प्रेम कविताएं रचते हुए मन एक अलग ही संवेदनात्मक अवस्था से गुजरता हैं जहां भावनाएं शब्दों का रुप धरकर प्रिय से पहली मुलाकात, महक,स्पर्श,संयोग, वियोग प्रतीक्षा की अनुभूतियों से आंदोलित होकर किसी डायरी के पन्ने पर उतर आती हैं I इस अवस्था में कविमन बाहरी जगत से अलग एक स्वप्निल दुनिया में विचरण करता हैं और अपने मनमीत के लिए जो लिखता हैं वो किसी प्रेमपत्र से कम नहीं होता हैI
शहरयार एक एडवोकेट होने के बाद प्रकाशक हैं लेकिन 2026 में उन्हें कवि रूप में देखना विस्मित करता हैं I उनकी कविताओं के पन्ने पलटते हुए जाना कि इनके मन का एक कोना कितना भावुक और रूमानी हैं I कविताओं के शास्त्रीय शिल्प पर माथापच्ची किए बिना उन्होंने अपने मन के कोरे नवेले भावों को जब अक्षरबद्ध किया तो एक नए नवेले प्रिय/पति की डायरी सामने आयी I उनके कच्चे प्रेम की यह खुशबू अभिभूत करती हैं और प्रेम कविताएं एक चलचित्र की तरह सामने चलने लगती हैं I
“एक पुराना मौसम लौटा” शीर्षक ही अपने भीतर एक गहरी अभिव्यक्ति लिए हुए हैं I यह केवल किसी मौसम के बदलने का संकेत मात्र नहीं है बल्कि लिखने वाले के अंतर्मन में उन भावों का पुनरागमन हैं जिन्हें समय की धूल, व्यस्तताओं ने धूमिल तो किया था लेकिन डायरी के पन्नों पर दर्ज यह भाव एक पुस्तक रूप में आने को आतुर हो उठे कि कवि को कहीं छिपी इन कविताओं को एक पुस्तक रूप में लाना ही पड़ा Iकाव्यसंग्रह में प्रेम को केवल रूमानी दृष्टि से ही नहीं बल्कि मानवीय संवेदना की दृष्टि से भी देखा गया हैं I स्मृतियों का चित्रण सजीव हैं कि हर पाठक जैसे अपने बीते समय की स्मृति में लौट जाता है I कविताओं में प्रकृति का प्रयोग भी बिंबों में किया हैं I मौसम, हवा,वर्षा, धूप सब भावों के दर्पण बनकर साथ चलते हैं I भाषा की दृष्टि से सहज सरल है Iहालांकि कुछ कविताओं में भावों की पुनरावृत्ति हुई हैं लेकिन समग्र रूप से यह संग्रह अपनी संवेदनात्मक तीव्रता से पाठकों को बांधे रखता हैं और पाठक एक मीठी सी मुस्कान के साथ एक के बाद एक कविता पढ़ता चला जाता हैं I
शहरयार का यह पहला कवितासंग्रह हैं इसके लिए उनको बहुत बहुत बधाईI यह उनके भावनात्मक पलो का पुनर्स्मरण है,जो जीवन को अर्थ देते हैI यह काव्यसंग्रह प्रेम ओर स्मृति के शाश्वत स्वर को सजीव रूप में प्रस्तुत करने में सफल हुआ हैं I यह काव्यसंग्रह शिवना प्रकाशन से प्रकाशित हैं और अमेजन पर उपलब्ध हैं I
2) उपन्यास
“अपने अपने बुर्ज ख़लीफा”
जयंती रंगनाथन
जयंती रंगनाथन किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं I सतत लेखन में उनका सानी नहीं हैं I उनका नया उपन्यास “अपने अपने बुर्ज ख़लीफा” जो उनकी बीसवीं प्रकाशित पुस्तक हैं ‘अपने–अपने बुर्ज ख़लीफ़ा’ एक कथा-संसार रचता है, जहाँ जीवन की ऊँचाइयाँ केवल उपलब्धियों से नहीं, बल्कि भीतर के संतुलन से मापी जाती हैं। यह कृति बाहरी सफलता के चमकदार शिखरों के साथ-साथ मनुष्य के आंतरिक संघर्षों और आत्म-विकास की यात्रा को सूक्ष्मता से सामने लाती है।
उपन्यास की केन्द्रीय पात्र एक नट-समाज की किशोरी जागृति है, जो रस्सी पर संतुलन साधते हुए मानो अपने जीवन के अर्थ को भी साधने का प्रयत्न करती है। उसका ‘जागृति’ से ‘जागती’ बनना केवल नाम-परिवर्तन नहीं, बल्कि चेतना के विस्तार का प्रतीक है। लेखिका ने उसके भीतर पलते आकर्षण, जिज्ञासा, मोह और आत्मविश्वास के द्वंद्व को अत्यंत बारीकी से उकेरा है। युवावस्था की देह-मन संबंधी हलचलों को बिना आडंबर के, सहज और संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करना कृति की विशिष्टता है। कथानक का प्रवाह गतिमान है, जिसमें देश–विदेश के विविध पात्रों का प्रवेश कथा को व्यापक आयाम देता है। नायिका का साधारण परिवेश से उठकर अंतरराष्ट्रीय पहचान तक पहुँचना, और फिर एकाएक पतन का सामना करना,यह समूची कहानी जीवन की अनिश्चितताओं का सशक्त कथ्य बनकर उभरती है। यहाँ ‘बुर्ज ख़लीफ़ा’ केवल भौतिक ऊँचाई नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के अपने-अपने स्वप्न-शिखरों का प्रतीक बन जाता है।
उपन्यास का एक उल्लेखनीय पक्ष यह है कि नायिका के संघर्ष-पथ पर परिवार और समाज का सहयोग निरंतर बना रहता है। यथार्थ की दृष्टि से यह कुछ आदर्शवादी प्रतीत हो सकता है, किंतु यही पक्ष उपन्यास को एक सकारात्मक ऊर्जा से भी भर देता है। लेखिका कहना चाहती हैं कि मनुष्य यदि अपने भीतर की क्षमता को पहचान ले, तो परिस्थितियाँ भी उसके पक्ष में उच्चाइयों को छू सकती हैं। भाषा में प्रवाह, भावों में तीव्रता और कथ्य में प्रेरक तत्व ये तीनों इस उपन्यास को विशिष्ट बनाते हैं। जयंती रंगनाथन ने एक साधारण-सी दिखने वाली नट-कन्या के माध्यम से असाधारण जीवन-दृष्टि प्रस्तुत की है।
‘अपने–अपने बुर्ज ख़लीफ़ा’ केवल एक लड़की की सफलता या असफलता की कथा नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की दास्तान है जो अपने भीतर किसी ऊँचाई को छूने का स्वप्न देखता है और उसके लिए संतुलन, साहस तथा धैर्य के साथ संघर्ष करता है। कई जगह जागती के साथ खड़े होकर मन भावुक होता है तो कहीं कहीं जोश में भी आ जाता हैं I 219 पृष्ठ का यह उपन्यास 2026 के बेहतरीन उपन्यासों में अपनी जगह बनाएगा ऐसी आशा हैं I शिवना प्रकाशन से प्रकाशित यह उपन्यास अमेजन पर उपलब्ध हैं I
3) कहानी संग्रह
“ खोना भी एक क्रिया है “
डॉ ज्योत्सना मिश्रा
पेशे से स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉ ज्योत्सना मिश्रा कब देह को पढ़ते पढ़ते मन को पढ़ने लगी शायद उनको भी याद नहीं होगा लेकिन शब्द उनके भीतर कोलाहल जरूर मचाते होंगे तभी आंखों से डॉ का चश्मा ओर कंधे से डॉ का कोट उतार कर जब वह भावों ओर अनंत समंदर में छलांग लगाती हैं ऐसे ऐसे नायाब भाव रचित हैं कि मन चकित रह जाता हैं I कहानी-संग्रह “खोना भी एक क्रिया है” समकालीन जीवन की उन सूक्ष्म दरारों को रेखांकित करता है, जिन्हें हम अक्सर देखते हुए भी अनदेखा कर देते हैं। यह संग्रह किसी बड़े शोर के साथ नहीं, बल्कि धीमे, भीतर उतरते स्वर में पाठक को अपनी ओर खींचता है।इन कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी अनकही बेचैनी है। कथाएँ सतह पर बहुत सामान्य प्रतीत होती हैं,अस्पताल, परिवार, रोज़मर्रा के संबंध…किन्तु उनके भीतर एक गहरी नैतिक उलझन और भावनात्मक क्षरण निरंतर सक्रिय रहता है। लेखिका, जो पेशे से चिकित्सक भी हैं, मनुष्य के शरीर ही नहीं, उसके मन और परिस्थितियों की भी शल्य-चिकित्सा करती दिखाई देती हैं। विशेषतः “प्रोटोकॉल” जैसी कहानियाँ व्यवस्था के भीतर छिपे असंवेदनशील तंत्र को उजागर करती हैं। यहाँ एक डॉक्टर केवल पेशेवर दायित्वों में नहीं उलझी, बल्कि मानवीय संवेदना और संस्थागत नियमों के बीच झूलती हुई दिखाई देती है। इसी प्रकार शीर्षक कथा “खोना भी एक क्रिया है” जीवन के उन क्षणों को पकड़ती है, जहाँ हानि केवल घटना नहीं रह जाती, बल्कि एक सतत प्रक्रिया बन जाती है,धीरे-धीरे भीतर कुछ टूटता, सरकता और विलीन होता रहता है।
रेनबो,योग वियोग,प्रेम का तीसरा पहलू,उमस का हिसाब,मनवंती का ब्याह सब अलग अलग रंग की कहानियां हैं I भाषा इस संग्रह की शक्ति है…सीधी, सादी, बिना अलंकारिक आडंबर के। किंतु यही सादगी पाठक को अधिक असहज करती है, क्योंकि उसमें कोई सजावट नहीं, केवल सत्य की एक चुभती,तीखी उपस्थिति है। कथाओं को पढ़ते हुए बार-बार ऐसा लगता है मानो ये पात्र हमारे आसपास ही मौजूद हों,उनकी चुप्पियाँ, उनकी थकान, उनके भीतर दबे संवाद सब परिचित लगते हैं।
इस संग्रह की एक और विशेषता यह है कि यह पाठक को भावुक बनाकर छोड़ नहीं देता, बल्कि उसे सोचने के लिए विवश करता है। कहानियाँ समाप्त होने के बाद भी उनके अर्थ भीतर चलते रहते हैं…जैसे कोई अधूरी बातचीत, जो मन में गूंजती रहती है। ‘खोना भी एक क्रिया है’ उन अनुभवों का साहित्यिक रूपांतरण है, जिन्हें हम जीते तो हैं, पर शब्द नहीं दे पाते। ज्योत्सना मिश्रा ने इन कहानियों के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि खोना केवल अंत नहीं, बल्कि एक ऐसी प्रक्रिया है जो मनुष्य को भीतर से बदलती, परिभाषित करती और कहीं न कहीं उसे नया भी बनाती है।यह संग्रह समकालीन हिंदी कहानी में संवेदना, यथार्थ और आत्ममंथन का एक सशक्त हस्ताक्षर है।