संपादकीय : कोरोना के आगे आख़िर ब्रिटेन ने घुटने क्यों टेक दिए हैं? 3
17 मार्च 2020 को ब्रिटेन के चीफ़ साइंटिफ़िक एडवाइज़र सर पैट्रिक वैलाँस ने घोषणा की थी कि यदि कोरोना वायरस के चलते ब्रिटेन में केवल 20,000 तक लोगों की मृत्यु तक सीमित किया जा सके तो यह एक उपलब्धि होगी। यह घोषणा सुबूत है इस बात का कि ब्रिटिश सरकार की सोच शुरू से ही निगेटिव रही। कहने वाले तो यह आरोप भी लगा रहे हैं कि ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि यहां के सीनियर सिटिज़न कोरोना की भेंट चढ़ जाएं। मगर इन आरोपों की पुष्टि कर पाना संभव नहीं।

विश्व भर में कोरोना की कुछ ऐसी दहशत फैली है कि कोई भी लेख सहीं आंकड़े दे ही नहीं सकता। लेख लिखने, भेजने और प्रकाशित होने में इतना समय लग जाता है कि आंकड़े इतिहास बन जाते हैं।  

यह लेख लिखते समय लंदन में 12 अप्रैल 2020 की सुबह के 05.30 बजे हैं। आज सुबह तक के आंकड़े कहते हैं कि ब्रिटेन में 78,991 केस कोरोना पॉज़िटिव के मौजूद हैं जबकि 9875 मरीज़ों की मृत्यु हो चुकी है। केवल 344 लोग इस बीमारी से ठीक होकर घर वापिस आ पाये हैं। 

सोचने की बात यह है कि ब्रिटेन में जनवरी 2020 के अंतिम सप्ताह में पहला कोरोना वायरस केस दर्ज हुआ था। तीस जनवरी को ब्रिटिश सरकार ने इस ख़तरे को ‘लो’ से बढ़ा कर ‘मॉडरेट’ घोषित किया। 31 जनवरी 2020 को आम जनता के लिये एक निर्देशिका जारी की गयी कि वायरस से कैसे बचा जाए। मगर अभी तक स्थिति की गंभीरता को किसी ने नहीं समझा था। 

याद रहे कि इटली के शहर मिलान में वहां की पहली कोरोना मृत्यु 22 फ़रवरी 2020 कोएक 77 वर्ष की महिला की हुई। और वहां के आज के आंकड़े हैं – 1,52,271 कोरोना पॉज़िटिव केस और 19468 मौतें।

अमरीका और ब्रिटेन ने इटली, स्पेन और ईरान से कोई सबक नहीं सीखा और लॉक-डाउन के आदेश जारी करने में बहुत देरी कर दी। आज अमरीका के आंकड़े कहते हैं – 5,32,879 मामले पॉज़िटिव, 20,577 मौतें। कोरोना वायरस से हुई मौतों के मामले में टॉप फ़ाइव देशों में – अमरीका (20,577), इटली (19468), स्पेन (16,606), फ़्रांस (13832) और ब्रिटेन (9,875) के नाम शामिल हैं। यदि चीन के आंकड़ों को सच माना जाए तो वहां केवल 3,339 लोग कोरोना वायरस की भेंट चढ़े।

अमरीका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बॉरिस जान्सन का रवैया लगभग एक सा रहा। वे समझते रहे कि कोरोना उनके देशों तक नहीं पहुंच सकता। वे हर मामले में ढील देते रहे और देरी करते रहे। ब्रिटेन में जब लॉक-आउट की बात कही गयी उसके बाद भी बहुत से रेस्टॉरेण्ट खुले थे। लोग काम पर आ जा रहे थे। यहां तक कि प्रिंस चार्ल्स और बाद में स्वयं बॉरिस जॉन्सन भी कोरोनाग्रस्त हो गये। 

याद रहे कि आज कोरोना से मरने वाले लोग केवल संख्या बन गये हैं। विश्व भर में जो 1,08,830 लोगों की मृत्यु हो चुकी है वे केवल संख्या नहीं थे। उन सबके परिवार थे। वे किसी के बेटा, भाई, पति, प्रेमी, मामा, चाचा थे। उनकी एक अपनी निजी दुनियां थी। उनके मरने से परिवारों के लिये सदमें से बाहर आ पाना आसान नहीं। 

17 मार्च 2020 को ब्रिटेन के चीफ़ साइंटिफ़िक एडवाइज़र सर पैट्रिक वैलाँस ने घोषणा की थी कि यदि कोरोना वायरस के चलते ब्रिटेन में केवल 20,000 तक लोगों की मृत्यु तक सीमित किया जा सके तो यह एक उपलब्धि होगी। यह घोषणा सुबूत है इस बात का कि ब्रिटिश सरकार की सोच शुरू से ही निगेटिव रही। कहने वाले तो यह आरोप भी लगा रहे हैं कि ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि यहां के सीनियर सिटिज़न कोरोना की भेंट चढ़ जाएं। मगर इन आरोपों की पुष्टि कर पाना संभव नहीं। 

यह प्रश्न सामने मुंह बाए खड़ा है कि आख़िर ब्रिटेन की इतनी दयनीय स्थिति क्यों हो गयी। ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ स्कीम की तो दुनियां भर में चर्चा रही है। आख़िर कैसे इतनी बड़ी संस्था ने इस विश्वमारी के सामने घुटने टेक दिये हैं। यहां ध्यान देने लायक बात यह है कि पिछले कुछ समय से ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ स्कीम का बजट लगातार कम किया जा रहा है। 2015 के मुक़ाबले बजट करीब 25 प्रतिशत कम हो चुका है। 

डॉक्टरों की शिकायत है कि लगातार डॉक्टरों और नर्सों की संख्या में गिरावट हो रही है और नयी आधुनिक मशीनें नहीं ख़रीदी जा पा रहीं क्योंकि बजट में निरंतर कमी आ रही है। वर्तमान सरकार हेल्थ सेवा को प्राइवेट करने की फ़िराक़ में है। वे चाहते हैं कि अमरीका की तरह ब्रिटेन के लोग भी निजी इन्श्योरेंस के भरोसे रहना शुरू कर दें और धीरे धीरे नेशनल हेल्थ स्कीम बस स्कीम ही बन कर रह जाए। 

आज हालत यह है कि अन्य बीमारियों की तो औक़ात ही ख़त्म हो गयी है। मुझे मेंरी डॉक्टर ने बताया कि मेरे दिल में एक ‘मरमर’ जैसी आवाज़ सुनाई दे रही है। मुझे ई.ई.जी. करवाना होगा। मगर पिछले 4 सप्ताह से तो कोई बात ही शुरू नहीं हो पा रही। डॉक्टर स्वयं कह रही हैं कि फ़िलहाल हस्पताल से दूर रहना ही ठीक है। कहीं ईईजी करवाने जाएं और कोरोना लेकर वापिस आएं।

आजकल दोपहर को धूप निकल रही है। ब्रिटेन के नागरिकों के लिये धूप एक लग्ज़री है। धूप खिलते ही सब पार्क और समुद्र तट की ओर निकल पड़ते हैं। इस ईस्टर पर उन्हें सलाह दी जाती है कि घरों में बन्द रहें। कोरोना के वाहक बनने से बचें।

कोरोना से लड़ने के लिये अमरीका समेत बहुत से देश भारत से मदद माँग रहे हैं। ब्राज़ील के राष्ट्रपति ने तो भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की तुलना भगवान महावीर (हनुमान) से कर दी है। भारत में लॉकडाउन 30 अप्रैल तक बढ़ा दिया गया है। कुछ खास हॉट-स्पॉट्स पर तो कर्फ़्यू भी लगा दिया गया है। सभी भारतीयों को सरकार का साथ देना चाहिये और इस वायरस को हराने में सहायता करनी चाहिये। 

तेजेंद्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

6 टिप्पणी

  1. दुनिया के लगभग सभी देशों की स्थिति कोरोना मामले में एक सी ही है।लोगों के लिये यही हितकर है कि जहां तक हो सकता है बाहिर निकलने से बचें।

  2. बहुत ही दयनीय स्थिति हैै…यह भयंकर संक्ररण बढती हुयी पैसे बनाने की लालसा का है!करोना का ईलाज बाहर है और इस लालच व खुदगर्ज़ी की महामारी का अपने भीतर!

  3. पूरे विश्व में स्थिति चिन्ताजनक है,बहुत लंबी लड़ाई है…अपना पूरा ध्यान रखें…शुभकामनाएं.

  4. समसामयिक संपादकीय! स्थिति नाजुक है। संपादक न केवल अपने प्रवासी देश की स्थिति पर चिंतन कर रहा है, मूल देश के लिए उसके मन में चिंता है वरन समस्त विश्व के हालात पर उसकी नजर है। इस भयावह परिस्थिति के बचाव के लिए वह घर में रहने की अपील कर रहा है जो इस बीमारी से बचने का एकमात्र ज्ञात कारगर तरीका है। संतुलित संपादकीय के लिए तेजेंद्र शर्मा को बधाई!

  5. मोदी जी ने सही समय पर सही फैसला लिया। लेकिन विडम्बना ये है कि हमारे देश में उनके प्रति नफ़रत ने एक बड़े वर्ग को अंधा कर दिया है। उसी का नतीजा आज पूरा देश भुगत रहा है।
    हम तो डूबेंगे सनम, तुम्हे भी ले डूबेंगे के तर्ज पर साज़िशों और ओछी राजनीति का बाज़ार गर्म है।

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