‘एक शाम और…’
इस जग मधुशाला में चलते हैं दौर |
एक शाम और ढली, एक शाम और ||
युग-युग से बुझी नहीं प्राणों की प्यास |
हर प्याला झाँक चुका, सागर की आस ||
डूब-डूब जाने को भटका हर ठौर |
एक शाम और ढली, एक शाम और||
व्यूहबद्ध थे हर एक द्वार |
प्राणों का अभिमन्यु कर आया पार ||
एक द्वार और बचा, एक द्वार और |
एक शाम और ढली, एक शाम और ||
एक-एक पल-प्रतिपल है चुकती जाती |
प्राणों की संवाहक प्राणों की थाती ||
एक सांस और बची, एक सांस और |
एक शाम और ढली, एक शाम और ||
इस जीवन हाला के गिने-चुने प्याले |
हर मयकश दीवाना जितने जो पाले ||
एक पैग और ढला, बीत चला दौर |
एक शाम और ढली, एक शाम और ||


अशोक जी आपकी ग़ज़ल उम्दा है
प्रचलित शिल्प पर नया सोच ।वाह वाह
Dr Prabha mishra
अच्छा गीत अशोक जी!
बधाइयाँ आपको।
मेरे गीत पर अपनी राय देने वाले साहित्य मनीषियों को धन्यवाद। इस अंक में प्रकाशित सभी रचनाएं कहानी, कविता, ग़ज़ल, गीत और जाने – माने लोकप्रिय साहित्यकार एवं पत्रिका के संपादक आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी ने एक जवलंत विषय वस्तु को अपनी संपादकीय का विषय बनाया है। कुल मिलाकर पूरा अंक हमेशा की तरह पठनीय एवं संग्रहणीय दोनों है।
बेहद खूबसूरत अंदाज़ ए बयां।