
नासिरा शर्मा वर्तमान समय की महत्वपूर्ण कथाकार हैं जिन्होंने कुइयांजान, ज़ीरो रोड, पारिजात, अक्षयवट, काग़ज़ की नाव जैसे उपन्यास हिन्दी जगत को दिये। उनके कहानी संग्रहों में शामिल हैं – पत्थरगली, इब्ने मरियम और ख़ुदा की वापसी।
नासिरा जी जब ‘कुइयांजान’ के लिये ‘इंदु शर्मा कथा सम्मान’ ग्रहण करने लंदन आईं थीं तो उन्हें कथा यूके की संरक्षक ज़किया ज़ुबैरी जी के साथ कुछ दिन रहने का मौक़ा मिला था। दोनों में एक ख़ास रिश्ता बन गया। इसलिये जब नासिरा जी से साक्षात्कार के बारे में सोचा गया तो ज़किया जी से बेहतर नाम दिमाग़ में नहीं आया। शायद इसीलिये यह साक्षात्कार केवल साहित्य तक सीमित नहीं है… कुछ अपनेपन वाले सवाल भी पाठकों को मिलेंगे। आप महसूस करेंगे कि नासिरा जी ने हर सवाल का जवाब बहुत खुल कर दिया है।
ज़किया ज़ुबैरीः नासिरा जी जब आपने लिखना शुरू किया तो आपको लिखने के लिए क्या प्रेरित करता था … और आज जब आपको विश्व भर में सम्मानित किया जा चुका है, आप हिन्दी की जानी मानी उपन्यासकार हैं तो आपको अब क्या प्रेरित करता है कि आप क़लम उठाएँ?
नासिरा शर्माः मेरे घर का माहौल। सभी लिखते पढ़ते रहते थे। उनकी देखा-देखी कहें या अन्दर की इच्छा कहें जिसने कुछ बुनने के लिए प्रेरित किया। घर में कहानी-किस्सों का बड़ा ज़ोर था। बच्चों की कहानियाँ जिसको आप लोक-कथा कह सकते हैं या धर्म से जुड़े कुछ व्यक्तित्व का बयान। इसी के साथ जानवरों व जिन्नातों की कहानियाँ जिस में काली-बिल्ली या बिल्ले की भूमिका होती। दूसरी तरफ ख़ानदानी क़िस्से जो परिवार में हुई घटना, दुर्घटना के साथ परिवार के पुरखों की मजेदार आदतें और उनसे जुड़े अन्य लोगों का बयान। ऐसी लच्छेदार दास्तानें, उस पर से चुटीली, चटखीली ज़बान में हुए संवाद। जिसमें इस बात का लिहाज कि किससे किस हैसियत से बात की जाए। इस माहौल में पलने बढ़ने वाला कौन बच्चा न होगा जो बुज़ुर्गों की तरह कहानी सुनाना नहीं चाहेगा। वही क़िस्सागोई आप कहानी के रूप में लिखने लगते हैं।
ज़किया ज़ुबैरीः प्रश्न का दूसरा हिस्सा अभी बाक़ी है नासिरा जी…
नासिरा शर्माः अरे हां… ज़किया साहिबा अगर आप अपने अन्दर के क़िस्सागो को शोहरत, इज्ज़त और पुरस्कार के प्रभाव से बचा पाते हैं तो फिर आपका दिल व दिमाग बदलते हालात को उसी तरह देखता और महसूस करता है जब आप ने लिखना शुरू किया था। यह अलग बात है कि लिखने के अभ्यास से और अध्ययन से आपकी अवलोकन की क्षमता बढ़ती और सूक्ष्म होती है यह दुनिया ठहरी हुई तो है नहीं। उसमें न केवल परिवेश बदलता है बल्कि नई-नई घटनाएँ और समस्याएँ लगातार समन्दर की लहरों की तरह पछाड़ती आपको भिगोती और झिंझोड़ती है। लेखक की ‘हिस’ जब तक ज़िंदा है वह लिखेगा। उसका न कोई अन्त है और न ही शर्त है। मैं अपने लिए सिर्फ इतना कह सकती हूँ कि मेरे अन्दर का खदबदाता ज्वालामुखी अभी शांत नहीं हुआ है। पुरस्कार मुझे मिलते रहे हैं। अपने समय के वे सारे पुरस्कार बहुत महत्वपूर्ण हुआ करते थे आज लाखों में आज लाखों वाले पुरस्कारों की चर्चा खासी रहती है जो मुझे बहुत बाद में मिले और साहित्य अकादमी पुरस्कार भी। चूंकि आप की नज़र किसी मंजिल पर नहीं टिकी थी और न रिटायरमेंट पर, तो आपको आपका परिवेश प्रेरित करता है लिखने के लिए। आपका पाठक वर्ग आपसे पूछता है नया क्या आने वाला है? और यह भी सच है कि हर नई पीढ़ी के साथ आपके पाठक जुड़ते और छूटते जाते हैं। कुछ नदियां सूख जाती हैं कुछ बहती रहती हैं।
ज़किया ज़ुबैरीः इलाहाबाद का आपके व्यक्तित्व पर कैसा असर रहा? क्या आपको अपने लेखन के लिए अपने बचपन की कुछ घटनाओं से सामग्री मिली?
नासिरा शर्माः जीवन में बचपन एक अहम भूमिका निभाता है। उसको यादें, कुछ अनबूझे प्रश्न, कुछ अधूरे दृश्य, आपके अवचेतन में पड़े रहते हैं जिनका जवाब आपको बड़े होने पर भी नहीं मिलता है और कुछ गुत्थियाँ समझ के साथ सुलझ भी जाती है। मेरे शहर और मेरे परिवार का असर मेरे व्यक्तित्व को बनाने में रहा है। मेरे लेखन में इलाहाबाद शहर का परिवेश उभरता है। मेरा दूसरा कहानी संग्रह ‘पत्थरगली’ नाम से आया। जिसकी कहानी मैंने लिखी होगी अस्सी के दशक में और इसका प्रकाशन वर्ष 1986 रहा। वह लगातार नए संस्करण में छपता व पढ़ा जाता है। नए लोग जो बहुत कुछ आज के हालात पर लिखते और पढ़ते हैं, वह भी उन कहानियों में डूब जाते हैं। अरसे बाद मेरा उपन्यास ‘अक्षयवट’ 2003 में आया जो इलाहाबाद पर लिखा मेरा पहला उपन्यास था जिसमें पहली बार मैने जगह के नाम वैसे ही रखे जैसे थे तब पता नहीं था कि खुद इलाहाबाद का नाम बदल दिया जायेगा। इसके बाद ‘कुइयांजान’ 2005 में आया। जीरो रोड ‘2008’ में और ‘पारिजात’ 2012 में। अब आप सोच सकते हैं कि यह चारों उपन्यासों के लिखने में इलाहाबाद ने मुझे कितना कुछ दिया है जो मैं ज़मीनी समस्याएँ उस शहर से उठाती हूँ और उस शहर की समस्याओं को विश्वस्तर की समस्याओं से जोड़ देती हूं क्योंकि मानवीय समस्याएं और उनसे जुड़ी अनेक समस्याएँ लगभग सभी देशों में एक सी हैं।


वाह
आदरणीय ज़किया जी द्वारा लिया गयासाक्षात्कार बहुमत
अच्छा है नासिराजी के कृतित्व की पूरी जानकारी से सराबोर
है ।
नासिरा आपा से ज़किया जी की ये बातचीत एक दृष्टिसम्पन्न वरिष्ठ लेखिका को जानने का सुख देती है और हम जैसों को एक दृष्टिकोण से समृद्ध भी करती हैं। पुरवाई टीम और जकिया जी का आभार ये बातचीत उपलब्ध कराने के लिए।
आपा का एक मानीखेज साक्षात्कार – हार्दिक बधाई
रौनको के लुट जाने का समय एक आंधी की तरह आता है , और जज़्बातन हम ये सोचते हैं कि हम उस आंधी को परास्त कर देंगे; नादाँ जज़्बात राजिस्थानी अंधड़ को पुरवाई समझते हैं!
इस रोचक व् ज्ञान वर्धक भेंट वार्ता के लिए पुरवाई परिवार को धन्यवाद!
बहुत ही प्रभावशाली इंटरव्यूह. कई वाक्य दिल को छू गए.
बहुत ही रोचक और प्रभावशाली इंटरव्यूह. कई व्क्क्य दिल को छू गए. नासिरा शर्मा और जकिया जुबैरी, दोनों को बधाई .