Tuesday, July 16, 2024
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विजय कुमार तिवारी की कलम से – श्रीप्रकाश मिश्र जी का चिन्तनात्मक निबंध संग्रह ‘यूरोप के आधुनिक कवि’

कृति : यूरोप के आधुनिक कवि लेखक : श्रीप्रकाश मिश्र मूल्य : रु 450/-
प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज
समीक्षक
विजय कुमार तिवारी
श्रीप्रकाश मिश्र जी की साहित्य साधना का क्षेत्र विस्तार पाते हुए यूरोपीय देशों तक पहुँचा है। भारतीय साहित्य और साहित्यकारों में पाश्चात्य देशों के कवियों के सृजन की ओर झुकाव रहा है। हिन्दी और हिन्दी के साहित्यकार भी इससे अछूते नहीं रहे हैं। उन्होंने इस दिशा में गहराई के साथ चिन्तन-मनन किया और भारतीय पाठक समूह को अपने निष्कर्षों से जोड़ा है। यूरोप के साठ से अधिक कवियों को लेकर किया गया उनका  शोधपूर्ण व्यापक चिन्तन “यूरोप के आधुनिक कवि” ग्रंथ के रूप में हमारे सामने है, निश्चित ही इससे यूरोपीय काव्य संस्कार को समझने में मदद मिलेगी।
‘अपनी बात’ में उन्होंने विस्तार से इस पुस्तक की विषयवस्तु की चर्चा की है जिसमें उनका  चिन्तन, विदेशी कविताओं का हिन्दी में अनुवाद,यूरोपीय कविता व कवियों का व्यक्तित्व, उनकी काव्य चेतना तथा प्रतिभा आदि का अध्ययन और मूल्यांकन दिखाई दे रहा है। अधिकांश चिन्तन व लेखन पत्र शैली में है। यह सम्पूर्ण शोध चिन्तन आलोचक श्री रघुवंशमणि और श्रीप्रकाश मिश्र के बीच पत्राचार व संवाद पर आधारित है। उनके द्वारा यह कोई अभिनव प्रयोग है और सार्थक पहल भी। वे लिखते है,” हमारे समय में कविता के दो लक्ष्य उभरे हैं-सौन्दर्य और मानवता।” सौन्दर्य,कला का कल्याणकारी झुकाव मानवता से जुड़ता है। उन्होंने इन बिन्दुओं पर गहन विवेचना की है,कोई सहमत हो या न हो,उनके निष्कर्षों पर विचार किया ही जाना चाहिए।
यूरोपीय कविता की अनेक रीतियाँ हैं। आधुनिक कविता,शुद्ध कविता या अति यथार्थ की कविता के साथ-साथ कुछ कवियों ने विचार पर बल दिया जिससे भाव पक्ष बिल्कुल दबा रह गया है। कुछ ने अकविता की भी चर्चा की और यूरोपीय काव्य विधा की खूब चिरफाड़ हुई है। कविता इसलिए भी शिकार होती रही कि वह सत्ता के साथ है या विरोध में। उसकी मुख्य धारा को लेकर भी खूब चिन्तन होता रहा है। कविता में नव-निर्माण, तानाशाही का विरोध और मार्क्सवाद से अप्रभावित जैसी प्रवृत्तियाँ देखी जाने लगी। मिश्र जी मानते हैं,यूरोप की तमाम कविताओं का उद्देश्य था-सत्ता में साझेदारी। कविता को स्वायत माना गया और इसके पक्ष व विरोध में बहुत से तर्क दिए गये। उन्होंने बहुत से कवियों को पढ़ा है और उनके विचारों को समझाने की यहाँ कोशिश करते हैं।
‘आधुनिकतावाद’ पर अपने लेख में उन्होंने विशद चिन्तन किया है और उसके ऐतिहासिक सन्दर्भों को रेखांकित करते हुए आधुनिक स्वरुप को समझने-समझाने का सारगर्भित प्रयास किया है। उन्होंने संकेत किया है कि इसका धीरे-धीरे विकास हुआ है,इसकी अनेक धाराएं और समूह हैं जिसे ‘आधुनिकतावाद’ के रुप में स्वीकार किया गया है। इसमें आधुनिक मनुष्य का चिन्तन है,आधुनिक प्रवृत्तियों की बातें हैं,आज का संघर्ष है,आज का सौन्दर्य है,आज की चुनौतियाँ हैं और उन सबसे जूझने के लिए आधुनिक साधन-संसाधन हैं। उन्होंने विस्तार से आधुनिकतावाद के सारे सन्दर्भों को समझाया है। उनकी शैली और भाषा सरल है,काव्य साहित्य के अध्येताओं को सहज ही सुगम्य हो सकता है। आधुनिकतावाद के क्रम में मिश्र जी ने अस्तित्ववाद व मार्क्सवाद पर विशेष ध्यान दिया है और सामाजिक सम्बन्ध,सरोकार को अपने चिन्तन में रखा है। साथ ही उन्होंने आधुनिकतावाद के पहले के आइडियलिज़्म, क्लासिकलिज़्म  और रोमांटिसिज्म की प्रवृत्तियों को भी विस्तार से लिखा है। उनका मत है, प्राकृतवाद और समकालीनता के तत्वों पर चिन्तन आधुनिकतावाद को समझने के लिए महत्वपूर्ण और जरूरी है।
यूरोप के आधुनिक कवियों को समझने के लिए उन्होंने फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, यूनान, रूस  और कुछ अन्य कवियों को अपने चिन्तन का विषय बनाया है। इस चयन का कोई विशेष आधार नहीं है बल्कि ये सभी कवि चर्चित और महत्वपूर्ण है। इस तरह उन्होंने कुल 61 कवियों पर शोधपरक विचार प्रस्तुत किया है।
फ्रांस के कवि बादलेयर पर चिन्तन करते हुए आलोचक श्री रघुवंशमणि और श्रीप्रकाश मिश्र के बीच पत्राचार में रचना के पीछे के सच को समझने की कोशिश हुई है– क्या इसका मतलब कवि के जीवन से है? क्या आज का कवि अपने जीवन से कुछ लिख रहा है जैसे रोमांटिक धारा के कवि लिखा करते थे? दूसरा अर्थ यह हो सकता है कि रचना जिस बिंब, विचार,टकराव,अवसाद या जोश,घटना आदि से उद्भूत हुई है,उसका परीक्षण किया जाय। तीसरे कवि के दर्शन से मतलब हो सकता है। चौथा अर्थ कविता के निहितार्थ का हो सकता है। ‘बादलेयर’ अकेला,विद्रोही,वेदनाभोगी,आत्महंता की तरह दिखाई देता है। कारण कि वह सुंदर देहयष्टि की ओर सम्मोहित होता है। उसे चलते जाना ज्यादे अच्छा लगता है,बजाय कहीं पहुँचने के। वह अपनी कविताओं में कहीं निर्णय नहीं देता। निश्चय ही बादलेयर अपने युग के सत्य की चर्चा करना चाहता है। वह नशा को जरुरी मानता है ताकि नकली स्वर्गों का निर्माण कर सके। वह भग्न व्यक्तित्व का कवि और सौन्दर्य की जगह मृत्यु उसकी कविता की तकदीर बन जाती है। उसका सत्य यथार्थ के निकट है। ‘मलार्मे’ अपने दिमाग को आत्मनिरीक्षण द्वारा खाली करता है। निज की भीतरी दुनिया के लिए शुद्ध कविता खोजना चाहता है। इसके लिए पहले वह भौतिक जगत की वस्तुओं को नकारता है फिर भीतर की वस्तुओं को। भाषा का आवरण धारण करता है। उनके इन निबंधों को पढ़ते हुए लगता है उन्होंने फ्रांस के रचनाकारों को हर दृष्टि से देखा-परखा है। वे लिखते हैं-मलार्मे के लिए यथार्थ, देखने के ढंग में है जो यथार्थ से ज्यादे महत्वपूर्ण है।
वादलेयर की बात-“हमारा हृदय ही अपना स्वयं का आइना है” मलार्मे और वलेरी के लिए आप्तवाक्य है। वलेरी की निजता इस बात में है कि वह कविता को इस कौशल के साथ लिखना चाहता है, जिसमें हर वाक्य और हर शब्द,हर विचार और हर ध्वनि इस तरह से आये कि वह आवश्यक और उसकी अनिवार्य परिणति की तरह दिखे। मिश्र जी वलेरी की सम्पूर्ण रचना प्रक्रिया विस्तार से समझाते हैं और उसके आत्म-परीक्षण को रेखांकित करते हैं। साथ ही शुद्ध कविता के विकास को समझने और उसका आनन्द उठाने के लिए फ्रांस के वरलेन, रिम्बा जैसे कवियों को पढ़ते हैं। रिम्बा दर्द की कविताएं लिखता है। भारत मे अज्ञेय जी ऐसे कवि हैं जिनके माध्यम से हम यूरोपीय कवियों से परिचित होते हैं। रिम्बा की तरह त्रिस्ताँ कारबियर भी दर्द का कवि है जिसका सम्पूर्ण जीवन ही 30 वर्षों का रहा। वह कहता है,कला को मैं नहीं जानता और कला मुझे नहीं जानती। मृत्यु बोध उसकी रचनाओं में है। इस तरह श्री प्रकाश मिश्र जी फ्रांस के अन्य महत्वपूर्ण कवियों-गुलाम अपोलोनेयर, पाॅ एलुआर, य्ये बानफ्वाय, एडगर एलेन पो के काव्य संसार का बेहतरीन अध्ययन करते हैं। साथ-साथ वे भारतीय कवियों के काव्य लेखन को भी समझते चलते हैं। उन्होंने अलग से ‘फ्रांस का समाज’ शीर्षक से जरुरी वैचारिक लेख शामिल किया है जिसमें नये आदमी की चर्चा है।
‘यूरोप के आधुनिक कवि’ पुस्तक में फ्रांस के बाद जर्मनी के कवियों पर उन्होंने व्यापक गहन विचार किया है। उन्होंने लिखा है,जर्मनी की ऊर्जा चिंतन में लगी थी जिसका समुच्चय हेगेल के दर्शन में हुआ जिसने पूरी दुनिया को अपनी तरह से प्रभावित किया। हेगेल व्यक्ति के अधिकार,कर्तव्य और जीवन-बोध को नई दिशा देना चाहते थे। प्रतिद्वन्दिता के चलते ब्रिटेन जिस भारतीय ज्ञान को नीचा दिखाना चाहता था,जर्मनी ने उसे उच्च कोटि का बताया, अपने मिथ,चिंतन व साहित्य में समाहित किया और गेटे जैसे कवि ने कालिदास को श्रेष्ठ माना। जर्मनी का चिंतन और तद्जन्य कविता या तो हेगेल की स्थापनाओं के समर्थन में उपजी या उसके विरोध में। हेगेल पर कवि फ्रेडरिक वान हर्डेनबर्ग नोवालिस अपनी प्रतिक्रिया करते हैं। वह शब्द की जादूगरी रचते थे। उनकी कविताएं जीवन के स्रोतों का पुनर्निर्माण एक उच्च और रहस्यमयी सान्त्वना देने वाली शक्ति के रुप में प्रतिष्ठित करती है। हेगेल के चिंतन पर जबरदस्त प्रतिक्रिया कार्ल मार्क्स की है परन्तु मार्क्सवाद के प्रभाव में कोई कविता नहीं लिखता जर्मनी में,हाँ, उपन्यास लिखे जाते हैं। पहला मार्क्सवादी कवि ब्रेख्त हैं। मिश्र जी स्टेफेन जार्ज का उल्लेख करते हुए लुकाच की समीक्षा उद्धृत करते हैं-‘जार्ज की कविताएं पूर्णतः भीतर से निर्मित हैं,पूर्णतः गीतिक हैं,बिना किसी घटना या जीवट के।’ जर्मनी के अन्य महत्वपूर्ण कवियों-क्रिस्चियन मार्जेन्स्टर्न, ह्यूगो वान हाफमैंस्थाल, रिल्के, गाटफ्रेड बेन, जार्ज  ट्रक्ल, पाल सेलान, जोहानस ब्रोबोस्की, बर्तोल्त ब्रेख्त आदि के काव्य लेखन पर श्रीप्रकाश मिश्र जी ने विस्तार से विचार किया है।
बर्तोल्त ब्रेख्त को भारत के लोग कुछ पहले से जानते हैं। उनका जन्म अभिजात्य परिवार में हुआ था। प्रथम विश्वयुद्ध के समय उन्होंने युद्ध का विरोध किया और जीवन भर अनेक महिलाओं के साथ आशनाई करते रहे। वे चाहते थे कि उनकी पहचान शोषक और शोषित के द्वन्द को बिल्कुल यथार्थ के धरातल पर उतारने वाले नाटककार के रुप में हो। उनकी मृत्यु के बाद लोगों ने अनुभव किया कि उनकी अभिव्यक्ति कविताओं में बेहतर हुई है। वे चाहते  थे कि महत्व उनकी युक्ति को दिया जाय,उनके व्यक्तित्व को नहीं। उन्होंने अनेक देशों में प्रवास किया और अंत में बर्लिन में उनकी मृत्यु हुई। मिश्र जी ने बेख्त पर आधारित अपने लेख को 7 हिस्सों में बाँटकर तनिक अधिक विस्तार दिया है और इसे पढ़ते हुए बेख्त को समझना थोड़ा सहज हुआ है। वे लिखते हैं कि उसके कवि व्यक्तित्व को समझने के लिए पक्का द्वन्द्ववादी बनना पड़ेगा।
इतालवी भाषा में आधुनिकताबोध से लैस कविताएं बहुत बाद में लिखी जानी शुरु हुईं। इसका महत्वपूर्ण कवि अम्बर्तो साबा है जो विभिन्न कवियों और काव्य धाराओं के बीच कड़ी का काम करता है। उसने अपने लेख में स्पष्ट किया कि अच्छी कविता के लिए मौलिक होने से कहीं ज्यादे जरुरी है कवि का असली और ईमानदार होना और हर तरह के प्रलोभनों से बचना। इसके लिए एक लम्बे अनुशासन की जरुरत होती है,जिससे कवि की वाणी विश्वसनीय बनती है। वह जीवन की वास्तविकताओं को पूरी सिद्दत से उकेरता था जिसके परिणामस्वरूप वाह्य घटनाओं में वे चाहे जितना विपन्न दिखें,भीतरी अनुरणन और संवेदना में उतनी ही प्रचुर होती थीं। उसने युद्ध के दौरान सैनिक की भूमिका निभाई जिसका प्रभाव उसकी कविताओं में दिखता है। उसने मां पर,पत्नी पर श्रेष्ठ कविताएं लिखीं। मिश्र जी ने जिस तरह से इटली के कवि साबो को समझा है,वह हर तरह से सराहनीय और अनुकरणीय है। बीच-बीच में वे भारतीय बड़े कवियों से तुलना करते चलते हैं,यह उनके अनुभव को अधिक विश्वसनीय बनाता है। साबा की कविताएं रुमानियत की हैं,अधिक दर्द की और सही दर्द की कविताएं है। मिश्र जी लिखते हैं-‘जाहिर है कि मुक्ति वह मृत्यु में देखता है। अज्ञेय ऐसा नहीं करते।” कहा जाता है कि सिर्फ दो ही इतालवी कवि-गुसेप अंगारेत्ती और एउजेनियो मोंतेल का प्रभाव यूरोपीय कविता पर पड़ा। एक तीसरे कवि सल्वातोर कासीमोदो को नोबेल पुरस्कार मिल जाने के कारण चर्चा होती है। अंगारेत्ती प्रतीकवादी कवि था,उसे लगता था-कविता समझने की नहीं,अनुभव करने की चीज है। एउजेनियो मोंतेल जीवन में पूछताछ करना चाहता है,लिखता है-मैं दुस्साहसपूर्वक असंभव के दरवाजे खटखटाता रहा हूँ कि जैसे मुझे उत्तर की प्रतीक्षा हो। उसने अपना भिन्न मार्ग अपनाया,वह कहा करता था-प्रेरणा हमेशा असंगति से मिलती है। सल्वातोर कासीमोदो ने पुनर्निर्माण के विचार को प्रमुखता से रेखांकित किया। आदमी का पुनर्निर्माण साहित्य के प्रेमियों को अच्छा लगा और उसे नोबेल पुरस्कार मिल गया। हालांकि इस पर विवाद भी उठा। मिश्र जी इस क्रम में लुसियो पिक्कोलो की चर्चा करते हैं। उसकी कविताओं के बारे में ग्लाउको काम्बो कहता है कि वे एक ऐसी दुनिया से अवतरित होती हैं जहाँ सब कुछ बहुत पहले ही घटित हो चुका है,जहाँ इतिहास लोककथा,जादू और छाया में तब्दील हो चुका है। बावजूद इसके वह आधुनिक कविताएं लिख रहा था। अपने लेखों में वे हर कवि को गहराई से पढ़ते हैं और उनकी आधुनिकता से जुड़ी कविताओं पर गहन चिन्तन करते हैं।
श्रीप्रकाश मिश्र जी ‘स्पेन का समाज’ लेख में विस्तृत विवेचना करते हुए बताते हैं-स्पेन की कविता दो जगहों से विकसित हुई,एक तो स्वयं स्पेन में,दूसरी स्पेन से बाहर उसके दक्षिण अमेरिकी उपनिवेशों में और वहाँ भी आधुनिकताबोध की कविता देर से अवतरित हुई। वहाँ के बौद्धिक धरातल पर दो बाहरी दार्शनिकों का प्रभाव पड़ा-स्पिनोजा और नीत्से। भौतिकवादी स्पिनोजा ने स्पष्ट किया कि ज्ञान का काम प्रकृति पर विजय और आदमी पर नियंत्रण प्राप्त करना है। उसके मत की विशद विवेचना करते हुए मिश्र जी लिखते हैं-उसका सकारात्मक योगदान यह है कि उसने बौद्धिक ज्ञान को तर्क पर आधारित माना। नीत्से ने जीवन को ‘शक्ति की इच्छा’ से संचालित बताया। उसने ईश्वर को भी मृत घोषित कर दिया। उसके लिए सभी व्यक्ति बराबर हैं। यूरोप के आधुनिक कवियों में स्पेन के अनेक कवि शामिल हैं-अंतानियो मकाडो, जुआन रमोन जिमेनेज, सिजर वलेजो, फेदरिको गार्सिया लोर्का, जार्ज गुलेन, जार्ज लुई बर्खेस, पाब्लो नेरुदा, आक्टियो पाँज आदि। हमारा भारतीय साहित्यिक समाज कुछ कवियों को जानता-पहचानता है। उन्होंने लिखा है-‘अस्तित्ववादी दार्शनिकों की एक पीढ़ी का कथन रहा है-आदमी का मृत्यु में दृढ़ विश्वास ही स्पष्टतः मानवीय बात है। यह वचन आधुनिक कवि अंतानियो मकाडो का है। पत्नी की मृत्यु ने उसे ऐसा सोचने का अवसर दिया। जुआन रमोन जिमेनेज को 1956 में नोबेल पुरस्कार मिला था। उसे स्पेन में खूब सम्मान मिला। उसकी कविता में रहस्यवाद उभरने लगा और उसने अपने पहले के सृजन की साफ-सफाई शुरु कर दी। सिजर वलेजो पेरु का स्पेनी कवि है जिसकी कविता एक साथ ही भाषा के साथ प्रयोग,व्यक्तिगत कुटेवों की अभिव्यक्ति और एक भौतिक विश्वदृष्टि की स्थापना करना चाहती है। वह एक साथ ही प्रयोगवादी और मार्क्सवादी दोनों है। शुरु में वलेजो की कविता को आलोचकों ने खारिज कर दिया था। विस्तार से उसके अनेक पहलुओं पर उन्होंने लिखा है जो रोचक भी है और जरुरी भी। फेदेरिको गार्सिया लोर्का  को राष्ट्रवादियों ने ग्रेनेडा में स्पेनी गृह युद्ध के दौरान मार डाला। उसकी हत्या राजनीतिक थी। वह एक साथ लोक कवि और कवियों का कवि है परन्तु उसे बौद्धिक नहीं माना गया। वह चित्रकार, नाटककार व संगीतकार भी था। वह कहता है कि रचने की प्रेरणा सिर्फ कच्चा माल है(जिसे वह बिम्ब कहता है) प्रदान करती है। उसे रचना में ढालने लिए प्रयत्नपूर्वक और व्यवस्थित होकर काम करने की जरुरत पड़ती है। इसकी क्षमता रचनाकार में होनी चाहिए क्योंकि वह किसी करिश्मा से प्राप्त नहीं होती। उसकी विशेषताएं हैं-वह संवेगों के विविध रुपों को प्रस्तुत करता है,व्यक्तिगत दुख के तान को किसी दूरस्थ आवाज में तब्दील कर देता है और उसका रूपांतरण स्वप्न की तरह है। उसकी मृत्यु के बाद छपी कविताओं में प्रेम की हूक भरी पड़ी है, मूड उदासी का और स्थायी भाव वियोग का है। वह तलवार की तरह सीधे सीने में उतर जाने वाली कविता लिखना चाहता था और न लिख पाने का उसे दुख था।
स्पेन का कवि जार्ज गुलेन जीवन और कला में वरेण्य कौन की तलाश करता है। वह कवि को खुदा नहीं मानता और उस कविता की वकालत करता है जो मानवीय होती है। कविता को मानवीय होने के लिए जरुरी है कि उसके शब्द स्पष्ट ध्वनियों के हों,जो मन और हृदय दोनों को एक साथ एक स्तर पर प्रभावित करे। गुलेन सही भाषा और उससे निर्मित भव्यता पर बल देता है। मिश्र जी ने यूरोपीय साहित्य बहुत पढ़ा है और उनके लेखन में वे सारी जानकारियाँ उभरती हैं। वे वेल्डन की पुस्तक ‘वोकेबुलरी आॅफ पालिटिक्स’ को उद्धृत करते हैं-शब्द का अर्थ हम अपनी क्षमता,परिवेश,प्रचलन,आकांक्षा,तथ्य की अभिव्यक्ति या आदर्श के निरुपण के अनुसार ग्रहण करते हैं। इसलिए अर्थ ग्रहण सबका भिन्न होता है। जार्ज लुई बर्खेस साहित्यिक शब्दों और विधाओं को लेकर ऐसी ही धारणा रखता है। वह अपनी रचना को जीवन और मृत्यु के बीच संवाद की तरह लेता है। बर्खेस पर अनेक दार्शनिक कवियों का प्रभाव दिखता है और अंत आते-आते उसमें आध्यात्मिकता हावी होने लगती है। उसकी ये पंक्तियाँ अद्भुत संकेत देती हैं-मैं,जो इतने मनुष्य बना रहा हूँ/कभी नहीं रहा हूँ/एक मनुष्य/जिसके आगोश में मटिल्डे अर्बख बेसुध हुई थी।
‘पाब्लो नेरुदा’ पर विस्तार से उन्होंने लिखा है। नेरुदा को साहित्य का नोबेल पुरस्कार 1971 में मिला और अपने जीवन काल में ही प्रसिद्धि मिल चुकी थी। वे कहा करते थे, किसी कविता का महत्व इस बात में है कि अगर वह कविता न होती तो कविता न लिखनेवालों (यानी पाठकों) पर क्या अंतर पड़ता? उनका क्या खो गया रहता? उनमें क्या कमी बनी रहती? जो अब कविता-विशेष के जानने से पूरी हो गई है। मार्क्सवादी बनने के बाद वे कहते थे,कविता उसी तरह से होती है जिस तरह से रोटी,रोटी जैसी वास्तविक और जरूरी। अपनी रुमानी कामापेक्षी कविताओं में भी नेरुदा दर्द की पराकाष्ठा पर पहुँच कर उससे निवृत्ति के लिए स्वप्न देखने के बजाए एक कामकाजी आदमी बना रहना चाहते हैं। ऑक्टेवियो पाँज स्पेनिश-अमेरिकी कवि हैं। उनका गद्य भी अद्भुत है। अपनी पुस्तकों में वह तर्क तो साहस के साथ करता है लेकिन इन्हें किन्हीं स्वाभाविक परिणतियों की ओर ले जाने की जगह विवरणों,आकर्षक तुलनाओं,अनुरुपताओं आदि में पूरे ढांचे को ही तिरोहित कर देता है। मिश्र जी नामवर सिंह जी को याद करते हैं और पाँज के बारे में लिखते हैं कि वह महत्वपूर्ण बातों को अपना बना कर और लिखकर प्रस्तुत करता है। उन्होंने पाँज के सम्पूर्ण लेखन पर चिन्तन करते हुए महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी है।
‘यूनान का समाज’ लेख में उन्होंने लिखा है-वहाँ के साहित्य और कला ने यूरोप को बहुत ही प्रभावित कर रखा है। राजनीतिक उथल-पुथल और युद्धों के चलते अव्यवस्था और पिछड़ेपन का वह शिकार हुआ। आगे चलकर यूनान ने यूरोपीय और ईसाई देश के रुप में अपनी स्पष्ट पहचान बना ली,प्रजातांत्रिक परम्पराओं की स्थापना हुई और आज भी वहाँ प्रजातंत्र का शासन चल रहा है। श्रीप्रकाश मिश्र जी ने वहाँ के कांस्तेन्ताइन कावाफी,जार्ज सेफेरिस और यानिस रित्सोस जैसे महत्वपूर्ण कवियों पर आधुनिकताबोध को ध्यान में रखते हुए विस्तार से अपने लेखों में चर्चा की है। कावाफी अति आनन्दवादी और पुरुष सौन्दर्य का अनुरागी था। वह कहा करता था-‘एक सच्चे कलाकार को अच्छे या बुरे के बीच चुनाव नहीं करना पड़ता, जैसा कि एक मिथक का नायक करता है,क्योंकि उसके उद्देश्य को दोनों ही तुष्ट करते हैं,वह दोनों से एक-सा प्यार करता है।’ जार्ज सेफरिस कविता के बारे में स्पष्ट विचार रखता है कि बिना वर्णनात्मक हुए मिथ को कथा वस्तु और ऐतिहासिक परिदृश्य के बीच की कोई वस्तु बननी चाहिए,जिसमें कवि का निज उसी तरह से तिरोहित हो जाना चाहिए जैसे उपन्यास के पात्र। वह कहता है कि काव्य यात्रा पर निकलने से पहले धरती और चट्टान की मजबूती को अच्छी तरह से परख लेना चाहिए। वह जन के विस्थापन की चिंता की कविताएं लिखता है। यानिस रित्सोस को नेरुदा से बढ़कर जनवादी कवि मानते हैं लोग। वह जीवन भर प्रमाणित करता रहा कि लिखना जिंदा बचे रहने का साधन है। उसका एक सच यह है कि उसने अधिकांश रचनाएं संतरियों के पहरे में की है। राजनीतिक फजीहत,बीमारी और पहरेदारों द्वारा लगाई गयी बंदिश के कारण ही वह लगातार लिखने की प्रेरणा पाता रहा। मिश्र जी लिखते हैं-‘’लेखन के ढेर में उसके निजी बिम्बों,प्रतीकों और अभिव्यक्ति के रंग दब से गये हैं,फिर भी वे जहाँ दिखते हैं, वहाँ बस रित्सोस के अपने ढंग के ही लगते हैं।‘’
श्रीप्रकाश मिश्र जी ”रुस का समाज” लेख में ध्यान देने वाली बात लिखते हैं-‘रुस का नाम लेते ही मार्क्सवाद का चित्र सामने आता है और लगता है कि सारी कविता मार्क्सवादी होगी, किन्तु ऐसा कुछ नहीं है और जो कविता मार्क्सवादी है वह भी मौजूदा मार्क्सवाद के समर्थन में कम,उसके नेतृत्व के विरोध में अधिक है।’ इस लेख में उन्होंने वहाँ की साहित्यिक-सामाजिक स्थिति पर गम्भीर चिन्तन किया है और एलेक्सांद्र ब्लाक,ब्लादीमीर मायकोवस्की, अन्ना आख्मातोवा,बोरिस पास्तरनाक,आसिफ मांडेल्स्टाम, मारिना स्वेताइवा,टरस शेवचेंको, एडवर्ड मेजेलाइटिस,जोसफ ब्राडस्की जैसे महत्वपूर्ण कवियों के साहित्य पर विवेचना की है। उनका कहना है कि रुस में आधुनिकताबोध की कविता बहुत देर से आई और इसका महत्वपूर्ण कवि एलेक्सांद्र ब्लाक है। वह कवि की आत्मा को एक ऐसा रंगभूमि मानता था जिस पर पीड़ित नौकर,बलि के बकरे और पीड़ा से मुक्ति देने वाले प्रातिनिधान क्राइस्ट में रुपांतरित होकर अपनी-अपनी भूमिका करते हैं। वह सौन्दर्यवादी नहीं था। प्रतीकवाद को सही मानता था क्योंकि इसके द्वारा वास्तविक जगत में वास्तविक और क्रांतिकारी परिवर्तन लाने की कोशिश की है। ब्लादीमीर मायकोवस्की रुस का घोषित मार्क्सवादी कवि है। उसने आत्महत्या कर ली क्योंकि उसकी कविता को न तो मार्क्सवादी नेतृत्व पसंद करता था और न रुसी जनमानस। उसे भविष्यवादी कवि कहा गया। उसकी प्रेम की कविताएं दर्द की बात करती हैं। मिश्र जी लिखते हैं-‘’मायकोवस्की सशक्त अखबारी कवि तो बना लेकिन देर तक अनुनादित करने वाला संस्कृति व मूल्यबोध का संवाहक न बन सका।‘’ अन्ना आख्मातोवा अपने युग की आवाज की कवयित्री हैं। कविता का औचित्य आपद्काल में ही बनता है जब कवि अपने समय की सामान्य वास्तविकता पर,यथार्थ पर अपनी बात निर्भीकता से कहे, सान्त्वना जताने के लिए कहे और ऐसे लोगों से कहे जो ना-उम्मीद हो चुके हैं,उनमें उम्मीद पैदा करने के लिए कहे। उसने पुश्किन की तरह दिल की बातें लिखी। उसके लेखन पर रोक लगाया गया। उसके बेटे को बिना कसूर पकड़ लिया गया जिसकी खोज में वह जीवन भर दर-दर भटकती रही। इसीलिए उसकी कविता जन-जन की आवाज बन गयी। बोरिस पास्तरनाक अपने उपन्यास ‘डा० झिवागो’ के लिए प्रसिद्ध है। उपन्यास में उसने कविताएं लिखी और लोगों ने पसंद किया। उसने लिखा-‘लिखना मुक्त होना है।’
मिश्र जी लिखते हैं-कलम तलवार से अधिक धारदार और शक्तिशाली होती है। ऐसी ही कलम रुसी कवि आसिफ मांडेल्स्टाम के पास है। उसकी हत्या रुसी प्रभुवर्ग ने इसलिए कर दी कि उसने स्तालिन के खिलाफ कविताएं लिखीं। क्रान्ति के बाद से ही उसे चुप कर देने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए गये। वह भी जीवट का कवि था,बाधाएं बढ़ने पर और भी उम्दा कविताएं लिखता था। उसकी कविता को ‘जीवित शब्दों’ के दस्तावेज के रुप में स्वीकार किया गया। उसने लिखा-न तो मैं चुप हूँगा,न ही मैं/अपने दर्द को सुन्न पड़ जाने दूँगा/मैं जरुर लिखूँगा वह जिसे लिख पाने की/तनिक भी आजादी मिली रहेगी। मारिना स्वेताइवा सशक्त रुसी कवयित्री है जिसके पति की हत्या कर दी गयी और बेरोजगारी व भूख से तंग आकर उसने स्वयं आत्महत्या कर ली। उसने बड़ी ही अद्भुत प्रेम कविताएं लिखी हैं,विदाई व विस्मृति पर भी अद्भुत लेखन की हैं। वह मृत्यु-शैया से आतंकित नहीं होती,मृत्यु को जीवन से,अनिद्रा से मुक्ति का संधान मानती है। टरस शेवचेंको उक्रेनी भाषा का कवि और चित्रकार है। वह आधुनिक कवि इसलिए है कि मार्क्सवादी था। मार्क्सवादी होना ही आधुनिकता का लक्षण माना जाता है। उक्रेनी लोगों के विचार,भावनाओं,दुर्गति और हताशा के विविध चित्र वाली कविताओं से उसे प्रसिद्धि मिली। वह मानव जीवन की शाश्वत समस्याओं से टकराता है। वैसे ही नेटिव रुसी कवि एडवर्ड मेजेलाइटिस अपना लेखन लिथुवानिया की बोली में करता है। वह नवीनतावादी कवि है। उसने चाँद-तारों के बजाए आदमी को देखना चाहा और लिखा-आदमी जो दिखता है,वह उससे कहीं अधिक गहरा है और यह गहराई उसके पराभौतिक पक्ष में है-स्पिरिट में। उसे आश्चर्य होता था,जो आदमी अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ रहा होता है,वही अपने लिए चारदीवारियाँ भी बनाया करता है। उसने मनुष्य को अजीब विरोधाभास में फँसा पाया। आदमी अच्छाई-बुराई के बीच झुलता रहता है। वह मनुष्य में ‘आत्मा का रंग’ खोज निकालता है जो उसकी भीतरी दुनिया का रंग है और बदलता रहता है। उसके लिए अच्छा जीवन का मतलब निष्क्रिय,सुखी जीवन नहीं बल्कि संघर्ष का–मूल्यबोध के स्तर पर जीवन है। एक और रुसी कवि है-जोसफ ब्राडस्की जो रुसी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में समान भाव-क्षमता के साथ लिखता था। उसे अमेरिका में रहकर विस्थापन का दर्द झेलना पड़ा। कविता का इस्तेमाल वह इस निर्वासन से मुक्ति पाने के लिए करता है। कविता करना वह बहादुरी का काम मानता है। श्रीप्रकाश मिश्र जी भारतीय हिन्दी के कवियों से बेहतरीन सामंजस्य बैठाते हैं और तुलनात्मक चिन्तन प्रस्तुत करते हैं। अपने अंतिम दिनों में उसने आत्मकथात्मक कविताएं लिखी और उसे नोबल पुरस्कार मिला। इनमें खामोशी स्वयं ही बोली बनकर उभरती है-आदमी में जो बच जाता है/वह हिस्सा होता है/एक बोला गया हिस्सा/एक बोल का हिस्सा।
इस तरह मिश्र जी ने आलोचक रघुवंशमणि जी के साथ गहन संवाद,पत्राचार करके यूरोपीय देशों के साहित्यिकों,कवियों में आधुनिकताबोध की तलाश की है। वे वहाँ की भाषा-बोली,शैली नहीं जानते,वहाँ की धरातलीय स्थितियाँ नहीं जानते,छोटे-छोटे देशों में बँटे मानव जीवन की विविधता नहीं जानते,साहित्य के मिथक नहीं जानते फिर भी उन्होंने  वहाँ के कवियों को पढ़ा, समझा और मख्खन हमारे लिए परोसा है। उन्होंने श्रम-साध्य शैली का सहारा लिया और सब कुछ समझने का प्रयास किया है। साहित्य के टूल्स की गहरी पकड़ ने उनसे ऐसा बड़ा काम करवा लिया है। अज्ञेय जी ने इस दिशा में पहल की और भारतीयों को विश्व साहित्य से परिचित करवाया। हमारे प्रवासी भारतीयों का भी निश्चय ही बड़ा योगदान रहा है। पुस्तक के अंत में ‘विविध’ खण्ड में उन्होंने यूरोपीय आधुनिकताबोध के कुछ अन्य महत्वपूर्ण कवियों पर अपना चिन्तनात्मक निबन्ध लिखा है, उनमें यहूदा आमीचाई,सीजर पावेस, मिरोस्लाव होलुब,अटिल्ला जोसफ,साँदोर पेताफी वास्को पोपा, मिस्साव शिम्बोर्सका, रोजेवीच,फर्डिनांडो पेसोवा,पाओ हाविक्को,टामस ट्रांस्टोमर जैसे चर्चित कवि हैं। उन्होंने हर एक कवि में आधुनिकताबोध की पड़ताल की है और विस्तार से हमारे सामने रखा है।

विजय कुमार तिवारी
कवि, लेखक, कहानीकार, उपन्यासकार, समीक्षक
टाटा अरियाना हाऊसिंग,टावर-4 फ्लैट-1002
पोस्ट-महालक्ष्मी विहार-751029
भुवनेश्वर,उडीसा,भारत
मो०-9102939190
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