Friday, April 17, 2026
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संपादकीय – रेप की नई परिभाषा और संवेदनहीनता

इलाहबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की पीठ ने इस मामले में अपने निर्णय में एक टिप्पणी की, “पीड़िता के स्तनों को पकड़ना, उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ना, उसे पुलिया के नीचे खींचकर ले जाने की कोशिश करना रेप या रेप की कोशिश नहीं मान सकते।” जज साहब को याद रखना चाहिये कि उनके द्वारा की गई टिप्पणी केवल एक फ़ैसले के लिये नहीं होती। बाद में आने वाले मामलों में भी इस टिप्पणी को उद्धृत किया जाता है।

पुरवाई के पाठकों को याद दिलाना चाहूंगा कि मैं लन्दन ओवरग्राउण्ड रेलवे में कार्यरत हूं। लन्दन मेट्रो के दो विभाग हैं – लन्दन अंडरग्राउण्ड और लन्दन ओवरग्राउण्ड। लन्दन अंडरग्राउण्ड को ट्यूब भी कहा जाता है। इन दोनों विभागों को ट्रांस्पोर्ट फ़ॉर लन्दन (TFL)  चलाती है और इनके मुखिया लन्दन के मेयर होते हैं जो कि आजकल हैं – सादिक़ ख़ान। 
समय-समय पर हमारी रेलवे पोस्टर कैंपेन चलाती रहती है। जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय का विद्यार्थी था तो उन दिनों बसों में महिलाओं के साथ ख़ासी छेड़-छाड़ देखने को मिलती थी। घूरना तो किसी गिनती में नहीं आता था; उनको छूना, चिपक कर खड़े हो जाना और बेजा हरकतें करना भी आम बात थी। 

लन्दन में भी जब मेट्रो में भीड़ रहती है तो कुछ तत्व ऐसी हरकतें करते हैं। मगर यहां की सरकार ना केवल ऐसे मुद्दों पर क़ानून बनाती है, बल्कि समय-समय पर लोगों को याद भी दिलाती जाती है कि महिलाओं और नाबालिग बच्चियों के प्रति समाज का व्यवहार कैसा होना चाहिये। 
रेलगाड़ी में या रेलवे स्टेशन पर घूरना (Staring), छूना (Touching), शरीर पर दबाव डालना (Pressing) और फ़ोन में नंगी फ़ोटो (Cyber Flashing) आदि दिखाना – सब अपराध की श्रेणी में आते हैं। पोस्टर पर बाक़ायदा स्पष्ट रूप से घूरने और छूने की व्याख्या भी की जाती है। “किसी को गन्दी निगाह से देखना और लगातार घूरना एक यौन उत्पीड़न है। इसे बरदाश्त नहीं किया जाएगा।”
इसी प्रकार हर पोस्टर पर यह समझा दिया जाता है कि यौन उत्पीड़न को रेलवे में बिल्कुल बरदाश्त नहीं किया जाएगा। बाल यौन उत्पीड़न को तो ब्रिटेन में बिल्कुल भी बरदाश्त नहीं किया जाता है। यदि कोई व्यक्ति बच्चों के सेक्स वीडियो देखता पकड़ा जाता है तो उसे संसद तक से त्यागपत्र देना पड़ जाता है। 
आप सोचिये जब मनोज कुमार की पूरब और पश्चिम टाइप फ़िल्मों के माध्याम से हम पश्चिमी देशों को जानने का प्रयास करते हैं तो पाते हैं कि पश्चिमी देशों की महिलाएं तो बस नंगी-पंगी, कम कपड़ों में बेशरमी करती घूमती हैं और आसानी से उपलब्ध हैं। जबकि भारत महान और यहां के मूल्य महान!

मगर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक जजमेंट ने भारत में तो विवाद खड़ा कर ही दिया; साथ ही साथ पूरे विश्व के भारतवंशियों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया कि यह कैसी मानसिकता है। दरअसल किस्सा कुछ इस तरह का है कि कासगंज की एक महिला ने 12 जनवरी 2022 को अपने बेटी के साथ हुए यौन हमले की शिकायत निचली अदालत में दर्ज करवाई थी। शिकायत में कहा गया था कि गांव के तीन युवकों ‘पवन, आकाश और अशोक’ ने बेटी को बाइक से घर छोड़ने की बात की। रास्ते में पवन और आकाश ने लड़की के स्तनों को छूने की कोशिश की। उसे पुलिया के नीचे खींचने का प्रयास करते हुए पायजामे का नाड़ा तोड़ दिया।
लड़की की चीख-पुकार सुनकर वहां से गुजर रहे सतीश और भूरे ने लड़की को बचाने की कोशिश की तो आरोपी उन्हें देसी तमंचा दिखाकर भाग गए। नाबालिग के अभिभावक पुलिस के पास गए। वहां पुलिस ने एफ.आई.आर. दर्ज नहीं की तो उन्होंने अदालत का रुख किया। निचली अदालत ने आरोपियों के विरुद्ध समन जारी किया। समन में ‘पॉक्सो’ अधिनियम की धारा 18 (अपराध करने का प्रयास) औऱ धारा 376 के अंतर्गत जांच करने का निर्देश दिया गया था। जिसके ख़िलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट की शरण ली थी। पॉक्सो अधिनियम 2012 में महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा लागू किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य है – यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण। इसमें बच्चों की तस्करी भी शामिल है।
इलाहबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की पीठ ने इस मामले में अपने निर्णय में एक टिप्पणी की, “पीड़िता के स्तनों को पकड़ना, उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ना, उसे पुलिया के नीचे खींचकर ले जाने की कोशिश करना रेप या रेप की कोशिश नहीं मान सकते।” जज साहब को याद रखना चाहिये कि उनके द्वारा की गई टिप्पणी केवल एक फ़ैसले के लिये नहीं होती। बाद में आने वाले मामलों में भी इस टिप्पणी को उद्धृत किया जाता है। 

एक बार सोचा जा सकता है कि पुरुष जज शायद एक नाबालिग बच्ची की भावनाओं को निजी तौर पर समझने में असफल रहा हो। मगर इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट में भी एक फ़ैसना इसी विषय पर सुनाया गया था। उस केस में जस्टिस पुष्पा गनेडीवाल ने भी कुछ इसी प्रकार की टिप्पणी की थी। उनका भी यही मानना था कि कपड़ों के ऊपर से स्तन दबाना यौन अपराध के दायरे में नहीं आता। और यह कह कर उन्होंने आरोपित व्यक्ति को बरी कर दिया था कि उस पर पॉक्सो एक्ट नहीं लगाया जा सकता।
हमारे सिस्टम में अभी भी कुछ तो बचा हुआ है कि इसके बाद नवंबर 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय ख़ारिज करते हुए फ़ैसला सुनाया कि सेक्सुअल मंशा से शरीर के किसी भी हिस्से को छूना पॉक्सो एक्ट के तहत आता है।  कम से कम जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा के पास तो सुप्रीम कोर्ट की जजमेंट का हवाला मौजूद था। फिर उन्होंने इसका लाभ क्यों नहीं उठाया? यदि यह हादसा जस्टिस मिश्रा के परिवार की किसी सदस्य के साथ गुज़रा होता या किसी नज़दीकी पारिवारिक मित्र के साथ, तो क्या तब भी उनका निर्णय यही रहता! उनके निर्णय पर भारत में बड़े स्तर पर विवाद खड़ा हो चुका है। बहुत से वकीलों ने भी इस निर्णय के विरुद्ध कमर कस ली है। 
राज्यसभा सदस्य और राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष रेखा शर्मा ने भी प्रतिक्रिया दी है। रेखा शर्मा ने कहा है कि यह गलत है और राष्ट्रीय महिला आयोग को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए।
समाचार एजेंसी ए.एन.आई. से बात करते हुए रेखा शर्मा ने आगे कहा – “अगर न्यायाधीश संवेदनशील नहीं हैं, तो महिलाएं और बच्चे क्या करेंगे? उन्हें इस कृत्य के पीछे की मंशा को देखना चाहिए। यह पूरी तरह से ग़लत है और मैं इसके ख़िलाफ हूं।”
केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के  इस फैसले की कड़े शब्दों निंदा की है।  केंद्रीय मंत्री ने इसे गलत फैसला भी बताया है। साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले पर ध्यान देने का आग्रह किया है. उन्होंने कहा कि इस तरह के फैसले से समाज में गलत संदेश जाएगा। 
कोर्ट के इस फैसले पर दिल्ली महिला आयोग (DCW) की पूर्व प्रमुख और आम आदमी पार्टी की राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने भी इस मामले में अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने एनडीटीवी से बात करते हुए कहा कि ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं फ़ैसले में की गई टिप्पणियों से बहुत स्तब्ध हूं। यह बहुत शर्मनाक स्थिति है। उन पुरुषों द्वारा किया गया कृत्य बलात्कार के दायरे में क्यों नहीं आता? मुझे इस फ़ैसले के पीछे का तर्क समझ में नहीं आया। सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए।
फ़ैसले के कुछ ही समय बाद सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ एडवोकेट शोभा गुप्ता ने भारत की सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना को पत्र लिखते हुए कहा है कि यह फ़ैसला देने वाले न्यायाधीश को शीघ्र अति शीघ्र पद से हटाया जाए।  उन्हें क्रिमिनल केसों की सुनवाई से पूरी तरह अलग कर दिया जाए। 
वरिष्ठ एडवोकेट शोभा गुप्ता की ही तरह हमें भी यह निर्णय बिल्कुल समझ नहीं आ रहा। कोई भी जज इतना संवेदनहीन कैसे हो सकता है।  वो तीन लड़के नाबालिग लड़की के स्तनों को क्यों छू रहे थे। इसके पीछे उनकी मंशा क्या थी? क्या जज साहब भी पुलिस की तरह अपराध घटित होने की प्रतीक्षा करना चाहते हैं। अपराध को रोकना नहीं चाहते!… जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने भारत की न्याय प्रणाली को बुरी तरह से झकझोर दिया है। सुप्रीम कोर्ट या भारत सरकार को सोचना होगा कि जो जज क्रिमिनल केस हैंडल कर रहे हैं हर साल उनके मानसिक संतुलन का टेस्ट होना ज़रूरी है। जैसे विमान के पायलट, ट्रेन के ड्राइवर आदि का हर साल मेडिकल होता है, अब जजों को भी इस दायरे में लाने की ज़रूरत है। 
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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59 टिप्पणी

  1. ऐसे फैसले विवेक से नहीं, मिलने वाली रकम से किए गए होते हैं…अब जितनी थू थू हो रही है कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं बचा ….

  2. आज का संपादकीय एक न्याय व्यवस्था पर है जो संपादक की संवेदनशीलता और निडरता को दर्शाता है।
    न्यायपालिका के दामन पर ये दाग तो उसके ही सिपहसालारों ने अपनी मर्ज़ी या खुदगर्ज़ी से लगाया है। संपादकीय में भारत कुमार यानी मनोज कुमार की फिल्म पूरब और पश्चिम का उदाहरण सटीक दिया गया है।पाठक को समझने का इस से अच्छा और नायाब तरीका हो ही नहीं सकता।
    आज का भारत उस फिल्म से बदल कर अब पश्चिम के समांतर नहीं तो आस पास अवश्य हो गया है।बीते कल के युवा आज के बुजुर्ग हैं ।किसी भी समाज के बजुर्ग ही युवाओं को दिशा देते हैं।पर यही परिपक्व भारत अब अपनी जिम्मेदारी को अच्छे से नहीं निभा रहा है उसे मध्यावस्था यानी चालीस के बाद पैसा बटोरने या पद प्राप्त करने की लालसा या लिप्सा है।
    यही प्रतीत होता है कि ,,,,कहना पड़ेगा,,,,शिष्टाचार के तकाज़े में कि न्याय मूर्ति को अब पुनः गांधीजी के बारे में स्कूली स्तर पर शिक्षित करने हेतु एक क्रैश कोर्स करवाना पड़ेगा।
    न्याय व्यवस्था किसी भी देश का आईना होती है।उसकी छवि को प्रसारित करने वाली अदृश्य शक्ति होती है।
    हमारे प्रधान नेतृत्व को इसे चुनावी या अन्य राज काज के साथ इसे पूर्ण प्राथमिकता पर संज्ञान लेकर एक नज़ीर स्थापित करने हेतु इस प्रकरण या ऐसे ही अन्य पर भी निर्णयात्मक नीति और कदम उठाना ही होगा।
    वरन यह विश्वगुरु न्याय के स्थान पर ,,,न्याय का प्रतिबिंब बनकर भस्मासुर न बन जाए।यदि सार रूप में कहें तो न्याय व्यवस्था को मानवीय सोच से देखना ही होगा।
    निडर संपादकीय हेतु,संपादक को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई हो

    • भाई सूर्य कांत जी, मैं यह सोच कर हैरान हूं कि ब्रिटेन में घूरना, छूना, और शरीर पर दबाव बनाना जुर्म है, और हमारे जस्टिस मिश्रा पता नहीं किस दुनिया में रह रहे हैं!

      • जी ईश्वर ने मौके दिए हैं लंदन प्रवास के। आपने सही कहा है कि वहां घूरना या संदिग्ध अंदाज़ से ताड़ना अक्षम्य अपराध हैं।
        हमारे यहां विशाखा नियमावली भी ऐसे ही है।

  3. वाकई बेहद शर्मनाक फैसला और कथन, इस जज को तत्काल हटा देना चाहिए लेकिन जब दिल्ली में एक जज का कमरा 15 करोड़ नोटों से मिला और उसे नहीं हटाया केवल दिल्ली से अल्हाबाद भेज दिया तो अपेक्षा की जा सकती है? सरकार को चाहिए कि कानून बनाकर जजो को भी जाँच के दायरे में लाना चाहिए जब पीएम जाँच के दायरे में आते हैं तो जज क्यों नहीं?

  4. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने जो असंवेदनशील और घटिया निर्णय दिया है इससे जाहिर होता है उनकी मानसिक हालत ठीक नहीं है। सी जे आई और उनके परिवार को चाहिए कि उनको किसी मनः चिकित्सक को शीघ्र दिखाएं ।अकेले मिश्रा जी को ही क्यों, उनके साथ ही मुंबई हाईकोर्ट की जज पुष्पा गनेडीवाल को भी ले जाएं ।
    तेजेंद्र जी स्पष्टवादिता कोई सीखे तो आपसे । आपकी संवेदनशीलता को सैल्यूट।

    • पद्मजा जी, आपकी टिप्पणी हमारी पूरी टीम के लिये उत्साहवर्धक है। हार्दिक आभार।

  5. आपकी टिप्पणी संतुलित किए जाने की प्रतीक्षा कर रही है
    इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने जो असंवेदनशील और घटिया निर्णय दिया है इससे जाहिर होता है उनकी मानसिक हालत ठीक नहीं है। सी जे आई और मिश्रा जी के परिवार को चाहिए कि उनको किसी मनः चिकित्सक को शीघ्र दिखाएं ।अकेले मिश्रा जी को ही क्यों, उनके साथ ही मुंबई हाईकोर्ट की जज पुष्पा गनेडीवाल को भी ले जाएं ।
    तेजेंद्र जी स्पष्टवादिता कोई सीखे तो आपसे । आपकी संवेदनशीलता को सैल्यूट।

  6. तेजेंद्र जी, भारतीय न्याय प्रणाली पर आपकी बेबाक टिप्पणी तथा समाज में घट रही घटनाओं के प्रति संवेदनशीलता के साथ ही विदेश में , विशेष रूप से ब्रिटेन में स्त्रियों के प्रति न्याय व्यवस्था की बात अत्यंत सराहनीय जानकारी है। हम भारतीयों का कछुआ धर्म किंचित इन जानकारियों से शोधित हो सके….

    • सुषमा जी, हम बात तो नारी की पूजा की करते हैं, मगर हमारे न्यायाधीश ना जाने किस मानसिक रोगी से ग्रस्त हैं।

  7. पुरवाई के इस संपादकीय में न्याय व्यवस्था को देखने वाली खंडपीठ के न्यायाधीश महोदय द्वारा रेप पर दी गई टिप्पणी… टिप्पणी कहूं या कुछ और …. गुस्सा आ रहा है। बहुत ही वाहियात टिप्पणी की गई है। गुड टच और बैड टच में अंतर तो मामूली इंसान भी जानता है। इन लोगों ने गांव गिराम कभी देखा नहीं है। न वहां के दुराचरण को समझा हैं। अभी तक कानून के डर से दुराचारियों की संख्या में कमी दिखने लगी थी। अब भगवान जाने क्या होगा?
    नगर और महानगरों की रेल, बस और भीड़भाड़ वाले इलाक़ों में शोहदों की हरकतों से वे परिचित होंगे। उसे ही देख समझ लेते।
    खैर…………
    तेजेन्द्र सर जी, आपने इस संपादकीय में मुद्दा समयानुकूल उठाया है। लोगों के सम्मान से जुड़े मुद्दों को उठाना संपादकीय का धर्म है। आपने इस विषय को उठाकर अच्छा काम किया है। आपको बहुत-बहुत धन्यवाद

    • हार्दिक आभार भाई लखन लाल पाल जी। जब से जस्टिस मिश्रा की टिप्पणी पढ़ी है मन उद्वेलित है।

  8. जस्टिस मिश्रा के इस निर्णय की जितनी भी निन्दा की जाय, वह कम ही होगा। ऐसे अविवेकी निर्णय से व्यभिचार को निश्चित रूप से बढ़ावा मिलेगा, साथ ही पाशविक वृत्ति के लोगों का हौसला और अधिक बुलन्द होगा।

  9. बेहद शर्मनाक फैसला। एक जज इतना संवेदनहीन कैसे हो सकता है? या तो इन महाशय का मानसिक संतुलन बिगड़ा हुआ है या ये स्वयं भी ऐसे ही हैं। इस मामले के इतना तूल पकड़ने के बावजूद अगर इनमें जरा भी शर्म बाकी है तो इन्हें स्वयं इस्तीफा देना चाहिए अगर ये स्वयं इस्तीफा नहीं देते तो इन्हें तुरंत बर्खास्त कर देना चाहिए।

  10. जी ईश्वर ने मौके दिए हैं लंदन प्रवास के। आपने सही कहा है कि वहां घूरना या संदिग्ध अंदाज़ से ताड़ना अक्षम्य अपराध हैं।
    हमारे यहां विशाखा नियमावली भी ऐसे ही है।

  11. जाको प्रभु दारुण दुख देहीं
    ताकी मति पहले हरि लेहीं
    जज की बुद्धि पर गर्द चढ़ गया है सम्भवतः उनके दुर्दिन करीब आ गए ।निंदनीय सोच है यह
    एक व्यक्ति की विक्षिप्त मानसिकता का परिचायक भी है ।
    Dr Prabha mishra

  12. आज की सम्पादकीय में उठाये गये विषय ने चारो ओर से जज की भर्त्सना हो रही है, ये तो उन अपराधियों से भी बड़े अपराधी कहे जायेंगे। जिसे सामाजिक परिप्रेक्ष्य में उचित और अनुचित में अंतर करना ही नहीं आता तो न्याय कैसे करेगा? हर देश की अपनी संस्कृति होती है और हम अन्य देशों की तरह निर्णय दे रहे हैं तो आप उस पद को अपमानित कर रहे हैं।
    अब अ़ंकुश लगाने के लिए तत्काल प्रभाव से उन्हें पद से हटया जाना चाहिए। आपने बहुत अच्छी तरह प्रस्तुत किया है। इस

  13. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    आपके आज के संपादकीय को पढ़कर न्याय की धज्जियाँ उड़ती नज़र आईं। न्याय और न्यायाधीश दोनों पर से ही भरोसा उठ गया। बिना पढ़ा लिखा अनपढ़ गँवार भी जिस बात को समझता है उस बात को न्यायाधीश कैसे नहीं समझ पाए? एक लंबे समय से अभियान के तहत चला “गुड टच, बैड टच”। और अब भी बच्चियों को यह बात उम्र के अनुरूप समझाई जाती हैं पर हमारे न्यायाधीश महोदय को ही गुड टच और बेड टच क्या होता है, इसके बारे में कुछ पता नहीं?
    इसे कहते हैं *”आँख के अँधे, नाम नयनसुख”*
    नाम मनोहर है जिसमें *राम* भी है और *नारायण* भी दोनों *मिश्र* और बताओ; बुद्धि बच्चों से भी गई- बीती।
    और उन्हें यह बात भी याद नहीं रही जो फैसला वह देंगे वह भविष्य के लिए उदाहरण के रूप में देखा जाएगा।
    ऐसा नहीं है कि बस में या रेल में भीड़ की स्थिति में, और उस भीड़ में होने वाली हरकतें में पहले के मुकाबले में आज कुछ बहुत ज्यादा सुधार आया हो किंतु फिर भी अगर गलत हो रहा है तो उसे नज़रंदाज़ भी नहीं करना चाहिए। क्रोध तो इतना अधिक आ रहा है की संभाले नहीं संभल रहा। मन में तो आ रहा है कि अगर कहीं मिल जाते ये जनाब तो उनसे कहते कि “यह कहने के पहले कम से कम अपनी माँ, बहन, बीबी,बेटी और बुआ; पाँचों से घर पर ही मशवरा कर लिया होता।
    “तेजेन्द्र जी! आज संपादकीय के विषय पर लंदन में जिस तरह के पोस्टरों की आपने चर्चा की है ,उसी तरह के पोस्टर भारत-सरकार को भी ट्रेन एवं बसों में लगवाना चाहिये। वैसे ही नियम यहाँ भी बनाए जाने चाहिये।
    लंदन के बारे में आपने जो कुछ बताया वह पढ़कर बहुत अच्छा लगा लेकिन हमारी भारत सरकार को दूसरों से कुछ अच्छा सीखने की आदत नहीं है। देसी भाषा में कहें तो सब डेढ़ स्याने हैं।
    जस्टिस महोदय के घर की किसी स्त्री सदस्य के साथ ऐसा हुआ होता तो शायद वह समझ पाते । लेकिन ऐसा हुआ नहीं एक कहावत है,” जाके पैर न फटे बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई।”
    जिसके पैर में कभी बिवाई भी न फटी हो वह दूसरों के दर्द को कैसे समझ सकता है?
    जस्टिस पुष्पा का निर्णय तो और भी ज्यादा गंभीर है। अगर वह एक महिला होकर भी इस बात की गंभीरता को नहीं समझ पाईं।
    गलत फैसले गलत इरादों की ओर इशारा करते हैं। फिर दिमाग में आने लगता है कि पैसे खाये गये हैं।
    फैसला करते हुए हर जज को चाहिये कि उस केस की तरह ही पूर्व में अन्य केसों पर जो फैसले दिये गए हैं, वे भी सुप्रीम कोर्ट से ,तो एक बार उनकी और भी ध्यान दिया जाये पर जस्टिस मिश्रा ने ऐसा नहीं किया; वरना आज इतनी बड़ी बदनामी और अपमान से शायद बच जाते।
    एक कहावत है- बद अच्छा, बदनाम बुरा।
    अगर आपकी किस्मत खराब है और आपको कोई परेशानी या तकलीफ आ रही हैं तो बदनामी से यह बदकिस्मती कहीं अधिक बेहतर है।

    इस निर्णय के खिलाफ विवाद उठना तो बहुत जायज़ है।आश्चर्य तो तब होता जब विवाद नहीं उठता।
    सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी किसी भी काम को करते हुए या कोई निर्णय लेते हुए परिणामों के बारे में जरूर विचार करता है।
    इतने गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर फैसला सुनाने से पहले उन्होंने परिणाम के बारे में विचार नहीं किया ऐसी शख्सियत को क्या ही कहा जाए?
    जो-जो भी इस फैसले के खिलाफ खड़ा है, हम उनका समर्थन करते हैं और हम उनके साथ हैं।

    आज आपके ही एक पूर्व संपादकीय की एक बात याद आ रही है-
    आपके एक संपादकीय में आपने लिखा था कि “लंदन में बलात्कार के लिए ब्रिटिश सरकार ने एक नियम बना दिया है कि उसे आतंकवाद के समकक्ष रखा गया है।

    आपके लंदन में कुछ नियम हमें बहुत अच्छे लगे, जितना कि हम आपसे जानते जा रहे हैं। और यह सब जानकर ऐसा लगता है कि शायद यही कारण है कि लोग हिंदुस्तान छोड़कर विदेश जाकर बसना और विशेष तौर से लंदन जाकर बसना अधिक पसंद करते हैं।
    काश भारत सरकार ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर कुछ ठोस कदम उठा पाए और ऐसे जजों को तो पहली बार में ही बर्खास्त कर देना चाहिए बिना किसी सुनवाई के।
    आपका आज का संपादकीय बेहद-बेहद संवेदनशील और विचारणीय है। अपने पद का दुरुपयोग करना जितना दंडनीय होता है, अपने काम के प्रति लापरवाही व गलती भी उतना ही बड़ा दंडनीय अपराध है।
    दिल्ली हाई कोर्ट के एक और जस्टिस यशवंत वर्मा भी इस समय काफी चर्चा में हैं। उनके घर आग लगने पर घर में बहुत सारे नोट मिलने का खुलासा हुआ तत्काल प्रभाव से उन्हें कम से कम पद से तो छुट्टी दे ही देना चाहिये था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्हें ट्रांसफर कर दिया गया।
    न्याय के धुरंधर राजा विक्रमादित्य का देश !!तो यह है हमारे हिंदुस्तान के न्यायाधीश,उनके न्याय और उनके कारनामे।

    • नीलिमा जी आपकी विस्तृत टिप्पणी मुद्दे पर पूरी तरह से प्रकाश डालते हुए समझा देती है। धन्यवाद।

  14. 14 तारीख़ को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के घर पर लगी आग में फायर फाइटर्स को मिले पूरे कमरे में भरे नोटों ने स्पष्ट कर दिया कि फ़ैसले ख़रीदे जाते हैं !
    पिछले बरस विनेश फोगाट और अन्य महिला पहलवानों के साथ जो सलूक किया गया वो जग ज़ाहिर है! एक फ़िल्म के फेमस डायलॉग ” तारीख़ पे तारीख़” ज़्यादा नोट छापने का ज़रिया है!
    अधिकांश रेप केसेज में राजनीतिज्ञ, उनके रिश्तेदार या रसूख़ दार ही होते हैं ! और उनका कुछ नहीं होता !
    रेप केस में सज़ा काट रहे अभियुक्तों को चुनाव के समय पैरोल पर छोड़ना और उनको spg प्रोटेक्शन देना, फिर उनका फ़तवा देना की उनके अनुयाई आमुख दल के उम्मीदवारों को ही वोट दें !
    जिस देश में बलात्कार के अभियुक्त और मुजरिम सरकार की छत्र छाया में पल बढ़ रहे हों, फल फूल रहे हों , तो उस देश में और क्या अपेक्षा की जा सकती है !
    बलात्कारी चुनाव जीत कर मंत्री बन जाते हैं वाशिंग मशीन में धुल कर प्रमाणित मिस्टर क्लीन बन जाते हैं!
    यही तो हैं अच्छे दिन !

  15. एक सबसे महत्वपूर्ण बात जो सबसे पहले लिखी जानी चाहिए थी लेकिन क्रोध की अधिकता के कारण छूट गईकि जिस देश की वेशभूषा भारतीय परिधान से पूरी तरह विपरीत मानी जाती है, उस देश का कानून बलात्कार व उससे संबंधित प्रारंभिक समस्त क्रियाकलापों के प्रति जितना सख्त है हमारा सुसंस्कृत परिधान वाले देश में उसी को लेकर कानून कितना लचर व लापरवाह है ।वाकई आज के संपादकीय ने सिद्ध किया कि भारत के एक न्यायाधीश ने रेप की एक नई परिभाषा गड़कर संवेदनहीनता का परिचय दिया।

    • जी मैं तो कई बार कह देता हूं कि जिसे हम राम-राज्य कहते हैं वो ब्रिटेन में लागू है।

  16. संपादक महोदय,
    राम मनोहर नारायण जी के नाम के आगे तो श्री अथवा जस्टिस लगाने में भी मुझे लज्जा आती है,
    मैं जस्टिस शोभा गुप्ता जी से पूर्ण सहमति रखती हूं कि राम मनोहर का मानसिक संतुलन ठीक नहीं है,वे मानसिक रोगी ही है।
    स्त्री होने के नाते मुझे अब इस आयु में यह कहते हुए भी तनिक भी लज्जा नहीं आती कि किसी पुरुष द्वारा कुदृष्टि से घूरने जाने मात्र से ही हृदय उसके प्रति घृणा से भर जाता था इससे अच्छा ऐसी होती थी कि या तो उसके सीने में चुरा भोग दे या स्वयं नदी में जाकर कूद पड़ें, छूना तो बड़ी दूर की बात है।
    राम मनोहर नारायण को तुरंत पद से हटकर मानसिक चिकित्सालय भेज देना चाहिए। यह तो अपने नाम’ राम मनोहर नारायण ‘को भी लज्जित
    कर रहे हैं।

  17. मैं स्तब्ध हूँ सर… जिस दिन यह खबर आई.. एक पल के लिए असुरक्षित भावना से मन भारी हो गया। फिर लगा कि हमारे यहाँ की व्यवस्था ही कुछ ऐसी है कि यहाँ भ्रस्टाचार व व्यभिचार बहुत साधारण हो बात हैं।
    और इन सभी नीच कार्य से जुड़े व्यक्ति लज्जाहीन होते हैं। ईश्वर करें इस विकृत इंसान को ऐसा दंड मिले कि पूरी दुनिया कांप उठे।

  18. आपने विस्तृत विवेचन किया है। मगर तथ्य है कि पाक्सो ऐक्ट की धारा को जस्टिस ने नहीं हटाया है। साथ ही अन्य दो धारायें भी यथावत हैं। उन्होंने केवल रेप के संबंध में कानून की मौजूदा स्पष्ट व्याख्याओं की सीमाओं को ध्यान में रखकर केवल निचली अदालत को अपराध की धाराओं को संशोधित करने का आदेश दिया है। ध्यातव्य है कि दो विभिन्न उच्च न्यायालयों ने समान फैसले सुनायें हैं तो जरुर ऐसा कुछ है जो उन्हें नियंत्रित कर रहा है। आप स्वयं भारतीय दंड सहिता में बलात्कार क्या है देखें। स्पष्ट है कि बिना लिंग पेनिट्रेशन के बलात्कार नहीं माना गया है। कानून कभी कभी बहुत शुष्क होता है और भावनाओं, संवेदनाओं से परे रहकर अपना स्टैंड लेता है। इस मामले में भी यही है।

    • अरविंद भाई आपकी टिप्पणी बलात्कार की बात कर रहे हैं। Attempt to rape का मामला भी उतना ही गंभीर है।

  19. अपने ही देश में असुरक्षित महसूस करना, कितनी बड़ी त्रासदी है
    असक्षम रियाया घबराई हुई रहने को मजबूर है और कुछ भी कर सकने में लगातार नाकाम रहते हुए कैसे जीने की हिम्मत रखे कोई भी, मन में हाहाकार और ज़हन डरा हुआ इसकी कोई रेमेडी नहीं..

  20. जस्टिस राम नारायण मिश्रा के इस सरासर पक्षपाती फैसले ने समुची दुनिया में भारत और भारतीयों को शर्मशार कर दिया है। सरकारें चुप है। मुझे उम्मीद थी कि कानून मंत्रालय इसकी जाँच करके इस बेईमान जज पर कारवाई करेगी। परंतु सारी व्यवस्था सहित भारत की मुख्य धारा मिडिया (गोदी मिडिया) भी चुप है। सिर्फ सोशल मिडिया (विरोधी मिडिया) के उन लोगों ने अपना विरोध जताया है जो अंधभक्ति समुदाय की नजरों में वामपंथी अथवा देशद्रोही है। एक व्हाट्स्अप ग्रुप पर मैंने भी इसके विरुद्ध एक पोस्ट क्षमा याचनाओं सहित साझा किया था। दो दिनों तक किसी की कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखी। मैंने अपनी धृष्टता समझते हुए वह पोस्ट मिटा दिया। पूरवाई पर यह संपादकीय देख कर मुझे एक संतोषजनक खुशी हुई है। मैं संपादक श्री तेजेन्द्र शर्मा जी का बहुत बहुत प्रशंसा करता हूँ कि उन्होंने इस गलत फैसले को अपने संपादकीय का विषय बना कर करोड़ों लोगों तक इस बात को पहुँचाकर यह संदेश दिया कि इस फैसले ने भारत से बाहर रहने वाले भारतीय भी आहत हुए है। और इस फैसले का विरोध करते हैं। वास्तव में यह फैसला कुछ ऐसा लग रहा है जैसे किसी फिल्म में किशोर कुमार का वह गीत जब माँझी नाव डुबाए..
    जब न्यायाधीश हीं अन्याय करे तो
    फिर न्याय कौन दिलाए।
    एक अन्य मामले में किसी जज के बंगले से भारी नकदी रकम मिली है। हलाँकि इस मामले को असंवैधानिक तरीके से दबाने का प्रयास विफल रहा और इसकी जाँच के लिए एक समिति गठित की गई है। संभव है सच सामने आए तथा यह भी संभव है कि असंवैधानिक तरीके से मिली विफलता को संवैधानिक तरीके से दबाया जा सके। एक अन्य मामला औरंगज़ेब का है जिसमें कुछ लोगों की वीरता तीन सौ वर्षों बाद जगी है और इसलिए औरंगज़ेब को कब्र से निकाल कर उससे दो दो हाथ करने को कटिबद्ध है।
    आमतौर पर किसी आरोपी अथवा अपराधी की मृत्यु हो जाने पर उसका मुकदमा समाप्त कर दिया जाता है। परंतु किसे कौन और कैसे समझाये। वे छुटते हीं गाली देना शुरु कर देंगे। जो लोग लगभग तीन सौ वर्षों पहले मृत औरंगज़ेब लड़ना चाहता है।
    और इस बात पर कोई चर्चा मशविरा हीं नहीं चाहता कि अमेरिका लगभग लगातार दो महिनों से हम भारतीयों को न सिर्फ धमका रहा है बल्कि अपमान भी कर रहा है। यह समय औरंगज़ेब के नाम पर आपस में बँटने अथवा लड़ने का नहीं बल्कि एकजूट होकर यह विचार करने का है कि अमेरिका से कैसे संबंध सुधारे जाएँ। 02 अप्रैल से वह जिस टैरिफ की योजना बनाकर हमारी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाना चाहता है उससे कैसे बचा जाए। ताकि देश के लाखों बच्चे जो अपनी पढ़ाई पुरी करके काम ढूँढेगे उन्हें काम मिल सके। सच्चाई यही है कि अमेरिका से व्यापार युद्ध की स्थिति में भारत अभी नहीं है इसलिए यदि अमेरिका के साथ बौद्धिक तरीके से नहीं निपटा गया तो हम घाटे में रहेंगे।

  21. भाई राजनन्दन जी आजकल न्यायपालिका बहुत दबाव में है। आपने बहुत से मुद्दों को अपनी टिप्पणी में उठाया है। हार्दिक धन्यवाद।

  22. प्रणाम भाई,
    आज का संपादकीय एक ज्वलंत मुद्दे पर लिखा गया जिस पर लिखना आवश्यक तो था ही साहसिक भी है।आम नागरिक को न्यायपालिका पर विश्वास करना सिखाया जाता है,उससे सच्चे न्याय की उम्मीद की जाती है परन्तु इलाहाबाद कोर्ट के जस्टिस का यह निर्णय बेहद शर्मनाक लगता है ।महिलाओ को न्याय देना क्या इतना कठिन है?.जो समाज की आधी आबादी कही जाती हैं,उनकी अस्मिता के साथ बेढंगा मजाक है यह फैसला।हमें एक जुट होकर इसका विरोध करना ही पडेगा।जैसा कि तेजेन्द्र भाई ने कहा कि महिलाओ के खिलाफ अपराध रोकने के लिए लंदन में पोस्टर लगाने जैसे तरीके अपनाए जाते हैं,वैसा हमारी सरकार क्यों नहीं कर सकती? क्या ऐसे ही पाशविक फैसलों से हम न्याय व्यवस्था कायम करेंगें।मै व्यक्तिगत रूप से घोर निंदा करती हूं।आभार भाई आपने इसके एक एक पक्ष को बेबाकी से उभारा है जो अनेक समाधान और जानकारी भी देता है।
    पद्मा मिश्र

    • पद्मा आपकी प्रतिक्रिया और समर्थन हमारे लिए महत्वपूर्ण है। हार्दिक आभार।

  23. आ0तेजेन्द्र जी !आप हमेशा सामयिक मुद्दे उठाते हैं इस के लिये साधुवाद। हमारे देश के लोग , ऐसा लगता है, दो गले हो गये हैं। एक तरफ़ सनातन संस्कृति की बात करते हैं और दूसरी तरफ़ लम्पट मानसिकता से ग्रस्त हैं। एक तरफ़ औरत को देवी या माँ का दर्जा देते हैं और दूसरी तरफ़ उनके लिये कुत्सित मानसिकता रखते हैं। सब ने सब कुछ कह ही दिया और क्या कहा जाये सड़न व्याप रही है भ्रष्टाचार फलफूल रहा है चाहे न्याय की देवी की आँखों से पट्टी हटा दी गई है पर शायद उसे दिखाई और सुझाई देना बन्द हो गया।
    ” जो मेरे क़त्ल का इन्साफ़ करने वाले हैं
    उन्हीं के हाथ में खंजर है क्या किया जाये”

  24. यह मुद्दा निश्चय ही शर्मसार कर देने वाला है….सचमुच ऐसे जजों का नियमित मानसिक संतुलन का चेकअप करवाना ही चाहिए ।

  25. शर्मनाक …अगर न्यायपालिका इस प्रकार के ग़लत फैसले करेगी तो दुनिया की आधी आबादी की सुरक्षा का क्या होगा?
    महत्वपूर्ण संपादकीय विषय है सर

  26. हद ही हो गई, यह वह देश है जहाँ देवी पूजा होती है? यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते की बात की जाती है? जब से यह बात पता चली है मन उद्विग्न है।
    जो लोग संवेदना के नाम पर बड़ा सा शून्य हैं वे ऐसे पदों पर? लज्जा की बात है। इस प्रकार के लोगों को तो कड़े से कड़ा दंड दिया जाना चाहिए।
    बिलकुल सही कहा किसी ने कि उनका मानसिक टैस्ट करवाना चाहिए। जैसे अपराधियों को सुधार गृह भेजा जाता है इनको भी वैसे ही भैजना चाहिए।
    मैं तो कहती हूँ जिसके लिए ऐसी बात कही गई है उसको ही कोड़ा पकड़ा देना चाहिए।
    आपके संपादकीय में यदि यह प्रश्न न उठाया जाता, इस पर संवाद न होता तो आश्चर्जनित पीड़ा होती। कहाँ जा रहे हैं हम?
    खुल कर बात करने हेतु साधुवाद आपको।

    • आदरणीय प्रणव जी, आपकी सार्थक एवं सारगर्भित टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।

  27. तेजेन्द्र जी
    ज्वलंत मुद्दे को उठाने के लिये साधुवाद।सत्तर अस्सी के दशक में जो विद्यार्थी पढ़ने में कमजोर होते थे वह वकालत की पढ़ाई करते थे।दबंगई करते थे।वकील या नेता बनते थे।अधिकांशतः चरित्रवान,गुणी विद्यार्थी डॉक्टर या इंजिनियर या प्रशासनिक सेवा में जाते थे।फिर जाने कैसे न्यायाधीश व नेता का पद अति सम्मानित हो गया।वकीलों के परिवार तक से दूरी रखी जाती थी कि कानूनी धाराएं बता कर घर मे क्लेश करा देंगे।
    देखती हूँ कि बुजुर्गों की सोच बहुत सही थी।न्याय व्यवस्था भारतीय दण्ड व्यवस्था पर आधारित न हो कर अधिकांशतः मालिक अंग्रेज के दण्ड विधान को ही मान लिया गया था भारत विभाजन के समय।इंग्लैंड में न्याय प्रणाली सुधरती गयी किन्तु आपराधिक पृष्ठभूमि वाले राजनेता व न्यायधीशों ने भारत मे न्याय व्यवस्था को अन्याय व्यवस्था में बदल लिया।बात एक नतायाधीश की नही है बल्कि उस हिम्मत की है जो इस नराधम जज ने यह निर्णय देते हुए दिखाया।दोषी भारत की जनता भी है जो ऐसा जज और उसके घर की स्त्रियां अभी तक चैन से रह रहीं हैं।

    • निवेदिताश्री जी, आपकी टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण है। आप अपनी प्रतिक्रिया हमेशा भेजा करें।

  28. संपादकीय धर्म को किस तरह बेबाक और ईमानदारी से निभाया जाता है, यह कोई आपसे सीखे।
    ऐसे ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा होना समाज के हित में है। शर्म आती है मिश्रा जी जैसे विकलांग मानसिकता वाले व्यक्ति को न्यायाधीश कहने में। ऐसे अधिकारी क्या सोच कर इस तरह के फैंसले देते हैं और सरकार भी कठपुतली बनकर घूमती रहती है।
    इस तरह के फैसलों का फ़ायदा उठा कर दुष्कर्मी भी बच निकलने में कामयाब हो जाते हैं और न्याय की देवी तराज़ू संभालती रह जाती है।
    ऐसे बेबुनियाद फैसलों पर जनता को आवाज़ उठानी चाहिए और सरकार को भी कड़ा रूख अख्तियार करना चाहिए।
    इस मामले में लेखनी चला कर श्री तेजेन्द्र शर्मा जी ने अपने संवेदनशील व्यक्तित्व का परिचय दिया है ,,

    • आशमा जी, इस सारगर्भित और अर्थपूर्ण टिप्पणी के लिए आपको हार्दिक आभार। आपका समर्थन हमारे लिए महत्वपूर्ण है।

  29. जितेन्द्र भाई: क्या हो गया है भारत के जस्टिस सिस्टम को? कोई पूछे जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा जी से कि यहीं अगर उनकी अपनी बेटी होती और कोई और दूसरे हाई कोर्ट के जज वही फ़ैसला लेते जो इन्होंने लिया है तो मिश्रा जी फिर क्या कहते? मिश्रा जी को इतना तो ज़रूर मालूम होगा कि उनका यह फ़ैसला आगे होने वाले क्रिमिनल लोगों को बचाने का एक precedent बन जायेगा। ऐसे माहॉल में मिश्रा जी को तुरंत disgracefully बर्ख़ास्त कर देना चाहिये।
    सुप्रीम कोर्ट से लेकर छोटी अदालतों के जो किस्से अब सामने आरहे हैं, उस को देखकर तो यह ऐसा लगता है कि यह एक elite क्लब है जहाँ एक दूसरे के गुनाहों को लेकर बाकी जज गुनाहगार को बचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते। समय आगया है कि मोदी ही और जस्टिस मिनिस्टर इस और ध्यान दें। जैसा आप ने सुझाव दिया है कि “पायलैट, ट्रेन ड्राइवरों की तरह, जजों का भी mandatory दिमाग़ी चैकप होना चाहिये”; इस विषय पर भी सरकार को गंभीरता से सोचना होगा।

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