Saturday, July 27, 2024
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कमला नरवरिया की लघुकथा – थप्पड़

लड़की ने हमेशा की तरह लड़के को फोन किया। और लड़के ने हर बार की तरह अभी समय नही है, कहकर उसकी बात सुने बिना फोन रख दिया। 
लड़की की आँखों में आँसू आ गए। वह लड़के को बताना चाहती थी कि आज उसने जुगनुओं को जगमगाते देखा । उस नीली पंखों वाली चिड़िया ने फिर से आम के पेड़ पर अंडे दिए है और वह आजकल किशोर दा के गाने सुनने लगी है और भी कई बातें मगर…
लड़की ने एक ठंडी आह भरी और  फिर न जाने क्या सोचकर उसने लड़के को दुबारा कॉल लगाया। दूसरी तरफ से लड़के ने झुंझलाते हुए फोन उठाया और लगभग उसे डांटते हुए फोन रख दिया।
लड़की उदास हो गई। उसकी आँखों में जगमगा रहे जुगनूं बुझ गए।
उसके बाद कई दिनों तक लडकी ने लडके को फोन नही लगाया। फिर एक दिन अचानक से लड़का-लड़की से मिलने आया और अपने पिछले बर्ताव के लिए लड़की से माफी मांगने लगा। लड़की ने भी उसे दिल से माफ कर दिया।
फिर दोनों पास के पार्क में घुमने गये। वहां लड़का, लड़की की किसी बात से नाराज हो गया और उसने चटाक से एक थप्पड़ लड़की के गाल पर रसीद कर दिया।
लड़की सुबकती हुई वहां से चली आई। थप्पड़ की गूंज अभी भी उसके कानों में गूंज रही थी। रास्ते भर उसे अपनी एक सहकर्मी मिसेज सिंह की बात याद आती रही। 
“यार ये लड़कियां टुकड़े – टुकड़े होने का इंतजार क्यों करती रहती है। टुकड़े होने से पहले भी तो बहुत कुछ घटित होता होगा ।  वैसे तो बहुत सशक्त बनती फिरती है ये लड़कियां। फिर उस समय विरोध क्यों नहीं करती है।”
उसके घर पहुंचने से पहले लडका उसके घर पहुंच चुका था। वह अपनी गलती के लिए उससे माफी मांग रहा था। लड़की ने अपने गाल पर हाथ रखते हुए चीखकर उससे कहा – 
“दफा हो जाओ मेरी जिंदगी से, मुझे अब और थप्पड़ नही खाना है”
लड़की ने यह बात इतने आत्मविश्वास से कही थी कि लड़का विरोध न कर सका और चुपचाप वहां से चला गया।
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