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संपादकीय – नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के साथ अंततः न्याय हुआ!

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संपादकीय - नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के साथ अंततः न्याय हुआ! 3

भारत की वर्तमान एन.डी.ए. सरकार ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए वहां भारत के महान सपूत नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मूर्ति स्थापित करने का फ़ैसला लिया। साथ ही साथ यह भी घोषित कर दिया कि अब क्योंकि शहीद स्मारक की स्थापना हो चुकी है, इसलिये अमर जवान ज्योति को इंडिया गेट से हटा कर शहीद स्मारक के साथ जोड़ दिया जाएगा और ज्योति वहीं स्थापित हो जाएगी।

मेरे पिता (जिन्हें मैं बाऊजी कहा करता था) श्री नंद गोपाल मोहला एक युवा क्रांतिकारी थे। देश की स्वतंत्रता के लिये एक नौजवानों के टोले के साथ अंग्रेज़ों के विरुद्ध लड़ते थे। वे गर्म दल के सदस्य थे और कांग्रेसियों का मज़ाक उड़ाया करते थे। वे मुझे बताया करते थे कि कांग्रेसी तो गले में हार पहन कर जेल जाते थे; हमें हवालात में डंडे खाने पड़ते थे। 
मुझे बताया गया कि मेरे पिता को फांसी की सज़ा हो गयी थी और किंग जॉर्ज के जन्मदिन पर ‘जनरल पार्डन’ में उन्हें माफ़ी मिल गयी थी। कुछ अन्य साथियों के साथ उन पर हत्या के संगीन आरोप थे। सभी साथी एक साथ जेल से छूटे थे। 
बाऊजी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेसियों का ख़ूब मज़ाक उड़ाया करते थे। वे हमेशा लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, राम प्रसाद बिस्मिल आदि की बातें किया करते थे। कुछ किस्से भी सुनने को मिलते। मगर आम तौर पर उन्होंने अपने क्रांतिकारी जीवन के बारे में कभी किसी से कुछ ख़ास साझा नहीं किया। उन्होंने कभी स्वतंत्रता सेनानी होने की कोई पेंशन या वज़ीफ़ा नहीं लिया। बस ईमानदारी से अपना पूरा जीवन रेलवे की सादी पगार पर गुज़ार दिया। 
मगर जिस इन्सान की मेरे बाऊजी सबसे अधिक तारीफ़ किया करते थे, वे थे नेता जी सुभाष चन्द्र बोस। मेरे बाऊजी के मुताबिक भारत के स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा नायक यदि कोई था – तो वे केवल और केवल नेता जी सुभाष चन्द्र बोस थे। 
बाऊजी का मानना था कि हम गर्म दल के लोग इमोशनल लोग थे। बस अंग्रेज़ों से लड़ना है उन्हें भारत छोड़ने के लिये मजबूर कर देना है। इसके लिये योजना क्या बनानी है, ऐसा हम नहीं सोचते थे। भगत सिंह यदि योजनाबद्ध तरीके से काम करते तो कभी फांसी नहीं चढ़ते। उनका मानना था कि एक अकेले सुभाष चन्द्र बोस थे जो योजनाबद्ध तरीके से सेना बना कर अंग्रेज़ से लड़ने का सपना देख सकते थे। 
आज पिताजी की यादें इसलिये ताज़ा हो आईं कि कुछ दिन पहले ही वर्तमान भारत सरकार ने निर्णय लिया कि दिल्ली के इंडिया गेट के निकट ख़ाली पड़ी छतरी में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मूर्ति स्थापित की जाएगी। उस छतरी का निर्माण 1936 में करवाया गया था और वहां उस समय के ब्रिटिश राजा जॉर्ज पंचम की मूर्ति लगाई गयी थी। 
1968 में उस मूर्ति को हटा दिया गया था और तब से यह छतरी ख़ाली खड़ी थी। उस मूर्ति को कोरोनेशन पार्क भेज दिया गया। 60 के दशक में इंडिया गेट व उसके आस-पास लगी सभी ब्रिटिश गवर्नर जैसे लॉर्ड विलिंगडन, लॉर्ड हार्डिंग व लॉर्ड इरविन की मूर्तियों को भी हटाकर उसे कोरोनेशन पार्क में भेज दिया गया था। शायद यह निर्णय भारत की  स्वतंत्रता को रेखांकित करने के लिये किया गया। 
जिन दिनों जॉर्ज पंजम की मूर्ति हटाई गयी थी, यह सुनने को मिलता था कि शायद वहां महात्मा गांधी की मूर्ति स्थापित की जाएगी। किन्हीं कारणों से ऐसा हो नहीं पाया। और छतरी 1968 से 2022 तक यानी कि 54 साल तक खाली रही।   
भारत की वर्तमान एन.डी.ए. सरकार ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए वहां भारत के महान सपूत नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मूर्ति स्थापित करने का फ़ैसला लिया। साथ ही साथ यह भी घोषित कर दिया कि अब क्योंकि शहीद स्मारक की स्थापना हो चुकी है, इसलिये अमर जवान ज्योति को इंडिया गेट से हटा कर शहीद स्मारक के साथ जोड़ दिया जाएगा और ज्योति वहीं स्थापित हो जाएगी।
कांग्रेस के राज में सुभाष चन्द्र बोस, लाला लाजपत राय, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, राम प्रसाद बिस्मिल आदि की अनदेखी की जाती रही है। आरोप तो यहां तक लगाये जाते रहे हैं कि उस समय के प्रधान मंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू ने ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधान मंत्री को लिखे अपने पत्र में नेताजी को आतंकवादी तक करार दे दिया था। नेता जी के परिवार ने आरोप लगाए थे कि उनके घरों पर जासूसी होती रही है। इंडिया टुडे ने इस पर एक एक्सक्लूसिव स्टोरी भी की थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करके जानकारी दी है। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा कि ऐसे समय जब पूरा देश नेता जी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती मना रहा है, मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि ग्रेनाइट से बनी उनकी भव्य प्रतिमा इंडिया गेट पर स्थापित की जाएगी। यह उनके प्रति भारत के ऋणी होने का प्रतीक होगा। 23 जनवरी को उनकी होलोग्राम प्रतिमा का अनावरण प्रधानमंत्री ने स्वयं किया। जब तक ग्रेनाइट की मूर्ति तैयार नहीं हो जाती, तब तक यह होलोग्राम हमें नेता जी के प्रति नमन होने का अहसास करवाती रहेगी।
विपक्ष और ख़ास तौर पर कांग्रेस ने सुभाष चन्द्र बोस की मूर्ति स्थापना का विरोध किया। और साथ ही अमर जवान ज्योति को हटा कर शहीद स्मारक पर ले जाने पर भी हल्ला किया। यह आरोप भी लगाया गया कि पांच राज्यों में होने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए नेता जी की मूर्ति स्थापित करने की घोषणा की गयी है। 
फ़िल्मी हस्ती जावेद अख़्तर ने एक फ़िल्मी कारण ढूंढते हुए ट्वीट किया, ”नेता जी की मूर्ति लगाने का सुझाव अच्छा है, लेकिन प्रतिमा का चुनाव करना सही नहीं है। हर वक्त प्रतिमा के चारों और ट्रैफिक ही रहेगा और वह प्रतिमा सलामी की मुद्रा में खड़ी रहेगी। यह उसकी मर्यादा के नीचे है। या तो प्रतिमा बैठी हुई मुद्रा में होनी चाहिए या फिर अपनी मुट्ठी उठाते हुए ऐसी मुद्रा में हो, जैसे कोई नारा लगा रही हो।”
अपने इस ट्वीट के कारण जावेद अख़्तर ख़ासे ट्रोल भी हुए। 
मगर सोशल मीडिया पर नेता जी की नाज़ी नेताओं के साथ फ़ोटो साझा की जा रही है और कहा जा रहा है कि नेता जी तो नाज़ियों का साथ दे रहे थे। विपक्ष को यह समझ नहीं आ रहा कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त बनाया जा सकता है। यही राजनीति का नियम है। उस समय ब्रिटेन को यदि कोई नकेल डाल सकता था, तो वो था जर्मनी। वर्तमान और भविष्य को समझने वाले नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने यह जान लिया था कि यदि सैनिक कार्यवाही करके अंग्रेज़ों को भारत से निकालना है तो जर्मनी और जापान से ही सहायता लेनी होगी। 
विपक्ष से न तो निगलते बन रहा है और न ही थूकते। नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का क़द इतना बड़ा है कि उन्हें नकारा नहीं जा सकता। उन्होंने कांग्रेस में रहते हुए महात्मा गांधी के उम्मीदवार को अध्यक्ष पद के चुनाव में हरा दिया था। गांधी जी से सहमति न होने के कारण कांग्रेस में ही फ़ॉर्वर्ड ब्लॉक की स्थापना कर दी थी। विदेश में जाकर आज़ाद हिन्द सेना का गठन; भारतीय सरकार की स्थापना; भारतीय करंसी को अलग से छापना जैसे अद्भुत काम नेता जी ने कर दिखाए। ‘चलो दिल्ली’ का नारा दिया और आज उनकी मूर्ति दिल्ली के बीचो-बीच स्थापित हो रही है। नेता जी के लिये – जय हिन्द।
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

10 टिप्पणी

  1. It is indeed heartwarming to learn that your father had been a part of our Freedom Movement.
    It is a matter of great pride that he loved his country more than a secure job and even when he got one in the Railways after India got freedom he did not encash his participation in the Freedom Movement.
    Your love for Subhash Chandŕa Bose is very natural and your appreciation of the government’s decision to get his statue installed is laudable.
    Regards n congratulations Tejendra ji
    Deepak Sharma

  2. सर्वप्रथम आपने ‘बाऊजी’ से जुड़ी जिन स्मृतियों को सांझा किया उसके लिये साधुवाद और बाऊजी को सादर नमन। नेताजी की 125 वी जयंती के वर्ष में भारत सरकार द्वारा लिए गए निर्णय सहज ही वंदनीय हैं। इस घटनाक्रम पर होने वाली चर्चाओं और विपक्ष के रवैये के ऊपर आपके द्वारा अच्छी बेबाक और स्पष्ट विवेचना की गई, जिसके लिए आप बधाई के पात्र है। वर्तमान भारतीय राजनीति में एक बात तेजी से देखी जा रही है, वह है विपक्ष का रवैया। विपक्ष जिन मुद्दों को अपने कार्यकाल में नजरंदाज करता रहा है, वर्तमान में जब उन मुद्दों पर वर्तमान सरकार कोई एक्शन लेती है तो वह झुंझलाक़र सरकार के साथ उन मुद्दों के भी खिलाफ हो जाते हैं जो सहज ही उनकी हताशा का ही एक उदाहरण है।
    हार्दिक सादुवाद सहित आदरणीय. . .

    • भाई विरेन्द्र वीर जी आपने स्थिति को सही रूप से समझा है। बाऊजी की स्मृतियां तो मेरे जीने का सहारा हैं।

  3. तेजेन्द्र जी, एक और उत्तम सम्पादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई। नेता जी का हमारे स्वतंत्रता संग्राम में जो योगदान रहा, उसे भुला पाना या मिटा पाना संभव नहीं। मैं लम्बे समय से रूस में रहती हूँ, और यहाँ लगभग कोई भी परिवार ऐसा नहीं है जो द्वितीय विश्वयुद्ध की वीभत्साओं से अछूता रहा हो, आज भी किसी भी वॉर मेमोरियल में जाकर लोगों के भावों को देखकर या विचारों को जानकर मेरी आँखें नम हो जाती हैं।
    माना दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, पर अगर वह दोस्त दुश्मन से ज़्यादा घातक हो तो? बस यही एक बात मुझे हमेशा कुरेदती रहती है।

  4. आपके संपादकीय प्रासंगिक विषयों पर होते हैं। आज पुनः आपने ऐसा ही विषय लिया और उसके साथ न्याय किया। बाऊ जी की भावनाओं और विचारों के माध्यम से उस समय के विचारों से भी अवगत कराया। नेता जी के महान कार्यों और उनके अप्रतिम उत्साह के बारे में सोच कर ही रोमांच हो आता है। उन्हें न्याय मिलना ही चाहिए। प्रतिमा लगाना उस प्रक्रिया की शुरुआत कही जा सकती है। ऐसे आवश्यक विषयों को सामने लाने पर आपको बधाई।

    • शैलजा आप निरंतर पुरवाई के संपादकीयों पर टिप्पणी करती हैं। पत्रिका, संपादक और पुरवाई टीम का इससे उत्साह बढ़ता है। सही मायने में यह एक अच्छी शुरूआत है।

  5. अदभुत सँपादकीय। बाबूजी का ज़िक्र अच्छा महसूस हुआ। नेताजी
    सुभाष चन्द्र बोस की मूर्ति की स्थापना एक अहम क़दम है। बच्चों की टेक्स्ट बुक में भी उनके बारे में एक चैप्टर हो जाए तो मूर्ति स्थाफना को Political move नहीं समझा जाएगा।
    मैं बहोत कोशिश कर रही हूँ याद करने की कि दिल्ली मे गाँधी जी की मूर्ति कहां स्थापित है?
    एक बेहतरीन सम्पादकीय के लिए शर्मा जी को बेहद शाबाशी।

    • ज़किया जी आपकी टिप्पणी इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि जैसे घर से शाबाशी मिल रही हो। टेक्सट बुक वाली बात आपने बिल्कुल ठीक कही है।

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