Friday, April 17, 2026
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भाषा का सवाल केवल संप्रेषण अथवा अभिव्यक्ति का नहीं है…! – प्रो नवीन चन्द्र लोहनी

भाषा का सवाल केवल संप्रेषण अथवा अभिव्यक्ति का नहीं है…!

  • प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी

भारत में भाषा का सवाल बार-बार नए सिरे से उठता है और उसमें 1947 के आसपास जैसी कोई बहस शुरू हो जाती है कि हिंदी किसी राज्य पर नहीं लादी जाएगी। हिंदी को राज्य विशेष या अन्य राज्यों पर लादने जैसा विचार केवल इसलिए भड़काया जाता है कि इस बहाने भारतीय भाषाओं और हिंदी के बीच युद्ध जैसा कोई वातावरण बना लिया जाए और राजनीतिक स्वार्थों तथा अंग्रेज़ी को इस तरह बचा लिया जाए जिससे राजनीति भी चमकती रहे और अंग्रेज़ी अपनी जगह पर न केवल बची रहे बल्कि उसका अस्तित्व और भी पुख्ता तरीके से सिद्ध होता रहे।

हाल के दिनों में तमिलनाडु में घटी घटना ने इस बात को और भी महत्वपूर्ण तरीके से रेखांकित किया है कि भाषा का सवाल देश में अभी भी न केवल राजनीतिक बहस के लिए खड़ा किया जाता है बल्कि अपनी स्थानीय और क्षेत्रीय भाषाओं का प्रश्न खड़ा कर हिंदी के विरुद्ध राजनीति तैयार की जाती है और उसके बहाने अपने वोटो को एक जगह संगठित करने की कोशिश दिखाई देती है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के आने के बाद 5 वर्षों में लगातार यह चर्चा बनी हुई है कि राज्यों का शिक्षण माध्यम क्या हो? स्पष्ट है कि शिक्षा नीति में स्थानीय भाषा, घर की भाषा, क्षेत्रीय भाषा, मातृभाषा को शिक्षण माध्यम की भाषा के रूप में प्राथमिक स्तर पर लागू करने के लिए कहा गया और यह भी कहा गया कि जहां तक संभव हो आगे भी शिक्षण माध्यम के रूप में स्थानीय भाषा को बढ़ावा दिया जाए। इस स्पष्ट आदेश या सुझाव को पढ़ने के बजाय इसमें जो नहीं है उसको आगे बढ़ाने की न केवल कोशिश की जाती है बल्कि उसके बहाने राजनीतिक रोटियां सेंकी जाती हैं।

जहां तक त्रिभाषा सूत्र का सवाल है राष्ट्रीय शिक्षा नीति में पूर्व से चल रही त्रिभाषा नीति को कुछ अलग तरह से व्याख्यायित कर दिया गया है इसमें हिंदी तीसरी भाषा नहीं है या भारत की कोई भी भाषा तीसरी भाषा नहीं है अपितु स्पष्ट किया गया है कि तीसरी भाषा के रूप में अंग्रेज़ी और स्थानीय भाषा के अलावा कोई भी भाषा ली जा सकती है।

तमिलनाडु में तीसरी भाषा का सवाल इस रूप में प्रस्तुत किया गया कि अगर तीसरी भाषा आएगी तो वह हिंदी होगी। यद्यपि मेरा दृढ़ मत है कि भारत की एकता के लिए तीसरी भाषा नहीं बल्कि दूसरी भाषा के रूप में हिंदी होनी चाहिए। अंग्रेज़ी या किसी अन्य विदेशी भाषा को तीसरी भाषा के रूप में प्रयोग किया जाना चाहिए, ताकि स्थानीय और क्षेत्रीय भाषा के बाद राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण भाषा और दुनिया की एक बहुसंख्यक जनता द्वारा बोली जाने वाली भाषा को जो भारत की राजभाषा भी है, देश के सभी नागरिकों तक पहुंचाने की कोशिश न केवल होनी चाहिए, बल्कि इसको लागू कर संविधान की भावना का भी की भी अनुपालना होनी चाहिए।

यह अनुपालन न होकर हिंदी थोपने के नाम पर जो दुष्प्रचार किया जाता है उसे हिंदी का नुकसान तो हो ही रहा है, स्थानीय भाषा या भारत की अन्य भाषाओं का भी इससे नुकसान हो रहा है और राजनीति जिस सिरे भी जाए अंग्रेज़ी का वर्चस्व और भी पुख्ता तरीके से भारत में लागू हो रहा है, जिसकी आवश्यकता अब नहीं है क्योंकि अंग्रेज़ी जिस देश से आई थी उसके पड़ोसी देशों में ही नहीं बल्कि उस देश में भी अंग्रेज़ी के वर्चस्व को अस्वीकारने की बातें अक्सर होती हैं। स्पष्ट है कि अंग्रेज़ी एक माध्यम है भारतीयों को उसे मूल भाषा प्रयोक्ताओं की तरह स्वीकारने की कोई मजबूरी नहीं है।

राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भाषा लागू कर संपन्न बने देशों की संपन्नता अधिक है इस संबंध में पूर्वी एशिया के देशों चीन, जापान, कोरिया, रूस से लेकर पश्चिमी दुनिया में अब देश जर्मनी, फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल जैसे देश ही नहीं अन्य छोटे-छोटे देशों की भी बात की जा सकती है जहां अपनी भाषा को संपर्क भाषा, राजभाषा, प्रौद्योगिकी की भाषा, शिक्षण माध्यम भाषा और राजनयिक भाषा के रूप में विकसित किया गया है। ये देश न केवल अपनी भाषा नीति में स्पष्ट रखते हैं बल्कि स्पष्ट नीति के चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी भाषा नीति छोटा देश होने के बाद भी प्रखर रूप में स्पष्ट होती है।

यूक्रेन तथा अन्य छोटे देशों के द्वारा भी अपने देश में शिक्षण के लिए आने वाले विदेशी नागरिकों को स्थानीय भाषा की आवश्यकता होती है। जो कोरोना काल में भारत में सभी के बीच बहस के रूप में आई कि किस प्रकार दुनिया के छोटे बड़े देश अपनी भाषा को आगे बढ़ाने के लिए शिक्षण माध्यम के रूप में अनिवार्य बना रहे हैं।

यद्यपि दुनिया भर में अंग्रेज़ी भाषा पहुँची है और दुनिया के वे देश भी धीरे-धीरे अंग्रेज़ी से जुड़ रहे हैं जो पहले अपनी भाषा के अलावा अन्य भाषा शिक्षण को महत्व नहीं देते थे, किंतु उन देशों में आज भी प्राथमिकता अपनी भाषा को है न कि अंग्रेज़ी को। इसके उलट अपने देश में राजभाषा हिंदी के विरुद्ध संगठित होकर नारेबाजी फैशन की तरह है जिस राजनीतिक रोटियां पकाई जाती हैं और भाषाओं के बहाने स्वयं की राजनीति चमकाई जाती है।

तमिलनाडु में स्टालिन द्वारा किया गया भाषा विरोध किसी भी रूप में वर्तमान में अपेक्षित या आवश्यक नहीं है क्योंकि टेक्नोलॉजी के विकास के साथ ही दुनिया भर की भाषाओं में ज्ञान और सूचना के अनुवाद और आपसी लेनदेन की संभावना बढ़ गई है । इससे संपर्क भाषा के रूप में हिंदी का विकास भारत और दुनिया में हो रहा है और आज दुनिया भी यह मान रही है कि हिंदी भारत की राजकाज की भाषा ही नहीं है बल्कि वह वैश्विक स्तर पर इसलिए उसे सीखना पूर्वी एशियाई देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में रह रहे प्रवासी भारतीयों के मध्य भी व्यापार, संपर्क और आपसी व्यवहार के लिए उपयोगी है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 आने के बाद राज्यों में उसके अनुपालन अलग-अलग रूप में करने की कोशिश हुई। इसमें कर्नाटक में स्नातक स्तर पर हिंदी, संस्कृत के स्थान पर कन्नड़ भाषा के प्रयोग को बढ़ावा देने के नाम पर 3 वर्ष पूर्व जो कोशिश हुई उसे पर अभी तक न्यायालय ने लगाम लगाई हुई है क्योंकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में किसी भाषा विशेष को चाहे वह स्थानीय ही क्यों ना हो नागरिकों पर उच्च शिक्षा माध्यम के रूप में थोपने की सलाह नहीं दी गई है। इसलिए किसी भी राजनीतिक दल द्वारा भाषा विरोध को इस रूप में आगे बढ़ाना कि इस बहाने देश की सरकार अथवा बहुसंख्यक हिंदी प्रयोक्ता थोपने की कोशिश कर रहे हैं एक राजनीतिक बयान जैसा ही है, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा नीति के अनुपालन में तीन भाषाओं या भाषा विशेष के प्रयोग में हिंदी को जबरिया लागू करने की कोई सलाह नहीं दी गई है बल्कि हिंदी पट्टी के बीच इस बात पर आपत्ति है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 कहीं भी हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने की बात नहीं करती और उसमें हिंदी को अनिवार्य करने जैसी कोई घोषणा नहीं है जिससे राष्ट्रीय स्तर पर राजभाषा की उपेक्षा भी दिखाई देती है ।

अतः स्टालिन या अन्य राज्य सरकारों में जहां भी भाषा विवाद को हिंदी बनाम स्थानीय भाषा करने की कोशिश हो रही है वह सब अपनी भाषा विकास की कोशिश नहीं अपितु भाषा के बहाने अपने राजनीति के विकास की कोशिश अधिक दिखाई देती है। स्टालिन का विरोध तो रुपए के प्रतीक चिन्ह का विरोध करने के स्तर तक जाने का तात्पर्य भी यही है कि वह हिंदी और देवनागरी लिपि को एक जैसा बताने की कोशिश कर रहे हैं जबकि देवनागरी लिपि केवल हिंदी की लिपि नहीं है और लिपि का विरोध करना एक अलग बात है भाषा का विरोध करना अलग ।

स्टालिन अब एक तीसरे स्तर पर जा चुके हैं जो राष्ट्रीय रूप में स्वीकृत एक ऐसे प्रतीक का विरोध कर रहे हैं जिसका भाषा से कोई संबंध नहीं है और जब यह प्रतीक निश्चित किया गया तब भी इसमें ऐसा कोई सुझाव नहीं दिया गया था कि जिससे हिंदी प्रोन्नति की जानी है। हिंदी देवनागरी में स्वीकृत  ‘₹’ चिन्ह को हटाकर भी स्टालिन एक ऐसा कार्य कर रहे हैं जिससे राज्यों में सहमति नहीं मिलनी है और वह हिंदी विरोध भी एक ऐसा खोखला विरोध है जिससे शिक्षा नीति के आगे बढ़ाने में भले ही कुछ कठिनाइयां आए परंतु राष्ट्रीय स्तर पर उनको कोई सहमति या स्वीकृति मिले अथवा वे राजनेता के रूप में बड़े नेता बनते हो ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता ।

भारत की भाषा नीति में स्पष्टता की जो कमी है उसका लाभ स्टालिन जैसे नेता अपनी राजनीति चमकाने के लिए अक्सर करते हैं । इसमें वे राजनेता भी शामिल हैं जो वोट के लिए हिंदी में बोलते हैं किंतु जब भी हिंदी के हित या राष्ट्रीय स्तर पर भाषा नीति की बात आती है तो वह अप्रत्यक्ष और कभी-कभी प्रत्यक्ष रूप में भी हिंदी विरोध में दिखाई देते हैं । ऐसा होने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को कोई लाभ हो रहा हो ऐसा भी नहीं है और न ही इससे हिंदी विकास यात्रा रुकेगी परंतु जब तक हिंदी को देश की सरकार शिक्षण माध्यम की भाषा और रोजगार की भाषा के रूप में स्वीकृत नहीं करती हिंदी का अपेक्षित विकास भी संभव नहीं है।

आज भी भारत में हिंदी प्रदेशों में भी छोटी-छोटी दुकानों में छपने वाले बिलों से लेकर निजी संस्थानों में प्रयुक्त होने वाली पत्रावलियों और व्यापार में प्रयुक्त होने वाले भाषा माध्यम में भी अंग्रेज़ी का दबदबा इसी वजह से अभी तक बना हुआ है कि हमें उनसे संबंधित दस्तावेजों में कथित आसानी के नाम पर इसका बढ़ावा मिलता दिखाई देता है। आवश्यकता है कि सरकार भाषा नीति में शिक्षण माध्यम के रूप में त्रिभाषा सूत्र को न केवल लागू करें अपितु तीसरी भाषा के रूप में द्वैध या कन्फ्यूजन खत्म कर स्पष्ट रूप में हिंदी को देश की प्रमुख भाषा भारत की राजभाषा होने के कारण अनिवार्य कर दे।

हिंदी को देश की एकता के लिए भी एक ऐसी भाषा के रूप में विकसित किया जाना चाहिए जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व कर सके। चीन जैसे देश में जिसमें अनेक राज्यों की बहुत संपन्न भाषाएं थी भारत की आजादी के बाद आजाद हुआ देश आज न केवल मंदारिन से अपने को अभिव्यक्त कर रहा है अपितु मदारिन को तकनीक, शिक्षण, राजभाषा सहित सभी माध्यमों में लागू करने के कारण आज चीनी भाषा अंग्रेज़ी के बरक्स तकनीकी क्षेत्र में भी एक बड़ा मुकाम हासिल कर गई है, जहां हिंदी इससे काफी दूर है। इसके लिए हिंदी को काफी लंबी दौड़ लगानी पड़ेगी । जाहिर है भाषा का सवाल केवल संप्रेषण अथवा अभिव्यक्ति का नहीं है, यह एक सांस्कृतिक सवाल भी है और भाषा का सवाल दुनिया में भारत की सशक्त उपस्थिति का भी सवाल है।

अंग्रेज़ी दुनिया में किसी भी देश की भाषा बन जाए परंतु भारतीयों के लिए वह एक विदेशी भाषा ही रहेगी। अंग्रेज़ी या किसी भाषा को सीखना नागरिकों के विकास के लिए अपेक्षित है परंतु अंग्रेज़ी विकास के लिए देश की भाषाओं की उपेक्षा विशेष कर हिंदी को अंग्रेज़ी के सामने खड़ा कर हिंदी की उपेक्षा नितांत वर्जित की जानी चाहिए भाषा का सवाल केवल संप्रेषण अथवा अभिव्यक्ति का नहीं है भाषा का सवाल केवल संप्रेषण अथवा अभिव्यक्ति का नहीं है इसके लिए सरकार को भी न केवल ठोस कदम उठाने चाहिए, बल्कि संवैधानिक रूप में हिंदी की स्थिति लागू करने के लिए राष्ट्रीय ही नहीं हमारे अंतरराष्ट्रीय कार्यालयों विदेश मंत्रालय, दूतावासों, उच्चायोगों एवं कोंसलवासों में भी हिंदी प्रयोग को आवश्यक स्तर तक बढ़ाना चाहिए तथा विदेशों में भी संपर्क भाषा के तौर पर भारतीय नागरिकों में भाषा गौरव के रूप में देश की भाषा को आगे बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए। दुनिया के सभी देश इस रूप में अपनी भाषा को बढ़ावा दे रहे हैं, तब हमारी टालने और उपेक्षा की नीति के ऐसे ही परिणाम दिखाई देते हैं।

 

प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी
वरिष्ठ आचार्य
अध्यक्ष हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग,
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ
पिन 250004 उत्तर प्रदेश भारत.
मोबाइल – +91 94122 07200

 

 

 

 

 

 

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3 टिप्पणी

  1. बोलचाल की संपर्क भाषा के संदर्भों में पूरी तरह सहमत । वास्तव में हिंदी की ताक़त बहुत बड़ी और मज़बूत है । आज आर्थिक जगत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बोलचाल की हिंदी एक उद्योग के रूप मेें काम कर रही है । भारत के हर राज्य में, तमिलनाडु सहित, CBSC पाठ्यक्रम लोकप्रिय है, जहाँ किसी न किसी स्तर पर हिंदी को स्थान हासिल है,मैं 1986 से अबतक तमिलनाडु से गहराई से जुड़ा हुआ हूँ; हिंदी का वह Picture नहीं है जो वहाँ के राजनेता बताते हैं *** रोज़गारोन्मुख और प्रयोजनमूलक हिंदी सब चाहते हैं ; दुर्भाग्य से हमारे हिन्दी संस्थान/विवि इसे गंभीरतापूर्वक नहीं ले रहे हैं । हिंदी एक बड़ा उद्योग बन चुकी है इसे समझना चाहिए*** किशोर वासवानी, पुणे, मो• 9979851770

  2. आदरणीय सर
    आपका शीर्षक काबिले गौर है।आपने बिल्कुल सही कहा है कि भाषा का सवाल केवल संप्रेषण अथवा अभिव्यक्ति का नहीं है।
    आपका पूरा लेख पढ़ा। हिंदी भाषा को लेकर आपने इस लेख में जो कुछ भी लिखा है वह काफी महत्वपूर्ण है। हिंदी के उत्थान के लिये, विशेष तौर से इसलिये भी कि यह देश की राजभाषा है और राजभाषा की हैसियत से आपके विचारों से हम पूरी तरह सहमत हैं कि अगर राज्यों में स्थानीय भाषा को शिक्षण का माध्यम और पहली भाषा माना जाता है तो द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी को स्वीकृत किया जाए और अंग्रेजी तृतीय भाषा के रूप में रहे।
    दक्षिण भारत में हिंदी भाषा को लेकर इस तरह के मतभेद पहले भी उत्पन्न किए गए हैं। अपने राजनीतिक लाभ के लिए राजनेता अपने ही देश की भाषाओं को लेकर राजनीति करते हैं। जैसे पाकिस्तान जब स्वयं कुछ नहीं कर पाता तो कश्मीर मुद्दा उठा लेता है। त्रिभाषा नीति तो कई सालों से चल रही है पर उसके क्रम को लेकर विचार करने की गंभीरता राजनीतिक लोग नहीं समझ पाते। वास्तव में हिंदी को नुकसान अपने ही घर से हो रहा है।
    विचारणीय तो यह है कि जो शिक्षा मंत्री है, वह शिक्षा व शिक्षण के प्रति उसकी नीतियों के प्रति कितनी जानकारी रखता है और कितना गंभीर है।
    भारतेंदु जी ने कहा था।
    *”निज भाषा उन्नति अहै,*
    *सब भाषा को मूल।*
    *बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय के सूल।।*
    हमारी अपनी भाषा सही हमारी उन्नति संभव है।
    अगर प्रथम भाषा स्थानीय भाषा है जिसमें अध्ययन कराया जाता है तो द्वितीय भाषा हिंदी को ही रखना चाहिये और तृतीय भाषा अंग्रेजी होनी चाहिये।
    भारत में रहने वाले हर भारतीय को हिंदी भाषा आनी ही चाहिये।
    इस संदर्भ में विवेकानंद का शिकागो भाषण भी याद आता है जो स्वामी विवेकानंद ने 11 सितंबर, 1893 को अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में दिया था। वहाँ उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत “अमेरिका के भाइयों और बहनों” (Sisters and Brothers of America) के साथ की, जो कि हिंदी में था।
    उनके भाषण ने पश्चिमी देशों को भारतीय दर्शन, संस्कृति और अध्यात्म से परिचित कराया और भारत की छवि को दुनिया में बदल दिया।
    यह दिन भारत के इतिहास में गर्व और सम्मान की घटना के रूप में दर्ज हुआ है।
    उनके भाषण के बाद शिकागो का आर्ट इंस्टीट्यूट दो मिनट तक तालियों से गूँजता रहा था। यह हमारी हिंदी का ही प्रभाव था।
    पहले भी ऐसा हुआ करता था कि विदेशी राजनयिक अपने देश की भाषा में ही भाषण दिया करते थे और उसे समझाने के लिए दुभाषियों की व्यवस्था रहती थी।
    आप सही कह रहे हैं कि आज तो फिर दुनिया की बहुत संख्या की जनता हिंदी भाषा का प्रयोग कर रही है ।हमारे देश के संविधान में इस संबंध में परिवर्तन करने की आवश्यकता है और से पालन करवाने की भी है। लोगों को स्वयं इस बात को समझना होगा कि इसे पढ़ने में वे स्वयं रुचि पैदा करें। जिन देशों में उनकी अपनी भाषा का प्रयोग होता है वे राष्ट्र आज अधिक उन्नत है।
    आज टेक्नोलॉजी में अनुवाद को सरल कर दिया है इसलिए तमिलनाडु के स्टालिन द्वारा किया गया भाषा विरोध कोई अर्थ नहीं रखता।
    राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी हिंदी को बढ़ावा देने वाली बात नहीं है।यह सच है। भाषा नीति को स्पष्ट करने की बहुत आवश्यकता है। राष्ट्रीय एकता के लिये और राजभाषा की दृष्टि से भी महत्व रखते हुए इस पर गंभीरता से विचार करना व संवैधानिक दृष्टि से इसके लिए नियम बनाना आवश्यक है।
    यहाँ एक बात हम अपनी ओर से भी कहना चाहते हैं।भारत में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई को बंद कर देना चाहिये। हिंदी को सबसे अधिक नुकसान इसी से हो रहा है। और सीबीएसई और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में तो दसवीं के बाद ही हिंदी खत्म हो जाती है। जबकि ऐसा नहीं होना चाहिये।
    हिन्दी भाषा को लेकर आपकी चिंता महसूस हुई। और यह चिंता सिर्फ आपकी नहीं उस हर व्यक्ति की है जो हिंदी के महत्व को समझता है। अपने देश के गौरव को समझता है। आजकल विदेशों में हिंदी का इतना प्रचार और प्रसार हो रहा है, इतना लेखन हो रहा है! उसके बावजूद हमारे अपने देश में हिंदी को उसके अनुकूल सम्मान नहीं मिल रहा है।
    हम उम्मीद करते हैं कि आपकी आवाज संविधान के पन्नों तक पहुँच पाये।
    इस महत्वपूर्ण लेख के लिए आपको बधाई।
    प्रस्तुति के लिए तेजेंद्र जी का शुक्रिया पुरवाई का बहुत -बहुत आभार।

  3. आदरणीय किशोर वासवानी जी
    आपकी टिप्पणी पढ़ी। अगर वास्तव में ऐसा है जैसा आपने बताया तो संतोषजनक लगा लेकिन फिर भी इस पर चिंतन करने की आवश्यकता है।

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