अमरीका के लिये आज के दिन यूक्रेन से केवल इतना ही मतलब है कि अमरीका वहां के खनिजों पर एकाधिकार जमाना चाहता है। अमरीका और यूरोपीय देशों ने पहले तो जेलेंस्की को लालच दिया कि यूक्रेन को नैटो का सदस्य बना दिया जाएगा ताकि उसे नैटो देशों वाले लाभ मिल सकें। मगर अब जेलेंस्की के पाँव के नीचे से सीढ़ी हटा कर उसकी बलि चढ़ाने का निर्णय कर लिया है। इस सिलसिले में राष्ट्रपति ट्रंप के सलाहकारों ने यूक्रेन के विपक्षी दल के नेताओं से संपर्क भी किया ताकि वहां आपस की फूट का फ़ायदा उठा कर चुनाव करवा दिये जाएं और जेलेंस्की की छुट्टी कर दी जाए।
आज का संपादकीय लिखते हुए मुझे महात्मा गांधी की याद आ गई। एक बार की बात है जब महात्मा गांधी गोल मेज़ सम्मेलन में भाग लेने लंदन गये तो वे अपनी धोती पहन कर ही बकिंघम पैलेस चले गये। वहां उन्हें किंग जॉर्ज पंचम से मुलाकात भी करनी थी। इस पर कुछ लोगों ने ऐतराज़ किया। उनसे पूछा गया कि उन्होंने सूट वगैरह क्यों नहीं पहना। इस पर गांधी जी ने जवाब दिया, “मुझे अधिक कपड़े पहनने की क्या ज़रूरत है, जितने कपड़े आपके राजा के बदन पर हैं, वो हम दोनों के लिये काफ़ी हैं।”
कुछ ऐसा ही सवाल एक प्रेस काँफ़्रेंस के दौरान रीयल अमेरिकाज़ वॉइस के चीफ़ कॉरेसपोंडेंट ब्रायन ग्लेन ने यूक्रेन के राष्ट्पति वोलोदीमीर ज़ेलेंस्की से पूछा, “आप सूट क्यों नहीं पहनते हैं? क्या आपके पास कोई सूट है? आप देश के उच्चतम कार्यालय का दौरा करने आए हैं। अमेरिका के बहुत से लोग आपसे नाराज है, क्योंकि उन्हें लगता है कि आप ऑफिस की गरिमा का सम्मान नहीं करते।” पत्रकार का लहजा बदतमीज़ी भरा था।
बहुत शालीनता से इस सवाल का जवाब देते हुए ज़ेलेंस्की ने कहा, “मैं इस युद्ध के खत्म होने के बाद ऐसे कपड़े पहनूंगा… शायद कुछ आपके जैसे या शायद उससे और बेहतर… मुझे नहीं पता… शायद इससे कुछ सस्ता… देखते हैं.”
दरअसल जिस प्रकार अमरीका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने सार्वजनिक रूप से यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदीमीर ज़ेलेंस्की से साथ बदतमीज़ी भरा व्यवहार किया उससे हमें 1941 की एक फ़िल्म का एक दृश्य याद आ गया। फ़िल्म का नाम था ‘सिकंदर’ और उसके मुख्य कलाकार थे पृथ्वीराज कपूर और सोहराब मोदी।
हालांकि यह सीन पूरी तरह से काल्पनिक है और उसकी पुष्टि करने का कोई तरीका हमारे पास नहीं हैं, मगर यह सीन एक सीख अवश्य देता है कि राष्ट्र प्रमुख का व्यवहार कैसा होना चाहिये। इस फ़िल्म के निर्माता निर्देशक भी सोहराब मोदी थे। फ़िल्म में पृथ्वीराज कपूर सिकंदर का किरदार निभाते हैं तो पोरस बनते हैं सोहराब मोदी स्वयं।
इस काल्पनिक सीन में महाराज पोरस को युद्ध में हराने के बाद, सिकंदर तख़्त पर बैठा है और महाराज पोरस उसके सामने बंदी के रूप में खड़े हैं। सिकंदर महाराज पोरस से सवाल करता है, “आपके साथ कैसा सुलूक किया जाए?” इस पर पोरस बने सोहराब मोदी अपनी गहरी आवाज़ में कहते हैं, “जैसा एक राजा को दूसरे राजा के साथ करना चाहिये।” यह सुन कर सिकंदर इतना प्रभावित होता है कि महाराज़ पोरस को तुरंत उनका राज्य लौटा कर रिहा कर देता है और स्वयं अपने देश के लिये निकल जाता है। हमारे पास फ़िल्म के इस सीन का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।
ज़ाहिर है कि अमरीका के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति ने ना तो 1941 की यह हिन्दी फ़िल्म देखी होगी और ना ही उनकी परवरिश में ऐसी सोच शामिल की गई होगी। इसलिये जब वे पत्रकारों के सामने एक स्वतंत्र देश के राष्ट्रपति से बात कर रहे थे तो उन्हें ऐसे डांट रहे थे जैसे किसी स्कूल का प्राचार्य किसी विद्यार्थी को डांट रहा हो। इसके बावजूद जेलेंस्की ने आपा नहीं खोया और बातचीत का लहजा ना बदलते हुए उसे शालीन बनाए रखा।
ट्रंप से हुई बहस के बाद ज़ेलेंस्की को व्हाइट हाउस से जाने के लिए कह दिया गया। इस मुलाकात के मुद्दे यानी रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका से खनिज सौदे पर कोई बात नहीं बन सकी। यूक्रेनी राष्ट्रपति को काफी खराब माहौल में व्हाइट हाउस से निकलना पड़ा। यहां तक कि उनको खाने के लिये भी नहीं पूछा गया। इस घटनाक्रम ने अमेरिका और यूक्रेन के रिश्तों में तनाव पैदा कर दिया है। यूक्रेन को अमेरिका से मिलने वाली मदद पर भी अब अनिश्चितता पैदा हो गई है।
आमतौर पर देखा जाता है कि सरकारें बदल जाती हैं मगर देश की विदेश नीतियां आसानी से नहीं बदलती हैं। जिस प्रकार अमरीका और रूस में नज़दीकियां बढ़ रही हैं उससे हमें साँप और नेवले वाली स्थिति याद आती है। भला साँप और नेवले में दोस्ती कैसे हो सकती है। मगर डॉनल्ड ट्रंप और व्लादिमीर पुतिन की निजी मित्रता ने सभी समीकरण उलटे कर दिये हैं। आज अपने मित्र पुतिन के लिये राष्ट्रपति ट्रंप ब्रिटेन के प्रधानमंत्री और फ़्रांस के राष्ट्रपति की भी बेइज्ज़ती कर सकते हैं।
अमरीका जानता है कि उसकी सैन्य सहायता के बगैर यूक्रेन एक दिन भी रूस से युद्ध नहीं कर सकता। इसलिये डॉनल्ड ट्रंप ने सबसे पहले तो यूक्रेन की सैन्य सहायता बंद करने का ऐलान कर दिया। यूक्रेन पर अतिरिक्त दबाव डालने के लिये उनके साथ ख़ुफ़िया जानकारी साझा करने पर भी पाबंदी लगा दी।
अमरीका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने इस पूरे प्रकरण पर बयान जारी करते हुए कहा है कि, “राष्ट्रपति ट्रंप इस समय दुनिया के एकमात्र ऐसे नेता हैं, जिनके पास यूक्रेन में युद्ध को स्थाई रूप से ख़त्म करने का अवसर है। हम रूस को बातचीत के लिये मेज़ पर लाना चाहते हैं। हम ये पता लगाना चाहते हैं कि क्या इस क्षेत्र में शांति की संभावनाएं हैं।”
डॉनल्ड ट्रंप अमरीका की अब तक की घोषित नीति के पूरी तरह विरुद्ध कार्य कर रहे हैं। वे जेलेंस्की को सार्वजनिक रूप से उघाड़ने का अवसर हाथ से नहीं जाने दे रहे हैं। उन्होंने तो गोपनीयता की शर्त को धता बताते हुए, यह बात भी सार्वजनिक कर दी है कि उन्हें जेलेंस्की का एक महत्वपूर्ण पत्र मिला है जिसमें जेलेंस्की ने शांतिवार्ता के लिये हामी भर दी है। ट्रंप ने तो यह भी कहा है कि जेलेंस्की ने खनिज संसाधनों से जुड़े समझौते पर भी चर्चा की बात कही है। वहीं दूसरी ओर ट्रंप ने यह भी कहा कि पुतिन ने भी शांति स्थापना में रुचि दिखाई है।
यानी कि अमरीका के लिये आज के दिन यूक्रेन से केवल इतना ही मतलब है कि अमरीका वहां के खनिजों पर एकाधिकार जमाना चाहता है। अमरीका और यूरोपीय देशों ने पहले तो जेलेंस्की को लालच दिया कि यूक्रेन को नैटो का सदस्य बना दिया जाएगा ताकि उसे नैटो देशों वाले लाभ मिल सकें। मगर अब जेलेंस्की के पाँव के नीचे से सीढ़ी हटा कर उसकी बलि चढ़ाने का निर्णय कर लिया है। इस सिलसिले में राष्ट्रपति ट्रंप के सलाहकारों ने यूक्रेन के विपक्षी दल के नेताओं से संपर्क भी किया ताकि वहां आपस की फूट का फ़ायदा उठा कर चुनाव करवा दिये जाएं और जेलेंस्की की छुट्टी कर दी जाए।
मगर इस मोर्चे पर भी ट्रंप की नहीं चली। यूक्रेन के विपक्षी नेताओं ने अमरीका को झटका दे दिया है। विपक्षी नेताओं का कहना था कि यूक्रेन जब तक पूरी तरह शांत नहीं हो जाएगा, तब तक चुनाव कराना आसान नहीं है।
यूक्रेन के पूर्व राष्ट्रपति पोरोशंको ने कहा है कि अमरीकी अधिकारियों ने चुनाव को लेकर मुझसे संपर्क किया था, जिसका मैंने विरोध किया है। मैंने उन अधिकारियों से कह दिया है कि जब तक मार्शल लॉ लागू है, यूक्रेन में चुनाव नहीं हो सकता है।
अमरीकी अधिकारियों का मानना है कि अगर अभी यूक्रेन में चुनाव कराए जाते हैं तो ज़ेलेंस्की हार सकते हैं। ज़ेलेंस्की के ख़िलाफ़ युद्ध को लेकर लोगों में नाराज़गी है। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप युद्ध छेड़ने को लेकर जेलेंस्की को फटकार लगा चुके हैं।
हालांकि, ज़ेलेंस्की का कहना है कि हम अपने स्वाभिमान और आज़ादी के लिए युद्ध करेंगे। रूस के हमलों के आगे नहीं झुक सकते हैं। जंग की वजह से यूक्रेन के खारकीव, क्रीमिया, ओब्लास्ट जैसे कई शहर बर्बाद हो चुके हैं।
हमारा मानना है कि यूक्रेन का युद्ध शुरू करने की तमाम ज़िम्मेदारी अमरीका और यूरोप की रही है। अभी तक हमें क्यूबा मिसाइल की घटना भूली नहीं है जब सोवियत रूस ने क्यूबा में मिसाइल तैनात की थीं तो अमरीका ने उन्हें हटाने के लिये विश्वयुद्ध तक की धमकी दे डाली थी। फिर अमरीका और नैटो देशों ने यह कैसे सोच लिया कि रूस अपने दरवाज़े पर मिसाइलें बरदाश्त करेगा। मगर अपनी ख़राब नीतियों के चलते अमरीका ने यूक्रेन का बेड़ा ग़र्क किया… पूरी दुनिया में पेट्रोल के दाम बढ़वा दिये, पूरा विश्व मंदी की चपेट में आ गया और अब ट्रंप और पूतिन गले मिल रहे हैं।
डॉनल्ड ट्रंप ने कुछ इस तरह के निर्णय जारी किये हैं जिससे पूरे विश्व का संतुलन गड़बड़ाने की आशंका है। उनकी निजी राय कुछ भी हो सकती है, मगर अमरीका का राष्ट्रपति जब कोई फ़ैसला करता है तो उसका असर पूरे विश्व पर होता है। अपने एक बयान में ट्रंप ने कहा है कि, “इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि रूस अभी यूक्रेन पर ‘धमाका’ कर रहा है, मैं इस समय रूस पर बड़े पैमाने पर बैंकिंग प्रतिबंध, टैरिफ लगाने पर गंभीरता से विचार कर रहा हूं, जब तक कि युद्धविराम और शांति के लिए अंतिम समझौता नहीं हो जाता।”
भारत को भी समझना होगा कि अमरीका कभी किसी का मित्र नहीं हो पाया। उसका पूरा इतिहास ही दूसरे मुल्कों को तबाह करने का है। वियतनाम, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, यूक्रेन, ईराक़, लीबिया, सीरिया – हर जगह अमरीका का किरदार सवालों के घेरे में रहा है। कैमरे के सामने हंसते हुए फ़ोटो खिंचवाना एक बात है, मगर देश की टैरिफ़ नीति के चलते दूसरे मुल्कों पर दबाव बनाना एकदम दूसरा मुद्दा है। ट्रंप इन दिनों जोकर और विलेन का मिलाजुला किरदार निभा रहे हैं… उनका व्यक्तित्व जल्दी से जल्दी परिपक्व हो पाये, यही हमारी कामना है।
यूक्रेन के राष्ट्रपति और अमेरिका के राष्ट्रपति की इस मीटिंग के बाद सोशल मीडिया पर इतने लेख पढे ।लोगों के विचार देखे।जेलेंस्की को ज्यादातर लोगों ने एक जोकर घोषित करने की कोशिश कर दी।इस मुद्दे पर आपका संपादकीय उन लोगों को जरूर पढ़ना चाहिए।
दिव्या आपने संपादकीय की आत्मा को पकड़ा। बहुत बहुत शुक्रिया।
सही विश्लेषण
युद्ध से शांति आती है क्या?
यह सवाल जो भी देश आपस में लड़ मर रहे हैं उनसे पूछना चाहिए
हार्दिक आभार संगीता। मेरा प्रयास रहा है कि ईमानदारी से विश्लेषण करूं।
फिल्म *सिकंदर* देखनी पड़ेगी…..
जी YouTube पर मौजूद है।
अति सुन्दर सम्पादकीय सराहनीय विष्लेषण
पुरानी कहावत है कि नया मुल्ला क़ारी ज़ोर से अज़ान देता है ! ट्रम्प दूसरी बार नए नए राष्ट्रपति पद पर आसीन हुए हैं ! इसलिए शोर कुछ ज़्यादा हो रहा है और स्वाभाविक भी है ! अब देखना ये है कि आगे क्या होता है ! ब्रिटेन जर्मनी फ्रांस और रूस ने अब कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है अमरीकी सीनेट कांग्रेस ने भी कोई बात नहीं की है ! ये नहीं भूलना चाहिए कि पिछले कार्यकाल में दो बार इम्पीचमेन्ट का सामना कर चुके हैं !
राजनीति में कब क्या होगा कोई नहीं जानता
पांसा कब उल्टा पड़ जाए !
कैलाश भाई, मैं ब्रिटेन की राजनीति में सक्रिय भाग लेता हूं। इस प्रकार का व्यवहार यहां कोई नहीं करता।
यूक्रेन और अमेरिका के राष्ट्र प्रमुखों की मुलाकात व्हाइट हाउस में होना एक अनोखी मिसाल बन गयी। एक तरफा और खुद को सर्वश्रेष्ठ समझने वाले अमेरिका का व्यवहार न अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के अनुकूल है और ही दो राष्ट्रों की गरिमा को कायम रखनेवाला। विश्व के शेष शीर्ष राष्ट्र खामोशी धारण किये हुए है मानो स्वतंत्र प्रतिक्रिया देना उन्हें भी किसी संकट में डाल देगा। बहरहाल जेलेंस्की के साथ किये गये दुर्व्यवहार ने अमेरिका को एक अभिमानी एवं स्वार्थी के रूप में सामने आया है।
रेखा जी, आपने मुद्दे को सही पकड़ा है। समझने के लिये हार्दिक आभार।
माफ़ कीजियेगा लेकिन मालूम नहीं क्यों इस सम्पादकीय में ब्रिटेन की उस नीति की झलक है जिसने ट्रम्प से एक असहज मुलाक़ात के बाद उसने जैलेशकी का एक हीरो की तरह स्वागत किया। मेरी नज़र में युक्रेनी प्रेसिडन्ट अपनी बेवकूफी में पहले अमेरिका के मोहरे बनकर और अब यूरोप के मोहरे बनकर अपने देश को खंडहर बना रहे हैँ, बातचीत के टेबल पर आकर मामले को सुलझाने के जितने भी मौके वे खो रहे हैँ उतने ही वे कमज़ोर होते जा रहे हैँ। जब देश दांव पर लगा हो तो ठसक से काम नहीं चलता, कुछ कूटनीति भी अपनानी चाहिए
भाई आलोक जी, राजनीति और साहित्य – दोनों में हर व्यक्ति अपने कोण से चीज़ों को परखता है। यह स्वतंत्रता आपको भी है। आभार।
तुम सूट पहनकर क्यों नहीं आये संपादकीय अमेरिका जैसे बड़े देशों की छोटे देशों के प्रति उनकी मानसिकता बताता है। यह सच है कि अमेरिका किसी का मित्र नहीं हो सकता। वह पाकिस्तान को भी भारत के विरुद्ध भड़काकर उसे सैन्य सहायता देकर भारत और पाकिस्तान में सदा द्वेष पैदा करता रहा है जिससे भारत सदा कमजोर बना रहे। सिर्फ भारत ही नहीं, इराक, अफगानिस्तान जैसे कई अन्य देश अमेरिका की दादागिरी के उदाहरण हैं।
हर देश की अपनी इज्जत होती है, उसका सम्मान हर देश को करना चाहिए। जहाँ तक यूक्रेन का प्रश्न है, मेरे विचार से उसने नाटो में सम्मिलित होने के लिए रूस से दुश्मनी कर अपने देश को ही बर्बाद किया है। यूरोपिन देश तथा अमेरिका कभी रूस की बढ़ती ताकत को सह नहीं पाये। रूस को तोड़ने के लिए उन्होंने यूक्रेन को सिर्फ मोहरा बनाया। न वह नाटो में सम्मिलित हो पाया न अपने देश को बचा पाया। आज उसके कई क्षेत्र रूस के कब्जे में हैं। हर देश को अपनी नीतियाँ अपने देश के अनुसार तय करनी चाहिए। उसे अपनी सामर्थ्य के अनुसार कोई निर्णय लेना चाहिए न कि दूसरों के भरोसे।
सुधा जी संपादकीय को सही कोण से समझ कर आपने सारगर्भित टिप्पणी लिखी है। यूक्रेन का तो बेड़ा ग़र्क हो गया।
आपके इस संपादकीय में एक तरह से जेलेंस्की के साथ हुए दुर्व्यवहार पर अफसोस जताया गया है। व्हाइट हाउस में उसके साथ जो बदतमीजी हुई है उससे सहमत नहीं हुआ जा सकता है। पर बदतमीजी का दोष किसको दें ? जेलेंस्की को ही न। जो अपने देश को युद्ध में झोंककर जनता को मरने के लिए छोड़ दे, उसे हम नेता कैसे कह सकते हैं। इसीलिए तो कहा जाता है कि पानी पियो छानकर, नेता चुनो जानकर। अमेरिका तथा यूरोप के बहकावे में आकर इसने अपने देश की गत करवा दी। हर लोकतांत्रिक देश अमेरिका को बखूबी जानने लगा है कि ये कैसे हैं। इनके हथियार बिकते रहें , मानवता गई चूल्हे में। मनुष्यता इनके लिए सिर्फ ढोंग है, पाखंड है।
भारत को ही देख लीजिए। लड़ाई में झोंकने में इसने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। ऐसे नहीं माने तो पड़ोसी देश की सरकार गिराकर उकसाया। रूस से संबंध खत्म करने के लिए यूरोप और अमेरिका दोनों ने खूब दबाव डाला। उनका विचार था कि रूस से संबंध खराब हो जाएं तो इसकी भी गत बना देंगे। क्योंकि इसके बाद भारत को किसी भी युद्ध में झोंका जा सकता है। क्योंकि हमारे पड़ोस में भी जेलेंस्की बनाए जा सकते हैं। फिर रूस भारत का साथ भी नहीं देता। रूस से ये सब डरते हैं। पुतिन का स्पष्ट कहना है कि रूस नहीं तो हमारे लिए यह गोला किस काम का।
यूक्रेन के विपक्ष ने प्रभावित किया। भले ही जेलेंस्की ने नासमझी में ये काम कर दिया हो लेकिन वे देश के साथ खड़े हैं जो इस समय जेलेंस्की ही देश है।
तेजेन्द्र सर जी, विश्व की राजनीति पर आपका यह संपादकीय बढ़िया है। इसमें आपका नजरिया स्पष्ट झलकता है। अच्छी संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई
भाई लखनलाल पाल जी, आपकी टिप्पणी महत्वपूर्ण है। आपने संपादकीय को कई कोणों से परखा है। हार्दिक आभार।
शानदार संपादकीय । Is this so call diplomacy? नीतियाँ, सोच या मुद्दे चाहे जो भी रहें हों किसी के साथ बातचीत में उसे घर से जाने के कह देना बच्चों जैसी हरकत है। यूक्रेन को तो पैर का पत्थर बना दिया । बस ठोकर मारते जाओ। पर इन्हें ये नहीं पता कि इसकी नोकें जब अंदर मुड़ जाएगी तो उसमे से नया तराशा हुआ कुछ निकलेगा ।
Diplomatic behaviour के मायने डॉनल्ड ट्रंप को बिल्कुल नहीं मालूम। उनका उपराष्ट्रपति वैंस भी बदतमीज़ है।
अंतराष्ट्रीय दुविधा का विस्तृत उल्लेख है।
साधुवाद
Dr Prabha mishra
धन्यवाद प्रभा जी।
तेजेन्द्र जी आपने अपनी संपादकीय में अमेरिका की उस नीति का खुलासा कर दिया जो वह पिछले काफी सालों से करते आ रहा है। अमेरिका की हमेशा से यही नीति रही है कि दो देशों को लड़वा दो और अपने हथियार बेचो। आपकी संपादकीय अमेरिका की असलियत को उजागर करती है।
आपने सही समझा है मुद्दे को भाई इंद्रजीत जी।
तेजेंद्र शर्मा जी द्वारा लिखित इस बार का पुरवाई पत्रिका में संपादकीय,समूचे विश्व के उन देशों के राष्ट्र अध्यक्षों को नैतिक मूल्य याद दिलाता है। जिन्होंने अमेरिका जैसी बड़ी महाशक्ति के भरोसे आसपास के देश या भूभाग में चौधराहट है दिखाने की कोशिश की है और वे सदैव ही औंधे मुंह गिरे हैं।
उधर ज़ेलेंस्की साहब ने भी यही गलती दोहराई है और अपने विवेक, अपनी ताकत अपने स्वाभिमान या यूं कहें कि अपने राष्ट्र की संप्रभुता को एक दंभी महाशक्ति के यहां गिरवी रख दिया।
पंचतंत्र की कहानी यहां एकदम प्रासंगिक या आज की भाषा में कहें तो फिट बैठती है।
जिसमें एक सांप मेंढक से दोस्ती करता है ।क्योंकि उसे मेंढक को कुछ लोग पसंद नहीं थे ।और उस मेंढक की निशानदेही पर उस सांप ने वे सारे के सारे मेंढक खा डालें जो उस उस दुष्ट और कायर मेंढक के साथी थे और बाद में धीरे-धीरे करके इस मेंढक के परिवार और स्वयं को भी उस मेंढक को सांप का काल ग्रास बना पड़ा था।
नेटो का साथ और सुविधाओं का लालच इस अल्पबुद्धि , शेखीखोर ज़ेलेंस्की को कहां ले आया ये उसे भी तब पता चला जब वह सुयोधन से दुर्योधन की श्रेणी में पहुंच गया।सोवियत संघ के टुकड़े करने के बाद यूक्रेन के खनिजों पर अमेरिका की नज़र थी और नाकामयाब होने की सूरत में डिप्लोमेटिक व्यवहार के स्तर पर अमेरिका का यह व्यवहार याद रखा जाएगा ।
परंतु इसके साथ प्रशंसा यूक्रेन के विपक्ष की करनी होगी जिनकी राष्ट्र भक्ति को एक बड़ा सलाम बनता है।
यही स्थिति याद दिलाती है,सन 1971 के युद्ध की जिसमें बांग्लादेश का जन्म भारतीय लोकतंत्र के हाथों हुआ था।तब विपक्ष के नेता स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेई जी ने देश के हितों की रक्षा और छवि को अमेरिका के सामने मजबूती से प्रस्तुत करने पर उस समय की विवादित प्रधान मंत्री को दुर्गा अवतार तक कहा था।यह संकट के समय में दलगत राजनीति से ऊपर देश को रखने का विरल दृष्टांत है।यूक्रेन का विपक्ष भी ऐसा ही करने के प्रयास में है।
उम्मीद है, जेलेंस्की इसे समझ कर अपने पड़ोसी से संबंध सुधार कर या फिर राजनीति से संन्यास लेकर अपना और देश के गौरव को अक्षुण्ण रखेंगे।
एक उल्लेखनीय और बोल्ड संपादकीय।
आपने समग्रता में संपादकीय की विवेचना की है भाई सूर्यकांत जी। हार्दिक आभार।
अमेरिका तो सभी के लिए आस्तीन का सांप है। वैसे, जब भी सूर्य ग्रहण, चन्द्र ग्रहण होते है तब दो भूकंपों का आना लगभग तय होता है- एक भूगर्भ में दूसरा राजनीतिक में।
सही कहा महेश भाई।
यूक्रेन के राष्ट्रपति और अमेरिका के राष्ट्रपति की जो बातचीत हुई वह हम सब ने टीवी पर भी देखी, अपने शब्दों के माध्यम से बहुत विस्तृत ढंग से इसे प्रस्तुत किया बहुत-बहुत साधुवाद
हार्दिक आभार मुक्ति जी। हमारा प्रयास रहता है कि बात को बढ़ा चढ़ा कर ना पेश किया जाए।
Your Editorial of today rightly reprimands Trump,the bully and speaks of Zelenzky’s resourcelessness against the aggressive Russia.
You have presented the entire scenario emphasizing upon the threat that the world is facing today,both political n financial and also pointed out how
the question put to Zelensky by an impudent American journalist about
regarding not wearing a suit sounds absurd.
Very timely presentation indeed.
Warm regards
Deepak Sharma
Deepak ji we always expect diplomatic behaviour from world leaders Trump and his Deputy Vance. But they are really disappointing!
तेजेन्द्र जी!
महात्मा गाँधी तो अपने जैसे एक ही हैं।
ज़ेलेंस्की ने सही जवाब दिया कि ,”मैं इस युद्ध के खत्म होने के बाद ऐसे कपड़े पहनुंगा”
गोपनीयता की शर्त भंग करना भी छोटी बात नहीं। इस घटना से तो विश्व के सभी देशो को सचेत होने की जरूरत है।
इस संपादकीय के माध्यम से आपने अमेरिका, रूस और यूक्रेन को लेकर जितनी भी जानकारियाँ दी हैं चिंतित करने वाली हैं।
ट्रंप ने जब से पद संभाला है तब से ही वे कुछ ऐसा कर रहे हैं, कि चर्चा में निरंतर बने हुए हैं, किंतु एक राष्ट्राध्यक्ष की हैसियत से अब जो हुआ वह निश्चित अमेरिका के अहंकार को पोषित करता है, शर्मनाक भी है।कम से कम पद का ही सम्मान किया होता। क्या पहनावे से ही किसी की योग्यता सिद्ध होती है?
आपके संपादकीय को पढ़कर विस्तार से इस विषय को जान पाए।
यह बिल्कुल सही है कि एक राष्ट्राध्यक्ष को दूसरे राष्ट्रीयाध्यक्ष का वैसा ही सम्मान करना चाहिए जैसा की होना आवश्यक है।
मोहम्मद गौरी ने जब पृथ्वीराज चौहान को कैद किया था तो उसने भी पृथ्वीराज चौहान से यही प्रश्न किया था कि “तुम्हारे साथ कैसा सलूक किया जाए?”और पृथ्वीराज चौहान ने भी यही जवाब दिया था कि ” एक राजा को जैसा दूसरे राजा के साथ करना चाहिये।”
लेकिन उसने वैसा किया नहीं।
युद्ध कभी किसी भी समस्या का समाधान नहीं होता है।
श्रीराम ने भी अंगद को संदेश लेकर भेजा था और वह नहीं माना। अंततः रावण के संपूर्ण वंश का नाश हुआ। श्री राम भी नहीं चाहते थे कि युद्ध हो।
महाभारत में तो श्री कृष्णा स्वयं पांडवों के दूत बन कर गए,वे भी नहीं चाहते थे कि युद्ध हो। किंतु एक राजा का अहंकार और उसकी महत्वाकांक्षाएँअपनी प्रजा का किस तरह सर्वनाश करती हैं, यह उदाहरण है युद्ध का।
महाभारत युद्ध में एक अरब, 66 करोड़ 20’000 लोग मारे गए थे। पशुधन अलग खत्म हुआ। इतना खून बहा था कि कहते हैं कि आज भी वहाँ की धरती लाल है।
काश!सब यह समझ पाएँ कि सुख सुविधाओं के महलों के अंदर बैठकर युद्ध में हम अपने जिन सैनिकों को झोंक दिया करते हैं उनके परिवार क्या दुआएँ देते होंगे?
चुनिंदा शासकों के अहम् और अनावश्यक
उच्च महत्वाकांक्षाओं की पूर्णता में असंख्य लोगों की बलि असमय चढ़ जाती है।
इस तरह की चीजें बहुत तकलीफ देती हैं।
इस बार का संपादकीय चिंता का विषय है। लगता तो नहीं कि रूस और अमेरिका की मित्रता प्रगाढ़ हो पाएगी।दोनों ही हमेशा एक दूसरे के अपोजिट रहे हैं। वैसे भी हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और होते हैं। सच्चाई भविष्य में नजर आएगी।
हर बार की तरह महत्वपूर्ण संपादकीय के लिए आपका शुक्रिया।
पुरवाई का आभार तो बनता है।
नीलिमा जी आपने तो महाभारत से आजतक के सभी तथ्य इस टिप्पणी से जोड़ दिये। एक अरब 66 करोड़ और बीस हज़ार लोग महाभारत काल में मारे गये – क्या इतने लोग कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े हो सकते थे? यह सवाल परेशान तो कर रहा है… मगर आपने तो कहीं ना कहीं पढ़ा ही होगा… हस्तिनापुर जैसे छोटे से राज्य की इतनी आबादी भी थी क्या… हालांकि ये सवाब संपादकीय से कहीं नहीं जुड़े हैं…
जो साफ़गोई से काम लेता है, मुझे मेरी निजी राय में सही लगता है, भले ही कूटनीति या राजनीति की कोई भी शर्तें हों। हिम्मत होनी चाहिए अपने असली चेहरा को दिखाने की, मुखौटा लगा कर तो गीदड़ भी शेर बन जाते हैं। ट्रंप की यही विशेषता मुझे प्रभावित करती है। अमेरिका कभी किसी का साथी नहीं रहा। यदि आपको विजेयता बनना है तो भावनाओं से नहीं प्रोफेशनलिज्म से काम लेना होता है। मित्र के लिए जान कुर्बान, ये असफल व्यक्ति का रोजानामचा है। जो सफल या जो तैर कर पार होगा, उसका दामन पकड़ो, डूबने वाले का साथ देना यानी ख़ुद भी डूबना। भले ही बाद में आपके गुणगान हों, मरने के बाद कौन आता है देखने कि लोग गाली दे रहे हैं या प्रशंसा कर रहे हैं…
जिलेस्की को अगर पड़ोसियों के दम पर अपने देश को दांव पर लगाना था तो, नतीजा भी भुगतना था। वह यूक्रेन के सर्वनाश के लिए कृतसंकल्प है।
कौन जाने, येल्तसिन, गांधी की तरह वह भी विदेशियों का रोपा हुआ विनाशक हो?
कहते हैं, nothing succeeds like success, पुतिन का पड़ला भारी है तो उसका दामन थामने में समझदारी है।
ट्रंप का यह दूसरा कार्यकाल है, उसमें आत्मविश्वास है। यूँ भी अमेरिका के दादागिरी के दिन जाने वाले हैं। बुझने से पहले दिया भभकता ही है।
एक अच्छे और जानकारी भरे तटस्थ संपादकीय के लिए हार्दिक बधाई और धन्यवाद
आदरणीय शैली जी आपकी साफ़गोई को सलाम। मैं इस मसले में किसी के साथ नहीं हूं… मेरा उद्देश्य विश्व में शांति ही है।
बड़े बेआबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले। जेलेंस्की जोकर हैं और ट्रंप बादशाह यह तो समय ही तय करेगा। मगर राजनय की ऐसी विफलता कभी देखी सुनी नहीं गयी।
ड्रेस कोड आदि भी एक अभिजात्य दिखावा है और प्रबुद्ध लोग इससे दूर रहते हैं। जैसे सुना है कि किसी ने एक बार बर्ट्रैंड रसेल या चर्चिल की टाई के रंग पर कोई टिप्पणी की थी तो उनका जवाब था कि जो देश टाई के रंग पर इतना ध्यान दे रहा है उसका क्या भविष्य होगा?
आपने बदलते वैश्विक राजनीतिक समीकरण पर बहुत अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत किया है। कई नये बदलाव सचमुच आश्चर्य में डालने वाले हैं। मगर एक शुभ पक्ष है कि अचानक चीन भारत से मित्रता प्रगाढ़ करने को उत्सुक हो गया है।
अरविंद भाई, एक मज़ेदार टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
जितेन्द्र भाई; वो राष्ट्रपति जो अपने ही देश के कैपिटल हिल पर गुण्डों को भेजकर तोड़ाफोड़ करवा सकता है और बाद में दुबारा सत्ता में आने पर उन सभी गुण्डों को माफ़ कर सकता है उसको दुबारा सत्ता में लाने के लिए तो अमरीकी वोटर का ही हाथ है न? इस से आपको आम अमरीकी जन्ता की बुद्धी का अंदाज़ा लग सकता है कि उन में सोचने समझने की कितनी क्षमता है। जैसा बोओगे वैसा काटोगे, अब झेलो ट्रंप की जहालतें।
व्हाइट हाउस में जेलेंस्की के साथ हो रही बेइज़्ज़ती भरे माहॉल को हम लाइव देख रहे थे। और यहाँ पर ट्रंप के और वाँस के बदतमीज़ी के व्यवहार ने शराफ़त की सारी हदें तोड़ दी थी। अपना उल्लू सीधा करने के लिए अमरीका और यूरोप की ‘चढ़ जा बेटा सूली पर और भली करेंगे राम’ वाली कूटनीति में जेलैंस्की ऐसा फंसा जैसे सांप छुछन्दर को चूहा समझ कर मुंह में डाल तो ले लेता है लेकिन अगर वो उसे निगलता है तो उसका पेट फट जाएगा औरअगर छोड़ता है तो अंधा हो जाएगा। जेलेंस्की का भी यही हाल है और जब नीचे से सीढ़ी खेँच ली गई हे तो उस बेचारे के पास अपने खनिज पदार्थ देने के इलावा कोई चारा नहीं है।
काबिले ग़ौर बात है कि USSR के समय वहाँ के बहुत से नेता रूस और युक्रेन से थे। USSR की मानी हुई हस्ती ख्रुश्चोव भी युक्रेन से थी। रूस का क्युबा में मिसाइल लगाना और अमरीका की विश्व युद्ध की धमकी का आप ने ज़िकर किया है। ऐसे माहॉल में रूस युक्रेन को नेटो का मैम्बर कैसे बनने देगा। वो भी वही केगा जो अमरीका ने उस समय किया था।
ट्रंप के पागलपन के इस नए नमूने से तो आप वाकिफ़ होंगे। सत्ता में आते ही पड़ौस के कैनेडा और मैक्सिको पर इम्पोर्ट सामानों पर 25% टैरिफ़ लगाने का फ़रमान जारी कर दिया और उसकी एक तारीख़ भी फ़िक्स करदी। इसी बीच जब इन दोनों देशों ने भी जवाबी हमला करने की चेतावनी देदी तो आख़िरी दिन टैरिफ़ लगाने की तारीख़ आगे खिसका दी। यह सलाइडिंग डेट पॉलिसी सब के लिए सिरदर्द बन गई है। औण्टेरियो के मुख्य मन्त्री डग फ़ोर्ड ने तो जो बिजली अमरीका के मिशिगन, न्यु यॉर्क, मिनिसोटा को जातौ है उसके बारे में कहा है these three states would face tariffs on electricity after a week of President Trump’s swipes at Canada with fluctuating trade policies.
कैनेडा में नए प्रधान मन्त्री का चुनाव हो गया है। यह वही मार्क कार्नी है जिसने कैनेडा और इँगलैण्ड के बेंकों के गवर्नर बनकर दोनों देशों की आर्थिक स्थिती को ठीक किया था। सेर को सवा सेर अब मिला है। बाकी समय बतायेगा।
भाई विजय विक्रान्त जी, आपकी धीर गंभीर और समझदार टिप्पणी के लिये दिल से शुक्रिया।
अमेरिका अपने हित पहले देखता है। इसके लिए वह तानाशाहों/ सैनिक शासकों का समर्थक भी रहा है। साथ में प्रजातंत्र का ढिढोरा भी पीटता रहता है। जेलेंस्की को अपनी भाषा( यूक्रेनी) में बात करनी चाहिए थी अनुवादक बीच में होने से शायद राष्ट्रपति ट्रंप हावी नहीं हो पाता। जेलेंस्की की शिक्षा शायद अमेरिका में हुयी है। अच्छा विश्लेषण है। शक्ति का कोई विकल्प नहीं है या तो शासक उदार हो!
सर, अमेरिका की तानाशाही अब जगजाहिर हो चुकी है और ट्रंप तो अपने अहंकार के चलते सामान्य शिष्टाचार भी निभाने से चूक जाते हैं। आपके लेखों से विश्व राजनीति को संतुलित दृष्टि से देखने और समझने का मौका मिलता है।
बहुत बढ़िया आलेख सर… खरी खरी बात..
प्रिय भाई तेजेंद्र जी,
आपका हर संपादकीय बड़ी दिलचस्पी के साथ पढ़ता हूं, पर इस बार ट्रंप की विचित्र अकड़-फूं और घनघोर घमंडी तेवरों पर आपने जिस तरह अंदर-बाहर की परतें खोलते हुए, तीखा और खरा संपादकीय लिखा है, वह सिर्फ और सिर्फ आप ही लिख सकते थे।
हां, आपने उनके अस्थिरमतित्व के जल्दी किसी सम या संतुलित दृष्टिकोण पर आने की जो आशा की है, वह तो भाई तेजेंद्र जी, मुझे लगता है, एक दुराशा ही साबित होने वाली है। क्योंकि इस शख्स का घमंड खुद इसके काबू में नहीं है, और यह कब, कहां, किससे क्या कह जाएगा, यह तो खुद इसे ही पता नहीं। एक बड़ी विचित्र अहम् की डोरी है, जिस पर हम इस शख्स को किसी नट की तरह बड़ा विचित्र नृत्य करते देखते हैं, जिसमें अजब-गजब स्थितियां सामने आ रही हैं, और इससे भी ज्यादा अभी सामने आने वाली हैं।
यों मैं समझता हूं, अब सारी दुनिया ही इस तमाशे को देखने की अभ्यस्त हो गई है, और इस शख्स को अलग छोड़कर अपना अलग निर्णय लेने के लिए खुद को तैयार कर रही है। अमेरिका के ज्यादा अकड़-फूं दिखाने पर, उसे एकदम अलग छोड़कर ब्रिटेन और यूरोपीय देशों का यूक्रेन की मदद के लिए एक साथ आगे आना भी कुछ ऐसा ही है, जिसमें ट्रंप और अमेरिका दोनों की एक साथ बेइज्जती हुई।
आपने बिल्कुल सही कहा भाई तेजेंद्र जी, कि यह शख्स जोकर और विलेन का मिला-जुला रूप है। पर मुझे लगता है, धीरे-धीरे ट्रंप के ऊटपटांग फैसलों और उन्हें फिर-फिर पलटने की हड़बड़ाहट में, यह जो जोकर वाला तत्व है, बढ़ता ही जाएगा, और ट्रंप को अमेरिका के एक ऐसे राष्ट्रपति के रूप में जाना जाएगा, जिसने अपनी अजीबोगरीब तुगलकी नीतियों की वजह से खुद को, और अपने साथ-साथ अमेरिका सरीखे मुल्क को भी लगभग हास्यास्पद बना दिया।
अलबत्ता, ऐसे खरे और विचारोत्तेजक संपादकीय के लिए भाई तेजेंद्र जी, आपको और पुरवाई को भी बार-बार बधाई और साधुवाद!
स्नेह,
प्रकाश मनु
नमस्ते सर
बहुत ही महत्वपूर्ण, विचारणीय आलेख है सर