Tuesday, July 16, 2024
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संपादकीय – चुनावी धांधली सीमा के आर-पार

चाहे हम सरहद के इस पार रहें या उस पार, धांधली हमारे चरित्र में शामिल है। कम से कम पाकिस्तान में रावलपिंडी के कमिश्नर लियाकत अली चट्टा की आत्मा अभी तक पूरी तरह मरी नहीं और उन्होंने अपना अपराध स्वीकार करते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने इस धांधली में मुख्य चुनाव आयुक्त और मुख्य न्यायाधीष को भी शामिल बताया।  इतना ही नहीं लियाकत ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था कि उन्हें इस अपराध के लिये चौक पर सजा ए मौत मिलनी चाहिए। साथ ही उन्होंने यही सज़ा मुख्य चुनाव आयुक्त एवं मुख्य न्यायाधीष के लिये भी मांगी। पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया है।
आजकल दो वीडियो ख़ासे वायरल हैं। एक वीडियो पाकिस्तान से है जिसमें रावलपिंडी के कमिश्नर लियाकत अली चट्टा ने आम चुनावों में धांधली के आरोप लगाए हैं। और दूसरा वीडियो भारत के शहर चंडीगढ़ से है जिसमें मेयर के चुनाव में रिटर्निंग ऑफ़ीसर अनिल मसीह गड़बड़ी करते दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के साझा उम्मीदवार को हरा कर भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार को विजयी घोषित किया था। 
यानी कि चाहे हम सरहद के इस पार रहें या उस पार, धांधली हमारे चरित्र में शामिल है। कम से कम पाकिस्तान में रावलपिंडी के कमिश्नर लियाकत अली चट्टा की आत्मा अभी तक पूरी तरह मरी नहीं और उन्होंने अपना अपराध स्वीकार करते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने इस धांधली में मुख्य चुनाव आयुक्त और मुख्य न्यायाधीष को भी शामिल बताया।  इतना ही नहीं लियाकत ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था कि उन्हें इस अपराध के लिये चौक पर सजा ए मौत मिलनी चाहिए। साथ ही उन्होंने यही सज़ा मुख्य चुनाव आयुक्त एवं मुख्य न्यायाधीश के लिये भी मांगी। पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया है। 
लियाक़त अली
सब को हैरानी हो रही थी कि जेल में होने के बावजूद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान लोगों के बीच किस हद तक लोकप्रिय हैं। दरअसल मुझे सुबह की शिफ़्ट के लिये कंपनी टैक्सी सेवा उपलब्ध करवाती है। अधिकांश टैक्सी ड्राइवर पाकिस्तानी मूल के हैं। रास्ते भर वे नवाज़ शरीफ़ की बुराई और इमरान ख़ान की बढ़ाई करते हैं। मैं क्योंकि इमरान का प्रशंसक नहीं हूं… मुझे हैरानी अवश्य होती। इस बार तो सेना ने कमाल ही कर दिया। इमरान के राजनीतिक दल को हराने के लिये उसकी पार्टी का चुनाव चिन्ह ही ख़ारिज कर दिया। इमरान के हर उम्मीदवार को अलग-अलग चुनाव चिन्ह मिला था। 
इस त्यागपत्र और गिरफ़्तारी की घटना के बाद पाकिस्तान में हड़कंप मच गया है। जेल में बंद पूर्व प्रधान मंत्री  इमरान खान तो शुरू से ही पाकिस्तान चुनाव में धांधली का आरोप लगाते रहे हैं। और इस आत्मस्वीकृति के बाद तो ये आरोप सच भी लग रहे हैं। कमिश्नर लियाकत अली चिट्टा ने अपना इस्तीफा देते हुए कहा कि उन्होंने रावलपिंडी डिवीजन के लोगों के साथ अन्याय किया है। उन्होंने स्वीकार किया कि रावलपिंडी डिवीजन में “धांधली” हुई और इसके लिए वह जिम्मेदार हैं। उन्होंने दावा किया, ”हमने हारे हुए लोगों को 50,000 वोटों के अंतर से विजेता बना दिया.” और खुद को पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।
लियाकत अली ने कहा, ”मैं अपने डिवीजन के रिटर्निंग अधिकारियों से माफी मांगता हूं।” उन्होंने कहा कि उनके अधीनस्थ इस बात को लेकर रो रहे थे कि उन्हें क्या करने का निर्देश दिया गया था। चट्ठा ने दावा किया कि आज भी चुनाव कर्मचारी मतपत्रों पर फर्जी मोहर लगा रहे हैं। उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा, “हमने देश के साथ अन्याय किया… अब यह कह पाना कठिन है कि लियाकत अली चिट्टा के साथ फ़ौज कैसा बर्ताव करेगी। हो सकता है कि जल्दी ही हमें उनकी आत्महत्या का समाचार मिल जाए। 
पाकिस्तान के कार्यवाहक सूचना मंत्री अमीर मीर ने कहा कि यह न तो कोई रहस्योद्घाटन है और न ही अपराध की स्वीकारोक्ति, बल्कि यह चुनाव की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाने का दावा और आरोप है। उन्होंने कहा कि वह चट्टा के आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं। मीर ने कहा कि आत्महत्या की बात करने वाला व्यक्ति मनोरोगी ही हो सकता है, उन्होंने बताया कि चट्टा 13 मार्च को रिटायरमेंट की ओर बढ़ रहे थे। “अपने रिटायरमेंट से कुछ हफ्ते पहले वह राजनीतिक स्टंट कर रहे हैं। मुझे लगता है कि वह राजनीतिक करियर बनाना चाहते हैं।” मगर इसके अलावा वे कह भी क्या सकते हैं। 
जहां पाकिस्तान में मामला राष्ट्रीय चुनावों को लेकर था वहीं भारत वाला मामला तो चंडीगढ़ जैसी यूनियन टेरेटरी की नगर निगम के मेयर के चुनाव का है। सोचने की बात यह है कि इस चुनाव के जीतने या हारने से राष्ट्रीय स्तर की राजनीति पर क्या असर पड़ने वाला है। 
अनिल मसीह
इस विषय पर बात करने से पहले हमें यह जान लेना आवश्यक है कि आख़िर अनिल मसीह है कौन। 53 वर्ष के अनिल मसीह कुछ वर्ष पूर्व ही भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए थे। वे भाजपा के अलंपसंख्यक मोर्चे से जुड़े हैं। वर्ष 2021 में चंडीगढ़ नगर निगम के चुनाव के दौरान वार्ड-13 से भाजपा से उन्हें टिकट की उम्मीद थी, मगर ये हो न सका। अगले ही साल यानी 2022 में भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें चंडीगढ़ा नगर निगम के लिये मनोनीत किया था। मसीह चंड़ीगढ़ नगर निगम के उन नौ पार्षदों में से एक हैं जिन्हें मनोनीत किया गया है। 
अनिल मसीह चंडीगढ़ मेयर चुनाव में गड़बड़ी करने से पहले भी विवादों में रहे है। उन पर चर्च में अभद्र भाषा के प्रयोग का आरोप भी लगा था।  इससे पहले साल 2021 में ही भारतीय जनता पार्टी ने मसीह को अल्पसंख्यक मोर्चा का महासचिव नियुक्त कर दिया था। बाद में मेयर चुनाव के बाद विवादों में आने के कारण बीजेपी ने मसीह को पद से हटा दिया था।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि अनिल मसीह ने यह कुकृत्य किसके कहने पर किया? क्या उस पर किसी तरह का दबाव था या फिर वह अपनी ओर से अपने आकाओं को प्रसन्न करने का प्रयास कर रहा था? यह तो संभव नहीं कि उसे मालूम न हो कि उसकी कारगुज़ारी सीसीटीवी कैमरे में कैद हो रही है। फिर ऐसी क्या मजबूरी थी जो उसने आठ बेलट पेपरों पर निशान लगा कर उन्हें अवैध क़रार दे दिया। यह तो संभव नहीं कि उसे यह नहीं पता होगा कि आम आदमी पार्टी और कांग्रेस पार्टी आसमान सिर पर उठा लेंगे।… और फिर क्यों ना उठाएं?
30 जनवरी को चंडीगढ़ महापौर के चुनाव में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के साझा उम्मीदवार कुलदीप कुमार को कुल बीस वोट मिले थे। अनिल मसीह ने आठ वोटों को अमान्य करार दिया और भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी को विजयी घोषित कर दिया। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। मुख्य न्यायाधीष डी. वाई. चन्द्रचूड़ ने मामले की गंभीरता को समझते हुए कठोर निर्णय सुनाया। 
मुख्य न्यायाधीश ने आदेश सुनाते हुए कहा कि अनिल मसीह ने जानबूझकर आम आदमी पार्टी के पक्ष में पड़े आठ मतपत्रों से छेड़छाड़ करने की कोशिश की थी।  उन्होंने अपने आदेश में कहा, ‘यह स्पष्ट है कि अनिल मसीह ने पीठासीन अधिकारी के रूप में अपनी भूमिका और क्षमता में जो किया वह गंभीर कदाचार के दोषी हैं।’
बेंच ने अदालत के समक्ष गलत बयान देने के लिए मसीह के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 340 के तहत कार्रवाई भी शुरू की है।
अदालत ने पाया कि गलत बयान देने के लिए चुनाव अधिकारी के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 340 के तहत एक उपयुक्त मामला बनता है। रजिस्ट्रार ज्यूडिशियल को निर्देश दिया गया है कि वह अनिल मसीह को नोटिस जारी कर बताएं कि क्यों न उनके खिलाफ सीआरपीसी की धारा 340 के तहत कार्रवाई शुरू की जाए।
उच्चतम न्यायालय का कहना है कि पीठासीन अधिकारी का बयान दर्ज करने से पहले उसने मसीह को गंभीर परिणामों के बारे में नोटिस दिया था। अदालत ने कहा था कि मसीह इस अदालत के समक्ष दिए गए गलत बयान के लिए उत्तरदायी होंगे।
न्यायालय ने दो कृत्यों के लिए पीठासीन अधिकारी की निंदा की है। कोर्ट के अनुसार मसीह ने मेयर चुनाव के नतीजे को गैरकानूनी रूप से बदल दिया और 19 फरवरी को इस न्यायालय के सामने झूठा बयान दिया जिसके लिए उन्हें दोषी ठहराया जाना चाहिए।
पुरवाई के पाठक जानना चाहेंगे कि आख़िर धारा 340 होती क्या है और किस पर लगाई जाती है। तो हम बताना चाहेंगे कि धारा 340 के अंतर्गत किसी मामले के पक्ष सबूतों को बाधित करने या झूठा बयान देकर अदालत का समय बरबाद करना और न्याय में देरी करने पर, कार्रवाई होती है। इसके तहत अगर कोई सबूतों के साथ छेड़छाड़ करता है या नुकसान पहुंचाता है या फिर ग़लत बयान देकर न्याय की स्थिति को मोड़ने का प्रयास करता है; तो उसके तहत आरोपी पर सीआरपीसी की धारा 340 के तहत कार्रवाई की जाती है।
अदालत धारा 340 को उस व्यक्ति पर लगाती है जो कानूनी काम में बाधा डालने की कोशिश करता है। इसके चलते अदालत की अवमानना और न्याय में देरी को लेकर आरोपी पर ये धारा लगाई जाती है।
इस बात पर जांच बिठाई जानी चाहिये के अनिल मसीह के पीछे कौन है। उस शख़्सियत का नाम उजागर होना बहुत ज़रूरी है। हालांकि यह मामला बहुत स्थानीय किस्म का है मगर चुनावी वर्ष में कोई भी घटना कब कैसा रूप धारण करले कुछ पता नहीं चलता। भारतीय जनता पार्टी को एक राजनीतिक दल के तौर पर और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एकछत्र नेता के रूप में अपनी छवि को साफ़ सुथरा बनाए रखने का पूरा प्रयास करना चाहिये। जो भी लोग अनिल मसीह के पीछे हैं उनके कारनामों को आम जनता के सामने लाना बहुत ज़रूरी है। अच्छे लोकतंत्र में ऐसी घटनाओं के लिये कोई स्थान नहीं है।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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35 टिप्पणी

  1. लोकतंत्र के रक्स पर गहन विश्लेषण और वह भी बेहद सहज और सारगर्भित। एक शह होती है फितरत अब एक सरहद और वो भी एक अंग्रेज कसाई के हाथ रेडक्लिफ ?! जनाब ने खुद ही स्वीकार किया है कि कम समय मिला और सर्जन की जगह कसाई का काम हुआ।
    खैर बात फितरत की। अविकसित देशों में यह बहुतायत में होता है विकासशील में कम और विकसित देशों में कभी कभी।
    काश ये सियासत ऐसी भ्रष्टाचारी गाली से मुक्त हो जाए तो विकास का चंदन सभी के माथे लग जाए।तेजेंद्र शर्मा साहब ने बेहद सशक्त रूप से इस संवेदनशील मुद्दे को संपादकीय बना कर आम जन को इस से रू ब रू करवाया है।
    तेजेंद्र शर्मा जी और पुरवाई को साधुवाद।

  2. आज सम्पादकीय पढ़कर निदा फ़ाज़ली याद आ गए —
    “इंसान में हैवान यहाँ भी है, वहाँ भी
    अल्लाह निगहबान यहाँ भी है वहाँ भी ‘।
    दो देश और दो घटनाओं का सटीक विश्लेषण है।
    अपराध करने की मानसिकता और मजबूरी के कारणों की खोज होनी ही चाहिए ।
    Dr Prabha mishra

  3. चुनाव के मौसम में चुनावी सम्पादकीय की तीखी हवा, क्या कहें कुछ कहते नहीं बन रहा। सूर्य कांत जी चुनावी भ्रष्टाचार को विकसित और अविकसित देशों से जोड़ रहे हैं। शायद विकसित देश के डोनल्ड ट्रंप को शायद भूल रहे हैं।
    मनुष्य स्वभाव से भ्रष्टाचारी है। अगर ना होता तो महाभारत और रामायण अस्तित्व में ही ना होते।
    भ्रष्टाचार वेद के वरुण सूक्त से शूरू हुआ तो चलता ही जा
    रहा है।
    पाकिस्तान की राजनीति को भ्रष्टाचार नीति कहा जाये तो ठीक होगा। पाकिस्तान और सचरित्र??? दोनों कॉन्ट्रास्ट हैं।
    रही बात मेयर जैसे स्थानीय चुनाव की तो जाहिर है उसमें अमित शाह और मोदी शामिल नहीं होंगे। अन्यथा कर्नाटक, पंजाब, असम, हिमांचल आदि में परिणाम अलग होते पश्चिमी बंगाल और दिल्ली में भी।
    व्यक्तिगत रूप में कौन किस हद तक जा सकता है ये तो ईश्वर या वह व्यक्ति जान सकता है ।
    बधाई सत्य का आग्रह करते सम्पादकीय के लिए। एक बार पुनः अपनी तटस्था सिद्ध कर दी आपने।

    • शैली जी मैं भारत के किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़ा हूं। मेरे लिए भारत का हित सर्वोपरि है। आपकी सार्थक टिप्पणी के लिए आभार।

  4. राजनीति में इतनी गंदगी फैल चुकी है कि नई पीढ़ी पूरी तरह से disillusioned होती जा रही है। अपने नागरिक अधिकार का उपयोग नहीं करना चाहती।

  5. अनिल मसीह जैसे लोग न तो किसी पार्टी के होते हैं और न ही देश के। पैसा और पावर ही इनका धर्म और ईमान है। भाजपा धड़ल्ले से बिना जांच परख के भेड़ बकरियों की तरह पार्टी में किसी को भी शामिल कर रही है जो सही नहीं। संपादक महोदय को साधुवाद विषयों के चयन हेतु

  6. सादर नमस्कार सर हमेशा की तरह आजकी संपादकीय भी विचारणीय है। जो भी हुआ है.. वास्तवमें इसके पीछे किसका हाथ जानना आवश्यक है। किसकी छवि धूमिल हो रही है या क्या जा रहा है…. सबकुछ स्पष्ट होना भी आवश्यक है। साधुवाद सर

  7. बहुत सही, बोल्ड और‌ लोकतंत्र‌ के लिए खतरे की घंटी बजाने वाला एक जरूरी संपादकीय है यह भाई तेजेंद्र जी।‌ सही मायने में आंख खोल देने वाला एक तेजस्वी संपादकीय। आपकी हिम्मत और जज्बे को सलाम!

    स्नेह,
    प्रकाश मनु

  8. संपादक जी संतुलित और निष्पक्ष संपादकीय के लिए बधाई,
    निसंदेह प्रजातंत्र विश्व के लिए सर्वोत्तम शासन प्रणाली है परंतु मनुष्य के स्वभाव की दुर्बलताएं इस इस पर कई बार? भी लगा देती हैं। सच्चाई सामने आने में इतना समय लग जाता है कि वह महत्वहीन सी लगने लगती है। यह सभी परिवर्तन के संकेत होते है इस सतत परिवर्तनशील संसार में केवल परिवर्तन ही सतत स्थिर है।

  9. राजनीति में पहले लोग कुर्सी के लिए कुछ भी कर जाते थे आज पैसे के लिए कुछ भी कर सकते हैं कुछ लोग थाली का बैंगन होते हैं जिधर पलड़ा देख उधर लुढ़क जातें हैं ये तो पार्टियों को स्वयं मंथन करना होगा किसे शामिल किया जाए और किसे नहीं। हमेशा कि तरह आपका संपादकीय निष्पक्ष और बेबाक

  10. सही कहा आपने पाकिस्तान तो एक फेल कंट्री है उसका क्या ही कहना लेकिन चंडीगढ़ की घटना ज़रूर परेशान करने वाली है और इसे अच्छा हुआ कोर्ट ने दूध का दूध पानी का पानी कर दिया।

  11. पाकिस्तान में ऐसी धांधली हो तो आश्चर्य तो होता ही है , वहां की परिस्थितियों को देखते हुए अब हॅंसी आ जाती है। बहुत वक़्त लगेगा उन्हें सही राह पर आने में।
    बात भारत की हो तो आश्चर्य के साथ दुख भी होता है। राजनीति की गिरता स्तर एक सोचनीय विषय है।
    आपने संपादकीय में कुछ बिंदु ऐसे अंकित किए हैं, जो सोचने पर मजबूर करते हैं ।सीसीटीवी कैमरे की उपस्थिति से अनिल मसीह नावाक़िफ़ तो नहीं रहा होगा फिर
    क्या वजह रही होगी जो इतना बड़ा अपराध कर गया।
    राजनीति एक ऐसा खेल है ,जैसा सतह पर दिखाई देता है ,उसके बिल्कुल विपरीत अंदर की तहों में चल रहा होता है।
    कुछ दिन पहले एक वीडियो देखा था जिसमें एक व्यक्ति बता रहा था कि AAP पार्टी वालों ने अपने ही विधायकों की वफ़ादारी चैक करने के लिए अपने ही कुछ लोगों से फोन करवाये और बीजेपी का नाम लेकर उन्हें पैसों का लालच दिया। बाद में केजरीवाल जी इन्हीं फोन कॉल्स का हवाला देकर बीजेपी पर इल्ज़ाम लगाने लगे।
    अनिल मसीह की इस मूर्खतापूर्ण और ग़ैर ज़िम्मेदाराना हरक़त से बरबस ही विपक्षी दलों पर संदेह सा हो रहा है। हमें नहीं लगता अमित शाह और प्रधानमंत्री जैसे परिपक्व राजनेता ऐसी बेवक़ूफी करवायेंगे।
    बहरहाल, उनका सतर्क रहना भी ज़रूरी है। ऐसी घटनाओं से उनकी इमेज भी धूमिल होती है ।
    सामयिक, संतुलित और सटीक संपादकीय के लिए साधुवाद।

    • रचना आपने चंडीगढ़ वाली घटना को एक नये रूप में देखा है। धन्यवाद। आप हमेशा बढ़िया टिप्पणी देती हैं।

  12. Your Editorial of today gives two contrasting pictures relating to election officials.
    One belongs to Pakistan who resigned from his post admitting he had permitted/ dictated (to his staffers) to use unfair means in the counting of votes.
    The other belongs to India who cancels eight valid posts and declares the defeated candidate as the winner.
    One resigns on his own accord and is arrested while the other culprit is held guilty n punished by the Supreme Court.
    A thoroughly thought provoking text.
    Warm regards
    Deepak Sharma

  13. आपका हर संपादकीय समसामयिक रहता है, इस बार भी ऐसा ही हुआ। ‘चुनावी धांधली सीमा के आर पार’ संपादकीय में भारत और पाकिस्तान में हुई चुनाव में धांधली पर प्रकाश डाला है।
    दो वायरल वीडियो जिनमें एक पाकिस्तान तथा एक भारत से है, की जानकारी देते हुए बताया है कि पाकिस्तान में रावलपिंडी के कमिश्नर लियाकत अली चट्टा का ने पाकिस्तानी चुनावों में धांधली की जिम्मेदारी लेते अपनी आत्मा की पुकार पर उन्होंने अपना अपराध स्वीकार करते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने कहा कि इस धांधली में मुख्य चुनाव आयुक्त और मुख्य न्यायाधीश को भी शामिल हैं। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि उन्हें इस अपराध के लिये चौक पर सजा ए मौत मिलनी चाहिए। साथ ही उन्होंने यही सज़ा मुख्य चुनाव आयुक्त एवं मुख्य न्यायाधीश के लिये भी मांगी। पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया है।
    दूसरे वीडियो में भारत के चंडीगढ़ में मेयर के चुनाव में रिटर्निंग ऑफ़ीसर अनिल मसीह गड़बड़ी करते दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के साझा उम्मीदवार को हरा कर भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार को विजयी घोषित किया था।
    सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें दोषी पाया है।
    लेकिन मेरा मानना है कि कोई भी अधिकारी स्वतः ऐसा नहीं करेगा। ऐसा करने के लिए उसे किसने बाध्य किया। इसका पता लगाना भी बेहद आवश्यक है।

    दरअसल राजनीति इतनी दूषित हो गई है कि किसी पर लांछन लगाना आज बेहद आसान हो गया है पर सच्चाई पता लगाना उससे भी मुश्किल।

    जहाँ तक भ्रष्टाचार की बात है तो कोई देश इससे अछूता नहीं है बस मात्रा का फर्क है।

  14. भारत और पाकिस्तान दोनों देशों की चुनावी धांधली का सटीक विश्लेषण, अच्छे लोकतंत्र के सरोकार की चिंता , संदर्भित प्रश्नों को मुखरता से उठाना –निष्पक्ष एवं तटस्थ सम्पादकीय के लिए अशेष बधाई एवं शुभेच्छा

  15. तेजेन्द्र भाई, आपके सम्पादकीय में जिन दो घटनाओं का वर्णन आप ने किया है वो कोई नई बात नहीं है। ऐसी घटनायें तो आये दिन होती रहती हैं। इनका मूल कारण क्या है, थोड़ा इस पर भी विचार करलें। अगस्त 1947 में जब भारत और पाकिस्तान को अँग्रेज़ों से आज़ादी मिली थौ या फिर Transfer of Power हुआ था उस समय के नेताओं का फ़र्ज़ बनता था कि देश की जनता के दिलों में “कैसे देश को आगे बढ़ाना है” की भावना को जागृत करें, ताकि ग़ुलामी की सोच से छुटकारा मिले और देश को आगे लेजाने की प्रेरणा मिले। लेकिन हुआ इसका बिल्कुल उलटा। उस समय के नेताओं ने जो देश की जनता के चरित्र को जिस दिशा में ढाला उसका परिणाम आज 77 साल बाद आपके सामने है। ज़रा जापान और जर्मनी को भी देखो। द्वितीय विश्वयुद्ध में बुरी तरह से हारने के बाद भी वो आज कहाँ हैं, यह कोई रहस्य की बात नहीं है। इसका मूल कारण political leadership थी जिस ने पहले देश के बारे में सोचा। अभी भी देर नहीं हुई है। भारत की जनता बहुत भाग्यशाली हैं कि भारत को तो क ऐसा मसीहा मिल गया है जिस ने देश के बारे में सोचा तो है। पाकिस्तान में आगे क्या होगा वो तो समय बतायेगा किन्तु अभी भी हालात अच्छे नज़र नहीं आते।

    • भाई विजय विक्रान्त जी, आपने संपादकीय को नये संदर्भ दिये हैं। हार्दिक आभार।

  16. आदरणीय तेजेंद्र जी! बहुत ही ताजा तरीन विषय है इस संपादकीय का भी जैसा कि हर संपादकीय का हमेशा रहता है।
    वैसे तो दोनों ही खबरें बहुत महत्वपूर्ण हैं। हमने चंडीगढ़ की खबर पहले पढ़ी और बहुत अच्छा लगा ,वह इसलिए कि कहीं तो ईमानदारी अब भी जिंदा है।पर पाकिस्तान के रावलपिंडी के कमिश्नर लियाकत अली चट्टा के बारे में जानकार पहले तो आश्चर्य हुआ पर फिर अच्छा भी लगा कि बारूद के ढेर पर बैठकर भी कोई सत्य को अहमियत देते हुए उसकी वकालत करने की ताकत रखता है। यह उसके लिए बिल्कुल भी सरल नहीं रहा होगा। इमरान की पार्टी को हराने के लिए चुनाव चिन्ह को ही खारिज करने को धांधली नहीं कह सकते, बल्कि यह जानबूझकर की जा रही तानाशाही ही महसूस हुई।लियाकत अली का क्या होगा सोच कर रूह भी काँप जाती है।
    तख्त पर बैठे हुए शहंशाहों के लिए सच को झूठा साबित करने में कोई कठिनाई नहीं होती। और उस सच को स्वीकार करना आवाम की मजबूरी है पता नहीं क्यों उसे अपनी ताकत का अंदाजा नहीं हो पाता।
    चंडीगढ़ का मामला यद्यपि राष्ट्रीय स्तर का नहीं था पर नगर निगम के मेयर का तो था! सोचने वाली बात तो यह भी है कि जहाँ पंचायत के चुनावों में भी राज्य स्तरीय दखल प्रत्यक्ष नजर आता है तो मुकाबले में नगर निगम बहुत महत्व रखता है। ऊपर जाने के लिए सीढ़ी का हर पायदान महत्वपूर्ण होता है और फिर ऐसे लोगों के लिए तो न्यायालय भी उन्हें अपने घर की मुर्गी महसूस होती है; पर हर दिन एक सा नहीं होता सुनार की सौ पर कभी-कभी लोहार की एक भारी पड़ जाती है। यह भी काबिले गौर है,जैसा कि आपने भी कहा कि अनिल मसीह ने इतनी हिम्मत किसके बल से प्राप्त की होगी? उसके सिर पर किसका हाथ है यह मालूम करना भी मौजूदा सरकार के लिए बहुत जरूरी है।
    जब छोटे चुनावों में इस तरह राजनीति चलती है तो बड़े चुनावों में राजनीति के काले-पीले का तो अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता।
    धारा 340 को आपने बहुत अच्छे से समझाया।
    राजनीति के पीछे छिपे हुए भ्रष्टाचार को सभी लोग समझते हैं लेकिन मजबूरी की अपनी कहानी होती है। जिन लोगों को हर दिन खाने पीने की जद्दोजहद करनी पड़ती है उन्हें अगर थोड़ा सा पैसा मिल जाता है तो चुनाव कौन जीता है इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता एक दिन का उनका इंतजाम हो जाता है यह उनके लिए मायने रखता है।
    सबसे ज्यादा मार मध्यमवर्गीय लोगों पर रहती है। वह सब समझता है पर कुछ करना इसलिए नहीं चाहता कि उसकी अपनी परेशानियाँ भी कुछ कम नहीं है और सरकार के पास भी लूटने के लिए मध्यम वर्ग ही है। वह अपना चैन खोना नहीं चाहता। सभी सोचते हैं लड़े से टले भले।
    राजनीतिक शतरंज की चाल में सब अपना- अपना मोहरा फिट करना चाहते हैं और हित साधने के सिवा कुछ उन्हें दिखाई नहीं देता ।चुनाव के समय में अपने समर्थन के््
    जनता को दिखाए जाने वाले प्रलोभनों के खाके और मुद्दे सुरक्षित रखते हैं।अपने हित की दृष्टि से।
    पार्टी सिर्फ पहचान है और नियत सब की खोटी है ।
    आपके संपादकीय के लिये क्या ही कहें। यहाँ भी वही सचबयानी है जैसे कि इस बार चंडीगढ़ और पाकिस्तान में नज़र आई।
    आपकी बेबाक संपादकीय को सलाम

    • नीलिमा जी आपने ख़ासी विस्तृत टिप्पणी भेजें है। आपकी पढ़ने की भूख अद्भुत है

  17. आदरणीय तेजेंद्र जी ,हर बार की तरह संपादकीय में चुनावी राजनीति पर विस्तृत विश्लेषण पढ़ने को मिला ।दोनों देशों की चुनावी राजनीतिक गतिविधियाँ विचलित करती हैं । लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप परिवर्तित हो रहा है । बहुत बढ़िया ज्ञानवर्धक आलेख ।

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