,फौज़,धर्मांधता
    के आग़ोश में ग़फ़लत की लोरियाँ सुनाता और गर कभी जागता तो अल्पसंख्यकों की जान की खुराक ले कर फिर सो जाता। भ्रष्टाचार की पौध रौंपी और अब कंगाली के कगार या गर्त से भी आगे फिर भी फितरत वही शैतानी और अहसान फ़रामोशी की।पुरानी कहावत ओल्ड हैबिट्स दिए हार्ड नहीं नेवर एवर dies।
    भारत भी सियासत की गोद में वही सेक्युलरिज्म की ग़फ़लती लोरियाँ सुनता भ्रष्टाचार के अचार को खापा पीता धोता और सुखाता।तिस पर भी गंगा जमुनी तहज़ीब को अपनी रूह में जज़्ब करता लोकतंत्र को ईश्वर सदृश मानता और जाहिर सी बात है कि प्रगति और चंहुमुखी प्रगति का द्वीप स्तंभ बनता जिसमें इंसान और इंसानी संस्कृति का बोलबाला रहा। बांग्लादेश को आज़ाद करना और फिर उसी पूर्वी पाकिस्तान की फितरत से अपने सीने पर वार पर वार झेलना।
    कुछ लोग कहते थे कि जर्मनी वालों ने बर्लिन की दीवार गिरा दी और खुशहाली और प्रगति का मेहमान से मेजबान बना लिया।यहां पर भी ऐसी ही खुशफहमी पाली गई चाय के प्याले में तूफान की मानिंद।धर्म और कट्टरता और वर्षों तक मेहमान रही धोखेबाजी शेखीखोरी ने पवित्र स्थान को पाकिस्तान बनने ही नहीं दिया।
    इधर भारत आगे बढ़ता गया साथ में कश्मीर और तुष्टिकरण की राजनीति के साथ।
    नतीजा है कि एक देश अपने अंदरूनी माहौल में परेशान है और भारत को कोसना उसकी आदत फितरत और मजबूरी है। संपादकीय उसी का विश्लेषण मौजूदा हालत पर करके महाशक्ति या यों को आईना दिखा रहा है।
    देखें शायद कोई सहर की उम्मीद की किरण आए।

    • भाई सूर्यकान्त जी आपकी टिप्पणी भी दिमाग़ को झकझोरने वाली है। आपने संपदकीय के साथ बहुत से आयाम जोड़ दिये हैं। आपने भारत की राजनीति को भी अपनी टिप्पणी में शामिल किया है। आपका आभार।

  19. मेरी टिप्पणी में मां को मन पढ़ा जाए।
    टिप्पणी को आगे बढ़ाते हुए।
    माँ के पैरों के नीचे जन्नत है यह तो हमारे पड़ोसी देश में माँ की बात करते हुए तकिया कलाम की हैसियत पा चुका है।
    हमारे गंगा जमुनी तहज़ीब में दो क्रिकेट के महानायकों में से एक ने अगर शमी की माताजी के पांव छू लिए तो हंगामा हो रहा है।
    कितनी तंगदिली और बुजदिली की बात है।
    भाई अपने बड़े भाइयों से सीख लो।

    • भाई सूर्यकान्त जी, टिप्पणी थोड़ी तेज़ी से लिखी गई इसलिये हमने ख़ुद ही हर संभव प्रयास करते हुए सबकुछ ठीकठाक तरीके से पढ़ लिया।

  20. सादर प्रणाम भाई, सुप्रभात।
    आपका संपादकीय ज्वलंत प्रश्न उठाते हुए मानवीय संवेदना पर तो जागरुक करता ही है.,नैतिक जिम्मेदारियों और देश भक्ति पर भी मुखर है।समझ नहीं आता कि दूसरों को आतंक के निशाने पर रखने वाला पाकिस्तान जब खुद आतंकवादी गतिविधियों का शिकार होता है तो अपनी शासनिक, देश की जनता के प्रति दायित्व और मानवीय नैतिक जिम्मेदारी भी भूल जाता है,उसकी सोच काम नहीं करती या हमेशा नकारात्मक सोच के कारण सकारात्मक विचार आते ही नहीं । पहली घटना जो भारतीय संस्कृति का.श्रेष्ठ उदाहरण है,विराट कोहली का एक मां के चरण स्पर्श करना।इसमें कहां गलत हो गया? साथी होने के कारण भी और एक महिला जो एक महान खिलाडी की मां भी थी,उन्हे आदर देना कैसे गलत हो सकता है? इसमें इस्लाम तो कहीं नहीं बल्कि एक स्नेह, सम्मान की पवित्र भावना थी।पाकिस्तान की विकृत सोच और बुद्धि का विपरीत,
    मैं आम तौर पर राजनीतिक विषयों से दूर रहती हूं लेकिन यह घटना मेरे देश की संस्कृति और भारतीय संस्कारो से जुडी है।दूसरी घटना जब पाकिस्तान के राजदूत को डिपोर्ट किया गया ,यह बेहद शर्मनाक और राष्ट्रीय दृष्टि से भी गलत मानती हूं,यहां मेरे भारतीय संस्कार ही हैं जो उनकी हमारे देश के प्रति गलत विचारधारा के बावजूद मुझे दुख हुआ, बुरा लगा।
    ट्रेन का हायजैक हो जाना निस्संदेह एक गलत घटना है,निंदनीय है,परंतु ऐसी घटनाओं के प्रति शासन की कोई तैयारी न होना,सेना का किंकर्तव्यविमूढ हो जाना आश्चर्य में डालता है।जैसा कि अपने संपादकीय में आदरणीय तेजेन्द्र धाई लिखते.हैं-**-*पाकिस्तान की सेना या सरकार को 26 साल पहले इंडियन एअरलाइन्स के यात्रियों को बंघक बनाने का अनुभव तो है, मगर बंधकों को छुड़ाने का कोई अनुभव नहीं है। पाकिस्तान सेना के हेलिकॉप्टर हवा में उड़ान भरते दिखाई दिये। वहां की एअर फ़ोर्स ने एफ.-16 विमान भी तैयार कर लिये। मगर इन से बम्बारी तभी की जा सकती है, यदि आप फ़ैसला कर लें कि बंधकों को छुड़ाना मुख्य उद्देश्य नहीं है बल्कि बलोच लिब्रेशन आर्मी के लड़ाकों को मार गिराना लक्ष्य है**
    ये आतंकवाद न जाने कितने जीवन मूल्यों, नैतिक आदर्शों, और मानवीयता का नाश करेगा,पददलित करेगा?कब तक?। खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की तर्ज पर भारत पर आरोप लगाना कि.वह आतंकी संगठनों को.प्रश्रय दे रहा है* एक दिवालिया सोच का ही परिणाम है।
    एक बार पुन; समसामयिक सारगर्भित और सार्थक संपादकीय पर बहुत बहुत बधाई हो.भाई प्रणाम।
    पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

    • पद्मा, आपने संपादकीय में उठाए तीनों मुद्दों को बारीक़ी से पकड़ा है। आपकी सकारात्मक सोच इस पूरी टिप्पणी में महसूस की जा सकती है। स्नेह बनाए रखें। आभार।

  21. बढ़िया जानकारी। पाकिस्तानी क्रिकेटरों की टिप्पणी से तो ऐसा लगता है उन्हें माँ से पैदा होना भी स्वीकार नहीं! लेकिन क्या करें,ऐसा संभव नहीं है। इंडियन एयलाइंस के संदर्भ में हम भी असफल ही रहे। दिल्ली में रिश्तदारों ने जो किया,राष्ट्र के संदर्भ में उचित तो नहीं कहा जा सकता है।

  22. Your Editorial of today familiarizes us with the details of the damage,both political and international,caused by the failed paraphernalia of ISI leading to the hijack of a train by Baloch terrorists n taking a number of that train’s passengers as hostages.
    Very distressing indeed.
    Warm regards
    Deepak Sharma
    attitude

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