Tuesday, July 16, 2024
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सौम्या पाण्डेय ‘पूर्ति’ की कलम से ‘फुंगियो पर धूप’ की समीक्षा

पुस्तक – “फुंगियों पर धूप”; लेखक : डॉ सन्तोष खन्ना; समीक्षक : सौम्या पाण्डेय “पूर्ति”
प्रकाशन वर्ष : 2021; मूल्य : ₹450 सजिल्द, पृष्ठ : 150
“फुंगियों पर धूप” आदरणीय डॉ सन्तोष खन्ना जी का काव्य संग्रह है । आप वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार हैं, जो कि पूर्व जज व “महिला विधि भारती पत्रिका” की प्रधान संपादक हैं, साथ ही सेवानिवृत्त संसदीय अधिकारी भी हैं एवं इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी की काउंसलर भी हैं । विभिन्न प्रसाशकीय दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन करते हुए आप हिंदी साहित्य के क्षेत्र में भी विगत कई दशकों से विभिन्न विधाओं में सृजन करते हुए अपना अमूल्य योगदान दे रहीं हैं । डॉ खन्ना की अब तक, काव्य संग्रह, कहानी संग्रह, नाटक, अनुवादित नाटक, विधि व कानून पर आधारित 16 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, साथ ही हिंदी एवं अंग्रेजी विषय में 20 से अधिक संपादित पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं । हाल ही में आप रेमन मैगसेसे अवॉर्ड विनर्स पर “काव्य सलिला” नामक पुस्तक का संपादन करके “वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड, लंदन के “गोल्ड एडिशन” में भी अपना नाम दर्ज करा चुकी हैं । डॉ खन्ना को उनकी साहित्यिक व प्रसाशकीय सेवाओं के लिए कई पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं ।
“फुंगियो पर धूप” उनका विशिष्ट काव्य संग्रह है, जिसमें जीवन, प्रकृति, देश, समाज, स्त्री विमर्श, व्यवस्था, अध्यात्म एवं बाल कविताओं का समावेश है । एक ओर जहाँ उनकी रचनाओं के विषयों में विविधता है तो वहीं उन्होंने काव्य की विभिन्न विधाओं जैसे, गीत, ग़ज़ल, दोहे, मुक्त छंद, हाइकू आदि के द्वारा रचनाओं को दोहराव से बचाया है, जिसके कारण पाठकों को एक ही संग्रह के अंतर्गत विभिन्न काव्य विधाओं एवं अनेकों विषयों को पढ़ने का आनंद प्राप्त होगा।
यह संग्रह कोरोना की विभीषिका के बाद रचा गया है अतः उस काल की भयंकरता, सामाजिक विद्वेष, सकारात्मकता की प्रवृत्ति की भी संग्रह में उपयुक्त रूप से उपस्थिति है ।
डॉ खन्ना ने अपने लेखकीय कथन में कोरोना काल के समय के सकारात्मक व नकारात्मक दोनों पक्षों का वर्णन किया है साथ ही महाकवि “निराला” जी के संस्मरण द्वारा सौ वर्ष पूर्व की महामारी से उसका तुलनात्मक विवरण भी प्रस्तुत किया है । जो कि उनकी शोध परक दृष्टि का परिचायक है । संग्रह का प्रारम्भ “नमन” नामक कविता से होता है जिसमे वो सम्पूर्ण जगत के कल्याण के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हुए नतमस्तक होती हैं, एक बानगी देखिये:
तुम्हारे सजदे में…
बंद पलकों में बना रहा
यह अनोखा अहसास…
मांगूँ दवा सबकी
देश की और पूरा संसार ।
इसके बाद शीर्षकीय रचना “फुंगियों पर धूप”, “कवि”, “कविता”, “शब्द” आदि रचनाएँ विषय को सार्थक करती नज़र आती हैं । इसी प्रकार एक रचना “खुशी” में वो खुश होने के अनोखे उदाहरण से मन आह्लादित करती हैं, इसमें बेटी के जन्म की महत्ता को भी खुशी के प्रतीक रूप में दर्शाया गया है :
तपते मौसम के बाद
जैसे सावन की फुहार
अमावस के बाद हो
जैसे शुभ्र चाँदनी रात
कई बेटों के बाद
जैसे जन्मी हो बेटी
इसी प्रकार पुलवामा के दंश को बयां करती उनकी रचना “पुलवामा कहर” को देखें :
कलम हुई कुंद
आया ऐसा बवंडर
लील गया मेरे लालों को
मेरा तन मन गश के अंदर
डॉ खन्ना ने गहन आध्यात्मिक पराकाष्ठा को भी अपनी लेखनी से उकेरा है :
मेरा आकार है बेशक लघु
पूरे ब्रह्मांड-सी हस्ती हूँ मैं
मैं संगीत में हूँ, सुरों का साज हूँ मैं
सुर में दिव्य संगीत हूँ मैं
कवितत्व में कविता हूँ
कविता में कवितत्व हूँ
मैं अक्षर हूँ, मैं शिव हूँ
शिव का शिवत्व भी मैं
एक तरफ जहाँ मुक्तक लिखते हुए वो नदी की विवशता व जल के संकट की गंभीरता को परिलक्षित करती हैं :
सब की मैल और मैला धो रही है नदी
पर अपनी पावनता को खो रही है नदी
धुलवाते रहोगे अपने पाप गर नदी से
देख लेना बंजर हो जाएगी यही सदी ।
तो वहीं दूसरी तरफ सूर्योपासना व छठ पर्व की महत्ता को सीमित शब्दों में दर्शाता उनका हाइकू अचंभित करता है :
षष्ठी का पर्व
उपासना सूर्य की
अर्ध्य उत्सव
इसी प्रकार “एक शाम” कविता विवाह उत्सवों के द्वारा उल्लास व वैवाहिक कार्यक्रमों में कार्य करते कर्मचारियों को रोजगार दिलाने का सबब बनती है तो वहीं बाल कविता बच्चों के मनोविज्ञान को बतलाती गेय रचना है :
देखो खेले मेरी मुनिया
भांति-भांति के सुंदर खेल
ऐसे ही स्त्री भावना व युद्ध की विभीषिका के मध्य स्त्री के क्षरण का सजीव चित्रण करती रचना आँखे नम कर देती है :
चूंकि वह जननी है
रक्त जिसका बहता है
तो वह है स्त्री
लुटता जिसका श्रृंगार है
इसके साथ ही इंसानियत का पाठ पढ़ाती रचना “सबका है लाल लहू” विश्व बंधुत्व के भाव को जगाती है तो वहीं “विषाणु वायरस” कोरोना की भयावहता को दर्शाती है ।
ऐसे ही गीत देखें :
खामोश हूँ पर गुनगुना रही हूँ मैं
हर देहरी पर दीप जला रही हूँ मैं
तो वहीं ग़ज़ल है :
क्यों बरबस मुस्कराए जाते हो
दर्द को क्यों छिपाए जाते हो
यह सम्पूर्ण संग्रह डॉ सन्तोष खन्ना के अनुभवों से सृजित उत्कृष्ट काव्य रचनाओं से समृद्ध है । जिसमें इतने विषय समाहित हैं कि हर रचना मन में नया भाव उत्पन्न कर जाती है व पाठक को सोंचने पर मजबूर कर देती है। जहाँ एक ओर त्रासदी का मंजर है तो वहीं दूसरी ओर सकारात्मकता का, कहीं बालपन की कविताएं तो कहीं प्रेम से सराबोर रचनाएँ । हर्ष, बिषाद के मिले जुले भावों में आध्यात्म का पुट भी है, लेकिन कहीं भी निराशा नहीं है, क्योंकि निराशा में भी आशा के दीप जलाना डॉ खन्ना बखूबी जानती हैं । ऐसी रचनाएँ समय की मांग हैं, जिनका सृजन करके उन्होंने अपने लेखकीय दायित्व का पालन किया है क्योंकि यह कविताएँ सिर्फ कोरी कल्पना नहीं बल्कि यथार्थ का प्रतिबिंब हैं, जो परिस्थितियों से सीखने की प्रेरणा देती हैं तो वहीं आने वाले भविष्य के प्रति सचेत भी करती हैं । यह निस्संदेह एक पठनीय पुस्तक है, क्योंकि विपुल विषय विस्तार व उत्कृष्ट शब्द संयोजन संग्रह को वैशिष्टय प्रदान करते हैं । यदि छोटी-छोटी प्रिंटिंग की त्रुटियों को नजरअंदाज कर दें तो अच्छी पेपर क्वालिटी की यह हार्ड बाउंड पुस्तक संग्रहणीय है । इस अनुपम सृजन के लिए डॉ सन्तोष खन्ना जी बधाई की पात्र हैं ।
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