Wednesday, February 11, 2026
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डॉ. रामनिवास ‘मानव’ द्वारा डॉ. रमेश यादव की पुस्तक ‘राग-विराग’ की समीक्षा

हाइकु संग्रह – राग- विराग 
रचनाकार- डॉ. रमेश यादव, मुंबई 
प्रकाशक – अद्विक पब्लिकेशन- दिल्ली
प्रकाशन वर्ष – 2025 
मूल्य 200/- ( दो सौ रुपए केवल) 
“हाइकु” विश्व का कदाचित् सर्वाधिक छोटा छंद है। भारत में हिंदी-हाइकु की शुरुआत 20वीं शताब्दी के सातवें दशक से मानी जाती है तथा इस सत्रहाक्षरी जापानी छंद का हिंदी साहित्य-संसार से सर्वप्रथम परिचय प्रयोगवादी कवि अज्ञेय द्वारा करवाया गया था। विगत 50-55 वर्षों की इसकी विकास-यात्रा में खूब हाइकु  लिखे गए, सैकड़ों हाइकु संग्रह और संकलन प्रकाशित हुए तथा अनेकानेक पत्र-पत्रिकाओं के हाइकु-विशेषांक भी निकले।  किंतु, इन सारे प्रयासों के बावजूद, हाइकु को एक काव्य विधा के रूप में न तो विशिष्ट पहचान मिली और न ही यथेष्ट महत्त्व प्राप्त हुआ। कारण? कुकुरमुत्तों की तरह उग आये तथाकथित साहित्यकारों ने हाइकु-लेखन को कवि बनने का शार्ट कट समझ लिया और किसी भी वाक्य को, 5,7,5 के अक्षर-क्रम से तीन पंक्तियों में तोड़कर, कुछ भी ऊल-जलूल लिख लेने को वे हाइकु मानकर कागज काले करते रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि 21वीं सदी का द्वितीय दशक समाप्त होते-होते हाइकु-लेखन में ठहराव-सा आ गया। 
        अब बहुत कम, गिने-चुने हाइकु-संग्रह ही प्रकाशित हो रहे हैं। उन्हीं में से एक है वरिष्ठ रचनाकार डॉ.रमेश यादव का राग-विरागशीर्षक हाइकु-संग्रह। वंदन(10), ‘राग-विराग(81),प्रेम-शृंगार-विरह(75), ‘नारी(45),समाज(90),दर्शन(60),राजनीति(46),प्रकृति-पर्यावरण(48),माता-पिता(50) और तीज-त्योहार(21) सहित दस खंडों में विभाजित इस संग्रह में कुल 526 हाइकु संगृहीत हैं। इन शीर्षकों से स्पष्ट है कि इन हाइकु-कविताओं में विषय-वैविध्य है तथा जीवन और जगत् तथा देश और समाज से जुड़े अधिकतर विषयों को छूने का सार्थक प्रयास कवि ने किया है। 
        हाइकु भले ही जापानी छंद है, किंतु भारत में लोकप्रिय होने के लिए इसका न केवल भारतीय परिवेश में ढलना आवश्यक है, बल्कि भारतीय संस्कृति से जुड़ना और जीवन-मूल्यों को आत्मसात् करना भी जरूरी है। उत्सवधर्मी देश भारत में गीत-संगीत का बहुत महत्त्व है। अतः हाइकु युगबोध-संपृक्त होने के साथ तुकांत और लयात्मक भी हो, तो सोने पर सुहागा। इस कसौटी पर राग-विरागके अनेक हाइकु खरे उतरते हैं, यथा :
  1. आँखों में आँसू 
सीप में जैसे मोती
बेशकीमती। 
  1. बादल-बूँद
 गिरती धरा पर
आँखें मूँद। 
  1. संयम भी तो
अपने ही विरुद्ध
है एक युद्ध।
  1. छोटी–सी बात
खुशियों की सौगात
वो मुलाकात। 
  1. हौले हौले सी
सुरूर- ए- जाम सी 
नशा प्यार की।   
प्रस्तुत संग्रह के अनेक हाइकुओं में उपमा, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण, अनुप्रास आदि अलंकारों का सुंदर प्रयोग भी सहज ही द्रष्टव्य है। ऐसे कतिपय आलंकारिक हाइकु उदाहरणस्वरूप यहाँ प्रस्तुत हैं :
  1. गौरैया प्यारी
थिरकती-खेलती
बिटिया जैसे। 
  1. यादें उसकी
पहली बारिश-सी
भिगोती मुझे। 
  1. धार प्रीत की
धीरे-धीरे बहती
नदी-धार-सी। 
  1. चाँद देखने
बैठी रही रजनी
नदी-किनारे।
  1. धीमी –धीमी सी 
बहती पवन जैसी 
यादें उसकी
  1. दिल ने आज 
छेड़ा राग- विराग
बजी गिटार।
  1. हँसी जो थमी 
समझो उम्र बढ़ी 
मुस्काते रहो। 
 
राग-विरागरमेश यादव का प्रथम हाइकु-संग्रह है। फिर भी, अनेक अच्छे और सच्चे हाइकु इसमें पढ़ने को मिलते हैं। रमेश जी बहुमुखी प्रतिभा के रचनाकार हैं। काव्य, बालसाहित्य, लघुकथा, कहानी और लोकसाहित्य की पुस्तकों तथा कई अनूदित कृतियों सहित इनकी सत्रह पुस्तकें प्रकाशित होकर समादृत हो चुकी हैं। इनके हाइकु-लेखन में अभी और परिष्कार-परिमार्जन होगा तथा हाइकुकार के रूप में भी इनकी पुष्ट पहचान बनेगी, ऐसी आशा की जा सकती है। 
*– डॉ. रामनिवास मानव‘*
प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी-विभाग 
तथा अधिष्ठाता, सांस्कृतिक संकाय
सिंघानिया विश्वविद्यालय, पचेरी बड़ी (राजस्थान)
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