Wednesday, February 11, 2026
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डॉ रूबी भूषण की दो ग़ज़लें

1
लिखने बैठी पीर पुरानी क्‍या बोलूं
आँखों ने बरसाया पानी क्‍या बोलूं
कर जाता कुछ ऐसी बातें महफि़ल में
हो जाती सबको हैरानी क्‍या बोलूं
जख्‍म़ मिला है तुमसे जो मैं भूलूं क्‍या
चाहें रख दो लाख निशानी क्‍या बोलूं
अलग-अलग होते हैं सबके मसले यूं
सबकी अपनी एक कहानी क्‍या बोलूं
रूठे हैं वो बात ज़रा सी होने पर
उनकी ये हरकत बचकानी क्‍या बोलूं

2

सिर्फ़ दौलत का नहीं खुशियों का कारोबार हो
घर के अंदर देखना कोई नहीं लाचार हो
हम तो तन्हा ही निकल आए हैं मंज़िल के लिए
रास्ते में आपका थोड़ा बहुत दीदार हो
दूसरों से क्या ज़रूरी प्यार का ऐलान हो
दिल में अपने वास्ते ही कुछ न कुछ तो प्यार हो
सच तुम्हारी बात को हम मान लेंगे याद रख
शर्त इतनी है कि उसमें वक़्त का आधार हो
हम पड़ोसी के लिए इतना तो अक्सर सोचते
वो हमेशा खुश रहे मन से नहीं बीमार हो
हक उसी को ही मिले इसकी सुरक्षा जो करे
ये गलत है बस यहां वो देश का हकदार हो

डॉ रूबी भूषण
102, शिवराज अपार्टमेंट,
ईस्ट बोरिंग कैनल रोड,
पंचमुखी हनुमान मंदिर के समीप,
पटना-800001
मोबाइल – +91-9931918723
Email –  [email protected]
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1 टिप्पणी

  1. रूबी जी! आपकी दोनों ही गजलें अच्छी लगीं। गजलों की बारीकियाँ तो हम नहीं समझते ।उसके भाव ही हमें मोहते हैं।

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