पुस्तक – श्रापित किन्नर ( उपन्यास ); लेखिका – डॉ. मुक्ति शर्मा; प्रकाशक – अमन प्रकाशन, कानपुर; पृष्ठ संख्या – 88; मूल्य – 195/- मात्र ; ISBN न. – 978-93-89-220-30
(यह समीक्षा मेरे लिए इसलिए भी रोमांचकारी रही कि, विदेशी धरती पर जब मुझे मेरी 7 वर्षीय पोती किआरा ने लाइब्रेरी में हाथ पकडकर कम्यूनिटी लेंग्वेज सेक्शन में लेजाकर खड़ा कर दिया और कहा – Daadi, come and find your book here. कुल मिला कर 10 किताबों में से मैं यह उपन्यास इश्यु करवाकर लाई थी )
डॉ. मुक्ति शर्मा जम्मू, कश्मीर से संबंधित हैं। आपके कहानी संग्रह जिन्दा लाश एवं वो रात आ चुकि हैं। आपको कुल सम्मान इस प्रकार है… सर्वोत्तम पुरुस्कार- वाराणसी विश्व विद्यालय 2017, आदिवासी विमर्श की अवधारणा – हरियाणा अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी 2018 इनके अतिरिक्त नारी की समाज में स्थिति और हिंदी साहित्य में किन्नर जीवन पर भी आपको सम्मानित किया जा चुका है।
लेखिका द्वारा लिखित उपन्यास भारतीय समाज में किन्नरों की दशा पर व्यापक प्रभाव डालता है। प्रारम्भ से ही हमारे समाज में किन्नरों को स्वीकार नहीं किया गया, वे समाज की मूलधारा से जुड़ नहीं सके। वर्ष 2021-2022 में देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें समाज के तीसरे लिंग या थर्ड जेंडर का दर्जा देकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की पहल की है।
प्रस्तुत उपन्यास ‘श्रापित किन्नर’ भी इसी कथानक पर आधारित है। यह कहानी उन परिवारों की कहानी है, जिन परिवारों बच्चे ऐसे पैदा होते हैं। वे बच्चे और कहीं- कहीं तो उनकी जननी भी प्रतारणा, उपेक्षा के शिकार होते हैं। इस कहानी में भी हिना और नर्गिस ऐसे ही पात्र हैं। उपन्यास में किन्नरों के समाज के बहुत से अनदेखे पहलुओं पर भी रोशनी डाली है, उदाहरण के लिये…
किन्नरों का अंतिम संस्कार रात्रि में गुप्त तरीके से किया जाता है।
ये शव को जलाते नहीं हैं बल्कि दफनाते हैं।
शवयात्रा उठाने से पहले शव को जूते चप्पल से मारा जाता है।
मृत्यु के बाद साथी की याद में सारा समाज एक हफ्ते तक भोजन नहीं करते।
किन्नरों के ‘आराध्यदेव अरावन’ हैं, और समूह के सभी किन्नर को साल में एकबार इनसे विवाह अवश्य करना होता है।
इसके अतिरिक्त यह सत्य भी है कि, देश में प्रतिवर्ष 40 से 50 हज़ार किन्नर नए जुड़ते हैं, इनमें से 90% किन्नर बनाये जाते हैं। इस बिरादरी में वे भी शामिल होते हैं कि, जो लिंगानुसार तो नहीं पर हाव-भाव से ज़नाना अंदाज़ रखते हैं। डॉ. मुक्ति शर्मा ने उस परिवार की मानसिकता का भी बहुत सशक्त चित्रण किया है, जिस परिवार में किन्नर शिशु पैदा होते हैं। इसी मानसिकता के साथ कहानी आगे बढ़ती है। नायक अकरम की प्रेयसी नर्गिस जो किन्नर है की शादी में बहुत व्यवधान आता है, यह समाज में सहजता से स्वीकार नहीं है। क़ुछ युवा वर्ग साथ आते पर वे संख्या में बहुत कम ही होते हैं। साथ ही नायिका नर्गिस के मन में शंका – कुशंका जन्म लेती हैं जो जायज़ भी हैं।
लेखिका ने पुस्तक में अनेक प्रश्न भी खड़े किये हैं, उदाहरण के लिये…
आपकी ख़ुशी में किन्नर आते हैं नाच गा कर बधाईयाँ देते हैं। उनके इस कार्य के बदले हम उन्हें धन राशि भी देते हैं, तो ये उपेक्षित क्योँ?
हम स्वयं को सभ्य मानने वाले कभी भी उनके बारे में जानने की कोशिश नहीं करते, बिना उनको जाने उन्हें गलत या उपेक्षित क्योँ ठहरा देते हैं?
उपन्यास ‘श्रापित किन्नर’ में लेखिका डॉ. मुक्ति शर्मा ने किन्नर संबंधित अनेक पौराणिक प्रसंगों को भी समाहित किया है। वे बताती हैं कि, किन्नर आराध्य अरावन भगवान श्री कृष्ण के मित्र गाण्डीव धारी अर्जुन के पुत्र थे। द्रोपदी विवाह उपरांत एक शर्त के उल्लंघन के कारण अर्जुन को एक वर्ष के लिए तीर्थयात्रा करनी थी। उसी दौरान अर्जुन को एक विधवा नाग राजकुमारी उलूपी से प्यार हो गया और विवाह कर लिया, उन्हीं की संतान अरावन थे। एक दूसरा प्रसंग भी देखिएगा, महाभारत युद्ध में अरावन ने पाण्डवों के जीत के लिए स्वयं को बलि के लिए समर्पित कर दिया था, किन्तु कुंआरा होने के कारण मान्य नहीं रहे तब श्री कृष्ण ने मोहिनी बनकर अरावन से विवाह किया और उनका मनोरथ सफल किया।
लेखिका मुक्ति शर्मा ने अपने उपन्यास में देश के विभाजन की व्यथा को भी उकेरा है। वे लिखती हैं कि, इस अनोखे बंटवारे में लाखों करोड़ों लोगों का वर्तमान- भविष्य, सभ्यता- संस्कृति, आचरण – व्यवहार, का भी बंटवारा हुआ। कहानी में क़ुछ राजनीति रंग भी दिखा है, किन्नर हिना को राजनीति में पद देकर अपनी रोटियां सेकने जा भी जिक्र किया है। वर्ष 1937 के आम चुनाव में कांग्रेस की बहुमत से विजयी होने का भी उल्लेख है। बहुत ही संवेदनाशील क़ुछ पंक्तियाँ भी पुस्तक में पढ़ने को मिली हैं, आपसे शेयर कर रही हूँ, बहुत सशक्त संदेश है…
हाँ, मैं पुरुष हूँ, न नारी हूँ!
अबला नहीं सशक्त हूँ!
दृढ़ता की पहचान हूँ!
हाँ, मैं जीवन दायनी नहीं हूँ!
निश्छल कल-कल बहती हूँ!
मैं गंगा की धारा हूँ!
खुशियाँ बाँटती चलती!
जिस घर में जाती!
हाँ, मैं बुलंद हौँसलों की मिसाल हूँ!
ताली मेरी पहचान बन गई!
हाँ, मैं पुरुष हूँ न नारी हूँ!
डॉ. मुक्ति शर्मा द्वारा लिखित उपन्यास में किन्नर समाज के बहुत से अनदेखे पहलुओं को सामने लाया गया है। सामाजिक, राजनैतिक, भौगोलिक, विषयों पर भी प्रकाश डाला गया है। कथानक बहुत सशक्त है। समाज की विषमताओं को भी हम देख सकते हैं, तभी गृह पलायन, विरोध, आत्महत्या जैसे विकृत प्रसंग भी सामने आये। पात्र नर्गिस, हिना, अकरम, गुरु माँ, अम्मी – अब्बू, मामी हैं, और सभी के चरित्र के साथ पूरा पूरा न्याय हुआ है। मुख्य पृष्ठ पर भी किन्नर जैसे संवेदना शील विषय को उकेरा गया है, दिखया गया चित्र की आँखें अपनी व्यथा खुद कह रहा है। लाल नीले रंग से विषय को और भी गूढ़ता दी गई है। संवाद सीधे सरल, प्रवाह पूर्ण हैं। भाषा धारा प्रवाह है।
और अन्त में लेखिका ने इस कारण घर से उपेक्षित बच्चों को आतंकवाद की और मुड़ने का संदेश भी दिया है, किन्तु हिना जैसे समझदार नायिका द्वारा अपने बहके कदमों को रोक कर, पढ़ लिखकर डॉक्टर बन कर समाज में उदाहरण प्रस्तुत किया है साथ ही समाज में बहकते बच्चों को नई दिशा देने का भी संदेश दिया है। जटिल विषय को अपना कथानक बना कर संदेशात्मक कृति प्रस्तुत करने के लिए बधाईयाँ।