Monday, July 22, 2024
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डॉ विशाला शर्मा की समीक्षा – कहानी ब्रिटिश सैन्य अधिकारी के प्रेम और जज़्बात की : रॉबर्ट गिल की पारो

पुस्तक : कहानी ब्रिटिश सैन्य अफसर के प्रेम और जज़्बात की – “रॉबर्ट गिल की पारो” (1824 -1879′); लेखिकाः प्रमिला वर्मा; प्रकाशक: किताबवाले, 22/4735 प्रकाशदीप बिल्डिंग, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली 110002; मूल्य – ₹800/-
वह साल था 1844 अर्थात 19वीं शताब्दी की आधी सदी पहले एक पारो हुई थी। सिर्फ कल्पनाओं में नहीं हकीकत की जमीन पर…..  और वह भी विश्व प्रसिद्ध अजंता गुफाओं के पास अजिंठा ग्राम में । लेकिन सच कहें तो पारो से पहले विश्व प्रसिद्ध भी कहां हुई थी अजंता ।अजंता गुफाओं के विश्व प्रसिद्ध होने के साथ ही अजंता गांव की पारो का नाम भी दुनियाभर में जाना जाने लगा। और इन दोनों के पीछे एक वजह सिर्फ एक थी…. बस एक नाम….  ब्रिटिश सैन्य अधिकारी रॉबर्ट गिल ।अजंता गुफाओं की खोज सर जॉन स्मिथ द्वारा हो गई थी। लेकिन यह खोज सिर्फ कागजों तक ही सीमित थी। अजंता गुफाओं की रॉबर्ट गिल द्वारा बनाई पेंटिंग्स ने इन भूली बिसरी गुफाओं के चित्र को विश्व पटल पर ला खड़ा किया और इसके साथ ही विश्व पटल पर एक साथ आ गए दो नाम रॉबर्ट और पारो।
यह उपन्यास जो 400 पृष्ठों में समाया है ।यह इसलिए भी खोज की दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि एक ब्रिटिश सैन्य अधिकारी सेना में भर्ती होकर इस देश में आने का इच्छुक है। स्पष्ट है कि उसे यहां की संस्कृति ने अवश्य ही प्रभावित किया होगा। जहाज में बैठा सोचता है वह, इंडिया उसे पुकारता है क्या है यहां पर…..    
जैसे कि उस काल के दौरान 700 वर्ष पूर्व बनी अजंता की गुफाएं जो घने जंगल में कहीं खो गई थीं ।जहां जंगली जानवर और  रेंगने वाले सांप बिच्छू का साम्राज्य था ।वहां कोई जाने का सोच भी नहीं सकता था ऐसे में अकस्मात ढंग से जॉन स्मिथ को शिकार के दौरान  पहाड़ियों के बीच एक कमान दिखती है और वे समझ जाते हैं कि वहां जरूर कुछ ऐसा है जो सामने नहीं आया है। रॉबर्ट के यहां आने से 30 वर्ष पूर्व उन्होंने अजंता की खोज तो कर ली थी। लेकिन उसे एक एक्सीडेंटल खोज माना जाता है ।क्योंकि वे तो शिकार के लिए गए थे।लेकिन, उसे दुनिया के समक्ष लाने का श्रेय रॉबर्ट को जाता है।
सर जॉन स्मिथ ने वहां से आकर अपनी एक रिपोर्ट तैयार की। वे पहले भी इस देश के रॉक कट  मंदिरों पर खोजपूर्ण कार्य कर चुके थे। अतः उन्होंने एक पत्र द्वारा रॉयल एशियाटिक सोसाइटी को इन गुफाओं के बारे में सूचित किया ।लेकिन, काफी वर्ष बीत गए। इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया। कुछ वर्षों के पश्चात इन गुफाओं की रखरखाव एवं उनकी चित्रकारी के लिए रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के सलाहकार सर फर्ग्यूसन ने ईस्ट इंडिया कंपनी को एक पत्र द्वारा रॉबर्ट के नाम की सिफारिश करते हुए लिखा कि वह एक योग्य कलाकार है। उसे महाराष्ट्र में स्थित अजंता की गुफाओं के चित्र बनाने के लिए वहां भेजा जाए। उपन्यास इसी “आदेशपत्र” से शुरू होता है। पृष्ठ 304 पहली बार उसे अपने भाग्य पर गर्व महसूस हुआ आज वह मेजर के पद पर नियुक्त है और ईस्ट इंडिया कंपनी ने उस पर भरोसा भी किया है कि वह गुफाओं की पेंटिंग और फोटोग्राफी का काम संभाल लिख सकेगा अपनी यह खुशी वह किसके साथ बैठे बांटे पत्नी तो इंग्लैंड में है वह एक पत्र द्वारा अपने मित्र टेरेंस को और पत्नी को यह समाचार देता है।
आदेश और पदोन्नति से पूर्व रॉबर्ट मद्रास ,बेंगलोर ,कलकत्ता ,बर्मा, जालना में अपने कार्य में नियुक्त होकर रह चुका था। लेखिका ने इन सभी जगहों का चित्रण उस दौरान के समय को देखते हुए किया है।
19 वर्ष की आयु में लंदन में सेना में भर्ती हुआ था । उसके साथ उसका बचपन का मित्र टेरेंस भी सेना में भर्ती हुआ था ।रॉबर्ट के माता-पिता नहीं है। उसे चर्च के फादर रॉडरिक ने पाला था। तथा उसकी शिक्षा और अनुशासित जिंदगी जीना सिखाया था। उन्होंने सेंट लुइस चेल्सिया के सामंती परिवार की लड़की फ्लावरड्यू के साथ रिश्ता तय कर दिया था ।कुछ समय पश्चात दोनों की सगाई हो जाती है।
अपने मित्र टेरेंस के खाली पड़े बंगले पर वह पेंटिंग बनाने जाता है जहां बंगलों के पीछे के हिस्से पर एक नाट्य मंडली ठहरी हुई है ।जिसके निदेशक मिस्टर ब्रोनी हैं। यहां के कलाकारों से उसकी भेंट होती है जिनमें एक लड़की लीसा है। शोख, चंचल वह लड़की नाटक की कलाकार है। 
धीरे-धीरे यह मुलाकात प्रेम में बदल जाती है। रॉबर्ट की सगाई होने के बावजूद दोनों एक दूसरे को प्रेम करने लगते हैं ।यह एक लंबी प्रेम कहानी है ।नाटक कंपनी के मालिक मिस्टर ब्रोनी उसके अभिन्न मित्र टैरेंस के परिवार से काफी नजदीकी संबंध रखते हैं ।और फिर परत- दर- परत टैरेंस के परिवार उसकी मां अगाथा और पिता के संबंधों के बारे में रॉबर्ट को पता चलता है। करीब 100 पृष्ठों में रची  इस कथा को लेखिका ने मानो कथ्य में डूब कर लिखा है। इस कहानी में रोचकता है.. उत्सुकता है… यह कहानी उपन्यास में जीवंतता लाती है। जबकि रॉबर्ट के हर क्षण का साथी टैरेंस शायद या तो कुछ अधिक अच्छी तरह जानता नहीं है या जानना नहीं  चाहता।
रॉबर्ट लंदन से इंडिया के लिए रवाना हो चुका है। टेरेंस रॉबर्ट के जाने से बहुत अकेला हो चुका है। जहाज के लंबे सफर में उसकी मित्रता एल्फिन नामक व्यक्ति से होती है जो उसका हमउम्र है। रॉबर्ट के साथ सेना में वह भी भर्ती हुआ है। एल्फिन से मित्रता रॉबर्ट की सारी जिंदगी चलती है।
सर्वप्रथम मद्रास आकर रॉबर्ट ड्यूटी जॉइन करता है और फिर कुछ वर्ष रहकर विवाह के लिए इंग्लैंड रवाना होता है। और पति पत्नी दोनों इंडिया आ जाते हैं। पत्नी फ्लावरड्यू को इंडिया पसंद नहीं है।  राबर्ट के बार- बार  स्थानांतरण से पत्नी ऊब जाती है बरसों बीत जाते हैं और चाह कर भी फ्लावरड्यू रॉबर्ट को वापस इंग्लैंड नहीं लें जा पाई।  यहीं से वैचारिक मतभेद शुरू हो जाता है जो चरम पर पहुंच जाता है। पत्नी वापस इंग्लैंड लौट जाती है और रॉबर्ट पत्नी के ऐसे रूखे व्यवहार से अवसाद की स्थिति में आ जाता है।
यहां पर रॉबर्ट का नौकर जयकिशन जिसे रॉबर्ट जॉय कहता है ऐसी बीमारी की स्थिति में एक परिवार के सदस्य की तरह रॉबर्ट की देखभाल करता है। उपन्यास में शुरू से अंत तक जयकिशन रावत के साथ है।
ऐसी बीमारी की स्थिति में ही मद्रास के समुद्र तट पर चित्रकारी करने रॉबर्ट जाता है। जहां उसकी मुलाकात एनी नाम की लड़की से होती है। एनी अपने फौजी पिता के साथ इंग्लैंड से आई हुई है। यह मुलाकात दोस्ती में बदल जाती है। एनी रॉबर्ट से बहुत प्रभावित है।
यहां इंग्लैंड से अपने पिता के साथ आई एनी से उसकी मुलाकात होती है। बार-बार पत्नी  का इंग्लैंड जाना और फिर वापस लौटना, यह सब राबर्ट को गहराई से उद्वेलित करता है वह इस दौरान एनी से मित्रता को अहमियत देता है। रॉबर्ट के अनेक शौक हैं। पियानो बजाता है। माउथ ऑर्गन बजाने में माहिर है। पेंटिंग ,रेखाचित्र, छायाचित्र और शिकार का शौकीन है उसके हिस्से में 150 लेपर्ड का शिकार दर्ज है। राबर्ट उस आदेश पत्र को हाथ में लिए बैठा है कि वह अपनी दीर्घकालीन प्रतीक्षा के बाद अपनी पदोन्नति साथ ही उसका मनचाहा काम भी उसे सौंपा जा रहा है उसे निजाम हैदराबाद की ओर से इस कार्य के लिए अतिरिक्त सहायता भी दी जा रही है। सरकारी आदेश के तहत उसे शीघ्र अजन्ता ग्राम जाना है।वह अकेला ही अपने  दोनों नौकरों और अपने प्रिय घोड़ों के साथ  अजंता ग्राम की ओर चल देता है।
पृष्ठ 290 से रॉबर्ट की संपूर्ण जिंदगी को खंगालने के बाद अजंता गुफाओं की रोचक जानकारी सामने आती है। उस समय सिर्फ थोड़ी जानकारी अजंता गुफाओं के बारे में  सर जॉन स्मिथ के राईट अप से ही रॉबर्ट को मिलती है। लेकिन रॉबर्ट ने अपनी 265 पेंटिंग्स के द्वारा अजंता की गुफाओं की संपूर्ण जानकारी विश्व के सामने प्रस्तुत की।
इसी दौरान महाराष्ट्रियन आदिवासी लड़की पारो उसकी जिंदगी में आती है। और एक अंग्रेज सैन्य अधिकारी और पारो की प्रेम कहानी इतिहास प्रसिद्ध हो जाती है। लेखिका ने न केवल इन गुफाओं की रोचक जानकारी प्रस्तुत की है बल्कि अपने शब्दों से अजंता की गुफाओं की दीवारों पर रॉबर्ट और पारो की प्रेम कहानी भी मानो अंकित कर दी है। 
उपन्यास में विस्तार है लेकिन यह विस्तार रोचकता से भरपूर है। प्रमिला वर्मा ने न केवल उस काल को मानो भरपूर जिया हो, बल्कि लंदन से लेकर इंडिया तक को उस दौरान (1829-1879 ) पूरा प्रस्तुत किया है। पारो के गांव का वर्णन, प्रेम से परिपूर्ण लड़की पारो, उसकी सामाजिक स्थिति, उसकी मृत्यु और राबर्ट का  पारो के प्रति समर्पित प्रेम इस  कथा में बहुत सच्चाई से उभर कर सामने आया है । लेखिका के अनुसार उनका यह शोधात्मक उपन्यास है। इसकी चर्चा भूमिका में की गई है। 
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखे गए उपन्यासों में यथार्थ  और कल्पना से लिखा गया यह उपन्यास हिंदी जगत में निश्चय ही अपनी जगह बनाएगा। राबर्ट गिल के द्वारा बनाई पेंटिंग्स की तस्वीरें और छायाचित्र भी इस पुस्तक में दी गई है। जिससे उस काल का आभास होता है कि कैसे पेंटिंग्स वगैरह बनाई जाती थीं। एक ब्रिटिश सैनिक अधिकारी जो अपनी इच्छा से भारत आता है और यहीं रह जाता है। और यहां की सभ्यता और संस्कृति को बहुत ही महत्व देता है। उसकी मन:स्थिति, उसके कार्यों का उल्लेख आदि को प्रस्तुत करना अपने आप में एक महत्वपूर्ण प्रयोग माना जा सकता है। लेखिका प्रमिला वर्मा बधाई की पात्र हैं।
डॉ विशाला शर्मा
प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष 
चेतना कला वरिष्ठ महाविद्यालय सावंगी औरंगाबाद (महाराष्ट्र) 431008 मोबाइल: 94227 34035 ईमेल :[email protected]
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