समीक्षित कृति : राबर्ट गिल की पारो (उपन्यास) उपन्यासकार : प्रमिला वर्मा मूल्य : रु 1800/-
प्रकाशक : किताबवाले, नई दिल्ली
उपन्यास हिन्दी गद्य की आधुनिक विधा है। कुछ साहित्यिकों का कहना है,भारत में इस विधा की शुरुआत पाश्चात्य लेखन से प्रभावित होकर हुआ है। यह एक तरह का विवाद का विषय है। हमारे यहाँ सदियों से वैदिक साहित्य लिखे गए है,पुराण, उपनिषद,काव्य,महाकाव्य,कथा आदि का लेखन खूब हुआ है। समीक्षा की दृष्टि से उपन्यास विधा सहज भी है और जटिल भी। वैसे ही उपन्यास लेखन को भी सहजता व दुरूहता में समझा जा सकता है। उपन्यासकार के लिए आकाश खुला रहता है,वह उड़ान भरता है और कहानी के भीतर कहानियाँ बुनता है। साहित्य के मर्मज्ञ विस्तार से उन तत्वों की चर्चा करते हैं जिनका उपयोग उपन्यास में हुआ होता है या होना चाहिए। सर्वमान्य परिभाषा या सिद्धान्त तय करना किसी भी प्रवहमान विधा के लिए सहज नहीं है।
उपन्यास क्यों लिखे जाते हैं? प्रश्न सहज है और जटिल भी। उत्तर भी वैसे ही होंगे। जो कहा जायेगा, लोग सहमत होंगे और असहमत भी। जिसने जो देखा,जो समझा,वह लिखा। कभी सहमत होकर लिखा,कभी असहमत होकर लिखा। अपने अनुभव को कविता के रुप में लिखा,कहानी लिख डाली और साहित्य की नाना विधाएं पल्लवित-पुष्पित हुईं। हम जीवन और उससे जुड़े कथानकों को महत्व देते हैं क्योंकि उसमें हमारा सम्पूर्ण जीवन स्वाभाविक रुप से बिम्बित होता है। कथ्य-कथानक में जीवन की नाना अवस्थाओं का चित्रण किया जाता है,जीवन के सभी पक्ष वर्णित होते हैं,उनका मूल्यांकन होता है और सबसे महत्वपूर्ण,मानवीय अनुभूतियों की पूर्ण अभिव्यक्ति मिलती है। साहित्य की उपन्यास विधा में एक साथ ये सभी समाहित होते दिखाई देते हैं। कथानक के साथ चरित्र चित्रण और पात्रों का चयन कम महत्वपूर्ण नहीं है। पात्रों के बीच संवाद,विषय निरुपण और कथोपकथन से उपन्यास लेखन प्रभावशाली दिखता है। देश-काल,उद्देश्य और भाषा-शैली का किसी भी लेखन में महत्वपूर्ण स्थान है। उपन्यास लेखन में घटनाओं का समूह होता है,पात्रों और काल की दृष्टि से विस्तार होता है और एक साथ बहुत कुछ समेटा जा सकता है।
जीवन की जटिलताएं, जीवन चेतना,जीवन का विस्तृत स्वरुप,चरित्रों का पूर्ण चित्रण, भावनाओं की पूर्ण अभिव्यक्ति आदि के लिए जिन विस्तारों की आवश्यकता होती है,उसकी पूर्ति उपन्यास लेखन द्वारा ही संभव है। विस्तार में गये बिना,जीवन की गुत्थियों को खोले बिना,हर प्रसंग का उल्लेख किए बिना रचनाकार का मन संतुष्ट नहीं होता या जो कहना चाहता है,कह नहीं पाता। ऐसे हालात में विस्तृत फलक का उपन्यास लिखकर ही वह संतुष्ट होता है। चरित्र आधारित उपन्यास, ऐतिहासिक उपन्यास, सामाजिक उपन्यास, यथार्थ कथ्य-कथानक के उपन्यास, मनोवैज्ञानिक चिन्तन के उपन्यास आदि के साथ अब तो भावनाओं और गहरे राजनीतिक अनुभवों को समेटे नाना तरह के उपन्यास लिखे और पढ़े जा रहे हैं। उपन्यास लेखन की यही सबसे अच्छी खूबसूरती है कि इसमें मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन उभरता है या कोई कालखण्ड,कोई घटनाक्रम विस्तार पाता है। कभी-कभी कहानियाँ भी औपन्यासिक पृष्ठभूमि लिए होती हैं जो अपने भीतर बहुत कुछ समेटे रहती हैं। यह विवाद का नहीं,समझने की बातें हैं और साहित्यिक लोग समझते भी हैं।
सुखद संयोग ही है,सोलापुर,महाराष्ट्र की प्रमिला वर्मा द्वारा रचित वृहदाकार उपन्यास ”राबर्ट गिल की पारो” मेरे सामने है। अब तक छः कहानी संग्रहों,साझा संकलनों के साथ-साथ अनेक शोध आधारित लेखन उनके नाम है। पत्रकारिता और लेखन के लिए उन्हें बहुत सारे सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। उनकी रुझान आदिवासी व परित्यक्त महिलाओं को लेकर अध्ययन की ओर है,उनके लेखन में स्त्री-विमर्श खोजा जा सकता है और प्रेम उनके चिन्तन का मूल बिन्दु है। उनके लेखन और इस उपन्यास को लेकर भोपाल के संतोष श्रीवास्तव ने लिखा है-”1844 में ब्रिटिश सैन्य अधिकारी राॅबर्ट गिल को अजंता गुफाओं की चित्रकारी हेतु भेजा गया। वह कलाकार था जो अपनी पेंटिंग्स और छायाचित्रों के साथ-साथ भावुक इंसान भी था। उसकी जिंदगी के कई आयाम थे। नेकदिल इंसान जो कि प्रेम से भरा था,लेकिन कहीं अपने आप में एकाकी। लंदन में जहाज में बैठते ही उसे महसूस हुआ,इंडिया में ऐसा कुछ है जो उसे पुकार रहा है। शायद वह पारो ही थी। जो उसकी जिंदगी में आई और अजंता में राबर्ट और पारो की जिंदगी एक लम्बी प्रेम कहानी बन गई।” उन्होंने आगे लिखा,”एक छोटी सी जानकारी पाकर कथाकार प्रमिला वर्मा की लेखनी ने न केवल इस उपन्यास को शोध-परक औपन्यासिक कृति बनाया बल्कि उसके जीवन के हर पहलू को एक सूत्र में पिरोया।‘’
”मुझे भी कुछ कहना है” शीर्षक से प्रमिला वर्मा अपने उपन्यास ‘राॅबर्ट गिल की पारो’ की भूमिका में लिखती है-‘’सैन्य अधिकारी मेजर राॅबर्ट गिल को अजंता ग्राम की आदिवासी लड़की ‘पारो’ अपनी बगिया का काला गुलाब दिया करती थी और यह प्रसंग धीमे-धीमे अनोखे प्रेम में बदल गया। वह कोली जाति की आदिवासी लड़की थी।‘’ इस शोध कार्य में लेखिका के पति तथा दोनों बेटियों ने भरपूर सहयोग किया है। श्रेष्ठ उपलब्धि के लिए ऐसे सहयोग की जरुरत पड़ती ही है,मैं हृदय पूर्वक सभी को बधाई देता हूँ।
राॅबर्ट गिल बहुमुखी प्रतिभा का मालिक था परन्तु कहीं न कहीं वह अपने को एकाकी महसूस करता था। कम्पनी द्वारा उसे अजंता की पेंटिंग्स बनाने के लिए नियुक्त किया गया। पारो समझदार थी, नृत्य करती थी,वह राॅबर्ट की सहायता और समर्थन करती थी। राॅबर्ट पारो के बिना अधूरा था। एकाकी मनःस्थिति के दिनों में पारो ने ही उसे संभाला था। बल्कि गुफाओं कि हर पेंटिंग में वह उसके साथ थी। प्रमिला वर्मा ने अपना दायित्व समझा,उपन्यास में उस प्रेम-कहानी को लिखा और अमर कर दिया। ”भीतर पसरा हुआ प्रेम ही दूसरे के प्रेम को समझ सकता है” उन्होंने इस कथन को प्रमाणित कर दिया।
उपन्यास लिखने के क्रम में उन्होंने खूब श्रम और शोध किया है,नायक राॅबर्ट गिल के जीवन की हर तिथि जैसे नियुक्ति,पदोन्नति आदि को दस्तावेजों से प्रमाणित करते हुए जोड़ा है और अंत में लिखती है-“अब वह मेजर के पद पर था और साथ ही विशेष अनुरोध पर राॅबर्ट को अजंता मे बौद्ध गुफाओं का चित्रमय रिकार्ड बनाने के लिए नियुक्त किया गया। उसे चित्रादि सारे दस्तावेज लंदन भेजने थे। वह खुश था क्योंकि अपनी इच्छानुरुप अजंता जा रहा था। उसे शांत जगह पसंद है और एकान्त भी। वह कहीं खोया रहता किसी अज्ञात की प्रतीक्षा में। रेखाचित्रों में रंग भरता और मुग्ध होता रहता। समुद्र तट पर किसी दिन एनी मिली और दोनों में धीरे-धीरे आत्मीयता बढ़ती गई। प्रमिला वर्मा दृश्यों के चित्रण में,रंग भरने और प्रेम की अनुभूतियों को आकार देने में पारंगत हैं मानो कोई जानी-पहचानी या अनुभूत सच्चाई हो। संवाद रोचक और ऐतिहासिक सन्दर्भ लिए हुए हैं। उसने एनी से कहा, “यहाँ ऐसा कुछ है जो मुझे अपनी ओर खींचता है। मद्रास में पहला कदम रखा तो लगा,बस अब यहीं रहना है। मृत्यु भी यहीं कहीं होगी आसपास।” उसने आगे कहा, ‘यहीं मृत्यु है,तो यहीं प्यार है–यहीं जीवन है।’ पाश्चात्य या रुसी लेखकों की तरह लेखिका ने सर्वत्र विवरण विस्तार से दिया है जो रोचक है, कभी-कभी उबाऊ भी। वस्त्र-विन्यास का चित्रण जीवन्त लगता है परन्तु स्त्री के विशेष अंगों का नाम लिए बिना भी रोचकता बनी रह सकती है। राॅबर्ट गम्भीर स्वभाव का है और एनी चंचल,चुलबुली। वह राॅबर्ट की मूर्ति बनाना चाहती है। उसने समुद्र तट पर एनी का रेखाचित्र बना डाला। पत्नी वापस इंग्लैंड लौट गई और वह अकेला था। ऐसे में एनी ने उसके सोए तारों को झिंझोड़ा था। क्या वह प्रेम चाहता था या केवल संग-साथ या एनी का शरीर। शायद यह सब कुछ–। रेखाचित्र में उसने रंग भरा, कैनवस पर एनी जीवन्त हो उठी और वह उसे सम्पूर्ण पाने के लिए बेताब हो उठा।
उसने लीसा को टूट कर प्यार किया। उसे अपनी पत्नी फ्लावरड्यू से वैचारिक मतभेद रहा करते थे। उससे जुड़े रहना मजबूरी थी क्योंकि वह उसके बच्चों की मां थी। अजंता के जंगलों में उसे पारो मिली। उसका अपनापन देख राबर्ट का हृदय धड़क उठा। प्रमिला वर्मा लिखती हैं-”जानती थी वह कि उसे वह अधिकार नहीं मिलेंगे जो एक स्त्री को चाहिए। लेकिन सम्पूर्ण समर्पित रही वह, उसके प्रति।” उन्होंने विस्तार से राबर्ट का फ्लावरड्यू के साथ मिलना,शादी करना और जीवन के मधुर सम्बन्धों के बारे में लिखा है। सैनिक क्वार्टर में टैरेन्स और वह साथ रहते थे। दोनों अपनी छुट्टियाँ बीताने के लिए पहाड़ी पर स्थित टैरेन्स के बंगले पर पहुँचते हैं।
प्रमिला वर्मा लिखती हैं-”पहाड़ी पर एक अकेला बंगला,घर के सदस्यों के सुख-दुख और प्रेम का अनोखा गवाह यह बंगला।” लेखिका की अपनी शैली है,वह एक-एक वस्तु का व्यौरा देते हुए भावों को जोड़ती चलती हैं और कहानी बढ़ती रहती है। टैरेन्स पूछता है-‘क्या तुम जानते हो प्यार क्या है—- ‘राबर्ट की आँखों में नींद है फिर भी वह बोले जा रहा है-मां ने कहा था-डायरी लिखते रहना। एक दिन उसने डायरी में डोरा स्मिथ का नाम लिखा। प्रमिला वर्मा सिलसिलेवार नहीं लिखती,मानो उछलती-कूदती रहती हैं,कभी वर्तमान में कभी भूतकाल में परन्तु रोचकता बनी रहती है। टैरेन्स ने अपनी मां को मरते हुए देखा था। पिता को लगता था,उनकी अनुपस्थिति में मां किसी और को प्रेम करती है। वह मां और डैडी की हर बात का गवाह था। दादी भी ऐसा ही मानती थी,इसलिए वह मां से नफरत करती थी। राबर्ट को लीसा मिलती है,मुस्कराती है। प्रमिला जी कोई डरावना दृश्य चित्रित करती हैं, कोई लाल कपड़े का बैग गिरता है बिना किसी कारण। पीछे नाटक मंडली रिहर्सल कर रही है। सुबह वह देर से उठा,कुछ स्केच बनाए और लीसा से संवाद करता रहा। संवाद लिखने में लेखिका को महारत है और गहन भाव होते हैं उनके आपसी संवाद में। राबर्ट लीसा से हाफ न्यूड तस्वीरें बनाने के लिए तर्क देता है-‘प्रकृति भी तो नग्न है, पेड़, पहाड़, नदी,समुद्र सभी नग्न होते हैं। वे तो मना नहीं करते कि मेरा स्केच नहीं बनाओ।’ लीसा सटीक उत्तर देती है-‘वे अपने-आप में कपड़े पहने हैं,जेवर पहने हैं। उनकी नग्नता प्राकृतिक है। वे कुछ भी उतार नहीं सकते।’ राबर्ट ने कहा-‘अर्धनग्न,नग्न मूर्तियाँ,मैथून करती मूर्तियाँ वहाँ इंडिया में हैं जो सैकड़ों वर्ष पूर्व बनाई गई थीं।’ वह लीसा का स्केच बनाने लगा और अचानक फ्लावरड्यू  आँखों के सामने आ गई। प्रमिला वर्मा रुमानियत भरे क्षणों को जीवन्त करती हैं। राबर्ट-लीसा प्रसंग पाठकों को रोमांचित करेगा। लीसा ने राबर्ट के दिल को धड़का दिया है,”तुम वाकई सुंदर हो लीसा,एक मासूम और भोला सौन्दर्य।”
मि ब्रोनी ने राबर्ट को विस्तार से टैरेन्स की मां आगाथा,पिता पीटर,आगाथा की बहन जीनिया व अन्य रिश्तेदारों की कहानी सिलसिलेवार सुनाने लगा और यह भी बता दिया कि पीटर जीनिया को प्रेम करता था। राबर्ट को फ्लावरड्यू की याद आई,उसे लगा, वह कोई नकचढ़ी है,अहंकारी और जिद्दी जबकि लीसा प्यारी सी संवेदनशील लड़की है। प्रमिला वर्मा के युवा पात्र जब भी मौका मिलता है, चुम्बन,दीर्घ चुम्बन में व्यस्त हो जाते हैं। राबर्ट और लीसा की यही स्थिति है। लीसा मां का कहा याद करती है-‘जब सपनों का राजकुमार मिल जाता है तो मन के भीतर घंटियाँ बजने लगती हैं।’ पीटर ससुराल से जीनिया को ले आया और आगाथा से बोला,”जब तुम बच्चा जनोगी तो यह तुम्हारी देखभाल करेगी।’
अगाथा की सेवा नहीं हो रही है बल्कि उसे अपमानित किया जा रहा है,उचित भोजन आदि की व्यवस्था नहीं है। किम से अगाथा शिकायत के लहजे में सच्चाई कहती है-”मेरी बहन जीनिया आई है। वह सुंदर है,कमसिन है,पतली है। मि जान एफ उसे पसंद करता है। किम अगाथा के प्रति भावुक था,जन्म के बाद उसने ही टेरेन्स को उठाया। उस दिन मां खुश थी,घर का वारिस जो आ गया था। किम का आना-जाना बढ़ता गया और दोनों एक-दूसरे को प्रेम करने लगे थे। डा० प्रमिला वर्मा अगाथा और जान एफ के शारीरिक सम्बन्धों को खुलकर लिखती हैं-शरीर के कोमल अंग दर्द से फट जाते थे,जान इसे अपनी पौरुषता समझता था और अगाथा को ‘ठंडा गोश्त’ कहता था। किम के व्यवहार से अगाथा को सही प्रेम की समझ हुई। उसने पुस्तकों से प्रेम करने सिखाया और स्वयं से प्रेम करने भी।
राबर्ट आलमारी खोलता है,उसे एक जोड़ी गरीब आँखें दिखती हैं जो प्रेम चाहती थी और चारों ओर कोई मृत्यु गंध पसरी हुई है। उसे कुछ पर्चियाँ मिलती हैं जिसे अगाथा ने लिखा है अपनी मृत्यु के पहले। राबर्ट एक पर्ची पढ़ता है,लिखा है-”मैं एक हताश औरत जिसे न पति का प्यार मिला और न ही घर की ऐसी चौखट कि वह वहाँ प्यार और स्वाभिमान से रह पाती।” उसने यह भी लिखा है-‘जो स्वयं सुरक्षित नहीं वह अपने बच्चे को क्या सुरक्षा दे पायेगी। लेखिका का यह कथन सही है-शायद हर इंसान प्यार का भूखा होता है। राबर्ट लीसा को याद करता है। वह अपनी मंगेतर के साथ आलिंगनबद्ध है,उसे चुम रहा है,बाल सहला रहा है और उसके ब्लाउज की ओर हाथ बढ़ाता है। फ्लावरड्यू रोक देती है। प्रमिला जी मर्दों की आदतों को जानती हैं,ऐसा कोई मौका छोड़ती नहीं। जीवन को लेकर उनका विचार स्पष्ट है,लीसा के मुँह से कहलवाती हैं-”राबर्ट! हमारी जिंदगी भी तो एक ड्रामा है।”
कहानी को आगे बढ़ाने का हुनर प्रमिला जी से सीखा जा सकता है। वे प्रेम में डूबती हैं और अपने पात्रों को मिलन दृश्यों में सक्रिय कर देती हैं। उनके पात्र राबर्ट और लीसा आलिंगनबद्ध होते हैं,सुबह जागने पर प्रमिला जी लिखती हैं-‘सूरज की किरणें खिड़की से होती हुई आईं और दोनों की नग्न देह को गुदगुदाने लगी।’ मि ब्रोनी राबर्ट को टेरेन्स की माॅम अगाथा के मृत्यु के समय की कहानी सुना रहे हैं। किम के साथ अगाथा के शारीरिक संबंध भी हो गए। उधर जीनिया का तीसरा महीना हुआ है। जान एफ अगाथा के बगल में लेट गया है। अगाथा ने पूछा-किस हक से तुम यहाँ मेरे पलंग पर,मेरे बाजू में लेटते हो? वह मारता-पिटता है अगाथा को। उसकी मां जीनिया को पसंद करती है और अगाथा के प्रति दुर्भावना रखती है। अगाथा उसकी मां को मक्कार औरत और जान एफ को धूप का जला सांढ़ कहती है। वह डायरी लिखती रहती है। प्रमिला वर्मा ने अगाथा को थोड़ी-थोड़ी मात्रा में जहर देने का प्रसंग विस्तार से लिखा है और सभी के चरित्रों को उजागर किया है। जितना प्रेम और रोमांस चित्रित करने में उन्हें महारत है,उससे अधिक ही मार्मिक व संवेदना के दृश्य बुनती हैं।
प्रमिला जी राबर्ट और लीसा के मिलन दृश्यों को काव्यात्मक शैली में लिखती हैं-”खिड़की से झाँकता चन्द्रमा मुस्करा रहा था। राबर्ट ने लीसा को अपनी बांहों में भर लिया। चाँद शरमाकर खिड़की की दीवारों के पीछे छुप गया। वे आलिंगनबद्ध ही बिस्तरे पर आ गए। चाँद भौचक-सा आसमान में ऊँचा चला गया। चाँदनी मद्धिम हो रही थी।’ वे अपने पात्रों के मनोभावों को खूब समझती हैं,विशेषतया प्यार को। उनका बार-बार आलिंगनबद्ध होना,एक-दूसरे को चूमना और राबर्ट द्वारा लीसा के छिपे अंगों की तस्वीरें लेना पूरे मनोयोग से लिखती हैं। कहानीकार चित्रण करते समय अपनी भावनाओं और पसंद को अवश्य चित्रित करता है। वह भूदृश्यावली का यथार्थ चित्र खींचती हैं और पूरे उपन्यास में ऐसे चित्रांकन मिलते हैं। मन के भाव, भूदृश्यावली और प्रेमी-प्रेमिका के मिलन से यह उपन्यास भरा हुआ है। मिलन जितना जीवन्त है,विरह के दृश्य भी संवेदनाएं जगाते हैं। लीसा और राबर्ट को अलग होना है,दोनों के मन में भावुकता है,दोनों उदास हैं।
राबर्ट लीसा को बताता है,”चेलसिया के रिकरबाय घराने की लड़की फ्लावरड्यू के साथ उसकी सगाई हो चुकी है।” प्रमिला जी ने इस सूचना से लीसा,मि ब्रोनी और स्वयं राबर्ट पर पड़े प्रभावों का अद्भुत चित्रण किया है। सारे संवाद,सारी घटनाएं और उनके पीछे की पीड़ा,संवेदनाएं यथार्थतः चित्रित हुई हैं। उनकी पात्रों के बीच की संवाद-लेखन शैली प्रभावित करने वाली है। भावुक करने वाला दृश्य देखिए-”उसे लग रहा था जैसे वह बहुत रो चुका है। लेकिन आँसू नहीं निकलते। बस आँखें भीगती हैं। फिर सूख जाती हैं। कोई उसकी जिंदगी का फैसला क्यों नहीं कर देता।” लेखिका द्वारा सपनों के दृश्यों का चित्रांकन चौंकाता और भावुक करता है। लीसा का यह वाक्य कोई संदेश देता है-”जानते भी हो राबर्ट प्रेम क्या होता है। क्या हथेली पर रखे धूल के कण जिन्हें जब चाहा उड़ा दो। जब चाहे मुट्ठी में बंद करके उसे सहेज लो। जाओ राबर्ट मैं तुम्हें माफ करती हूँ और यह अपेक्षा भी कि आज के बाद हम कभी नहीं मिलेंगे। औरत जितनी नम्र होती है उतनी कठोर भी।” प्रमिला वर्मा टेरेन्स-डोरा प्रसंग को पूरी संवेदना के साथ चित्रित करती हैं। डोरा अपने पिता को स्टाक ब्रोकर कहती है और बहुत निराश है। वे लिखती हैं-”कितने उलझे रिश्ते थे सभी तरफ। एक दुख जो राबर्ट पर तारी था,एक दुख जो टेरेन्स की ओर मुड़ने को मुँह बाए खड़ा था।”
रॉबर्ट,टेरेन्स,फादर रॉड्रिक्स,डोरा,लीसा के बीच पसरी हुई प्रेम और भावनाओं की मार्मिकता,संवेदनाओं को उपन्यासकार ने खूब गहराई से चित्रित किया है। ये सारे दृश्य एक-दूसरे को भावुक करते हैं। राबर्ट को भारत आना है। उनकी यह पंक्तियाँ देखिए-जानते हो राबर्ट,आँखें कभी नहीं मरती। वह सब कुछ देखती हैं। मां की खुली आँखों ने सब कुछ देखा था। वे देख रही थीं–अपनी मृत्यु—।  उपन्यासकार ने पत्र लिखकर कोई प्रयोग किया हैं। अगाथा ने अपने बेटे के नाम मार्मिक पत्र लिखा हैं और अपने जीवन की सच्चाई भी। राबर्ट के मन में नाना तरह की भावनाएं जाग रही थी। उसे लगा-फ्लावरड्यू एक कर्तव्य थी और लीसा उसका प्यार। राबर्ट और एल्फिन साथ-साथ हैं,बातें कर रहे हैं और अपने-अपने सुख-दुख साझा कर रहे हैं। पानी के जहाज से समुद्री यात्रा का लेखिका ने जीवन्त चित्रण किया है और राबर्ट की मनःस्थिति का भी। उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से उपन्यास को विस्तार दिया है। अगाथा द्वारा लिखी पर्चियों को राबर्ट यात्रा के एकान्त में पढ़ेगा,इसकी योजना लेखिका के मन में पहले ही रही होगी। ये पर्चियाँ प्रेम-पत्र ही हैं,बहुत भावुक करने वाली और जीवन की सच्चाई। इन पर्चियों में स्त्री-मन की करुण गाथा,प्रेम की तड़प और नाना शिक्षाएं भी हैं। अगाथा के प्रश्न हैं,उत्तर हैं और टूटते जीवन की कहानी है। प्रमिला वर्मा महान विचारक और गणितज्ञ ब्लेज पास्कल को उद्धृत करती हैं-”जब आप किसी को प्यार करते हैं,आपकी मुलाकात दुनिया के सबसे खूबसूरत व्यक्ति से होती है।” अगाथा उसमें जोड़ती है-”यानी तुम किम!” राबर्ट को आश्चर्य होता है,जिसे कमजोर,अशिक्षित समझा जाता रहा,वह स्त्री महान लोगों को पढ़ती,समझती थी और उन्हें याद भी रखती थी।
राबर्ट इंडिया पहुँच गया। जयकिशन ने उसे चाय दी और सेवा में लग गया। वह अकेला महसूस कर रहा था। उसने मन ही मन कहा-”अपनी पेंटिंग और फोटोग्राफी से वह ग्रेट ब्रिटेन को बता देगा कि इंडिया कैसा है?” अधिकतर प्रकृति के चित्र खींचता और परम्परावादी लोगों की अद्भुत पोशाकें और रहन-सहन से वह अचंभित रहता था। टेरेन्स ने पत्र में लिखा-फादर बीमार हैं और चाहते हैं कि उनके सामने शादी हो जाए।” राबर्ट को वापस लंदन जाना पड़ा। प्रमिला वर्मा जी ने रिकरबाय हवेली की सजावट,चर्च में शादी,सबकी वेशभूषा आदि का मोहक दृश्य चित्रित किया है। राबर्ट लीसा को भूल नहीं पाता और हमेशा किसी अपराध-बोध से ग्रसित रहता है। राबर्ट टेरेन्स को इंडिया, यहाँ के तौर-तरीके,पहनावे आदि के बारे में बताता है, दोनों हँसते हैं।
स्मृतियों के गहरे प्रभाव को प्रमिला जी बार-बार लिखती हैं,राबर्ट के बगल में फ्लावरड्यू है और मन की यादों में लीसा। ऐसी परिस्थितियाँ विह्वल करती हैं और कोई भी भावुक हुए बिना नहीं रह सकता। साथ ही लंदन से मद्रास बंदरगाह तक की यात्रा का उल्लेख करती हैं। उन्होंने हर एक विवरण सजा-संवार कर लिखा है। दोनों खुश हैं।
प्रमिला जी की एक और विशेषता है,उनके लेखन में सपाट बयानी भी रोचकता के साथ है और कहानी विस्तार लेती हुई आगे बढ़ती है। प्राकृतिक दृश्यों,घरेलू जीवन को सहजता से सम्मिलित करती हैं। टेरेन्स ने पत्र में तनिक दार्शनिक व विह्वल भाव के साथ सूचित किया है-”फादर राॅडरिक नहीं रहे,वे अकेले थे,वैसे मृत्यु के समय सभी अकेले ही होते हैं।” राबर्ट रो पड़ा। उसने लिखा है-”दादी ने मेरा विवाह तय कर दिया है।” पत्र की शैली ऐसी है मानो कोई सामने बैठा संवाद कर रहा हो। प्रमिला जी की यह सहज शैली है,उनके लेखन में जटिलता या भारी-भरकम शब्दावली नहीं है। राबर्ट के चरित्र का एक हिस्सा यह भी है, वह हर पल,सुख हो या दुख,स्त्री पात्रों, प्रेमिका या पत्नी को अपने आगोश में लेना चाहता है। फ्लावरड्यू रोकती है-”ओह,नो राबर्ट! अब यह सब डेंजरस है।” राबर्ट कुछ नहीं सुनता। प्रमिला जी लिखती हैं-”वह गम और खुशी को एक साथ अपने भीतर उतार लेना चाहता है।”
फ्लावरड्यू ने बच्ची को जन्म दिया है। लम्बी यात्रा करके उनकी मां और दो भाई आ पहुँचे हैं। अंग्रेज स्त्रियाँ भारतीयों के प्रति क्या व्यवहार करती थी,मिसस रिकरबाय के मुँह से सुनिए-”आई हेट दिस कंट्री,दिस फेलो। व्हाय शुड वी रीच्ड दिस कंट्री। डर्टी ब्लैक मैन,डर्टी हाऊस,वेरी हाॅट एटमासफियर एण्ड वेदर।” आगे देखिए-”क्या-क्या पूजते हैं ये लोग। पहाड़,पेड़,सांप,लाल रंग के पुते फ्लाइंग करते गाॅड,जीभ निकालकर ब्लैक लेडी। ओह हारिबल!”  यहाँ नवम्बर-दिसम्बर में हल्की ठंडक और हमेशा गर्म व उमस भरा मौसम होता है। फ्लावरड्यू ने दूसरे बेटे को जन्म दिया। घर में खुशी फैली थी। प्रमिला जी ने दोनों बच्चों के जन्म के समय की असहनीय पीड़ा का उल्लेख किया है और समस्याओं का भी।
राबर्ट का तबादला वर्मा हो गया और उसे शीघ्र ही जाना पड़ा। प्रमिला जी अपनी लेखनी का चमत्कार दिखाती हैं,संघर्षों,परिवर्तनों,सुखों,समस्याओं और प्रेम के दृश्यों का चित्रण करती हैं। फ्लावरड्यू पुनः गर्भ से है। तीसरी बार फिर लड़की हुई। समय से पहले साढ़े सात महीने में जन्म होने से वह कमजोर थी और उसके सिर पर बाल नहीं थे। डाक्टर ने चिन्ता न करने को कहा था परन्तु अचानक उसकी हिचकियाँ उठीं और वह ईश्वर को प्यारी हो गई। फ्लावरड्यू को लगने लगा,राबर्ट को समझना, समझाना मुश्किल है। वह चाहती थी,राबर्ट नौकरी छोड़ दे और इंग्लैड चले। राबर्ट पुनः मद्रास चला आया, उसके तबादले की प्रार्थना स्वीकृत हो गई थी। प्रमिला जी ने विस्तार से वर्मा से मद्रास की यात्रा,टेरेन्स का आना,एल्फिन का दिल्ली जाना आदि का चित्रण लिखा है। फ्लावरड्यू वापस इंग्लैड लौटना चाहती है। पति-पत्नी के बीच झगड़े शुरु हो गए हैं।  उसने कहा,”जहाज में हम लोगों की टिकट बुक करा दो,कल ही जाना है मुझे।”
लेखिका की संवेदना राबर्ट के साथ है। जहाज पर चढ़ाते हुए उसने चाहा था कि इस तरह अकेला छोड़कर फ्लावरड्यू न जाए। घर लौटकर वह अविरल शांति में घुल गया था। वह शांति का दृश्य खींचती हैं-“अगर शांति का मतलब लगी-बँधी लीक के साथ जीना है,जहाँ न अचानक खुशी का झटका लगता है,न किसी खतरे का झोंका आता है और न ही कोई खुशी इतनी उद्वेलित करती है कि कोई उसके साथ दिनों-हफ्तों-महीनों जिया जा सके।” राबर्ट अवसाद में चला गया। फादर ने कहा,”मिस्टर राबर्ट, अवसाद कोई बीमारी नहीं है,बल्कि शरीर को खतम होते देखने का उत्सव है। इससे बाहर आओ राबर्ट! यह धीमा जहर है जो शरीर को दीमक की तरह खाता है।” प्रमिला वर्मा विस्तार दे रही हैं राबर्ट के हर एक पल का,उनकी कोशिशों का। महीनों बाद एनी आई है। उसने चुम्बनों की बौछार कर दी। एनी ने कहा,”शरीर को समूचा पा लेना जिंदगी नहीं कहलाती मिस्टर राबर्ट!” ऐसे मिलन के बीच के संवाद को मूर्त करने में प्रमिला जी की लेखनी कमाल करती है। राबर्ट ने सोचा-”प्रेम की अजब परिभाषा लिख गई थी एनी।” राबर्ट भी इंग्लैंड पहुँचता है। टेरेन्स,फ्लावरड्यू सहित सभी प्रसन्न हैं। वह फिर से गर्भवती है।
रॉबर्ट नौकरी छोड़ना चाहता है और इंग्लैंड में पत्नी,बच्चों के साथ रहना चाहता है। उसे पता चलता है,महाराष्ट्र के जालना में उसकी पोस्टिंग हुई है। राबर्ट अतीत में खो जाता है और मन ही मन कहता है-”किनारे कभी नहीं मिलते राबर्ट! बस लहरें संदेश देती रहती है एक संदेश बाहक की तरह।” इंडिया की यात्रा शुरु है,फ्लावरड्यू अपने दोनों बच्चों के साथ आ रही है। जालना का बँगलों अच्छा है। फ्लावरड्यू यहाँ अपने बच्चे को जन्म देती है। राबर्ट को मद्रास भेजा जाता है,फिर जालना बुला लिया जाता है। उसने पेंटिंग के साथ फोटोग्राफी करना सीख लिया । फ्लावरड्यू चौथे बच्चे की मां बनने वाली थी। वह बार-बार हो रहे स्थानान्तरण से परेशान था। 1844 में उसने ‘राॅयल एशियाटिक सोसायटी’ को पत्र भेजा कि वह औरंगाबाद में खोजी गई अजंता गुफाओं पर चित्र बनाकर कार्य करना चाहता है। सर जेम्स फर्ग्युसन ने उसके नाम की सिफारिश की थी। उन्होंने सरकार को लिखा था कि अजंता की गुफाओं को मधुमक्खियों के छत्तों,चमगादड़ों, बनैले पशुओं,मकड़ियों ने भारी नुकसान पहुँचाया है।
राबर्ट को एनी का पत्र मिलता है,वह मुम्बई में है। उसे एनी से मिलने जाना ही था। चित्रण देखिए-एनी पिघल उठी,”हाँ, राबर्ट तुम मेरे दिल-दिमाग पर ऐसे छाए हो कि अलग कुछ सूझता ही नहीं। तुम मेरे हो राबर्ट।” आगे लिखती हैं, “एनी की जिंदगी का यह पहला पुरुष स्पर्श था। उसने एनी को इतना आलिंगनबद्ध किया कि उसकी मुलायम देह कसमसा उठी।” एनी पूछती है-”क्या तुम मुझसे शादी करोगे राबर्ट?” वह स्वयं बोल पड़ती है,”खैर ,कोई बात नहीं। तुम्हारी पत्नी है,तुम्हारे बच्चे हैं। राबर्ट मैं ऐसा कोई काम नहीं करुँगी कि तुम्हारा परिवार टूटे। बस मुझे आश्वस्त कर दो कि मैं तुम्हारी हूँ,तुम मेरे हो।” प्रमिला वर्मा स्त्री-मन को खूब समझती हैं और दृश्य जीवन्त कर देती हैं। फ्लावरड्यू बहुत नाराज और दुखी है। उसे जोजेफ के द्वारा सूचना मिल चुकी थी। उसने पूछा,”कौन थी वह जिसके साथ तुमने छुट्टियाँ मनाई? उसने सब कुछ बता दिया। कुछ दिनों बाद फ्लावरड्यू अपने चारों बच्चों के साथ इंग्लैड लौट गई।
राबर्ट सोचता है,दुख से बचना बहुत मुश्किल है। उसने पाया कि वह दुख और अकेलेपन से घिरा हुआ है। उसे परायों से प्रेम और अपनापन बहुत मिला। उसे महसूस हुआ,एनी के लिए कोई कोना खाली है उसके भीतर। उसने तय कर लिया,वह समुद्र तट पर जायेगा,फोटोग्राफी करेगा,स्केच,पेंटिंग करके स्वयं को संतुलित करेगा। उसने गहराई से सोचा-“क्या मैं सचमुच बदनसीब हूँ।”
उसे राॅयल एशियाटिक सोसायटी का पत्र मिला, खूब खुश हुआ,उसे अजंता गुफाओं की चित्रकारी करने औरंगाबाद भेजा जा रहा है और मेजर पद पर पदोन्नति हुई है। अजंता गाँव की बारादरी में उसके रहने की व्यवस्था करवा दी गई है। बारादरी अजंता का स्थानीय महल था। उससे मिलने गाँव के लोग आए। सामने लड़की खड़ी थी, उसके हाथ में मिट्टी की साफ-सुथरी प्लेट थी जिसमें ज्वार की घी लगी दो रोटियाँ थी,करडी का साग था। उसने कहा-”हम आपके लिए खाना लाए हैं।” उसने लड़की को देखा। प्रमिला वर्मा जी लिखती हैं-”खुलता गेहुँआ रंग। बगैर ब्लाउज की ऊँची साड़ी जो उपर के भाग को आँचल में कसकर ढकी हुई थी। बालों का कसकर बाँधा ऊँचा जूड़ा जिसमें गुलाब के दो फूल खुँसे हुए।” एक वृद्ध ने हाथ जोड़कर कहा-”साहब हम कोली जाति के हैं। यहीं मिट्टी के घर बनाकर रहते हैं। हमें बंजारा कहते हैं।” प्रमिला जी जयकिशन के बारे में,राबर्ट के शिकार आदि का विवरण देती हैं। वह आसपास को देखने-समझने के लिए अक्सर घोड़े पर सवार हो निकल पड़ता है। वह अजंता की गुफाओं को देखने निकल पड़ा। वहाँ 29 गुफाएं हैं,वार्गूणा नदी बहती है। जाॅन स्मिथ ने सबसे पहले इन गुफाओं को खोज निकाला था। लेखिका ने विस्तार से स्मिथ के खोज का विवरण लिखा है। स्मिथ ने लेख लिखकर भेजा था जो बाद में प्रकाशित हुआ। राबर्ट के पास वह लेख है और उसने बहुत सी जानकारियाँ हासिल कर ली है।
प्रमिला वर्मा पात्रों के मन को पढ़ती हैं,उनकी भावनाओं को समझती हैं और कोई जीवन्त दृश्य मूर्त कर देती हैं। उन्हें हवा-पानी,शीत-ग्रीष्म-बरसात सहित हर मौसम का खूब ज्ञान है। पारो गाँव के मुखिया महादेव की बेटी है। उसने देखा,पारो उसकी ओर देखकर कुछ शरमा-सी रही थी। बीच-बीच में उसे अकेलापन लगता, उसने फ्लावरड्यू को पत्र लिखा और आने के लिए आग्रह किया। स्मृतियों में उभरती हैं-लीसा की आँखें,अगाथा की पत्थर होती आँखें और जहाज पर चढ़ती फ्लावरड्यू की आँखें। प्रमिला जी लिखती हैं-‘राबर्ट ने उन आँखों को पहचान लिया था। वे आँखें सब कुछ कह जाती हैं।’ वह अजंता गुफा के चित्रों का सन्दर्भों के साथ विस्तार से चित्रण करती है। जातक कथाओं पर आधारित इन गुफाओं में चित्र बने हैं जो भगवान बुद्ध के पूर्व जन्मों पर आधारित हैं। ‘मारा’ उस समय का प्यार का देवता है जो बुद्ध को रोक रहा है,’’प्यार करो, पलायन मत करो।‘’ भारतीय चिन्तन के आधार पर बुद्ध ने पलायन किया था। लौटते समय कनाई पारो के बारे में राबर्ट को बताता है-‘’वह नाचती है,गाती है। अन्ना भाऊ का दबंग व लड़ाकू बेटा महावीर पारो से शादी करना चाहता है परन्तु वह नहीं चाहती।‘’
लेखिका ने जयकिशन का चरित्र चित्रण किया है,वह सेवक है,स्वामीभक्त है और हर तरह से राबर्ट के लिए चिन्ता करता है। वह उसके व्यवहार को,अकेलेपन को, भीतरी पीड़ा आदि सब कुछ पहचानता है। उसके खाने-पीने से लेकर स्वास्थ्य आदि हर तरह से सेवा में जुटा रहता है। उसके कहने पर राबर्ट ने कनाई को नौकरी में रख लिया। दूसरे दिन गुफा-2 और तीन की सफाई के बाद राबर्ट ने देखा,जाँचा-परखा। गुफा-3 में थोड़ी देर एकान्त में विश्राम किया। शाम ढले तरबूज लेकर पारो आई। प्रमिला जी लिखती हैं-”पारो की मुस्कराहट में एक खिलापन था। उसने बालों को कसकर जूड़ा बाँधा था और उसमें शेवंती के फूलों की वेणी लगाई थी। एक कंधा खुला था और खूब कसकर बाँधा हुआ कपड़ा जो उसके स्तनों को ढके था। पैरों में धातु की पायलें। किसी भी कोण से देखो पारो सुंदर थी।” जयकिशन को न जाने क्यों लगा कि पारो अपनी इच्छा से आई है।
रॉबर्ट गुफा में स्तम्भ को हाथ लगाता तो उसे पायल की छन-छन ध्वनि सुनाई देती। प्रमिला जी लिखती हैं-”पारो ने उसकी जिंदगी में दस्तक दे दी थी।” हर गुफा की सफाई होती,राबर्ट सब कुछ देखता और चित्र बनाने के लिए थीम की योजना बनाता रहता। गुफा के बाहर आकर वह छाया में खड़ा हो गया और दिमाग में थी पायलों की गूँज और हाथ में तरबूज लिए खड़ी पारो। सातवीं गुफा में मंडप जैसी आकृतियाँ बनी हुई थीं। आठवीं गुफा खाली थी। नौवीं आयताकार गुफा थी जिसमें बुद्ध की खंडित-खंडित जीवन यात्रा है। टेरेन्स और फ्लावरड्यू के आने की सूचना उनके पत्रों द्वारा मिली और उसने फ्लावरड्यू को पत्र लिखा-”जिंदगी का हर पल मूल्यवान होता है फ्लावर—मृत्यु तक हमें जीना चाहिए—हम मृत्यु आने के पहले ही मरने लगते हैं।” प्रमिला वर्मा की पत्र-लेखन शैली रोचक और भावनाओं को यथार्थतः व्यक्त करने वाली है। राबर्ट ने गिलास में काला गुलाब देखकर उसके बारे में पूछा। जयकिशन ने बताया-‘’पारो आई थी।‘’ बीच में एक दिन वह एलोरा की गुफाओं को देखने गया। यहाँ बौद्ध धर्म से शुरु होकर जैन धर्म तक के चित्रों से अद्भुत गाथाएं कही गई हैं। 10वीं गुफा हिनायना मंदिर कहा जाता है। 11वीं गुफा का सभाकक्ष बहुत बड़ा है। 12वीं गुफा में पत्थर के पलंग दिखाई दे रहे हैं। 13,14,15 में कुछ खास नहीं है। 16वीं बहुत महत्वपूर्ण गुफा लगी। राबर्ट को आश्चर्य हुआ,ऐसा काम जो पत्थरों पर हुआ है वह लकड़ी पर किया जाता है,इतना बारीक,सुंदर कटाव नकाशीदार। इस देश को अन्य देशों के लोग जितना अशिक्षित समझते हैं,वैसा यह नहीं है। ये लोग अपनी संस्कृति को हमेशा जीवित रखना चाहते हैं। दफन हो चुकी संस्कृति भी इनके यहाँ जीवित है। 17वीं गुफा ने राबर्ट का मन मोह लिया। उसे जंगल के रास्ते में पारो मिली,निर्गुण्डी के पत्ते लेने आई थी। 19वीं गुफा में बुद्ध अपनी पत्नी और पुत्र से भिक्षा लेते दिखाई दे रहे हैं। राबर्ट ने क्रमशः सभी गुफाओं को देखा और प्रभावित होता रहा। अगले दिन भी पारो जंगल में मिल गई। पत्ते तोड़ रही थी। प्रमिला जी लिखती हैं-”राबर्ट के पीछे घोड़े पर पारो बैठी थी। वह बार-बार राबर्ट की पीठ पर गिर जाती थी। उसके सख्त वक्षस्थल राबर्ट की पीठ से चिपके थे। उसने राबर्ट को दोनों हाथों से कमर से पकड़ लिया था।”
गाँव में मेला लगा है,रॉबर्ट देखने पहुँच गया। उसका स्वागत हुआ और उसे तख्त पर बैठाया गया। पारो काले रंग की साड़ी पहने अन्य लड़कियों के साथ नृत्य मंच पर उपस्थित हुई। उसने राबर्ट को कनखियों से देखा। दोनों मुस्करा दिए। राबर्ट के कोट में वही काला गुलाब पिन के सहारे अटका हुआ था। वहाँ राबर्ट को स्वादिष्ट भोजन परोसा गया। खा-पीकर वह देर से लौटा। राबर्ट चित्र बनाने की तैयारी में लग गया और अजंता की पेटिंग में खो गया। सन्ध्या के कुछ पहले वह घोड़ा लेकर निकल पड़ा। जंगल में उसे महावीर और उसके साथी मिले। उन्होंने चाय के लिए राबर्ट को निमंत्रित किया। राबर्ट भी यही चाहता था,पारो की शायद एक झलक मिल जाए। वह दिख गई और राबर्ट उसके आँगन में भीतर चला आया। ”आज ब्लैक रोज कहाँ है पारो?” उसने कहा। वह भागकर पिछवाड़े गई और अधखिला गुलाब तोड़ लाई। उसने राबर्ट के समीप जाकर फूल उसके कोट में लगा दिया। महावीर जल-भुन गया और मुट्ठियाँ भिंच ली। प्रमिला जी लिखती है-”राबर्ट और पारो की सांसे फूल लगाते समय आपस में घुल-मिल रही थीं।”
अगले दिन पेंटिंग के साजों-सामान के साथ राबर्ट गुफा-6 के सामने कैनवस पर पेन्सिल से चित्र बनाने लगा। पद्मासन मुद्रा में,ध्यान में बैठे बुद्ध का चित्र बनाया,28 स्तम्भ,बड़ा सा सभाकक्ष,प्रवेश द्वार पर मगरमच्छ और फूलों की सुन्दर आकृतियाँ। उसे अकेलापन महसूस होता है,किंचित दार्शनिक चिन्तन करता है-”हमेशा यात्रा पर ही रहता हूँ। मेरी यात्रा अंतहीन है,मुझे जाना कहाँ है कुछ पता नहीं, लेकिन उद्देश्यहीन भी मैं नहीं भटका हूँ। लगता है जिंदगी का अंतिम पड़ाव यह अजंता ग्राम ही है।”
उसे पायल की छम-छम सुनाई दी। वह एकाएक खड़ा हुआ और नीचे नदी की ओर उतरने लगा। पारो चट्टान पर बैठी थी और अंजुरी से पानी उछाल कर अपना चेहरा धो रही थी। राबर्ट मुग्ध हो देख रहा था। अचानक पारो ने नदी का शीतल जल राबर्ट की ओर उछाल दिया और हँस पड़ी। प्रमिला वर्मा ने दोनों के बीच के संवाद,फिर घोर बरसात,दोनों का भीगना और राबर्ट द्वारा पारो के भीगे वस्त्रों को उतारना आदि के दृश्यों को सधे अंदाज में लिखा है। गाँव वाले,जयकिशन सभी खोजते आ पहुँचे। पारो बाबा के साथ चलने लगी। उसके पैरों में प्रथम मिलन के बाद की पीड़ा का कंपन था। पिता ने पारो को थप्पड़ जड़ा और आग बबूला हुआ।
प्रमिला जी लिखती हैं-”वह सब कुछ जानता है। उसने आज  तक स्त्री की मर्जी के विरुद्ध किसी से संबंध नहीं बनाए क्योंकि उसके भीतर एक प्यार भरा दिल धड़कता है। वह प्यार पाना चाहता है जो उसे लीसा से मिला,एनी से मिला और अब पारो—पारो बहुत सभ्य,प्रिय,बुद्धिमान लड़की है। वह सदैव पारो से प्रेम करेगा।” एनी के पत्र को पढ़कर राबर्ट भीग उठा,”उसकी कला की कितनी कद्र की है एनी ने।”
अगले दिन गुफा की ओर से लौटते हुए राबर्ट भीग गया था,उस दिन भी खूब बरसात हो रही थी। तली हुई मछली लेकर पारो भीगते हुए आ गई। उसने पारो को भी मछली के साथ रोटी खिलाई और स्वयं खाया। वह लिखती हैं-”न यहाँ धर्म था,न पूर्वी-पश्चिमी संस्कृति–यहाँ केवल प्रेम था। प्रेम–जिसकी अथाह गहराई में राबर्ट डूब चुका था। पारो इस मिलन के लिए तैयार नहीं थी,जो हो चुका था।” प्रमिला जी ऐसे दृश्यों को बड़ी जीवन्तता व साहस के साथ चित्रित करती हैं और प्रेम को सहजता से स्वीकार करती हैं चाहे कोई कुछ भी समझे।
कहानी जो भी हो,प्रमिला वर्मा जी ने वासना के दृश्यों से भर दिया है अपने उपन्यास को। निजाम हैदराबाद ने चमचमाती हुई थालियाँ भेजी हैं,सूर्य का प्रकाश इन थालियों से परावर्तित होकर गुफा को प्रकाश से भर देता है जिससे चित्रों को सहजता से समझा जा सकता है। कन्हैया के द्वारा पता चला,महादेव व आसपास के स्त्री-पुरुष मेला देखने  दौलताबाद गए हैं। राबर्ट गाँव पहुँचा और खुश हुआ,पारो घर में ही थी। उसने पारो को कमरे में ले गया। प्रमिला जी की पंक्ति देखिए-”थोड़ी ही देर में पारो के कपड़े अस्त-व्यस्त थे और राबर्ट गहरी सांसें ले रहा था।” लोग लौट आए थे। जेनाबाई ने राबर्ट को ”बेशरम कहीं का” और पारो को ”कलमुँही” कहा। महादेव इतना ही कह पाया,”अरे,साहब आप?” होली के दिन महादेव ने राबर्ट को बुलाया था,वह सज-धजकर पहुँचा। पारो पीली साड़ी में दिखी। उसका पूरा श्रृंगार पीले फूलों का था। उसने राबर्ट से कहा,”सर! मालूम था,तुम आओगे। बहुत सुन्दर लग रहे हो इन कपड़ों में। जल्दी मत जाना,आज होली जलेगी।” लड़कियों का नृत्य शुरु था। दोनों मुग्ध हो एक-दूसरे को देख रहे थे। पारो अचानक पास आई और ‘होली है’ कहते हुए राबर्ट पर गुलाल उड़ाया। वह भी नाचने लगा। महादेव ने राबर्ट के माथे पर तिलक लगाया। महावीर ने कहा-”महादेव काका अपने फिरंगी बूढ़े दामाद का राजतिलक कर रहे हैं।” सभी हँसने लगे और महादेव सचमुच शर्मिंदा हो उठे। राबर्ट ने सोचा-जब सब लोग जान ही गए हैं,वह पारो को यहाँ बारादरी में ला ही सकता है। किसी दिन पारो उसे जुगनुओं से भरे तालाब ले गयी,वह खुश हुआ।
वह लगातार पेंटिंग बना रहा था और शीघ्र ही सारी पेंटिंग्स भेज देना चाहता था। उसने पारो को बता दिया था कि पत्नी,बच्चे और दो दोस्त आने वाले हैं। वह उत्सुक थी सबसे मिलने को और सजावट के काम में हिस्सा ले रही थी। मि. सिम्पसन आये,गुफा में गए,शिकार किया,राबर्ट को पेंटिंग बनाते देखा और एक दिन चालीस पेंटिंग्स,संदूक में बंद फोटोग्राफ्स और बेमिसाल उपहारों के साथ रवाना हुए। उन्होंने राबर्ट की खूब प्रशंसा की।
सिम्पसन के रहने तक पारो बारादरी नहीं आई,राबर्ट गाँव पहुँचा,उसके हाथ की चाय पी और हालचाल पूछा। पारो ने सूचित किया-”सर,हम दोनों दो से तीन होने जा रहे हैं।” राबर्ट खुश हुआ,बोला,”मैं इसकी देखभाल करुँगा,आखिर यह मेरा बच्चा है।”
आगे इस कहानी में झंझावात ही झंझावात है। पारो गर्भवती है,इससे गाँव का माहौल गर्म है। फ्लावरड्यू बच्चों और राबर्ट के दो दोस्तों के साथ बारादरी आ गई। वह भी गर्भवती है। उसे पता चलता है,पारो के बारे में। वह विफर उठती है। राबर्ट गाँव वालों को समझा देता है,पारो उसकी मिस्ट्रेस है,वह उसका और बच्चे की परवरिश करेगा। वह पारो की छोटी बहन पिहू की शादी का खर्च भी वहन करेगा। फ्लावरड्यू सोच रही है-“यह पुरुष की कैसी मानसिकता है,घर में पत्नी है,बच्चे हैं, लेकिन मिस्ट्रेस भी चाहिए। हर खूबसूरत लड़की उसे अपनी बाँहों में चाहिए। यहाँ के जमींदार–सामंतीशाही घराने के पुरुष भी तो अनेक शादियाँ करते हैं,मिस्ट्रेस रखते हैं—यह सब क्या है? और क्यों है?” उसकी स्थिति अवसाद जैसी होने लगी और उसका तीन माह का गर्भ खराब हो गया। अंततः उसने वापस इंग्लैड जाना तय कर लिया। राबर्ट बहुत दुखी था, परन्तु जानता था इस संबंध का यही अंत है। उधर पारो के साथ भी यही हुआ, बच्चा पेट में ही मर गया। उसने पारो के माथे का चुंबन लिया। सान्त्वना के शब्द नहीं थे उसके पास।
महावीर की शादी पिहू से हो गई। पारो लगातार राबर्ट के साथ रहती,दोनों एक-दूसरे की जरुरत बन गए थे। विभिन्न कोणों से राबर्ट ने अजंता की अनेक तस्वीरें ली जो इतनी सुंदर आई मानो राबर्ट ने इतिहास रच दिया। पारो मां नहीं बन पा रही थी। इस को लेकर वह उदास रहती थी परन्तु जाहिर नहीं होने देती थी।
राबर्ट ने 105 पेंटिंग्स बना ली थी। अचानक उसे मद्रास जाना पड़ा। पारो गर्भवती थी। मद्रास से लौटते हुए वह खुश था,पारो की डिलीवरी का समय नजदीक है। जयकिशन ने बताया,”पारो नहीं रही सर!” ‘कैसे?’ वह चीखा। यह हृदयविदारक चीख थी। पारो प्लेग की बीमारी से नहीं मरी बल्कि उसके गर्भ के नौ महीने पूरे हो रहे थे,यह जानते हुए भी उसे पत्थरों से मारा गया। लोग कहते हैं,’महावीर ने बदला ले लिया।’ आदिवासी समुदाय का मुखिया महावीर है और महादेव भी नहीं रहा। मात्र छह महीने में सब कुछ खत्म हो गया।
वह अजंता ग्राम में गया और पारो के घर के सामने खड़ा हो गया। उसने अधजले काले गुलाब की डंडी सहित पंखुड़ियाँ तोड़ ली। पिहू जोर से रो पड़ी-”सर,पारो नहीं रही।” उसने बताया-”महावीर पारो को अपने साथ सुलाना चाहता था। उसके महीने पूरे हो गये थे। पत्थरों से मार-मार कर उसकी हत्या कर दी।” पिहू ने कहा,”लेकिन साहब,ताई ने हार नहीं मानी। उसने कहा,जब सर आएं तो बता देना मैं उनकी थी,उनकी ही रहूँगी। मैं उन्हें बहुत प्यार करती हूँ। वो भी मुझे बहुत प्यार करते हैं।” राबर्ट ने पारो के अंतिम संस्कार की जगह चबूतरा बनवाया और उस पर लिखवाया-”23 मई 1856 फाॅर माई वीलव्ड पारो-राबर्ट।”
राबर्ट के पास दो पेंटिंग्स थी जो उसने पारो के बनाये थे। एक में वह जेवरों से सजी थी। कसी हुई चोली और स्तनों के बीच में आँचल। पाँवों में मोटे चाँदी के कड़े,पैरों में पायल और एक पैर में काला धागा। दूसरी पेंटिंग में पारो चट्टान पर बैठी थी। एक स्तन साड़ी के आँचल से ढका था,एक खुला था। कठोर और उन्नत स्तन। पीछे केव्ज थी जो चित्र में दिख रही थी। उस दिन राबर्ट ने खुले आसमान के नीचे पारो के सारे कपड़े उतार दिए थे। राबर्ट अक्सर उस चट्टान पर बैठा करता या उस स्थान पर जाता जहाँ पारो का अंतिम संस्कार हुआ था। लोग कहने लगे थे-फिरंगी पारो के पीछे दिमागी संतुलन खो चुका था। वह निरुद्देश्य जंगलों,पहाड़ों में घूमा करता था। पिहू और उसके बच्चे से मिलता,उनका सारा खर्च उठाता और उनके लिए आम-जामुन वाला बाग खरीद दिया था। अपनी जिंदगी के न जाने कितने वर्ष राबर्ट ने अजंता की पेंटिग्स,केव्ज की नाप,उनका नक्शा,उनकी देखरेख में लगा दिए। एनी उसकी सारी पेंटिग्स को लेकर प्रदर्शनी में गई थी। ब्रिटेन में अजंता केव्ज की पेंटिंग्स की खूब चर्चा हुई और भारत के राक कट मंदिरों में एक मंदिर और शामिल हो गया। प्रदर्शनी में आग लग जाने के कारण चार को छोड़ सभी पेंटिंग्स जलकर नष्ट हो गई। उसे मद्रास बुला लिया गया। वहाँ उसे एनी दिखाई दी। जयकिशन को औरंगाबाद में गाँव के रमन चाचा मिले और बुआ सहित सारी कहानी सुना दी, वह रो पड़ा।
राबर्ट ने एनी से कहा-”तुम चाहती थी ना एनी कि हमारी शादी हो?” उसने कहा,”हम लोग अजंता जाएंगे। तुम मेरे साथ रहोगी तो मैं फिर से पेंटिंग बना सकूँगा।” उसने कहा,”हाँ राबर्ट! तुम जरुर बनाओगे पेंटिंग। तुम्हारे अंदर बार-बार उठकर खड़े हो जाने का हुनर है। कितने भी दुख आए लेकिन तुम हारोगे नहीं। कुछ दिनों बाद वे बारादरी आ गए। एनी गर्भवती हुई और उसने एक पुत्र को जन्म दिया। दुर्भाग्य देखिए,नौ महीनों बाद उसकी भी मृत्यु हो गई। राबर्ट पुनः अजंता जाने लगा। कभी-कभी एनी भी साथ जाती और पेंटिंग बनाने में मदद करती। उसने खूब फूल लगाए और पूरी बारादरी फूलों से लद गई। एनी ने एक लड़की को जन्म दिया और दो वर्षों के बाद दूसरी लड़की हुई। तीसरी बार जब वह गर्भवती हुई तो उसने अपनी दोनों बेटियों को लंदन भेज दिया।
राबर्ट ने अजंता गुफा के बहुत सारे फोटोग्राफ्स लिए और सिलसिलेवार हस्ताक्षर करके सजाता जा रहा था। उसने बुलढाणा के जंगल,पहाड़,किले आदि के फोटो लिए। एनी बहुत प्रभावित थी भारत के इन मंदिरों को देखकर। उसने खजुराहो के मंदिरों को भी देखा था। राबर्ट उच्च रक्तचाप का शिकार हो गया था,उसकी सांसें उखड़ती रहती थीं। उसे तेज बुखार था। टेरेन्स दो-चार दिनों में आने वाला था। चिकित्सक ना-उम्मीद हो रहा था। जयकिशन भी निराश हो चला था। प्रमिला वर्मा ने तत्कालीन परिस्थितियों और आपसी संबंधों को लेकर विस्तृत वर्णन किया है। राबर्ट असहाय हो गया था। टेरेन्स उसके पूरे जीवन को याद कर रहा था जहाज में बैठे-बैठे।
डाक्टर की सलाह पर भुसावल ले जाने की तैयारी शुरु हो गई। एनी ने टेरेन्स से कहा-”जब तक शरीर में सांसें बाकी रहती हैं तब तक प्रयत्न और विश्वास नहीं छोड़ना चाहिए।” राबर्ट सोचता है,क्या सचमुच पारो नहीं है,फिर यह दो बाँहें उसके गले में आकर कैसे लिपट जाती हैं। वह पारो की स्मृतियों में खोया रहता है,एक-एक दृश्य उभरता है और वह महसूस करता है कि आकाश से उतरती परी की तरह पारो उसके सीने से आ लगती है। उसे लीसा याद आई।
भुसावल की कष्टप्रद यात्रा शुरु हो गई। बीच रास्ते में मीना मिली,उसने कहा-‘’मैं सर से मद्रास तट पर मिली हूँ। वे एक लड़की का इंतजार करते थे। फिर उसके चित्र बनाते थे।‘’ एनी शरमा गई,कहा, ”मैं वही लड़की हू।” मीना और राबर्ट की आत्मीय बातचीत हुई। अस्पताल में इलाज शुरु हुआ। राबर्ट ने कहा,” सुनो टेरेन्स,मैंने असंख्य गुनाह किए हैं। मैं लीसा का गुनहगार हूँ—मैं उसकी संतान का गुनहगार हूँ—मैं फ्लावरड्यू का गुनहगार हूँ।‘’ उसने आँखें मूँद ली। एनी उठी,उसने उनके माथे को सहलाया,बोली,”तुम किसी के गुनहगार नहीं हो। जो होता गया तुम स्वीकार करते गए। तुम नेकदिल इंसान हो, प्यार से भरे या ऐसे कहो,सबको प्यार देते हुए—प्यार से ओतप्रोत—।‘’ वह बड़बड़ा रहा है,लीजा को याद कर रहा है। बहुत सी बातें कर रहा है। अचानक हवा का झोंका आया और दरवाजा खुल गया। उसने देखा,पारो झाँक रही है।
एनी रो रही थी। उसने कहा,”टेरेन्स! राबर्ट ने मुझे जिंदगी जीना सिखाया। कभी-कभी सोचती हूँ, फ्लावरड्यू क्यू बार-बार भागती रही राबर्ट के पास से—जो अनंत प्रेम से भरा है। उसने कहा था,”मेरे हृदय के कई कोने हैं,सब एक-दूसरे से अछूते,प्रेम से भरे। जब तुमसे प्रेम करता हूँ तो तुम ही मेरे हृदय में होती हो।” राबर्ट ने कहा-”टेरेन्स! मेरी जिंदगी एक ठहरी हुई झील है। बहुत कुछ पाया मैंने जिंदगी से—लेकिन खोया भी बहुत कुछ। फ्लावर से कह देना टेरेन्स,मैं उसके बिना भी मर सकता हूँ।” प्रमिला वर्मा कुशल चित्रकार की तरह इस अंत वाले दृश्य को चित्रित कर रही हैं। यहाँ सब कुछ है-भावनाएं,प्रेम,करुणा,अनंत पीड़ा और शून्य की ओर बढ़ते कदम। एनी का हाथ छूटा राबर्ट से और एक ओर लटक गया। यात्रा का अंत था। भुसावल के यूरोपीय ईसाई कैथोलिक कब्रगाह में राबर्ट का अंतिम संस्कार किया गया।
इस तरह यह एक सशक्त उपन्यास रचा गया है जिसमें मानव का प्रेम है,कमजोरियाँ हैं,दो संस्कृतियों-सभ्यताओं का अंतर है,सारे पात्र अपना चरित्र निभाते दिखाई दे रहे हैं और भाषा-शैली प्रभावित करने वाली है। यह रचना बहुत से प्रश्न खड़ी करती है और उस काल-खण्ड को मूर्त करती है। यह किसी ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह है और सर्वत्र मोहक-मनोरम भूदृश्यावली के वर्णनों से भरी हुई है।

विजय कुमार तिवारी
(कवि,लेखक,कहानीकार,उपन्यासकार,समीक्षक)
टाटा अरियाना हाऊसिंग,टावर-4 फ्लैट-1002
पोस्ट-महालक्ष्मी विहार-751029
भुवनेश्वर,उडीसा,भारत
मो०-9102939190

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