फणीश्वरनाथ रेणु : जीते जी एक रचनाकार का मिथक बन जाना 3
फणीश्वरनाथ रेणु (1921-1977) भाषाई ताज़गी, लोक संपृक्ति और जीवन की साखियों से उपजे रूपायन को लेकर साहित्य में पदार्पित होते हैं। अपने अनूठे रचानकर्म के बल पर ‘रेणु’ अपने जीवन का में ही मिथक बन गए। उनके द्वारा लिखे गए उपन्यास,कहानियाँ, रिपोर्ताज, वैचारिक-स्तंभ, एक रचनाकार के कोरे जीवनानुभव नहीं हैं वरन् हमारे साहित्य के ऐतिहासिक और संग्रहणीय दस्तावेज़ भी हैं।
बकौल डॉ.नामवर सिंह, विचार जिस प्रकार प्राप्त होता है, उसी प्रकार अभिव्यक्त भी होता है। यदि वह पुस्तकों से प्राप्त होता है, तो पुस्तकीय ढंग से प्रकट होता है, यदि वह जनारण्य से दूर एकान्त कमरे में आराम-कुर्सी के चिंतन से प्राप्त होता है, तो रचना में भी एकान्त और वैयक्तिक चिंतन का रूप लेता है, और यदि वह जीवन के संघर्षों में कुछ न्यौछावर करने से प्राप्त होता है, तो उसी गर्मी,उसी ताज़गी, उसी सजीवता, उसी सक्रियता तथा उसी मूर्तिमत्ता के साथ रूपायित होता है।
साहित्य में इसी रूपायन का महत्त्व है , जो रेणु के कथा-साहित्य में ललित, रससिक्त और प्राणवंत भाषा और कथानक की सजीवता और लोकरंग लेकर जीवंत होता है। प्रेमचंद के पश्चात् हिन्दी साहित्य में एक विशेष तरह के आभिजात्य और संभ्रांत लेखन का वर्चस्व दिखाई देता है, इस भीड़ में रेणु एक नए मुहावरे की तरह उभर कर सामने आते हैं। व्यक्तित्व अकसर कृतित्व में प्रतिबिम्बित होता है, ऐसा ही रेणु के रचाव में भी देखा जा सकता है।
पतनशीलता की पराकाष्ठा को देखकर उन्होंने कहा है, अन्याय और भ्रष्टाचार अब तक मेरे लेखन का विषय रहा है और मैं सपने देखता रहा हूँ कि यह कब ख़त्म हो।”(दिनमान, 28 अप्रैल,1974) आंचलिकता की रंगभूमि पर रेणु के रचनाकर्म की भावभूमि को देखें , जिसके लिए रेणु को जाना जाता है तो आज़ादी के बाद का वह गाँव है जिसका कच्चापन टूटकर बिखर रहा है, वहाँ की हवाओं में लोकगीतों के स्थान पर फिल्मी गीत हैं, सामूहिकता  में दरारें हैं और एक गाँव में एक पंचायत नहीं , बल्कि हर जाति, समुदाय की अपनी पंचायत और उस पंचायत के लिए अपनी एक पंचलाइट  आज़ादी के बाद गाँव शहरों की ओर पलायन कर रहे थे और जो गाँव निःशेष रह गया वहाँ भी शहरी संस्कृति काबिज़ हो गई ।  उनकी रसप्रिया, विघटन के क्षण, उच्चाटन, भित्तिचित्र की मयूरी’, इन्हीं विसंगतियों से उपजी कहानियाँ हैं। 
काव्य के भाव-तत्त्वों में नाद, झमक और यति-गति को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है, यह रेणु के यहाँ जीवंत होते दिखाई देते हैं। मैला आँचल हो , परती-परिकथा हो (उपन्यास), विदापत-नाच (रिपोर्ताज) हो, मारे गए गुलफ़ाम हो या कि डायन कोसी (रिपोर्ताज) सभी में उनके कथ्य और भाषा एक ऐन्द्रिक नाद का सर्जन करते  दिखाई देते हैं।
रेणु ने अपने जीवन में अनेक राजनीतिक और सामाजिक विकृतियों का साक्षात्कार किया है। उन्ही विद्रूपताओं को संवेद्य करते  वे कोसी पर बन रहे पुल को सर्वहारा की हड्डियों के पुल की संज्ञा दे देते हैं तो 1966 में बिहार और उड़ीसा के अकाल पर, 1975 में पटना की बाढ़ पर रिपोर्ताज लिखकर और दलित-सर्वहारा की पीडा दिखाकर वास्तविक भारत-दर्शन करवाने से भी नहीं चूकते हैं। तमाम सामाजिक रुग्णताओं के प्रतिबिम्बन के बावज़ूद रेणु के मन में आशा और विश्वास के स्वर  हैं, जिन्हें  वे ‘नए सवेरे की आशा’ में तो  रूपायित करते ही हैं साथ ही उस तेज और चमक को अपनी भाषा से भी रचनाओं में बिखेरते हैं।
धर्म, मज़हब और जाति के खाँचों में बँटा मानव रेणु की कहानियों में मुक्तिकामी दिखाई पड़ता है। वह राजनितिक कुचक्रों और पूँजीपति वर्ग की कारगुजारियों से आहत होता है। वस्तुतः यही वे संवेदनाएँ हैं जो उनकी रचनाओं को विश्वसनीयता और सम्पन्नता प्रदान करती है और संभवतः यही रेणु का वर्गविहीन भारत है जिसकी आस उनकी हर रचना में मुखर रूप से अभिव्यक्त होती दिखाई देती है।

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