हिंदी साहित्य में प्रचारित स्त्री-विमर्श ने स्त्री लेखन की संभावनाओं को सीमित कर दिया – सूर्यबाला 1
सूर्यबाला जी – लंदन के नेहरू सेन्टर में अपना व्यंग्य एवं कहानी पाठ करते हुए। साथ बैठे हैं वरिष्ठ साहित्यकार स्वर्गीय श्री गौतम सचदेव एवं कथा यूके के तत्कालीन अध्यक्ष स्वर्गीय श्री कैलाश बुधवार।

हिंदी साहित्य में सूर्यबाला को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। अबतक 150 से अधिक कहानियाँ और आधा दर्जन उपन्यास लिख चुकीं सूर्यबाला व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में विशेष पहचान रखती हैं। हाल ही में उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का प्रतिष्ठित ‘भारत भारती सम्मान’ देने की घोषणा हुई है। इस अवसर पर पुरवाई टीम ने उनसे उनकी लेखन यात्रा से जुड़े अनुभवों, स्त्री-विमर्श, व्यंग्य लेखन की वर्तमान दशा-दिशा आदि विषयों पर बातचीत की है।

सवाल – नमस्कार सूर्यबाला जी, पुरवाई से बातचीत में आपका स्वागत है…. सबसे पहले तो आपको ‘भारत भारती’ सम्मान के लिए बहुत-बहुत बधाई। यह सम्मान मिलने के बाद आपने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा कि ‘भारत-भारती इस तरह आई…. जैसे मायके से चिट्ठी आई हो, बेटी के नाम…..’ इस बात का क्या आशय है?
सूर्यबाला जी – आपकी बधाई के लिए आभार। फेसबुक वाल पर लिखे मेरे वाक्य का बहुत सीधा और थोड़ा-सा ही भावुक आशय है। ‘मायका’ हर स्त्री के लिए पूरी उम्र भावुक कर देने वाला शब्द है और यह पुरस्कार भी मेरे गृह प्रदेश द्वारा दिया गया सर्वोच्च सम्मान है। संयोग यह भी कि अभी तक मेरे साढ़े चार दशकों लंबे लेखन में, मुझे मेरे प्रदेश से मिला यह पहला सम्मान है। तो अपना प्रदेश, नगर (वाराणसी) मेरी गली, सब अनायास जुड़ते गए और सबसे बढ़कर पुरस्कार का नाम ‘भारत-भारती’ मुझे रोमांचित करने के लिए काफी थे।
एक भूल सुधार करना चाहूंगी कि दो वर्ष पूर्व मुझे मेरे व्यंग्य-लेखन के लिए लखनऊ की ‘माध्यम’ संस्था द्वारा ‘अट्टहास शीर्ष सम्मान’ अवश्य मिला था लेकिन वह आयोजन भोपाल में हुआ था। बेशक पहली बार किसी ‘महिला’ को मिले व्यंग्य के उस शीर्ष सम्मान की काफी चर्चा हुई थी।
सवाल – आपका पहला उपन्यास ‘मेरे संधि पत्र’ धर्मयुग में बारह किस्तों में प्रकाशित हुआ था। इस पहले उपन्यास के प्रकाशन से व डॉ. धर्मवीर भारती से जुड़ी कोई खास  याद जो आप हमारे पाठकों से साझा करना चाहें….?
सूर्यबाला जी – यह आपादमस्तक रोमांचित कर देने वाली अनुभूति और अविस्मरणीय स्मृति है…. लिखते हुए और मेरी कहानियां व व्यंग्य प्रकाशित होते हुए मुझे कुल तीन वर्ष ही हुए थे जब मैंने अलीगढ़ में रहते हुए यह उपन्यास पूरा कर लिया था। संयोग कि तभी पति का स्थानांतरण मुंबई हो गया। अतः उपन्यास की पांडुलिपि स्वयं टाइम्स ऑफ इंडिया बिल्डिंग के धर्मयुग कार्यालय में जाकर देने का निश्चय किया। पहुंची तो लाइन से दोनों तरफ की मेजों पर उपसंपादकों की अति उत्सुक निगाहें देखने को मिलीं और अंत में मनमोहन सरल (सहायक संपादक) की मेज! सरल जी बड़ी आत्मीयता से मिले। मैंने ससंकोच उपन्यास की पांडुलिपि थमायी तो उसी आत्मीयता से बोले, ‘देख तो मैं लूंगा- लेकिन अंतिम निर्णय डॉक सॉब (भारती जी) पर ही निर्भर करता है।… अरे, लेकिन आई हैं तो भारती जी से तो मिलती जाइये।‘
मैंने घबराहट में दोनों कान छुए – ‘मैं-मैं भारती जी से यूं ही क्या मिलूं? क्या कहूंगी….’ कह कर जान छुड़ाती लौट ली।
तीन सप्ताह बाद फिर धर्मयुग कार्यालय पहुंची (शायद बुलावा आया था)। उसी तरह सरल जी के पास गई। उन्होंने कहा, ‘मुझे तो आपका उपन्यास बहुत अच्छा लगा….. लेकिन डॉक साब की नहीं जानता। बहरहाल मिल तो लीजिए ही।‘
गनीमत थी, पति को साथ लेकर गई थी। अकेले हिम्मत कहां। खैर, सरल जी ने ‘स्लिप’ भिजवाई। बहुत जल्दी बुलावा आ गया। आगे-आगे पति, पीछे पीछे मैं। हजार धड़कने संभालती।
बड़ी सी हरी वेलवटी टेबलों के पीछे काले फ्रेम के चश्में से मढ़ी वत्सली आंखों वाले भारती जी के हाथों में काला ही सिगार, चेहरे पर ऊष्मा भरी मुस्कान, तपाक से पति से हाथ मिलाया और बिठाया। मेरी सलज्ज नमस्ते का वैसा ही आत्मीय प्रत्युत्तर। अब आलम यह कि मैं बैठी ही रही और वे पति से कहां-कहां की बातें करते रहे। अब मैं कसमसाई। तब अंत में नहीं, अंततः, मेरी ओर मुड़े, एक-एक शब्द नापतौल कर उतनी ही संयत गुरू गंभीर भाषा में बोले- ‘आपका यह उपन्यास मुझे बहुत पसंद आया… खास तौर पर सौतेली माँ और बेटियों के बीच के संबंधों का समीकरण… (तो! आगे!… मेरी धड़कन तेज हुई) मैं इसे धर्मयुग में धारावाहिक प्रकाशित करूंगा…. लेकिन… (‘अब क्या!….’) मैं चाहता हूं, उपन्यास का तीसरा और अंतिम खंड, ‘शिवाः मेरे संधिपत्र’ आप एक बार फिर से देखकर तराश ले जायें तो अच्छा।’
तब अचानक मैंने अपने आपको कहते सुना –  ’लेकिन मान लीजिए जैसा आप चाहते हैं, मैं वैसा नहीं तराश पाई तो!’
‘तो मैं इसे ऐसे ही छापूंगा’– और वह चेहरा एक नटखट वात्सल्य से हंस पड़ा….
सवाल – ‘कौन देस को वासी-वेणु की डायरी’ में अमरीकी जीवन का चित्रण बहुत सशक्त है। जिस तरह इस उपन्यास में भारत और अमेरिका में आवाजाही होता है उसमें अनुभव की प्रमाणिकता महसूस की जा सकती है। क्या अमरीका  के अनुभव आपके अपने हैं या फिर कल्पनाशीलता का इस्तेमाल है?
सूर्यबाला जी – ‘कौन देस को वासी…. वेणु की डायरी’, दरअसल विदेश प्रवास में सालों साल, कई-कई बार रह कर लिखी गई मेरी डायरियों का पुलिंदा है। कथा सूत्र तो बाद में जुड़े। सारी स्थितियां, घटनाएं, अहसास मेरे अपने हैं। मेरे अंदर बाहर से गुजरे हुए। बहुत से पात्र भी। निःसंदेह तथ्य और कथा सूत्रों को जोड़ने और संवेदनाओं के प्रमाणिक लेखे-जोखे ने दस वर्ष लगा दिए। सबसे महत्वपूर्ण बात, अमेरिका जाते हुए मैंने कभी भी ऐसा कोई उपन्यास लिखने की कल्पना, योजना बिलकुल नहीं बनाई थी। यह तो भारत लौट कर डायरियां पढ़ते हुए लगा था कि उपन्यास लिखना चाहिए।
सवाल – व्यंग्य के क्षेत्र में आपका नाम खासा प्रतिष्ठित है। मगर आपने व्यंग्य का इस्तेमाल कहानियों और उपन्यासों में लगभग न के बराबर किया है। क्या इसके पीछे कोई ख़ास सोच है?
सूर्यबाला जी – यही तो आश्चर्य है। मैंने व्यंग्य पूरी तरह आंतरिक प्रेरणा से लिखे। जब कभी सूझे और कलम बिलकुल नहीं मानी तभी लिखे, प्रतिष्ठित होने के लिए तो जरा भी नहीं। सबसे दिलचस्प बात, हास्य व्यंग्य मैं बचपन से जब तब लिखती आ रही थी लेकिन पता ही नहीं था इसे तराश कर ‘व्यंग्यरचना’ के रूप में प्रकाशित किया जा सकता है। बड़ी होकर शरद जोशी और परसाई जी की व्यंग्य रचनाओं को पढ़ते-सराहते हुए लगा कि ऐसा ही कुछ तो मैं भी लिखती हूं।
मैंने ‘व्यंग्य’ का इस्तेमाल ‘विधा’ और शिल्प शैली दोनों रूपों में किया है। जानबूझ कर, सोच समझ कर नहीं, सिर्फ स्थितियों की मांग पर। आप से आप। मेरी ‘मातम’, ‘बाऊ जी और बंदर…’, ‘सुनंदा छोकरी की डायरी’, ‘होगी जय पुरूषोत्तम नवीन’, ‘माय नेम इश ताता’ और ‘फरिश्ते’ जैसी कहानियां इसकी प्रमाण हैं। लेकिन यह सच है कि ऐसी कहानियां कम हैं। इसके अतिरिक्त ‘गजानन बनाम गणनायक’ शीर्षक एक लंबी व्यंग्य कहानी भी मैंने लिखी है जिसे बहुत सराहना भी मिली है। मेरी रचनाओं, कृतियों के पीछे ‘सोची समझी’ की भूमिका ‘नहीं’ के बराबर है। मैं योजना बना कर बिलकुल नहीं लिख पाती।
सवाल – अगर हमें सही याद पड़ता है तो आपकी पहली कहानी सारिका में 1972 में प्रकाशित हुई थी। आपने अब तक 150 से अधिक कहानियां लिखी हैं। छः उपन्यास और तीन व्यंग्य संग्रह भी आए हैं। आप सही मायने में साहित्य की हरफ़नमौला लेखिका हैं। कौन-सी विधा आपको अपनी कलम के सबसे करीब लगती है?
सूर्यबाला जी – यह कोई ऐसी विशेष या महत्वपूर्ण बात नहीं। मेरे समय के प्रायः सभी रचनाकारों ने कहानी, उपन्यास और संस्मरण लिखे हैं। हां, व्यंग्य लेखन में मैं लगभग अकेली थी। मुझसे हर साक्षात्कार में एक प्रश्न अनिवार्य था, आप महिला होकर व्यंग्य कैसे लिखने लगीं? जैसे व्यंग्य लिखना महिलाओं के लिए वर्जित क्षेत्र हो।
जहां तक सहज होने की बात है, मैं कहानी, उपन्यास, व्यंग्य, संस्मरण चारों विधाओं में समान सहजता से लिखती हूं। लेकिन सब कुछ मेरी कलम के मूड पर निर्भर करता है। जबरदस्ती बिलकुल नहीं चलती। कभी कहानी लिखने के अधबीच भी व्यंग्य सूझा है और कभी एक व्यंग्य रचना के ही स्रोत से दो और व्यंग्य निकले हैं। लेकिन इन सभी विधाओं में तुलना करूं तो कहानी संभवतः मेरे सबसे अधिक निकट और सहज रही। समग्रतः विधा कोई भी हो, मेरी कलम, बाहर की दुनिया की अपेक्षा व्यक्ति के अंर्तमन के प्रकोष्ठों की शोध करती ज्यादा दृष्टिगत होती है।
सवाल – आप पर कभी किसी विचारधारा के दबाव में लिखने का आरोप नहीं लगा। क्या आपको अपने आसपास के समाज में भारतीय मूल्यों और संस्कारों में किसी प्रकार की गिरावट महसूस होती है?
सूर्यबाला जी – मेरा मानना है कि विचारधाराएं सभी मनुष्य और समाज के हित में बनाई जाती हैं। वे एक दूसरे की पूरक होती हैं। क्योंकि कोई एक थ्योरी या विचारधारा, आइडियालॉजी यदि पूर्णतः पूर्ण हो तो अगली की आवश्यकता ही क्यों हो? हां, विचारधाराओं को संकुचित और प्रदूषित उनके अनुयायी करते हैं।
रही गिरावट की बात तो आपके इस प्रश्न के उत्तर में ही मानो मैंने ‘वेणु की डायरी’ रच दी है। इस उपन्यास ही नहीं, मेरे समूचे लेखन के मूल में यह प्रश्न ही है कि सभ्यता के चरमोत्कर्ष पर पहुंचा हुआ यह समय, मनुष्यता को साथ लेकर क्यों नहीं चल पा रहा? क्यों समाज और और ज्यादा बर्बर होता जा रहा है! मेरी सभी कृतियों, रचनाओं के चरित्र कोई ‘हीरो’ नहीं, वे अति सामान्य व्यक्ति हैं जो एक सही मनुष्य होकर जी पाने की लड़ाई में शामिल हैं।
पिछले दशकों के अपने अमेरिकी प्रवासों के दौरान, उस समाज को स्त्री को, संबंधों को, परिवारिक विखंडन को, अकेले छुटे बच्चों को बहुत पास से महसूसने के दौरान मिले अनुभवों से मेरा यह विश्वास दृढ़ हुआ है कि हमारी संस्कृति, सोच और परंपराओं में अभी बहुत मूल्यवान बचा हुआ है लेकिन हम उन्हें सहेजने के बदले कौड़ी के मोल लुटा रहे हैं।
सवाल – हिंदी साहित्य में स्त्री-विमर्श कुछ समय बाद ही नारेबाज़ी में बदल गया। क्या लाउड हुए बिना अपनी बात नहीं कही जा सकती है? कहीं हम अपने साहित्य में नारी को पुरूष बनाने का अपराध तो नहीं कर रहे?
सूर्यबाला जी – स्त्री-विमर्श को लेकर अपनी हमेशा की कही बात ही दुहराऊंगी कि हिंदी साहित्य में प्रचारित स्त्री-विमर्श ने स्त्री लेखन की गहराई और संभावनाओं को सीमित कर दिया। उसे एक चौहद्दी में कैद कर दिया। जो विमर्श स्त्री की सोच, स्वप्न, दृष्टि और आकांक्षाओं का पर्याय होना चाहिए था, वह उसके देह विमर्श पर ही अटक कर रह गया। और यह यूं ही नहीं हुआ, इसे मैं साहित्य के पुरूष वर्चस्वी वर्ग की एक सोची समझी साजिश की तरह लेती हूं जिसने उन दशकों की नयी पौध और कुछ कलमों को ‘स्थिति की मांग’, ‘लेखकीय प्रतिबद्धता’ का प्रलोभन दिया। डिमांड और सप्लाई की तर्ज पर देखते-देखते साहित्य का बाजार विमर्शी लेखन से पट गया। स्त्री कथा लेखन में घटी इस दुर्घटना के लिए मैं यही कहूंगी कि – लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई…. । गनीमत है कि वरिष्ठ, परिपक्व कलमें इस बहकावे में नहीं आईं और स्त्री लेखन की नयी पीढ़ी भी आज के समय की जटिलताओं को लेती हुई अपने नये रास्ते तलाश रही है।
‘लाउड’ होना भी बुरा नहीं, बशर्तें आप साहित्य और जीवन में कुछ सकारात्मक, मूल्यवान जोड़ पायें लेकिन यहां तो जैसे पुरूष को हिंसक, प्रतिहिंसक और आतंकवादी किस्म का प्रमाणित करने की होड़ सी लग गयी। यह अतिरेकी एकांगी पक्ष क्रमशः अपना ही प्रतिपक्ष बनता गया। न हम स्त्री की सदियों से शोषित, प्रताड़ित स्थितियों से अनजान हैं, न आज की महती उपलब्धियों और आत्मविश्वस्त छवि से। आपत्ति हमारी उन अधकचरी फतवेबाजियों से है जिन्होंने पुरूष की बराबरी के नाम पर उसकी प्रकृति को स्त्री-गुणों से खंगाल डाला।
सवाल – जहां तक कविता का सवाल है उसमें तो व्यंग्य के नाम पर चुटकुलेबाजी अधिक होती दिखाई दे रही है। वर्तमान समय में आप हिंदी व्यंग्य की दशा-दिशा को कैसे देखती हैं?
सूर्यबाला जी – हिंदी व्यंग्य-लेखन की कुछ अपनी विडंबनाएं हैं। निश्चित रूप से ‘शूद्रविद्या’ से उसका उद्धार हुआ है। एक तरफ डॉक्टर प्रेम जनमजेय की ‘व्यंग्ययात्रा’ जैसी पत्रिका को मैं पिछली सदी में घटी एक शुभ घटना मानती हूं। इसने दूरदराज बैठकर लिख रहे व्यंग्यकारों को एक मंच दिया है। भूले बिसरे कोनों से व्यंग्य के स्रोत तलाशे हैं। व्यंग्यालोचन के सरोकारों से लोगों को अवगत कराया है। तो दूसरी तरफ डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी जैसे उद्भट व्यंग्यकार अपने व्यंग्य उपन्यासों, स्तंभों और व्यंग्य लेखन से शानदार इतिहास रच रहे हैं। लेकिन इस सब के बीच एक बड़ा ‘फिल ऑफ द ब्लेंक’ है।
एक दिगभ्रम, कंफ्यूज़न की सी स्थिति है। प्रत्यक्षतः सिर्फ उंगली पर गिने जाने वाले व्यंग्यकारों को छोड़ दें तो शेष सब पर कोई क्वालिटी कंट्रोल नहीं है। बहुतों को यह समझाना बहुत मुश्किल है कि आप जिसे ‘व्यंग्य’ समझकर लिख, छाप रहें हैं, वह व्यंग्य नहीं है। ऐसी चीजों को परिभाषित या प्रमाणित भी नहीं किया जा सकता। आप जिसे खारिज करेंगे, वह आपको खारिज कर देगा। कभी-कभी मुझे लगता है, कहीं व्यंग्य-कॉलमों की अति लोकप्रियता ही, शायद इसकी शत्रु सिद्ध हुई है क्या? बहरहाल कुछ वरिष्ठ, कुछ कम वरिष्ठ और कुछ युवा व्यंग्यकार मनोयोग और श्रम से व्यंग्यलेखन में जुटे हैं। पिछले वर्षों और इस वर्ष भी कुछ अच्छे व्यंग्य उपन्यासों का आना स्वागतयोग्य है। कुछ युवा व्यंग्यकारों के लेखन से उम्मीद भी बनती है, आश्वस्ति भी मिलती है। साथ ही परिमाण की दृष्टि से प्रभूत संख्या में स्त्री व्यंग्यकार भी पिछले दशकों से सोत्साह व्यंग्य के क्षेत्र में अपनी कलम की अजमाइश कर रही हैं लेकिन उन्हें भी समझना होगा कि अभी इश्क के इम्तहां और भी हैं…!
सवाल – आजकल फेसबुक और व्हट्सप जैसे सोशल माध्यमों से ही लेखक को वाहवाही मिल जाती है और वो समझ लेता है उसका काम पूरा हो गया। ये फेसबुक का लेखन, वाहवाही और गुटबाजी साहित्य के लिए कितनी लाभदायक या हानिकारक हो सकती है?
सूर्यबाला जी – कुल मिलाकर पास टाइम मनोरंजन के बाद साहित्य की दृष्टि से हानिकारक ही लगता है मुझे। सब अपनी-अपनी मृगमरीचिका में फंसे हुए हैं। लाइक्स और कमेंट्स की जोड़ बाकी चल रही है। यहां भी क्वालिटी कंट्रोल नदारद है। लेकिन एक सच यह भी है कि आप अब इससे कतरा कर भी नहीं निकल सकते। एक पास टाइम और अपनी बिरादरी के हालचाल के नाम पर कुछ बुरा नहीं। बशर्ते कि आप इसके एडिक्ट न होइये। बीच-बीच में कुछ बहुत जरूरी जानकारियां, गहरी चीजें भी मिल जाती हैं। बस इसके बाद और ज्यादा की अपेक्षा नादानी ही होगी। सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण है कि स्वयंभू-स्वघोषित और संपादक नामक जीव के अंकुश से मुक्त लेखकों की एक पूरी जमात काबिज़ है सोशल मीडिया पर। फिर भी लेखन की ‘जन्नत की हकीकत’ समझने वाले अपनी कलम के साथ जुटे रहते हैं, उन्हें इस शॉर्टकट से संतोष नहीं मिलता, यह भी सच है। बाकी बचों को उससे ज्यादा कुछ चाहिये भी नहीं होता। उसी में डूब उतरा लेते हैं।
सवाल – आपकी नज़र में व्यंग्य लेखन के लिए व्यंग्यकार का समाज को किस नजर से देखना जरूरी है। नए व्यंग्यकारों के लिए कोई संदेश देना चाहेंगी?
सूर्यबाला जी – देखिये लेखन एक बड़ी विचित्र, अनूठी देन है, प्रकृति प्रदत्त प्रतिभा है। आप चाहकर, कड़े परिश्रम से थोड़ा बहुत ही हरेफेर ला सकते हैं अपने लेखन में। मैं व्यंग्य को सबसे कठिन विधा, ‘गद्य’ का निकष मानती हूं। यह भी मानती हूं कि व्यंग्यकार तो जन्मजात ही होता है। सबकी अपनी-अपनी गहरी उथली संवेदना, समझ और पैठ होती है। हां, उत्कृष्ट कोटि की गहरी व्यंग्य रचनाओं को पढ़ा जाना तो अपनी जगह मदद करता ही है। कम से कम व्यंग्य और विद्रूप में पैठने की समझ देता है लेकिन व्यंग्यशास्त्र या व्यंग्यालोचन पढ़कर ही आप अच्छे व्यंग्यकार नहीं हो सकते। ‘पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय’ वाला हाल है।
हां, नयों के लिए यही समझना काफी है कि व्यंग्य-लेखन का कोई अलग की शब्दकोष नहीं हुआ करता। उन्हीं रोजमर्रा के इस्तेमाल के शब्दों से यह खेल खेला जाता है। व्यंग्य शब्दों में होता भी नहीं, शब्दों के इस्तेमाल से होता है। व्यंग्य का उत्स भी करूणा, आक्रोश और विद्रूप हेता है लेकिन परोसना उसे जायकेदार बनाकर ही होता है।… और एक बात, व्यंग्य, व्यक्ति के बाहर से कहीं ज्यादा व्यक्ति के अंदर होता है- हम सिर्फ जरा अपने मानस जगत को टटोल कर देखें कि कितना कच्चामाल हमारे अंदर है। इस आइने में विद्रूप का एक पूरा संसार नज़र आयेगा हमें।
सवाल – आजकल आप कुछ वेबिनारों में भी दिखाई देने लगी हैं। क्या कोरोना काल की इस देन से आप को संतुष्टि मिलती है? कहीं इससे आपके लेखन पर उल्टा असर तो नहीं पड़ रहा?
सूर्यबाला जी – सच कहूं तो इन वेबिनारों से मुझे संतुष्टि भी मिली है,  लाभ भी, अपने वृहत्तर पाठक वर्ग से प्रत्यक्ष मिल पाने की खुशी के रूप में। चूंकि मैं अभी तक इस अभासी दुनिया के चमत्कारों से बहुत दूर और अनजान थी, इसलिए इन वेबिनारों के माध्यम से ही मुझे पता चल पाया कि तीन-तीन चार-चार दशक पूर्व लिखी मेरी कहानियों, व्यंग्य-रचनाओं और विशेषकर मेरे पहले उपन्यास ‘मेरे संधि-पत्र’ से जुड़ी यादों को मेरे पाठकों ने कितने प्यार से अपने अंदर सहेज कर रखा है।
रचनाओं के शीर्षक, पंक्तियां, चरित्रों तक की पूरी खबरदारी। यह शायद इसलिए हुआ क्योंकि अधिकांशतः सभा सेमिनारों से मैं अनुपस्थित ही रही। पाठकों की दुनिया से मेरा प्रत्यक्ष संपर्क ना के बराबर था। पाठक सिर्फ मेरे अहसासों में थे। क्या आप विश्वास करेंगे, लिखते हुए लगभग बीस वर्ष होने को आये थे जब मैंने पहली बार मुंबई के बाहर किसी शहर की संगोष्ठी में शिरकत की थी। 
तो ‘समय’ तो बेशक लगाना पड़ा लेकिन मेरा मानना है कि कोरोना काल के पूर्वाद्ध के अज्ञात भय और हताशाओं के बीच कम से कम मेरी लिखने की मनःस्थितियां भी नहीं के बराबरी थीं। हम एक विचित्र अवसादी भय से गुज़र रहे थे। ये वेबिनार डूबते को तिनके का सहारा बने। लेकिन इनमें भी मैं थोड़े चुनाव का विकल्प रखती हूं। अपनी रूचि, सुविधा देखकर।
पुरवाई टीम – हमसे बातचीत करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद
सूर्यबाला जी – धन्यवाद

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