Wednesday, February 11, 2026
होमग़ज़ल एवं गीतअशोक कुमार मिश्र का गीत - एक शाम और

अशोक कुमार मिश्र का गीत – एक शाम और

‘एक शाम और…’
इस जग मधुशाला में चलते हैं दौर |
एक शाम और ढली, एक शाम और ||
युग-युग से बुझी नहीं प्राणों की प्यास |
हर प्याला झाँक चुका, सागर की आस ||
डूब-डूब जाने को भटका हर ठौर |
एक शाम और ढली, एक शाम और||
व्यूहबद्ध थे हर एक द्वार |
प्राणों का अभिमन्यु कर आया पार ||
एक द्वार और बचा, एक द्वार और |
एक शाम और ढली, एक शाम और ||
एक-एक पल-प्रतिपल है चुकती जाती |
प्राणों की  संवाहक  प्राणों  की  थाती ||
एक सांस और बची, एक सांस और |
एक शाम और ढली, एक शाम और ||
इस जीवन हाला के गिने-चुने प्याले |
हर मयकश दीवाना जितने जो पाले ||
एक पैग और ढला, बीत चला दौर |
एक शाम और ढली, एक शाम और ||

अशोक कुमार मिश्र
संपर्क – [email protected]
RELATED ARTICLES

4 टिप्पणी

  1. मेरे गीत पर अपनी राय देने वाले साहित्य मनीषियों को धन्यवाद। इस अंक में प्रकाशित सभी रचनाएं कहानी, कविता, ग़ज़ल, गीत और जाने – माने लोकप्रिय साहित्यकार एवं पत्रिका के संपादक आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी ने एक जवलंत विषय वस्तु को अपनी संपादकीय का विषय बनाया है। कुल मिलाकर पूरा अंक हमेशा की तरह पठनीय एवं संग्रहणीय दोनों है।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest