1
हम कविताएँ नहीं पढ़ते
बल्कि एक ऐसे आदमी को पढ़ते हैं
जो व्यथित होकर
सुख से जीता है..!

हम उन व्यथाओं को पढ़ते हैं
जो कविताएँ बन जाती है।

दुःख को काम्य बनाने का एक उपक्रम है
कविता

कवि आँखों में अंधेरा भर कर भी
चन्द्रमा की रौशनी पर प्यार लुटाता है।

मैं ऐसे एक आदमी को जानता हूँ
जो मेरे मन में रहता है..!.

2
इस तरह वो मुझसे रुठ गया
जैसे बरसात रूठती है किसान से..!

मैं उसको मनाने के खातिर सूरज से अड़ता हूँ
कभी हवाओं से भीड़ जाता हूँ

उसे यकीन दिलाता हूँ
खेत में बोये गए अनाज के दाने सबसे मीठे दाने हैं
बस,एक बार तू बरस जा…अपने सारे पानी के साथ..!

देख लेना,आने वाली फसल
हमारे प्रेम और मित्रता की गवाह होगी
जिसे कोई बंजरपन झुठला नहीँ सकेगा!

3
गलतियां स्वीकार की जाती है
दूसरों पर थोपी नहीं जाती।
जिन्होंने अपनी गलतियां स्वीकार की,
सुखों ने उनका साथ दिया
और जिन्होंने अपनी गलतियां हमेशा दूसरों पर थोपी
वे एक दुःख से दूसरे दुःख के बीच
लुढ़कते गए,एक गोलाकार पत्थर की तरह!
4
हालांकि घास और आदमी का कोई सम्बन्ध नहीं था अब तक..
लेकिन जब से जँगल सिमटने लगे
शहर बढ़ने लगे
हर गाँव चीख़-चीख़ कर कहने लगा
मेरी हरियाली लौटाओ
और कुछ नहीं तो
घास ही लौटा दो..!
तब से आदमी घास ढूँढने में लगा है..!
5
किसी नदी या तालाब में
कूदकर जान देने वाली
स्त्री,
यदि बचा ली जाती है तो
वह मानसिक रूप से कमजोर बताई जाती है
और
यदि नहीं बच पाती है तो
चरित्र-हीन समझकर
स्त्री को भुला दिया जाता है।..!
ये समाज,
स्त्रियों के पक्ष में कभी खड़ा नहीं होता
चाहे वो जिए या मरे!

2 टिप्पणी

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.