‘शिक्षक से संवाद’ साक्षात्कार शृंखला की नौवीं कड़ी में प्रो. विनोद कुमार मिश्र से हमारे प्रतिनिधि पीयूष कुमार दुबे ने बातचीत की है। विनोद जी, त्रिपुरा विश्वविद्यालय में हिंदी के विभागाध्यक्ष हैं। इसके अतिरिक्त आप विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरिशस के महासचिव के रूप में भी पाँच वर्ष तक अपनी सेवा दे चुके हैं। प्रस्तुत साक्षात्कार में विनोद जी ने अपने अकादमिक जीवन से लेकर शिक्षा, साहित्य, विचारधारा आदि विभिन्न विषयों पर खुलकर बातचीत की है।
प्रश्न – नमस्कार विनोद जी, पुरवाई से बातचीत में आपका स्वागत है। बातचीत आगे बढ़ाने से पूर्व मैं चाहूँगा कि आप हमारे पाठकों को अपनी अब तक की जीवन-यात्रा का एक संक्षिप्त परिचय दे दीजिये।
प्रो. विनोद कुमार मिश्र – आपको और पूरे पुरवाई समूह को हृदय से धन्यवाद। मेरा जन्म वाराणसी के एक सुदूर छोटे से गाँव हरिहरपुर में 22 जून, 1965 को हुआ था। मेरे पिता का नाम पारसनाथ मिश्र और माता का नाम अमरावती देवी है। वे दोनों अब स्वर्गीय हो चुके हैं। प्राथमिक से लेकर बारहवीं तक की शिक्षा गाँव में और उसके आस-पास स्थित विद्यालय में हुई। बारहवीं के बाद स्नातक करने के लिए मैं वाराणसी आ गया और काशी विद्यापीठ में प्रवेश लिया। वहाँ से मैंने स्नातक, परास्नातक और एम. फिल. की उपाधि प्राप्त की। एम. फिल. करने के दौरान ही मैंने दिसंबर 1987 से तदर्थ प्रवक्ता के रूप में राममनोहर लोहिया महाविद्यालय, भैरव तलाब, वाराणसी में अध्यापन आरंभ किया। महाविद्यालय की स्थिति मेरे लिए अनुकूल नहीं थी लेकिन उन दिनों की खट्टी–मीठी यादें आज भी मेरे जेहन में यथावत बनी हुई हैं –
मैं खंडहर हो गया पर न तुम मेरी याद से निकले।
मगर तुम्हारे नाम का पत्थर मेरी बुनियाद से निकले।
उन्हीं दिनों मैंने पी-एच. डी. के लिए ‘काशी हिंदू विश्वविद्यालय’ में प्रवेश लिया। पी-एच. डी. करने के दौरान ही मेरा चयन अरुणाचल प्रदेश में लेक्चरर के रूप में हो गया। बेरोजगारी की पीड़ा से निजात मिली और चल पड़ा उस निर्जन वीरान पहाड़ों की ओर, अन्यथा-
मुझे क्या काम था उस महफिले वीरां में जाने का
छुड़ाया आबदाने ने कदीने आशियाँ अपना ||
आरंभ में मुझे जवाहर लाल नेहरू शासकीय महाविद्यालय, पासीघाट पदस्थ किया गया| वहाँ मैंने लगभग एक वर्ष तक कार्य किया। तत्पश्चात मुझे शासकीय महाविद्यालय, ईटानगर में स्थानांतरित किया गया। इस महाविद्यालय में मेरे जीवनगीता के अट्ठारह अध्याय लिखे गए अर्थात वहाँ 18 वर्ष तक सेवाएँ दीं। इस दौरान तमाम तरह के साहित्य और प्रशासनिक गतिविधियों में लगातार सक्रिय रहा। वहाँ रहते हुए मैंने विश्व बैंक द्वारा अनुदानित प्रोजेक्ट में अकादमिक सलाहकार के रूप में कार्य किया। आकाशवाणी और दूरदर्शन के लिए अनेक कहानियों का नाट्य-रूपान्तरण किया, एकांकी लिखी, नाट्य-मंचन का निर्देशन किया, साक्षात्कार लिया और अनेक महत्वपूर्ण विचारकों तथा राजनीतिज्ञों से संवाद किया।
वर्ष 2009 में त्रिपुरा विश्वविद्यालय में मुझे सह-आचार्य के पद पर नियुक्त किया गया। मैं अरुणाचल में तो रम गया था लेकिन इस स्थानांतरण ने मुझमें नई ऊर्जा भरने का कार्य किया। अरुणाचल से निकलते हुए मुझे एक शेर हमेशा याद आता रहा –
जानेवाला तो जाता है तस्वीर मगर रह जाती है
हर प्रीत नगर के कैदी की जंजीर मगर रह जाती है॥
बहरहाल, त्रिपुरा विश्वविद्यालय में आने के बाद जितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा उसकी कल्पना मैंने कभी नहीं की थी – अपने देश में रहकर भी बहिरागत (बाहर से आया हुआ)। मार्क्सवाद का चोला ओढ़े गुंडों के बीच इकलौता देशभक्त होने का दंड यह मिला कि मुझे अभिमन्यु की भांति कदम-कदम पर अकेले ही लड़ना पड़ा। सुखद बात यह रही कि इस लड़ाई में मैंने कभी हार नहीं मानी। स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की बातें हमेशा पथ-प्रदर्शित करती रहीं – हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा। इसका प्रतिफल यह हुआ कि वैचारिक दुश्मनों के द्वारा तमाम तरह के अंकुश और अत्याचार के बावजूद मैं सदैव आगे बढ़ता रहा। विश्वविद्यालय में अपने जीवन के सात वर्ष व्यतीत करने के बाद 2016 में विदेश मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा मुझे विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस का महासचिव नियुक्त किया गया। मॉरीशस में मैं 5 वर्ष 2 महीने तक महासचिव के पद पर कार्य करते हुए अकादमिक और प्रशासनिक गतिविधियों में मैं वैसे ही डूब गया था जैसे अज्ञेय का ‘प्रियंवद’! खैर वहाँ से मैं जुलाई 2021 में कर्तव्यमुक्त हो गया। एक सार्थक और सफल कार्यकाल पूरा कर अब मैं लौटकर पुनः उसी भूमिपर वापस आ गया हूँ जहां से लड़ते-झगड़ते हुए गया था। क्योंकि – मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै/ जैसे उड़ि जहाज की पंछी, फिरि जहाज पै आवै॥ त्रिपुरा से मॉरिशस जाते समय अपने विदाई के समय एक शेर कहा था –
हालात तब से अब के अक्सर बदल गए होंगे |
जिन्हें मासूम छोड़ आया था वे कातिल बन गए होंगे ||
यहाँ आकर बिलकुल मासूमों को कातिल बना पाया | विश्वविद्यालय का रंग-ढंग देखकर मैं चकित रह गया। फिजा में केसर की नई खुश्बू समा गई थी। ‘लाल’ रंग ‘भगवा’ में बदल चुका था, कॉमरेड के सम्बोधन पर फूले न सामने वाले लोग अब ‘जय श्रीराम’ का उद्घोष कर रहे थे।


