तुम जो गाओ वह दुहराऊँ, ऐसा थोड़ी होगा जी।
‘कोरस’ का गायक बन जाऊँ, ऐसा थोड़ी होगा जी।
ढोलक, तबला, हारमोनियम सभी तुम्हारे नाम हुए;
मैं बैठा झुनझुना बजाऊँ, ऐसा थोड़ी होगा जी।
लाख बदल लो भेस, मगर फ़ितरत तो वही रहेगी न,
चूहा बोले म्याऊँ-म्याऊँ, ऐसा थोड़ी होगा जी।
संसद में टेबल ठोको, जो चाहे पास करा लो बिल;
लोकतंत्र से ‘लोक’ उड़ाऊँ, ऐसा थोड़ी होगा जी।
अगर प्यार पर मेरे, नहीं भरोसा, तो फिर जाने दो;
ताजमहल मैं भी बनवाऊँ, ऐसा थोड़ी होगा जी।
थोड़ा इनका, थोड़ा उनका, थोड़ा-थोड़ा सबका हूँ;
पूरा ही तेरा कहलाऊँ, ऐसा थोड़ी होगा जी।
औरों के हिस्से में भर दूँ, घना अँधेरा रातों का,
चाँद तोड़कर तुमको लाऊँ, ऐसा थोड़ी होगा जी।
सुरेश कुमार ‘सौरभ’ अकवि
ज़मानियां, ग़ाज़ीपुर (उ. प्र.)
रचना-तिथि : 09.01.2026
(कोरस = मुख्य गायक के गाने के बाद पीछे से उसकी पँक्ति दुहराने वाला गायक ‘कोरस’ होता है।)
मेरी रचना को पत्रिका में स्थान मिला इस हेतु मैं आदरणीय डॉ. तेजेन्द्र शर्मा जी एवं सम्पादक मंडल के प्रति हार्दिक कृतज्ञ हूँ। सादर नमन!
प्रिय भाई,
आपकी यह रचना मात्र एक ग़ज़ल नहीं, बल्कि स्वतंत्र चेतना का घोषणापत्र है। ज़मानियां (गाज़ीपुर) की माटी से उपजी यह रचना अपनी सादगी, बेबाकी और तीखे तेवरों से पाठक का ध्यान बरबस ही खींच लेती है। इस पूरी रचना में जो सबसे प्रभावी बात उभरकर सामने आती है, वह है अपनी मौलिकता को बचाए रखने की जिद। आपने बहुत स्पष्ट शब्दों में यह सन्देश दिया है कि किसी का पिछलग्गू बनकर या अपनी पहचान खोकर जीना आपको स्वीकार नहीं है। ‘कोरस’ का गायक बनने से इनकार करना वास्तव में उस भीड़तंत्र का हिस्सा बनने से इनकार करना है, जहाँ व्यक्ति की अपनी आवाज़ कहीं खो जाती है।
आपका यह अन्दाज़ आज के दौर की चाटुकारिता वाली संस्कृति पर एक करारा प्रहार है। आप बड़ी मासूमियत और अधिकार के साथ यह स्पष्ट कर देते हैं कि आप किसी की धुन पर ‘झुनझुना’ बजाने के लिए पैदा नहीं हुए हैं। अपनी शर्तों पर जीने की यह जिजीविषा रचना के हर मिसरे में बिजली की तरह कौंधती है। जब आप कहते हैं कि लोकतंत्र से ‘लोक’ को गायब करना सम्भव नहीं है, तो आप एक जागरूक नागरिक के रूप में खड़े दिखाई देते हैं, जो सत्ता की निरंकुशता को पहचानते हैं और उसे चुनौती देने का साहस रखते हैं।
प्रेम के धरातल पर भी यह गज़ल किसी रूमानी कल्पना लोक में भटकने के बजाय ज़मीन की सच्चाई से रूबरू कराती है। आज के समय में जहाँ प्रेम को प्रदर्शन और भव्यता से तौला जाता है, वहाँ आपका यह कहना कि आप प्रेम की खातिर ताजमहल जैसे भव्य स्मारक बनाने के झूठे दावे नहीं करेंगे, प्रेम की शुद्धता को भौतिकवाद से ऊपर रखता है। इसी तरह, औरों के हिस्से का उजाला छीनकर किसी प्रिय को चाँद लाकर देने की बात को नकारना आपकी उस व्यापक करुणा को दर्शाता है, जिसमें आप अपने निजी सुख के लिए सम्पूर्ण मानवता को अँधेरे में धकेलने के विरोधी हैं।
पूरी रचना में ‘ऐसा थोड़ी होगा जी’ की जो रदीफ इस्तेमाल हुई है, वह एक ओर तो लोक-व्यवहार की मिठास पैदा करती है और दूसरी ओर एक ऐसा प्रतिरोध दर्ज करती है, जो विनम्र है पर अडिग है। गाज़ीपुर की मिट्टी का यह अक्खड़पन कविता के शब्दों में साफ़ महसूस किया जा सकता है, जहाँ फितरत बदलने का ढोंग करने वालों को आईना दिखाया गया है। यह रचना अन्ततः व्यक्ति की निजता, स्वाभिमान और सामाजिक सरोकारों का एक सुन्दर संगम है जो पाठक को अन्तर्मन तक झकझोर देती है।
सुरेश कुमार जी!
आपकी ग़ज़ल पढ़ी।एक नम्बर लगी। उम्मीद और विश्वास के धरातल पर सामने वाले को चित्त करती सी, कि बहुत हुआ ;किसी एटमबम की तरह।
*तुम जो गाओ वह दुहराऊँ, ऐसा थोड़ी होगा जी।*
अब ऐसा नहीं होगा कि मैं भीड़ का हिस्सा बनकर तुम्हारी हाँ में हाँ मिलाऊँ।
*‘कोरस’ का गायक बन जाऊँ, ऐसा थोड़ी होगा जी।*
*लाख बदल लो भेस, मगर फ़ितरत तो वही रहेगी न,*
*चूहा बोले म्याऊँ-म्याऊँ, ऐसा थोड़ी होगा जी।*
प्रतिरोध के प्रखर स्वरों का ऐलान करती है यह ग़ज़ल।
सबसे जबरदस्त पंक्ति है
*संसद में टेबल ठोको, जो चाहे पास करा लो बिल;*
*लोकतंत्र से ‘लोक’ उड़ाऊँ, ऐसा थोड़ी होगा जी।*
यह एकदम न्यायिक है कि
*औरों के हिस्से में भर दूँ, घना अँधेरा रातों का,*
*चाँद तोड़कर तुमको लाऊँ, ऐसा थोड़ी होगा जी।*
चाटुकारिता पर प्रहार करते,
व्यंग्य के तीर से जंग के ऐलान की तरह अव्यवस्था और अन्याय के खिलाफ चेतावनी की तरह है यह ग़ज़ल।
बहुत बहुत बधाई आपको।