कभी दुर्बल बनाता, कभी संबल होता है
प्रेम लक्ष्मी जी की तरह चंचल होता है
स्याह लग जाता है स्वार्थ में घुल कर
निःस्वार्थ प्रेम से मन उज्ज्वल होता है
समस्या संकेत है प्रेम के अभाव का
प्रेम तो हर समस्या का हल होता है
जोड़-तोड़ का गणित हटा कर देखो
समर्पण का भी अपना बल होता है
छल की चाल ले जाये भ्रम की नगरी
प्रेम का स्वभाव तो निश्छल होता है


बहुत ही अच्छी ग़ज़ल है आपकी अशोक जी!सीधी सिंपल और प्रभावशाली।
प्रेम को लेकर आपके सभी शेर बहुत अच्छे हैं अशोक जी!