डॉ. विमलेश शर्मा का लेख - हिंदी दलित कविता का सहज सौंदर्यशास्त्र 1
  • डॉ. विमलेश शर्मा

दलित साहित्य की अपनी वैचारिकी है जो इसे विशेष बनाती है। बहिष्कृत समाज के नायक की भाषा सौन्दर्य के परम्परागत मानकों के आधार पर तय नहीं की जा सकती। इस लेखन में यथार्थ का तीव्र स्वर और निषेध के प्रति आक्रोश है । वेदना,व्यथा औऱ असंतोष की अभिव्यक्ति के कारण भाषा के संदर्भ में दलित साहित्यकार बुनावट से कोसों दूर है। यथार्थ चित्रण का आग्रही दलित साहित्य लोक से जुड़े हुए देशज शब्दों में अपनी अभिव्यक्ति देता है।वह छद्म की भाषा और भाषा के छद्म से समान दूरी बनाए रखता है। इस कविता में मानवीय भाव, सहानुभूति, प्रगतिशील दृष्टि और सामाजिक विकृतियों के प्रति आक्रोश झलकता हुआ दिखाई देता है। 
दलित साहित्य पर समय-समय पर अनेक आक्षेप लगते रहे हैं कि क्या दलित साहित्य अश्लील साहित्य है, दोयम है? दलित साहित्य सहानुभूति का साहित्य है या स्वानुभूति का? अब तक की परिपाटी रही है कि हिन्दी साहित्य के मूल्यांकन के लिए संस्कृत काव्यशास्त्र के मानदण्डों को आधार बनाया गया। मुंशी प्रेमचंद नये सौन्दर्यशास्त्र की आवश्यकता पर लिखते हैं-“हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो,जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो, जो हममें गति, संघर्ष औऱ बैचेनी पैदा करे, सुलाये नहीं क्योंकि अब और ज़्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।”(हिन्दी दलित कविता- डॉ इकरार अहमद, वाड़मय बुक्स, सं.-2014, अलीगढ़,पृ.15) भारतीय साहित्य की सैद्धान्तिक परिपाटी को पहली बार प्रेमचंद ने बदलने का प्रयास किया। दलित जन की स्थापना के लिए सर्वथा नए सौन्दर्यशास्त्र की आवश्यकता थी। इस नए सौन्दर्यशास्त्र ने शिल्प की अपेक्षा कथ्य पर जोर दिया। हालाँकि कलावादियों ने, आलोचकों ने इन जनवादी मूल्यों पर प्रश्नचिह्न लगाया कि वस्तु तत्त्व एवं भावना को प्रधानता देने पर कलातत्त्व क्षीण हो जाएगा; परन्तु यह साहित्य मुक्तिबोध के विचार का अनुसरण करता हुआ आगे बढ़ता रहा-“हमें साहित्यिक मापजोख दो दृष्टियों से करना चाहिए , एक रूप की दृष्टि से, दूसरा वस्तु तत्व की दृष्टि से। वस्तु तत्त्व में इतनी शक्ति होती है कि वह स्वयं अपने रूप को लेकर आता है। अतएव मुख्यतः हमारे लिए वस्तु तत्त्व प्रधान हो जाता है।”1 इसी जनवादी सौन्दर्यशास्त्र पर विचार करते हुए चीनी मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्री ‘याओ वेन युआंग ’सृजनात्मक सौन्दर्यशास्त्र की तीन प्रमुख समस्याएँ बतलाते हैं-
1.सौन्दर्यशास्त्र की पहली समस्या जनता के जीवन में सुन्दर औऱ असुन्दर का अध्ययन करना  अर्थात्       सुन्दर-असुन्दर के अन्तर्विरोध का अध्ययन करना है। 
  1. कला के सामान्य नियमों का अध्ययन करना जो यथार्थ को ही एक उच्चतर धरातल पर प्रतिबिंबित करते हैं अर्थात् सामाजिक जीवन एवं कलाकृतियों में सौन्दर्य के अंतर्विरोध का अध्ययन करना दूसरी समस्या है।
  2. सौन्दर्यशास्त्र की तीसरी सबसे बड़ी समस्या सौन्दर्य के रूप और विषयवस्तु का अध्ययन अर्थात् स्वयं वस्तुओं में सुंदर-असुंदर,सत्य-असत्य आदि के अंतर्विरोधों का अध्ययन करना है।”2 
मार्क्सवादी सौन्दर्य़शास्त्र दलित साहित्य की वैचारिकी के निकट बैठता है। जनवादी साहित्य ने, साहित्य को सामाजिक सरोकारों से जोड़ा है। कला का वास्तविक उद्देश्य भी यही है। कला में जीवन की महत्ता स्थापित करने से तात्पर्य कला को नकारना नहीं है बल्कि कला और जीवन की संबंधता स्थापित करना है। हालांकि यह सत्य है कि कला तत्त्वों के बिना साहित्य का मूल्य कम हो जाता है, इसलिए जनवादी सौन्दर्यशास्त्र कलात्मकता को भी स्थान देता है। 
दलित साहित्य की पृष्ठभूमि,उसके उद्भव, विकास,रचाव, रचनाशीलता के पीछे के कारणों से उसकी साहित्यिकता औऱ उद्देश्य स्पष्ट हो जाते हैं। दलित साहित्य आक्रोश और नकार का साहित्य है इसलिए यहाँ भाषा कर्कश है, कोमलकांत नहीं। सूरजपाल सिंह की इस कविता को देखें तो शब्द-दर-शब्द आक्रोश साफ़ नज़र आता है। “तुम्हें मंगल सिंह पाण्डे/ याद आता है/ मातादीन भंगी या बिरसा मुंडा याद नहीं आते/  तुम्हें झांसी की रानी भी याद है/ लेकिन/ कोरी झलकारी बाई याद नहीं/ ज्ञात नहीं / उस वीरांगना की कहानी/ हीराडोम या अछूतानंद का नाम लेते हुए/ आती है तुम्हें लाज/ रचते हो झूठा इतिहासय/ और बर्बरिक महान का / असुर बालक कहकर/ करते हो उपहास।”3 
दलित कवियों द्वारा रचित कविताओं की भाषा को देखकर एकाएक लगता है कि यह क्या पढ़ रहे हैं हम, आखिर यह कैसा साहित्य है? यही बात दलित आत्मकथा, कहानी, उपन्यास आदि विधाओं पर भी लागू होती है। इसे पढ़ कर एक बारगी लगता है कि यह अश्लील साहित्य है जहाँ गालियों की भरमार है।“किंतु ध्यान देने की बात यह है कि दलित साहित्य प्रतिरोध और बहुत हद तक प्रतिक्रिया का भी साहित्य है। अतः उसमें शोध, पीडा और आक्रोश स्वाभाविक है। जो कि परिवेश और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से  सिद्ध होता है। दलित रचनाकार भाषा के लालित्य व संस्कृतनिष्ठता को नकारते हैं। वे काव्यशैली और विषयवस्तु के प्रस्तुतीकरण को इतना सहेज रखते हैं कि यह बात उस वर्ग तक ठीक-ठीक पहुँच जाए जहाँ वे पहुँचाना चाहते हैं। वे ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जो दलितों की पीडा , अपमान और व्यथा तथा जन-सामान्य की आशा-आकांक्षाओं के यथार्थ को सही अभिव्यक्ति दे सके। इसलिए इसमें कुछ ऐसे शब्दों का भी प्रयोग हो जाता है, जो साहित्य के लिए अश्लील और वर्जित रहे हैं, जैसे- हँगना-मूतना आदि। यद्यपि ऐसे शब्दों के प्रयोग स्त्री –लेखन  और मार्क्सवादी लेखन में पहले भी हो चुके हैं पर कुछ लेखक केवल इसी कारण दलित साहित्य पर अश्लील और दोयम/हेय/ गंदी भाषा होने का आरोप लगाते हैं। उन्हें लगता है कि साहित्य का पाठ पवित्र होना चाहिए। भले ही उसमें आभिजात्य संस्कारों की बनावटी भाषा का प्रयोग ही क्यों ना करना पड़े।
य़थार्थ की भूमि से उपजा साहित्य भाषा की जमीन पर मजबूती से खड़ा नज़र आता है। दलित कविताओँ में एक सहज खुलापन है। इनमें रचाव भले ही कम हो परन्तु रचनात्मक संभावना अधिक है। इन कवियों के पास दुनिया तथा अपने समाज को देखने, समझने की  विज्ञानसम्मत दृष्टि है जिसे उन्होंने व्यावहारिक अनुभवों से समृद्ध किया है।
मनुष्य एक उत्पीडित प्राणी है। जब वह उत्पीडित होता है तो आत्माभिव्यक्ति के लिए छटपटा उठता है। साहित्य का संबंध भी सीधे-सीधे संवेदनाओं से होता है। वस्तुतः ये एक दूसरे के पूरक हैं। साहित्य में सामाजिक सरोकार, विसंगतियाँ और मानवीय संवेदनाएँ स्थान पाते हैं अतः दलित साहित्य भी सामाजिक, सांस्कृतिक समस्याओं, संघर्ष और द्व्नद्व की सटीक अभिव्यक्ति है। साहित्य अभिव्यक्ति के लिए बिम्बों का सहारा लेता है। सामान्यतः साहित्य में बिम्ब का अर्थ रचनाकार की उस क्षमता से लिया जाता है, जिसके आधार पर वह अतीत की घटनाओं औऱ विषय के रंग, ध्वनि, गति, आकार, प्रकार सहित देश,  काल व परिस्थिति को ध्यान में रखकर शब्दचित्रों को वर्णित करता है। कविता में बिम्ब का कार्य अप्रस्तुत की रूप प्रतिष्ठा करना है। दलित कविता में अनेक प्रकार के बिम्बों की सहायता से कविता को सजीवता प्रदान की गयी है। यहाँ दृश्य, श्रव्य , घ्राणमूलक, नाद, प्राकृतिक, अतीत और वर्तमान के बिम्ब , यौन बिम्ब कविता की संरचनात्मकता को उच्चता प्रदान करते हैं। 
‘मनु का पाप’ में संकलित ‘दीपक’ कविता में प्रस्तुत दृश्य बिम्ब निम्नानुसार है-“जब मैं / सुबह सवेरे/  नहा धोकर / दीप जलाता हूँ / तेरी आँखों में / मेरे अस्तित्व में / मेरे सर्वांग में / सिवाय/ दीपक के कुछ और नहीं होता।”4 
 इसी तरह ‘भगवान’ कविता में उस ईश्वर द्वारा  एक दलित की बेबसी को अनदेखा करने का दृश्य बिम्ब प्रस्तुत किया जा रहा है यथा-“ जो भगवान/ चारदीवारी के अंदर बैठकर/ मजे उड़ाता, दूध पी रहा है/ उसे क्या पता था उसका पुत्र / कितना अभिशप्त जीवन जी रहा है/ उसका एक पुत्र।”5 ऐसा नहीं है कि दलित कविता केवल ओऱ केवल आक्रोश की बात करती है, प्रकृति का सौन्दर्य उसे भी प्रभावित करता है।‘ एकलव्य की आत्मा’ में प्रकृति का वर्णन इस प्रकार किया गया है। “इस खिली-खिली प्रकृति में / खिल रही अविरल शबनम/ सरसराहट वाले पेड़ो में / कुछ तरू सूखे कुछ तरू नम/ कोयल गाती कितना मधुर/ कितना मनोरम यह सुमधुर।”6  यही भाव सूरजपाल चौहान की प्रतिबिम्बित कविता में भी देखने को मिलता है। “इसके अलावा भी / बहुत कुछ है जो/ मेरी जरूरत है/ मसलन/ खेत/ रास्ते/ धूप, रोशनी/ कागज़, कलम/ आस- पड़ोस।” 7 
दलित साहित्य अपनी कविताओँ में नवीन बिम्ब गढ़ता है। वह तमाम पौराणिक मिथकों की परिभाषा  बदल देता है। अनुभवों की प्रामाणिकता को जो खरापन दलित लेखन में है वह वर्तमान साहित्य की एकरसता से नितांत भिन्न है। “ इसके दायरे में अंधविश्वास, भाग्य, पूर्वजन्म के कर्म, धर्म या भगवान नहीं आते। यह तो प्रत्य़क्ष य़थार्थ से युक्त है, जीवन्त है- इसी जिंदगी से जुड़ा है, पीड़ाएँ झेलते हुए, आक्रोश से खौलते हुए, सब्र की हद से परे गंदगी सहते हुए, जुल्मों से जूझते हुए, मरते औऱ जीते हुए अपने बीच के, इर्द-गिर्द के स्त्री पुरूषों को सामने लाता है, दलित साहित्य।” 8 
दलित साहित्य के श्रम के अपने बिम्ब हैं।हाथ में झाड़ू लिए, सिर पर मैला ढ़ोने की बाल्टी लिए बिम्ब सभ्य समाज की विकृत मानसिकता को उजागर करते हैं। ये बिम्ब पूर्व में साहित्य में बहिष्कृत थे, एक हद तक प्रतिबंधित भी। रसवाद और सैद्धान्तिक आलोचना के तहत  ये जुगुप्सा और घृणा पैदा करने वाले बिम्ब थे, जिनका प्रयोग पूर्णतः निषिद्ध था। आज साहित्य में जातिगत अन्याय की विद्रूपता को उजागर करने वाले ये बिम्ब समाज और देश के सामने अनेक प्रश्न उठाते हैं, जो मानवता से सीधे-सीधे जुड़े हैं। इस दृष्टि से दलित साहित्य देश के वर्ग विशेष की मुक्ति के लिए कटिबद्ध है। आज साहित्य में प्रयुक्त ये बिम्ब घृणा पैदा नहीं करते  बल्कि प्रतिरोध की आँच में अस्मितामूलक चेतना की स्थापना का प्रयास करते हैं। 
प्रतीक- दलित चेतना उस सच पर प्रहार करती है जो सदियों से शोषण की आँच में तप रहा है। उनकी कविता विषय और सोच पूर्णतः भिन्न है। दलित कवि ,कविता मनोरंजन के लिए नहीं वरन् बदलाव के लिए लिख रहे हैं। इनकी कविता व्यवस्था के विषधरों (कुसुम वियोगी) को चुनौति देकर कहने लगी है कि सुनो ब्राह्म्ण(मलखान सिंह), बस्स बहुत हुआ( ओमप्रकाश वाल्मीकि), अब मेरा आक्रोश( डॉ सी.बी. भारती) ज्वालामुखी के मुहाने पर (मलखान सिंह) है। अब उत्पीडन की यह यात्रा (लक्ष्मीनारायण सुधाकर) दलित चेतना की कविताओं में अभिव्यक्त होगी। यह उस लिखे के माध्यम प्रतिरोध दर्ज़ करने का प्रयास (सूरजपाल चौहान) करेगी जो सदियों के संताप से उपजा है। वह प्रश्नाकुल है कि व्यवस्था बहुत हुआ, ‘अब मूरख नहीं बनेंगे हम’(रमणिका गुप्ता), हमें यह बताओ कि तब तुम्हारी निष्ठा क्या होती(कंवल भारती) जब तुम भी वही सब कुछ झेलते जो हमने झेला। अनेक प्रतीकों और भाषा को हथियार बनाती हुई यह कविता कहती है-“हवाओं ज्यादा सांय-सांय मत करो/ मेरी बगिया के पौधे अब पेड़ बन गए हैं या/ अब वे विजय का अर्थ जान गए हैं/ जो पहले मरने के लिए जीते थे।”(जय प्रकाश कर्दम)
दलित साहित्य के प्रतीक सौन्दर्य में डूबे नहीं है वरन् वे जाग के प्रतीक हैं। इस कविता के भाव मधुर धुन नहीं बजाते, ना ही वे भक्ति के भजन गाते हैं , वे अपना प्रतिरोध पंचम स्वर में दर्ज़ करवाते हैं। यह स्वर तल्ख है और ज़रूरत पड़ने पर आक्रामक भी हो जाता है। उनके नृत्य लास्य नहीं है। यह कविता उम्मीद है, आंदोलन है, प्रतिरोध है, बहस है, प्रतिरोध है, पीडा है। पहले यही कविता मंद गति से डरे सहमें कदम रखती थी, अब उनके पाँव युद्ध की मुद्रा में थाप देने लगे है। कोई भी साहित्यकार अपनी कल्पना से बिम्ब का आविर्भाव करता है औऱ बिम्ब से प्रतीक का । जब कल्पना मूर्त रूप धारण करती है तो बिम्बों की सृष्टि होती है और जब बिम्ब बारम्बार प्रयोग के द्वारा किसी निश्चित अर्थ में निर्धारित हो जाते हैं , तब उनसे प्रतीकों का निर्माण होता है। दलित कविता में बिम्ब कविता पर कम यथार्थ पर अधिक आधारित रहते हैं। परम्परागत प्रतीकों में धार्मिक, ऐतिहासिक पात्र और घटनाओं का प्रयोग मिलता है। ‘कुछ दोहे और ’ कविता में  लिखा गया है- ‘ तुमसे मिलकर यह लगा/ पार लगेगी नाव/ इतनी ज़ल्दी दे दिए तुमने गहरे घाव।’ इन कविताओं में कहीं द्रोणाचार्य है, कहीं राम है, कहीं बुद्ध है तो कहीं शम्बूक। ‘ऐ द्रोणाचार्य’ कविता में लिखा गया है-“अब मेरे हाथ/ शंबूक महान/ कबीर, रैदास/ सावित्री औऱ ज्योतिबा फूले।”9 
इसी तरह ‘आम्रपाली ने चूड़िया नहीं पहनी’ कविता में आम्रपाली आधूनिक नारी का प्रतीक है।“आम्रपाली जवान हो गई/ वह अपने हाथों में / चूड़िया नहीं पहनती/ न पहनना चाहती है/ वह कहती है/ चूड़िया खनककर करती है शोर/  पढ़ने , काम करने से भटकाती है/ मुझ में आत्मविश्वास पैदा नहीं होने देती” 10 
एक दूसरी कविता में भेड़िये को शोषक के प्रतीक के रूप में  तथा मेमने को शोषित के प्रतीक में दिखलाया गया है-“एक दलित का चीखना-चिल्लाना/ हज़ारों हिन्दूओं की इस भीड़ में / भड़ियों के झुण्ड में फँसे/ एक मेमने की तरह/ विलीन हो गया था।”11 
इन कविताओं में प्रतीकों का चयन कवि सहानुभूति के स्तर पर नही करता वरन् प्रतीकों के माध्यम से वह भोगे हुए यथार्थ और व्यवस्था पर तंज कसता है। वह लिखता है- स्वयं पीडित/ स्वयं ही है साक्ष्य /प्रेक्षपों पर नहीं है विश्वास। श्यौराज सिंह बैचेन अपनी कविता ‘क्रौंच हूँ मैं’ कविता में इस सवाल का सटीक जवाब देते हैं कि -“आदि कविता क्रौंच का वध देखकर पैदा हुई थी/ मैं परन्तु आदि कवि के वंशज़ों में से नहीं हूँ/वाल्मीकि मैं नहीं हूँ / क्रौंच हूँ मैं” 12  
यहाँ वाल्मीकि सवर्ण लेखन करने वाले लेखक का प्रतीक है और क्रौंच दलित लेखक का प्रतीक है, जो स्वानुभूति को अपने लिखे में स्वर दे रहा है। कवि आगे अपनी बात जारी करते हुए कहता है कि जब शोषक श्रेणी के लोग ही कविता करने लगे हैं तो दलित कविता को उनका समर्थन कैसे मिल सकता है? बैचेन बहेलियों और प्रेक्षपों की कविताओं के बिम्ब को ‘जुल्म जारी भी है’ कविता में इस प्रकार लिखते हैं-“अब उसके खेत का/  टुकड़ा कुतरने में लगा है भूमिहार/ उसकी बर्बादी का जिम्मेदार पचवारी भी है/ वह मजूरी गाँव में देखे / या भागे शहर को।”(वही –पृ.-32)
दलित कविताओं के प्रतीक सामाजिक जीवन की विडम्बनाओं को यथार्थ के पैराहन में परोसते है। रमणिका गुप्ता दलित साहित्य के प्रतीको के संदर्भ में लिखती है-“दलित साहित्य के प्रतीक भिन्न है , ये प्रतीक इनके दैनिक कार्य से जुड़े हैं। वे नफ़ीस और नाज़ुक नहीं वरन् खुरदरे हैं। मैले कुचैले हैं, भौंडे हैं पर मजबूत है।  वे नए नहीं पुराने टूटे-फटे समान से टेढे-मेढे, मुड़े-तुड़े होते हैं और उनकी अन्त्यज दशा और अकिंचनता के प्रतीक होते हैं। वे कल्पना की रंगीनियाँ लिए हुए नहीं बल्कि तथ्यों, तार्किक निष्कर्षों और सत्य से पैदा होते हैं। झाड़ू, टोकरी, खपची,चमड़ा, जूता, सिलाई करने वाला सुआ, चमड़ा छीलने वाला छूरा या अन्य औज़ार अथवा यन्त्र आदि सब उनके दैनिक कार्यों से जुड़े हैं, उनके अपने पुश्तैनी वाद्य यंत्र भी उनके प्रतीक हैं।”13  
दलित कविता अमानवीय यातनाओं की पीढ़ियों से सहते आए दलित वर्ग की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। वहाँ प्रकृति के सौन्दर्य और उसके प्रतीक स्थान नहीं पा सकते है। दलित कविताओं में परम्परागत कलात्मकता के दर्शन न होने के कारण को रेखांकित करते हुए दलित कवि अपनी कविता ‘पतझर’ में कहते हैं-“तुमने कहा/मेरी कविताओं में/फूल सी खूशबू नहीं है/फूलों का रंग/कहाँ से लाऊँ/जब बचपन से ही/देखा है/पतझर”14 
दलित साहित्य हिन्दी साहित्य का एक सर्वथा नवीन आयाम है, जिसमें वैचारिक एवं सांवेगिक बाहुल्य है। जातिव्यवस्था व वर्ण व्यवस्था से पीडित समाज की आकांक्षाओं  को इस साहित्य धारा ने एक नये तेवर के साथ प्रस्तुत किया है। इस नयेपन में वह सैद्धान्तिक साहित्यशास्त्र के प्रति विरोध दर्ज़ करता है। साहित्य के मापदण्ड जिस सौन्दर्य, प्रतीक, बिम्ब,कल्पना एवं मिथक के आधार पर रखे जाते हैं।  दलित साहित्य उनका विवेचन दलित दृष्टिकोण से, मानवीय दृष्टिकोण से करता है। दलित साहित्य की निर्मिति यथार्थ से, अनुभूति से होती है अतः इसके अध्ययन मनन के लिए भी समाजशास्त्रीय दृष्टि की आवश्यकता है ना कि पारम्परिक सौन्दर्यशास्त्र की। सफेदपोश समीक्षा दलित साहित्य का उचित मूल्यांकन करने में असमर्थ होगी क्योंकि इसकी भाषा सांस्कृतिक विद्रोह की भाषा है।
संदर्भ सूची-
1.गजानन माधव मुक्तिबोध, नये साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र,राधाकृष्ण प्रकाशन,नयी दिल्ली, सं. 1993,पृ.62-63
2.रोहिताश्व-मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र की भूमिका,पृ.12
3.क्यों विश्वास करूँ, सूरजपाल चौहान, वाणी प्रकाशन,पृ.-33,34
4.मनु का पाप, डॉ राजेन्द्र बड़गूजर,सुकीर्ति प्रकाशन, कैथल-‘दीपक’ कविता,पृ.18
5.वही, पृ.37
6.वही पृ.-37
7.कब होगी वह भोर-सूरजपाल चौहान,पृ.60
8.दलित हस्तक्षेप-रमणिका गुप्ता, सं.-ओमप्रकाश वाल्मीकि,अक्षर शिल्पी, सं.-2012,पृ.-128-129
9.भीड़ी गलियाँ तंग मकान,पृ.-76-डॉ राजेन्द्र बड़गूजर, साहित्य संस्थान,ई-10/660, उत्तरांचल कॉलोनी, लोनी बार्डर, गाजियाबाद सं.-2010
10.कलम को दर्द कहने दो, पृ.-34, कर्मशील भारती, दलित साहित्य प्रकाशन संस्थान,नई दिल्ली, सं.-2000 
11.वही.-पृ-69
12.नई फसल-पृ.31-श्यौराज सिंह बैचेन, वाणी प्रकाशन-2014
13.दलित हस्तक्षेप-रमणिका गुप्ता,पृ.-20-21
14.चिंरजी कटारिया-शब्द थके ज़रूर हैं,सम्यक प्रकाशन,नयी दिल्ली, प्र.सं.-2002,पृ.-48

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