लेखक में 'बिना पैसे के पैर नहीं हिलाएंगे' वाली बात नहीं होनी चाहिए - कुलदीप राघव 1
कुलदीप राघव

कुलदीप राघव उभरते हुए युवा लेखक हैं। इनकी तीन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें आखिर की दो किताबें प्रेम विषयक उपन्यास हैं और पाठकों के बीच जगह बनाने में कामयाब रही हैं। आज कुलदीप से पुरवाई टीम ने उनकी किताबों, हिंदी लेखन के आर्थिक परिदृश्य आदि विषयों पर बातचीत की है।

सवाल – नमस्कार कुलदीप जी, पुरवाई से बातचीत में आपका स्वागत है. आप एक उभरते हुए युवा लेखक हैं. आपकी अबतक तीन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो प्रेम कहानियाँ हैं। आप पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े हैं, फिर वैसा कोई विषय लेने की बजाय प्रेम कहानियों के प्रति इतने आकर्षण के पीछे कोई विशेष कारण ? अपनी किताबों और उनकी रचना-प्रक्रिया के बारे में कुछ बताइए।
कुलदीप राघव – पत्रकार और कहानीकार, इन दोनों में ही एक बात कॉमन है और वो है लेखक। पत्रकार और कहानीकार दोनों ही लेखक होते हैं। मेरी पहली पुस्‍तक वर्ष 2014 में प्रकाशित हुई जोकि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से संबंधित थी- ‘नरेंद्र मोदी-एक शोध’। 2014 की चुनाव कवरेज के दौरान नरेंद्र मोदी जी के बारे में जो कुछ जाना-समझा, सब कुछ इस किताब में समाहित है। इस पुस्‍तक का आना मेरे लिए अप्रत्‍याशित था। इसके बाद कई वर्ष तक पुस्‍तक लेखन का कोई विचार मन में नहीं था। आठवीं-नौंवी कक्षा से कहानियां पढने का शौक लग गया था। सिलेबस से हटकर जो भी किताब मिले, बस उसे निपटा देना और उसी समय से प्रेम कहानियों के प्रति सहज झुकाव हो गया। कह सकते हैं स्‍कूल लाइफ थी और स्‍कूल में नए नए प्रेम के किस्‍से थे। यही वजह रही कि प्रेम के प्रति मन अधिक लगता। जब अपनी अगली पुस्‍तक रचने का वक्‍त आया तो कलम से प्रेम कहानी ही निकली- ‘आईलवयू’, जिसे पाठकों ने उम्‍मीद से बेहतर प्‍यार दिया। राजनीति, समाज, आध्‍यात्‍म, पौराणिक, विज्ञान आदि के पाठक अलग अलग हो सकते हैं लेकिन ये सभी प्रेम के पाठक जरूर होते हैं।
सवाल – एक नए लेखक के रूप में पहली किताब छपवाने के लिए आपको कितनी मशक्कत करनी पड़ी ?
कुलदीप राघव – पहली किताब यानि ‘नरेंद्र मोदी-एक शोध’ के प्रकाशन के लिए खास मशक्कत नहीं करनी पड़ी चुंकि अमर उजाला के मेरे एक संपादक महोदय का मार्गदर्शन मिला था। किताब छपने की क्‍या प्रक्रिया होती है, उसमें उन्‍होंने काफी मदद की। हालांकि आईलवयू को लेकर कुछ इंतजार जरूर करना पड़ा। हर लेखक की तरह देश के शीर्ष हिंदी प्रकाशकों के साथ प्रकाशित होने की इच्‍छा होना स्‍वाभाविक था लेकिन वहां से वही उत्‍तर मिला जो 80 प्रतिशत नवोदित लेखकों को मिलता है- हमारे पास अधिक पांडुलिपि कतार में हैं। इसके बाद साल 2017 के पुस्‍तक मेले में रेडग्रैब बुक्‍स के वीनस केसरी जी से मुलाकात हुई। उनकी पुस्‍तकों के कलेवर, प्रकाशन का तरीका अच्‍छा लगा तो आगे बातचीत की। पांडुलिपि उन्‍हें पसंद आई और प्रकाशक द्वारा पूर्ण प्रकाशकीय खर्च स्‍वयं कर पुस्‍तक प्रकाशित करने का करार हो गया।
सवाल – पहली किताब के बाद क्या प्रकाशन की राह कुछ आसान हो गयी या चुनौतियाँ यथावत बनी रहीं ?
कुलदीप राघव – ‘आईलवयू’ पुस्‍तक ने लेखन जगत में स्‍थापित करने का काम किया जिसकी बदौलत ‘इश्‍क मुबारक’ के प्रकाशन में कोई चुनौती सामने नहीं रही। आईलवयू की सफलता ने इश्‍क मुबारक को नए मुकाम पर पहुंचाया। देश ने जाने माने गीतकार मनोज मुंतशिर ने किताब की भूमिका लिखी जिससे पुस्‍तक काफी सशक्‍त हुई। पाठकों ने इश्‍क मुबारक को पहले ही सप्‍ताह में अमेजन बेस्‍ट सेलर बनाया। देश के तमाम मीडिया समूहों ने समीक्षाएं प्रक‍ाशित कीं, सोशल मीडिया पर खूब चर्चा होती है। नतीजा ये रहा कि पहले जिन शीर्ष प्रकाशकों ने ‘पांडुलिपि कतार में हैं’ वाला जवाब दिया, उनकी नजर में मेरा काम आया और उनसे बातचीत होने लगी। भविष्य की राह काफी सुगम होने वाली है।
सवाल – आजकल सोशल मीडिया पर #NoToFree नामक एक अभियान कुछ लेखकों द्वारा चलाया जा रहा है। इसके पक्ष-विपक्ष दोनों तरफ अपने-अपने तर्क हैं। आप इस अभियान को कैसे देखते हैं ?
कुलदीप राघव – यह बात बिलकुल सही है कि एक लेखक को उसके कार्य के अनुरूप उचित मानदेय मिलना चाहिए लेकिन इसके लिए किसी संविधान की आवश्‍यकता नहीं है। मेरे कहने का मतलब है कि ‘बिना पैसे के पैर नहीं हिलाएंगे’ वाली बात नहीं होनी चाहिए। कहीं रुपया मायने रखता है तो कहीं व्‍यक्तिगत संबंध। यह लेखक को तय करना है कि कहां किस बात को अधिक अहमियत देनी है। कुछ आयोजन इतने बड़े स्‍तर के होते हैं कि वहां के मंच पर शामिल होना ही किसी के लिए गौरव की बात होती है। साहित्‍य आजतक और टाइम्‍स लिट फेस्‍ट जैसे आयोजनों के लिए लेखक क्‍या बड़े सेलिब्रिटी किसी तरह की डिमांड नहीं करते। मुझे लगता है कि #NoToFree अभियान के तहत पारदर्शी होने की जरूरत है। यह अभियान केवल कार्यक्रमों में पैसे लेकर बोलने तक सीमित ना रहे। रॉयल्‍टी को लेकर प्रकाशकों के भेदभाव पर भी लागू हो।
सवाल – किसी लेखक के लिए आय का प्राथमिक स्रोत उसकी किताब की रॉयल्टी होती है, अतः क्या इवेंट वगैरह में पैसे लेकर जाने से पहले बात किताब की रॉयल्टी पर नहीं होनी चाहिए ?
कुलदीप राघव – इस सवाल से पिछले सवाल के जवाब में मैंने वही बात कहना चाही। यह अभियान केवल कार्यक्रमों में पैसे लेकर बोलने तक सीमित ना रहे। रॉयल्‍टी को लेकर प्रकाशकों के भेदभाव पर भी लागू हो। प्रकाशक ही लेखक को बताता है कि कितनी पुस्‍तकें बिकीं और लेखक को उस पर यकीन करना ही होता है। ऐसे में पारदर्शिता होना बहुत जरूरी है। ना जाने कितने करार रॉयल्‍टी की वजह से टूटे हैं।
सवाल – पहले लेखक केवल किताब लिखते थे और छपने के बाद उसे पाठकों पर छोड़ देते थे। अब लेखक, विशेषकर युवा लेखक, किताब बेचने का अतिरिक्त भार भी उठा लिए हैं। हिंदी में पहले ही पूर्णकालिक लेखकों की कमी है, ऐसे में आपको नहीं लगता कि किताब लिखने के साथ-साथ बेचने का भार लेखकीय गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है ? साथ ही, क्या ऐसा करके प्रकाशकों को उनके बचे-खुचे दायित्वों से भी मुक्त होने का अवसर नहीं दिया जा रहा ?
कुलदीप राघव – मैं किताब लिखकर छोड़ देने में यकीन नहीं करता हूं, बल्कि उन लेखकों में शामिल हूं जो अपनी किताब के प्रमोशन में जी जान लगा देते हैं। बहुत से वरिष्‍ठ इसको ठीक नहीं ठहराते। मेरा व्‍यक्तिगत ऐसा मानना है कि आज के दौर में लेखक के लिए लिखना जितना जरूरी है, दिखना और बिकना भी उतना ही जरूरी है। दिखने और बिकने से लेखकीय गुणवत्ता प्रभवित होगी, इससे मैं सहमत नहीं हूं। मुझे लगता है कि जब तक पुस्‍तक लिखी जा रही हो, तब तक लेखक रहो। जब किताब प्रकाशित होने चली जाए तो मार्केटिंग करो। मैं आज जो कुछ हूं, उसमें सोशल मीडिया का बड़ा रोल है। मैंने अपनी पुस्‍तकों को सोशल मीडिया के माध्‍यम से ही दूरदराज तक पहुंचाया है। वहीं, प्रकाशक हर महीने 5 से 10 किताबें प्रकाशित करते हैं और उनको सभी किताबों का प्रमोशन करना होता है। ऐसे में लेखक को अपनी पुस्‍तक के प्रमोशन के बारे में अलग से सोचना ही चाहिए और उसका पूरा प्‍लान तैयार करना चाहिए।
सवाल – स्टोरीटेल, ऑडीबल जैसे माध्यमों ने लेखकों के लिए एक नयी संभावना का द्वारा खोला है। इस तरह के लेखन में प्रसिद्धि और पैसा दोनों ही है। आप इस माध्यम को कैसे देखते हैं ? क्या आपका इस माध्यम से कोई साबका पड़ा है ?
कुलदीप राघव – मेरी पुस्‍तक इश्‍क मुबारक ऑडियो बुक के रूप में स्‍टोरी टेल पर मौजूद है और इस किताब के करार के बदले अच्‍छी धनराशि भी मुझे मिली। वहीं इस नए प्‍लेटफॉर्म पर भी लोग जानने पहचानने लगे हैं। उसी की बदौलत बीते दिनों 8-8 हजार शब्‍द की दो कहानियों का करार स्‍टोरी टेल के साथ हुआ है जिसमें से एक कहानी एक महीने के भीतर रिलीज भी होने वाली है। यह एक अलग तरह का माध्‍यम है जिसे अभी पूरी तरह अपनाया जाना बाकी है। इन माध्‍यमों ने लेखकों को प्रसिद्धि और पैसा दोनों दिया है। यहां फटाफट कहानी रिलीज होती है और फटाफट उसका भुगतान।
सवाल – नए लेखकों की किताबों में विषयवस्तु के स्तर पर प्रायः ‘रेंज’ की कमी दिखाई देती है. कॉलेज का जीवन, प्रेम, रोमांस, संबंधों की खींचतान से आगे उनकी कलम नहीं देख पाती। गाँव की पृष्ठभूमि को भी कुछ लेखकों ने लिया है, लेकिन कथानक में या तो वे नॉस्टेल्जिया में डूब गए या जो वर्षों पहले प्रेमचंद से लेकर श्रीलाल शुक्ल और रेणु जैसे लेखक लिख चुके हैं, कमोबेश उसीका दोहराव कर दिए।क्या इससे यह जाहिर नहीं होता कि नए लेखक विषयवस्तु के स्तर पर प्रयोग करने का साहस नहीं दिखा पा रहे ?
कुलदीप राघव – नए लेखकों गहराई से लिखने का साहस तो रखते हैं लेकिन जानबूझकर विषयवस्‍तु को हल्‍का रखने की कोशिश करते हैं। उदाहरण के लिए- मैं युवा पाठकों को ध्‍यान में रखकर कहानी लिखता है। इनमें वह पाठक भी शामिल हैं जो अंग्रेजी मीडियम स्‍कूलों से आते हैं और हिंदी को दीन-हीन समझते हैं। जाहिर है उन्‍हें गंभीर कथानक और गंभीर भाषा के साथ हिंदी के आंगन में नहीं लाया जा सकता।
सवाल – आप इन दिनों क्या कुछ लिख-पढ़ रहे हैं ?
कुलदीप राघव – मूलरूप से पत्रकार हूं तो इन दिनों जिंदगी कोरोना की कवरेज में गुजर रही है। बीता वर्ष निराशाजनक था और उम्‍मीद थी कि साल 2021 सकारात्‍मकता की किरण लेकर आएगा लेकिन स्थिति और बदतर है। स्‍टोरी टेल के लिए दूसरी कहानी पर काम कर रहा हूं। एक नए उपन्‍यास पर काम कर रहा हूं लेकिन आसपास जो हो रहा है उससे बेचैन हूं। इन दिनों लिखने का मन नहीं होता। भाई साहब आशुतोष गर्ग जी की नई किताब कल्कि पढ़ने की कोशिश कर रहा हूं।
पुरवाई टीम – हमसे बातचीत करने के लिए धन्यवाद कुलदीप जी।
कुलदीप राघव – धन्‍यवाद।

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