Monday, March 9, 2026
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मनीष बादल की ग़ज़लें

01
हम देखते ही रह गये बस ख़्वाब आपके
और ग़ैर सारे हो गये अहबाब आपके
बस बेवफ़ाई आपकी अच्छी नहीं लगी
नाज़ो-अदा तो ख़ूब हैं नायाब आपके
हम ख़ुशबुओं से आपकी हैं तर-बतर हुए
हमको लुभाते हैं परे-सुर्खाब आपके
हम आपकी दो आँखों का तारा न बन सके
सारे मगर रक़ीब हैं महताब आपके
हमको डुबो के जान कभी लेंगे ये ज़रूर
गालों पे दिख रहे हैं जो गिर्दाब आपके
ये ख़्वाब है या है ये हक़ीक़त बताइए
अरमान दिख रहे ज़रा बेताब आपके
जज़्बात से यूँ खेलना है शौक़ आपका
दिल-जान ये हमारे हैं अस्बाब आपके
हम आपकी जफ़ा पे भी बस ये दुआ करें
जीवन के सब नज़ारे हों शादाब आपके
‘बादल’ इसी उमीद पर अबतक है जी रहा
इक दिन इधर भी आएंगे आदाब आपके
02.
हम तो फ़िदा हुए हैं यूँ हुस्न-ओ-शबाब पर
जैसे कि जान हारे हैं भौरे गुलाब पर
उनके बग़ैर ज़िन्दगी ऐसी फ़ना हुई
हर रोज़ लिख रहे है जवानी हम आब पर
झुकती हुई निगाह ने देखा कुछ इस तरह
चढ़ने लगे हैं रंग कई मेरे ख़्वाब पर
हमको तो जीतनी ही थी बाज़ी वो प्यार की
हमने लगायी आँखों पर, उसने शराब पर
हरदम ही जिनके वास्ते ख़ुद्दार हम रहे
उनको भी शक़ हुआ है हमारे सवाब पर
जब जाँ पे आ गयी तो किया हमने इक सवाल
आया नहीं है आपका कोई जवाब, पर
तारीफ़ सारे कर रहे ‘बादल’ की आजकल
क़िस्मत फ़िदा हुई है बहुत इन जनाब पर
03.
उठा हूँ दर से तेरे जब भी, ये मलाल रहा
जो पूछना था, दबा दिल में वो सवाल रहा
उसी से प्यार मुझे था उसी से पर्दा था
बताऊँ क्या, तुझे कैसा मेरा विसाल रहा
उसे मिला है कोई तजरबा बुरा शायद
वो मेरी इश्क़ सिफ़ारिश तभी तो टाल रहा
मेरे ख़याल में वो घर बना के यूँ हैं बसे
मुझे नहीं किसी ख़ातून का ख़याल रहा
छिपा के अश्क़ मैं आँखों में, झूठ कहता हूँ
नहीं था दर्द कोई, हिज्र बाक़माल रहा
वो चाहता है उसे दफ़्न कोई राज़ मिले
दराज़ दिल कें मेरे तब ही वो खँगाल रहा
फिर एक बार सितम कर रहा है वो मुझपर
ख़ता किसी की है, इल्ज़ाम मुझपे डाल रहा
अगर जो चाह लो दिल से तो क्या नहीं हासिल
ख़याल वस्ल के ‘बादल’ तभी तो पाल रहा
04.
सब ने हैं पकड़े हाथ में ख़ंजर तो क्या करें
हर ईंट खोजती है कोई सर तो क्या करें
बस इसलिए ही उसकी है बे-नूर शख़्सियत
झाँके नहीं वो ख़ुद के ही अंदर तो क्या करें
उसको क़लम की धार से था बोलना बहुत
लब सी के बैठ जाए सुखनवर तो क्या करें
नदियों ने मिल के कोशिशें तो लाख कीं मगर
फिर भी जो प्यासा रह गया सागर तो क्या करें
इक वक़्त ही है सबसे बड़ा आज बादशाह
ख़ुद से ही हारता है सिकंदर तो क्या करें
माया व मोह से चले सुख-दुःख का कारवाँ
जीवन रहा इसी में उलझकर तो क्या करें
कलियुग में पाप देख इसे बदनाम कर रहे
तुम भूलते हो त्रेता और द्वापर तो क्या करें
जन्नत जो है ज़मीन का वो अम्न खोजता
कुछ ख़ूँ से सींचते वहाँ केसर तो क्या करें
‘बादल’ है पिघले मोम-सा हर दर्द देखकर
उसको ही तुमने कह दिया पत्थर तो क्या करें
05
ख़ुद से ख़ुद की कीजिए पहले शनासाई मियाँ
तब दिखेगी ज़िन्दगी बेहद करिश्माई मियाँ
बस तभी इक-दूसरे से ये लिपट चलती रहीं
ज़िन्दगी गर धूप है तो साँस परछाई मियाँ
चार दिन की ज़िन्दगी मे क़र्ज़ साँसों का मिला
और हम करते हैं इसकी रोज़ भरपाई मियाँ
ख़ूबसूरत शै में ही, धोखे मिले अक्सर छिपे
ज़िन्दगी तब ही लगी है हमको हरजाई* मियाँ
पहले हम जज़्बात में, बहकर लुटाते जान थे
आज रिश्तों में है चलती ख़ूब दानाई मियाँ
इक ज़रा-सी बात पर रिश्ते उधड़ते हैं दिखे
रिश्तों की भी करते रहिए आप तुरपाई मियाँ
चैन से जीना है पगले तो नज़रिये को बदल
ज़िन्दगी की उलझनों में देख रानाई मियाँ
देखिए, सीधा बहुत है, दिल से रिश्ता अक़्ल का
एक लुटने को है बैठा, एक सौदाई मियाँ
तुमने क्या ‘बादल’ को बच्चा ही समझ थोड़ी-सी दी
और अपने पास रख ली तीन चौथाई मियाँ
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1 टिप्पणी

  1. मनीष बादल आपकी ग़ज़ल पुरवाई पत्रिका में पढ़कर ख़ुशी हुई ।
    सभी एक से बढ़कर एक लाज़वाब
    शुभकामना
    Dr Prabha mishra

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