1
भ्रम कहाँ तक पाला जाए
अंतरमन खंगाला जाए
सबसे शाना शातिर मन
जिसपर फंदा डाला जाए
टूटेगा, ये दिल दर्पण है
कैसे टूट सँभाला जाए
बछड़े को ना दूध मिलेगा
पूरी ख़ेप गोशाला जाए
सिर के ऊपर पैसा बोले
कैसे काम निकाला जाए
अनशन झूट-दिखावा भर
भूखे पेट निवाला जाए
सूक्ष्म रूप होता अभिमान
कैसे उसको चाला जाए
अंधेरों का ज़ोर बहुत है
डर कर रोज़ उजाला जाए
झूठ से जीना शानोशौक़त
सच पर मरने वाला जाए
झूठ की खेती ख़ूब उगेगी
सच को, बोने वाला जाए
नग्न रूपी वेश-भूषा पर
कैसे पर्दा डाला जाए
2
खुल रहे हैं, मेरे हौसलों के पर धीरे-धीरे
मेरी हिम्मत ने दिखाई असर धीरे-धीरे
देख तज़ुर्बे के तन पर मशक़्क़त की धूप
फौलाद बनने लगा है, जिगर धीरे- धीरे
उनके लबों पर, कहीं मेरा नाम ही न हो
क्यों काँपते हैं, उनके अधर धीरे- धीरे
आँखें उठी हैं या झुक कर दुहरी हुई है
इन अदाओं से दिल तरबतर धीरे-धीरे
पुरानी परंपराओं की, जब से छुट्टी हुई
जहाँ में बढ़ने लगा है, ज़हर धीरे- धीरे
कभी इंतज़ार में, कभी पाने की ज़द में
कट जाएगी बस यूँ हीं सफ़र धीरे-धीरे
जद्दोजहद के बाद की अलसाई रात है
हसरतों का उगता है सहर धीरे – धीरे
ऐश्वर्य की चाह में गाँव हो गई है ख़ाली
भागदौड़ की क़वायद में शहर धीरे-धीरे
स्वार्थ के फ़र्श पर, देख मतलब की छत
अब टूटने लगा है – बामोदर धीरे-धीरे
3
बदले माहौल में, ऐसा बर्ताव होगा
आँखें बेशर्म, पर मूँछों पर ताव होगा
धरती तुम हौसले का पत्थर तो उठाओ
डर जायेगा आसमाँ , गोया पथराव होगा
इरादा नाख़ुदा का हैरत – अंगेज देखा
मन अपने नाव मत उतार, सुझाव होगा
चलने वाले पाँव मंज़िल की तलाश में हैं
पर किसकी दौड़ होगी किसका पाँव होगा
उल्फ़त में ढूँढ लेंगे, कुछ तहजीब ऐसी
बातें जब शूल देगी, ग़म का रिसाव होगा


आदरणीय कृष्ण कुमार जी 1. छोटी बाहर की उम्दा गजल
एक से बढ़कर एक शेर
भरम कहां तक पाला जाए
अंतर्मन खंगाला जाए।
बछड़े को न दूध मिलेगा
पूरी खेप गो शाला जाए
2.उनके लबों पर कही मेरा नाम ही न हो
क्यों कांप रहे हैं उनके अधर धीरे धीरे।
3.बदले माहौल में ऐसा बर्ताव होगा
आंखे बेशर्म पर मूंछों पर तब होगा।
शानदार अशआर ।
बढ़िया गजलें
संजय मासूम की ग़ज़ल शानदार हैं
शानदार अशआर,
इरादा ख़ुदा का हैरतअंगेज देखा…
सुन्दर रचना के आपका और पुरवाई परिवार का आभार