हिन्दुस्तान में कुछ सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है क्रिकेट के साथ-साथ तो वह है सिनेमा। ‘दादा साहब फाल्के’ ही वे महनीय खोजकर्ता थे जिन्होंने भारत में इस माध्यम की खोज की या कहें बाहर से लेकर आए। वर्तमान में यह फिल्म उद्योग दुनिया का सबसे बड़ा उद्योग बनकर सामने आया है और इसने लाखों लोगों को रोज़गार तो दिया ही साथ ही उनकी रचनात्मकता एवं छुपी हुई प्रतिभा को भी बाहर निकाला। साल 1913 में ‘राजा हरिश्चन्द्र’ से शुरू हुआ यह सफ़र मूक से सवाक और ब्लैक एंड वाईट से रंगीन तो अब मोबाइल और ओटीटी तक आ चुका है। आज से कुछ साल पीछे ही चले जाएं तो किसने सोचा था कि हम लोग घर बैठे बड़े पर्दे पर रिलीज होने वाली फिल्मों को सीधा अपने घरों में, बिस्तर में बैठे देख सकेंगे। फिल्म उद्योग हर राज्य में अपने-अपने स्तर पर गतिमान है कहीं इसकी गति सुस्त तो कहीं चुस्त दिखाई देती है। लगभग हर प्रचलित भाषा में मौजूद सिनेमा का गढ़ तो माया नगरी मुम्बई ही है। जहाँ से हर कोई अपने पंखों को परवाज देना चाहता है और अपनी उड़ान को आसमान की ऊँचाइयों से भी आगे ले जाना चाहता है। ऐसे ही कई फिल्मकार भी हुए हैं तो अभिनेता, अभिनेत्री भी जिन्होंने हमें हर दौर में भांति-भांति के रसों का परिपाक करवाया है और हम उसे देखते हुए रोये, खिलखिलाए भी हैं। 
हिंदी सिनेमा के जनक या कहें पितामह ‘दादा साहब फाल्के’ का “जन्म 30 अप्रैल 1870 में हुआ था और इनका फ़िल्मी योगदान देखें तो इन्होंने अपने करियर में 95 बड़ी  फ़िल्में तथा करीबन 27 फ़िल्मों को लघु रूप में यानी शार्ट फिल्मों का निर्माण किया।”1 उस समय भारत में फिल्म बनाने के संसाधन मौजूद नहीं थे तो इन्होंने संसाधन विदेशों से मंगवाए। मीडिया रिपोर्ट्स और फिल्म इतिहासकारों की माने तो इनके द्वारा बनाई गई “पहली फिल्म राजा हरिश्चन्द्र को बनाने में करीबन 7 महीने का समय लगा था। यह फिल्म 40 मिनट की थी और मूक थी तथा इसके तीन भाषाओं में शीर्षक यानी के टाइटल रखे गए वे भाषाएँ थीं हिंदी, इंग्लिश, मराठी।”2 हालांकि अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत में फाल्के साहब ने “5 पौंड में एक सस्ता कैमरा खरीदा और शहर के सभी सिनेमाघरों में जाकर फिल्मों का अध्ययन किया। उसके बाद दिन में बीस घंटे लगकर उसके साथ प्रयोग किए। इसका प्रभाव उनके शरीर पर भी पड़ा और एक आँख खराब हो गई। उस समय उनकी पत्नी ने अपने जेवर तक गिरवी रख दिए थे। 40 साल बाद जब यही काम ‘सत्यजीत रे’ की पत्नी ने किया था जब वे फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ बना रहे थे।”3 इस फिल्म के बनने के कई वर्ष बाद सिनेमा ने बोलना शुरू किया और पहली सवाक फिल्म आई ‘आलम आरा’। 14 मार्च 1931 को गूंगी फिल्मों ने तुतलाना शुरू कर दिया था और आज वे इस कदर धूम मचा रही हैं कि जितने में एक मंगल यान भेजा जा सकता है उतना तो अब इनका बजट होने लगा है यानी इन्हें बनाने का खर्चा। हिंदी सिनेमा को तुतलाना यानी बोलना सिखाया ‘आर्देशिर ईरानी’ ने। कहा जाता है कि फाल्के साहब ने भी कई प्रयास किए ताकि उनका सिनेमाई बच्चा बोलना सीख सके लेकिन कहते हैं न कि पिता भले ही शिशु के जन्म का कारण हो सकता है लेकिन उसका विकास और उसके अधिकरण की प्रक्रिया एवं भूमिका उसकी माँ ही निभाती है। तो इस तरह आर्देशिर ईरानी को अगर मैं भारतीय सिनेमा (जिसे हिंदी सिनेमा भी कहते हैं) की माँ कहूँ तो ऐसा कहना कुछ गलत नहीं होगा। बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में प्रसिद्ध समीक्षक ‘फ़िरोज रंगूनवाना’ ने जब 50 के दशक में ‘आलम आरा’ के निर्देशक से मुलाक़ात की तो उन्होंने उस मुलाक़ात के बारे में जिक्र इस इंटरव्यू के दौरान किया और कहा कि – “मैं जब उनसे मिला तो वो खासे उम्रदराज हो चुके थे। उन्होंने मुझे बताया कि उस दौर तक भारत में लोगों की फिल्मों में दिलचस्पी कम होने लगी थी। हॉलीवुड की कई टॉकी (बोलती फ़िल्में) भारत आने लगी थीं। ऐसे में आर्देशिर को लगा कि भारत में भी ऐसी फ़िल्में बनाना जरूरी है।”
हिंदी सिनेमा का भविष्य वाया ओटीटी, मोबाइल सिनेमा! 1
साभार : News18
फाल्के साहब और आर्देशिर जैसे महत्वाकांक्षी व्यक्तियों के बदौलत यह आज सम्भव: हो पाया है कि सिनेमा नित नई ऊँचाइयाँ छू रहा है, नई और सोच बदलने वाले किस्से, कहानियों को गढ़कर हमारे सामने मनोरंजन के मसाले के रूप में पेश कर रहा है। जब आर्देशिर जैसे लोग सिनेमा बना रहे थे तो उस तकनीक में डबिंग जैसी नाम कोई चीज नहीं हुआ करती थी। यह तो था हिंदी सिनेमा का अतीत लेकिन इसके बाद जैसे-जैसे समय बदला यह रंगीन होना शुरू हुआ और फिर इसी तरह टीवी के माध्यम से हमारे घरों में, हमारे बिस्तर तक में दस्तक देने लगा। अब इसकी घुसपैठ या कहें पकड़ इतनी मजबूत हो चुकी है कि यह राह चलते भी फिल्माया, देखा, एडिट किया जाने लगा है। हालांकि  राह चलते फिल्माने के मामले में यह उतना विकसित नहीं हो पाया है जितना देखने और छोटी-मोटी एडिटिंग के मामले में विकसित हुआ है। 

 

प्रकृति में परिवर्तन एक शाश्वत नियम है और इसी परिवर्तन के परिणाम स्वरूप जब से कोरोना महामारी फैली है तो इसने सिनेमा के बड़े पर्दे को ही हमारे घरों तक आसानी से विभिन्न ओटीटी प्लेटफार्म के रूप में पेश किया है। इनमें ‘हंगामा’, ‘यूट्यूब’, ‘जी5’, ‘जियो सिनेमा’, ‘अमेजन प्राइम’, ‘नेटफ्लिक्स’, ‘हॉट स्टार’ आदि प्रमुख हैं। गूगल ने साल 2016 में एक शोध किया था उस शोध के मुताबिक़ हर दस में से एक भारतीय सिनेमा के बारे में आजकल हर जानकारी मोबाइल पर लेने लगा है और इस शोध को माने तो केवल जानकारी ही नहीं बल्कि उस जानकारी तथा उसमें निहित तकनीक को जानकार वर्तमान में कई लोग सक्रिय हुए हैं और उन्होंने सिनेमा जैसी कैमरे से अर्जित की जाने वाली वस्तु को अब मोबाइल और ऐसे ही छोटे गैजेट्स आदि माध्यमों और उपकरणों का सहारा लेना शुरू कर दिया है। 
हर साल अमेजन और फ्लिपकार्ट आदि पर चलने वाली मोबाइल आदि की सेल और .मोबाइल की खपत भी हिन्दुस्तान में बढ़ी है। “साल 2019 में हुई एक सेल में अकेले अमेजन ने मात्र छतीस घंटे में 750 करोड़ रुपए के लगभग मात्र फोन बेचे थे।”5 इसके अलावा बाहुबली जैसी फ़िल्में विश्व स्तर पर हजारों करोड़ का मुनाफ़ा कमा रही हैं लेकिन मात्र इन दो चीजों से देश की जीडीपी और आर्थिक मंदी या तेजी तो तय नहीं हो सकती। क्योंकि आज भी हजारों लोग ऐसे हैं जिन्हें साफ़ कपड़े, पानी, छत और भोजन दोनों समय तक का मुहैया नहीं हो पाता। खैर ये एक अलग विषय है जिस पर चर्चा होती रहती है और होती रहनी चाहिए। लेकिन इस तरह की भारी मात्रा में सेल होना और उसमें से चुनिंदा लोगों का ही सही एक बेहतरीन निर्देशक, एक्टर , कैमरामैन आदि बनकर आना भी सुखद संकेत देता है।   
मोबाइल सिनेमा की परिभाषा तो व्यवस्थित एवं लिखित रूप में सम्भवत: किसी ने नहीं दी है अभी तक। लेकिन मेरे अनुसार या कहूँ मोबाइल सिनेमा क्या है तो उसको परिभाषित करते हुए मैं कहना चाहूँगा कि – मोबाइल सिनेमा वह सिनेमा है जो समग्र रूप से मोबाइल में फिल्मांकित किया जाता है और उसी में विभिन्न सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करते हुए उसकी सफल प्रक्रिया सम्पन्न की जाती है व तत्पश्चात उसे कहीं प्रदर्शित किया जाता है वह मोबाइल सिनेमा कहलाता है।
फिल्म निर्देशक एवं लेखक ‘मनीष उप्पल’ के मतानुसार मोबाइल सिनेमा बड़े-बड़े कैमरे का छोटा बच्चा है। एक बालक है जिसके माध्यम से अच्छी-अच्छी फ़िल्में बनाई जा सकती हैं। इसकी परिभाषा कहूँ तो यही है कि जिसमें ज्यादा बजट की जरूरत नहीं होती। बड़े-बड़े डी० ओ० पी नहीं लेने पड़ते। आप खुद से उसे ऑपरेट/संचालित कर सकते हैं। छोटे-छोटे उपकरणों के माध्यम से और उसे हाई डेफिनेशन तक ले जाया जा सकता है। और आईफोन से अगर शूट किया जाता है तो उसे निसंदेह सिनेमाघरों में भी प्रदर्शित किया जा सकता है। आईफोन की खासियत है कि उसके पिक्सल फटते नहीं है जितना मर्जी बड़ा स्क्रीन हो जाए। गिम्बल, ट्रायपॉड, और छोटे-छोटे लेंस आदि का सहारा लिया जा सकता है। यह बहुत ज्यादा सुविधाजनक है। चीजों को संचालित करने में बड़े कैमरे के मुकाबले। क्योंकि बड़े कैमरे को संचालित करने के लिए ज्ञान भी उसी स्तर का होना जरूरी है। जबकि फोन को व्यक्ति ज्यादा अच्छे से समझता है। इसके अलावा मोबाइल के माध्यम से ऐसे स्थानों पर जाकर भी फिल्मांकन करना संभव है जहाँ अनुमति नहीं होती है शूट करने की या जहाँ बहुत ज्यादा रुपए देने पड़ते हैं। वहाँ भी गुपचुप तरीके से शूट किया जा सकता है। ज्यादा तामझाम की आवश्यकता नहीं होती। कुलमिलाकर कहा जा सकता है कि यह एक छोटा माध्यम है बड़ी चीजों को प्रदर्शित करने का। 
विश्व भर के परिदृश्य में हालांकि बड़ी फिल्में भी पर्दे पर आ रही हैं। लेकिन हिंदी सिनेमा के परिप्रेक्ष्य में अभी यह चमत्कार नहीं हुआ है। उसमें अभी ज्यादातर छोटी-छोटी फ़िल्में ही आ रही हैं जो विभिन्न फिल्म समारोहों में भी सराही जा रही हैं ऐसे ही मनीष उप्पल की कई फ़िल्में हैं जो मोबाइल सिनेमा का उत्कृष्ट नमूना है और उन फिल्मों ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पचास से ज्यादा पुरूस्कार हासिल किए हैं। फिल्म समारोहों के माध्यम से यह सिनेमा की एक नई कैटेगरी उभर कर सामने आई है। छोटी फिल्मों को हालांकि मोबाइल में ही एडिट किया जा सकता है लेकिन बड़ी फिल्मों को एडिट करने के लिए कम्प्यूटर आदि का सहारा लेना ही पड़ता है। ऐसा ही कुछ दिल्ली के एक प्रसिद्ध यूट्यूबर ‘विनय शर्मा’ का भी मानना है। विनय शर्मा का चैनल ‘विनय शर्मा वाइन’ नाम से फेसबुक और यूट्यूब पर खूब प्रचलित है। वे बताते हैं कि मोबाइल में अभी कुछ सीमितताएँ हैं इसलिए ज्यादा बड़ी फ़ाइल उसमें एडिट अभी करना मुश्किल है। लेकिन मोबाइल सिनेमा दो तरीके से देखा जाना चाहिए एक तो बतौर दर्शक और दूसरा बतौर क्रियेटर यानी निर्माता। बतौर दर्शक मोबाइल ने चीजों को आसान बनाया है। पहले जो एक फ्री स्पेस चाहिए होता था कुछ भी देखने के लिए मसलन टीवी, लैपटॉप, कम्प्यूटर आदि। अब मोबाइल सिनेमा से चीजें आसान हुई हैं। और चलते-फिरते कहीं भी देखी जा सकती हैं। लेकिन बतौर क्रियेटर या निर्माता, निर्देशक भी आसान हुआ है कहीं न कहीं। इसके लिए पहले किसी प्लेटफार्म की जरूरत होती थी जैसे कोई चैनल, सिनेमाहॉल आदि और इसके लिए बजट/पैसा  भी चाहिए तो ऐसे में मोबाइल सिनेमा ने उन चीजों को आसान बनाया है। यह सिनेमा दर्शाने का एक नया माध्यम है। 
ऐसा ही कुछ फिल्म लेखक और निर्देशक ‘गौरव चौधरी’ का मानना है कि मोबाइल का स्वयं का अर्थ है चलता-फिरता। जिसे कहीं भी लाया ले जाया जा सके बड़ी आसानी से। और आज के समय में जब अमूमन हर आदमी के पास अच्छी कैमरा क्वालिटी के मोबाइल हैं जैसे सैमसंग, आईफोन या रेडमी आदि। इनके बेहतर क्वालिटी वाले फोन और उन मोबाइल्स के कैमरा द्वारा बनाई गई फिल्मों को हम मोबाइल सिनेमा कहते हैं। जिसके अंदर ज्यादा बड़े आकार के कैमरे इस्तेमाल न किए जाएं। इनमें जैसे रेड (Red) कैमरे का इस्तेमाल न करना, ब्लैक मैजिक, एरे अलेक्सिया कैमरे का इस्तेमाल न करना। और आज के समय में मोबाइल कम्पनियां सोनी, कार्ल जे एस आदि लैंस का इस्तेमाल कर रहे हैं तो उनकी प्रोसेसिंग चिप बहुत अच्छी हो गई है। मोबाइल कैमरा पर फिल्म बनाने का तात्पर्य यह नहीं की हमें सिर्फ अच्छा मोबाइल कैमरा ही चाहिए होगा। वह फिर पूरे अर्थों में सिनेमा नहीं होगा। पूरे अर्थों से मतलब दृश्य और श्रव्य दोनों तकनीक का बेहतर अनुभव देना। किसी भी फुटेज को अनुभवहीन व्यक्ति द्वारा बनाए गए फुटेज सिनेमा नहीं है। क्योंकि सिनेमा की विशेषता है कि जब तक वो आपकी इन्द्रियों को प्रभावित न करे किसी भी रूप में तो वह सिनेमा नहीं है। जो भी चलायमान उपकरण हैं जिनको हम बहुत आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं और उससे एक दृश्य और श्रव्य रूपित साधनों का इस्तेमाल करते हुए एक अच्छा चित्रपट बना सकें यही इसकी परिभाषा गौरव चौधरी मानते हैं।  इसके अलावा पंजाब के प्रतिष्ठित लेखक, निर्देशक ‘ओजस्वी शर्मा’ मोबाइल सिनेमा की महत्ता को स्वीकार तो करते हैं लेकिन वे कहते हैं कि एक्शन सीन जैसे कई ऐसे शॉट्स हैं जो मोबाइल कैमरे के माध्यम से उतने सम्भव नहीं हैं या अभी उनकी तकनीक उतनी विकसित नहीं हुई है। हाँ छोटी फ़िल्में बनाई जा सकती हैं। हालांकि विदेशों में बड़ी फ़िल्में भी बनी हैं और सिनेमाघरों में देखी गई हैं, दर्शकों ने सराहा भी हैं लेकिन भारत जैसे देश में अभी मोबाइल के माध्यम से एक बड़ी फिल्म आने में और उसमें भी एक्शन वगैरह सारे मसाले उसी तरीके से फिल्माने में समय लगेगा।    
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि हिंदी सिनेमा में हो रहा यह नया प्रयोग और कोरोना काल में इस क्षेत्र में नए प्रयोगों की तरफ़ बढ़ रहे हमारे सिने कलाकार, निर्माता, निर्देशकों की यह बहुत सराहनीय पहल है। महामारियां तो आती जाती ही रहती हैं जैसे ही इस महामारी का प्रवाह थमेगा उसके बाद निसंदेह थोड़े समयांतराल पर ही कुछ बड़ी फ़िल्में भी देखने को हमें मिल सकती हैं जिसमें पूरी फिल्म मोबाइल से न सही लेकिन कुछ अंश तो मोबाइल से शूट किए ही जा रहे होंगे। हिंदी सिनेमा का भविष्य इसके जन्मकाल से ही हमेशा उज्ज्वल रहा है। सिनेमा चिरंजीवी भव:!  
सन्दर्भ ग्रंथ सूची :- 
  1. मेक हिंदी डॉट कॉम (भारत की सबसे पहली फिल्म कौन सी थी)
  2. वही 
  3. दादा साहब फाल्के विकिपीडिया
  4. 14 मार्च 2015 बीबीसी हिंदी रिपोर्ट 
  5. द लल्लन टॉप डॉट कॉम (क्या सिनेमा और मोबाइल फोन की कमाई तय करेगी कि देश में मंदी है या नहीं? – अविनाश)

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